
Seasonal and Monthly Worship of Viṣṇu (Jyeṣṭha–Kārtika), Ritual Purity Rules, and the Greatness of the Lotus Offering
इस अध्याय में ज्येष्ठ मास की विष्णु-पूजा का विधान बताया गया है—शीतल अभिषेक, सुगंधित द्रव्यों का प्रयोग, चँवर से पंखा करना, तथा मंदिर/पूजा-स्थान की उपयुक्तता के नियम। फिर मासानुसार क्रम आता है: आषाढ़ में दधि-भात, मक्खन आदि नैवेद्य; श्रावण-भाद्र में पुष्प-फल, भोजन-नियम और निषेध; तथा आश्विन में जल-तर्पण/अर्घ्य देने का उचित समय। इसके बाद शुद्धि और आचार का विस्तृत भाग है—वस्त्र, केश, गृह-प्रतिष्ठा, तिलक, और वैष्णव शस्त्र-चिह्नों (अंकन/धारण) को रक्षक तथा उद्धारक चिह्न कहा गया है। अंत में कार्तिक-व्रत की महिमा—दीपदान, तुलसी-बिल्व पूजन और कमल-समर्पण—विशेष रूप से गाई गई है; एक इतिहासनुसार पूर्व डाकू भी केवल एक कमल विष्णु को अर्पित कर भक्ति से परिवर्तित होकर ज्ञान और मोक्ष प्राप्त करता है।
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