
भीष्मविक्रमदर्शनं तथा क्रौञ्चारुणव्यूहविधानम् | Bhīṣma’s Ascendancy and the Organization of the Krauñcāruṇa Formation
Upa-parva: Vyūha-nirmāṇa (Pāṇḍava-vyūha-prastāva) — Krauñcāruṇa-vyūha Context
Saṃjaya reports that after an initial withdrawal of troops, Bhīṣma renews combat intensity, producing visible pressure on the Pāṇḍava forces. Yudhiṣṭhira approaches Kṛṣṇa in distress, describing Bhīṣma as an overwhelming tactical force and expressing fear of coalition attrition; he momentarily contemplates withdrawal to the forest as an ethical escape from further losses. He also critiques the limited effectiveness of straightforward heroism (even Bhīma’s) against entrenched masters of arms (Bhīṣma and Droṇa) and asks for decisive guidance. Kṛṣṇa responds by discouraging despair, enumerating allies and reaffirming the coalition’s readiness; he points to Dhṛṣṭadyumna’s command and signals Śikhaṇḍin’s instrumental role in Bhīṣma’s downfall. Yudhiṣṭhira then instructs Dhṛṣṭadyumna to counter with the Krauñcāruṇa-vyūha, attributed to Bṛhaspati’s tradition, and the text details its structure—head, wings, neck, rear—along with banners, troop distributions, and regional contingents assembling for engagement at sunrise.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र के सम्मुख संजय गीता-उपदेश के रहस्य को छेड़ते हैं—मन की शुद्धि, आहार-विचार, और कर्म की शुद्धता का सूत्र खोलते हुए, जैसे युद्धभूमि के कोलाहल के बीच आत्मा का दीपक जल उठे। → कृष्ण अर्जुन को संन्यास और त्याग का भेद बताते हैं: कुछ मनीषी कर्म को दोषयुक्त मानकर त्याज्य कहते हैं, तो कुछ यज्ञ-दान-तप को अ-त्याज्य बताते हैं। फिर कर्म-सिद्धि के ‘पाँच कारण’ (अधिष्ठान आदि) रखकर यह तनाव बढ़ाते हैं कि कर्म होता दिखता है, पर कर्ता कौन है? इसी बीच बुद्धि के तीन रूप—तामसी, राजसी, सात्त्विकी—का निर्णय-क्षेत्र खुलता है, जहाँ अधर्म को धर्म मान लेने वाली तामसी बुद्धि सबसे बड़ा संकट बनती है। → परम गुह्य वचन का शिखर: कर्म-फल-त्याग, बुद्धि की शुद्धि, और स्वभावज कर्म (वैश्य का कृषि-गोरक्षा-वाणिज्य, शूद्र की परिचर्या) के विधान के साथ कृष्ण यह भी उद्घोष करते हैं कि जो इस परम रहस्य को भक्तों में कहेगा और भक्ति को परम बनाकर बोलेगा, वह निश्चय ही मुझे प्राप्त होगा—ज्ञान का फल स्वयं भक्ति बनकर प्रकट होता है। → संजय धृतराष्ट्र से कहता है कि केशव-अर्जुन का यह पुण्य, अद्भुत, रहस्ययुक्त संवाद स्मरण कर-कर के वह बार-बार हर्षित होता है; उपदेश की महिमा स्वयं कथावाचक के हृदय में आनंद बनकर स्थिर हो जाती है। → संजय अब धृतराष्ट्र के सामने विजय की निश्चितता की ओर संकेत करता है—उपदेश का निष्कर्ष युद्ध के परिणाम की छाया बनकर अगले प्रसंग की देहरी पर खड़ा है।
Verse 1
२)। अन्त:करणकी शुद्धिसे ही विचार, भाव, श्रद्धादि गुण और क्रियाएँ शुद्ध होंगी। अतएव इस प्रसंगमें आहारका विवेचन करके यह भाव दिखलाया गया है कि सात्त्विक, राजस और तामस आहारोंमें जो आहार जिसको प्रिय होता है, वह उसी गुणवाला होता है। इसी भावसे शलोकमें “प्रिय” शब्द देकर विशेष लक्ष्य कराया गया है। अतः आहारकी दृष्टिसे भी उसकी पहचान हो सकती है। यही बात यज्ञ, दान और तपके विषयमें भी समझ लेनी चाहिये। ३. दूध, चीनी आदि रसयुक्त पदार्थोंको 'रस्याः” कहते हैं। २. मक्खन, घी तथा सात्त्विक पदार्थोंसे निकाले हुए तैल आदि स्नेहयुक्त पदार्थोंको “स्निग्धा:” कहते हैं। 3. जिन पदार्थोंका सार बहुत कालतक शरीरमें स्थिर रह सकता है, ऐसे ओज उत्पन्न करनेवाले पदार्थोंको 'स्थिरा:' कहते हैं। ४. जो गंदे और अपवित्र नहीं हैं तथा देखते ही मनमें साच्चिक रुचि उत्पन्न करनेवाले हैं, ऐसे पदार्थोको /ह॒द्या:" कहते हैं। ५. भक्ष्य, भोज्य, लेह्मु और चोष्य--इन चार प्रकारके खानेयोग्य पदार्थोकी “आहार” कहते हैं। ६. (१) आयुका अर्थ है उम्र या जीवन। जीवनकी अवधिका बढ़ जाना आयुका बढ़ना है। (२) सत्त्वका अर्थ है बुद्धि। बुद्धिका निर्मल, तीक्ष्ण एवं यथार्थ तथा सूक्ष्मदर्शिनी होना ही सत्त्वका बढ़ना है। (३) बलका अर्थ है सत्कार्यमें सफलता दिलानेवाली मानसिक और शारीरिक शक्ति। इस आन्तर एवं बाह्मशक्तिका बढ़ना ही बलका बढ़ना है। (४) मानसिक और शारीरिक रोगोंका नष्ट होना ही आरोग्यका बढ़ना है। (५) हृदयमें संतोष, सात्त्विक प्रसन्नता और पुष्टिका होना तथा मुखादि शरीरके अंगोंपर शुद्धभावजनित आनन्दके चिह्नोंका प्रकट होना सुख है; इनकी वृद्धि सुखका बढ़ना है। (६) चित्तवृत्तिका प्रेमभावसम्पन्न हो जाना और शरीरमें प्रीतिकर चिह्लोंका प्रकट होना ही प्रीतिका बढ़ना है। उपर्युक्त आयु, बुद्धि और बल आदिको बढ़ानेवाले जो दूध, घी, शाक, फल, चीनी, गेहूँ, जौ, चना, मूँग और चावल आदि सात्तविक आहार हैं, उन सबको समझानेके लिये आहारका यह लक्षण किया गया है। ७. नीम, करेला आदि पदार्थ कड़वे हैं, इमली आदि खट्टे हैं, क्षार तथा विविध भाँतिके नमक नमकीन हैं, बहुत गरम-गरम वस्तुएँ अति उष्ण हैं, लाल मिर्च आदि तीखे हैं, भाड़में भूँजे हुए अन्नादि रूखे हैं और राई आदि पदार्थ दाहकारक हैं। उपर्युक्त पदार्थोको खानेके समय गले आदिमें तकलीफका होना, जीभ, तालू आदिका जलना, दाँतोंका आम जाना, चबानेमें दिक्कत होना, आँखों और नाकोंमें पानी आ जाना, हिचकी आना आदि जो वष्ट होते हैं, उन्हें 'दुःख” कहते हैं। खानेके बाद जो पश्चात्ताप होता है, उसे “चिन्ता” कहते हैं और खानेसे जो बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें 'रोग” कहते हैं। इन कड़वे, खट्टे आदि पदार्थोंके खानेसे ये दु:ख, चिन्ता और रोग उत्पन्न होते हैं। इसलिये इन्हें “दुःख, चिन्ता और रोगोंको उत्पन्न करनेवाले” कहा है। अतएव इनका त्याग करना उचित है। ८. 'यातयाम” अर्थात् अधपका उन फलों अथवा उन खाद्य पदार्थोंको समझना चाहिये, जो पूरी तरहसे पके न हों अथवा जिनके सिद्ध होनेमें (सीझनेमें) कमी रह गयी हो। इसी श्लोकमें *पर्युषितम” यानी बासी अन्नको तामस बतलाया गया है। “यातयामम्” का अर्थ एक प्रहर पहलेका बना भोजन मान लेनेसे “बासी' भोजनको तामस बतलानेकी कोई सार्थकता नहीं रह जाती; यह सोचकर यहाँ “यातयामम” का अर्थ “अधपका' किया गया है। ९. अग्नि आदिके संयोगसे, हवासे अथवा मौसिम बीत जाने आदिके कारणोंसे जिन रसयुक्त पदार्थोंका रस सूख गया हो (जैसे संतरे, ऊख आदिका रस सूख जाया करता है), उनको “गतरस'” कहते हैं। १०. खानेकी जो वस्तुएँ स्वभावसे ही दुर्गन्धयुक्त हों (जैसे प्याज, लहसुन आदि) अथवा जिनमें किसी क्रियासे दुर्गन््ध उत्पन्न कर दी गयी हो, उन वस्तुओंको “पूति” कहते हैं। ३३. पहले दिनके बनाये हुए भोजनको “पर्युषित” या बासी कहते हैं। उन फलोंको भी बासी समझना चाहिये, जिनमें पेड़से तोड़े बहुत समय बीत जानेके कारण विकार उत्पन्न हो गया हो। ३२. अपने या दूसरेके भोजन कर लेनेपर बची हुई जूठी चीजोंको 'उच्छषिष्ट” कहते हैं। ३१३. मांस, अण्डे आदि हिंसामय और शराब-ताड़ी आदि निषिद्ध मादक वस्तुएँ, जो स्वभावसे ही अपवित्र हैं अथवा जिनमें किसी प्रकारके संगदोषसे, किसी अपवित्र वस्तु, स्थान, पात्र या व्यक्तिके संयोगसे या अन्याय और अधर्मसे उपार्जित असत् धनके द्वारा प्राप्त होनेके कारण अपवित्रता आ गयी हो, उन सब वस्तुओंको “अमेध्य” कहते हैं। ऐसे पदार्थ देव-पूजनमें भी निषिद्ध माने गये हैं। इनके सिवा गाँजा, भाँग, अफीम, तम्बाकू, सिगरेट-बीड़ी, अर्क, आसव और अपवित्र दवाइयाँ आदि तमोगुण उत्पन्न करनेवाली जितनी भी खान-पानकी वस्तुएँ हैं--सभी अपवित्र हैं। $. यज्ञ करनेवाले जो पुरुष उस यज्ञसे स्त्री, पुत्र, धन, मकान, मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा, विजय या स्वर्ग आदिकी प्राप्ति एवं किसी प्रकारके अनिष्टकी निवृत्तिरूप इस लोक या परलोकके किसी प्रकारके सुखभोग या दुःख-निवृत्तिकी जरा भी इच्छा नहीं करते, उनका वाचक 'अफलाकाडुक्षिभि:” पद है (गीता ६।१) २. देवता आदिके उद्देश्यसे घृतादिके द्वारा अग्निमें हवन करना या अन्य किसी प्रकारसे किसी भी वस्तुका समर्पण करके किसीकी यथायोग्य पूजा करना “यज्ञ" कहलाता है। 3. अपने-अपने वर्णाश्रमके अनुसार जिस यज्ञका जिसके लिये शास्त्रोंमें विधान है, उसको अवश्य करना चाहिये; ऐसे शास्त्रविहित कर्तव्यरूप यज्ञका न करना भगवान्के आदेशका उल्लंघन करना है--इस प्रकार यज्ञ करनेके लिये मनमें दृढ़ निश्चय करके निष्कामभावसे जो यज्ञ किया जाता है, वही यज्ञ सात््विक होता है। ४. जो यज्ञ किसी फलप्राप्तिके उद्देश्यसे किया गया है, वह शास्त्रविहित और श्रद्धापूर्वक किया हुआ होनेपर भी राजस है, एवं जो दम्भपूर्वक किया जाता है, वह भी राजस है; फिर जिसमें ये दोनों दोष हों, उसके 'राजस' होनेमें तो कहना ही कया है? ५. जो यज्ञ शास्त्रविहित न हो या जिसके सम्पादनमें शास्त्रविधिकी कमी हो अथवा जो शास्त्रोक्त विधानकी अवहेलना करके मनमाने ढंगसे किया गया हो, उसे “विधिहीन” कहते हैं। ६. जो यज्ञ शास्त्रोक्त मन्त्रोंसे रहित हो, जिसमें मन्त्रप्रयोग हुए ही न हों या विधिवत् न हुए हों अथवा अवहेलनासे त्रुटि रह गयी हो--उस यज्ञको “मन्त्रहीन' कहते हैं। ७. ब्रह्मा, महादेव, सूर्य, चन्द्रमा, दुर्गा, अग्नि, वरुण, यम, इन्द्र आदि जितने भी शास्त्रोक्त देवता हैं-- शास्त्रोंमें जिनके पूजनका विधान है, उन सबका वाचक यहाँ “देव” शब्द है। 'द्विज' शब्द ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य--इन तीनों वर्णोका वाचक होनेपर भी यहाँ केवल ब्राह्मणोंहीके लिये प्रयुक्त है; क्योंकि शास्त्रानुसार ब्राह्मण ही सबके पूज्य हैं। “गुरु” शब्द यहाँ माता, पिता, आचार्य, वृद्ध एवं अपनेसे जो वर्ण, आश्रम और आयु आदिमें किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबका वाचक है तथा “प्राज्ञ" शब्द यहाँ परमेश्वरके स्वरूपको भलीभाँति जाननेवाले महात्मा ज्ञानी पुरुषोंका वाचक है। इन सबका यथायोग्य आदर-सत्कार करना; इनको नमस्कार करना; दण्डवत्-प्रणाम करना; इनके चरण धोना; इन्हें चन्दन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि समर्पण करना; इनकी यथायोग्य सेवा आदि करना और इन्हें सुख पहुँचानेकी उचित चेष्टा करना आदि इनका पूजन करना है। <. यहाँ पवित्रता” केवल शारीरिक शौचका वाचक है; क्योंकि वाणीकी शुद्धिका वर्णन अगले पंद्रहवें श्लोकमें और मनकी शुद्धिका वर्णन सोलहवें श्लोकमें अलग किया गया है। जल-मृतिकादिके द्वारा शरीरको स्वच्छ और पवित्र रखना एवं शरीरसम्बन्धी समस्त चेष्टाओंका उत्तम होना ही शरीरकी पवित्रता है (गीता १६।३) १. यहाँ शरीरकी अकड़ और ऐंठ आदि वक्रताके त्यागका नाम 'सरलता' है। २. यहाँ “ब्रह्मचर्य” शब्द शरीरसम्बन्धी सब प्रकारके मैथुनोंके त्याग और भलीभाँति वीर्य धारण करनेका बोधक है। 3. शरीरद्वारा किसी भी प्राणीको किसी भी प्रकारसे कभी जरा भी कष्ट न पहुँचानेका नाम ही यहाँ “अहिंसा' है। ४. उपर्युक्त क्रियाओंमें शरीरकी प्रधानता है अर्थात् इनसे शरीरका विशेष सम्बन्ध है और ये इन्द्रियोंके सहित शरीरको उसके समस्त दोषोंका नाश करके पवित्र बना देनेवाली हैं, इसलिये इन सबको “शरीरसम्बन्धी तप” कहते हैं। ५. जो वचन किसीके भी मनमें जरा भी उद्धेग उत्पन्न करनेवाले न हों तथा निन्दा या चुगली आदि दोषोंसे सर्वथा रहित हों, उन्हें “अनुद्वेगकर” कहते हैं। जैसा देखा, सुना और अनुभव किया हो, ठीक वैसा- का-वैसा ही भाव दूसरेको समझानेके लिये जो यथार्थ वचन बोले जायूँ, उनको “सत्य” कहते हैं। जो सुननेवालेको प्रिय लगते हों तथा कटुता, रूखापन, तीखापन, ताना और अपमानके भाव आदि दोषोंसे सर्वथा रहित हों--ऐसे प्रेमयुक्त, मीठे, सरल और शान्त वचनोंको “प्रिय” कहते हैं; तथा जिनसे परिणाममें सबका हित होता हो; जो हिंसा, द्वेष, डाह, वैरसे सर्वथा शून्य हों और प्रेम, दया तथा मंगलसे भरे हों, उनको 'हित” कहते हैं। जिस वाक्यमें उपर्युक्त सभी गुणोंका समावेश हो एवं जो शास्त्रवर्णित वाणीसम्बन्धी सब प्रकारके दोषोंसे रहित हो, उसी वाक्यके उच्चारणको “वाचिक तप” माना जा सकता है। ६. विषाद-भय, चिन्ता-शोक, व्याकुलता-उद्विग्नता आदि दोषोंसे रहित होकर सात्त्विक प्रसन्नता, हर्ष और बोधशक्तिसे युक्त हो जाना ही “मनका प्रसाद' है। ७. रूक्षता, डाह, हिंसा, प्रतिहिंसा, क्रूरता, निर्दयता आदि तापकारक दोषोंसे सर्वथा शून्य होकर मनका सदा-सर्वदा शान्त और शीतल बने रहना ही “सौम्यत्व' है। ८. मनका निरन्तर भगवानके गुण, प्रभाव, तत्त्व, स्वरूप, लीला और नाम आदिके चिन्तनमें या ब्रह्मविचारमें लगे रहना ही “मौन” है। ९, अन्त:करणकी चंचलता सर्वथा नाश होकर उसका स्थिर तथा अच्छी प्रकार अपने वशमें हो जाना ही “आत्मविनिग्रह' है। १०. अन्तःकरणमें राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर, ईर्ष्या-वैर, घृणा-तिरस्कार, असूया- असहिष्णुता, प्रमाद, व्यर्थ विचार, इष्टविरोध और अनिष्टचिन्तन आदि दुर्भावोंका सर्वथा नष्ट हो जाना और इनके विरोधी दया, क्षमा, प्रेम, विनय आदि समस्त सद्भावोंका सदा विकसित रहना “भावसंशुद्धि' है। १३१. जो मनुष्य इस लोक या परलोकके किसी प्रकारके भी सुखभोग अथवा दुःखकी निवृत्तिरूप फलकी कभी किसी भी कारणसे किंचिन्मात्र भी कामना नहीं करता, उसे “अफलाकाडक्षी” कहते हैं और जिसके मन, बुद्धि और इन्द्रिय अनासक्त, निगृहीत तथा शुद्ध होनेके कारण कभी किसी भी प्रकारके भोगके सम्बन्धसे विचलित नहीं हो सकते, जिसमें आसक्तिका सर्वथा अभाव हो गया है, उसे “युक्त” कहते हैं। उपर्युक्त तीन प्रकारका तप जब ऐसे निष्काम पुरुषोंद्वारा किया जाता है, तभी वह पूर्ण सात््विक होता है। ३२, शास्त्रोंमें उपर्युक्त तपका जो कुछ भी महत्त्व, प्रभाव और स्वरूप बतलाया गया है, उसपर प्रत्यक्षसे भी बढ़कर सम्मानपूर्वक पूर्ण विश्वास होना “परम श्रद्धा” है और ऐसी श्रद्धासे युक्त होकर बड़े-से-बड़े विघ्नों या कष्टोंकी कुछ भी परवा न करके सदा अविचलित रहते हुए अत्यन्त आदर और उत्साहपूर्वक उपर्युक्त तपका आचरण करते रहना ही उसे परम श्रद्धासे करना है। ३३. अभिप्राय यह है कि शरीर, वाणी और मनसम्बन्धी उपर्युक्त तप ही सात्त्विक हो सकते हैं। साथ ही यह भी दिखलाया है कि यद्यपि ये तप स्वरूपसे तो साच्त्विक हैं; परंतु वे पूर्ण सात््विक तब होते हैं, जब इस श्लोकमें बतलाये हुए भावसे किये जाते हैं। १. तपमें वस्तुत: आस्था न होनेपर भी लोगोंको धोखा देकर किसी प्रकारका स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये तपस्वीका-सा स्वाँग रचकर जो किसी लौकिक या शास्त्रीय तपका बाहरसे दिखाने भरके लिये आचरण किया जाता है, उसे दम्भसे तप करना कहते हैं। २. जिस फलकी प्राप्तिके लिये उसका अनुष्ठान किया जाता है, उसका प्राप्त होना या न होना निश्चित नहीं है; इसलिये उसे “अध्रुव” कहा है और जो कुछ फल मिलता है, वह भी सदा नहीं रहता, उसका निश्चय ही नाश हो जाता है; इसलिये उसे “चल” कहा है। 3. तपकी प्रसिद्धिसे जो इस प्रकार जगत्में बड़ाई होती है कि यह मनुष्य बड़ा भारी तपस्वी है, इसकी बराबरी कौन कर सकता है, यह बड़ा श्रेष्ठ है आदि--उसका नाम 'सत्कार' है। किसीको तपस्वी समझकर उसका स्वागत करना, उसके सामने खड़े हो जाना, प्रणाम करना, मानपत्र देना या अन्य किसी क्रियासे उसका आदर करना “मान' है, तथा उसकी आरती उतारना, पैर धोना, पत्र-पुष्पादि षोडशोपचारसे पूजा करना, उसकी आज्ञाका पालन करना--इन सबका नाम “पूजा” है। इन सबके लिये जो लौकिक या शास्त्रीय तपका आचरण किया जाता है, वही सत्कार, मान और पूजाके लिये तप करना है। इसके सिवा अन्य किसी स्वार्थकी सिद्धिके लिये किया जानेवाला तप भी राजस है। ४. तपके वास्तविक लक्षणोंको न समझकर जिस किसी भी क्रियाको तप मानकर उसे करनेका जो हठ या दुराग्रह है, उसे “मूढ्ग्राह” कहते हैं। ५. जिस तपका वर्णन इसी अध्यायके पाँचवें और छठे श्लोकोंमें किया गया है, जो अशास्त्रीय, मनःकल्पित, घोर और स्वभावसे ही तामस है, जिसमें दम्भकी प्रेरणासे या अज्ञानसे पैरोंको पेड़की डालीमें बाँधकर सिर नीचा करके लटकना, लोहेके काँटोंपर बैठना तथा इसी प्रकारकी अन्यान्य घोर क्रियाएँ करके बुरी भावनासे अर्थात् दूसरोंकी सम्पत्तिका हरण करने, उसका नाश करने, उनके वंशका उच्छेद करने अथवा उनका किसी प्रकार कुछ भी अनिष्ट करनेके लिये जो अपने मन, वाणी और शरीरको ताप पहुँचाना है--उसे “तामस तप” कहते हैं। ६. वर्ण, आश्रम, अवस्था और परिस्थितिके अनुसार शास्त्रविहित दान करना--अपने स्वत्वको यथाशक्ति दूसरोंके हितमें लगाना मनुष्यका परम कर्तव्य है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो मनुष्यत्वसे गिरता है और भगवान्के कल्याणमय आदेशका अनादर करता है। अतः जो दान केवल इस कर्तव्य बुद्धिसे ही दिया जाता है, जिसमें इस लोक और परलोकके किसी भी फलकी जरा भी अपेक्षा नहीं होती--वही दान पूर्ण साच्विक है। ७. जिस देश और जिस कालमें जिस वस्तुकी आवश्यकता हो, उस वस्तुके दानद्वारा सबको यथायोग्य सुख पहुँचानेके लिये वही योग्य देश और काल है। इसके अतिरिक्त कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, मथुरा, काशी, प्रयाग, नैमिषारण्य आदि तीर्थस्थान और ग्रहण, पूर्णिमा, अमावस्या, संक्रान्ति, एकादशी आदि पुण्यकाल --जो दानके लिये शास्त्रोंमें प्रशस्त माने गये हैं, वे भी योग्य देश-काल हैं। ८. जिसके पास जहाँ जिस समय जिस वस्तुका अभाव हो, वह वहीं और उसी समय उस वस्तुके दानका पात्र है। जैसे--भूखे, प्यासे, नंगे, दरिद्र, रोगी, आर्त, अनाथ और भयभीत प्राणी अन्न, जल, वस्त्र, निर्वाहयोग्य धन, औषध, आश्वासन, आश्रय और अभयदानके पात्र हैं। आर्त प्राणियोंकी पात्रतामें जाति, देश और कालका कोई बन्धन नहीं है। उनकी आतुरदशा ही पात्रताकी पहचान है। इनके सिवा जो श्रेष्ठ आचरणोंवाले विद्वान, ब्राह्मण, उत्तम ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी तथा सेवाव्रती लोग हैं--जिनको जिस वस्तुका दान देना शास्त्रमें कर्तव्य बतलाया गया है--वे भी अपने-अपने अधिकारके अनुसार यथाशक्ति धन आदि सभी आवश्यक वस्तुओंके दानपात्र हैं। १. जिसका अपने ऊपर उपकार है, उसकी सेवा करना तथा यथासाध्य उसे सुख पहुँचानेका प्रयास करना तो मनुष्यका कर्तव्य ही है। उसे जो लोग दान समझते हैं, वे वस्तुत: उपकारीका तिरस्कार करते हैं और जो लोग उपकारीकी सेवा नहीं करना चाहते, वे तो कृतघ्नकी श्रेणीमें हैं; अतएव अपना उपकार करनेवालेकी तो सेवा करनी ही चाहिये। यहाँ अनुपकारीको दान देनेकी बात कहकर भगवान् यह भाव दिखलाते हैं कि दान देनेवाला दानके पात्रसे बदलेमें किसी प्रकारके जरा भी उपकार पानेकी इच्छा न रखे। जिससे किसी भी प्रकारका अपना स्वार्थका सम्बन्ध मनमें नहीं है, उस मनुष्यको जो दान दिया जाता है--वही सात्त्विक है। इससे वस्तुतः दाताकी स्वार्थबुद्धिका ही निषेध किया गया है। २. किसीके धरना देने, हठ करने या भय दिखलाने अथवा प्रतिष्ठित और प्रभावशाली पुरुषोंके कुछ दबाव डालनेपर बिना ही इच्छाके मनमें विषाद और दुःखका अनुभव करते हुए निरुपाय होकर जो दान दिया जाता है, वह क्लेशपूर्वक दान देना है। 3. जो मनुष्य बराबर अपने काममें आता है या आगे चलकर जिससे अपना कोई छोटा या बड़ा काम निकालनेकी सम्भावना या आशा है, ऐसे व्यक्ति या संस्थाओंको दान देना प्रत्युपकारके प्रयोजनसे दान देना है। ४. मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादि इस लोक और परलोकके भोगोंकी प्राप्तिके लिये या रोग आदिकी निवृत्तिके लिये जो किसी वस्तुका दान किसी व्यक्ति या संस्थाको दिया जाता है, वह फलके उद्देश्यसे दान देना है। ५. यथायोग्य अभिवादन, कुशल-प्रश्न, प्रियभाषण और आसन आदिद्दवारा सम्मान न करके जो रूखाईसे दान दिया जाता है, वह बिना सत्कारके दिया जानेवाला दान है। ६. पाँच बात सुनाकर, कड़वा बोलकर, धमकाकर, फिर न आनेकी कड़ी हिदायत देकर, दिल्लगी उड़ाकर अथवा अन्य किसी भी प्रकारसे वचन, शरीर या संकेतके द्वारा अपमानित करके जो दान दिया जाता है, वह तिरस्कारपूर्वक दिया जानेवाला दान है। ७. जिस देश-कालमें दान देना आवश्यक नहीं है अथवा जहाँ दान देना शास्त्रमें निषेध किया है, वे देश और काल दानके लिये अयोग्य हैं। ८. जिन मनुष्योंको दान देनेकी आवश्यकता नहीं है तथा जिनको दान देनेका शास्त्रमें निषेध है, वे धर्मध्वजी, पाखण्डी, कपटवेषधारी, हिंसा करनेवाले, दूसरोंकी निन्दा करनेवाले, दूसरोंकी जीविकाका छेदन करके अपने स्वार्थसाधनमें तत्पर, बनावटी विनय दिखानेवाले, मद्य-मांस आदि अभक्ष्य वस्तुओंको भक्षण करनेवाले, चोरी, व्यभिचार आदि नीच कर्म करनेवाले, ठग, जुआरी और नास्तिक आदि सभी दानके लिये अपात्र हैं। ९. जिस परमात्मासे समस्त कर्ता, कर्म और कर्म-विधिकी उत्पति हुई है, उस भगवान्के वाचक '३“', “तत्” और 'सत्'--ये तीनों नाम हैं; अत: इनके उच्चारण आदिसे उन सबके अंगवैगुण्यकी पूर्ति हो जाती है। अतएव प्रत्येक कामके आरम्भमें परमेश्वरके नामोंका उच्चारण करना परम आवश्यक है। $. यहाँ “ब्राह्मण” शब्द ब्राह्मण आदि समस्त प्रजाका, “वेद” चारों वेदोंका, यज्ञ" शब्द यज्ञ, तप, दान आदि समस्त शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंका वाचक है। २. जिस परमेश्वरसे इन यज्ञादि कर्मोंकी उत्पत्ति हुई है, उसका नाम होनेके कारण ओंकारके उच्चारणसे समस्त कर्मोंका अंगवैगुण्य दूर हो जाता है तथा वे पवित्र और कल्याणप्रद हो जाते हैं। यह भगवानके नामकी अपार महिमा है। इसीलिये वेदोक्त मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक यज्ञादि कर्म करनेके अधिकारी दिद्वान् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके यज्ञ, दान, तप आदि समस्त शास्त्रविहित शुभ कर्म सदा ओंकारके उच्चारणपूर्वक ही होते हैं। ३. जो विहित कर्म करनेवाले साधारण वेदवादी हैं, वे फलकी इच्छा या अहंता-ममताका त्याग नहीं करते; किंतु जो कल्याणकामी मनुष्य हैं, जिनको परमेश्वरकी प्राप्तिके सिवा अन्य किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है, वे समस्त कर्म अहंता, ममता, आसक्ति और फल-कामनाका सर्वथा त्याग करके केवल परमेश्वरके ही लिये उनके आज्ञानुसार किया करते हैं। ४. सद्भाव” (सत्यभाव) नित्य भावका अर्थात् जिसका अस्तित्व सदा रहता है, उस अविनाशी तत्त्वका वाचक है और वही परमेश्वरका स्वरूप है। इसलिये उसे 'सत” नामसे कहा जाता है। ५. अन्तःकरणका जो शुद्ध और श्रेष्ठभाव है, उसका वाचक यहाँ 'साधुभाव” है। वह परमेश्वरकी प्राप्तिका हेतु है; इसलिये उसमें परमेश्वरके 'सत्” नामका प्रयोग किया जाता है अर्थात् उसे 'सद्भाव” कहा जाता है। ६. जो शास्त्रविहित करनेयोग्य शुभ कर्म है, वह निष्कामभावसे किये जानेपर परमात्माकी प्राप्तिका हेतु है; इसलिये उसमें परमात्माके 'सत” नामका प्रयोग किया जाता है अर्थात् उसे “सत् कर्म” कहा जाता है। ७. यज्ञ, तप और दानसे यहाँ साच्चिक यज्ञ, तप और दानका निर्देश किया गया है तथा उनमें जो श्रद्धा और प्रेमपूर्वक आस्तिक बुद्धि है, जिसे निष्ठा भी कहते हैं, उसका वाचक यहाँ “स्थिति” शब्द है; ऐसी स्थिति परमेश्वरकी प्राप्तिमें हेतु है, इसलिये वह “सत्' है। ८. जो कोई भी कर्म केवल भगवानके आज्ञानुसार उन्हींके लिये किया जाता है, जिसमें कर्ताका जरा भी स्वार्थ नहीं रहता--ऐसा कर्म कतके अन्त:करणको शुद्ध बनाकर उसे परमेश्वरकी प्राप्ति करा देता है, इसलिये वह 'सत' है। ३. 'यत"” पदसे यहाँ निषिद्ध कर्मोंका समाहार नहीं है; क्योंकि निषिद्ध कर्मोके करनेमें श्रद्धाकी आवश्यकता नहीं है और उनका फल भी श्रद्धापर निर्भर नहीं है। उनको करते भी वे ही मनुष्य हैं, जिनकी शास्त्र, महापुरुष और ईश्वरमें पूर्ण श्रद्धा नहीं होती। जिनको विश्वास नहीं है, उनको भी पापकर्मोंका दुःखरूप फल अवश्य ही मिलता है। अतः यहाँ यज्ञ, दान और तपरूप शुभ क्रियाओंके साथ-साथ आया हुआ “यत् कृतम्” पद उसी जातिकी क्रियाका वाचक है। २. हवन, दान और तप तथा अन्यान्य शुभ कर्म श्रद्धापूर्वक किये जानेपर ही अन्त:करणकी शुद्धिमें और इस लोक या परलोकके फल देनेमें समर्थ होते हैं। बिना श्रद्धाके किये हुए शुभ कर्म व्यर्थ हैं, इसीसे उनको 'असत्' और “वे इस लोक या परलोकमें कहीं भी लाभप्रद नहीं हैं'--ऐसा कहा है। द्विचत्वारिशो5् ध्याय: (श्रीमद्धगवद्गीतायामष्टादशो< ध्याय:) त्यागका, सांख्यसिद्धान्तका, फलसहित वर्ण-धर्मका, उपासनासतहित ज्ञाननिष्ठाका, भक्तिसहित निष्काम कर्मयोगका एवं गीताके माहात्म्यका वर्णन सम्बन्ध--गीताके दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे गीताके उपदेशका आरम्भ हुआ। वहॉसे आरम्भ करके तीसवें *लीकतक भगवान्ने ज्ञानयोगका उपदेश दिया और प्रसंगवश क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करनेकी कर्तव्यताका प्रतिपादन करके उनतालीसवें *लोकसे लेकर अध्यायकी समाप्ति-पर्यन्त कर्मगोगका उपदेश दिया; उसके बाद तीसरे अध्यायसे सत्रहवें अध्यायतक कहीं ज्ञानयोगकी दृष्टिसे और कहीं कर्मयोगकी दृष्टिसे परमात्माकी प्राप्तिके बहुत-से साधन बतलाये। उन सबको युननेके अनन्तर अब अर्जुन इस अठारहवें अध्यायमें समस्त जअध्यायोंके उपदेशका सार जाननेके उद्देश्यसे भगवान्के सामने संन्यास यानी ज्ञानयोगका और त्याग यानी फलासक्तिके त्यागरूप कर्मयोगका तत्त्व थलीभॉति अलग- अलग जाननेकी इच्छा प्रकट करते हैं-- अजुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक् केशिनिषूदन,अर्जुन बोले--हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्यागके तत्त्वको पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ
Arjuna said: O mighty-armed one! O Hṛṣīkeśa, slayer of Keśin! I wish to understand clearly the true principle of renunciation (saṃnyāsa) and also of relinquishment (tyāga)—as distinct from one another. In the ethical tension of the battlefield, Arjuna asks for a precise distinction between abandoning action and abandoning attachment to the fruits of action, seeking a rule of life that preserves dharma while purifying intention.
Verse 2
श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संनन््यासं कवयो विदु: । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा:
The Blessed Lord said: The wise understand renunciation (saṁnyāsa) as the laying aside of actions undertaken for personal desire. But the discerning declare true relinquishment (tyāga) to be the abandonment of the fruits of all actions. In ethical terms, the teaching shifts the focus from merely stopping certain deeds to purifying intention—acting as duty requires while releasing possessiveness over outcomes.
Verse 3
२ ।। त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण: । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे,कई एक विद्दान् ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिये त्यागनेके योग्य हैं* और दूसरे विद्वान् यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागनेयोग्य नहीं हैं:
Arjuna said: “Some thoughtful authorities declare that action should be abandoned because it is tainted with fault; yet others maintain that acts of sacrifice, giving, and austerity are not to be renounced.”
Verse 4
सम्बन्ध-- इस प्रकार संन्यास और त्यागके विषयोंगें विद्वानोंके भिन्न-भिन्न मत बतलाकर अब भगवान् त्यागके विषयमें अपना निश्चय बतलाना आरम्भ करते हैं-- निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम | त्यागो हि पुरुषव्याप्र त्रिविध: सम्प्रकीर्तित:,हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन! संन्यास और त्याग, इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें तू मेरा निश्चय सुन; क्योंकि त्याग सात््विक, राजस और तामस-भेदसे तीन प्रकारका कहा गया है
Hear now my settled conclusion regarding renunciation (tyāga), O best of the Bharatas. For, O tiger among men, renunciation is declared to be of three kinds—sāttvika, rājasa, and tāmasa.
Verse 5
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्",यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करनेके योग्य नहीं है, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है;* क्योंकि यज्ञ, दान और तप--ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान् पुरुषोंको पवित्र करनेवाले हैं
Acts of sacrifice, charity, and austerity are not to be abandoned; they must indeed be performed. For sacrifice, charity, and austerity are purifying practices for the wise.
Verse 6
एतान्यपि तु कर्माणि सड़ूं त्यक्त्वा फलानि च | कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्,इसलिये हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंको तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंकी आसक्ति और फलोंका त्याग करके अवश्य करना चाहिये; यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है+.
Therefore, O Partha, even these acts—sacrifice, charity, and austerity—should be performed, but with attachment abandoned and the fruits relinquished. This is my firmly settled and highest judgment.
Verse 7
सम्बन्ध-- अब तीन “लोकोंगें क्रमसे उपर्युक्त तीन प्रकारके त्यायोंके लक्षण बतलाते हैं नियतस्य तु संन्यास: कर्मणो नोपपद्यते । मोहात् तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तित:,(निषिद्ध और काम्य कर्मोंका तो स्वरूपसे त्याग करना उचित ही है) परंतु नियत कर्मका स्वरूपसे त्याग उचित नहीं हैः। इसलिये मोहके कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया हैः
But renouncing one’s obligatory duties is not proper. When a person abandons such prescribed action out of delusion (moha), that abandonment is declared to be a tāmasic form of renunciation.
Verse 8
दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात् त्यजेत् | स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्,जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है--ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेशके भयसे कर्तव्य-कर्मोंका त्याग कर दे,* तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्यागके फलको किसी प्रकार भी नहीं पाता
Arjuna said: If a person, thinking that all action is nothing but suffering, abandons the duties that ought to be done out of fear of bodily hardship, then having performed a rajasic kind of renunciation, he does not obtain the true fruit of renunciation at all.
Verse 9
कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियते<र्जुन । सड्ूूं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात््विको मत:,हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है--इसी भावसे आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है--वही सात्त्विक त्याग माना गया है*
Arjuna, when a prescribed duty is performed solely because it ought to be done—abandoning attachment and also relinquishing claim to its results—such renunciation is regarded as sāttvic.
Verse 10
सम्बन्ध-- उपर्युक्त प्रकारसे सात्विक त्याग करनेवाले पुरुषका निषिद्ध और काम्यकर्मोको स्वरूपसे छोड़नेगें और कर्तव्यकमोंके करनेमें कैया भाव रहता है, इस जिज्ञासापर यात्विक त्यागी पुरुषकी अन्तिम स्थितिके लक्षण बतलाते हैं-- न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सच्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय:,जो मनुष्य अकुशल कर्मसे तो द्वेष नहीं करता: और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता,* वह शुद्ध सत्त्वगुणसे युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान् और सच्चा त्यागी हैं
Arjuna said: The true renouncer neither hates an unwholesome act nor clings to a wholesome one. Immersed in clarity (sattva), discerning and free from doubt, such a person is the genuine practitioner of renunciation.
Verse 11
न हि देहभूता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत: । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते,क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्णतासे सब कर्मोका त्याग किया जाना शक्य नहीं है;/ इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है--यह कहा जाता हैः
For one who is embodied, it is not possible to abandon all actions entirely. Therefore, the person who renounces the fruits of action is truly called a renouncer—so it is said.
Verse 12
अनिष्टमिष्टं मिश्र॑ च त्रिविध॑ कर्मण: फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्,कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंके कर्मोका तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ-- ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके पश्चात् अवश्य होता है; किंतु कर्मफलका त्याग कर देनेवाले मनुष्योंके कर्मोॉंका फल किसी कालमें भी नहीं होता
Arjuna said: For those who do not relinquish the fruits of action, the result of karma after death is inevitably threefold—unpleasant, pleasant, or mixed. But for those who have renounced the fruits (and thus stand in true renunciation), no such karmic result accrues at any time.
Verse 13
सम्बन्ध-- पहले शलोकमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जाननेकी इच्छा प्रकट की थी। उसका उत्तर देते हुए भगवान्ने दूसरे और तीसरे *लोकोर्में इस विषयपर विद्वानोंके भिन्न-भिन्न मत बतलाकर अपने मतके अनुसार चौथे शलोकसे बारहवें #लोकतक त्यागका यानी कर्मयोगका तत्त्व भलीभॉति समझाया: अब संनन््यासका यानी सांख्ययोगका तत्त्व समझानेके लिये पहले सांख्य-सिद्धान्तके अनुसार कर्मोकी सिद्धिगें पॉच हेतु बतलाते हैं-- पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । सांख्ये कृतान्तेः प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्रँ
The Blessed Lord said: “O mighty-armed one, understand from Me these five causal factors. In the Sāṅkhya’s settled conclusion they are declared as the means by which every action comes to completion.”
Verse 14
हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मोकी सिद्धिके ये पाँच हेतु कर्मोंका अन्त करनेके लिये उपाय बतलानेवाले सांख्य-शास्त्रमें कहे गये हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान ।। अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्व पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पज्चमम्,इस विषयमें अर्थात् कर्मोंकी सिद्धिमें अधिष्ठान" और कर्ता+ तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके करण* एवं नाना प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ: और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव+ है
Arjuna said: “O mighty-armed one, please explain to me clearly the five factors that the Sāṅkhya teaching declares as the means by which actions reach completion. In the accomplishment of any deed there are: the basis or seat (the body and its situation), the agent (the doer), the various instruments (senses, mind, and tools), the many distinct efforts and movements, and—fifth—destiny or the divine factor. Knowing these, one should act responsibly without pride, and without blaming oneself or others as the sole cause.”
Verse 15
शरीरवाड्मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नर: । न्याय्यं*) वा विपरीतं* वा पज्चैते तस्य हेतव:
Arjuna said: Whatever action a person undertakes through body, speech, or mind—whether it is rightful or contrary to righteousness—there are five causes that stand behind it.
Verse 16
१५ |। सम्बन्ध-- इस प्रकार यांख्ययोगके |सिद्धान्तसे समस्त कर्मोकी सिद्धिके अधिष्ठानादि पॉच कारणोंका निरूपण करके अब, वास्तवमें आत्माका कर्मोसे कोई सम्बन्ध नहीं है, आत्मा सर्वथा शुद्ध निर्विकार और अकर्ता है--यह बात समझानेके लिये आत्माको कर्ता माननेवालेकी निन्दा करके अकर्ता माननेवालेकी स्वुति करते हैं-- तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवल तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मति:,परंतु ऐसा होनेपर भी जो मनुष्य अशुद्धबुद्धि होनेके कारण उस विषयमें यानी कर्मोंके होनेमें केवल शुद्धस्वरूप आत्माको कर्ता समझता है, वह मलिन बुद्धिवाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता?
Even when this is so—when action is understood to rest on its various causal supports—whoever, through an unrefined understanding, looks upon the pure Self alone as the doer in the occurrence of actions, that misguided person does not truly see reality. Ethically, the verse corrects the error of moral agency being falsely imposed on the changeless Self, urging discernment between the field of action and the witnessing consciousness.
Verse 17
इस प्रकार श्रीमह्ााभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद््गीतापव॑किे अन्तर्गत ब्रह्मविद्या और योगशासत्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्: श्रीकृष्णाजुन-संवादमें श्रद्धात्रयविभागयोग नामक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ,यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमॉल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते जिस पुरुषके अन्तः:करणमें “मैं कर्ता हूँ" ऐसा भाव नहीं है* तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थोंमें और कर्मोमें लिपायमान नहीं होती,“ वह पुरुष इन सब लोकोंको मारकर भी वास्तवमें न तो मारता है और न पापसे बँधता है;
He in whom there is no egoistic notion—“I am the doer”—and whose understanding is not tainted or attached to worldly objects and actions: even if he were to slay these beings, in truth he neither kills nor becomes bound by sin. The verse frames moral responsibility in terms of inner agency: action performed without ego and without clinging does not generate binding guilt.
Verse 18
सम्बन्ध--इस प्रकार संनन््याय (ज्ञानयोग)-का तत्व समझानेके लिये आत्माके अकतोपपिनका प्रतिपादन करके अब उसके अनुसार कर्मके अंग-प्रत्यंगोंको भलीभाँति समझानेके लिये कर्म-प्रेरणा; कर्म-संग्रह और उनके यात्विक आदि भेदोंका प्रतिपादन करते हैं-- ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविध: कर्मसंग्रह:,ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय--यह तीन प्रकारकी कर्म-प्रेरणाः है और कर्ता, करण तथा क्रिया --यह तीन प्रकारका कर्मसंग्रह है; इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्धगवदगीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्तसु ब्रह्मुविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नामाष्टादशो<5ध्याय:
Arjuna said: “Knowledge, the object to be known, and the knower—these three are the threefold impulse that sets action in motion. The instrument, the act itself, and the agent—these three are the threefold basis (aggregate) of action.”
Verse 19
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदत: । प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृूणु तान्यपि,गुणोंकी संख्या करनेवाले शास्त्रमें ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणोंके भेदसे तीन-तीन प्रकारके ही कहे गये हैं, उनको भी तू मुझसे भलीभाँति सुन"
Arjuna said: “In the teaching that analyzes the guṇas, knowledge, action, and the doer are each described as threefold, distinguished by the guṇas. Please explain those as well, correctly and in due order.”
Verse 20
सर्वभूतेषु येनैके भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि साक््चिकम्,जिस ज्ञानसे मनुष्य पृथक्ू-पृथक् सब भूतोंमें एक अविनाशी परमात्मभावको विभागरहित समभावसे स्थित देखता है, उस ज्ञानको तो तू साच्चिक जानर
Arjuna said: “Know that knowledge to be sāttvika by which one perceives, in all beings, a single imperishable Reality—undivided though appearing among divided forms.”
Verse 21
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् | वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्,किंतु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारके नाना भावोंको अलग-अलग जानता है, उस ज्ञानको तू राजस जानः
Arjuna said: “That knowledge by which one perceives, in all beings, the many distinct states and varieties as separate from one another—know that knowledge to be rājasa.”
Verse 22
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्य सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत् तामसमुदाह्ृतम्
But that understanding which clings to a single task as though it were the whole, without rational grounds, and which is shallow and contrary to the true nature of things—this is declared to be tamasic (tāmasa).
Verse 23
परंतु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके सदूृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्विक अर्थसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया हैः ।। नियतं४ सड़रहितमरागद्वेषत:" कृतम् | अफललप्रेप्सुना कर्म यत्तत् सात््विकमुच्यते,जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तापनके अभिमानसे रहित हो तथा फल न चाहनेवाले पुरुषद्वारा बिना राग-द्वेषके किया गया हो*--वह सात्त्विक कहा जाता है?
A deed is called sāttvika when it is performed as a duty prescribed by śāstra—without attachment, without the ego of doership, free from attraction and aversion alike—and by one who seeks no personal reward. Ethically, it marks right action as disciplined, impartial, and duty-centered, not driven by desire, hatred, or self-interest.
Verse 24
यत्तु कामेप्सुना* कर्म साहंकारेण5 वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद् राजसमुदाह्ृतम्,परंतु जो कर्म बहुत परिश्रमसे युक्त होता हैः तथा भोगोंको चाहनेवाले पुरुषद्वारा या अहंकारययुक्त पुरुषद्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है?
Arjuna said: But that action which is performed by one who longs for sense-enjoyments, or is done with egoistic self-assertion, and which involves much strain and exertion—such action is declared to be of rajas. Ethically, it is driven by craving and self-display rather than by duty carried out with inner steadiness.
Verse 25
अनुबन्ध॑ क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते,जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न विचारकर केवल अज्ञानसे आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता हे?
Arjuna said: That action is called tāmasika when, out of delusion, one undertakes it without considering its consequences, the loss it may cause, the violence involved, or one’s own capacity to carry it through. Ethically, it points to heedless, ignorant initiative that ignores harm and responsibility.
Verse 26
#स्ज्िम (2) अअसना २. यद्यपि शास्त्रविधिके त्यागकी बात गीताके सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें भी कही जा चुकी थी और यहाँ भी कहते हैं; पर इन दोनोंके भावमें बड़ा अन्तर है। वहाँ अवहेलनापूर्वक किये जानेवाले शास्त्रविधिके त्यागका वर्णन है और यहाँ न जाननेके कारण होनेवाले शास्त्रविधिके त्यागका है। उनको तो शास्त्रकी परवा ही नहीं है; अतः वे मनमाने ढंगसे जिस कर्मको अच्छा समझते हैं, उसे करते हैं। इसीलिये वहाँ *वर्तते कामकारत:” कहा गया है; परंतु यहाँ “यजन्ते श्रद्धयान्विता: कहा है, अतः इन लोगोंमें श्रद्धा है, जहाँ श्रद्धा होती है, वहाँ अवहेलना नहीं हो सकती। इन लोगोंको परिस्थिति और वातावरणकी प्रतिकूलतासे, अवकाशके अभावसे अथवा परिश्रम तथा अध्ययन आदिकी कमीसे शास्त्रविधिका ज्ञान नहीं होता और इस अज्ञताके कारण ही इनके द्वारा उसका त्याग होता है। $. जो शास्त्रको न जाननेके कारण शास्त्रविधिका त्याग करके श्रद्धांके साथ पूजन आदि करनेवाले हैं, वे कैसे स्वभाववाले हैं--दैव स्वभाववाले या आसुरस्वभाववाले? इसका स्पष्टीकरण पहले नहीं हुआ। अतः उसीको समझनेके लिये अर्जुनका यह प्रश्न है कि ऐसे लोगोंकी स्थिति सात्त्विकी है अथवा राजसी या तामसी? अर्थात् वे दैवीसम्पदावाले हैं या आसुरीसम्पदावाले? ऊपरके विवेचनसे यह पता लगता है कि संसारमें निम्नलिखित पाँच प्रकारके मनुष्य हो सकते हैं-- (१) जिनमें श्रद्धा भी है और जो शास्त्रविधिका पालन भी करते हैं, ऐसे पुरुष दो प्रकारके हैं--एक तो निष्कामभावसे कर्मोका आचरण करनेवाले और दूसरे सकामभावसे कर्मोंका आचरण करनेवाले। निष्कामभावसे आचरण करनेवाले दैवीसम्पदायुक्त सात्त्विक पुरुष मोक्षको प्राप्त होते हैं; इनका वर्णन प्रधानतया गीताके सोलहवें अध्यायके पहले तीन श्लोकोंमें तथा इस अध्यायके ग्यारहवें, चौदहवेंसे सत्रहवें और बीसवें श्लोकोंमें है। सकामभावसे आचरण करनेवाले सत्त्वमिश्रित राजस पुरुष सिद्धि, सुख तथा स्वर्गादि लोकोंको प्राप्त होते हैं; इनका वर्णन गीताके दूसरे अध्यायके बयालीसवें, तैंतालीसवें और चौवालीसवेंमें, चौथे अध्यायके बारहवेंमें, सातवेंके बीसवें, इक्कीसवें और बाईसवेंमें और नवें अध्यायके बीसवें, इक्कीसवें और तेईसवें तथा इस अध्यायके बारहवें, अठारहवें और इक्कीसवें श्लोकोंमें है। (२) जो लोग शास्त्रविधिका किसी अंशमें पालन करते हुए यज्ञ, दान, तप आदि कर्म तो करते हैं, परंतु जिनमें श्रद्धा नहीं होती, उन पुरुषोंके कर्म असत् (निष्फल) होते हैं; उन्हें इस लोक और परलोकमें उन कर्मोसे कोई भी लाभ नहीं होता। इनका वर्णन गीताके इस अध्यायके अट्ठबराईसवें श्लोकमें किया गया है। (३) जो लोग अज्ञताके कारण शास्त्रविधिका तो त्याग करते हैं, परंतु जिनमें श्रद्धा है, ऐसे पुरुष श्रद्धाके भेदसे सात््विक भी होते हैं और राजस तथा तामस भी। इनकी गति भी इनके स्वरूपके अनुसार ही होती है। इनका वर्णन इस अध्यायके दूसरे, तीसरे तथा चौथे श्लोकोंमें किया गया है। (४) जो लोग न तो शास्त्रको मानते हैं और न जिनमें श्रद्धा ही है; इससे जो काम, क्रोध और लोभके वश होकर अपना पापमय जीवन बिताते हैं, वे आसुरी-सम्पदावाले लोग नरकोंमें गिरते हैं तथा नीच योनियोंको प्राप्त होते हैं। उनका वर्णन गीताके सातवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें, नवेंके बारहवेंमें, सोलहतवें अध्यायके सातवेंसे लेकर बीसवेंतकमें और इस अध्यायके पाँचवें, छठे एवं तेरहवें श्लोकोंमें है। (५) जो लोग अवहेलनासे शास्त्रविधिका त्याग करते हैं और अपनी समझसे उन्हें जो अच्छा लगता है, वही करते हैं, उन यथेच्छाचारी पुरुषोंमें जिनके कर्म शास्त्रनिषिद्ध होते हैं, उन तामस पुरुषोंको तो नरकादि दुर्गतिकी प्राप्ति होती है और जिनके कर्म अच्छे होते हैं, उन पुरुषोंको शास्त्रविधिका त्याग कर देनेके कारण कोई भी फल नहीं मिलता। इसका वर्णन गीताके सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें किया गया है। ध्यान रहे कि इनके द्वारा जो पापकर्म किये जाते हैं, उनका फल-तिर्यक्-योनियोंकी प्राप्ति और नरकोंकी प्राप्ति--अवश्य होता है। इन पाँच प्रकारके मनुष्योंके वर्णनमें प्रमाणस्वरूप जिन श्लोकोंका संकेत किया गया है, उनके अतिरिक्त अन्यान्य श्लोकोंमें भी इनका वर्णन है; परंतु यहाँ उन सबका उल्लेख करनेसे बहुत विस्तार हो जाता, इसलिये नहीं किया गया। २. जो श्रद्धा शास्त्रके श्रवण-पठनादिसे होती है, उसे “शास्त्रजा' कहते हैं और जो पूर्वजन्मोंके तथा इस जन्मके कर्मोंके संस्कारानुसार स्वाभाविक होती है, वह 'स्वभावजा' कहलाती है। 3. पुरुषका वास्तविक स्वरूप तो गुणातीत ही है; परंतु यहाँ उस पुरुषकी बात है, जो प्रकृतिमें स्थित है और प्रकृतिसे उत्पन्न तीनों गुणोंसे सम्बद्ध है; क्योंकि गुणजन्य भेद “प्रकृतिस्थ पुरुष' में ही सम्भव है। जो गुणोंसे परे है, उसमें तो गुणोंके भेदकी कल्पना ही नहीं हो सकती। यहाँ भगवान् यह बतलाते हैं कि जिसकी अन्तःकरणके अनुरूप जैसी सात्तविकी, राजसी या तामसी श्रद्धा होती है--वैसी ही उस पुरुषकी निष्ठा या स्थिति होती है अर्थात् जिसकी जैसी श्रद्धा है, वही उसका स्वरूप है। इससे भगवानने श्रद्धा, निष्ठा और स्वरूपकी एकता करते हुए “उनकी कौन-सी निष्ठा है” अर्जुनके इस प्रश्नका उत्तर दिया है। ३. अभिप्राय यह है कि देवताओंको पूजनेवाले मनुष्य सात्विक हैं--सात्त्विकी निष्ठावाले हैं। देवताओंसे यहाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वायु, इन्द्र, वरुण, यम, अश्विनीकुमार और विश्वेदेव आदि शास्त्रोक्त देव समझने चाहिये। यहाँ देवपूजनरूप क्रिया सात््विक होनेके कारण उसे करनेवालोंको सात्त्विक बतलाया है; परंतु पूर्ण सात्त्विक तो वही है, जो सात्त्विक क्रियाको निष्कामभावसे करता है। २. यक्षसे कुबेरादि और राक्षसोंसे राहु-केतु आदि समझना चाहिये। 3. मरनेके बाद जो पापकर्मवश भूत-प्रेतादिके वायुप्रधान देहको प्राप्त होते हैं, वे भूत-प्रेत कहलाते हैं। ४. जिसमें नाना प्रकारके आडम्बरोंसे शरीर और इन्द्रियोंको कष्ट पहुँचाया जाता है और जिसका स्वरूप बड़ा भयानक होता है, इस प्रकारके शास्त्रविरुद्ध भयानक तप करनेवाले मनुष्योंमें श्रद्धा नहीं होती। वे लोगोंको ठगनेके लिये और उनपर रोब जमानेके लिये पाखण्ड रचते हैं तथा सदा अहंकारसे फूले रहते हैं। इसीसे उन्हें दम्भ और अहंकारसे युक्त कहा गया है। ५. पाँच महाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार, दस इन्द्रियाँ और पाँच इन्द्रियोंक विषय--इन तेईस तत्त्वोंके समूहका नाम “भूतग्राम” है। ६. शरीरको क्षीण और दुर्बल करना तथा स्वयं अपने आत्माको या किसीके भी आत्माको दुःख पहुँचाना भूतसमुदायको और परमात्माको कृश करना है; क्योंकि सबके हृदयमें आत्मरूपसे परमात्मा ही स्थित हैं। ७. मनुष्य जैसा आहार करता है, वैसा ही उसका अन्तःकरण बनता है और अन्त:करणके अनुरूप ही श्रद्धा भी होती है। आहार शुद्ध होगा तो उसके परिणामस्वरूप अन्त:करण भी शुद्ध होगा--'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि:” (छान्दोग्य० ७,मुक्तसड्रो5नहंवादीः ५ धृत्युत्ताहसमन्वित: । सिद्धयसिद्धयोर्निरविकार: कर्ता सात््विक उच्यते जो कर्ता संगरहित, अहंकारके वचन न बोलनेवाला, धैर्य और उत्साहसे युक्त तथा कार्यके सिद्ध होने और न होनेमें हर्ष-शोकादि विकारोंसे रहित है, वह सात््विक कहा जाता हैः
Arjuna said: “By your grace, I have gained clarity of purpose from what I have heard here. My doubt is gone; I stand firm. I will act according to your word.”
Verse 27
रागीः कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धोः 3 हिंसात्मको5शुचि:* ५ | हर्षशोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तित:,जो कर्ता आसक्तिसे युक्त, कर्मोके फलको चाहनेवाला और लोभी है तथा दूसरोंको कष्ट देनेके स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोकसे लिप्त है, वह राजस कहा गया है
Arjuna said: The doer who is driven by attachment, who craves the fruits of action, who is greedy, whose nature is to harm, who is impure in conduct, and who is entangled in elation and grief—such an agent is declared to be of the rājasa type. Ethically, this describes action propelled by desire and agitation rather than clarity or self-restraint, and it warns that such motivation distorts judgment and leads to suffering for oneself and others.
Verse 28
असुक्त:* प्रकृते:९ स्तब्ध: शठो नैष्कृतिकोडलस: । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते,जो कर्ता अयुक्त, शिक्षासे रहित, घमंडी<, धूर्त” और दूसरोंकी जीविकाका नाश करनेवाला5* तथा शोक करनेवाला आलसी-* और दीर्घसूत्री:: है--वह तामस कहा जाता हैः5
Arjuna said: The doer who is undisciplined and untrained, stubborn and arrogant, deceitful and malicious, lazy and given to grief, and who delays action through procrastination—such an agent is declared to be of tamasic (tāmasika) nature.
Verse 29
सम्बन्ध-- इस प्रकार तत्त्वज्ञानमें सहायक सात्विकभावको ग्रहण करानेके लिये और उसके विरोधी राजस-तामय भावोंका त्याग करानेके लिये कर्म-प्रेरणा और कर्म संग्रहमेंसे ज्ञान, कर्म और कतकि सात्विक आदि तीन-तीन भेद क्रमसे बतलाकर अब बुद्धि और ध्ृतिके सात्विक, राजस और तामस--इस प्रकार त्रिविध भेद क्रमशः बतलानेकी प्रस्तावना करते हुए बतलाते हैं-- बुद्धेर्भेद धृतेश्नेव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय,हे धनंजय! अब तू बुद्धिका और धृतिका भी गुणोंके अनुसार तीन प्रकारका भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णतासे विभागपूर्वक कहा जानेवाला सुन
Arjuna said: “O Dhanañjaya, now hear from me, in full and with clear distinctions, the threefold classification—according to the guṇas—of both understanding (buddhi) and steadfast resolve (dhṛti).”
Verse 30
प्रवृत्ति च निवृत्ति च कार्याकार्ये भया भये । बन्ध॑ मोक्ष च या वेत्ति बुद्धि: सा पार्थ सातक््चिकी,हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग- और निवृत्तिमार्गकोः कर्तव्य और अकर्तव्यको,* भय और अभयको” तथा बन्धन और मोक्षको* यथार्थ जानती है, वह बुद्धि सात््विकी है
Arjuna said: That understanding is sāttvika, O Pārtha, which clearly discerns the path of engagement (pravṛtti) and the path of withdrawal (nivṛtti); what ought to be done and what ought not to be done; what is to be feared and what is not; and what leads to bondage and what leads to liberation (mokṣa).
Verse 31
यया धर्ममधर्म च कार्य चाकार्यमेव च । अयथावत् प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी,हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धिके द्वारा धर्म और अधर्मको* तथा कर्तव्य और अकर्तव्यकोः भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है?
Arjuna said: That intellect by which one fails to discern correctly what is dharma and what is adharma, and likewise what ought to be done and what ought not to be done—such an intellect, O Pārtha, is of the rajasic (rājasa) kind.
Verse 32
अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसा5<वृता | सर्वार्थान् विपरीतांश्व बुद्धि: सा पार्थ तामसी,हे अर्जुन! जो तमोगुणसे घिरी हुई बुद्धि अधर्मको भी “यह धर्म है” ऐसा मान लेती हैः तथा इसी प्रकार अन्य सम्पूर्ण पदार्थोकोी भी विपरीत मान लेती है,* वह बुद्धि तामसी है
Arjuna said: That intellect which, being veiled by darkness (tamas), takes what is unrighteous to be righteous, and likewise misconstrues all things in a reversed way—such an intellect, O Pārtha, is called tāmasī (born of tamas).
Verse 33
धृत्या यया धारयते मन:प्राणेन्द्रियक्रिया: । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात््विकी,हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारणशक्तिसे मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी हैः
O Partha, that steadfastness (dhṛti) by which a person, through the discipline of yoga and unwavering constancy, holds the mind, the vital breath (prāṇa), and the activities of the senses firmly under control—that steadfastness is sāttvika.
Verse 34
यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयते<र्जुन । प्रसड़ेन फलाकाडुक्षी धृति: सा पार्थ राजसी,परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन! फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धारणशक्तिके द्वारा अत्यन्त आससक्तिसे धर्म, अर्थ और कामोंको धारण करता है,* वह धारणशक्ति राजसी है
But, O Partha, that steadfastness by which a person, driven by attachment and craving for results, clings to duty (dharma), gain (artha), and pleasure (kāma)—that steadfastness is rajasic.
Verse 35
यया स्वप्न भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुज्चति दुर्मेधा धृति:* सा पार्थ तामसी,हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारणशक्तिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता और दुःखको तथा उन्मत्तताको भी नहीं छोड़ता अर्थात् धारण किये रहता है,* वह धारणशक्ति तामसी है
O Partha, that steadfastness by which a dull-witted person does not let go of sleep, fear, grief, dejection, and even intoxicated delusion—clinging to them instead—is called tamasic resolve.
Verse 36
सम्बन्ध-- इस प्रकार सात्विकी बुद्धि और ध्ृतिका ग्रहण तथा राजसी-तामसीका त्याग करनेके लिये बुद्धि और धृतिके सात्तिक आदि तीन-तीन भेद क्रमसे बतलाकर अब जिसके लिये मनुष्य समस्त कर्म करता है; उस सुखके भी सात्विक, राजस और तामस--इस प्रकार तीन भेद क्रमसे बतलाते हैं-- सुखं तल्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद् रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति,हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तू मुझसे सुन। जिस सुखमें साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादिके अभ्याससे रमण करता है* और जिससे दु:खोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है*-- जो ऐसा सुख है, वह आरम्भकालमें यद्यपि विषके तुल्य प्रतीत होता है,* परंतु परिणाममें अमृतके तुल्य है;* इसलिये वह परमात्मविषयक बुद्धिके प्रसादसे उत्पन्न होनेवाला सुख+ सात्त्विक कहा गया है
O best of the Bharatas, now hear from me of the threefold nature of happiness. That happiness in which a disciplined seeker delights through repeated practice, and by which one reaches the end of sorrow—though it seems like poison at the beginning, it becomes like nectar in the end; therefore it is called sāttvika happiness, born of the clarity and grace of right understanding turned toward the Self (Ātman).
Verse 37
यत्तदग्रे विषमिव परिणामे5मृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्,हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तू मुझसे सुन। जिस सुखमें साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादिके अभ्याससे रमण करता है* और जिससे दु:खोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है*-- जो ऐसा सुख है, वह आरम्भकालमें यद्यपि विषके तुल्य प्रतीत होता है,* परंतु परिणाममें अमृतके तुल्य है;* इसलिये वह परमात्मविषयक बुद्धिके प्रसादसे उत्पन्न होनेवाला सुख+ सात्त्विक कहा गया है
That happiness which at first feels like poison, but in the end becomes like nectar—such happiness is declared to be sāttvika. It arises from the clarity and grace of one’s inner understanding: the purified intellect turned toward the Self (Ātman).
Verse 38
विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेडमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत् सुखं राजसं स्मृतम्,जो सुख विषय और इन्द्रियोंक संयोगसे होता है, वह पहले--भोगकालमें अमृतके तुल्य प्रतीत होनेपर भी परिणाममें विषके तुल्य है; इसलिये वह सुख राजस कहा गया है; जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त* गीताशास्त्रको मेरे भक्तोंमें+ कहेगा,+ वह मुझको ही प्राप्त होगा--इसमें कोई संदेह नहीं है?
The pleasure born of the senses’ contact with their objects seems like nectar at first, in the very moment of enjoyment; yet in its outcome it turns to poison. Therefore such pleasure is remembered as “rajasic”—driven by passion and attachment, alluring at the start but harmful in the end.
Verse 39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन: । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाह्तम्,जो सुख भोगकालमें तथा परिणाममें भी आत्माको मोहित करनेवाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न सुखःई तामस कहा गया है
That pleasure which, both at the beginning and in its aftermath, deludes the self—arising from sleep, indolence, and heedlessness—is declared to be tāmasic.
Verse 40
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुन: । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्ते यदेभि: स्यात् त्रिभिर्गुणै:,पृथ्वीमें या आकाशमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो£
There is nothing anywhere—on earth, in the heavens, or even among the gods—that exists free from these three qualities born of Nature. All beings, wherever found, are inevitably shaped and bound by the triple strands of the guṇas.
Verse 41
भीष्मपर्वणि तु एकचत्वारिंशो5 ध्याय:,भीष्मपर्वमें इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ सम्बन्ध--इस अध्यायके चौथेसे बारहवें *लोकतक भगवान्ने अपने मतके अनुसार त्याग और त्यागीके लक्षण बतलाये। तदनन्तर तेरहवेंसे सत्रहवें *लोकतक संन्यास (सांख्य)-के स्वरूपका निरूपण करके संन्यासमें सहायक सत्त्वगुणका ग्रहण और उसके विरोधी रज एवं तमका त्याग करानेके उद्देश्यसे अठारहवेंसे चालीसवें श*्लोकतक गुणोंके अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता आदि मुख्य-मुख्य पदार्थोके भेद समझाये और अन्त्में समस्त युष्टिको गुणोंसे युक्त बतलाकर उस विषयका उपसंदार किया। वहाँ त्यागका स्वरूप बतलाते समय भगवान्ने यह बात कही थी कि नियत कर्मका स्वरूपसे त्याग उचित नहीं है (गीता १८/७), अपितु नियत कर्मोको आसक्ति और फलके त्यागपूर्वक करते रहना ही वास्तविक त्याग है (गीता १८॥९), किंतु वहाँ यह बात नहीं बतलायी कि किसके लिये कौन-या कर्म नियत है। अतएव अब संक्षेपर्में नियत कर्मोका स्वरूप, त्यायके नामसे वर्णित कर्मयोगमें भक्तिका सहयोग और उसका फल परम सिद्धिकी प्राप्ति बतलानेके लिये पुनः उसी त्यायरूप कर्मयोयका प्रकरण आरम्भ करते हैं ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै: हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके तथा शूद्रोंके+ कर्म स्वभावसे उत्पन्न गुणोंद्वारा विभक्त किये गये हैं:
The Blessed Lord explains that social duties are not arbitrary but arise from one’s innate disposition. He tells Arjuna, “O scorcher of foes, the works of Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, and Shudras are apportioned according to the qualities born of their own nature.” In ethical terms, the verse frames dharma as responsibility aligned with character and temperament, preparing the ground for teaching that true renunciation is not abandoning rightful work, but performing it without attachment and with devotion.
Verse 42
शमो5 दमस्तप: 3 शौच क्षान्तिरार्जवमेव" 5 च | ज्ञानं? विज्ञानमास्तिक्यं८ 5 ब्रह्मकर्म स्वभावजम्
Serenity of mind, self-restraint, austerity, purity, forbearance, and straightforwardness; also knowledge, realized discernment, and faith in the sacred order—these are the natural duties that arise from one’s inborn disposition as a brāhmaṇa.
Verse 43
अन्त: करणका निग्रह करना, इन्द्रियोंका दमन करना, धर्मपालनके लिये कष्ट सहना, बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना, दूसरोंके अपराधोंको क्षमा करना, मन, इन्द्रिय और शरीरको सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदिमें श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रोंका अध्ययन- अध्यापन करना और परमात्माके तत्त्वका अनुभव करना--ये सब-के-सब ही ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।? |। शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्पपलायनम् । दानमी श्वरभावद्ष क्षात्रं कर्म स्वभावजम्,शूरवीरता5, तेज, धैर्य/3$, चतुरता*४ और युद्धमें न भागना5, दान देना और स्वामिभावः--ये सब-के-सब ही क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं:
Arjuna asks about the natural duties that arise from one’s disposition. He describes the Brahmin’s innate work as inner self-restraint, control of the senses, endurance of hardship for the sake of dharma, purity within and without, forgiveness of others’ faults, straightforwardness of mind, senses, and body, faith in the Veda and śāstra, in God and the hereafter, the study and teaching of sacred learning, and direct realization of the Supreme Reality. He then states that the Kshatriya’s innate work is valor, radiance and vigor, steadfastness, skill, not fleeing from battle, generosity, and a lordly sense of responsibility befitting a protector.
Verse 44
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् | परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्
Arjuna said: “Agriculture, cattle-tending, and trade are the natural duties of the Vaiśya, arising from his inborn disposition. Service in the form of attending upon others is likewise the natural duty of the Śūdra, arising from his inborn disposition.”
Verse 45
खेती<, गोपालन” और क्रय-विक्रयरूप सत्य व्यवहार*--ये वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णोकी सेवा करना* शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है ।। सम्बन्ध-- इस प्रकार चारों वर्णोके स्वाभाविक कर्मोका वर्णन करके अब भक्तियुक्त कर्मयोगका स्वरूप और फल बतलानेके लिये, उन कर्मोका किस प्रकार आचरण करनेसे मनुष्य अनायास परम सिद्धिको प्राप्त कर लेता है--यह बात दो शलोकोंमें बतलाते हैं-- स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर: । स्वकर्मनिरत: सिद्धि यथा विन्दति तच्छुणु,अपने-अपने स्वाभाविक कर्मोमें तत्परतासे लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्तिरूप परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है?। अपने स्वाभाविक कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकारसे कर्म करके परम सिद्धिको प्राप्त होता है, उस विधिको तू सुन
Arjuna said: A person who is devoted to his own allotted duty attains complete perfection. Hear from me how one who remains steadfast in his own work reaches that perfection—namely, the highest fulfillment that culminates in realization of the Divine—without abandoning the responsibilities of his station.
Verse 46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानव:,जिस परमेश्वरसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वरकी अपने स्वाभाविक कर्मोद्वारा पूजा करकेः मनुष्य परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता हैः
From that Supreme Lord all beings arise, and by Him this entire world is pervaded. By worshiping Him through one’s own natural work, a person attains the highest perfection.
Verse 47
सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकर्में यह बात कही गयी कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कमाद्वारा परमेश्वरकी पूजा करके परम सिद्धिको पा लेता है; इसपर यह शंका होती है कि यदि कोई क्षत्रिय अपने युद्धादि क्रूर कर्मोको न करके; ब्राह्मणोंकी भाँति अध्यापनादि शान्तिमय कर्मोसे अपना निर्वाह करके परमात्माको प्राप्त करनेकी चेष्टा करे या इसी तरह कोई वैश्य या शूद्र अपने कर्मोको उच्च वर्णोके कर्मोंसे हीन समझकर उनका त्याग कर दे और अपनेसे ऊँचे वर्णकी वृत्तिसे अपना निर्वाह करके परमात्माको प्राप्त करनेका प्रयत्न करे तो उचित है या नहीं। इसपर दूसरेके धर्मकी अपेक्षा स्वधर्मकों श्रेष्ठ बतलाकर उसके त्यागका निषेध करते हैं-- श्रेयान् स्वधर्मोर्ट विगुण: परधर्मात् स्वनुछितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्रोति किल्बिषम्,अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरेके धर्मसे5 गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है;> क्योंकि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त होताः
Arjuna said: One’s own duty, even if imperfectly endowed with qualities, is better than another’s duty, even when performed well. For a person who carries out the work fixed by their own nature does not incur moral fault. In the ethical context of the epic, this affirms that abandoning one’s rightful station and responsibilities—out of fear, imitation, or a mistaken sense of superiority/inferiority—creates inner disorder, whereas faithfully doing one’s own role (even with limitations) aligns action with one’s nature and avoids blameworthy transgression.
Verse 48
सहजंएं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता:
“O son of Kuntī, one should not abandon the work born of one’s own nature, even if it is flawed; for every undertaking is inevitably veiled by some defect—just as fire is covered by smoke.”
Verse 49
अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मको” नहीं त्यागना चाहिये; क्योंकि धूएँसे अग्निकी भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं* ।। सम्बन्ध-- भगवान्ने तेरहवेंसे चालीसवें *लोकतक संन्यास यानी सांख्यका निरूपण किया। फिर इकतालीसवें श्लोकसे यहॉतक कर्मयोगरूप त्यागका तत्त्व समझानेके लिये स्वाभाविक कर्मोका स्वरूप और उनकी अवश्यकर्तव्यताका निर्देश करके तथा कर्मयोगमों भक्तिका सहयोग दिखलाकर उसका फल भगवत्प्राप्ति बतलाया;: किंतु वहाँ संन््यासके प्रकरणमें यह बात नहीं कही गयी कि संन्यासका क्या फल होता है और कर्मोर्नें कर्तापनका अभिमगान त्याग कर उपासनाके सहित सांख्ययोगका किस प्रकार साधन करना चाहिये। अतः यहाँ उपासनाके सहित विवेक और वैराग्यपूर्वक एकान्तमें रहकर साधन करनेकी विधि और उसका फल बतलानेके लिये पुनः सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हैं-- असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृह: । नैष्कर्म्यसिद्धि परमां संन्यासेनाधिगच्छति,सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अन्तःकरणवाला पुरुष सांख्ययोगके द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धिको प्राप्त होता है?
“Therefore, O son of Kuntī, one should not abandon one’s natural, inborn duty even when it is attended by faults; for every action in this world is inevitably tainted by some defect—just as fire is veiled by smoke. The ethical point is not to flee responsibility because it is imperfect, but to perform one’s rightful work with discernment and steadiness, accepting that purity in action is a matter of inner orientation rather than flawless external conditions.”
Verse 50
सिद्धि प्राप्तो यथा ब्रह्म तथा55प्रोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा,जो कि ज्ञानयोगकी परा निष्ठा है, उस नैष्कर्म्य-सिद्धिकोः जिस प्रकारसे प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्मको प्राप्त होता है,£ उस प्रकारको हे दुन्तीपुत्र! तू संक्षेपमें ही मुझसे समझ
“Teach me clearly how, having attained perfection, a person reaches Brahman. O son of Kuntī, explain to me in brief that supreme steadfastness in knowledge—the highest culmination of the path of wisdom—by which one attains the state beyond action and arrives at Brahman.”
Verse 51
बुद्धया विशुद्धया युक्तो धृत्या55त्मानं नियम्य च | शब्दादीन् विषयांस्त्यकत्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च,विशुद्ध बुद्धिसे युक्त+ तथा हलका, सातक््विक और नियमित भोजन करनेवाला, शब्दादि विषयोंका त्याग करके एकान्त और शुद्ध देशका सेवन करने-वाला,* सात््विक धारणशक्तिके द्वारा अन्तः:करण और इन्द्रियोंका संयम करके“ मन, वाणी और शरीरको वशमें कर लेनेवाला,” राग-द्वेषको सर्वथा नष्ट करके*ः भलीभाँति दृढ़ वैराग्यका आश्रय लेनेवाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके निरन्तर ध्यानयोगके परायण रहनेवाला: ममता-रहितः और शान्तियुक्त पुरुष: सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित होनेका पात्र होता है
“Endowed with a purified intellect, and steadying oneself through firm resolve, one should restrain the self; abandoning sense-objects beginning with sound, and casting away attachment and aversion. Ethically, the verse points to inner discipline as the foundation for right action: mastery over the senses and the pair of likes and dislikes prevents conduct from being driven by craving or hostility, and prepares a person for calm, principled engagement with life’s duties.”
Verse 52
विविक्तसेवी लघ्वाशीः यतवाक्कायमानस: । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रित:,विशुद्ध बुद्धिसे युक्त+ तथा हलका, सातक््विक और नियमित भोजन करनेवाला, शब्दादि विषयोंका त्याग करके एकान्त और शुद्ध देशका सेवन करने-वाला,* सात््विक धारणशक्तिके द्वारा अन्तः:करण और इन्द्रियोंका संयम करके“ मन, वाणी और शरीरको वशमें कर लेनेवाला,” राग-द्वेषको सर्वथा नष्ट करके*ः भलीभाँति दृढ़ वैराग्यका आश्रय लेनेवाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके निरन्तर ध्यानयोगके परायण रहनेवाला: ममता-रहितः और शान्तियुक्त पुरुष: सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित होनेका पात्र होता है
“One who resorts to solitude, eats lightly, and has disciplined speech, body, and mind—ever devoted to the yoga of meditation and firmly established in dispassion—becomes fit for inner steadiness and spiritual realization. The verse highlights an ethical ideal of self-restraint: withdrawing from distractions, moderating consumption, and cultivating sustained contemplative practice so that desire and aversion lose their hold.”
Verse 53
अहंकार बल दर्प काम॑ क्रोध॑ परिग्रहम् विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्म भूयाय कल्पते,विशुद्ध बुद्धिसे युक्त+ तथा हलका, सातक््विक और नियमित भोजन करनेवाला, शब्दादि विषयोंका त्याग करके एकान्त और शुद्ध देशका सेवन करने-वाला,* सात््विक धारणशक्तिके द्वारा अन्तः:करण और इन्द्रियोंका संयम करके“ मन, वाणी और शरीरको वशमें कर लेनेवाला,” राग-द्वेषको सर्वथा नष्ट करके*ः भलीभाँति दृढ़ वैराग्यका आश्रय लेनेवाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके निरन्तर ध्यानयोगके परायण रहनेवाला: ममता-रहितः और शान्तियुक्त पुरुष: सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित होनेका पात्र होता है
Arjuna said: “Having cast off egoism, the pride of strength, arrogance, desire, anger, and possessiveness, becoming free from ‘mine-ness’ and established in inner peace, one becomes fit to abide in Brahman—i.e., to live in the state of Brahman-realization. Ethically, the teaching points to victory over the inner enemies that fuel violence and attachment, so that a person may act without selfish grasping and remain steady in serenity.”
Verse 54
ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा' न शोचति न काड्क्षति । सम: सर्वेषु भूतेषु मदभक्ति लभते पराम्,फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें एकीभावसे स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी आकांक्षा ही करता है।& ऐसा समस्त प्राणियोंमें समभाववाला योगी मेरी परा भक्तिको* प्राप्त हो जाता है
Arjuna said: “One who has become established in Brahman, whose inner being is serene, neither grieves nor hankers. Equal toward all beings, such a person attains supreme devotion to Me.”
Verse 55
भक््त्या मामभिजानाति यावान् यश्नास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्,उस परा भक्तिके द्वारा वह मुझ परमात्माको, मैं जो हूँ और जितना हूँ ठीक वैसा-का- वैसा तत्त्वसे जान लेता है: तथा उस भक्तिसे मुझको तत्त्वसे जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है?
Through single-minded devotion, one truly comes to know Me as I am—My real nature and full measure. Having thus known Me in truth, that devotee then enters into Me immediately thereafter, attaining intimate union with the Supreme beyond the turmoil of the battlefield.
Verse 56
सम्बन्ध-- अर्जुनकी जिज्ञासाके अनुसार त्यागका यानी कर्मयोगका और संन्यासका यानी सांख्ययोगका तत्व अलय-अलय समझाकर यहाँतक उस प्रकरणको समाप्त कर दिया; किंतु इस वर्णनमें भगवान्ने यह बात नहीं कही कि दोनोंगेंसे तुम्हारे लिये अमुक साधन कर्तव्य है; अतएव अर्जुनको भक्तिप्रधान कर्मयोग ग्रहण करानेके उद्देश्यसे अब भक्तिप्रधान कर्मयोगकी महिमा कहते हैं-- सर्वकर्माण्यपिः सदा कुर्वाणो मद्बयपाश्रय: । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्व॒तं पदमव्ययम्,मेरे परायण हुआः कर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मोको सदा करता हुआ भी मेरी कृपासे सनातन अविनाशी परमपदको3 प्राप्त हो जाता हैडं
Even while continually performing every kind of duty, the practitioner of karma-yoga who takes refuge in Me as the sole support attains—by My grace—the eternal, imperishable supreme state. The ethical emphasis is that action need not be abandoned; when one acts without ego and with devotion, responsibility is fulfilled without bondage, and liberation becomes possible through divine favor.
Verse 57
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्पर: । बुद्धियोगमुपश्रित्य मच्चित्त: सततं भव,सब कर्मोंका मनसे मुझमें अर्पण करके» तथा समबुद्धिरूप योगको* अवलम्बन करके मेरे परायण* और निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो*
Arjuna said: “Surrendering in your mind all actions to Me, making Me your highest aim, and taking refuge in the yoga of steady discernment, keep your consciousness fixed on Me at all times.”
Verse 58
मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात् तरिष्यसि । अथ चेत् त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनड्क्ष्यसि
With your mind fixed on Me, by My grace you will cross beyond all hardships and perilous obstacles. But if, out of ego, you refuse to heed this counsel, you will come to ruin.
Verse 59
उपर्युक्त प्रकारसे मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे समस्त संकटोंको अनायास ही पार कर जायगाः और यदि अहंकारके कारण मेरे वचनोंको न सुनेगा तो नष्ट हो जायगा अर्थात् परमार्थसे भ्रष्ट हो जायगा5 ।। यदहंकारमश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति,जो तू अहंकारका आश्रय लेकर यह मान रहा है कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा',> तेरा यह निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा
Arjuna, if—taking refuge in ego—you decide, “I will not fight,” that resolve is futile. Your own inborn nature will compel you into action, drawing you into the very battle you wish to avoid. Refusing one’s rightful duty out of self-will does not free one from action; it only entangles one more deeply in the forces of character and circumstance.
Verse 60
स्वभावजेन कौन्तेयः निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तु नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशो5पि तत्,हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्मको तू मोहके कारण* करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्मसे बँधा हुआ परवश होकर करेगाः
Bound by your own action born of your nature, O son of Kuntī, you will be compelled to do that very deed which, out of delusion, you do not wish to do. The force of your ingrained disposition and past practice will drive you even against your present reluctance—showing that evasion of rightful duty does not free one from responsibility, but entangles one further in confusion.
Verse 61
सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकोंनें कर्म करनेगें मनुष्यको स्वभावके अधीन बतलाया गया: इसपर यह शंका हो सकती है कि प्रकृति या स्वभाव जड है; वह किसीको अपने वशमें कैसे कर सकता है; इसलिये भगवान् कहते हैं-- ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेडर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया
The Lord abides in the heart of every being, O Arjuna. By His māyā He causes all creatures to move and turn about, as though mounted on a machine—indicating that embodied agency operates under an inner divine governance even while moral responsibility for one’s chosen alignment remains central to dharma.
Verse 62
हे अर्जुन! शरीररूप यन्त्रमें आरूढ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी मायासे उनके कर्मोंके अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित हैः ।। सम्बन्ध-- यहाँ यह प्रश्न उठता है कि कर्मबन्धनसे छूटकर परम शान्तिलाभ करनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये; इसपर भगवान् कहते हैं-- तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थान प्राप्स्पसि शाश्वतम्
The Lord, O Arjuna, abides in the heart-region of all beings. By His māyā He causes all creatures—mounted upon the mechanism of the body—to move about, each according to their deeds. Therefore, to be released from the bondage of action and attain supreme peace, take refuge in Him alone with your whole being, O descendant of Bharata; by His grace you will attain the highest peace and the eternal abode.
Verse 63
हे भारत! तू सब प्रकारसे उस परमेश्वरकी ही शरणमें जा5। उस परमात्माकी कृपासे ही तू परम शान्तिको तथा सनातन परम धामको प्राप्त होगा ।। सम्बन्ध-- इस प्रकार अर्जुनको अन्तयमी परमेश्वरकी शरण ग्रहण करनेके लिये आज्ञा देकर अब भगवान् उक्त उपदेशका उपसंद्वार करते हुए कहते हैं-- इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्माद् गुह्दतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु
O descendant of Bharata, take refuge wholly in that Supreme Lord alone. By the grace of that Supreme Self, you will attain the highest peace and reach the eternal, supreme abode. (Context: Having urged Arjuna toward inner surrender to the indwelling Lord, the teaching now moves toward its concluding summary.)
Verse 64
इस प्रकार यह गोपनीयसे भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुझसे कह दियाः। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञानको पूर्णतया भलीभाँति विचारकर जैसे चाहता है वैसे ही कर ।। सम्बन्ध-- इस प्रकार अर्जुनको सारे उपदेशपर विचार करके अपना कर्तव्य निर्धारित करनेके लिये कहे जानेपर भी जब अजुनने कुछ भी उत्तर नहीं दिया और वे अपनेको अनधिकारी तथा कर्तव्य निश्चय करनेगें असमर्थ समझकर खिन्रचित्त हो गये, तब सबके हदयकी बात जाननेवाले अन्तयमी भगवान् स्वयं ही अर्जुनपर दया करके कहने लगे-- सर्वगुह्मतमं भूय: शृणु मे परमं वच: । इष्टोडसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्
Thus I have declared to you this knowledge—more secret than what is secret. Reflect on it fully and without remainder; then act as you choose. (In ethical terms, the teaching is not imposed by force: after receiving the highest counsel, the hearer is asked to deliberate carefully and take responsibility for a freely chosen course aligned with dharma.)
Verse 65
सम्पूर्ण गोपनीयोंसे अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचनको तू फिर भी सुनरें। तू मेरा अतिशय प्रिय है,* इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा ।। मन्मना भव मद्धक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोडसि मे,हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करनेवाला होः और मुझको प्रणाम कर*। ऐसा करनेसे तू मुझे ही प्राप्त होगा,5 यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ;* क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है
O Arjuna, hear once more My supreme word, the most secret of all secrets, charged with the highest mystery. Because you are deeply dear to Me, I will speak to you what is for your highest good. Let your mind rest in Me; become My devotee; worship Me; bow to Me. By doing so you will surely come to Me—this is My true pledge to you—because you are dear to Me.
Verse 66
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:
Abandon every competing claim of duty and take refuge in Me alone. I will free you from all wrongdoing and its consequences; do not grieve.
Verse 67
सम्पूर्ण धर्मोको अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको मुझमें त्यागकर* तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार परमेश्वरकी ही शरणमें आ जाः। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत करः ।। सम्बन्ध-- इस प्रकार भगवान् गीताके उपदेशका उपसंहार करके अब उस उपदेशके अध्यापन और अध्ययन आदिका माहात्म्य बतलानेके लिये पहले अनधिकारीके लक्षण बतलाकर उसे गीताका उपदेश युनानेका निषेध करते हैं-- इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां यो5भ्यसूयति,तुझे यह गीतारूप रहस्यमय उपदेश किसी भी कालमें न तो तपरहित मनुष्यसे कहना चाहिये, न भक्तिरहितसे और न बिना सुननेकी इच्छावालेसे ही कहना चाहिये तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहियरें
Abandoning all other claims of duty and obligation, take refuge in Me alone—the all-powerful Lord, the support of all. I will release you from every sin; do not grieve. Having thus concluded the teaching of the Gītā, the Lord then turns to its proper transmission: this secret instruction is not to be taught to one without austerity, without devotion, without the desire to listen and serve, or to one who is hostile and fault-finding toward Him.
Verse 68
य इमं परम॑ गुहां मद्धक्तेष्वभिधास्यति । भक्ति मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:
Whoever expounds this supreme secret among My devotees—having established the highest devotion toward Me—will come to Me alone, without doubt.
Verse 69
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्निन्मे प्रियकृत्तम: । भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि,उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभरमें उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्यमें होगा भी नहींः
Among human beings, there is none who has done what is dearer to Me than he; and on this earth there will never be another who will be more beloved to Me than he.
Verse 70
सम्बन्ध--इस प्रकार उपर्युक्त दो श्लोकोर्में गीताशास्त्रका श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवद्धक्तोंगें विस्तार करनेका फल और गमाहात्म्य बतलाया: किंतु सभी मनुष्य इस कार्यको नहीं कर सकते, इसका अधिकारी तो कोई बिरला ही होता है। इसलिये अब गीताशास्त्रके अध्ययनका गमाहात्म्य बतलाते हैं-- अध्येष्यते च य इमं धर्म्य संवादमावयो: । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति:,जो पुरुष इस धर्ममयर हम दोनोंके संवादरूप गीताशास्त्रको पढ़ेगा,” उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे* पूजित होऊँगा--ऐसा मेरा मत है
Whoever studies this righteous dialogue between the two of us—this teaching—by that very act I consider Myself worshipped through the sacrifice of knowledge; such is My conviction.
Verse 71
सम्बन्ध-- इस प्रकार गीताशास्त्रके अध्ययनका माहात्म्य बतलाकर, अब जो उपर्युक्त प्रकारसे अध्ययन करनेगें असमर्थ हैं-- ऐसे मनुष्यके लिये उसके श्रवणका फल बतलाते हैं श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नर: । सोअपिमुक्त: शुभाल्लोकान प्राप्तुयात् पुण्यकर्मणाम्,जो मजनुष्यः श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित होकर इस गीताशास्त्रका श्रवण भी करेगाउं, वह भी पापोंसे मुक्त होकर उत्तम कर्म करनेवालोंके श्रेष्ठ लोकोंको प्राप्त होगा३
Even a person who cannot undertake a disciplined study of this teaching, but listens to it with faith and without fault-finding, is freed from sin and attains the auspicious realms reached by those who perform righteous deeds.
Verse 72
सम्बन्ध-- इस प्रकार गीताशासत्रके कथन; पठन और श्रवणका माहात्म्य बतलाकर अब भगवान् स्वयं सब कुछ जानते हुए भी अर्जुनकों सचेत करनेके लिये उससे उसकी स्थिति पूछते हैं-- कच्चिदेतच्छुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानसम्मोह: प्रनष्टस्ते धनंजय,हे पार्थ! क्या इस (गीताशास्त्र)-को तूने एकाग्रचित्तसे श्रवण किया?* और हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?5
O Partha, have you listened to this with a mind made single-pointed? O Dhananjaya, has the delusion born of ignorance been destroyed in you?
Verse 73
अजुन उवाच नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितो5स्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव,अर्जुन बोले--हे अच्युत! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञाका पालन करूँगाः
Arjuna said: “O Acyuta, by your grace my delusion has been dispelled and my true recollection has returned. I now stand firm, free from doubt; I will carry out your instruction.”
Verse 74
मोह-नाश नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितो5स्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव ॥। (गीता १८।७३) सम्बन्ध-- इस प्रकार धृतराष्ट्रके प्रश्नानुसार भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप गीताशासत्रका वर्णण करके अब उसका उपसंहार करते हुए संजय धुतराष्ट्रके सामने गीताका महत्त्व प्रकट करते हैं-- संजय उवाच इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मन: । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्,संजय बोले--इस प्रकार मैंने श्रीवासुदेवके और महात्मा अर्जुनके इस अद्भुत रहस्ययुक्त, रोमांचकारक संवादको सुनाई
Arjuna declares to Kṛṣṇa: “My delusion has been destroyed, and through your grace, O Acyuta, I have regained clear remembrance and right understanding. I now stand firm, free from doubt, and I will carry out your instruction.” In the ethical setting of the battlefield, this marks the turning point where inner confusion yields to discernment and committed action aligned with dharma rather than personal fear or attachment.
Verse 75
व्यासप्रसादाच्छुतवानेतद् गुहामहं परम् । योगं योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयत: स्वयम्,श्रीव्यासजीकी कृपासेः दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योगको:ः अर्जुनके प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे प्रत्यक्ष सुना है
Sanjaya said: By the grace of Vyasa, I have heard this supreme secret—this profound Yoga—directly from Krishna, the Lord of Yoga Himself, as He spoke it in person. The verse underscores that Sanjaya’s report is not hearsay but a divinely granted, faithful witnessing of a sacred teaching delivered amid the moral crisis of war.
Verse 76
राजन संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् | केशवार्जुनयो: पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुह:
Sañjaya said: O King, again and again recalling this wondrous dialogue, the sacred exchange between Keśava and Arjuna, I am filled with joy time after time. In remembering it, the mind turns from the violence of war toward the higher law of dharma and the purifying power of right understanding and devotion.
Verse 77
हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्धुत संवादको पुन:-पुन: स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित होता हूँ्ें ।। तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यदभुतं हरे:५ | विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुन: पुन:,हे राजन! श्रीहरिके उस अत्यन्त विलक्षण रूपको भी पुनः:-पुनः स्मरण करके मेरे चित्तमें महान् आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ
Sanjaya said: O King, as I recall again and again that supremely wondrous form of Hari, a great astonishment arises in me; and time after time I am filled with joy. Remembering repeatedly the secret, welfare-bringing, extraordinary dialogue between Śrī Kṛṣṇa and Arjuna, my heart is uplifted—showing how the vision of the Divine and the teaching of dharma steady the mind even amid the terror of war.
Verse 78
सम्बन्ध--इस प्रकार अपनी स्थितिका वर्णन करते हुए गीताके उपदेशकी और हक 3. रूपकी स्युतिका महत्त्व प्रकट करके; अब संजय धुतराष्ट्रसे की विजयकी निश्चित सम्भावना प्रकट करते हुए इस अध्यायका उपसंहार करते हैं-- यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: । तत्र श्रीविजयो भूतिर्धुवा नीतिर्मतिर्मम,हे राजन! जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहींपर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है--ऐसा मेरा मत है*.
Sanjaya said: O King, wherever Krishna, the Lord of Yoga, stands, and wherever Arjuna, the wielder of the bow, stands—there surely abide prosperity, victory, flourishing power, and steadfast right policy. Such is my considered judgment.
Yudhiṣṭhira confronts a dharma-saṅkaṭa: whether continued leadership in a destructive campaign is ethically defensible, or whether withdrawal (forest-life and austerity) is preferable when losses appear unavoidable.
The chapter frames despair as a governance failure: ethical intent must be joined to disciplined organization, delegated command, and collective effort; responsibility is discharged through steadiness and appropriate strategy rather than abandonment.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is operational and instructional—linking emotional crisis to counsel and then to a formalized vyūha plan within the epic’s war-narrative logic.