भीष्मविक्रमदर्शनं तथा क्रौञ्चारुणव्यूहविधानम् | Bhīṣma’s Ascendancy and the Organization of the Krauñcāruṇa Formation
अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मको” नहीं त्यागना चाहिये; क्योंकि धूएँसे अग्निकी भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं* ।। सम्बन्ध-- भगवान्ने तेरहवेंसे चालीसवें *लोकतक संन्यास यानी सांख्यका निरूपण किया। फिर इकतालीसवें श्लोकसे यहॉतक कर्मयोगरूप त्यागका तत्त्व समझानेके लिये स्वाभाविक कर्मोका स्वरूप और उनकी अवश्यकर्तव्यताका निर्देश करके तथा कर्मयोगमों भक्तिका सहयोग दिखलाकर उसका फल भगवत्प्राप्ति बतलाया;: किंतु वहाँ संन््यासके प्रकरणमें यह बात नहीं कही गयी कि संन्यासका क्या फल होता है और कर्मोर्नें कर्तापनका अभिमगान त्याग कर उपासनाके सहित सांख्ययोगका किस प्रकार साधन करना चाहिये। अतः यहाँ उपासनाके सहित विवेक और वैराग्यपूर्वक एकान्तमें रहकर साधन करनेकी विधि और उसका फल बतलानेके लिये पुनः सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हैं-- असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृह: । नैष्कर्म्यसिद्धि परमां संन्यासेनाधिगच्छति,सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अन्तःकरणवाला पुरुष सांख्ययोगके द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धिको प्राप्त होता है?
ata eva he kaunteya doṣa-yukto 'pi sahajaṁ karma na tyajet; dhūmenāgnir iva sarvāṇi karmāṇi doṣeṇa āvṛtāni.
“Therefore, O son of Kuntī, one should not abandon one’s natural, inborn duty even when it is attended by faults; for every action in this world is inevitably tainted by some defect—just as fire is veiled by smoke. The ethical point is not to flee responsibility because it is imperfect, but to perform one’s rightful work with discernment and steadiness, accepting that purity in action is a matter of inner orientation rather than flawless external conditions.”
अजुन उवाच