Adhyaya 23
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Adhyaya 23

The Glory of Ekādaśī: From Vigil Worship to Yama’s Court and the Two Paths

व्यास राजा कोचराश और रानी सुप्राज्ञा को एकादशी-व्रत में निष्ठावान आदर्श वैष्णव बतलाते हैं। वे दशमी के नियमों का पालन कर एकादशी की मध्यरात्रि में जागरण करते हैं—भजन, नृत्य, धूप-दीप, तुलसी-सेवा और सामूहिक कीर्तन से भगवान् हरि की आराधना करते हुए। ब्राह्मण शौरि उनके दुर्लभ आचरण की प्रशंसा कर उनकी पवित्रता का कारण पूछता है। सुप्राज्ञा अपने पूर्वजन्म का रहस्य खोलती है—वह वेश्या-जीवन और नित्योदयनामक दुराचारी पुरुष से संबंध के पापों का वर्णन करती है। उसी जीवन में दुःखवश/अनायास हुआ उपवास, दीप-प्रज्वलन, रात्रि-जागरण और नाम-स्मरण एकादशी के दिन उनके पापों का नाश करने वाला बना। यमलोक में चित्रगुप्त एकादशी की महिमा का प्रमाण देता है; धर्मराज यम उन्हें सम्मानपूर्वक मुक्त कर विष्णुधाम की ओर भेज देते हैं। इसके बाद अध्याय परलोक के दो मार्गों का उपदेश देता है—धर्मात्माओं के लिए शोभायमान, सुखद मार्ग और पापियों के लिए विशाल, यातनापूर्ण मार्ग; साथ ही नरकों और दंडों का वर्णन आता है। अंत में एकादशी को सर्वोत्तम व्रत घोषित कर राजदम्पति की हरि-प्राप्ति के साथ कथा पूर्ण होती है।

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