Adhyaya 3
Kriyayoga SaraAdhyaya 30

Adhyaya 3

Constituents of Kriyā-yoga and the Greatness of Gaṅgādvāra (The Story of King Manobhadra and the Vulture’s Past Lives)

जैमिनि व्यास से क्रिया-योग का सार पूछते हैं और कहते हैं कि मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, इसलिए मुक्ति के लिए शीघ्र साधना आवश्यक है। व्यास क्रिया-योग के ठोस अंग बताते हैं—गंगा का आदर-पूजन, धर्म के अनुरूप श्री/समृद्धि, विष्णु-भक्ति, दान, ब्राह्मण-सेवा, एकादशी-व्रत, धात्री (आँवला) और तुलसी की भक्ति, तथा अतिथि-सत्कार। फिर गंगा की तारक शक्ति का विशेष वर्णन होता है—गंगाद्वार, प्रयाग और समुद्र-संगम में स्नान-सेवा का महात्म्य बताया जाता है; यहाँ तक कहा जाता है कि ‘गंगा’ नाम का उच्चारण भी पाप हर लेता है। इसके बाद कथा-प्रसंग में राजा मनोभद्र एक गिद्ध से उसके पूर्वजन्मों का वृत्तांत सुनते हैं—यमराज और चित्रगुप्त की सभा में कर्म-निर्णय, ब्राह्मणों के प्रति कंजूसी और माता-पिता के अपमान के भयंकर परिणाम, तथा गंगा में आकस्मिक मृत्यु से भी अद्भुत मुक्ति का प्रसंग। अंत में फलश्रुति है कि श्रद्धा से सुनने-पढ़ने पर शीघ्र पाप-नाश होता है।

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