Adhyaya 20
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Adhyaya 20

The Glory of Charity (Supremacy of All Gifts in Kali Yuga)

इस अध्याय में कलियुग में दान को सर्वोच्च धर्म बताकर तप से भी श्रेष्ठ ठहराया गया है। कहा गया है कि तप कभी-कभी दोष और हिंसा का कारण बन सकता है, पर दान स्वभावतः अहिंसक और पुण्यदायक है; विशेष रूप से अन्नदान और जलदान को प्राणदायी, सर्वश्रेष्ठ दान कहा गया है। हस्तिनापुर में रतिविदग्धा नामक वेश्या, क्षेमंकारी नामक ब्राह्मणी-विधवा और धनवान ब्राह्मण हरिशर्मा—तीनों की मृत्यु के बाद यमदूत उन्हें धर्मपुर ले जाते हैं। वहाँ चित्रगुप्त कर्मों का लेखा जाँचता है; भारी पापों के होते हुए भी वेश्या का अन्नदान और ब्राह्मणी का बाल्यकाल में किया जलदान महान पाप-भार को नष्ट कर देता है, और यम उन्हें विष्णुलोक भेज देता है। हरिशर्मा को सम्मान तो मिलता है, पर कंजूसी के कारण उसे भोजन नहीं मिलता; तब ब्रह्मा समझाते हैं कि जो धन न भोगा जाए न दान किया जाए, वह व्यर्थ नष्ट हो जाता है। अंत में भूमि, गौ, स्वर्ण, ग्रंथ, ज्ञान आदि विविध दानों के फल बताए गए हैं और लक्ष्मीपति को प्रसन्न करने हेतु श्रद्धापूर्वक दान करने की प्रेरणा दी गई है।

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