Adhyaya 151
Anushasana ParvaAdhyaya 15165 Verses

Adhyaya 151

कल्मषापहर-कीर्तनम् / Kīrtana for the Removal of Impurity

Upa-parva: Pāpa-nāśana-stava (Deva–Ṛṣi–Rājarṣi-kīrtana) Sub-episode

Yudhiṣṭhira opens with a normative inquiry: what is śreyas for a person, what conduct yields happiness, how one becomes free from pāpa, and what destroys kalmaṣa. Bhīṣma answers by prescribing a recitation characterized as ‘daivatavaṃśa’ and ‘ṛṣivaṃśa-samanvita,’ to be read at both twilight junctions (dvi-saṃdhyā), explicitly labeled as a supreme remover of impurity. The chapter then unfolds as a catalogic stava: it names major deities and cosmic authorities (including creator and preserver forms), assemblies of gods, celestial musicians and apsarases, ethical abstractions (dharma, satya, tapas, dīkṣā), time-units and astral bodies, followed by extensive sacred geography—rivers, tīrthas (e.g., Prayāga, Naimiṣa), and mountains (Himavān, Vindhya, Meru). A second catalog lists tapas-siddha ṛṣis aligned with directions, and then a long rājarṣi roll-call of exemplary kings. The discourse closes with protective and purificatory claims: one who praises, honors, and repeats these names is released from faults and fear, and the speaker appends a brief wish-prayer for freedom from obstacles and for steadfast success and higher destiny.

Chapter Arc: पार्वती का प्रश्न उठता है—मनुष्य किन शीलों, सदाचारों, कर्मों और किस प्रकार के दान से स्वर्गगति पाता है; धर्म का मार्ग एक जिज्ञासा नहीं, जीवन-मरण का निर्णय बनकर सामने आता है। → महेश्वर दान और लोकहित के कर्मों की विस्तृत सूची खोलते हैं—ब्राह्मण-सत्कार, दीन-आर्त-कृपणों पर करुणा, अन्न-जल-वस्त्र का दान, विश्राम-स्थल, सभा-गृह, कूप, प्रपा, पुष्करिणी आदि जनोपयोगी निर्माण; साथ ही संकेत देते हैं कि इन मर्यादाओं से विचलन नरक और पतन की ओर ले जाता है। → धर्म-उल्लंघन का कठोर फल उद्घाटित होता है—नरक से छूटने पर भी दीर्घकाल तक कुत्सित कुलों (श्वपाक, पुल्कस आदि) में जन्म का दारुण विधान; और इसके प्रतिपक्ष में निर्णायक वाक्य—‘प्राणों से प्रिय कुछ नहीं, इसलिए जैसे अपने प्रति वैसे ही पर-प्राणियों के प्रति दया’—अहिंसा/प्राणिदया को धर्म का शिखर बना देता है। → महेश्वर निष्कर्ष देते हैं कि यह ‘सतां धर्म’ कल्याणकारी है और मनुष्यों के हितार्थ कहा गया है; शास्त्र लोकधर्म की मर्यादाएँ स्थापित करते हैं, और जो उन्हें प्रमाण मानकर दृढ़व्रत रहते हैं वे उन्नति पाते हैं—संशय-च्छेदन के रूप में कुशल-अकुशल का धर्मसागर स्पष्ट हो जाता है।

Shlokas

Verse 1

पार्वतीने पूछा--भगवन्‌! मनुष्य किस प्रकारके शील, कैसे सदाचार और किन कर्मोसे युक्त होकर अथवा किस दानके द्वारा स्वर्गमें जाता है

Pārvatī asked: “O Blessed Lord, by what kind of character and what manner of right conduct—endowed with which deeds, or through what form of giving—does a human being attain heaven?”

Verse 2

श्रीमहेश्वर उवाच दाता ब्राह्मणसत्कर्ता दीनार्तकृपणादिषु । भक्ष्यभोज्यान्नपानानां वाससां च प्रदायक:,श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य ब्राह्मणोंका सम्मान और दान करता है दीन, दुःखी और दरिद्र आदि मनुष्योंको भक्ष्य-भोज्य, अन्न-पान और वस्त्र प्रदान करता है, ठहरनेके स्थान, धर्मशाला, कुआँ, प्याऊ, पोखरी या बावड़ी आदि बनवाता है, लेनेवाले लोगोंकी इच्छा पूछ-पूछकर नित्य देनेयोग्य वस्तुएँ दान करता है, समस्त नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करता है, आसन, शय्या, सवारी, गृह, रत्न, धन, धान्य, गौ, खेत और कन्याओंका प्रसन्नतापूर्वक दान करता है, देवि! ऐसा मनुष्य देवलोकमें जन्म लेता है

Śrī Maheśvara said: “O Devī, one who is a giver—who honors Brahmins and shows compassion to the poor, the distressed, and the destitute—who provides food fit to eat, prepared meals, grain, drink, and clothing: such a person practices dharma through generous support of those in need.”

Verse 3

प्रतिश्रयान्‌ सभा: कूपान्‌ प्रपा: पुष्करिणीस्तथा । नैत्यकानि च सर्वाणि किमिच्छकमतीव च,श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य ब्राह्मणोंका सम्मान और दान करता है दीन, दुःखी और दरिद्र आदि मनुष्योंको भक्ष्य-भोज्य, अन्न-पान और वस्त्र प्रदान करता है, ठहरनेके स्थान, धर्मशाला, कुआँ, प्याऊ, पोखरी या बावड़ी आदि बनवाता है, लेनेवाले लोगोंकी इच्छा पूछ-पूछकर नित्य देनेयोग्य वस्तुएँ दान करता है, समस्त नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करता है, आसन, शय्या, सवारी, गृह, रत्न, धन, धान्य, गौ, खेत और कन्याओंका प्रसन्नतापूर्वक दान करता है, देवि! ऐसा मनुष्य देवलोकमें जन्म लेता है

Śrī Maheśvara said: “O Devī, (one should provide) shelters and assembly-halls, wells, public water-stations, and ponds/tanks; and likewise all daily (customary) gifts—given especially after asking what the recipient truly desires.”

Verse 4

आसन शयनं यान गृहं रत्नं धनं तथा । सस्यजातानि सर्वाणि गा: क्षेत्राण्यथ योषित:,श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य ब्राह्मणोंका सम्मान और दान करता है दीन, दुःखी और दरिद्र आदि मनुष्योंको भक्ष्य-भोज्य, अन्न-पान और वस्त्र प्रदान करता है, ठहरनेके स्थान, धर्मशाला, कुआँ, प्याऊ, पोखरी या बावड़ी आदि बनवाता है, लेनेवाले लोगोंकी इच्छा पूछ-पूछकर नित्य देनेयोग्य वस्तुएँ दान करता है, समस्त नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करता है, आसन, शय्या, सवारी, गृह, रत्न, धन, धान्य, गौ, खेत और कन्याओंका प्रसन्नतापूर्वक दान करता है, देवि! ऐसा मनुष्य देवलोकमें जन्म लेता है

Śrī Maheśvara said: “(One should give in charity) seats and beds, conveyances and houses, jewels and wealth; likewise all kinds of produce and grains, cows, fields, and women (i.e., maidens in marriage-gift).”

Verse 5

सुप्रतीतमना नित्यं यः प्रयच्छति मानव: । एवंभूतो नरो देवि देवलोकेडभिजायते,श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य ब्राह्मणोंका सम्मान और दान करता है दीन, दुःखी और दरिद्र आदि मनुष्योंको भक्ष्य-भोज्य, अन्न-पान और वस्त्र प्रदान करता है, ठहरनेके स्थान, धर्मशाला, कुआँ, प्याऊ, पोखरी या बावड़ी आदि बनवाता है, लेनेवाले लोगोंकी इच्छा पूछ-पूछकर नित्य देनेयोग्य वस्तुएँ दान करता है, समस्त नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करता है, आसन, शय्या, सवारी, गृह, रत्न, धन, धान्य, गौ, खेत और कन्याओंका प्रसन्नतापूर्वक दान करता है, देवि! ऐसा मनुष्य देवलोकमें जन्म लेता है

Maheshvara said: “O Goddess, the person who, with a mind ever content and well-disposed, continually gives in charity—such a man, O Devi, is reborn in the world of the gods.”

Verse 6

तत्रोष्य सुचिरं काल॑ भुक्‍त्वा भोगाननुत्तमान्‌ | सहाप्सतेभिमुदितो रमते नन्दनादिषु,वहाँ चिरकालतक निवास करके उत्तम भोगोंका भोग करते हुए ननन्‍्दन आदि वनोंमें अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रमण करता है

Having dwelt there for a long time, he enjoys unsurpassed heavenly pleasures; delighted, he sports joyfully in Nandana and other celestial groves in the company of apsarases.

Verse 7

तस्मात्‌ स्वर्गाच्च्युतो लोकान्‌ मानुषेषु प्रजायते । महाभोगकुले देवि धनधान्यसमन्वित:,देवि! फिर वह स्वर्गलोकसे नीचे आनेपर मनुष्य-जातिके भीतर महान्‌ भोगोंसे सम्पन्न कुलमें जन्म लेता है और धन-धान्यसे सम्पन्न होता है

Therefore, when he falls from heaven and returns to the worlds below, he is born among human beings—O Goddess—in a family endowed with great enjoyments, and he becomes possessed of wealth and abundant grain.

Verse 8

तत्र कामगुणै: सर्वे: समुपेतो मुदा युतः । महाभोगो महाकोशो धनी भवति मानव:,मानवयोनिमें वह समस्त कमनीय गुणोंसे सम्पन्न एवं प्रसन्न होता है। उसके पास महान्‌ भोगसामग्री संचित रहती है। उसका खजाना भी विशाल होता है। वह मनुष्य सभी दृष्टियोंसे धनवान्‌ होता है

There he is endowed with all desirable qualities and filled with gladness. Great enjoyments are amassed for him; his treasury is vast, and that man is wealthy in every respect.

Verse 9

एते देवि महाभागा: प्राणिनो दानशीलिन: । ब्रह्मणा वै पुरा प्रोक्ता: सर्वस्य प्रियदर्शना:

O Goddess, these fortunate beings are naturally inclined to generosity. Long ago they were spoken of by Brahmā himself, and they appear pleasing and dear to all.

Verse 10

देवि! ये दानशील प्राणी ही ऐसे महान्‌ सौभाग्यसे सम्पन्न होते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इनका ऐसा ही परिचय दिया है। दाता मनुष्य सभीकी दृष्टि में प्रिय होते हैं ।। अपरे मानवा देवि प्रदानकृपणा द्विजै: । याचिता न प्रयच्छन्ति विद्यमाने5प्यबुद्धय:,देवि! दूसरे बहुत-से मनुष्य दान देनेमें कृपण होते हैं। वे मन्दबुद्धि मानव ब्राह्मणोंके माँगनेपर अपने पास धन होते हुए भी उन्हें कुछ नहीं देते

Maheshvara said: “O Goddess, living beings who are generous in giving become endowed with such great good fortune. In ancient times Brahmā himself described them in just this way. A giver is dear in everyone’s eyes. But, O Goddess, many other people are miserly when it comes to giving; though they possess wealth, when asked by Brahmins they do not give—being of poor understanding.”

Verse 11

दीनान्धकृपणान्‌ दृष्टवा भिक्षुकानतिथीनपि । याच्यमाना निवर्तन्ते जिह्वालोभसमन्विता:,वे दीनों, अन्धों, दरिद्रों, भिखमंगों और अतिथियोंको देखते ही हट जाते हैं। उनके याचना करनेपर भी जिह्वाकी लोलुपताके कारण उन्हें अन्न नहीं देते

Seeing the destitute, the blind, and the wretched—beggars and even guests—they turn away. Even when those people plead, driven by greed for the pleasures of the tongue, they do not give them food.

Verse 12

न धनानि न वासांसि न भोगान्‌ न च काउचनम्‌ । न गावो नान्नविकृतिं प्रयच्छन्ति कदाचन,वेन धन, न वस्त्र, न भोग, न सुवर्ण, न गौ और न अन्नकी बनी हुई नाना प्रकारकी खाद्य वस्तुओंका कभी दान करते हैं

Śrī Maheśvara said: “They never give in charity—neither wealth nor garments, neither enjoyments nor gold; neither cows nor the many prepared varieties of food. Thus they remain closed to generosity and the duty of giving.”

Verse 13

अप्रवृत्ताश्न ये लुब्धा नास्तिका दानवर्जिता: | एवंभूता नरा देवि निरयं यान्त्यबुद्धय:,देवि! ऐसे अकर्मण्य, लोभी, नास्तिक तथा दानधर्मसे दूर रहनेवाले बुद्धिहीन मनुष्य नरकमें पड़ते हैं

Śrī Maheśvara said: “O Goddess, those men who are inactive and unwilling to exert themselves, who are greedy, who deny faith and moral order, and who keep away from the duty of giving—such people, lacking discernment, go to hell.”

Verse 14

ते वै मनुष्यतां यान्ति यदा कालस्य पर्ययात्‌ | धनरिक्ते कुले जन्म लभन्ते स्वल्पबुद्धयः,यदि कालचक्रके फेरसे वे मन्दबुद्धि मानव पुनः मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं तो निर्धन कुलमें ही उत्पन्न होते हैं

Maheshvara said: “When, with the turning of Time, such beings return to the human state, those of little understanding obtain birth in a family bereft of wealth.”

Verse 15

क्षुत्पिपासापरीताश्व सर्वलोकबहिष्कृता: । निराशा: सर्वभोगेभ्यो जीवन्त्यधर्मजीविकाम्‌,वहाँ सदा भूख-प्यासका कष्ट सहते हैं। सब लोग उन्हें समाजसे बाहर कर देते हैं तथा वे सब प्रकारके भोगोंसे निराश होकर पापाचारसे जीविका चलाते हैं

Afflicted by hunger and thirst, and cast out by all people, they lose hope of every lawful enjoyment. In such despair they sustain themselves by an unrighteous livelihood—living on wrongdoing and sinful conduct.

Verse 16

अल्पभोगकुले जाता अल्पभोगरता नरा: । अनेन कर्मणा देवि भवन्त्यधनिनो नरा:,देवि! इस पापकर्मसे ही मनुष्य अल्प भोगवाले कुलमें जन्म लेता है, थोड़े-से ही भोग भोगते और सदा निर्धन रहते हैं

Maheshvara said: “O Goddess, by this kind of sinful action, people are born into families of meagre means; they become attached to scant enjoyments, and they remain poor.”

Verse 17

अपरे स्तम्भिनो नित्यं मानिन: पापतो रता: । आसनार्हसय ये पीठं न प्रयच्छन्त्यचेतस:,इनके सिवा दूसरे भी ऐसे मनुष्य हैं, जो सदा गर्व और अभिमानमें फूले तथा पापमें रत रहते हैं। वे मूर्ख आसन देनेयोग्य पूज्य पुरुषको बैठनेके लिये कोई पीढ़ा या चौकीतक नहीं देते हैं

There are others as well—ever obstinate, swollen with pride and vanity, and devoted to sin. In their folly they do not even offer a seat, not so much as a small stool or bench, to a venerable person who is worthy to be seated.

Verse 18

मार्गहिस्थ च ये मार्ग न यच्छन्त्यल्पबुद्धय: । पाद्या्हस्य च ये पाद्यं न ददत्यल्पबुद्धय:,वे बुद्धिहीन अथवा मन्दबुद्धि पुरुष मार्ग देनेयोग्य पुरुषोंको जानेके लिये मार्ग नहीं देते और पाद्य अर्पण करनेयोग्य पूजनीय पुरुषोंको पाद्य (पैर धोनेके लिये जल) नहीं देते हैं

Those of little understanding, though standing on the road, do not show the way to one who should be guided; and to a venerable guest who deserves it, they do not offer foot-washing water.

Verse 19

अर्घ्यहिन्‌ न च सत्कारैरर्चयन्ति यथाविधि । अर्घ्यमाचमनीयं वा न यच्छन्त्यल्पबुद्धय:,इतना ही नहीं, वे अर्घ्य देनेयोग्य माननीय व्यक्तियोंका नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा विधिपूर्वक पूजन नहीं करते अथवा वे मूर्ख उन्हें अर््धय या आचमनीय नहीं देते हैं

Nor is that all: those of little understanding do not worship, as prescribed, those worthy of arghya with proper honors; and they offer them neither arghya nor ācamanīya, the water for ritual sipping and purification.

Verse 20

गुरु चाभिगतं प्रेम्णा गुरुवन्न बुभूषते । अभिमानप्रवृत्तेन लोभेन समवस्थिता:,गुरुके आनेपर प्रेमपूर्वक उनकी पूजा नहीं करते--उन्हें गुरुवत्‌ सम्मान नहीं देना चाहते, अभिमान और लोभके वशीभूत होकर वे सम्माननीय मनुष्योंका अपमान और बड़े- बूढ़ोंका तिरस्कार करते हैं। देवि! ऐसा करनेवाले सभी मनुष्य नरकगामी होते हैं

Even when a teacher comes to them, they do not honor him with loving regard—they do not wish to revere him as a guru. Ruled by pride and greed, they insult those worthy of reverence and scorn the elders. O Devi, all who act thus are destined for hell.

Verse 21

सम्मान्यांश्षावमन्यन्ते वृद्धान्‌ परिभवन्ति च । एवंविधा नरा देवि सर्वे निरयगामिन:,गुरुके आनेपर प्रेमपूर्वक उनकी पूजा नहीं करते--उन्हें गुरुवत्‌ सम्मान नहीं देना चाहते, अभिमान और लोभके वशीभूत होकर वे सम्माननीय मनुष्योंका अपमान और बड़े- बूढ़ोंका तिरस्कार करते हैं। देवि! ऐसा करनेवाले सभी मनुष्य नरकगामी होते हैं

They slight those who deserve honor, and they insult the aged as well. O Goddess, people of this kind—all of them—are destined for hell; for driven by pride and greed, they refuse to revere elders and worthy persons as teachers and instead treat them with contempt.

Verse 22

ते वै यदि नरास्तस्मान्निरयादुत्तरन्ति वै । वर्षपूगैस्ततो जन्म लभन्ते कुत्सिते कुले,बहुत वर्षोके बाद जब वे उस नरकसे छुटकारा पाते हैं तो श्वपाक और पुल्कस आदि निन्दित और मूढ़ मनुष्योंके कुत्सित कुलमें जन्म लेते हैं। गुरुजनों और वृद्धोंका तिरस्कार करनेवाले वे अधम मानव चाण्डालोंके उन्हीं निन्दित कुलोंमें उत्पन्न होते हैं

Maheshvara said: If those men do at last emerge from that hell, then only after the passage of many years do they obtain another birth—and that too in a despised and degraded family. Thus, those who scorn elders and teachers, and who show contempt for venerable persons, fall into suffering and, even after release, reap the consequence of being born among censured communities, for the law of dharma declares that disrespect toward the worthy leads to spiritual and social downfall.

Verse 23

श्वरपाकपुल्कसादीनां कुत्सितानामचेतसाम्‌ | कुलेषु तेषु जायन्ते गुरुवृद्धापचायिन:,बहुत वर्षोके बाद जब वे उस नरकसे छुटकारा पाते हैं तो श्वपाक और पुल्कस आदि निन्दित और मूढ़ मनुष्योंके कुत्सित कुलमें जन्म लेते हैं। गुरुजनों और वृद्धोंका तिरस्कार करनेवाले वे अधम मानव चाण्डालोंके उन्हीं निन्दित कुलोंमें उत्पन्न होते हैं

Maheśvara said: After being released from that hell, those base-minded people are born among the despised communities such as the śvapākas and pulkasas. They are the lowest of men—those who show no reverence to elders and teachers—and thus take birth again in those censured lineages.

Verse 24

न स्तम्भी न च मानी यो देवताद्विजपूजक: । लोकपूज्यो नमस्कर्ता प्रश्मितो मधुरं वच:,देवि! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात्‌ मानव-योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है

Śrī Maheśvara said: “That person who is neither arrogant nor conceited; who worships the gods and honors the twice-born (dvija); who is regarded as worthy of reverence by the world; who bows to elders; who is gentle and modest, speaking sweet words—such a one, by these marks of conduct, follows the path of dharma.”

Verse 25

सर्ववर्णप्रियकर: सर्वभूतहित: सदा । अद्वेषी सुमुख: श्लक्षण: स्निग्धवाणीप्रद: सदा,देवि! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात्‌ मानव-योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है

Maheshvara said: “O Devi, he who is dear to all the social orders, ever intent on the welfare of all beings; who bears no hatred; whose face is pleasant; whose disposition is gentle; and who always speaks in a warm, affectionate manner—such a person, by these qualities of humility, kindness, and non-hostility, becomes worthy of honor in the world and attains auspicious realms, later taking birth again among distinguished families.”

Verse 26

स्वागतेनैव सर्वेषां भूतानामविहिंसक: । यथार्हसत्क्रियापूर्वमर्चचन्तवतिष्ठति,देवि! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात्‌ मानव-योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है

Mahādeva said: “O Devī, one who is non-violent toward all beings, who greets others with warmth, and who remains ever engaged in honoring them with due respect and fitting hospitality—such a person, by making reverent offerings and performing appropriate acts of courtesy, abides in righteous conduct.”

Verse 27

मार्गार्हाय ददन्मार्ग गुरुं गुरुवदर्चयन्‌ । अतिथियद्रग्रहरतस्तथाभ्यागतपूजक:,देवि! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात्‌ मानव-योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है

Maheshvara says: One who yields the way to those who deserve it, honors the teacher as one honors a guru, remains devoted to receiving and serving guests, and also worshipfully attends to visitors who arrive of their own accord—such a person, established in courteous conduct and reverence, attains heaven; and thereafter, returning to human birth, is born in a distinguished family.

Verse 28

एवंभूतो नरो देवि स्वर्गतिं प्रतिपद्यते । ततो मानुषतां प्राप्प विशिष्टकुलजो भवेत्‌,देवि! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात्‌ मानव-योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है

Maheshvara said: “O Goddess, a man of such conduct attains the path to heaven. Thereafter, returning to human existence, he is born in a distinguished family.”

Verse 29

तत्रासौ विपुलैभोंगै: सर्वरत्नसमायुतः । यथार्हदाता चार्हेषु धर्मचर्यापरो भवेत्‌,उस जन्ममें वह महान्‌ भोगों और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न हो सुयोग्य ब्राह्मणोंको यथायोग्य दान देता और धर्मानुष्ठानमें तत्पर रहता है

There, in that birth, he becomes endowed with abundant enjoyments and adorned with every kind of precious gem. He gives fitting gifts to worthy Brahmins according to their due, and remains devoted to the practice and observance of dharma.

Verse 30

सम्मतः सर्वभूतानां सर्वलोकनमस्कृत: । स्वकर्मफलमाप्रोति स्वयमेव नर: सदा,वहाँ सब प्राणी उसका सम्मान करते हैं और सब लोग उसके सामने नतमस्तक होते हैं। इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मोका फल सदा स्वयं ही भोगता है

He who is approved and esteemed by all beings, and before whom all people bow in reverence—such honor arises from his own conduct. For a person always receives and experiences the results of his own actions, by himself alone.

Verse 31

उदात्तकुलजातीय उदात्ताभिजन: सदा । एष धर्मों मया प्रोक्तो विधात्रा स्वयमीरित:,धर्मात्मा मनुष्य सर्वदा उत्तम कुल, उत्तम जाति और उत्तम स्थानमें जन्म धारण करता है। यह साक्षात्‌ ब्रह्माजीके बताये हुए धर्मका मैंने वर्णन किया है

Mahādeva said: “One who is righteous is ever born into an exalted family and lineage, among the noble and well-regarded. This is the dharma I have declared—first proclaimed by the Creator himself.”

Verse 32

यस्तु रौद्रसमाचार: सर्वसत्त्वभयंकर: । हस्ताभ्यां यदि वा पदभ्यां रज्ज्वा दण्डेन वा पुन:

Mahādeva said: “But one whose conduct is fierce and cruel, terrifying to all living beings—whether he strikes with his hands or with his feet, or again uses a rope or a staff—(such violent behavior is being described).”

Verse 33

लोष्टै: स्तम्भैरायुधैर्वा जन्तून्‌ बाधति शोभने । हिंसार्थ निकृतिप्रज्ञ: प्रोद्ेजयति चैव ह

Maheshvara said: “O fair one, a man of perverse understanding harasses living beings—whether with clods of earth, with clubs or posts, or with weapons. Intent on causing harm, he deliberately provokes and incites violence.”

Verse 34

उपक्रामति जनन्‍्तूंश्च उद्वेशजनन: सदा । एवंशीलसमाचारो निरयं प्रतिपद्यते

One who attacks living beings and is ever a source of hatred—whose conduct is of such a nature—falls into hell.

Verse 35

शोभने! जिस मनुष्यका आचरण क्रूरतासे भरा हुआ है, जिससे समस्त जीवोंको भय प्राप्त होता है, जो हाथ, पैर, रस्सी, डंडे और ढेलेसे मारकर, खम्भोंमें बाँधकर तथा घातक शस्त्रोंका प्रहार करके जीव-जन्तुओंको सताता है, छल-कपटमें प्रवीण होकर हिंसाके लिये उन जीवोंमें उद्गबेग पैदा करता है तथा उद्वेगजनक होकर सदा उन जन्तुओंपर आक्रमण करता है, ऐसे स्वभाव और आचारवाले मनुष्यको नरकमें गिरना पड़ता है ।। स वै मनुष्यतां गच्छेद्‌ यदि कालस्य पर्ययात्‌ | बह्दवाबाधपरिक्लिष्टे जायते सोडधमे कुले,यदि वह कालचक्रके फेरसे फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो अनेक प्रकारकी विघ्न- बाधाओंसे कष्ट उठानेवाले अधम कुलमें उत्पन्न होता है

Śrī Maheśvara said: “O fair one! A man whose conduct is steeped in cruelty—one who becomes a source of fear to all creatures—who beats living beings with hands and feet, with ropes, sticks, and stones, who binds them to posts and strikes them with deadly weapons, tormenting animals and other beings; who is skilled in deceit and fraud, who for the sake of violence stirs panic among them, and, being himself an agent of terror, continually assaults those creatures—such a man must fall into hell. And if, by the turning of Time’s wheel, he returns again to human birth, he is born in a low family, afflicted by many hardships and obstructed by countless troubles.”

Verse 36

लोकद्देष्यो5धम: पुंसां स्वयं कर्मफलै: कृत्तै: एष देवि मनुष्येषु बोद्धव्यो ज्ञातिबन्धुषु

Śrī Maheśvara said: “Among men, the lowest is one who becomes hated by society through the consequences of his own deeds. O Devī, in human life this is to be recognized especially in relation to one’s kinsmen and close friends: a person’s self-made actions can sever the very bonds that should protect and uphold him.”

Verse 37

देवि! ऐसा मनुष्य अपने ही किये हुए कर्मोके फलके अनुसार मनुष्योंमें तथा जाति- बन्धुओंमें नीच समझा जाता है और सब लोग उससे द्वेष रखते हैं ।। अपर: सर्वभूतानि दयावाननुपश्यति । मैत्रदृष्टि: पितृसमो निर्वैरों नियतेन्द्रिय:,इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियोंके प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता है, सबके ऊपर पिताके समान स्नेह रखता है, किसीके साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, जो हाथ-पैर आदिको अपने अधीन रखकर किसी भी जीवको न तो उद्वेगमें डालता और न मारता ही है, जिसपर सब प्राणी विश्वास करते हैं, जो रस्सी, डंडे, ढेले और घातक अस्त्र-शस्त्रोंसे प्राणियोंको कष्ट नहीं पहुँचाता, जिसके कर्म कोमल एवं निर्दोष होते हैं तथा जो सदा ही दयापरायण होता है, ऐसे स्वभाव और आचरणवाला पुरुष स्वर्गलोकमें दिव्य शरीर धारण करता है और वहाँके दिव्य भवनमें देवताओंके समान आनन्दपूर्वक निवास करता है

Maheshvara said: “O Goddess, a person who acts in such a way becomes, by the very fruit of his own deeds, regarded as base among people and even among his own kin; everyone comes to hate him. But, by contrast, the one who looks upon all beings with compassion—who regards all as friends, shows father-like affection toward all, bears no enmity, and keeps the senses under restraint—who does not agitate or kill any creature by controlling his hands and feet, whom all beings trust, who does not torment creatures with rope, stick, stones, or deadly weapons, whose actions are gentle and blameless, and who is ever devoted to mercy—such a man attains heaven, assumes a divine body, and dwells joyfully in celestial mansions like the gods.”

Verse 38

नोद्वेजयति भूतानि न विधातयते तथा । हस्तपादै: सुनियतैरविश्वास्य: सर्वजन्तुषु,इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियोंके प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता है, सबके ऊपर पिताके समान स्नेह रखता है, किसीके साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, जो हाथ-पैर आदिको अपने अधीन रखकर किसी भी जीवको न तो उद्वेगमें डालता और न मारता ही है, जिसपर सब प्राणी विश्वास करते हैं, जो रस्सी, डंडे, ढेले और घातक अस्त्र-शस्त्रोंसे प्राणियोंको कष्ट नहीं पहुँचाता, जिसके कर्म कोमल एवं निर्दोष होते हैं तथा जो सदा ही दयापरायण होता है, ऐसे स्वभाव और आचरणवाला पुरुष स्वर्गलोकमें दिव्य शरीर धारण करता है और वहाँके दिव्य भवनमें देवताओंके समान आनन्दपूर्वक निवास करता है

Maheshvara said: He does not agitate living beings, nor does he strike them down. With hands and feet well restrained, he becomes one whom all creatures can trust. Such a person—gentle in conduct, harmless in action, and steadfastly compassionate—wins a divine body in heaven and dwells there joyfully like the gods.

Verse 39

न रज्ज्वा न च दण्डेन न लोष्टैर्नायुधेन च । उद्वेजयति भूतानि श्लक्षणकर्मा दयापर:,इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियोंके प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता है, सबके ऊपर पिताके समान स्नेह रखता है, किसीके साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, जो हाथ-पैर आदिको अपने अधीन रखकर किसी भी जीवको न तो उद्वेगमें डालता और न मारता ही है, जिसपर सब प्राणी विश्वास करते हैं, जो रस्सी, डंडे, ढेले और घातक अस्त्र-शस्त्रोंसे प्राणियोंको कष्ट नहीं पहुँचाता, जिसके कर्म कोमल एवं निर्दोष होते हैं तथा जो सदा ही दयापरायण होता है, ऐसे स्वभाव और आचरणवाला पुरुष स्वर्गलोकमें दिव्य शरीर धारण करता है और वहाँके दिव्य भवनमें देवताओंके समान आनन्दपूर्वक निवास करता है

He does not frighten living beings—neither with a rope, nor with a staff, nor with clods of earth, nor with weapons. His actions are gentle and blameless, and he is devoted to compassion. (In this teaching, Mahādeva praises the ethic of non-harm: a person who restrains the senses and does not cause fear or injury to any creature, avoiding coercion and violence even in small forms, is held to embody dharma.)

Verse 40

एवंशीलसमाचार: स्वर्गे समुपजायते । तत्रासौ भवने दिव्ये मुदा वसति देववत्‌,इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियोंके प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता है, सबके ऊपर पिताके समान स्नेह रखता है, किसीके साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, जो हाथ-पैर आदिको अपने अधीन रखकर किसी भी जीवको न तो उद्वेगमें डालता और न मारता ही है, जिसपर सब प्राणी विश्वास करते हैं, जो रस्सी, डंडे, ढेले और घातक अस्त्र-शस्त्रोंसे प्राणियोंको कष्ट नहीं पहुँचाता, जिसके कर्म कोमल एवं निर्दोष होते हैं तथा जो सदा ही दयापरायण होता है, ऐसे स्वभाव और आचरणवाला पुरुष स्वर्गलोकमें दिव्य शरीर धारण करता है और वहाँके दिव्य भवनमें देवताओंके समान आनन्दपूर्वक निवास करता है

One whose character and conduct are of this compassionate kind is reborn in heaven. There, in a radiant celestial mansion, he dwells joyfully like the gods.

Verse 41

स चेत्‌ कर्मक्षयान्मर्त्यों मनुष्येष्पजायते । अल्पाबाधो निरातड्क: स जात: सुखमेधते,फिर पुण्यकर्मोंके क्षीण होनेपर यदि वह मृत्यु-लोकमें जन्म लेता है, तो उसके ऊपर बाधाओंका आक्रमण कम होता है। वह निर्भय हो सुखसे अपनी उन्नति करता है। सुखका भागी होकर आयास और उद्वेगसे रहित जीवन व्यतीत करता है। देवि! यह सत्पुरुषोंका मार्ग है, जहाँ किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा नहीं आने पाती है

Mahādeva said: If, when his accumulated merit is exhausted, that being is born again among humans, he is assailed by only slight afflictions and remains free from fear and disturbance. Thus born, he prospers in happiness—living as a sharer in well-being, without strain or agitation. O Devī, this is the path of the virtuous, where obstacles and impediments do not gain entry.

Verse 42

सुखभागी निरायासो निरुद्धवेग: सदा नर: । एष देवि सतां मार्गो बाधा यत्र न विद्यते,फिर पुण्यकर्मोंके क्षीण होनेपर यदि वह मृत्यु-लोकमें जन्म लेता है, तो उसके ऊपर बाधाओंका आक्रमण कम होता है। वह निर्भय हो सुखसे अपनी उन्नति करता है। सुखका भागी होकर आयास और उद्वेगसे रहित जीवन व्यतीत करता है। देवि! यह सत्पुरुषोंका मार्ग है, जहाँ किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा नहीं आने पाती है

Mahādeva said: “Such a person becomes a sharer in happiness—effortless, with impulses held in check, and ever steady. O Devī, this is the path of the good: a way of life in which no afflictions or obstructing forces can gain a foothold.”

Verse 43

उमोवाच इमे मनुष्या दृश्यन्ते ऊहापोहविशारदा: । ज्ञानविज्ञानसम्पन्ना: प्रज्ञावन्तो<र्थकोविदा:,पार्वतीजीने पूछा--भगवन्‌! इन मनुष्योंमेंसे कुछ तो ऊहापोहमें कुशल, ज्ञान- विज्ञानसे सम्पन्न, बुद्धिमान्‌ और अर्थनिषुण देखे जाते हैं

Umā said: “Lord, among these human beings there are some who are seen to be adept at reasoning and counter-reasoning, endowed with knowledge and practical discernment, intelligent, and skilled in matters of purpose and worldly affairs.”

Verse 44

दुष्प्रज्ञाश्नापरे देव ज्ञानविज्ञानवर्जिता: । केन कर्मविशेषेण प्रज्ञावान्‌ पुरुषो भवेत्‌,देव! कुछ दूसरे मानव ज्ञान-विज्ञानसे शून्य और दुर्बुद्धि दिखायी देते हैं। ऐसी दशामें मनुष्य कौन-सा विशेष कर्म करनेसे बुद्धिमान हो सकता है?

Maheshvara said: “O God, some people appear dull-witted, lacking both true knowledge and realized discernment. In such a condition, by what particular kind of action can a person become wise, O Lord?”

Verse 45

अल्पप्रज्ञो विरूपाक्ष कथं भवति मानव: । एतन्मे संशयं छिन्धि सर्वधर्मविदां वर,विरूपाक्ष! मनुष्य मन्दबुद्धि कैसे होता है? सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महादेव! आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये

“O Virūpākṣa, how does a human being become of little understanding? O best among all who know dharma, cut through this doubt of mine and make it clear.”

Verse 46

जात्यन्धाक्षापरे देव रोगार्ताश्षापरे तथा । नरा: क्लीबाश्व दृश्यन्ते कारणं ब्रूहि तत्र वै,देव! कुछ लोग जन्मान्ध, कुछ रोगसे पीड़ित और कितने ही नपुंसक देखे जाते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये

Some people are seen to be blind from birth; others are afflicted by disease; and some are seen to be impotent. O Deva, tell me truly the cause behind these conditions.

Verse 47

श्रीमहेश्वर उवाच ब्राह्मणान्‌ वेदविदुष: सिद्धान्‌ धर्मविदस्तथा । परिपृच्छन्त्यहरह: कुशला: कुशलं तथा,श्रीमहादेवजीने कहा--देवि! जो कुशल मनुष्य सिद्ध, वेदवेत्ता और धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे प्रतिदिन उनकी कुशल पूछते हैं और अशुभ कर्मका परित्याग करके शुभकर्मका सेवन करते हैं, वे परलोकमें स्वर्ग और इहलोकमें सदा सुख पाते हैं

Śrī Maheśvara said: Day after day, the wise inquire after the well-being of accomplished brāhmaṇas—those who know the Vedas and understand dharma. By honoring such learned people through respectful questioning, and by abandoning inauspicious deeds in favor of auspicious conduct, they gain heaven in the next world and steady happiness in this one.

Verse 48

वर्जयन्तो5शुभं कर्म सेवमाना: शुभं तथा । लभन्ते स्वर्गतिं नित्यमिहलोके तथा सुखम्‌,श्रीमहादेवजीने कहा--देवि! जो कुशल मनुष्य सिद्ध, वेदवेत्ता और धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे प्रतिदिन उनकी कुशल पूछते हैं और अशुभ कर्मका परित्याग करके शुभकर्मका सेवन करते हैं, वे परलोकमें स्वर्ग और इहलोकमें सदा सुख पाते हैं

Mahādeva said: “Those who refrain from inauspicious deeds and consistently practice auspicious conduct attain the heavenly state in the hereafter, and in this very world they obtain enduring happiness.”

Verse 49

स चेन्मानुषतां याति मेधावी तत्र जायते । श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य कल्याणमुपजायते,ऐसे आचरणवाला पुरुष यदि स्वर्गसे लौटकर फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो वह मेधावी होता है। शास्त्र उसकी बुद्धिका अनुसरण करता है, अतः वह सदा कल्याणका भागी होता है

If such a man returns from heaven and is born again among humans, he is born as one endowed with keen intelligence. In his case, what is learned from the scriptures follows the lead of his discerning wisdom; therefore, auspiciousness and well-being continually arise for him.

Verse 50

परदारेषु ये चापि चक्षुर्दुष्ट प्रयुझ्जते । तेन दुष्टस्वभावेन जात्यन्धास्ते भवन्ति ह

Maheshvara said: Those who cast a corrupt and lustful gaze upon the wives of others—by that very depraved disposition—are indeed born blind.

Verse 51

जो परायी स्त्रियोंके प्रति सदा दोषभरी दृष्टि डालते हैं, उस दुष्ट स्वभावके कारण वे जन्मान्ध होते हैं ।। मनसा तु प्रदुष्टेन नग्नां पश्यन्ति ये स्त्रियम्‌ । रोगारतसस्ति भवन्तीह नरा दुष्कृतकर्मिण:,जो दूषित हृदयसे किसी नंगी स्त्रीकी ओर निहारते हैं, वे पापकर्मी मनुष्य इस लोकमें रोगसे पीड़ित होते हैं

Those who continually cast a fault-laden gaze upon the women of others, by that wicked nature, are born blind. And those who, with a mind made impure, look upon a naked woman—men who commit sinful deeds—are afflicted by disease in this very world.

Verse 52

ये तु मूढा दुराचारा वियोनौ मैथुने रता: । पुरुषेषु सुदुष्प्रज्ञा क्लीबत्वमुपयान्ति ते

Mahādeva said: “But those who are deluded and of corrupt conduct, who take pleasure in sexual union in an unnatural manner, and whose understanding regarding men is utterly perverse—such persons come to a state of impotence/effeminacy.”

Verse 53

जो दुराचारी, दुर्बुद्धि एवं मूढ़ मनुष्य पशु आदिकी योनिमें मैथुन करते हैं, वे पुरुषोंमें नपुंसक होते हैं ।। पशूंश्ष ये घातयन्ति ये चैव गुरुतल्पगा: । प्रकीर्णमैथुना ये च क्लीबा जायन्ति ते नस:,जो पशुओंकी हत्या कराते, गुरुकी शय्यापर सोते और वर्णसंकर जातिकी स्त्रियोंसे समागम करते हैं, वे मनुष्य नपुंसक होते हैं

Maheshvara declares that men who commit grave sexual and moral transgressions—such as causing the slaughter of animals, violating the teacher’s bed, or engaging in indiscriminate sexual relations—are said to be born as klība (sexually impaired/impotent). The verse functions as an ethical warning: actions that violate dharma, especially violence and sexual misconduct, are taught to bear painful consequences in one’s embodied condition.

Verse 54

उमोवाच सावद्यं किन्नु वै कर्म निरवद्यं तथैव च । श्रेय: कुर्वन्नवाप्रोति मानवो देवसत्तम,पार्वतीने पूछा--देवश्रेष्ठ] कौन सदोष कर्म हैं और कौन निर्दोष, कौन-सा कर्म करके मनुष्य कल्याणका भागी होता है?

Umā said: “O best of the gods, what kind of action is blameworthy, and what kind is blameless? By performing which action does a human being attain true welfare (śreyas)?”

Verse 55

श्रीमहेश्वर उवाच श्रेयांसं मार्गमन्विच्छन्‌ सदा य: पृच्छति द्विजान्‌ । धर्मान्विषी गुणाकांक्षी स स्वर्ग समुपाश्षुते

Śrī Maheśvara said: “One who, seeking the better path, continually questions the twice-born (learned Brahmins), who is a seeker of dharma and a desirous aspirant for virtues—such a person attains heaven.”

Verse 56

श्रीमहेश्वरने कहा--जो श्रेष्ठ मार्गको पानेकी इच्छा रखकर सदा ही ब्राह्मणोंसे उसके विषयमें पूछता है, धर्मका अन्वेषण करता और सद्‌गुणोंकी अभिलाषा रखता है, वही स्वर्गलोकके सुखका अनुभव करता है ।। यदि मानुषतां देवि कदाचित्‌ स निगच्छति । मेधावी धारणायुक्त: प्रायस्तत्राभिजायते,देवि! ऐसा मनुष्य यदि कभी मानवयोनिको प्राप्त होता है तो वहाँ प्रायः मेधावी एवं धारण शक्तिसे सम्पन्न होता है

Śrī Maheśvara said: “One who, desiring to attain the highest path, continually asks the brāhmaṇas about it, seeks out dharma, and longs for noble virtues—he alone experiences the happiness of the heavenly world. And if, O Goddess, such a person ever comes to human existence, then in that birth he is generally born intelligent and endowed with the power of retention and steady comprehension.”

Verse 57

एष देवि सतां धर्मो मन्तव्यो भूतिकारक: । नृणां हितार्थाय मया तव वै समुदाह्ृत:,देवि! यह सत्पुरुषोंका धर्म है, उसे कल्याणकारी मानना चाहिये। मैंने मनुष्योंके हितके लिये इस धर्मका तुम्हें भलीभाँति उपदेश किया है

Maheshvara said: “O Goddess, this is the dharma of the virtuous; it should be regarded as a source of true welfare and flourishing. For the benefit of human beings, I have clearly and fully declared this teaching to you.”

Verse 58

उमोवाच अपरे स्वल्पविज्ञाना धर्मविद्वेषिणो नरा: । ब्राह्मणान्‌ वेदविदुषो नेच्छन्ति परिसर्पितुम्‌,पार्वतीने पूछा--भगवन्‌! दूसरे बहुत-से ऐसे मनुष्य हैं, जो अल्पबुद्धि होनेके कारण धर्मसे द्वेष करते हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके पास नहीं जाना चाहते हैं

Uma (Parvati) asked: “O Lord, there are many other people who, because their understanding is small, come to hate dharma. They do not wish to approach the Brahmins who know the Vedas.”

Verse 59

व्रतवन्तो नरा: केचिच्छुद्धा धर्मपरायणा: । अव्रता भ्रष्टनियमास्तथान्ये राक्षसोपमा:,कुछ मनुष्य व्रतधारी, श्रद्धालु और धर्मपरायण होते हैं तथा दूसरे व्रतहीन, नियमश्रष्ट तथा राक्षसोंके समान होते हैं

Maheshvara said: “Among men, some are observant of vows—pure in conduct and devoted to dharma. Others, however, are without vows, fallen from discipline, and resemble rākṣasas in their behavior.”

Verse 60

यज्वानश्न तथैवान्ये निहॉमाश्ष तथापरे । केन कर्मविपाकेन भवन्तीह वदस्व मे,कितने ही यज्ञशील होते हैं और दूसरे मनुष्य होम और यज्ञसे दूर ही रहते हैं। किस कर्मविपाकसे मनुष्य इस प्रकार परस्परविरोधी स्वभावके हो जाते हैं? यह मुझे बताइये

Uma (Parvati) asked: “Some people are devoted sacrificers, while others keep far from homa and the fire-rites. By what maturation of karma do human beings here come to possess such mutually opposed dispositions? Tell me this.”

Verse 61

श्रीमहेश्वर उवाच आगमा लोकधर्माणां मर्यादा: सर्वनिर्मिता: । प्रामाण्येनानुवर्तन्ते दृश्यन्ते च दूढब्रता:

Śrī Maheśvara said: “The authoritative traditions (āgamas) are the boundaries and standards that have been established for the ways of the world. People follow them because they are regarded as valid sources of knowledge; and those of firm vows are seen to adhere to them steadfastly.”

Verse 62

श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! शास्त्र लोकधर्मोकी उन मर्यादाओंको स्थापित करते हैं, जो सबके हितके लिये निर्मित हुई हैं। जो उन शास्त्रोंको प्रमाण मानते हैं, वे दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करते देखे जाते हैं ।। अधर्म धर्ममित्याहुयें च मोहवशं गता: । अव्रता नष्टमर्यादास्ते प्रोक्ता ब्रह्म॒राक्षसा:,जो मोहके वशीभूत होकर अधर्मको धर्म कहते हैं, वे व्रतहीन मर्यादाको नष्ट करनेवाले पुरुष ब्रह्मराक्षस कहे गये हैं

Mahādeva said: “O Devī, the śāstras establish the boundaries of right conduct—standards fashioned for the welfare of all. Those who accept the śāstras as authoritative are seen to observe noble vows with steadfastness. But those who, overcome by delusion, call adharma ‘dharma’—vowless men who destroy the very limits of proper conduct—are declared to be brahma-rākṣasas.”

Verse 63

ते चेत्कालकृतोद्योगात्‌ सम्भवन्तीह मानुषा: । नि्ोमा निर्वषट्कारास्ते भवन्ति नराधमा:,वे मनुष्य यदि कालयोगसे इस संसारमें मनुष्य होकर जन्म लेते हैं तो होम और वषट्कारसे रहित तथा नराधम होते हैं

Mahādeva said: If, due to the workings of Time and the impulses it generates, people come to be born here as human beings, then they become devoid of sacred fire-offerings and the ritual exclamation ‘vaṣaṭ’; thus they turn into the lowest among men.

Verse 64

एष देवि मया सर्व: संशयच्छेदनाय ते । कुशलाकुशलो नृणां व्याख्यातो धर्मसागर:

O Goddess, in order to cut through your doubts, I have explained to you in full the ocean of dharma—how human conduct becomes wholesome or unwholesome, and what leads toward rightness or wrong.

Verse 145

न हि प्राणै: प्रियतमं लोके किंचन विद्यते । तस्मात्‌ प्राणिदया कार्या यथा55त्मनि तथा परे ।। संसारमें प्राणोंके समान प्रियतम दूसरी कोई वस्तु नहीं है। अतः समस्त प्राणियोंपर दया करनी चाहिये। जैसे अपने ऊपर दया अभीष्ट होती है, वैसे ही दूसरोंपर भी होनी चाहिये ।। इत्येवं मुनयः प्राहु्मासस्याभक्षणे गुणान्‌ इस प्रकार मुनियोंने मांस न खानेमें गुण बताये हैं ।। उमोवाच गुरुपूजा कथं देव क्रियते धर्मचारिभि: ।। उमाने पूछा--देव! धर्मचारी मनुष्य गुरुजनोंकी पूजा कैसे करते हैं? ।। श्रीमहेश्वर उवाच गुरुपूजां प्रवक्ष्यामि यथावत्‌ तव शोभने । कृतज्ञानां परो धर्म इति वेदानुशासनम्‌ ।। श्रीमहेश्वरने कहा--शोभने! अब मैं तुम्हें यथावत्‌ रूपसे गुरुजनोंकी पूजाकी विधि बता रहा हूँ। वेदकी यह आज्ञा है कि कृतज्ञ पुरुषोंके लिये गुरुजनोंकी पूजा परम धर्म है ।। तस्मात्‌ स्वगुरव: पूज्यास्ते हि पूर्वोपकारिण: । गुरूणां च गरीयांसस्त्रयो लोकेषु पूजिता: ।। उपाध्याय: पिता माता सम्पूज्यास्ते विशेषत: । अतः सबको अपने-अपने गुरुजनोंका पूजन करना चाहिये; क्योंकि वे गुरुजन संतान और शिष्यपर पहले उपकार करनेवाले हैं। गुरुजनोंमें उपाध्याय (अध्यापक) पिता और माता--ये तीन अधिक गौरवशाली हैं। इनकी तीनों लोकोंमें पूजा होती है; अत: इन सबका विशेषरूपसे आदर-सत्कार करना चाहिये ।। ये पितुर्भ्नातरो ज्येष्ठा ये च तस्यानुजास्तथा ।। पितु: पिता च सर्वे ते पूजनीया: पिता तथा ।। जो पिताके बड़े तथा छोटे भाई हों, वे तथा पिताके भी पिता--ये सब-के-सब पिताके ही तुल्य पूजनीय हैं ।। मातुर्या भगिनी ज्येष्ठा मातुर्या च यवीयसी । मातामही च धात्री च सर्वास्ता मातर: स्मृता: ।। माताकी जो जेठी बहिन तथा छोटी बहिन हैं, वे और नानी एवं धाय--इन सबको माताके ही तुल्य माना गया है ।। उपाध्यायस्य य: पुत्रो यश्व तस्य भवेद्‌ गुरु: । ऋत्विग्‌ गुरु: पिता चेति गुरव: सम्प्रकीर्तिता: ।। उपाध्यायका जो पुत्र है वह गुरु है, उसका जो गुरु है वह भी अपना गुरु है, ऋत्विक्‌ गुरु है और पिता भी गुरु है--ये सब-के-सब गुरु कहे गये हैं ।। ज्येष्टो भ्राता नरेन्द्रश्न मातुलः श्वशुरस्तथा । भयत्राता च भर्ता च गुरवस्ते प्रकीर्तिता: ।। बड़ा भाई, राजा, मामा, श्वशुर, भयसे रक्षा करनेवाला तथा भर्ता (स्वामी)--ये सब गुरु कहे गये हैं ।। इत्येष कथित: साध्वि गुरूणां सर्वसंग्रह: । अनुवृत्तिं च पूजां च तेषामपि निबोध मे ।। पतिव्रते! यह गुरु-कोटिमें जिनकी गणना है, उन सबका संग्रह करके यहाँ बताया गया है। अब उनकी अनुवृत्ति और पूजाकी भी बात सुनो ।। आराध्या मातापितरावुपाध्यायस्तथैव च । कथंचिन्नावमन्तव्या नरेण हितमिच्छता ।। अपना हित चाहनेवाले पुरुषको माता, पिता और उपाध्याय--इन तीनोंकी आराधना करनी चाहिये। किसी तरह भी इनका अपमान नहीं करना चाहिये ।। तेन प्रीणन्ति पितरस्तेन प्रीत: प्रजापति: । येन प्रीणाति चेन्माता प्रीता: स्युर्देवमातर: ।। येन प्रीणात्युपाध्यायो ब्रह्मा तेनाभिपूजित: । अप्रीतेषु पुनस्तेषु नरो नरकमेति हि ।। इससे पितर प्रसन्न होते हैं। प्रजापतिको प्रसन्नता होती है। जिस आराधनाके द्वारा वह माताको प्रसन्न करता है, उससे देवमाताएँ प्रसन्न होती हैं। जिससे वह उपाध्यायको संतुष्ट करता है, उससे ब्रह्माजी पूजित होते हैं। यदि मनुष्य आराधना-द्वारा इन सबको संतुष्ट न करे तो वह नरकमें जाता है ।। गुरूणां वैरनिर्बन्धो न कर्तव्य: कथंचन । नरकं स्वगुरुप्रीत्या मनसापि न गच्छति ।। गुरुजनोंके साथ कभी वैर नहीं बाँधना चाहिये। अपने गुरुजनके प्रसन्न होनेपर मनुष्य कभी मनसे भी नरकमें नहीं पड़ता ।। न ब्रूयाद्‌ विप्रियं तेषामनिष्टं न प्रवर्तयेत्‌ । विगृह्य न वदेत्‌ तेषां समीपे स्पर्धया क्वचित्‌ ।। उन्हें जो अप्रिय लगे, ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिये, जिससे उनका अनिष्ट हो, ऐसा काम भी नहीं करना चाहिये। उनसे झगड़कर नहीं बोलना चाहिये और उनके समीप कभी किसी बातके लिये होड़ नहीं लगानी चाहिये ।। यद्‌ यदिच्छन्ति ते कर्तुमस्वतन्त्रस्तदाचरेत्‌ । वेदानुशासनसमं गुरुशासनमिष्यते ।। वे जो-जो काम कराना चाहें, उनकी आज्ञाके अधीन रहकर वह सब कुछ करना चाहिये। वेदोंकी आज्ञाके समान गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन अभीष्ट माना गया है ।। कलहांश्व विवादांश्न गुरुभि: सह वर्जयेत्‌ । कैतवं परिहासांश्व मन्युकामाश्रयांस्तथा ।। गुरुजनोंके साथ कलह और विवाद छोड़ दे, उनके साथ छल-कपट, परिहास तथा काम-क्रोधके आधारभूत बर्ताव भी न करे ।। गुरूणां यो5नहंवादी करोत्याज्ञामतन्द्रित: । न तस्मात्‌ सर्वमर्त्येषु विद्यते पुण्यकृत्तम: ।। जो आलस्य और अहंकार छोड़कर गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करता है, समस्त मनुष्योंमें उससे बढ़कर पुण्यात्मा दूसरा कोई नहीं है ।। असूयामपवादं च गुरूणां परिवर्जयेत्‌ । तेषां प्रियहितान्वेषी भूत्वा परिचरेत्‌ सदा ।। गुरुजनोंके दोष देखना और उनकी निन्दा करना छोड़ दे, उनके प्रिय और हितका ध्यान रखते हुए सदा उनकी परिचर्या करे ।। न तद्‌ यज्ञफलं कुर्यात्‌ तपो वा5<चरितं महत्‌ | यत्‌ कुर्यात्‌ पुरुषस्येह गुरुपूजा सदा कृता ।। यज्ञोंका फल और किया हुआ महान्‌ तप भी इस जगत्‌में मनुष्यको वैसा लाभ नहीं पहुँचा सकता, जैसा सदा किया हुआ गुरुपूजन पहुँचा सकता है ।। अनुत॒ृत्तेविना धर्मो नास्ति सर्वाश्रमेष्वपि | तस्मात्‌ क्षमावृत:ः क्षान्तो गुरुवृत्ति समाचरेत्‌ ।। सभी आश्रमोंमें अनुवृत्ति (गुरुसेवा) के बिना कोई भी धर्म सफल नहीं हो सकता। इसलिये क्षमासे युक्त और सहनशील होकर गुरुसेवा करे ।। स्वमर्थ स्वशरीरं च गुर्वर्थे संत्यजेद्‌ बुध: । विवादं धनहेतोरवा मोहाद्‌ वा तैर्न रोचयेत्‌ ।। विद्वान्‌ पुरुष गुरुक लिये अपने धन और शरीरको समर्पण कर दे। धनके लिये अथवा मोहवश उनके साथ विवाद न करे ।। ब्रह्मचर्यमहिंसा च दानानि विविधानि च । गुरुभि: प्रतिषिद्धस्य सर्वमेतदपार्थकम्‌ ।। जो गुरुजनोंसे अभिशप्त है, उसके किये हुए ब्रह्मचर्य, अहिंसा और नाना प्रकारके दान --ये सब व्यर्थ हो जाते हैं ।। उपाध्यायं पितरं मातरं च येअभिद्रह्युर्मनसा कर्मणा वा । तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं तेभ्यो नान्य: पापकृदस्ति लोके ।। जो लोग उपाध्याय, पिता और माताके साथ मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा द्रोह करते हैं, उन्हें भ्रूणहत्यासे भी बड़ा पाप लगता है। उनसे बढ़कर पापाचारी इस संसारमें दूसरा कोई नहीं है ।। उमोवाच उपवासविर्धि तत्र तन्मे शंसितुमरहसि ।। उमाने कहा--प्रभो! अब आप मुझे उपवासकी विधि बताइये ।। श्रीमहेश्वर उवाच शरीरमलशान्त्यर्थमिन्द्रियोच्छोषणाय च । एकभुक्तोपवासैस्तु धारयन्ते व्रतं नरा: ।। लभन्ते विपुलं धर्म तथा55हारपरिक्षयात्‌ । श्रीमहेश्वर बोले--प्रिये! शारीरिक दोषकी शान्तिके लिये और इन्द्रियोंको सुखाकर वशमें करनेके लिये मनुष्य एक समय भोजन अथवा दोनों समय उपवासपूर्वक व्रत धारण करते हैं और आहार क्षीण कर देनेके कारण महान्‌ धर्मका फल पाते हैं ।। बहूनामुपरोध॑ तु न कुर्यादात्मकारणात्‌ ।। जीवोपघातं च तथा स जीवन्‌ धन्य इष्यते । जो अपने लिये बहुतसे प्राणियोंको बन्धनमें नहीं डालता और न उनका वध ही करता है, वह जीवन भर धन्य माना जाता है ।। तस्मात्‌ पुण्यं लभेन्मर्त्य: स्वयमाहारकर्शनात्‌ ।। तद्‌ गृहस्थैर्यथाशक्ति कर्तव्यमिति निश्चय: ।। अतः यह सिद्ध होता है कि स्वयं आहारको घटा देनेसे मनुष्य अवश्य पुण्यका भागी होता है। इसलिये गृहस्थोंको यथाशक्ति आहार-संयम करना चाहिये, यह शास्त्रोंका निश्चित आदेश है ।। उपवासार्दिते काये आपदर्थ पयो जलम्‌ । भुज्जन्नप्रतिघाती स्याद्‌ ब्राह्मणाननुमान्य च ।। उपवाससे जब शरीरको अधिक पीड़ा होने लगे, तब उस आपत्तिकालमें ब्राह्मणोंसे आज्ञा लेकर यदि मनुष्य दूध अथवा जल ग्रहण कर ले तो इससे उसका व्रत भंग नहीं होता ।। उमोवाच ब्रह्मचर्य कथं देव रक्षितव्यं विजानता ।। उमाने पूछा--देव! विज्ञ पुरुषको ब्रह्मचर्यकी रक्षा कैसे करनी चाहिये? ।। श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता ।। ब्रह्मचर्य परं शौचं ब्रह्म॒चर्य परं तप: । केवल ब्रह्मचर्येण प्राप्पते परमं पदम्‌ ।। श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! यह विषय मैं तुम्हें बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। ब्रह्मचर्य सर्वोत्तम शौचाचार है, ब्रह्मचर्य उत्कृष्ट तपस्या है तथा केवल ब्रह्मचर्यसे भी परमपदकी प्राप्ति होती है ।। संकल्पाद्‌ दर्शनाच्चैव तद्युक्तवतचनादपि । संस्पर्शादथ संयोगात्‌ पञज्चधा रक्षितं व्रतम्‌ ।। संकल्पसे, दृष्टिसे, न्‍्यायोचित वचनसे, स्पर्शसे और संयोगसे--इन पाँच प्रकारोंसे व्रतकी रक्षा होती है ।। व्रतवद्धारितं चैव ब्रह्म॒चर्यमकल्मषम्‌ । नित्यं संरक्षितं तस्य नैछिकानां विधीयते ।। व्रतपूर्वक धारण किया हुआ निष्कलंक ब्रह्मचर्य सदा सुरक्षित रहे, ऐसा नैप्ठिक ब्रह्मचारियोंके लिये विधान है ।। तदिष्यते गृहस्थानां कालमुद्दधिश्य कारणम्‌ ।। जन्मनक्षत्रयोगेषु पुण्यवासेषु पर्वसु । देवताधर्मकार्येषु ब्रह्मचर्यव्रतं चरेत्‌ ।। वही ब्रह्मचर्य गृहस्थोंके लिये भी अभीष्ट है, इसमें काल ही कारण है। जन्म-नक्षत्रका योग आनेपर पवित्र स्थानोंमें पर्वॉके दिन तथा देवतासम्बन्धी धर्म-कृत्योंमें गृहस्थोंको ब्रह्मचर्य व्रतका पालन अवश्य करना चाहिये ।। ब्रह्मचर्यव्रतफलं लभेद्‌ दारब्रती सदा । शौचमायुस्तथा5डरोग्यं लभ्यते ब्रह्मचारिभि: ।। जो सदा एकपत्नीव्रती रहता है, वह ब्रह्मचर्य व्रके पालनका फल पाता है। ब्रह्मचारियोंकों पवित्रता, आयु तथा आरोग्यकी प्राप्ति होती है ।। उमोवाच तीर्थचर्यव्रितं देव क्रियते धर्मकांक्षिभि: । कानि तीर्थानि लोकेषु तन्मे शंसितुमरहसि ।। उमाने पूछा--देव! बहुत-से धर्माभिलाषी पुरुष तीर्थयात्राका व्रत धारण करते हैं; अतः लोकोंमें कौन-कौनसे तीर्थ हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।। श्रीमहेश्वर उवाच हन्त ते कथयिष्यामि तीर्थस्नानविधिं प्रिये । पावनार्थ च शौचार्थ ब्रह्मणा निर्मित पुरा ।। श्रीमहेश्वरने कहा--प्रिये! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें तीर्थस्नानकी विधि बताता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने दूसरोंको पवित्र करने तथा स्वयं भी पवित्र होनेके लिये इस विधिका निर्माण किया था ।। यास्तु लोके महानद्यस्ता: सर्वास्तीर्थसंज्ञिका: । तासां प्राक्स्रोतस: श्रेष्ठा: सड़मश्न परस्परम्‌ ।। लोकमें जो बड़ी-बड़ी नदियाँ हैं, उन सबका नाम तीर्थ है। उनमें भी जिनका प्रवाह पूरबकी ओर है, वे श्रेष्ठ हैं और जहाँ दो नदियाँ परस्पर मिलती हैं, वह स्थान भी उत्तम तीर्थ कहा गया है ।। तासां सागरसंयोगो वरिष्ठ क्षेति विद्यते ।। तासामुभयत: कूल तत्र तत्र मनीषिभि: | देवैर्वा सेवितं देवि तत्‌ तीर्थ परमं स्मृतम्‌ ।। और उन नदियोंका जहाँ समुद्रके साथ संयोग हुआ है, वह स्थान सबसे श्रेष्ठ तीर्थ बताया गया है। देवि! उन नदियोंके दोनों तटोंपर मनीषी पुरुषोंने जिस स्थानका सेवन किया है, वह उत्कृष्ट तीर्थ माना गया है ।। समुद्रश्न महातीर्थ पावनं परमं शुभम्‌ | तस्य कूलगतास्तीर्था महद्विश्व समाप्लुता: ।। समुद्र भी परम पावन एवं शुभ महातीर्थ है। उसके तटपर जो तीर्थ हैं, उनमें महात्मा पुरुषोंने गोता लगाया है ।। स्रोतसां पर्वतानां च जोषितानां महर्षिभि: । अपि कूल तटाकं वा सेवितं मुनिभि: प्रिये ।। प्रिये! महर्षियोंद्वारा सेवित जो जलस्रोत और पर्वत हैं, उनके तटों और तड़ागोंपर भी बहुतसे मुनि निवास करते हैं ।। तत्‌ तु तीर्थमिति ज्ञेयं प्रभावात्‌ तु तपस्विनाम्‌ ।। तदाप्रभृति तीर्थत्वं लभेललोकहिताय वै । एवं तीर्थ भवेद्‌ देवि तस्य स्नानविर्धि शृणु ।। उन तपस्वी मुनियोंके प्रभावसे उस स्थानको तीर्थ समझना चाहिये। ऋषियोंके निवासकालसे ही वह स्थान जगतके हितके लिये तीर्थत्व प्राप्त कर लेता है। देवि! इस प्रकार स्थानविशेष तीर्थ बन जाता है। अब उसकी स्नानविधि सुनो ।। जन्मना व्रतभूयिष्ठो गत्वा तीर्थानि कांक्षया । उपवासत्रयं कुयदिकं वा नियमान्वित: ।। जो जन्मकालसे ही बहुत-से व्रत करता आया हो, वह पुरुष तीर्थोंके सेवनकी इच्छासे यदि वहाँ जाय तो नियमसे रहकर तीन या एक उपवास करे ।। पुण्यमासयुते काले पौर्णमास्यां यथाविधि । बहिरेव शुचिर्भूत्वा तत्‌ तीर्थ मन्‍्मना विशेत्‌ ।। पवित्र माससे युक्त समयमें पूर्णिमाको विधिपूर्वक बाहर ही पवित्र हो मुझमें मन लगाकर उस तीर्थंके भीतर प्रवेश करे ।। त्रिराप्लुत्स जलाभ्याशे दत्त्वा ब्राह्मणदक्षिणाम्‌ । अभ्यर्च्य देवायतनं ततः प्रायाद्‌ यथागतम्‌ ।। उसमें तीन बार गोता लगाकर जलके निकट ही ब्राह्मणको दक्षिणा दे, फिर देवालयमें देवताकी पूजा करके जहाँ इच्छा हो, वहाँ जाय ।। एतद्‌ू विधान सर्वेषां तीर्थ तीर्थमिति प्रिये । समीपतीर्थस्नानात्‌ तु दूरतीर्थ सुपूजितम्‌ ।। प्रिये! प्रत्येक तीर्थमें सबके लिये स्नानका यही विधान है। निकटवर्ती तीर्थमें स्नान करनेकी अपेक्षा दूरवर्ती तीर्थमें स्नान आदि करना अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है ।। आदिदप्रभृति शुद्धस्य तीर्थस्नानं शुभं भवेत्‌ | तपो<र्थ पापनाशार्थ शौचार्थ तीर्थगाहनम्‌ ।। जो पहलेसे ही शुद्ध हो, उसके लिये तीर्थस्थान शुभकारक माना जाता है। तपस्या, पापनाश और बाहर-भीतरकी पवित्रताके लिये तीर्थोमें स्नान किया जाता है ।। एवं पुण्येषु तीर्थेषु तीर्थस्नानं शुभं भवेत्‌ । एतन्नैयमिकं सर्व सुकृतं कथितं तव ।। इस प्रकार पुण्यतीर्थोमें स्नान करना कल्याणकारी होता है। यह सब नियमपूर्वक सम्पादित होनेवाले पुण्यका तुम्हारे सामने वर्णन किया गया है ।। उमोवाच लोकर्िद्धि तु यद्‌ द्रव्यं सर्वसाधारणं भवेत्‌ | तद्‌ ददत्‌ सर्वसामान्यं कथं धर्म लभेन्नर: ।। उमाने पूछा--भगवन्‌! जो द्रव्य लोकमें सबको प्राप्त है, जो सर्वसाधारणकी वस्तु है, उस सर्वसामान्य वस्तुका दान करनेवाला मनुष्य कैसे धर्मका भागी होता है? ।। श्रीमहेश्वर उवाच लोके भूतमयं द्रव्यं सर्वसाधारणं तथा । तथैव तदू ददन्मर्त्यों लभेत्‌ पुण्यं स तच्छृणु ।। श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! लोकमें जो भौतिक द्रव्य हैं, वे सबके लिये साधारण हैं; उन वस्तुओंका दान करनेवाला मनुष्य किस तरह पुण्यका भागी होता है, यह बताता हूँ, सुनो ।। दाता प्रतिग्रहीता च देयं सोपक्रमं तथा । देशकालौ च यत्‌ त्वेतद्‌ दानं षड्गुणमुच्यते ।। दान देनेवाला, उसे ग्रहण करनेवाला, देय वस्तु, उपक्रम (उसे देनेका प्रयत्न), देश और काल--इन छठ: वस्तुओंके गुणोंसे युक्त दान उत्तम बताया जाता है ।। तेषां सम्पद्विशेषांश्व कीर्त्यमानान्‌ निबोध मे । आदिदप्रभृति यः शुद्धो मनोवाक्कायकर्मभि: | सत्यवादी जितक्रोधस्त्वलुब्धो नाभ्यसूयक: ।। श्रद्धावानास्तिकश्नैव एवं दाता प्रशस्यते ।। अब मैं इन छहोंके विशेष गुणोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। जो आदिकालसे ही मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा शुद्ध हो, सत्यवादी, क्रोधविजयी, लोभहीन, अदोषदर्शी, श्रद्धालु और आस्तिक हो, ऐसा दाता उत्तम बताया गया है ।। शुद्धों दान्तो जितक्रोधस्तथादीनकुलोद्धव: । श्रुतचारित्रसम्पन्नस्तथा बहुकलत्रवान्‌ ।। पजञ्चयज्ञपरो नित्यं निर्विकारशरीरवान्‌ । एतान्‌ पात्रगुणान्‌ विद्धि तादृक्‌ पात्र प्रशस्यते ।। जो शुद्ध, जितेन्द्रिय, क्रोधको जीतनेवाला, उदार एवं उच्च कुलमें उत्पन्न, शास्त्रज्ञान एवं सदाचारसे सम्पन्न, बहुतसे स्त्री-पुत्रोंसे संयुक्त, पंचयज्ञपरायण तथा सदा नीरोग शरीरसे युक्त हो, वही दान लेनेका उत्तम पात्र है। उपर्युक्त गुणोंको ही दानपात्रके उत्तम गुण समझो। ऐसे पात्रकी ही प्रशंसा की जाती है ।। पितृदेवाग्निकार्येषु तस्य दत्तं महत्‌ फलम्‌ | यद्‌ यदर्हति यो लोके पात्र तस्य भवेच्च सः ।। देवता, पितर और अग्निहोत्रसम्बन्धी कार्योंमें उसको दिये हुए दानका महान्‌ फल होता है। लोकमें जो जिस वस्तुके योग्य हो, वही उस वस्तुको पानेका पात्र होता है ।। मुच्येदापदमापन्नो येन पात्र तदस्य तु । अन्नस्य क्षुधितं पात्र तृषितं तु जलस्य वै ।। एवं पात्रेषु नानात्वमिष्यते पुरुष प्रति । जिस वस्तुके पानेसे आपत्तिमें पड़ा हुआ मनुष्य आपत्तिसे छूट जाय, उस वस्तुका वही पात्र है। भूखा मनुष्य अन्नका और प्यासा जलका पात्र है। इस प्रकार प्रत्येक पुरुषके लिये दानके भिन्न-भिन्न पात्र होते हैं ।। जारक्षोरश्न षण्ढश्न हिंसः समयभेदक: । लोकविषध्नकराश्षान्ये वर्जिता: सर्वश:ः प्रिये ।। प्रिये! चोर, व्यभिचारी, नपुंसक, हिंसक, मर्यादा-भेदक और लोगोंके कार्यमें विघ्न डालनेवाले अन्यान्य पुरुष सब प्रकारसे दानमें वर्जित हैं अर्थात्‌ उन्हें दान नहीं देना चाहिये ।। परोपघाताद्‌ यद्‌ द्रव्यं चौर्याद्‌ वा लभ्यते नृभि: । निर्दयाल्लभ्यते यच्च धूर्तभावेन वै तथा ।। अधर्मादर्थमोहाद्‌ वा बहूनामुपरोधनात्‌ । लभ्यते यद्‌ धनं देवि तदत्यन्तविगर्हितम्‌ ।। देवि! दूसरोंका वध या चोरी करनेसे मनुष्योंको जो धन मिलता है, निर्दयता तथा धूर्तता करनेसे जो प्राप्त होता है, अधर्मसे, धनविषयक मोहसे तथा बहुत-से प्राणियोंकी जीविकाका अवरोध करनेसे जो धन प्राप्त होता है, वह अत्यन्त निन्दित है ।। तादृशेन कृतं धर्म निष्फलं विद्धि भामिनि | तस्मानन्यायागतेनैव दातव्यं शुभमिच्छता ।। भामिनि! ऐसे धनसे किये हुए धर्मको निष्फल समझो। अत: शुभकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको न्यायतः प्राप्त हुए धनके द्वारा ही दान करना चाहिये ।। यद्‌ यदात्मप्रियं नित्यं तत्‌ तद्‌ देयमिति स्थिति: । उपक्रममिमं विद्धि दातृणां परमं हितम्‌ ।। जो-जो अपनेको प्रिय लगे, उसी-उसी वस्तुका सदा दान करना चाहिये; यही मर्यादा है। इस प्रयत्न या चेष्टाको ही उपक्रम समझो। यह दाताओंके लिये परम हितकारक है ।। पात्रभूतं तु दूरस्थमभिगम्य प्रसाद्य च । दाता दान॑ तथा दद्याद्‌ यथा तुष्येत तेन सः ।। दानका सुयोग्य पात्र ब्राह्मण यदि दूरका निवासी हो तो उसके पास जाकर उसे प्रसन्न करके दाता इस प्रकार दान दे, जिससे वह संतुष्ट हो जाय ।। एष दानविधि: श्रेष्ठ: समाहूय तु मध्यम: ।। पूर्व च पात्रतां ज्ञात्वा समाहूय निवेद्य च | शौचाचमनसंयुक्तं दातव्यं श्रद्धया प्रिये ।। यह दानकी श्रेष्ठ विधि है। दानपात्रको जो अपने घर बुलाकर दान दिया जाता है, वह मध्यम श्रेणीका दान है। प्रिये! पहले पात्रताका ज्ञान प्राप्त करके फिर उस सुपात्र ब्राह्मणको घर बुलावे। उसके सामने अपना दानविषयक विचार प्रस्तुत करे। पश्चात्‌ स्वयं ही स्नान आदिसे पवित्र हो आचमन करके श्रद्धापूर्वक अभीष्ट वस्तुका दान करे ।। याचितृणां तु परममाभिमुख्यं पुरस्कृतम्‌ । सम्मानपूर्व संग्राह्मूं दातव्यं देशकालयो: ।। अपात्रेभ्यो5पि चान्ये भ्यो दातव्यं भूतिमिच्छता ।। याचकोंको सामने पाकर उन्हें सम्मानपूर्वक अपनाना और देश-कालके अनुसार दान देना चाहिये। ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे दूसरे अपात्र पुरुषोंको भी आवश्यकता होनेपर अन्न-वस्त्र आदिका दान करें ।। पात्राणि सम्परीक्ष्यैव दात्रा वै दानमात्रया । अतिशकत्या परं दानं यथाशक्‍्त्या तु मध्यमम्‌ ।। तृतीयं चापरं दान॑ं नानुरूपमिवात्मन: ।। पात्रोंकी परीक्षा करके दाता यदि दानकी मात्रा अपनी शक्तिसे भी अधिक करे तो वह उत्तम दान है। यथाशक्ति किया हुआ दान मध्यम है और तीसरा अधम श्रेणीका दान है, जो अपनी शक्तिके अनुरूप न हो ।। यथा सम्भावितं पूर्व दातव्यं तत्‌ तथैव च । पुण्यक्षेत्रेषु यद्‌ दत्त पुण्यकालेषु वा तथा ।। तच्छो भनतरं विद्धि गौरवाद्‌ देशकालयो: । पहले जैसा बताया गया है, उसी प्रकार दान देना चाहिये। पुण्य क्षेत्रोंमें तथा पुण्यके अवसरोंपर जो कुछ दिया जाता है, उसे देश और कालके गौरवसे अत्यन्त शुभकारक समझो ।। उमोवाच यश्च पुण्यतमो देशस्तथा कालश्न शंस मे ।। उमाने पूछा--प्रभो! पवित्रतम देश और काल कया है? यह मुझे बताइये ।। श्रीमहेश्वर उवाच कुरुक्षेत्र महानद्यो यच्च देवर्षिसेवितम्‌ । गिरिर॑रश्न तीर्थानि देशभागेषु पूजित: ।। ग्रहीतुमीप्सते यत्र तत्र दत्त महाफलम्‌ ।। श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! कुरुक्षेत्र, गड़ा आदि बड़ी-बड़ी नदियाँ, देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा सेवित स्थान एवं श्रेष्ठ पर्वत--ये सब-के-सब तीर्थ हैं। जहाँ देशके सभी भागोंमें पूजित श्रेष्ठ पुरुष दान ग्रहण करना चाहता हो, वहाँ दिये हुए दानका महान्‌ फल होता है ।। शरद्वसन्तकालश्च पुण्यमासस्तथैव च | शुक्लपक्षश्न पक्षाणां पौर्णमासी च पर्वसु ।। पितृदैवतनक्षत्रनिर्मलो दिवसस्तथा । तच्छोभनतरं विद्धि चन्द्रसूर्यग्रहे तथा ।। शरद्‌ और वसनन्‍्तका समय, पवित्र मास, पक्षोंमें शुक्लपक्ष, पर्वोर्में पौर्णमासी, मघानक्षत्रयुक्त निर्मल दिवस, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण--इन सबको अत्यन्त शुभकारक काल समझो ।। दाता देयं च पात्र च उपक्रमयुता क्रिया । देशकाल तथेत्येषां सम्पच्छुद्धि: प्रकीर्तिता ।। दाता हो, देनेकी वस्तु हो, दान लेनेवाला पात्र हो, उपक्रमयुक्त क्रिया हो और उत्तम देश-काल हो--इन सबका सम्पन्न होना शुद्धि कही गयी है ।। यदैव युगपत्‌ सम्पत्‌ तत्र दानं महद्‌ भवेत्‌ ।। अत्यल्पमपि यद्‌ दानमेभि: षड्भिग्गुणैर्युतम्‌ । भूत्वानन्तं नयेत्‌ स्वर्ग दातारं दोषवर्जितम्‌ ।। जब कभी एक समय इन सबका संयोग जुट जाय तभी दान देना महान्‌ फलदायक होता है। इन छः गुणोंसे युक्त जो दान है, वह अत्यन्त अल्प होनेपर भी अनन्त होकर निर्दोष दाताको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है ।। उमोवाच एवंगुणयुतं दान॑ दत्तं चाफलतां व्रजेत्‌ । उमाने पूछा--प्रभो! इन गुणोंसे युक्त दान दिया गया हो तो क्या वह भी निष्फल हो सकता है? ।। श्रीमहेश्वर उवाच तदप्यस्ति महाभागे नराणां भावदोषत: ।। कृत्वा धर्म तु विधिवत पश्चात्तापं करोति चेत्‌ श्लाघया वा यदि ब्रूयाद्‌ वृथा संसदि यत्‌ कृतम्‌ ।। श्रीमहेश्वरने कहा--महाभागे! मनुष्योंके भाव-दोषसे ऐसा भी होता है। यदि कोई विधिपूर्वक धर्मका सम्पादन करके फिर उसके लिये पश्चात्ताप करने लगता है अथवा भरी सभामें उसकी प्रशंसा करते हुए बड़ी-बड़ी बातें बनाने लगता है, उसका वह धर्म व्यर्थ हो जाता है ।। एते दोषा विवर्ज्याश्व दातृभि: पुण्यकांक्षिभि: ।। सनातनमिदं वृत्तं सद्धिराचरितं तथा । पुण्यकी अभिलाषा रखनेवाले दाताओंको चाहिये कि वे इन दोषोंको त्याग दें। यह दानसम्बन्धी आचार सनातन है। सत्पुरुषोंने सदा इसका आचरण किया है ।। अनुग्रहात्‌ परेषां तु गृहस्थानामृणं हि तत्‌ ।। इत्येवं मन आविश्य दातव्यं सततं बुधैः ।। दूसरोंपर अनुग्रह करनेके लिये दान किया जाता है। गृहस्थोंपर तो दूसरे प्राणियोंका ऋण होता है, जो दान करनेसे उतरता है, ऐसा मनमें समझकर विद्वान्‌ पुरुष सदा दान करता रहे ।। एवमेव कृतं नित्यं सुकृतं तद्‌ भवेन्महत्‌ । सर्वसाधारणं द्रव्यमेवं दत््वा महत्‌ फलम्‌ ।। इस तरह दिया हुआ सुकृत सदा महान्‌ होता है। सर्वसाधारण द्रव्यका भी इसी तरह दान करनेसे महान्‌ फलकी प्राप्ति होती है ।। उमोवाच भगवन्‌ कानि देयानि धर्ममुद्दिश्य मानवै: । तान्यहं श्रोतुमिच्छामि तन्मे शंसितुमरहसि ।। उमाने पूछा--भगवन्‌! मनुष्योंको धर्मके उद्देश्यसे किन-किन वस्तुओंका दान करना चाहिये? यह मैं सुनना चाहती हूँ। आप मुझे बतानेकी कृपा करें ।। श्रीमहेश्वर उवाच अजसंं धर्मकार्य च तथा नैमित्तिकं प्रिये अन्न प्रतिश्रयो दीप: पानीयं तृणमिन्धनम्‌ ।। स्‍्नेहो गन्धश्न भैेषज्यं तिलाक्ष लवणं तथा । एवमादि तथान्यच्च दानमाजस्रमुच्यते ।। श्रीमहेश्वरने कहा--प्रिये! निरन्तर धर्मकार्य तथा नैमित्तिक कर्म करने चाहिये। अन्न, निवासस्थान, दीप, जल, तृण, ईंधन, तेल, गन्ध, ओषधि, तिल और नमक-ये तथा और भी बहुत-सी वस्तुएँ निरन्तर दान करनेकी वस्तुएँ बतायी गयी हैं ।। अन्न प्राणो मनुष्याणामन्नद: प्राणदो भवेत्‌ । तस्मादन्नं विशेषेण दातुमिच्छति मानव: ।। अन्न मनुष्योंका प्राण है। जो अन्न दान करता है, वह प्राणदान करनेवाला होता है। अतः मनुष्य विशेषरूपसे अन्नका दान करना चाहता है ।। ब्राह्मणायाभिरूपाय यो दद्यादन्नमीप्सितम्‌ | निदधाति निधिश्रेष्ठ सोडनन्तं पारलौकिकम्‌ ।। अनुरूप ब्राह्मणको जो अभीष्ट अन्न प्रदान करता है, वह परलोकमें अपने लिये अनन्त एवं उत्तम निधिकी स्थापना करता है ।। श्रान्तमध्वपरिश्रान्तमतिर्थिं गृहमागतम्‌ । अर्चयीत प्रयत्नेन स हि यज्ञो वरप्रद: ।। रास्तेका थका-माँदा अतिथि यदि घरपर आ जाय तो यत्नपूर्वक उसका आदर-सत्कार करे; क्योंकि वह अतिथि-सत्कार मनोवांछित फल देनेवाला यज्ञ है ।। पितरस्तस्य नन्दन्ति सुवृष्टया कर्षका इव । पुत्रो यस्य तु पौत्रो वा श्रोत्रियं भोजयिष्यति ।। जिसका पुत्र अथवा पौत्र किसी श्रोत्रिय ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसके पितर उसी प्रकार प्रसन्न होते हैं, जैसे अच्छी वर्षा होनेसे किसान ।। अपि चाण्डालशूद्राणामन्नदानं न गह्ते । तस्मात्‌ सर्वप्रयत्नेन दद्यादन्ञममत्सर: ।। चाण्डाल और शूद्रोंको भी दिया हुआ अन्नदान निन्दित नहीं होता। अतः ईर्ष्या छोड़कर सब प्रकारके प्रयत्नद्वारा अन्नदान करना चाहिये ।। अन्नदानाच्च लोकांस्तान्‌ सम्प्रवक्ष्याम्यनिन्दिते । भवनानि प्रकाशन्ते दिवि तेषां महात्मनाम्‌ ।। अनिन्दिते! अन्नदानसे जो लोक प्राप्त होते हैं उनका वर्णन करता हूँ। उन महामना दानी पुरुषोंको मिले हुए भवन देवलोकमें प्रकाशित होते हैं ।। अनेकशतभौमानि सान्तर्जलवनानि च । वैडूर्यार्चि:प्रकाशानि हेमरूप्यनिभानि च ।। नानारूपाणि संस्थानां नानारत्नमयानि च । चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किंकिणीजालवन्ति च ।। तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च । यथेष्टभक्ष्यभोज्यानि शयनासनवन्ति च ।। सर्वकामफलाश्षात्र वृक्षा भवनसंस्थिता: । वाप्यो बह्व्यश्न कृपाश्न दीर्घिकाश्व सहस्रश: ।। उन भव्य भवनोंमें सैकड़ों तल्‍ले हैं। उनके भीतर जल और वन हैं। वे वैदूर्यमणिके तेजसे प्रकाशित होते हैं। उनमें सोने और चाँदी-जैसी चमक है। उन गृहोंके अनेक रूप हैं। नाना प्रकारके रत्नोंसे उनका निर्माण हुआ है। वे चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल और क्षुद्र घण्टिकाओंकी झालरोंसे सुशोभित हैं। किन्हीं-किन्हींकी कान्ति प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होती है। उन महात्माओंके वे भवन स्थावर भी हैं और जंगम भी हैं। उनमें इच्छानुसार भक्ष्य-भोज्य पदार्थ उपलब्ध होते हैं। उत्तम शय्या और आसन बिछे रहते हैं। वहाँ सम्पूर्ण मनोवांछित फल देनेवाले कल्पवृक्ष प्रत्येक घरमें विराजमान हैं। वहाँ बहुत-सी बावड़ियाँ, कुएँ और सहस्रों जलाशय हैं ।। अरुजानि विशोकानि नित्यानि विविधानि च | भवनानि विचित्राणि प्राणदानां त्रिविष्टपे ।। प्राणस्वरूप अन्न-दान करनेवाले लोगोंको स्वर्गमें जो भाँति-भाँतिके विचित्र भवन प्राप्त होते हैं, वे रोग-शोकसे रहित और नित्य (चिरस्थायी) हैं ।। विवस्वतश्न सोमस्य ब्रह्मणश्न प्रजापते: । विशन्ति लोकांस्ते नित्यं जगत्यन्नोदकप्रदा: ।। जगत्‌में सदा अन्न और जलका दान करनेवाले मनुष्य सूर्य, चन्द्रमा तथा प्रजापति ब्रह्माजीके लोकोंमें जाते हैं ।। तत्र ते सुचिरं काल॑ विहृत्याप्सरसां गणै: । जायन्ते मानुषे लोके सर्वकल्याणसंयुता: ।। वे वहाँ चिरकालतक अप्सराओंके साथ विहार करके पुनः मनुष्यलोकमें जन्म लेते और समस्त कल्याणकारी गुणोंसे संयुक्त होते हैं ।। बलसंहननोपेता नीरोगाश्चिरजीविन: । कुलीना मतिमन्तश्न भवन्त्यन्नप्रदा नरा: ।। वे सबल शरीरसे सम्पन्न, नीरोग, चिरजीवी, कुलीन, बुद्धिमान तथा अन्नदाता होते हैं ।। तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता । सर्वकालं च सर्वस्य सर्वत्र च सदैव च ।। अत: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा, सर्वत्र, सबके लिये, सब समय विशेषरूपसे अन्नदान करना चाहिये ।। सुवर्णदानं परम॑ स्वर्ग्य स्वस्त्ययनं महत्‌ | तस्मात्‌ ते वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वश: ।। अपि पापकृतं क़ूरं दत्त रुक्‍्मं प्रकाशयेत्‌ ।। सुवर्णदान परम उत्तम, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला और महान्‌ कल्याणकारी है। इसलिये तुमसे क्रमश: उसीका यथावत्‌्रूपसे वर्णन करूँगा। दिया हुआ सुवर्णका दान क्रूर और पापाचारीको भी प्रकाशित कर देता है ।। सुवर्ण ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियेभ्य: सुचेतस: । देवतास्ते तर्पयन्ति समस्ता इति वैदिकम्‌ ।। जो शुद्ध हृदयवाले मनुष्य श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान करते हैं, वे समस्त देवताओंको तृप्त कर देते हैं। यह वेदका मत है ।। अन्निहि देवता: सर्वा: सुवर्ण चाग्निरुच्यते । तस्मात्‌ सुवर्णदानेन तृप्ता: स्यु: सर्वदेवता: ।। अग्नि सम्पूर्ण देवताओंके स्वरूप हैं और सुवर्णको भी अग्निरूप ही बताया जाता है। इसलिये सुवर्णके दानसे समस्त देवता तृप्त होते हैं ।। अग्न्यभावे तु कुर्वन्ति वह्निस्थानेषु काउचनम्‌ | तस्मात्‌ सुवर्णदातार: सर्वान्‌ कामानवाप्नुयु: ।। अग्निके अभावमें उसकी जगह सुवर्णको स्थापित करते हैं। अतः सुवर्णका दान करनेवाले पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं ।। आदित्यस्य हुताशस्य लोकान्‌ नानाविधान्‌ शुभान्‌ । काज्चनं सम्प्रदायाशु प्रविशन्ति न संशय: ।। सुवर्णका दान करके मनुष्य शीघ्र ही सूर्य एवं अग्निके नाना प्रकारके मड़लकारी लोकोंमें प्रवेश करते हैं, इसमें संशय नहीं है ।। अलंकार कृतं चापि केवलात्‌ प्रविशिष्यते । सौवर्णब्राह्मणं काले तैरलंकृत्य भोजयेत्‌ ।। य एतत्‌ परम॑ दान दत्त्वा सौवर्णमद्भुतम्‌ | द्युतिं मेधां वपु: कीर्ति पुनर्जाते लभेद्‌ ध्रुवम्‌ ।। केवल सुवर्णकी अपेक्षा उसका आभूषण बनवाकर दान देना श्रेष्ठ माना गया है। अतः दानकालमें ब्राह्मगको सोनेके आभूषणोंसे विभूषित करके भोजन करावे। जो यह अदभुत एवं उत्कृष्ट सुवर्ण-दान करता है, वह पुनर्जन्म लेनेपर निश्चय ही सुन्दर शरीर, कान्ति, बुद्धि और कीर्ति पाता है ।। तस्मात्‌ स्वशक्‍त्या दातव्यं काज्चनं भुवि मानवै: । न होतस्मात्‌ परं लोकेष्वन्यत्‌ पापात्‌ प्रमुच्यते ।। अतः मनुष्योंको अपनी शक्तिके अनुसार पृथ्वीपर सुवर्णदान अवश्य करना चाहिये। संसारमें इससे बढ़कर कोई दान नहीं है। सुवर्णदान करके मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है ।। अत ऊर्ध्व॑ प्रवक्ष्यामि गवां दानमनिन्दिते । न हि गोभ्य: परं दान॑ विद्यते जगति प्रिये ।। अनिन्दिते! इसके बाद मैं गोदानका वर्णन करूँगा। प्रिये! इस संसारमें गौओंके दानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है ।। लोकान्‌ सिसक्षुणा पूर्व गाव: सृष्टा: स्वयम्भुवा । वृत्त्यर्थ सर्वभूतानां तस्मात्‌ ता मातर: स्मृता: ।। पूर्वकालमें लोकसृष्टिकी इच्छावाले स्वयम्भू ब्रह्माजीने समस्त प्राणियोंकी जीवन- वृत्तिके लिये गौओंकी सृष्टि की थी। इसलिये वे सबकी माताएँ मानी गयी हैं ।। लोकज्येष्ठा लोकवृत्त्यां प्रवृत्ता मय्यायत्ता: सोमनिष्यन्दभूता: । सौम्या: पुण्या: कामदा: प्राणदाश्न तस्मात्‌ पूज्या: पुण्यकामैर्मनुष्यै: ।। गौएँ सम्पूर्ण जगत्‌में ज्येष्ठ हैं। वे लोगोंको जीविका देनेके कार्यमें प्रवृत्त हुई हैं। मेरे अधीन हैं और चन्द्रमाके अमृतमय द्रवसे प्रकट हुई हैं। वे सौम्य, पुण्यमयी, कामनाओंकी पूर्ति करनेवाली तथा प्राणदायिनी हैं। इसलिये पुण्याभिलाषी मनुष्योंके लिये पूजनीय हैं ।। धेनुं दत्त्वा निभृतां सुशीलां कल्याणवत्सां च पयस्विनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावत्समा: स्वर्गफलानि भुड्क्ते ।। जो हृष्ट-पुष्ट, अच्छे स्वभाववाली, उत्तम बछड़ेसे युक्त एवं दूध देनेवाली गायका दान करता है, वह उस गायके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक स्वर्गीय फल भोगता है।। प्रयच्छते य: कपिलां सचैलां सकांस्यदोहां कनकाग्र्यशृज्जीम्‌ । पुत्रांश्व पौत्रांश्ष॒ कुलं च सर्व- मासप्तमं तारयते परत्र ।। जो काँसके दुग्धपात्र और सोनेसे मढ़े हुए सींगोंवाली कपिला गौका वस्त्रसहित दान करता है, वह अपने पुत्रों, पौत्रों तथा सातवीं पीढ़ीतकके समस्त कुलका परलोकमें उद्धार कर देता है ।। अन्तर्जाता: क्रीतका द्यूतलब्धा: प्राणक्रीता: सोदकाश्नौजसा वा । कृच्छोत्सृष्टा: पोषणार्थागताश्न द्वारैरेतैस्ता: प्रलब्धा: प्रदद्यात्‌ ।। जो अपने ही यहाँ पैदा हुई हों, खरीदकर लायी गयी हों, जुएमें जीत ली गयी हों, बदलेमें दूसरा कोई प्राणी देकर खरीदी गयी हों, जल हाथमें लेकर संकल्पपूर्वक दी गयी हों, अथवा युद्धमें बलपूर्वक जीती गयी हों, संकटसे छुड़ाकर लायी गयी हों, या पालन-पोषणके लिये आयी हों--इन द्वारोंसे प्राप्त हुई गौओंका दान करना चाहिये ।। कृशाय बहुपुत्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये । प्रदाय नीरुजां धेनुं लोकान प्राप्रोत्यनुत्तमान्‌ ।। जीविकाके बिना दुर्बल, अनेक पुत्रवाले, अन्निहोत्री, श्रोत्रिय ब्राह्मणको दूध देनेवाली नीरोग गायका दान करके दाता सर्वोत्तम लोकोंको प्राप्त होता है ।। नृशंसस्य कृतघ्नस्य लुब्धस्यानृतवादिन: । हव्यकव्यव्यपेतस्य न दद्याद्‌ गा: कथंचन ।। जो क्रूर, कृतघ्न, लोभी, असत्यवादी और हव्य-कव्यसे दूर रहनेवाला हो, ऐसे मनुष्यको किसी तरह गौएँ नहीं देनी चाहिये ।। समानवत्सां यो दद्याद्‌ धेनुं विप्रे पपस्विनीम्‌ । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां सोमलोके महीयते ।। जो मनुष्य समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी एवं दूध देनेवाली गायको वस्त्र ओढ़ाकर ब्राह्मणको दान करता है, वह सोमलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। समानवत्सां यो दद्यात्‌ कृष्णां धेनुं पयस्विनीम्‌ । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां लोकान्‌ प्राप्रोत्यपाम्पते: ।। जो समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी एवं दूध देनेवाली काली गौको वस्त्र ओढ़ाकर उसका ब्राह्मणको दान करता है, वह जलके स्वामी वरुणके लोकोंमें जाता है ।। हिरण्यवर्णा पिज़ाक्षीं सवत्सां कांस्यदोहनाम्‌ । प्रदाय वस्त्रसंछन्नां यान्ति कौबेर सझन: ।। जिसके शरीरका रंग सुनहरा, आँखें भूरी, साथमें बछड़ा और काँसकी दुहानी हो, उस गौको वस्त्र ओढ़ाकर दान करनेसे मनुष्य कुबेरके धाममें जाते हैं ।। वायुरेणुसवर्णा च सवत्सां कांस्यदोहनाम्‌ | प्रदाय वस्त्रसंछन्नां वायुलोके महीयते ।। वायुसे उड़ी हुई धूलिके समान रंगवाली, बछड़े-सहित, दूध देनेवाली गायको कपड़ा ओढ़ाकर काँसके दुहानीके साथ दान देकर दाता वायुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। समानवत्सां यो धेनुं दत्त्वा गौरीं पयस्विनीम्‌ । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नामग्निलोके महीयते ।। जो समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी, धौरी एवं दूध देनेवाली धेनुको वस्त्रसे आच्छादित करके उसका दान करता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। युवानं बलिन॑ं श्यामं शतेन सह यूथपम्‌ । गवेन्द्रं ब्राह्मणेन्द्राय भूरिशुज़्मलंकृतम्‌ ।। ऋषभ ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियाणां महात्मनाम्‌ | ऐश्वर्यमभिजायन्ते जायमाना: पुन: पुनः ।। जो लोग महामनस्वी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको नौजवान, बड़े सींगवाले, बलवान, श्यामवर्ण, एक सौ गौओंसहित यूथपति गवेन्द्र (साँड़) को पूर्णतः अलंकृत करके उसे श्रेष्ठ ब्राह्मणके हाथमें दे देते हैं, वे बारंबार जन्म लेनेपर ऐश्वर्यके साथ ही जन्म लेते हैं ।। गवां मूत्रपुरीषाणि नोद्विजेत कदाचन । न चासां मांसमश्रीयाद्‌ गोषु भक्त: सदा भवेत्‌ ।। गौओंके मल-मूत्रसे कभी उद्विग्न नहीं होना चाहिये और उनका मांस कभी नहीं खाना चाहिये। सदा गौओंका भक्त होना चाहिये ।। ग्रासमुष्टिं परगवे दद्याद्‌ संवत्सरं शुचि: । अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत्‌ सार्वकामिकम्‌ ।। जो पवित्र भावसे रहकर एक वर्षतक दूसरेकी गायको एक मुट्ठी ग्रास खिलाता है और स्वयं आहार नहीं करता, उसका वह व्रत सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला होता है ।। गवामुभयतः: काले नित्यं स्वस्त्ययनं वदेत्‌ न चासां चिन्तयेत्‌ पापमिति धर्मविदो विदुः ।। गौओंके पास प्रतिदिन दोनों समय उनके कल्याणकी बात कहनी चाहिये। कभी उनका अनिष्ट-चिन्तन नहीं करना चाहिये। ऐसा धर्मज्ञ पुरुषोंका मत है ।। गाव: पवित्र परमं गोषु लोका: प्रतिष्ठिता: । कथंचिन्नावमन्तव्या गावो लोकस्य मातर: ।। गौएँ परम पवित्र वस्तु हैं, गौओंमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं। अत: किसी तरह गौओंका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सम्पूर्ण जगत्‌की माताएँ हैं ।। तस्मादेव गवां दानं विशिष्टमिति कथ्यते । गोषु पूजा च भक्तिश्न नरस्यायुष्यतां वहेत्‌ ।। इसीलिये गौओंका दान सबसे उत्कृष्ट बताया जाता है। गौओंकी पूजा तथा उनके प्रति की हुई भक्ति मनुष्यकी आयु बढ़ानेवाली होती है ।। अतः: पर प्रवक्ष्यामि भूमिदानं महाफलम्‌ | भूमिदानसमं दान लोके नास्तीति निश्चय: ।। इसके बाद मैं भूमिदानका महत्त्व बतलाऊँगा। भूमिदानका महान्‌ फल है। संसारमें भूमिदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है। यही धर्मात्मा पुरुषोंका निश्चय है ।। गृहयुक क्षेत्रयुग्‌ वापि भूमिभाग: प्रदीयते । सुखभोगं निराक्रोशं वास्तुपूर्व प्रकल्प्प च ।। ग्रहीतारमलंकृत्य वस्त्रपुष्पानुलेपनै: । सभृत्यं सपरीवारं भोजयित्वा यथेष्टत: ।। यो दद्याद्‌ दक्षिणां काले त्रिरद्धिर्गु.ह्यातामिति ।। गृह अथवा क्षेत्रसे युक्त भू-भागका दान करना चाहिये। जहाँ सुख भोगनेकी सुविधा हो, जो अनिन्दनीय स्थान हो, वहाँ वास्तुपूजनपूर्वक गृह बनाकर दान लेनेवालेको वस्त्र, पुष्पमाला तथा चन्दनसे अलंकृत करके सेवक और परिवारसहित उसे यथेष्ट भोजन करावे। तत्पश्चात्‌ यथासमय तीन बार हाथमें जल लेकर “दान ग्रहण कीजिये” ऐसा कहकर उसे उस भूमिका दान एवं दक्षिणा दे ।। एवं भूम्यां प्रदत्तायां श्रद्धया वीतमत्सरै: । यावत्‌ तिष्ठति सा भूमिस्तावत्‌ तस्य फल विदुः । इस प्रकार ईर्ष्यारहित पुरुषोंद्वारा श्रद्धापूर्वक भूदान दिये जानेपर जबतक वह भूमि रहती है, तबतक दाता उसके दानजनित फलका उपभोग करते हैं ।। भूमिद: स्वर्गमारुह्मु रमते शाश्वती: समा: । अचला हााक्षया भूमि: सर्वकामान्‌ दुधुक्षति ।। भूमिदान देनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें जाकर सदा ही सुख भोगता है; क्योंकि यह अचल एवं अक्षय भूमि सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करती है ।। यत्‌ किंचित्‌ कुरुते पापं पुरुषो वृत्तिकर्शित: । अपि गोकर्णमात्रेण भूमिदानेन मुच्यते ।। जीविकाके लिये कष्ट पानेवाला पुरुष जो कोई भी पाप करता है, गायके कान बराबर भूमिका दान करनेसे भी मुक्त हो जाता है ।। सुवर्ण रजतं वस्त्र मणिमुक्तावसूनि च । सर्वमेतन्महा भागे भूमिदाने प्रतिष्ठितम्‌ ।। महाभागे! भूमिदानमें सुवर्ण, रजत, वस्त्र, मणि, मोती तथा रत्न--इन सबका दान प्रतिष्ठित है ।। भर्तुर्नि:श्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हता: । ब्रद्मलोकाय संसिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम्‌ ।। स्वामीके कल्याण-साधनमें तत्पर हो युद्धमें मारे जाकर अपने शरीरका परित्याग करनेवाले शूरवीर योद्धा उत्तम सिद्धि पाकर ब्रह्मलोककी यात्रा करते हैं; परंतु वे भी भूमिदान करनेवालेको लाँघ नहीं पाते हैं ।। हलकृष्टां महीं दद्याद्‌ यत्सबीजफलान्विताम्‌ । सुकूपशरणां वापि सा भवेत्‌ सर्वकामदा ।। जहाँ सुन्दर कूआँ और रहनेके लिये घर बना हो, जो हलसे जोती गयी हो और जिसमें बीजसहित फल लगे हों, ऐसी भूमिका दान करना चाहिये। वह सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली होती है ।। निष्पन्नसस्यां पृथिवीं यो ददाति द्विजन्मनाम्‌ | विमुक्त: कलुषै: सर्व: शक्रलोक॑ स गच्छति ।। जो उपजी हुई खेतीसे युक्त भूमिका ब्राह्मणोंके लिये दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो इन्द्रलोकमें जाता है ।। यथा जनित्री क्षीरेण स्वपुत्रमभिवर्धयेत्‌ । एवं सर्वफलैर्भूमिर्दातारमभिवर्धयेत्‌ ।। जैसे माता दूध पिलाकर अपने पुत्रका पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार भूमि सम्पूर्ण मनोवांछित फल देकर दाताको अभ्युदयशील बनाती है ।। ब्राह्माणं वृत्तसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम्‌ ग्राहयित्वा निजां भूमिं न यान्ति यमसादनम्‌ ।। जो लोग उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, अनग्निहोत्री एवं सदाचारी ब्राह्मणको अपनी भूमि देते हैं, वे यमलोकमें कभी नहीं जाते हैं ।। यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि दृश्यते । तथा भूमे: कृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ।। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी प्रतिदिन वृद्धि होती देखी जाती है, उसी प्रकार किये हुए भूमिदानका महत्त्व प्रत्येक नयी फसल पैदा होनेपर बढ़ता जाता है ।। यथा बीजानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले । तथा कामा: प्ररोहन्ति भूमिदानगुणार्जिता: ।। जैसे पृथ्वीपर बिखेरे हुए बीज अंकुरित हो जाते हैं, उसी प्रकार भूमिदानके गुणोंसे प्राप्त हुए सम्पूर्ण मनोवांछित भोग अंकुरित होते और बढ़ते हैं ।। पितर: पितृलोकस्था देवताश्न दिवि स्थिता: । संतर्पयन्ति भोगैस्तं यो ददाति वसुंधराम्‌ ।। जो भूमिका दान करता है, उसे पितृलोकनिवासी पितर और स्वर्गवासी देवता अभीष्ट भोगोंद्वारा तृप्त करते हैं ।। दीर्घायुष्य॑ वराड्रत्वं स्फीतां च श्रियमुत्तमाम्‌ | परत्र लभते मर्त्य: सम्प्रदाय वसुंधराम्‌ ।। भूमिदान करके मनुष्य परलोकमें दीर्घायु, सुन्दर शरीर और बढ़ी-चढ़ी उत्तम सम्पत्ति पाता है ।। एतत्‌ सर्व मयोद्दिष्टं भूमिदानस्य यत्‌ फलम्‌ । श्रद्धधानैनरिनित्यं श्राव्यमेतत्‌ सनातनम्‌ । यह सब मैंने भूमिदानका फल बताया है। श्रद्धालु पुरुषोंको प्रतिदिन यह सनातन दानमाहात्म्य सुनना चाहिये ।। अतः: पर प्रवक्ष्यामि कन्यादानं यथाविधि । कन्या देया महादेवि परेषामात्मनो5पि वा ।। अब मैं विधिपूर्वक कन्यादानका माहात्म्य बताऊँगा। महादेवि! दूसरोंकी और अपनी भी कनन्‍्याका दान करना चाहिये ।। कनन्‍्यां शुद्धव्रताचारां कुलरूपसमन्विताम्‌ । यस्मै दित्सति पात्राय तेनापि भूशकामिताम्‌ ।। जो शुद्ध व्रत एवं आचारवाली, कुलीन एवं सुन्दर रूपवाली कन्याका किसी सुपात्र पुरुषको दान करना चाहता है, उसे इस बातपर भी ध्यान रखना चाहिये कि वह सुपात्र व्यक्ति उस कन्याको बहुत चाहता है या नहीं (वह पुरुष उसे चाहता हो तभी उसके साथ उस कन्याका विवाह करना चाहिये) ।। प्रथमं तां समाकल्प्य बन्धुभि: कृतनिश्चयाम्‌ । कारयित्वा गृहं पूर्व दासीदासपरिच्छदै: ।। गृहोपकरणैश्वैव पशुधान्येन संयुताम्‌ । तदर्थिने तदर्हाय कन्यां तां समलड्कृताम्‌ ।। सविवाहं यथान्यायं प्रयच्छेदग्निसाक्षिकम्‌ ।। पहले बन्धुओंके साथ सलाह करके कन्याके विवाहका निश्चय करे, तत्पश्चात्‌ उसे वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित करे। फिर उसके लिये मण्डप बनाकर दास-दासी, अन्यान्य सामग्री, घरके आवश्यक उपकरण, पशु और धान्यसे सम्पन्न एवं वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हुई उस कन्‍्याका उसे चाहनेवाले योग्य वरको अग्निदेवकी साक्षितामें यथोचित रीतिसे विवाहपूर्वक दान करे ।। वृत्त्यायतीं यथा कृत्वा सदगृहे तौ निवेशयेत्‌ ।। एवं कृत्वा वधूदानं तस्य दानस्य गौरवात्‌ । प्रेत्यभावे महीयेत स्वर्गलोके यथासुखम्‌ ।। पुनर्जातश्व सौभाग्यं कुलवद्धिं तथा$5प्रुयात्‌ ।। भविष्यमें जीवन-निर्वाहके लिये पूर्ण व्यवस्था करके उन दोनों दम्पतिको उत्तम गृहमें ठहरावे। इस प्रकार वधू-वेषमें कन्‍्याका दान करके उस दानकी महिमासे दाता मृत्युके पश्चात्‌ स्वर्गलोकमें सुख और सम्मानके साथ रहता है। फिर जन्म लेनेपर उसे सौभाग्य प्राप्त होता है तथा वह अपने कुलको बढ़ाता है ।। विद्यादानं तथा देवि पात्रभूताय वै ददत्‌ । प्रेत्यभावे लभेन्मर्त्यों मेधां वृद्धि धृतिं स्मृतिम्‌ ।। देवि! सुपात्र शिष्यको विद्यादान देनेवाला मनुष्य मृत्युके पश्चात्‌ वृद्धि, बुद्धि, धृति और स्मृति प्राप्त करता है ।। अनुरूपाय शिष्याय यश्व विद्यां प्रयच्छति । यथोक्तस्य प्रदानस्य फलमानन्त्यमश्षुते ।। जो सुयोग्य शिष्यको विद्या दान करता है, उसे शास्त्रोक्त दानका अक्षय फल प्राप्त होता है ।। दापन त्वथ विद्यानां दरिद्रेभ्यो<र्थवेदनै: । स्वयं दत्तेन तुल्यं स्थादिति विद्धि शुभानने ।। शुभानने! निर्धन छात्रोंको धनकी सहायता देकर विद्या प्राप्त कराना भी स्वयं किये हुए विद्यादानके समान है, ऐसा समझो ।। एवं ते कथितान्येव महादानानि मानिनि । त्वत्प्रियार्थ मया देवि भूय: श्रोतुं किमिच्छसि ।। मानिनि! देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हारी प्रसन्नताके लिये ये बड़े-बड़े दान बताये हैं। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।। उमोवाच भगवन्‌ देवदेवेश कथं देयं तिलान्वितम्‌ । तस्य तस्य फल ब्रूहि दत्तस्य च कृतस्य च ।। उमाने पूछा--भगवन्‌! देवदेवेश्वर! तिलका दान कैसे करना चाहिये? और करनेका फल क्‍या होता है? यह मुझे बताइये ।। श्रीमहेश्वर उवाच तिलकल्पविधिं देवि तन्मे शूणु समाहिता ।। समृद्धैरसमृद्धैर्वा तिला देया विशेषत: । तिला: पवित्रा: पापघ्ना: सुपुण्या इति संस्मृता: ।। श्रीमहेश्वरने कहा--तुम एकाग्रचित्त होकर मुझसे तिलकल्पकी विधि सुनो। मनुष्य धनी हों या निर्धन, उन्हें विशेषरूपसे तिलोंका दान करना चाहिये; क्योंकि तिल पवित्र, पापनाशक और पुण्यमय माने गये हैं ।। न्यायतस्तु तिलान्‌ शुद्धान्‌ संहृत्याथ स्वशक्तित: । तिलराशिं पुन: कुर्यात्‌ पर्वताभं सरत्नकम्‌ ।। महान्तं यदि वा स्तोकं नानाद्रव्यसमन्वितम्‌ ।। सुवर्णरजताभ्यां च मणिमुक्ताप्रवालकै: । अलंकृत्य यथायोगं सपताकं सवेदिकम्‌ ।। सभूषणं सवस्त्रं च शयनासनसम्मितम्‌ । प्रायश: कौमुदीमासे पौर्णमास्यां विशेषत: । भोजयित्वा च विधिवद्‌ ब्राह्मणानर्हतो बहून्‌ ।। स्वयं कृतोपवासश्च वृत्तशौचसमन्वित: । दद्यात्‌ प्रदक्षिणीकृत्य तिलराशिं सदक्षिणम्‌ |।। अपनी शक्तिके अनुसार न्यायपूर्वक शुद्ध तिलोंका संग्रह करके उनकी पर्वताकार राशि बनावे। वह राशि छोटी हो या बड़ी उसे नाना प्रकारके द्रव्यों तथा रत्नोंसे युक्त करे। फिर यथाशक्ति सोना, चाँदी, मणि, मोती और मूँगोंसे अलंकृत करके पताका, वेदी, भूषण, वस्त्र, शय्या और आसनसे सुशोभित करे। प्राय: आश्विन मासमें विशेषत: पूर्णिमा तिथिको बहुत- से सुयोग्य ब्राह्मणोंको विधिवत्‌ भोजन कराकर स्वयं उपवास करके शौचाचार-सम्पन्न हो उन ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके दक्षिणासहित उस तिलराशिका दान करे ।। एकस्यापि बहूनां वा दातव्यं भूतिमिच्छता । तस्य दानफलं देवि अग्निष्टोमेन संयुतम्‌ ।। कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि वह एक ही पुरुषको या अनेक व्यक्तियोंको दान दे। देवि! उनके दानका फल अग्निष्टोम यज्ञके समान होता है ।। केवल वा तिलैरेव भूमौ कृत्वा गवाकृतिम्‌ | सवस्त्रक॑ सरत्नं च पुंसा गोदानकांक्षिणा ।। तदर्हाय प्रदातव्यं तस्य गोदानतः फलम्‌ ।। अथवा पृथ्वीपर केवल तिलोंसे ही गौकी आकृति बनाकर गोदानके फलकी इच्छा रखनेवाला पुरुष रत्न और वस्त्रसहित उस तिल-घधेनुका सुयोग्य ब्राह्मणको दान करे। इससे दाताको गोदान करनेका फल मिलता है ।। शरावांस्तिलसम्पूर्णान्‌ सहिरण्यान्‌ सचम्पकान्‌ | नृपो ददद्‌ ब्राह्मणाय स पुण्यफलभाग भवेत्‌ ।। जो राजा सुवर्ण और चम्पासे युक्त तथा तिलसे भरे हुए शरावों (पुरवों) का ब्राह्मणको दान करता है, वह पुण्य-फलका भागी होता है ।। एवं तिलमयं देयं नरेण हितमिच्छता । नानादानफलं भूय: शृणु देवि समाहिता ।। देवि! अपना हित चाहनेवाले मनुष्यको इसी प्रकार तिलमयी धेनुका दान करना चाहिये। अब पुनः एकाग्रचित्त होकर नाना प्रकारके दानोंका फल सुनो ।। बलमायुष्यमारोग्यमन्नदानाल्लभेन्नर: । पानीयदस्तु सौभाग्यं रसज्ञानं लभेन्नर: ।। अन्नदान करनेसे मनुष्यको बल, आयु और आरोग्यकी प्राप्ति होती है। जलदान करनेवाला पुरुष सौभाग्य तथा रसका ज्ञान प्राप्त करता है ।। वस्त्रदानाद्‌ वपु:ःशोभामलंकारं लभेन्नर: । दीपदो बुद्धिवैशद्यं द्युतिशोभां लभेन्नर: ।। वस्त्रदान करनेसे मनुष्य शारीरिक शोभा और आभूषण लाभ करता है। दीपदान करनेवालेकी बुद्धि निर्मल होती है तथा उसे द्युति एवं शोभाकी प्राप्ति होती है ।। राजबीजाविमोक्ष तु छत्रदो लभते फलम्‌ | दासीदासप्रदानात्‌ तु भवेत्‌ कर्मान्तभाड्नर: ।। दासीदासं च विविध लभेत्‌ प्रेत्य गुणान्वितम्‌ ।। छत्रदान करनेवाला पुरुष किसी भी जन्ममें राजवंशसे अलग नहीं होता। दासी और दासोंका दान करनेसे मनुष्य कर्मोंका अन्त कर देता है और मृत्युके पश्चात्‌ उत्तम गुणोंसे युक्त भाँति-भाँतिके दासों और दासियोंको प्राप्त करता है ।। यानानि वाहनं चैव तदर्हाय ददन्नर: । पादरोगपरिक्लेशान्मुक्त: श्वसनवाहवान्‌ | विचित्र रमणीयं च लभते यानवाहनम्‌ ।। जो मनुष्य सुयोग्य ब्राह्मणको रथ आदि यानों और वाहनोंका दान करता है, वह पैरसम्बन्धी रोगों और क्लेशोंसे मुक्त हो जाता है। उसकी सवारीमें वायुके समान वेगशाली घोड़े मिलते हैं। वह विचित्र एवं रमणीय यान और वाहन पाता है ।। सेतुकूपतटाकानां कर्ता तु लभते नर: । दीर्घायुष्यं च सौभाग्यं तथा प्रेत्य गतिं शुभाम्‌ ।। पुल, कुआँ और पोखरा बनवानेवाला मानव दीर्घायु, सौभाग्य तथा मृत्युके पश्चात्‌ शुभ गति प्राप्त कर लेता है ।। वृक्षसंरोपको यस्तु छायापुष्पफलप्रद: । प्रेत्यभावे लभेत्‌ पुण्यमभिगम्यो भवेन्नर: ।। जो वृक्ष लगानेवाला तथा छाया, फ़ूल और फल प्रदान करनेवाला है, वह मृत्युके पश्चात्‌ पुण्यलोक पाता है और सबके लिये मिलनेके योग्य हो जाता है ।। यस्तु संक्रमकूललोके नदीषु जलहारिणाम्‌ | लभेत्‌ पुण्यफल प्रेत्य व्यसने भ्यो विमोक्षणम्‌ ।। जो मनुष्य इस जगत्‌में नदियोंपर जल ले जानेवाले पुरुषोंकी सुविधाके लिये पुल निर्माण कराता है, वह मृत्युके पश्चात्‌ उसका पुण्यफल पाता है और सब प्रकारके संकटोंसे छुटकारा पा जाता है ।। मार्गकृत्‌ सततं मर्त्यों भवेत्‌ संतानवान्‌ पुनः । कायदोषविमुक्तस्तु तीर्थकृत्‌ सततं भवेत्‌ ।। जो मनुष्य सदा मार्गका निर्माण करता है, वह संतानवान्‌ होता है। तथा जो जलनमें उतरनेके लिये सीढ़ी एवं पक्के घाट बनवाता है, वह शारीरिक दोषसे मुक्त हो जाता है ।। औषधानां प्रदानात्‌ तु सततं कृपयान्वित: । भवेद्‌ व्याधिविहीनश्च दीर्घायुश्न विशेषत: ।। जो सदा कृपापूर्वक रोगियोंको औषध प्रदान करता है, वह रोगहीन और विशेषत: दीर्घायु होता है ।। अनाथानू्‌ पोषयेद्‌ यस्तु कृपणान्धकपडुकान्‌ | सतु पुण्यफल प्रेत्य लभते कृच्छुमोक्षणम्‌ ।। जो अनाथों, दीन-दुःखियों, अन्धों और पंगु मनुष्योंका पोषण करता है, वह मृत्युके पश्चात्‌ उसका पुण्यफल पाता और संकटसे मुक्त हो जाता है ।। वेदगोष्ठा: सभा: शाला भिक्षूणां च प्रतिश्रयम्‌ । यः कुर्याल्लभते नित्यं नर: प्रेत्य शुभं फलम्‌ ।। जो मनुष्य वेदविद्यालय, सभाभवन, धर्मशाला तथा भिक्षुओंके लिये आश्रम बनाता है, वह मृत्युके पश्चात्‌ शुभ फल पाता है ।। विविध॑ विविधाकारं भक्ष्यभोज्यगुणान्वितम्‌ । रम्यं सदैव गोवाट्ट यः कुर्याललभते नर: । प्रेत्यभावे शुभां जाति व्याधिमोक्षं तथैव च । एवं नानाविध॑ द्रव्यं दानकर्ता लभेत्‌ फलम्‌ ।। जो मानव उत्तम भक्ष्य-भोज्यसम्बन्धी गुणोंसे युक्त तथा नाना प्रकारकी आकृतिवाली भाँति-भाँतिकी रमणीय गोशालाओंका सदैव निर्माण करता है, वह मृत्युके पश्चात्‌ उत्तम जन्म पाता और रोगमुक्त होता है। इस प्रकार भाँति-भाँतिके द्रव्योंका दान करनेवाला मनुष्य पुण्यफलका भागी होता है ।। बुद्धिमायुष्यमारोग्यं बल॑ भाग्यं तथा55गमम्‌ | रूपेण सप्तधा भूत्वा मानुष्यं फलति ध्रुवम्‌ ।। बुद्धि, आयुष्य, आरोग्य, बल, भाग्य, आगम तथा रूप--इन सात भागोंमें प्रकट होकर मनुष्यका पुण्यकर्म अवश्य अपना फल देता है ।। उमोवाच भगवन्‌ देवदेवेश विशिष्ट यज्ञमुच्यते । लौकिकं वैदिकं चैव तन्मे शंसितुमरहसि ।। उमाने कहा--भगवन्‌! देवदेवेश्वरर! लौकिक और वैदिक यज्ञको उत्तम बताया जाता है। अतः: इस विषयका मुझसे वर्णन कीजिये ।। श्रीमहेश्वर उवाच देवतानां तु पूजा या यज्ञेष्वेव समाहिता । यज्ञा वेदेष्वधीताश्व वेदा ब्राह्मणसंयुता: ।। श्रीमहेश्वर बोले--देवि! देवताओंकी जो पूजा है, वह यज्ञोंके ही अन्तर्गत है। यज्ञोंका वेदोंमें वर्णन है और वेद ब्राह्मणोंके साथ हैं ।। इदं तु सकल द्रव्यं दिवि वा भुवि वा प्रिये यज्ञार्थ विद्धि तत्‌ सृष्टं लोकानां हितकाम्यया ।। प्रिये! स्वर्गलोकमें या पृथ्वीपर जो द्रव्य दृष्टिगोचर होता है, इस सबकी सृष्टि विधाताद्वारा लोकहितकी कामनासे यज्ञके लिये की गयी है, ऐसा समझो ।। एवं विज्ञाय तत्‌ कर्ता सदार: सततं द्विज: । प्रेत्यभावे लभेल्लोकान्‌ ब्रह्म॒कर्मसमाधिना ।। ऐसा समझकर जो द्विज सदा अपनी स्त्रीके साथ रहकर यज्ञ-कर्म करता है, वह ब्रह्मकर्ममें तत्पर रहनेके कारण मृत्युके पश्चात्‌ पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेता है ।। ब्राह्मणेष्वेव तद्‌ ब्रह्म नित्यं देवि समाहितम्‌ ।। तस्माद्‌ विप्रैर्यथाशास्त्रं विधिदृष्टेन कर्मणा । यज्ञकर्म कृतं सर्व देवता अभितर्पयेत्‌ ।। देवि! वह ब्रह्म (वेद) सदा ब्राह्मणोंमें ही स्थित है, अतः शास्त्र-विधिके अनुसार ब्राह्मणोंद्वारा किया हुआ सम्पूर्ण यज्ञकर्म देवताओंको तृप्त करता है ।। ब्राह्मणा: क्षत्रियाश्रैव यज्ञार्थ प्रायश: स्मृता: ।। अग्निष्टोमादिभिरययजिवेंदेषु परिकल्पितै: । सुशुद्धैर्यजमानैश्व ऋत्विग्भिश्व यथाविधि ।। शुद्धै्द्रव्योपकरणैर्यष्टव्यमिति निश्चय: ।। ब्राह्मणों और क्षत्रियोंकी उत्पत्ति प्राय: यज्ञके लिये ही मानी गयी है। शुद्ध यजमानों तथा ऋत्विजों-द्वारा किये गये वेदवर्णित अग्निष्टोम आदि यज्ञों एवं विशुद्ध द्रव्योपकरणोंसे यजन करना चाहिये, यह शास्त्रका निश्चय है ।। तथा कृतेषु यज्ञेषु देवानां तोषणं भवेत्‌ । तुष्टेषु सर्वदेवेषु यज्वा यज्ञफलं लभेत्‌ ।। इस प्रकार किये गये यज्ञोंमें देवताओंको संतोष होता है और सम्पूर्ण देवताओंके संतुष्ट होनेपर यजमानको यज्ञका पूरा-पूरा फल मिलता है ।। देवा: संतोषिता यजैलोंकान्‌ संवर्धयन्त्युत । यज्ञोंद्वारा संतुष्ट किये हुए देवता सम्पूर्ण लोकोंकी वृद्धि करते हैं ।। तस्माद्‌ यज्वा दिवं गत्वामरै: सह मोदते । नास्ति यज्ञसमं दान नास्ति यज्ञसमो निधि: ।। सर्वधर्मसमुद्देशो देवि यज्ञे समाहित: । इसलिये यजमान स्वर्गलोकमें जाकर देवताओंके साथ आनन्द भोगता है। यज्ञके समान कोई दान नहीं है और यज्ञके समान कोई निधि नहीं है। देवि! सम्पूर्ण धर्मोका उद्देश्य यज्ञमें प्रतिष्ठित है ।। एषा यज्ञकृता पूजा लौकिकीमपरां शृणु ।। देवसत्कारमुद्दिश्य क्रियते लौकिकोत्सव: ।। यह यज्ञद्वारा की गयी देवपूजा वैदिकी है। इससे भिन्न जो दूसरी लौकिकी पूजा है, उसका वर्णन सुनो। देवताओंके सत्कारके लिये लोकमें समय-समयपर उत्सव किया जाता है ।। देवगोषछ्ठेडधिसंस्कृत्य चोत्सवं यः करोति वै । यागान्‌ देवोपहारांश्व शुचिर्भूत्वा यथाविधि ।। देवान्‌ संतोषयित्वा स देवि धर्ममवाप्तुयात्‌ ।। देवि! जो देवालयमें देवताका संस्कार करके उत्सव मनाता है और पवित्र होकर विधिपूर्वक यज्ञ एवं देवताओंको उपहार समर्पित करके उन्हें संतुष्ट करता है, वह धर्मका पूरा-पूरा फल प्राप्त करता है ।। गन्धमाल्यैश्न विविधै: परमान्नेन धूपनै: । बद्दीभि: स्तुतिभि श्वैव स्तुवद्धिः प्रयतैर्नरे: ।। न्त्तैवयिश्व गान्धर्वैरन्यैर्दृष्टिविलो भनै: । देवसत्कारमुद्दिश्य कुर्वते ये नरा भुवि ।। तेषां भक्तिकृतेनैव सत्कारेणैव पूजिता: । तेनैव तोषं संयान्ति देवि देवास्त्रिविष्टपे ।। देवि! इस भूतलपर जो मनुष्य देवताओंके सत्कारके उद्देश्यसे नाना प्रकारके गन्ध, माल्य, उत्तम अन्न, धूपदान तथा बहुत-सी स्तुतियोंद्वारा स्‍्तवन करते हैं और शुद्धचित्त हो नृत्य, वाद्य, गान तथा दृष्टिको लुभानेवाले अन्यान्य कार्यक्रमोंद्वारा देवाराधन करते हैं, उनके भक्तिजनित सत्कारसे ही पूजित हो देवता स्वर्गमें उतनेसे ही संतुष्ट हो जाते हैं ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन] उमोवाच पितृमेध: कथं देव तन्मे शंसितुमरहसि । सर्वेषां पितर: पूज्या: सर्वसम्पत्प्रदायिन: ।। उमाने पूछा--देव! पितृमेध (श्राद्ध) कैसे किया जाता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें। सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता पितर सभीके लिये पूजनीय होते हैं ।। श्रीमहेश्वर उवाच पितृमेध॑ प्रवक्ष्यामि यथावत्‌ तन्मना: शृणु | देशकालौ विधान च तत्क्रियाया: शुभाशुभम्‌ ।। श्रीमहेश्वरने कहा-देवि! मैं पितृमेधका यथावत्रूपसे वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। देश, काल, विधान तथा क्रियाके शुभाशुभ फलका भी वर्णन करूँगा ।। लोकेषु पितर: पूज्या देवतानां च देवता: । शुचयो निर्मला: पुण्या दक्षिणां दिशमाश्रिता: ।। सभी लोकोंमें पितर पूजनीय होते हैं। वे देवताओंके भी देवता हैं। उनका स्वरूप शुद्ध, निर्मल एवं पवित्र है। वे दक्षिणदिशामें निवास करते हैं ।। यथा चवुष्टिं प्रतीक्षन्ते भूमिष्ठा: सर्वजन्तवः । पितरश्न तथा लोके पितृमेधं शुभेक्षणे ।। शुभेक्षणे! जैसे भूमिपर रहनेवाले सभी प्राणी वर्षाकी बाट जोहते रहते हैं, उसी प्रकार पितृलोकमें रहनेवाले पितर श्राद्धकी प्रतीक्षा करते रहते हैं ।। तस्य देशा: कुरुक्षेत्र गया गड़ा सरस्वती । प्रभासं पुष्करं चेति तेषु दत्त महाफलम्‌ ।। श्राद्धके लिये पवित्र देश हैं--कुरुक्षेत्र, गया, गंगा, सरस्वती, प्रभास और पुष्कर--इन तीर्थस्थानोंमें दिया गया श्राद्धका दान महान्‌ फलदायक होता है ।। तीर्थानि सरित: पुण्या विविक्तानि वनानि च । नदीनां पुलिनानीति देशा: श्राद्धस्य पूजिता: ।। तीर्थ, पवित्र नदियाँ, एकान्त वन तथा नदियोंके तट--ये श्राद्धके लिये प्रशंसित देश हैं ।। माघप्रोष्ठपदौ मासौ श्राद्धकर्मणि पूजितौ । पक्षयो: कृष्णपक्षश्ष पूर्वपक्षात्‌ प्रशस्यते ।। श्राद्ध-कर्ममें माध और भाद्रपदमास प्रशंसित हैं। दोनों पक्षोंमें पूर्वपक्ष (शुक्ल) की अपेक्षा कृष्णपक्ष उत्तम बताया जाता है ।। अमावास्यां त्रयोदश्यां नवम्यां प्रतिपत्सु च तिथिष्वेतासु तुष्यन्ति दत्तेनेह पितामहा: ।। अमावास्या, त्रयोदशी, नवमी और प्रतिपदा--इन तिथियोंमें यहाँ श्राद्धका दान करनेसे पितृगण संतुष्ट होते हैं ।। पूर्वाह्ने शुक्लपक्षे च रात्रौ जन्मदिनेषु वा । युग्मेष्वहस्सु च श्राद्ध न च कुर्वीत पण्डित: ।। विद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि पूर्वह्षमें, शुक्ल-पक्षमें, रात्रिमें अपने जन्मके दिनमें और युग्म दिनोंमें श्राद्ध न करे ।। एष कालो मया प्रोक्त: पितृमेधस्य पूजित: । यस्मिंश्ष ब्राह्मण पात्र पश्येत्‌ काल: स च स्मृतः ।। यह मैंने श्राद्धका प्रशस्त समय बताया है। जिस दिन सुपात्र ब्राह्मणका दर्शन हो, वह भी श्राद्धका उत्तम समय माना गया है ।। अपाद्धक्तेया द्विजा वर्ज्या ग्राह्मास्ते पड़क्तिपावना: । भोजयेद्‌ यदि पापिष्ठान्‌ श्राद्धेषु नरक॑ व्रजेत्‌ ।। श्राद्धमें अपांक्तेय ब्राह्मणोंका त्याग और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंको ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई श्राद्धमें पापिष्ठोंकोी भोजन कराता है तो वह नरकमें पड़ता है ।। वृत्तश्रुतकुलोपेतान्‌ सकलत्रान्‌ गुणान्वितान्‌ | तदरहनि श्रोत्रियान्‌ विद्धि ब्राह्मणानयुज: शुभे ।। शुभे! जो सदाचार, शास्त्रज्ञान और उत्तम कुलसे सम्पन्न, सपत्नीक तथा सदगुणी हों, ऐसे श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको तुम श्राद्धके योग्य समझो। श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी संख्या विषम होनी चाहिये ।। एतान्‌ निमन्त्रयेद्‌ विद्वान पूर्वेद्यु: प्रातरेव वा । ततः श्राद्धक्रियां पश्चादारभेत यथाविधि ।। विद्वान पुरुष इन ब्राह्मणोंको श्राद्धके पहले ही दिन अथवा श्राद्धके ही दिन प्रात:ः:काल निमन्त्रण दे। तत्पश्चात्‌ विधिपूर्वक श्राद्धकर्म आरम्भ करे ।। त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्र: कुतपस्तिला: । त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम्‌ ।। श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र हैं--दौहित्र, कुतपकाल (दिनके पन्द्रह भागमेंसे आठवाँ भाग) तथा तिल। इस कार्यमें तीन गुणोंकी प्रशंसा की जाती है। पवित्रता, क्रोधहीनता और अत्वरा (जल्दीबाजी न करना) ।। कुतप: खड्गपात्रं च कुशा दर्भास्तिला मधु । कालशाकं गजच्छाया पवित्र श्राद्धकर्मसु ।। कुतप, खड्गपात्र, कुशा, दर्भ, तिल, मधु, कालशाक और गजच्छाया--ये वस्तुएँ श्राद्धकर्ममें पवित्र मानी गयी हैं ।। तिलानवकिरेत्‌ तत्र नानावर्णान्‌ समन्ततः । अशुद्धमपवित्रं च तिलै: शुध्यति शोभने ।। श्राद्धके स्थानमें चारों ओर अनेक वर्णवाले तिल बिखेरने चाहिये। शोभने! तिलोंसे अशुद्ध और अपवित्र स्थान शुद्ध हो जाता है ।। नीलकाषायवत्त्रं च भिन्नवर्ण नवव्रणम्‌ | हीनाड्ुमशुचिं वापि वर्जयेत्‌ तत्र दूरत: ।। श्राद्धमें नीला और गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाले, विभिन्न वर्णवाले, नये घाववाले, किसी अंगसे हीन और अपवित्र मनुष्यको दूरसे ही त्याग देना चाहिये ।। उपकल्प्य तदाहारं ब्राह्म॒णानर्चयेत्‌ ततः ।। श्मश्रुकर्मशिरस्स्नातान्‌ समारोप्यासनं क्रमात्‌ । सुगन्धमाल्याभरणै: स्रग्भिरेतान्‌ विभूषयेत्‌ ।। श्राद्धकी रसोई तैयार करके ब्राह्मणोंकी पूजा करे। हजामत बनवाकर सिरसे नहाये हुए उन ब्राह्मणोंको क्रमशः आसनपर बिठाकर सुगन्ध, माला, आभूषणों तथा पुष्पहारोंसे विभूषित करे ।। अलंकृत्योपविष्टांस्तान्‌ पिण्डावापं निवेदयेत्‌ ।। ततः प्रस्तीर्य दर्भाणां प्रस्तरं दक्षिणामुखम्‌ । तत्समीपेडग्निमिद्ध्वा च स्वधां च जुहुयात्‌ ततः ।। अलंकृत होकर बैठे हुए उन ब्राह्मणोंको यह निवेदन करे कि अब मैं पिण्डदान करूँगा। तदनन्तर दक्षिणाभिमुख कुश बिछाकर उनके समीप अग्नि प्रज्वलित करके उसमें श्राद्धात्रकी आहुति दे (आहुतिके मन्त्र इस प्रकार हैं--अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा। सोमाय पितृमते स्वाहा) ।। समीपे त्वग्नीषोमाभ्यां पितृभ्यो जुहुयात्‌ तदा । तथा दर्भेषु पिण्डांस्त्रीन्‌ निर्वपेद्‌ दक्षिणामुख: । अपसब्यमपाड्गुष्ठं नामधेयपुरस्कृतम्‌ ।। इस प्रकार अग्नि और सोमके लिये आहुति देकर उनके समीप पितरोंके निमित्त होम करे तथा दक्षिणाभिमुख हो अपसव्य होकर अर्थात्‌ जनेऊको दाहिने कंधेपर रखकर पितरोंके नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए कुशोंपर तीन पिण्ड दे। उन पिण्डोंका अंगुष्ठसे स्पर्श न हो ।। एतेन विधिना दत्तं पितृणामक्षयं भवेत्‌ । ततो विप्रान्‌ यथाशक्ति पूजयेन्नियत: शुचि: ।। सदक्षिणं ससम्भारं यथा तुष्यन्ति ते द्विजा: ।। इस विधिसे दिया हुआ पिण्डदान पितरोंके लिये अक्षय होता है। तत्पश्चात्‌ मनको वशमें रखकर पवित्र हो यथाशक्ति दक्षिणा और सामग्री देकर ब्राह्मणोंकी यथाशक्ति पूजा करे। जिससे वे संतुष्ट हो जायूँ ।। यत्र तत्‌ क्रियते तत्र न जल्पेन्न जपेन्मिथ: । नियम्य वाचं देहं च श्राद्धकर्म समारभेत्‌ ।। जहाँ यह श्राद्ध या पूजन किया जाता है, वहाँ न तो कुछ बोले और न आपसमें ही कुछ दूसरी बात करे। वाणी और शरीरको संयममें रखकर श्राद्धकर्म आरम्भ करे ।। ततो निर्वपने वृत्ते तान्‌ पिण्डांस्तदनन्तरम्‌ । ब्राह्मणो5ग्निरजो गौर्वा भक्षयेदप्सु वा क्षिपेत्‌ ।। पिण्डदानका कार्य पूर्ण हो जानेपर उन पिण्डोंको ब्राह्मण, अग्नि, बकरा अथवा गौ भक्षण कर ले या उन्हें जलमें डाल दिया जाय ।। पत्नीं वा मध्यमं पिण्डं पुत्रकामां हि प्राशयेत्‌ आधत्त पितरो गर्भ कुमारं पुष्करस्रजम्‌ ।। यदि श्राद्धकर्ताकी पत्नीको पुत्रकी कामना हो, तो वह मध्यम पिण्ड अर्थात्‌ पितामहको अर्पित किये हुए पिण्डको खा ले और प्रार्थना करे कि “पितरो! आपलोग मेरे गर्भमें कमलोंकी मालासे अलंकृत एक सुन्दर कुमारकी स्थापना करें” ।। तृप्तानुत्थाप्य तान्‌ विप्रानन्नशेषं निवेदयेत्‌ । तच्छेष॑ बहुभि: पश्चात्‌ सभृत्यो भक्षयेन्नर: ।। जब ब्राह्मणलोग भोजन करके तृप्त हो जायँ, तब उन्हें उठाकर शेष अन्न दूसरोंको निवेदन करे। तत्पश्चात्‌ बहुत-से लोगोंके साथ मनुष्य भृत्यवर्गसहित शेष अन्नका स्वयं भोजन करे ।। एष प्रोक्त: समासेन पितृयज्ञ: सनातन: । पितरस्तेन तुष्यन्ति कर्ता च फलमाप्नुयात्‌ ।। यह सनातन पितृयज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया गया। इससे पितर संतुष्ट होते हैं और श्राद्धकर्ताको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ।। अहन्यहनि वा कुर्यान्मासे मासे5थवा पुन: । संवत्सरं द्वि: कुर्याच्च चतुर्वापि स्वशक्तित: ।। मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन, प्रतिमास, सालमें दो बार अथवा चार बार भी श्राद्ध करे ।। दीर्घायुश्न भवेत्‌ स्वस्थ: पितृमेधेन वा पुनः । सपुत्रो बहुभृत्यश्न प्रभूतधनधान्यवान्‌ ।। श्राद्ध करनेसे मनुष्य दीर्घायु एवं स्वस्थ होता है। वह बहुतसे पुत्र, सेवक तथा धन- धान्यसे सम्पन्न होता है ।। श्राद्धद: स्वर्गमाप्नोति निर्मल विविधात्मकम्‌ | अप्सरोगणसंघुष्टं विरजस्कमनन्तरम्‌ ।। श्राद्धका दान करनेवाला पुरुष विविध आकृतियोंवाले, निर्मल, रजोगुणरहित और अप्सराओंसे सेवित स्वर्गलोकमें निरन्तर निवास पाता है ।। भ्राद्धानि पुष्टिकामा वै ये प्रकुर्वन्ति पण्डिता: । तेषां पुष्टि प्रजां चैव दास्यन्ति पितर: सदा ।। जो पुष्टिकी इच्छा रखनेवाले पण्खडित श्राद्ध करते हैं, उन्हें पितर सदा पुष्टि एवं संतान प्रदान करते हैं ।। धन्य यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्य शत्रुविनाशनम्‌ । कुलसंधारकं चेति श्राद्धमाहुर्मनीषिण: ।। मनीषी पुरुष श्राद्धको धन, यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, शत्रुनाशक एवं कुलधारक बताते हैं ।। प्रमाणकल्पनां देवि दानस्य शृणु भामिनि ।। यत्सारस्तु नरो लोके तद्‌ दान चोत्तमं स्मृतम्‌ । सर्वदानविधिं प्राहुस्तदेव भुवि शोभने ।। देवि! भामिनि! दानके फलका जो प्रमाण माना गया है, उसे सुनो। जगतमें मनुष्यके पास जो सार वस्तु है, उसका दान उसके लिये उत्तम माना गया है। शोभने! इस पृथ्वीपर उसीको सम्पूर्ण दानकी विधि कही गयी है ।। प्रस्थं सारं दरिद्रस्य सारं कोटिधनस्य च । प्रस्थसारस्तु तत्‌ प्रस्थं ददन्‍महदवाप्नुयात्‌ ।। कोटिसारस्तु तां कोटिं ददन्‍्महदवाप्रुयात्‌ । उभयं तन्महत्‌ तच्च फलेनैव सम॑ स्मृतम्‌ ।। दरिद्रका सार है सेरभर अन्न और जो करोड़पति है उसका सार है करोड़। जिसका सेरभर अनाज ही सार है, वह उसीका दान करके महान्‌ फल प्राप्त कर लेता है और जिसका सार एक करोड़ मुद्रा है, वह उसीका दान कर दे तो महान्‌ फलका भागी होता है। ये दोनों ही महत्त्वपूर्ण दान हैं और दोनोंका फल महान्‌ माना गया है ।। धर्मार्थकामभोगेषु शक्‍्त्यभावस्तु मध्यमम्‌ । स्वद्रव्यादतिहीनं तु तद्‌ दानमधमं स्मृतम्‌ ।। धर्म, अर्थ और काम-भोगमें शक्तिका अभाव हो जाय और उस अवस्थामें कुछ दान किया जाय तो वह दान मध्यम कोटिका है और अपने धन एवं शक्तिसे अत्यन्त हीन कोटिका दान अधम माना गया है ।। शृणु दत्तस्य वै देवि पजचधा फलकल्पनाम्‌ | आनन्त्यं च महच्चैव सम॑ हीनं हि पातकम्‌ ।। देवि! दानके फलकी पाँच प्रकारसे कल्पना की गयी है, उसको सुनो। अनन्त, महान्‌, सम, हीन और पाप--ये पाँच तरहके फल होते हैं ।। तेषां विशेष वक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता । दुस्त्यजस्य च वै दानं पात्र आनन्त्यमुच्यते ।। देवि! इन पाँचोंकी जो विशेषता है, उसे बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो। जिस धनका त्याग करना अत्यन्त कठिन हो, उसे सुपात्रको देना “आनन्त्य” कहलाता है अर्थात्‌ उस दानका फल अनन्त--अक्षय होता है ।। दान॑ षड़्गुणयुक्त तु महदित्यभिधीयते । यथाश्रद्धं तु वै दानं यथा सममुच्यते ।। पूर्वोक्त छः गुणोंसे युक्त जो दान है, उसीको “महान” कहा गया है। जैसी अपनी श्रद्धा हो उसीके अनुसार यथायोग्य दान देना 'सम” कहलाता है ।। गुणतस्तु तथा हीन॑ दानं हीनमिति स्मृतम्‌ । दानं पातकमित्याहु: षड्गुणानां विपर्यये ।। गुणहीन दानको “हीन” कहा गया है। यदि पूर्वोक्त छः गुणोंके विपरीत दान किया जाय तो वह “पातक' रूप कहा गया है ।। देवलोके महत्‌ कालमानन्त्यस्य फलं विदु: । महतस्तु तथा काल स्वर्गलोके तु पूज्यते ।। आनन्त्य या “अनन्त” नामक दानका फल देव-लोकमें दीर्घ कालतक भोगा जाता है। महद्‌ दानका फल यह है कि मनुष्य स्वर्गलोकमें अधिक कालतक पूजित होता है ।। समस्य तु तदा दान मानुष्यं भोगमावहेत्‌ | दान॑ निष्फलमित्याहुर्विहीनं क्रियया शुभे ।। सम-दान मनुष्यलोकका भोग प्रस्तुत करता है। शुभे! क्रियासे हीन दान निष्फल बताया गया है ।। अथवा म्लेच्छदेशेषु तत्र तत्फलतां व्रजेत्‌ । नरक प्रेत्य तिर्यक्षु गच्छेदशुभदानत: ।। अथवा म्लेच्छ देशोंमें जन्म लेकर मनुष्य वहाँ उसका फल पाता है। अशुभदानसे पाप लगता है और उसका फल भोगनेके लिये वह दाता मृत्युके पश्चात्‌ नरक या तिर्यक्‌ योनियोंमें जाता है ।। उमोवाच अशुभस्यापि दानस्य शुभं स्याच्च फलं कथम्‌ | उमाने पूछा--भगवन्‌! अशुभदानका भी फल शुभ कैसे होता है? ।। श्रीमहेश्वर उवाच मनसा तत्त्वत: शुद्धमानृशंस्यपुरस्सरम्‌ | प्रीत्या तु सर्वदानानि दत्त्वा फलमवाप्लनुयात्‌ ।। श्रीमहेश्वरने कहा--प्रिये! जो दान शुद्ध हृदयसे अर्थात्‌ निष्काम भावसे दिये जानेके कारण तत्त्वतः शुद्ध हो, जिसमें क्रूरताका अभाव हो, जो दयापूर्वक दिया गया हो, वह शुभ फल देनेवाला है। सभी प्रकारके दानोंको प्रसन्नताके साथ देकर दाता शुभ फलका भागी होता है ।। रहस्यं सर्वदानानामेतद्‌ू विद्धि शुभेक्षणे | अन्यानि धर्मकार्याणि शृणु सद्धिः कृतानि च ।। शुभेक्षणे! इसीको तुम सम्पूर्ण दानोंका रहस्य समझो। अब सत्पुरुषोंद्वारा किये गये अन्य धर्म-कार्योंका वर्णन सुनो ।। आरामदेवगोष्ठानि संक्रमा: कूप एव च । गोवाटश्नल तटाकश्ष सभा शाला च सर्वशः ।। पाषण्डावसथश्वैव पानीयं गोतृणानि च । व्याधितानां च भैषज्यमनाथानां च पोषणम्‌ ।। अनाथशवसंस्कारस्तीर्थमार्गविशो धनम्‌ । व्यसनाभ्यवप्त्तिक्ष सर्वेषां च स्वशक्तित:ः ।। एतत्‌ सर्व समासेन धर्मकार्यमिति स्मृतम्‌ । तत्‌ कर्तव्यं मनुष्येण स्वशक्‍्त्या श्रद्धया शुभे ।। बगीचा लगाना, देवस्थान बनाना, पुल और कुआँका निर्माण करना, गोशाला, पोखरा, धर्मशाला, सबके लिये घर, पाखण्डीतकको भी आश्रय देना, पानी पिलाना, गौओंको घास देना, रोगियोंके लिये दवा और पथ्यकी व्यवस्था करना, अनाथ बालकोंका पालन-पोषण करना, अनाथ मुर्दोंका दाह-संस्कार कराना, तीर्थ-मार्गका शोधन करना, अपनी शक्तिके अनुसार सभीके संकटोंको दूर करनेका प्रयत्न करना--यह सब संक्षेपसे धर्मकार्य बताया गया। शुभे! मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार श्रद्धापूर्वक यह धर्मकार्य करना चाहिये ।। प्रेत्यभावे लभेत्‌ पुण्यं नास्ति तत्र विचारणा । रूपं॑ सौभाग्यमारोग्यं बल॑ सौख्यं लभेन्नर: ।। स्वर्गे वा मानुषे वापि तैस्तैराप्पायते हि सः ।। यह सब करनेसे मृत्युके पश्चात्‌ मनुष्यको पुण्य प्राप्त होता है, इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। वह धर्मात्मा पुरुष रूप, सौभाग्य, आरोग्य, बल और सुख पाता है। वह स्वर्गलोकमें रहे या मनुष्यलोकमें, उन-उन पुण्यफलोंसे तृप्त होता रहता है ।। उमोवाच भगवल्लॉकपालेश धर्मस्तु कतिभेदक: । दृश्यते परितः सद्धिस्तन्मे शंसितुमरहसि ।। उमाने कहा--भगवन्‌! लोकपालेश्वर! धर्मके कितने भेद हैं? साधु पुरुष सब ओर उसके कितने भेद देखते हैं? यह मुझे बताइये ।। श्रीमहेश्वर उवाच स्मृतिधर्मश्व बहुधा सद्धिराचार इष्यते ।। देशधर्माश्च दृश्यन्ते कुलधर्मास्तथैव च । जातिधर्मक्ष वै धर्मा गणधर्माश्न शोभने ।। श्रीमहेश्वरने कहा--स्मृतिकथित धर्म अनेक प्रकारका है। श्रेष्ठ पुरुषोंको आचार-धर्म अभीष्ट होता है। शोभने! देश-धर्म, कुल-धर्म, जाति-धर्म तथा समुदाय-धर्म भी दृष्टिगोचर होते हैं ।। शरीरकालवैषम्यादापद्धर्म श्न दृश्यते । एतदू धर्मस्य नानात्वं क्रियते लोकवासिभि: ।। शरीर और कालकी विषमतासे आपद्धर्म भी देखा जाता है। इस जगतमें रहनेवाले मनुष्य ही धर्मके ये नाना भेद करते हैं ।। तत्कारणसमायोगे लभेत्‌ कुर्वन्‌ फलं नर: ।। कारणका संयोग होनेपर धर्माचरण करनेवाला मनुष्य उस धर्मके फलको प्राप्त करता है ।। श्रौतस्मार्तस्तु धर्माणां प्रकृतो धर्म उच्यते । इति ते कथित देवि भूय: श्रोतुं किमिच्छसि ।। धर्मोमें जो श्रौत (वेद-कथित) और स्मार्त (स्मृति-कथित) धर्म है, उसे प्रकृत धर्म कहते हैं। देवि! इस प्रकार तुम्हें धर्मकी बात बतायी गयी है। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य-पालनपूर्वक शरीरत्यागका महान्‌ फल और काम, क्रोध आदिद्वारा देहत्याग करनेसे नरककी प्राप्ति] उमोवाच मानुषेष्वेव जीवत्सु गतिर्विज्ञायते न वा । यथा शुभगतिर्जीवन्‌ नासौ त्वशुभभागिति ।। एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे शंसितुमर्हसि । उमाने पूछा--प्रभो! मनुष्योंके जीते-जी उनकी गतिका ज्ञान होता है या नहीं? शुभगतिवाले मनुष्यका जैसा जीवन है, वैसा ही अशुभ गतिवालेका नहीं हो सकता। इस विषयको मैं सुनना चाहती हूँ, आप मुझे बताइये ।। श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि जीवितं विद्यते यथा । द्विविधा: प्राणिनो लोके दैवासुरसमाश्रिता: ।। श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! प्राणियोंका जीवन जैसा होता है, वह मैं तुम्हें बताऊँगा। संसारमें दो प्रकारके प्राणी होते हैं--एक दैवभावके आश्रित और दूसरे आसुरभावके आश्रित ।। मनसा कर्मणा वाचा प्रतिकूला भवन्ति ये । तादृशानासुरान्‌ विद्धि मर्त्यास्ते नरकालया: ।। जो मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा सबके प्रतिकूल ही आचरण करते हैं, उनको आसुर समझो। उन्हें नरकमें निवास करना पड़ता है ।। हिंस्राश्षोराश्च धूर्ताश्ष परदाराभिमर्शका: । नीचकर्मरता ये च शौचमड्नलवर्जिता: ।। शुचिविद्वेषिण: पापा लोकचारित्रदूषका: । एवंयुक्तसमाचारा जीवन्तो नरकालया: ।। जो हिंसक, चोर, धूर्त, परस्त्रीगामी, नीचकर्म-परायण, शौच और मंगलाचारसे रहित, पवित्रतासे द्वेष रखनेवाले, पापी और लोगोंके चरित्रपर कलंक लगानेवाले हैं, ऐसे आचारवाले अर्थात्‌ आसुरी स्वभाववाले मनुष्य जीते-जी ही नरकमें पड़े हुए हैं ।। लोकोद्वेगकराश्चान्ये पशवश्च सरीसूपा: । वृक्षा: कण्टकिनो रूक्षास्तादृशान्‌ विद्धि चासुरान्‌ ।। जो लोगोंको उद्वेगमें डालनेवाले पशु, साँप-विच्छू आदि जन्तु तथा रूखे और कँटीले वृक्ष हैं, वे सब पहले आसुर स्वभावके मनुष्य ही थे, ऐसा समझो ।। अपरान्‌ देवपफक्षांस्तु शूणु देवि समाहिता ।। मनोवाक्कर्मभिर्नित्यमनुकूला भवन्ति ये । तादृशानमरान्‌ विद्धि ते नरा: स्वर्गगामिन:ः ।। देवि! अब तुम एकाग्रचित्त होकर दूसरे देव-पक्षीय अर्थात्‌ दैवी प्रकृतिवाले मनुष्योंका परिचय सुनो। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा सबके अनुकूल होते हैं, ऐसे मनुष्योंको अमर (देवता) समझो। वे स्वर्गगामी होते हैं ।। शौचार्जवपरा धीरा: परार्थान्‌ न हरन्ति ये । ये समा: सर्वभूतेषु ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो शौच और सरलतामें तत्पर तथा धीर हैं, जो दूसरोंके धनका अपहरण नहीं करते हैं और समस्त प्राणियोंके प्रति समानभाव रखते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। धार्मिका: शौचसम्पन्ना: शुक्ला मधुरवादिन: । नाकार्य मनसेच्छन्ति ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो धार्मिक, शौचाचारसम्पन्न, शुद्ध और मधुरभाषी होकर कभी मनसे भी न करने योग्य कार्य करना नहीं चाहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। दरिद्रा अपि ये केचिद्‌ याचिता: प्रीतिपूर्वकम्‌ । ददत्येव च यत्‌ किंचित्‌ ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो कोई दरिद्र होनेपर भी किसी याचकके माँगनेपर उसे प्रसन्नतापूर्वक कुछ-न-कुछ देते ही हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।। आस्तिका मड़लपरा: सततं वृद्धसेविन: । पुण्यकर्मपरा नित्यं ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो आस्तिक, मंगलपरायण, सदा बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेवाले और प्रतिदिन पुण्यकर्ममें संलग्न रहनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। निर्ममा निरहंकारा: सानुक्रोशा: स्वबन्धुषु । दीनानुकम्पिनो नित्यं ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो ममता और अहंकारसे शून्य, अपने बन्धुजनोंपर अनुग्रह रखनेवाले और सदा दीनोंपर दया करनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। स्वदुःखमिव मन्यन्ते परेषां दुःखवेदनम्‌ | गुरुशुश्रूषणपरा देवब्राह्मणपूजका: ।। कृतज्ञा: कृतविद्याश्न ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो दूसरोंकी दुःख-वेदनाको अपने दुःखके समान ही मानते हैं, गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहते हैं, देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, कृतज्ञ तथा दिद्वान्‌ हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। जितेन्द्रिया जितक्रोधा जितमानमदास्तथा | लोभमात्सर्यहीना ये ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। शक्‍्त्या चाभ्यवपद्यन्ते ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो जितेन्द्रिय, क्रोधपर विजय पानेवाले और मान तथा मदको परास्त करनेवाले हैं तथा जिनमें लोभ और मात्सर्यका अभाव है, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं; जो यथाशक्ति परोपकारमें तत्पर रहते हैं, वे मनुष्य भी स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। व्रतिनो दानशीलाशक्ष धर्मशीलाश्ष मानवा: । ऋणजवो मृदवो नित्यं ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो व्रती, दानशील, धर्मशील, सरल और सदा कोमलतापूर्ण बर्ताव करनेवाले हैं, वे मनुष्य सदा स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। ऐहिकेन तु वृत्तेन पारत्रमनुमीयते । एवंविधा नरा लोके जीवन्त: स्वर्गगामिन: ।। इस लोकके आचारसे परलोकमें प्राप्त होनेवाली गतिका अनुमान किया जाता है। जगत्‌में ऐसा जीवन बितानेवाले मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। यदन्यच्च शुभ लोके प्रजानुग्रहकारि च । पशवश्चैव वृक्षाश्न॒ प्रजानां हितकारिण: ।। तादृशान्‌ देवपक्षस्थानिति विद्धि शुभानने ।। लोकमें और भी जो शुभ एवं प्रजापर अनुग्रह करनेवाला कर्म है, वह स्वर्गकी प्राप्तिका साधन है। शुभानने! जो प्रजाका हित करनेवाले पशु एवं वृक्ष हैं, उन सबको देवपक्षीय जानो ।। शुभाशुभमयं लोके सर्व स्थावरजड्भमम्‌ । दैवं शुभमिति प्राहुरासुरं चाशुभं प्रिये ।। जगत्‌में सारा चराचरसमुदाय शुभाशुभमय है। प्रिये! इनमें जो शुभ है, उसे दैव और जो अशुभ है, उसे आसुर समझो ।। उमोवाच भगवन्‌ मानुषा: केचित्‌ कालधर्ममुपस्थिता: । प्राणमोक्ष॑ं कथं कृत्वा परत्र हितमाप्तुयु: ।। उमाने पूछा--भगवन्‌! जो कोई मनुष्य मृत्युके निकट पहुँचे हुए हैं, वे किस प्रकार अपने प्राणोंका परित्याग करें, जिससे परलोकमें उन्हें कल्याणकी प्राप्ति हो? ।। श्रीमहेश्वर उवाच हन्त ते कथयिष्यामि शृणु देवि समाहिता । द्विविधं मरणं लोके स्वभावाद यत्नस्तथा ।। श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे इस विषयका वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। लोकमें दो प्रकारकी मृत्यु होती है, एक स्वाभाविक और दूसरी यत्नसाध्य ।। तयो: स्वभावं नापायं यत्नतः करणोद्धवम्‌ | एतयोरुभयोर्देवि विधानं शृणु शोभने ।। देवि! इन दोनोंमें जो स्वाभाविक मृत्यु है, वह अटल है, उसमें कोई बाधा नहीं है। परंतु जो यत्नसाध्य मृत्यु है, वह साधनसामग्रीद्वारा सम्भव होती है। शोभने! इन दोनोंमें जो विधान है, वह मुझसे सुनो ।। कल्याकल्यशरीरस्य यत्नजं द्विविध॑ स्मृतम्‌ । यत्नजं नाम मरणमात्मत्यागो मुमूर्षया ।। जो यत्नसाध्य मृत्यु है, वह समर्थ और असमर्थ शरीरसे सम्बन्ध रखनेके कारण दो प्रकारकी मानी गयी है। मरनेकी इच्छासे जो जान-बूझकर अपने शरीरका परित्याग किया जाता है, उसीका नाम है यत्नसाध्य मृत्यु ।। तत्राकल्यशरीरस्य जरा व्याधिश्व॒ कारणम्‌ | महाप्रस्थानगमनं तथा प्रायोपवेशनम्‌ ।। जलावगाहनं चैव अग्निचित्याप्रवेशनम्‌ । एवं चतुर्विध: प्रोक्त आत्मत्यागो मुमूर्षताम्‌ ।। जो असमर्थ शरीरसे युक्त है अर्थात्‌ बुढ़ापेके कारण या रोगके कारण असमर्थ हो गया है, उसकी मृत्युमें कारण है महाप्रस्थानगमन, आमरण उपवास, जलमें प्रवेश अथवा चिताकी आगमें जल मरना। यह चार प्रकारका देहत्याग बताया गया है, जिसे मरनेकी इच्छावाले पुरुष करते हैं ।। एतेषां क्रमयोगेन विधानं शृणु शोभने ।। स्वधर्मयुक्तं गार्हस्थ्यं चिरमूढवा विधानतः । तत्रानृण्यं च सम्प्राप्य वृद्धो वा व्याधितोडपि वा ।। दर्शयित्वा स्वदौर्बल्यं सवनिवानुमान्य च । सर्व विहाय बन्धूंश्ष कर्मणां भरणं तथा ।। दानानि विधिवत कृत्वा धर्मकार्यार्थमात्मन: । अनुज्ञाप्य जन सर्व वाचा मधुरया ब्रुवन्‌ ।। अदह्ततं वस्त्रमाच्छाद्य बद्ध्वा तत्‌ कुशरज्जुना । उपस्पृश्य प्रतिज्ञाय व्यवसायपुरस्सरम्‌ ।। परित्यज्य ततो ग्राम्यं धर्म कुर्याद्‌ यथेप्सितम्‌ ।। शोभने! अब क्रमश: इनकी विधि सुनो-मनुष्य स्वधर्मयुक्त गार्ईस्थ-आश्रमका दीर्घकालतक विधिपूर्वक निर्वाह करके उससे उऋण हो वृद्ध अथवा रोगी हो जानेपर अपनी दुर्बलता दिखा सभी लोगोंसे गृहत्यागके लिये अनुमति ले फिर समस्त भाई-बन्धुओं और कर्मानुष्ठानोंका त्याग करके अपने धर्मकार्यके लिये विधिवत्‌ दान करनेके पश्चात्‌ मीठी वाणी बोलकर सब लोगोंसे आज्ञा ले नूतन वस्त्र धारण करके उसे कुशकी रस्सीसे बाँध ले। इसके बाद आचमनपूर्वक दृढ़ निश्चयके साथ आत्मत्यागकी प्रतिज्ञा करके ग्राम्यधर्मको छोड़कर इच्छानुसार कार्य करे ।। महाप्रस्थानमिच्छेच्चेत्‌ प्रतिछेतोत्तरां दिशम्‌ ।। भूत्वा तावन्निराहारो यावत्‌ प्राणविमोक्षणम्‌ | चेष्टाहानौ शयित्वापि तन्मना: प्राणमुत्सूजेत्‌ ।। एवं पुण्यकृतां लोकानमलानू प्रतिपद्यते ।। यदि महाप्रस्थानकी इच्छा हो तो निराहार रहकर जबतक प्राण निकल न जायँ तबतक उत्तर दिशाकी ओर निरन्तर प्रस्थान करे। जब शरीर निश्रेष्ट हो जाय, तब वहीं सोकर उस परमेश्वरमें मन लगाकर प्राणोंका परित्याग कर दे। ऐसा करनेसे वह पुण्यात्माओंके निर्मल लोकोंको प्राप्त होता है ।। प्रायोपवेशनं चेच्छेत्‌ तेनेव विधिना नर: । देशे पुण्यतमे श्रेष्ठे निराहारस्तु संविशेत्‌ ।। यदि मनुष्य प्रायोपवेशन (आमरण उपवास) करना चाहे तो पूर्वोक्त विधिसे ही घर छोड़कर परम पवित्र श्रेष्ठठम देशमें निराहार होकर बैठ जाय ।। आप्राणान्तं शुचिर्भूत्वा कुर्वन्‌ दानं स्वशक्तित: । हरिं स्मरंस्त्यजेत्‌ प्राणानेष धर्म: सनातन: ।। जबतक प्राणोंका अन्त न हो तबतक शुद्ध होकर अपनी शक्तिके अनुसार दान करते हुए भगवानके स्मरण-पूर्वक प्राणोंका परित्याग करे। यह सनातन धर्म है ।। एवं कलेवरं त्यक्त्वा स्वर्गलोके महीयते ।। अग्निप्रवेशनं चेच्छेत्‌ तेनेव विधिना शुभे । कृत्वा काष्ठमयं चित्यं पुण्यक्षेत्रे नदीषु वा ।। दैवतेभ्यो नमस्कृत्वा कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्‌ । भूत्वा शुचिर्व्यवसित: स्मरन्‌ नारायणं हरिम्‌ ।। ब्राह्म॒णेभ्यो नमस्कृत्वा प्रविशेदग्निसंस्तरम्‌ ।। शुभे! इस प्रकार शरीरका त्याग करके मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यदि मनुष्य अग्निमें प्रवेश करना चाहे तो उसी विधिसे विदा लेकर किसी पुण्यक्षेत्रमें अथवा नदियोंके तटपर काठकी चिता बनावे। फिर देवताओंको नमस्कार और परिक्रमा करके शुद्ध एवं दृढ़निश्चयसे युक्त हो श्रीनारायण हरिका स्मरण करते हुए ब्राह्मणोंको मस्तक नवाकर उस प्रज्वलित चिताग्निमें प्रवेश कर जाय ।। सो<पि लोकान्‌ यथान्यायं प्राप्तुयात्‌ पुण्यकर्मणाम्‌ ।। जलावगाहन चेच्छेत्‌ तेनेव विधिना शुभे । ख्याते पुण्यतमे तीर्थे निमज्जेत्‌ सुकृतं स्मरन्‌ ।। सो5पि पुण्यतमॉल्लोकान्‌ निसर्गात्‌ प्रतिपद्यते ।। ऐसा पुरुष भी यथोचितरूपसे उक्त कार्य करके पुण्यात्माओंके लोक प्राप्त कर लेता है। शुभे! यदि कोई जलमें प्रवेश करना चाहे तो उसी विधिसे किसी विख्यात पवित्रतम तीर्थमें पुण्पका चिन्तन करते हुए डूब जाय। ऐसा मनुष्य भी स्वभावतः पुण्यतम लोकोंमें जाता है ।। ततः कल्यशरीरस्य संत्यागं शृणु तत्त्वतः ।। रक्षार्थ क्षत्रियस्येष्ट: प्रजापालनकारणात्‌ ।। योधानां भर्तपिण्डार्थ गुर्वर्थ ब्रह्मचारिणाम्‌ । गोब्राह्मणार्थ सर्वेषां प्राणत्यागो विधीयते ।। इसके बाद समर्थ शरीरवाले पुरुषके आत्मत्यागकी तात्त्विक विधि बताता हूँ, सुनो। क्षत्रियके लिये दीन-दुःखियोंकी रक्षा और प्रजापालनके निमित्त प्राणत्याग अभीष्ट बताया गया है। योद्धा अपने स्वामीके अन्नका बदला चुकानेके लिये, ब्रह्मचारी गुरुके हितके लिये तथा सब लोग गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये अपने प्राणोंको निछावर कर दें, यह शास्त्रका विधान है ।। स्वराज्यरक्षणार्थ वा कुनूपैः पीडिता: प्रजा: । मोक्तुकामस्त्यजेत्‌ प्राणान्‌ युद्धमार्गे यथाविधि ।। राजा अपने राज्यकी रक्षाके लिये अथवा दुष्ट नरेशोंद्वारा पीड़ित हुई प्रजाको संकटसे छुड़ानेके लिये विधिपूर्वक युद्धके मार्गपर चलकर प्राणोंका परित्याग करे ।। सुसन्नद्धो व्यवसित: सम्प्रविश्यापराड्मुख: ।। एवं राजा मृत: सद्यः स्वर्गलोके महीयते । तादृशी सुगतिनस्ति क्षत्रियस्य विशेषतः ।। जो राजा कवच बाँधकर मनमें दृढ़ निश्चय ले युद्धमें प्रवेश करके पीठ नहीं दिखाता और शत्रुओंका सामना करता हुआ मारा जाता है, वह तत्काल स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। सामान्यतः सबके लिये और विशेषत:ः क्षत्रियके लिये वैसी उत्तम गति दूसरी नहीं है ।। भृत्यो वा भर्तपिण्डार्थ भर्तृकर्मण्युपस्थिते | कुर्वस्तत्र तु साहाय्यमात्मप्राणानपेक्षया ।। स्वाम्यर्थ संत्यजेत्‌ प्राणान्‌ पुण्याल्‍लोकान्‌ स गच्छति । स्पृहणीय: सुरगणैस्तत्र नास्ति विचारणा ।। जो भृत्य स्वामीके अन्नका बदला देनेके लिये उनका कार्य उपस्थित होनेपर अपने प्राणोंका मोह छोड़कर उनकी सहायता करता है और स्वामीके लिये प्राण त्याग देता है, वह देवसमूहोंके लिये स्पृहणीय हो पुण्यलोकोंमें जाता है। इस विषयमें कोई विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। एवं गोब्राद्माणार्थ वा दीनार्थ वा त्यजेत्‌ तनुम्‌ । सो<पि पुण्यमवाप्नोति आनृशंस्यव्यपेक्षया ।। इत्येते जीवितत्यागे मार्गास्ते समुदाह्मता: ।। इस प्रकार जो गौओं, ब्राह्मणों तथा दीन-दु:खियोंकी रक्षाके लिये शरीरका त्याग करता है, वह भी दयाधर्मको अपनानेके कारण पुण्यलोकोंमें जाता है। इस तरह ये प्राणत्यागके समुचित मार्ग तुम्हें बताये गये हैं ।। कामात्‌ क्रोधाद्‌ भयाद्‌ वापि यदि चेत्‌ संत्यजेत्‌ तनुम्‌ । सो<नन्तं नरकं याति आत्महन्तृत्वकारणात्‌ ।। यदि कोई काम, क्रोध अथवा भयसे शरीरका त्याग करे तो वह आत्महत्या करनेके कारण अनन्त नरकमें जाता है ।। स्वभावं मरणं नाम न तु चात्मेच्छया भवेत्‌ । यथा मृतानां यत्‌ कार्य तनन्‍्मे शृणु यथाविधि ।। स्वाभाविक मृत्यु वह है, जो अपनी इच्छासे नहीं होती, स्वतः प्राप्त हो जाती है। उसमें जिस प्रकार मरे हुए लोगोंके लिये जो कर्तव्य है, वह मुझसे विधिपूर्वक सुनो ।। तत्रापि मरणं त्यागो मूढत्यागाद्‌ विशिष्यते । भूमौ संवेशयेद्‌ देहं नरस्य विनशिष्यत: ।। निर्जीवं वृणुयात्‌ सद्यो वाससा तु कलेवरम्‌ । माल्यगन्धैरलड्कृत्य सुवर्णेन च भामिनि ।। श्मशाने दक्षिणे देशे चिताग्नौ प्रदहेन्मृतम्‌ । अथवा निक्षिपेद्‌ भूमौ शरीरं जीववर्जितम्‌ ।। उसमें भी जो मरण या त्याग होता है, वह किसी मूर्खके देहत्यागसे बढ़कर है। मरनेवाले मनुष्यके शरीरको पृथ्वीपर लिटा देना चाहिये और जब प्राण निकल जाय, तब तत्काल उसके शरीरको नूतन वस्त्रसे ढक देना चाहिये। भामिनि! फिर उसे माला, गन्ध और सुवर्णसे अलंकृत करके श्मशान-भूमिमें दक्षिण दिशाकी ओर चिताकी आगमें उस शवको जला देना चाहिये। अथवा निर्जीव शरीरको वहाँ भूमिपर ही डाल दे ।। दिवा च शुक्लपक्षश्न उत्तरायणमेव च । मुमूर्षणां प्रशस्तानि विपरीत तु गर्हितम्‌ ।। दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायणका समय मुमूर्षुओंके लिये उत्तम है। इसके विपरीत रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन निन्दित हैं ।। औदकं चाष्टकाश्राद्ध बहुभि्बहुभि: कृतम्‌ । आप्यायन मृतानां तत्‌ परलोके भवेच्छुभम्‌ ।। एतत्‌ सर्व मया प्रोक्तं मानुषाणां हितं वच: ।। बहुत-से पुरुषोंद्वारा किया गया जलदान और अष्टकाश्राद्ध परलोकमें मृत पुरुषोंको तृप्त करनेवाला और शुभ होता है। यह सब मैंने मनुष्योंके लिये हितकारक बात बतायी है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता] उमोवाच देवदेव नमस्ते5स्तु कालसूदन शंकर । लोकेषु विविधा धर्मस्त्वत्प्रसादान्मया श्रुता: ।। विशिष्ट सर्वधर्मेभ्य: शाश्वृतं ध्रुवमव्ययम्‌ । उमाने कहा--देवदेव! कालसूदन शंकर! आपको नमस्कार है। आपकी कृपासे मैंने अनेक प्रकारके धर्म सुने। अब यह बताइये कि सम्पूर्ण धर्मोंसे श्रेष्ठ सनातन, अटल और अविनाशी धर्म क्‍या है? ।। नारद उवाच एवं पृष्टस्त्वया देव्या महादेव: पिनाकधृक्‌ । प्रोवाच मधुरं वाक्यं सूक्ष्ममध्यात्मसंश्रितम्‌ ।। नारदजीने कहा--देवी पार्वतीके इस प्रकार पूछनेपर पिनाकधारी महादेवजीने सूक्ष्म अध्यात्मभावसे युक्त मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा ।। श्रीमहेश्वर उवाच न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामासि निश्चयम्‌ । एतदेव विशिष्ट ते यत्‌ त्वं पृच्छसि मां प्रिये ।। श्रीमहेश्वर बोले--महाभागे! तुमने न्‍्यायत: सुननेकी निश्चित इच्छा प्रकट की है, प्रिये! तुम मुझसे जो पूछती हो, यही तुम्हारा विशिष्ट गुण है ।। सर्वत्र विहितो धर्म: स्वर्गलोकफलाश्रित: । बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ।। सर्वत्र स्वर्गलोकरूपी फलके आश्रयभूत धर्मका विधान किया गया है। धर्मके बहुत-से द्वार हैं और उसकी कोई क्रिया यहाँ निष्फल नहीं होती ।। यस्मिन्‌ यस्मिंश्व विषये यो यो याति विनिश्चयम्‌ । त॑ तमेवाभिजानाति नान्यं धर्म शुचिस्मिते ।। शुचिस्मिते! जो-जो जिस-जिस विषयमें निश्चयको प्राप्त होता है, वह-वह उसी-उसीको धर्म समझता है, दूसरेको नहीं ।। शृणु देवि समासेन मोक्षद्वारमनुत्तमम्‌ | एतद्धि सर्वधर्माणां विशिष्टे शुभमव्ययम्‌ ।। देवि! अब तुम संक्षेपसे परम उत्तम मोक्ष-द्वारका वर्णन सुनो। यही सब धर्मोंमें उत्तम, शुभ और अविनाशी है ।। नास्ति मोक्षात्‌ परं देवि नास्ति मोक्षात्‌ परा गतिः । सुखमात्यन्तिकं श्रेष्ठमनिवृत्तं च तद्‌ विदु: ।। देवि! मोक्षसे उत्तम कोई तत्त्व नहीं है और मोक्षसे श्रेष्ठ कोई गति नहीं है। ज्ञानी पुरुष मोक्षको कभी निवृत्त न होनेवाला, श्रेष्ठ एवं आत्यन्तिक सुख मानते हैं ।। नात्र देवि जरा मृत्यु: शोको वा दुःखमेव वा | अनुत्तममचिन्त्यं च तद्‌ देवि परमं सुखम्‌ ।। देवि! इसमें जरा, मृत्यु, शोक अथवा दु:ख नहीं है। वह सर्वोत्तम अचिन्त्य परम सुख है ।। ज्ञानानामुत्तमं ज्ञानं मोक्षज्ञानं विदुर्बुधा: । ऋषिभिद्देवसड्घैश्न प्रोच्यते परमं पदम्‌ ।। विद्वान्‌ पुरुष मोक्षज्ञानको सब ज्ञानोंमें उत्तम मानते हैं। ऋषि और देवसमुदाय उसे परमपद कहते हैं ।। नित्यमक्षरमक्षो भ्यमजेयं शाश्वतं शिवम्‌ | विशन्ति तत्‌ पदं प्राज्ञा: स्पृहणीयं सुरासुरै: ।। नित्य, अविनाशी, अक्षोभ्य, अजेय, शाश्वत और शिवस्वरूप वह मोक्षपद देवताओं और असुरोंके लिये भी स्पृहणीय है। ज्ञानी पुरुष उसमें प्रवेश करते हैं ।। दुःखादिदश्व दुरन्तश्न संसारो<यं प्रकीर्तित: । शोकव्याधिजरादोषैर्मरणेन च संयुतः ।। यह संसार आदि और अन्तमें दुःखमय कहा गया है। यह शोक, व्याधि, जरा और मृत्युके दोषोंसे युक्त है ।। यथा ज्योतिर्गणा व्योम्नि निवर्तन्ते पुनः पुनः । एवं जीवा अमी लोके निवर्तन्ते पुन: पुन: ।। तस्य मोक्षस्य मार्गो<यं श्रूयतां शुभलक्षणे ।। ब्रह्मादिस्थावरान्तश्न संसारो यः प्रकीर्तित: । संसारे प्राणिन: सर्वे निवर्तन्ते यथा पुनः ।। जैसे आकाशमें नक्षत्रगण बारंबार आते और निवृत्त हो जाते हैं, उसी प्रकार ये जीव लोकमें बारंबार लौटते रहते हैं। शुभलक्षणे! उसके मोक्षका यह मार्ग सुनो। ब्रह्माजीसे लेकर स्थावर वृक्षोंतक जो संसार बताया गया है, इसमें सभी प्राणी बारंबार लौटते हैं ।। तत्र संसारचक्रस्य मोक्षो ज्ञानेन दृश्यते । अध्यात्मतत्त्वविज्ञानं ज्ञानमित्यभिधीयते ।। ज्ञानस्य ग्रहणोपायमाचारं ज्ञानिनस्तथा । यथावत्‌ सम्प्रवक्ष्यामि तत्‌ त्वमेकमना: शृणु ।। वहाँ संसार-चक्रका ज्ञानके द्वारा मोक्ष देखा जाता है। अध्यात्मतत्त्वको अच्छी तरह समझ लेना ही ज्ञान कहलाता है। प्रिये! उस ज्ञानको ग्रहण करनेका जो उपाय है तथा ज्ञानीका जो आचार है, उसका मैं यथावत्‌ रूपसे वर्णन करूँगा। तुम एकचित्त होकर इसे सुनो ।। ब्राह्मण: क्षत्रियो वापि भूत्वा पूर्व गृहे स्थित: । आनृण्यं सर्वतः प्राप्प ततस्तान्‌ संत्यजेद्‌ गृहान्‌ ।। ततः संत्यज्य गार्हस्थ्यं निश्चितो वनमाश्रयेत्‌ ।। वने गुरुं समाज्ञाय दीक्षितो विधिपूर्वकम्‌ | दीक्षां प्राप्प यथान्यायं स्ववृत्तं परिपालयेत्‌ ।। गृह्लीयादप्युपाध्यायान्मोक्षज्ञानमनिन्दित: । द्विविधं च पुनर्मोक्ष॑ सांख्यं योगमिति स्मृति: ।। ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय पहले घरमें स्थित रहकर सब प्रकारके ऋणोंसे उऋण हो अन्तमें उन घरोंका परित्याग कर दे। इस तरह गार्हस्थ्य-आश्रमको त्यागकर वह निश्चितरूपसे वनका आश्रय ले। वनमें गुरुकी आज्ञा ले विधिपूर्वक दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षा पाकर यथोचित रीतिसे अपने सदाचारका पालन करे। तदनन्तर गुरुसे मोक्षज्ञानको ग्रहण करे और अनिन्द्य आचरणसे रहे। मोक्ष भी दो प्रकारका है--एक सांख्य-साध्य और दूसरा योग- साध्य। ऐसा शास्त्रका कथन है ।। पज्चविंशतिविज्ञानं सांख्यमित्यभिधीयते । ऐश्वर्य देवसारूप्यं योगशास्त्रस्य निर्णय: ।। तयोरन्यतरं ज्ञानं शूणुयाच्छिष्यतां गत: । नाकालो नाप्यकाषायी नाप्यसंवत्सरोषित: । नासांख्ययोगो नाश्रद्धं गुरुणा स्नेहपूर्वकम्‌ ।। पचीस तत्त्वोंका ज्ञान सांख्य कहलाता है। अणिमा आदि ऐश्वर्य और देवताओंके समान रूप--यह योग-शास्त्रका निर्णय है। इन दोनोंमेंसे किसी एक ज्ञानका शिष्यभावसे श्रवण करे। न तो असमयमें, न गेरुआ वस्त्र धारण किये बिना, न एक वर्षतक गुरुकी सेवामें रहे बिना, न सांख्य या योगमेंसे किसीको अपनाये बिना और न श्रद्धाके बिना ही गुरुका स्नेहपूर्वक उपदेश ग्रहण करे ।। सम: शीतोष्णहर्षादीन्‌ विषहेत स वै मुनि: ।। अमृष्य: क्षुत्पिपासाभ्यामुचिते भ्यो निवर्तयेत्‌ । त्यजेत्‌ संकल्पजान _ग्रन्थीन्‌ सदा ध्यानपरो भवेत्‌ ।। कुण्डिका चमसं शिकयं छत्र॑ यष्टिमुपानहौ । चैलमित्येव नैतेषु स्थापयेत्‌ स्वाम्यमात्मन: ।। गुरो: पूर्व समुत्तिछ्ठेज्जघन्यं तस्य संविशेत्‌ । नैवाविज्ञाप्य भर्तारमावश्यकमपि व्रजेत्‌ ।। द्विरह्वि सनानशाटेन संध्ययोरभिषेचनम्‌ । एककालाशबनं चास्य विहितं यतिभि: पुरा ।। जो सर्वत्र समान भाव रखते हुए सर्दी-गर्मी और हर्ष-शोक आदि द्वल्ोंको सहन करे, वही मुनि है। भूख-प्यासके वशीभूत न हो, उचित भोगोंसे भी अपने मनको हटा ले, संकल्पजनित ग्रन्थियोंको त्याग दे और सदा ध्यानमें तत्पर रहे। कुंडी, चमस (प्याली), छींका, छाता, लाठी, जूता और वस्त्र--इन वस्तुओंमें भी अपना स्वामित्व स्थापित न करे। गुरुसे पहले उठे और उनसे पीछे सोवे। स्वामी (गुरु) को सूचित किये बिना किसी आवश्यक कार्यके लिये भी न जाय। प्रतिदिन दिनमें दो बार दोनों संध्याओंके समय वस्त्रसहित स्नान करे। उसके लिये चौबीस घंटेमें एक समय भोजनका विधान है। पूर्वकालके यतियोंने ऐसा ही किया है ।। भैक्ष॑ सर्वत्र गृह्लीयाच्चिन्तयेत्‌ सततं निशि । कारणे चापि सम्प्राप्ते न कुप्पेत कदाचन ।। सर्वत्र भिक्षा ग्रहण करे, रातमें सदा परमात्माका चिन्तन करे, कोपका कारण प्राप्त होनेपर भी कभी कुपित न हो ।। ब्रह्मचर्य वने वास: शौचमिन्द्रियसंयम: । दया च सर्वभूतेषु तस्य धर्म: सनातन: ।। ब्रह्मचर्य, वनवास, पवित्रता, इन्द्रियसंयम और समस्त प्राणियोंपर दया--यह संन्‍न्यासीका सनातन धर्म है ।। विमुक्त: सर्वपापेभ्यो लघ्वाहारो जितेन्द्रिय: । आत्मयुक्तः: परां बुद्धि लभते पापनाशिनीम्‌ ।। वह समस्त पापोंसे दूर रहकर हल्का भोजन करे, इन्द्रियोंको संयममें रखे और परमात्मचिन्तनमें लगा रहे। इससे उसे पापनाशिनी श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्त होती है ।। यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम्‌ । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।। अनिष्ठरोडनहड्कारो निर्दन्द्रो वीतमत्सर: । वीतशोकभयाबाध: पद प्राप्नोत्यनुत्तमम्‌ ।। तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी समलोष्टाश्मकाछ्चन: । सम: शत्रौ च मित्रे च निर्वाणमधिगच्छति ।। जब मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीके प्रति पापभाव नहीं करता, तब वह यति ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। निछ्लुरताशून्य, अहंकाररहित, द्वन््धातीत और मात्सर्यहीन यति शोक, भय और बाधासे रहित हो सर्वोत्तम ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। जिसकी दृष्टिमें निन्‍्दा और स्तुति समान है, जो मौन रहता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझता है तथा जिसका शत्रु और मित्रके प्रति समभाव है, वह निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है ।। एवंयुक्तसमाचारस्तत्परो< ध्यात्मचिन्तक: । ज्ञानाभ्यासेन तेनैव प्राप्रोति परमां गतिम्‌ ।। ऐसे आचरणसे युक्त, तत्पर और अध्यात्मचिन्तननशील यति उसी ज्ञानाभ्याससे परमगतिको प्राप्त कर लेता है ।। अनुद्धिग्नमतेर्जन्तोरस्मिन्‌ संसारमण्डले । शोकव्याधिजरादु:खैरनिरवाणं नोपपद्यते ।। तस्मादुद्वेशजननं मनो5वस्थापनं तथा । ज्ञान ते सम्प्रवक्ष्यामि तन्मूलममृतं हि वै ।। इस संसार-मण्डलमें जिस प्राणीकी बुद्धि उद्वेगशून्य है, वह शोक, व्याधि और वृद्धावस्थाके दु:खोंसे मुक्त हो निर्वाणको प्राप्त होता है। इसलिये संसारसे वैराग्य उत्पन्न करानेवाले और मनको स्थिर रखनेवाले ज्ञानका तुम्हारे लिये उपदेश करूँगा; क्योंकि अमृत (मोक्ष) का मूल कारण ज्ञान ही है ।। शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्‌ ।। शोकके सहस्रों और भयके सैकड़ों स्थान हैं। वे मूर्ख मनुष्यपर ही प्रतिदिन प्रभाव डालते हैं, विद्वानपर नहीं ।। नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते । अहो दुःखमिति ध्यायन्‌ शोकस्य पदमाव्रजेत्‌ ।। धन नष्ट हो जाय अथवा स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु हो जाय, तो “अहो! मुझपर बड़ा भारी दुःख आ गया।” ऐसा सोचता हुआ मनुष्य शोकके आश्रयमें आ जाता है ।। द्रव्येषु समतीतेषु ये शुभास्तान्‌ न चिन्तयेत्‌ । ताननाद्रियमाणस्य शोकबन्ध: प्रणश्यति ।। किसी भी द्रव्यके नष्ट हो जानेपर जो उसके शुभ गुण हैं, उनका चिन्तन न करे। उन गुणोंका आदर न करनेवाले पुरुषके शोकका बन्धन नष्ट हो जाता है ।। सम्प्रयोगादनिष्टस्य विप्रयोगात्‌ प्रियस्य च । मानुषा मानसैर्दु:खै: संयुज्यन्ते5ल्पबुद्धय: ।। अप्रिय वस्तुका संयोग और प्रिय वस्तुका वियोग प्राप्त होनेपर अल्पबुद्धि मनुष्य मानसिक दु:खोंसे संयुक्त हो जाते हैं ।। मृतं वा यदि वा नष्ट योइतीतमनुशोचति । संतापेन च युज्येत तच्चास्य न निवर्तते ।। उत्पन्नमिह मानुष्ये गर्भप्रभृति मानवम्‌ । विविधान्युपवर्तन्ते दुः:खानि च सुखानि च ।। जो मरे हुए पुरुष या खोयी हुई वस्तुके लिये शोक करता है, वह केवल संतापका भागी होता है। उसका वह दुःख मिटता नहीं है। मनुष्य-योनिमें उत्पन्न हुए मानवके पास गर्भावस्‍थासे ही नाना प्रकारके दुःख और सुख आते रहते हैं ।। तयोरेकतरो मार्गो यद्येनमभिसंनमेत्‌ | सुखं प्राप्प न संदहृष्येन्न दुःखं प्राप्प संज्वरेत्‌ ।। उनमेंसे कोई एक मार्ग यदि इसे प्राप्त हो तो यह मनुष्य सुख पाकर हर्ष न करे और दुःख पाकर चिन्तित न हो ।। दोषदर्शी भवेत्‌ तत्र यत्र स्नेह: प्रवर्तते । अनिष्टेनान्वितं प्रश्येद्‌ यथा क्षिप्रं विरज्यते ।। जहाँ आसक्ति हो रही हो, वहाँ दोष देखना चाहिये। उस वस्तुको अनिष्टकी दृष्टिसे देखे, जिससे उसकी ओरसे शीघ्र ही वैराग्य हो जाय ।। यथा काष्ठ च काष्ठं च समेयातां महोदधौ । समेत्य च व्यपेयातां तद्वज्ज्ञातिसमागम: ।। जैसे महासागरमें दो काठ इधर-उधरसे आकर मिल जाते हैं और मिलकर फिर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार जाति-भाइयोंका समागम होता है ।। अदर्शनादापतिताः: पुनश्चादर्शनं गता: । स्नेहस्तत्र न कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्ुवः ।। सब लोग अदृश्य स्थानसे आये थे और पुनः अदृश्य स्थानको चले गये। उनके प्रति स्नेह नहीं करना चाहिये; क्योंकि उनके साथ वियोग होना निश्चित था ।। कुट॒म्बपुत्रदाराश्ष शरीरं धनसंचय: । ऐश्वर्य स्वस्थता चेति न मुहोत्‌ तत्र पण्डित: ।। सुखमेकान्ततो नास्ति शक्रस्यापि त्रिविष्टपे । तत्रापि सुमहद्‌ दु:ःखं सुखमल्पतरं भवेत्‌ ।। कुटम्ब, पुत्र, स्त्री, शरीर, धनसंचय, ऐश्वर्य और स्वस्थता--इनके प्रति विद्वान्‌ पुरुषको आसक्त नहीं होना चाहिये। स्वर्गमें रहनेवाले देवराज इन्द्रको भी केवल सुख-ही-सुख नहीं मिलता। वहाँ भी दुःख अधिक और सुख बहुत कम है ।। न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम्‌ । सुखस्यानन्तरं दुःखं दु:ःखस्यानन्तरं सुखम्‌ ।। किसीको भी न तो सदा दुःख मिलता है और न सदा सुख ही मिलता है। सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता रहता है ।। क्षयान्ता निचया: सर्वे पतनान्ता: समुच्छूया: । संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्‌ ।। उच्छुयान्‌ विनिपातांश्व दृष्टवा प्रत्यक्षतः स्वयम्‌ । अनित्यमसुखं चेति व्यवस्येत्‌ सर्वमेव च ।। सारे संग्रहोंका अन्त विनाश है, सारी उन्नतियोंका अन्त पतन है, संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है। उत्थान और पतनको स्वयं ही प्रत्यक्ष देखकर यह निश्चय करे कि यहाँका सब कुछ अनित्य और दुःखरूप है ।। अर्थानामा्जने दु:खमार्जितानां तु रक्षणे । नाशे दु:खं व्यये दुःखं धिगर्थ दुःखभाजनम्‌ ।। धनके उपार्जनमें दुःख होता है, उपार्जित हुए धनकी रक्षामें दुःख होता है, धनके नाश और व्ययमें भी दुःख होता है, इस प्रकार दुःखके भाजन बने हुए धनको धिककार है ।। अर्थवन्तं नरं नित्यं पञ्चाभिष्नन्ति शत्रव: | राजा चोरश्न दायादा भूतानि क्षय एव च ।। अर्थमेवमनर्थस्य मूलमित्यवधारय । न हानर्था: प्रबाधन्ते नरमर्थविवर्जितम्‌ ।। धनवान मनुष्यपर सदा पाँच शत्रु चोट करते रहते हैं--राजा, चोर, उत्तराधिकारी भाई- बन्धु, अन्यान्य प्राणी तथा क्षय। प्रिये! इस प्रकार तुम अर्थको अनर्थका मूल समझो। धनरहित पुरुषको अनर्थ बाधा नहीं देते हैं ।। अर्थप्राप्तिर्महद्‌ दुःखमाकिंचन्यं परं सुखम्‌ | उपद्रवेषु चार्थानां दुः:खं हि नियतं भवेत्‌ ।। धनकी प्राप्ति महान्‌ दुःख है और अकिंचनता (निर्धनता) परम सुख है; क्योंकि जब धनपर उपद्रव आते हैं, तब निश्चय ही बड़ा दुःख होता है ।। धनलोभेन तृष्णाया न तृप्तिरुपलभ्यते । लब्धाश्रयो विवर्धेत समिद्ध इव पावक: ।। धनके लोभसे तृष्णाकी कभी तृप्ति नहीं होती है। तृष्णा या लोभको आश्रय मिल जाय तो प्रज्वलित अग्निके समान उसकी वृद्धि होने लगती है ।। जित्वापि पृथिवीं कृत्स्नां चतु:सागरमेखलाम्‌ । सागराणां पुन: पारं जेतुमिच्छत्यसंशयम्‌ ।। चारों समुद्र जिसकी मेखला है, उस सारी पृथ्वीको जीतकर भी मनुष्य संतुष्ट नहीं होता। वह फिर समुद्रके पारवाले देशोंको भी जीतनेकी इच्छा करता है, इसमें संशय नहीं है ।। अलं परिग्रहेणेह दोषवान्‌ हि परिग्रह: । कोशकार: कृमिर्देवि बध्यते हि परिग्रहात्‌ ।। परिग्रह (संग्रह) से यहाँ कोई लाभ नहीं; क्योंकि परिग्रह दोषसे भरा हुआ है। देवि! रेशमका कीड़ा परिग्रहसे ही बन्धनको प्राप्त होता है ।। एको<पि पृथिवीं कृत्स्नामेकच्छत्रां प्रशास्ति च । एकस्मिन्नेव राष्ट्रे तु स चापि निवसेन्नूपः ।। तस्मिन्‌ राष्ट्रेषपि नगरमेकमेवाधितिष्ठति । नगरे<पि गृहं चैक॑ भवेत्‌ तस्य निवेशनम्‌ ।। जो राजा अकेला ही समूची पृथ्वीका एकच्छत्र शासन करता है। वह भी किसी एक ही राष्ट्रमें निवास करता है। उस राष्ट्रमें भी किसी एक ही नगरमें रहता है। उस नगरमें भी किसी एक ही घरमें उसका निवास होता है ।। एक एव प्रदिष्ट: स्थादावासस्तदगृहेडपि च । आवासे शयनं चैकं निशि यत्र प्रलीयते ।। उस घरमें भी उसके लिये एक ही कमरा नियत होता है। उस कमरेमें भी उसके लिये एक ही शय्या होती है, जिसपर वह रातमें सोता है ।। शयनस्यार्धमेवास्य स्त्रियाक्षार्ध विधीयते । तदनेन प्रसड्रेन स्वल्पेनैवेह युज्यते ।। सर्व ममेति सम्मूढो बल॑ पश्यति बालिश: । एवं सर्वोपयोगेषु स्वल्पमस्य प्रयोजनम्‌ ।। तण्डुलप्रस्थमात्रेण यात्रा स्यात्‌ सर्वदेहिनाम्‌ ततो भूयस्तरो भोगो दुःखाय तपनाय च ।। उस शय्याका भी आधा ही भाग उसके पल्‍ले पड़ता है। उसका आधा भाग उसकी रानीके काम आता है। इस प्रसंगसे वह अपने लिये थोड़ेसे ही भागका उपयोग कर पाता है। तो भी वह मूर्ख गवाँर सारे भूमण्डलको अपना ही समझता है और सर्वत्र अपना ही बल देखता है। इस प्रकार सभी वस्तुओंके उपयोगोंमें उसका थोड़ा-सा ही प्रयोजन होता है। प्रतिदिन सेरभर चावलसे ही समस्त देहधारियोंकी प्राणयात्राका निर्वाह होता है। उससे अधिक भोग दुःख और संतापका कारण होता है ।। नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्‌ । सर्वान्‌ कामान्‌ परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ।। तृष्णाके समान कोई दुःख नहीं है, त्यागके समान कोई सुख नहीं है। समस्त कामनाओंका परित्याग करके मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।। या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्य॑ति जीर्यत: । योडसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजत: सुखम्‌ ।। खोटी बुद्धिवाले मनुष्योंके लिये जिसका त्याग करना अत्यन्त कठिन है; जो मनुष्यके बूढ़े हो जानेपर स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जिसे प्राणनाशक रोग कहा गया है, उस तृष्णाका त्याग करनेवालेको ही सुख मिलता है ।। न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ।। भोगोंकी तृष्णा कभी भोग भोगनेसे शान्त नहीं होती, अपितु घीसे प्रज्वलित होनेवाली आगके समान अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है ।। अलाभेनैव कामानां शोकं त्यजति पण्डित: । आयासविटपस्तीव्र: कामाग्नि: कर्षणारणि: ।। इन्द्रियार्थेन सम्मोहा दहत्यकुशलं जनम्‌ ।। भोगोंकी प्राप्ति न होनेसे ही विद्वान्‌ पुरुष शोकको त्याग देता है। आयासरूपी वृक्षपर तीव्रवेगसे प्रजजलित और आकर्षणरूपी अग्निसे प्रकट हुई कामनारूप अग्नि मूर्ख मनुष्यको विषयोंद्वारा मोहित करके जला डालती है ।। यत्‌ पृथिव्यां ब्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय: । नालमेकस्य पर्याप्तमिति पश्यन्‌ न मुहाृति ।। इस पृथ्वीपर जो धान, जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर एक पुरुषके लिये पर्याप्त नहीं हैं। ऐसा देखने और समझनेवाला पुरुष मोहमें नहीं पड़ता है ।। यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्‌ सुखम्‌ | तृष्णाक्षयसुखस्यैते नाहत: षोडशीं कलाम्‌ ।। लोकमें जो काम-सुख है और परलोकमें जो महान्‌ दिव्य सुख है--ये दोनों मिलकर तृष्णाक्षयजनित सुखकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते ।। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु नैव धीरो नियोजयेत्‌ । मन:षष्ठानि संयम्य नित्यमात्मनि योजयेत्‌ ।। इन्द्रियाणां विसर्गेण दोषमृच्छत्यसंशयम्‌ । संनियम्य नु तान्येव ततः सिद्धिमवाप्रुयात्‌ ।। षण्णामात्मनि युक्तानामैश्वर्य योडधिगच्छति । न च पापैर्न चानर्थ: संयुज्येत विचक्षण: ।। धीर पुरुष अपनी इन्द्रियोंको विषयोंमें न लगावे। मनसहित उनका संयम करके उन्हें सदा परमात्माके ध्यानमें नियुक्त करे। इन्द्रियोंको खुली छोड़ देनेसे निश्चय ही दोषकी प्राप्ति होती है और उन्हींका संयम कर लेनेसे मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो परमात्म- चिन्तनमें लगी हुई मनसहित छहों इन्द्रियोंपर प्रभुत्व स्थापित कर लेता है, वह विद्वान्‌ पापों और अनर्थोसे संयुक्त नहीं होता है ।। अप्रमत्त: सदा रक्षेदिन्द्रियाणि विचक्षण: । अरक्षितेषु तेष्वाशु नरो नरकमेति हि ।। विद्वान पुरुष सावधान रहकर सदा अपनी इन्द्रियोंकी रक्षा करे; क्योंकि उनकी रक्षा न होनेपर मनुष्य शीघ्र ही नरकमें गिर जाता है ।। हृदि काममयश्रित्रो मोहसंचयसम्भव: । अज्ञानरूढमूलस्तु विधित्सापरिषेचन: ।। रोषलोभमहास्कन्ध: पुरा दुष्कृतसारवान्‌ | आयासविटपस्तीव्रशोकपुष्पो भयाड्कुर: ।। नानासंकल्पपत्राढ्य: प्रमादात्‌ परिवर्धित: । महतीभि: पिपासाभि: समन्तात्‌ परिवेष्टित: ।। संरोहत्यकृतप्रज्ञे पादप: कामसम्भव: ।। नैव रोहति तत्त्वज्ञे रूढो वा छिद्यते पुन: ।। कृच्छोपायेष्वनित्येषु निस्सारेषु फलेषु च । दुःखादिषु दुरन्तेषु कामयोगेषु का रति: ।। एक काममय वृक्ष है, जो मोह-संचयरूपी बीजसे उत्पन्न हुआ है। वह काममय विचित्र वृक्ष हृदयदेशमें ही स्थित है। अज्ञान ही उसकी मजबूत जड़ है। सकाम कर्म करनेकी इच्छा ही उसे सींचना है। रोष और लोभ ही उसका विशाल तना है। पाप ही उसका सार भाग है। आयास-प्रयास ही उसकी शाखाएँ हैं। तीव्रशोक पुष्प है, भय अंकुर है। नाना प्रकारके संकल्प उसके पत्ते हैं। यह प्रमादसे बढ़ा हुआ है। बड़ी भारी पिपासा या तृष्णा ही लता बनकर उस काम-वृक्षमें सब ओर लिपटी हुई है। अज्ञानी मनुष्यमें ही यह काममय वृक्ष उत्पन्न होता और बढ़ता है। तत्त्वज्ञ पुरुषमें यह नहीं अंकुरित होता है। यदि हुआ भी तो पुनः कट जाता है। यह काम कठिन उपायोंसे साध्य है, अनित्य है, उसके फल नि:सार हैं, उसका आदि और अन्त भी दुःखमय है, उससे सम्बन्ध जोड़नेमें क्या अनुराग हो सकता है? ।। इन्द्रियेषु च जीर्यत्सु च्छिद्यमाने तथा55युषि । पुरस्ताच्च स्थिते मृत्यौ कि सुखं पश्यत: शुभे ।। शुभे! इन्द्रियाँ सदा जीर्ण हो रही हैं, आयु नष्ट होती चली जा रही है और मौत सामने खड़ी है--यह सब देखते हुए किसीको संसारमें क्या सुख प्रतीत होगा? ।। व्याधिभि: पीड्यमानस्य नित्यं शारीरमानसै: । नरस्याकृतकृत्यस्य कि सुखं मरणे सति ।। मनुष्य सदा शारीरिक और मानसिक व्याधियोंसे पीड़ित होता है और अपनी अधूरी इच्छाएँ लिये ही मर जाता है। अतः यहाँ कौन-सा सुख है? ।। संचिन्तयानमेवार्थ कामानामवितृप्तकम्‌ । व्यात्र: पशुमिवारण्ये मृत्युरादाय गच्छति ।। जन्ममृत्युजरादु:खै: सततं समभिद्रुत: । संसारे पच्यमानस्तु पापान्नोद्विजते जन: ।। मानव अपने मनोरथोंकी पूर्तिका उपाय सोचता रहता है और कामनाओंसे अतृप्त ही बना रहता है। तभी जैसे जंगलमें बाघ आकर सहसा किसी पशुको दबोच लेता है, उसी प्रकार मौत उसे उठा ले जाती है। जन्म, मृत्यु और जरा-सम्बन्धी दुःखोंसे सदा आक्रान्त होकर संसारमें मनुष्य पकाया जा रहा है, तो भी वह पापसे उद्विग्न नहीं हो रहा है ।। उमोवाच केनोपायेन मर्त्यानां निवर्तेते जरान्तकौ | यद्यस्ति भगवन्‌ महा[मेतदाचक्ष्व मा चिरम्‌ ।। उमाने पूछा--भगवन्‌! मनुष्योंकी वृद्धावस्था और मृत्यु किस उपायसे निवृत्त होती है? यदि इसका कोई उपाय है तो यह मुझे बताइये, विलम्ब न कीजिये ।। तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन वा । रसायनप्रयोगैर्वा केनात्येति जरान्तकौ ।। महान्‌ तप, कर्म, शास्त्रज्ञान अथवा रासायनिक प्रयोग--किस उपायसे मनुष्य जरा और मृत्युको लाँध सकता है? ।। श्रीमहेश्वर उवाच नैतदस्ति महाभागे जरामृत्युनिवर्तनम्‌ । सर्वलोकेषु जानीहि मोक्षादन्यत्र भामिनि ।। श्रीमहेश्वरने कहा--महाभागे! ऐसी बात नहीं होती। भामिनि! तुम यह जान लो कि सम्पूर्ण संसारमें मोक्षके सिवा अन्यत्र जरा और मृत्युकी निवृत्ति नहीं होती ।। न धनेन न राज्येन नाग्रयेण तपसापि वा । मरणं नातितरते विना मुक्त्या शरीरिण: ।। आत्माकी मुक्तिके बिना मनुष्य न तो धनसे, न राज्यसे और न श्रेष्ठ तपस्यासे ही मृत्युको लाँध सकता है ।। अश्वमेधसहस््राणि वाजपेयशतानि च । न तरन्ति जरामृत्यू निर्वाणाधिगमाद्‌ विना ।। सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ भी मोक्षकी उपलब्धि हुए बिना जरा और मृत्युको नहीं लाँध सकते ।। ऐश्वर्य धनधान्यं च विद्यालाभस्तपस्तथा । रसायनप्रयोगो वा न तरन्ति जरान्तकौ ।। ऐश्वर्य, धन-धान्य, विद्यालाभ, तप और रसायनप्रयोग--ये कोई भी जरा और मृत्युके पार नहीं जा सकते ।। देवदानवगन्धर्वकिन्नरोरगराक्षसान्‌ | स्ववशे कुरुते कालो न कालस्यास्त्यगोचर: ।। न हाहानि निवर्तन्ते न मासा न पुन: क्षपा: | सो<यं प्रपद्यतेडध्वानमजसंतर ध्रुवमव्ययम्‌ ।। स्रवन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितामिव । आयुरादाय मर्त्यानामहोरात्रेषु संततम्‌ ।। देवता, दानव, गन्धर्व, किन्नर, नाग तथा राक्षसोंको भी काल अपने वशमें कर लेता है। कोई भी कालकी पहुँचसे परे नहीं है। गये हुए दिन, मास और रात्रियाँ फिर नहीं लौटती हैं। यह जीवात्मा उस निरन्तर चालू रहनेवाले अटल और अविनाशी मार्गको ग्रहण करता है। सरिताओंके स्रोतकी भाँति बीतती हुई आयुके दिन वापस नहीं लौटते हैं। दिन और रातोंमें व्याप्त हुई मनुष्योंकी आयु लेकर काल यहाँसे चल देता है ।। जीवितं सर्वभूतानामक्षय: क्षपयन्नसौ | आदित्यो हाुस्तमभ्येति पुन: पुनरुदेति च ।। अक्षय सूर्य सम्पूर्ण प्राणियोंक जीवनको क्षीण करता हुआ अस्त होता और पुनः उदय होता रहता है ।। रात्र्यां रात्र्यां व्यतीतायामायुरल्पतरं भवेत्‌ | गाधोदके मत्स्य इव कि नु तस्य कुमारता ।। एक-एक रात बीतनेपर आयु बहुत थोड़ी होती चली जाती है। जैसे थाह जलमें रहनेवाला मत्स्य सुखी नहीं रहता, उसी प्रकार जिसकी आयु क्षीण होती जा रही है, उस परिमित आयुवाले पुरुषको कुमारावस्थाका क्या सुख है? ।। मरणं हि शरीरस्य नियतं ध्रुवमेव च । तिष्ठन्नपि क्षणं सर्व: कालस्यैति वशं पुन: ।। शरीरकी मृत्यु निश्चित और अटल है। सब लोग यहाँ क्षणभर ठहरकर पुनः कालके अधीन हो जाते हैं ।। न म्रियेरन्‌ न जीर्येरन्‌ यदि स्यु: सर्वदेहिन: । न चानिष्टं प्रवर्तेत शोको वा प्राणिनां क्वचित्‌ ।। यदि समस्त देहधारी प्राणी न मरें और न बूढ़े हों तो न उन्हें अनिष्टकी प्राप्ति हो और न शोककी ही ।। अप्रमत्त: प्रमत्तेषु कालो भूतेषु तिष्ठति । अप्रमत्तस्य कालस्य क्षयं प्राप्तो न मुच्यते ।। श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम्‌ | को<पि तद्‌ वेद यत्रासौ मृत्युना नाभिवीक्षित: ।। समस्त प्राणियोंके असावधान रहनेपर भी काल सदा सावधान रहता है। उस सावधान कालके आश्रयमें आया हुआ कोई भी प्राणी बच नहीं सकता। कलका कार्य आज ही कर डाले, जिसे अपराक्ञमें करना हो उसे पूर्वाह्गमें ही पूरा कर डाले। कौन उस स्थानको जानता है, जहाँ उसपर मृत्युकी दृष्टि नहीं पड़ी होगी ।। वर्षास्विदं करिष्यामि इदं ग्रीष्मवसन्तयो: । इति बालकश्रचिन्तयति अन्तरायं न बुध्यते ।। इदं मे स्यादिदं मे स्यादित्येव॑ं मनसा नरा: । अनवाप्तेषु कामेषु द्वियन्ते मरणं प्रति ।। कालपाशेन बद्धानामहन्यहनि जीर्यताम्‌ । का श्रद्धा प्राणिनां मार्गे विषमे भ्रमतां सदा ।। युवैव धर्मशील: स्यादनिमित्तं हि जीवितम्‌ । फलानामिव पक्‍दवानां सदा हि पतनाद्‌ भयम्‌ ।। अविवेकी मनुष्य यह सोचता रहता है कि आगामी बरसातमें यह कार्य करूँगा और गर्मी तथा वसन्‍्त ऋतुमें अमुक कार्य आरम्भ करूँगा; परंतु उसमें जो मौत विघ्न बनकर खड़ी रहती है, उसकी ओर उसका ध्यान नहीं जाता है। 'मेरे पास यह हो जाय, वह हो जाय' इस प्रकार मन-ही-मन मनुष्य मनसूबे बाँधा करता है। उसकी कामनाएँ अप्राप्त ही रह जाती हैं और वह मृत्युकी ओर खिंचता चला जाता है। कालके बन्धनमें बँधकर प्रतिदिन जीर्ण होते और विषम-मार्गमें भटकते हुए प्राणियोंका इस जीवनपर क्या विश्वास हो सकता है। युवावस्थासे ही मनुष्य धर्मशील हो; क्योंकि जीवनका कोई सुदृढ़ निमित्त नहीं है। इसे पके हुए फलोंकी भाँति सदा ही पतनका भय बना रहता है ।। मर्त्यस्य किमु तैदरि: पुत्रैभोगि: प्रियैरपि । एकाह्ला सर्वमुत्सृज्य मृत्योस्तु वशमन्वियात्‌ ।। मनुष्यको उन स्त्रियों, पुत्रों और प्रिय भोगोंसे भी क्या प्रयोजन है, जब कि वह एक ही दिनमें सबको छोड़कर मृत्युकी ओर चला जाता है ।। जायमानांश्व सम्प्रेक्ष्य प्रियमाणांस्तथैव च । न संवेगो<स्ति चेत्‌ पुंसः काछलोष्टसमो हि सः ।। विनाशिनो हाध्रुवजीवितस्य कि बन्धुभिममित्रपरिग्रहैश्न । विहाय यद्‌ गच्छति सर्वमेवं क्षणेन गत्वा न निवर्तते च ।। संसारमें जन्म लेने और मरनेवालोंको देखकर भी यदि मनुष्यको वैराग्य नहीं होता तो वह चेतन नहीं, काठ और मिट्टीके ढेलेके समान जड है। जो विनाशशील है, जिसका जीवन निश्चित नहीं है, ऐसे पुरुषको बन्धुओं और मित्रोंके संग्रहसे क्या प्रयोजन है? क्योंकि वह सबको क्षणभरमें छोड़कर चल देता है और जाकर फिर कभी लौटता नहीं है ।। एवं चिन्तयतो नित्य॑ं सर्वार्थानामनित्यताम्‌ | उद्वेगो जायते शीघ्र निर्वाणस्य परस्परम्‌ ।। तेनोद्वेगेन चाप्यस्य विमर्शो जायते पुनः । विमर्शो नाम वैराग्यं सर्वद्रव्येषु जायते ।। वैराग्येण परां शान्तिं लभन्ते मानवा: शुभे । मोक्षस्योपनिषद्‌ दिव्यं वैराग्यमिति निश्चितम्‌ ।। एतत्‌ ते कथितं देवि वैराग्योत्पादनं वच: । एवं संचिन्त्य संचिन्त्य मुच्यन्ते हि मुमुक्षव: ।। इस प्रकार सदा सभी पदार्थोंकी अनित्यताका चिन्तन करते हुए पुरुषको शीघ्र ही एक दूसरेसे वैराग्य होता है, जो मोक्षका कारण है। उस उद्वेगसे उसके मनमें पुनः विमर्श पैदा होता है। समस्त द्रव्योंकी ओरसे जो वैराग्य पैदा होता है, उसीका नाम विमर्श है। शुभे! वैराग्यसे मनुष्योंको बड़ी शान्ति मिलती है। वैराग्य मोक्षका निकटतम एवं दिव्य साधन है, यह निश्चितरूपसे कहा गया है। देवि! यह तुमसे वैराग्य उत्पन्न करनेवाला वचन कहा गया है। मुमुक्षु पुरुष इस प्रकार बारंबार विचार करनेसे मुक्त हो जाते हैं ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन] श्रीमहेश्वर उवाच सांख्यज्ञानं प्रवक्ष्यामि यथावत्‌ ते शुचिस्मिते । यज्ज्ञात्वा न पुनर्मर्त्य: संसारेषु प्रवर्तते ।। श्रीमहेश्वरने कहा--शुचिस्मिते! अब मैं तुमसे सांख्यज्ञानका यथावत्‌ वर्णन करूँगा, जिसे जानकर मनुष्य फिर संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता ।। ज्ञानेनैव विमुक्तास्ते सांख्या: संन्यासकोविदा: । शारीरं तु तपो घोर सांख्या: प्राहुर्निरर्थकम्‌ ।। संन्यासकुशल सांख्यज्ञानी ज्ञानसे ही मुक्त हो जाते हैं। वे घोर शारीरिक तपको व्यर्थ बताते हैं ।। पज्चविंशतिकं ज्ञानं तेषां ज्ञानमिति स्मृतम्‌ । मूलप्रकृतिरव्यक्तमव्यक्ताज्जायते महान्‌ ।। महतो भूदहंकारस्तस्मात्‌ तन्मात्रपठचकम्‌ | इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्रेभ्यो भवन्त्युत ।। तेभ्यो भूतानि पठ्च भ्य: शरीर वै प्रवर्तते । इति क्षेत्रस्य संक्षेप: चतुर्विशतिरिष्यते ।। पज्चविंशतिरित्याहु: पुरुषेणेह संख्यया ।। पचीस तत्त्वोंका ज्ञान ही सांख्यज्ञान माना गया है। मूलप्रकृतिको अव्यक्त कहते हैं, अव्यक्तसे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है। महत्तत्त्व्से अहंकार प्रकट होता है और अहंकारसे पाँच तन्मात्राओंकी उत्पत्ति होती है। तन्मात्राओंसे दस इन्द्रियों और एक मनकी उत्पत्ति होती है। उनसे पाँच भूत प्रकट होते हैं और पाँच भूतोंसे इस शरीरका निर्माण होता है। यही क्षेत्रका संक्षेप स्वरूप है। इसीको चौबीस तत्त्वोंका समुदाय कहते हैं। इनमें पुरुषकी भी गणना कर लेनेपर कुल पचीस तत्त्व बताये गये हैं ।। सत्त्वं रजस्तमश्नेति गुणा: प्रकृतिसम्भवा: । तै: सृजत्यखिलं लोकं प्रकृतिस्त्वात्मजैर्गुणै: ।। इच्छा द्वेष: सुखं दुःखं सड्घातश्वेतना धृति: । विकारा: प्रकृतेश्चैते वेदितव्या मनीषिभि: ।। सत्त्व, रज और तम--ये तीन प्रकृतिजनित गुण हैं। प्रकृति इन तीनों आत्मज गुणोंसे सम्पूर्ण लोककी सृष्टि करती है। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल शरीर, चेतना और धृति-- इन्हें मनीषी पुरुषोंको प्रकृतिके विकार जानना चाहिये ।। लक्षणं चापि सर्वेषां विकल्पस्त्वादित: पृथक्‌ विस्तरेणैव वक्ष्यामि तस्य व्याख्यामहं शृणु ।॥। इन सबका लक्षण और आरम्भसे ही पृथक्‌-पृथक्‌ विकल्प मैं विस्तारपूर्वक बताऊँगा, उसकी व्याख्या सुनो ।। नित्यमेकमणु व्यापि क्रियाहीनमहेतुकम्‌ । अग्राह्ममिन्द्रियै: सर्वरेतदव्यक्तलक्षणम्‌ ।। अव्यक्तं प्रकृतिर्मूलं प्रधानं योनिरव्ययम्‌ । अव्यक्तस्यैव नामानि शब्दै: पर्यायवाचकै: ।। नित्य, एक, अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक, क्रियाहीन, हेतुरहित और सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्म होना-यह अव्यक्तका लक्षण है। अव्यक्त, प्रकृति, मूल, प्रधान, योनि और अविनाशी--इन पर्यायवाची शब्दोंद्वारा अव्यक्तके ही नाम बताये जाते हैं ।। तत्‌ सूक्ष्मत्वादनिर्देश्यं तत्‌ सदित्यभिधीयते । तन्मूलं च जगत्‌ सर्व तन्मूला सृष्टिरिष्यते ।। वह अव्यक्त अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण अनिर्देश्य है--उसका वाणीद्वारा कोई संकेत नहीं किया जा सकता। वह 'सत' कहलाता है। सम्पूर्ण जगत्‌का मूल वही है और सृष्टिका मूल भी उसीको बताया गया है ।। सत्त्वादय: प्रकृतिजा गुणास्तान्‌ प्रब्रवीम्पहम्‌ ।। सुखं तुष्टि: प्रकाशश्न॒ त्रयस्ते सात्चिका गुणा: । रागद्वेषौ सुखं दुःखं स्तम्भश्न रजसो गुणा: ।। सत्त्व आदि जो प्राकृत गुण हैं, उनको बता रहा हूँ। सुख, संतोष, प्रकाश--ये तीन सात्विक गुण हैं। राग-द्वेष, सुख-दुःख तथा उद्दण्डता--ये रजोगुणके गुण हैं ।। अप्रकाशो भयं मोहस्तन्द्री च तमसो गुणा: ।। श्रद्धा प्रहर्षो विज्ञानमसम्मोहो दया धृति: । सच्चे प्रवृद्धे वर्धन्ते विपरीते विपर्यय: ।। प्रकाशका अभाव, भय, मोह और आलस्यको तमोगुणके गुण समझो । श्रद्धा, हर्ष, विज्ञान, असम्मोह, दया और धैर्य--ये भाव सत्त्वगुणके बढ़नेपर बढ़ते हैं और तमोगुणके बढ़नेपर इनके विपरीत भाव अश्रद्धा आदिकी वृद्धि होती है ।। कामक्रोधौ मनस्तापो लोभो मोहस्तथा मृषा । प्रवृद्धे परिवर्धन्ते रजस्येतानि सर्वश:ः ।। विषाद: संशयो मोहस्तन्द्री निद्रा भयं तथा । तमस्येतानि वर्धन्ते प्रवृद्धे हेत्वहेतुकम्‌ ।। काम, क्रोध, मानसिक संताप, लोभ, मोह (आसक्ति) तथा मिथ्याभाषण--ये सारे दोष रजोगुणकी वृद्धि होनेपर बढ़ते हैं। विषाद, संशय, मोह, आलस्य, निद्रा, भय-ये तमोगुणकी वृद्धि होनेपर बढ़ते हैं ।। एवमन्योन्यमेतानि वर्धन्ते च पुनः पुनः । हीयन्ते च तथा नित्यमभि भूतानि भूरिश: ।। इस प्रकार ये तीनों गुण बारंबार परस्पर बढ़ते हैं और एक-दूसरेसे अभिभूत होनेपर सदा ही क्षीण होते हैं ।। तत्र यत्‌ प्रीतिसंयुक्ते कायेन मनसापि वा । वर्तते सात्विको भाव इत्युपेक्षेतर तत्‌ तदा ।। यदा संतापसंयुक्तं चित्तक्षो भकरं भवेत्‌ | वर्तते रज इत्येव तदा तदभिचिन्तयेत्‌ ।। इनमें शरीर अथवा मनसे जो प्रसन्नतायुक्त भाव हो, उसे सात््विक भाव है--ऐसा माने और अन्य भावोंकी उपेक्षा कर दे। जब चित्तमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला संतापयुक्त भाव हो, तब उसे रजोगुणकी प्रवृत्ति माने ।। यदा सम्मोहसंयुक्तं यद्‌ विषादकरं भवेत्‌ । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत्‌ ।। समासात्‌ सात्त्विको धर्म: समासाद्‌ राजसं धनम्‌ | समासात्‌ तामस: कामस्टत्रिवर्गे त्रिगुणा: क्रमात्‌ ।। ब्रह्मादिदेवसृष्टिरया सात्त्विकीति प्रकीर्त्यते । राजसी मानुषी सृष्टि: तिर्यग्योनिस्तु तामसी ।। जब मोहसयुक्त और विषाद उत्पन्न करनेवाला भाव अतर्क्य और अज्ञातरूपसे प्रकट हो, तब उसे तमोगुणका कार्य समझना चाहिये। धर्म सात््विक है, धन राजस है और काम तामस बताया गया है। इस प्रकार त्रिवर्गमें क्रमश: तीनों गुणोंकी स्थिति संक्षेपमें बतायी गयी है। ब्रह्मा आदि देवताओंकी जो सृष्टि है, वह सात््विकी बतायी जाती है। मनुष्योंकी राजसी सृष्टि है और तिर्यग्योनि तामसी कही गयी है ।। ऊर्ध्व॑ गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा: । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा: ।। देवमानुषतिर्यक्षु यद्‌भूत॑ं सचराचरम्‌ | आदिदप्रभृति संयुक्त व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्गुणै: ।। अतः परं प्रवक्ष्यामि महदादीनि लिड्रत: । विज्ञानं च विवेकश्न महतो लक्षणं भवेत्‌ ।। सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाले पुरुष ऊर्ध्वलोक (स्वर्ग आदि) में जाते हैं, रजोगुणी पुरुष मध्यलोक (मनुष्य-योनि) में स्थित होते हैं और तमोगुणके कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्य आदिमें स्थित हुए तामस पुरुष अधोगतिको--कीट-पशु आदि नीच योनियोंको तथा नरक आदिको प्राप्त होते हैं। देवता, मनुष्य तथा तिर्यक्‌ आदि योनियोंमें जो चराचर प्राणी हैं, वे आदि कालसे ही इन तीनों गुणोंद्वारा संयुक्त एवं व्याप्त हैं। अब मैं महत्‌ आदि तत्त्वोंके लक्षण बताऊँगा। बुद्धिके द्वारा जो विवेक और ज्ञान होता है, वही शरीरमें महत्तत्त्वका लक्षण है ।। महान बुद्धिर्मति: प्रज्ञा नामानि महतो विदु: । अहड्कार: स विज्ञेयो लक्षणेन समासत: ।। अहड्कारेण भूतानां सर्गो नानाविधो भवेत्‌ | अहड्कारनिवृत्तिहि निर्वाणायोपपद्यते ।। महान, बुद्धि, मति और प्रजा--ये महत्तत्त्वके नाम माने गये हैं। संक्षेपसे लक्षणद्वारा अहंकारका विशेष ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। अहंकारसे ही प्राणियोंकी नाना प्रकारकी सृष्टि होती है। अहंकारकी निवृत्ति मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली होती है ।। खं वायुरग्नि: सलिल॑ पृथिवी चेति पञ्चमी । महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ।। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पाँचवीं पृथ्वी--ये पाँच महाभूत हैं। ये ही समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ।। शब्द: श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशसम्भवम्‌ । स्पर्शवत्‌ प्राणिनां चेष्टा पवनस्य गुणा: स्मृता: ।। शब्द, श्रवणेन्द्रिय तथा इन्द्रियोंके छिद्र--ये तीनों आकाशसे प्रकट हुए हैं। स्पर्श और प्राणियोंकी चेष्टा--ये वायुके गुण माने गये हैं ।। रूप॑ पाको$क्षिणी ज्योतिश्नत्वारस्तेजसो गुणा: । रस: स्नेहस्तथा जिद्दा शैत्यं च जलजा गुणा: ।। रूप, पाक, नेत्र और ज्योति--ये चार तेजके गुण हैं। रस, स्नेह, जिह्ला और शीतलता --ये चार जलके गुण हैं ।। गन्धो प्राणं शरीरं च पृथिव्यास्ते गुणास्त्रय: । इति सर्वगुणा देवि विख्याता: पाज्चभौतिका: ।। गन्ध, प्राणेन्द्रिय और शरीर--ये पृथ्वीके तीन गुण हैं। देवि! इस प्रकार पाँचों भूतोंके समस्त गुण विख्यात हैं ।। गुणान्‌ पूर्वस्य पूर्वस्य प्राप्ुवन्त्युत्तराणि तु । तस्मान्नैकगुणाश्रैह दृश्यते भूतसृष्टय: ।। उपलकभ्याप्सु ये गन्धं केचिद्‌ ब्रूयुरनैपुणा: । अपां गन्धगुणं प्राज्ञा नेच्छन्ति कमलेक्षणे ।। उत्तरोत्तर भूत पूर्व-पूर्व भूतके गुण ग्रहण करते हैं। इसीलिये यहाँ प्राणियोंकी सृष्टि अनेक गुणोंसे युक्त दिखायी देती है। कमलेक्षणे! कुछ अयोग्य मनुष्य जो जलमें सुगन्ध या दुर्गन्ध पाकर गन्धको जलका गुण बताते हैं, उसे विद्वान्‌ पुरुष नहीं स्वीकर करते हैं ।। तद्‌ गन्धत्वमपां नास्ति पृथिव्या एव तद्‌ गुण: । भूमिर्गन्धे रसे स्नेहो ज्योतिश्चक्षुषि संस्थितम्‌ ।। जलमें गन्ध नहीं है, गन्ध पृथ्वीका ही गुण है। गन्धमें भूमि, रसमें जल तथा नेत्रमें तेजकी स्थिति है ।। प्राणापानाश्रयो वायु: खेष्वाकाश: शरीरिणाम्‌ | केशास्थिनखदन्तत्वक्पाणिपादशिरांसि च । पृष्ठोदरकटिग्रीवा: सर्व भूम्यात्मकं स्मृतम्‌ ।। प्राण और अपानका आश्रय वायु है। देहधारियोंके शरीरमें जितने छिद्र हैं, उन सबमें आकाश व्याप्त है। केश, हड्डी, नख, दाँत, त्वचा, हाथ, पैर, सिर, पीठ, पेट, कमर और गर्दन --ये सब भूमिके कार्य माने गये हैं ।। यत्‌ किंचिदपि काये5स्मिन्‌ धातुदोषमलाश्रितम्‌ | तत्‌ सर्व भौतिकं विद्धि देहैरेवास्य स्वामिकम्‌ ।। इस शरीरमें जो कुछ भी धातु, दोष और मल-सम्बन्धी वस्तुएँ हैं, उन सबको पांचभौतिक समझो। शरीरोंके द्वारा ही इस विश्वपर पंचभूतोंका स्वामित्व है ।। बुद्धीन्द्रियाणि कर्णत्वकुचक्षुर्जिह्नाथ नासिका | कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादीौ मेढ़ं गुदस्तथा ।। शब्द: स्पर्शक्ष रूपं च रसो गन्धक्ष॒ पठचम: । बुद्धीन्द्रियार्थान्‌ जानीयाद्‌ भूतेभ्यस्त्वभिनि:सृतान्‌ ।। कान, त्वचा, नेत्र, जिह्ला और नासिका--ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। हाथ, पैर, वाक, मेढ़ (लिंग) और गुदा--ये कर्मेन्द्रियाँ हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध--हन्हें ज्ञानेन्द्रियोंके विषय समझें। ये पाँचों भूतोंसे प्रकट हुए हैं ।। वाक्‍्यं क्रिया गति: प्रीतिरुत्सर्गश्षेत्रि पज्चधा । कर्मेन्द्रियार्थान्‌ू जानीयात्‌ ते च भूतोद्भवा मता: ।। इन्द्रियाणां तु सर्वेषामी श्वर॑ मन उच्यते । प्रार्थनालक्षणं तच्च इन्द्रियं तु मनः स्मृतम्‌ ।। वाक्य, क्रिया, गति, प्रीति और उत्सर्ग-ये पाँच कर्मन्द्रियोंके विषय जानें। ये भी पजञ्चभूतोंसे उत्पन्न हुए माने गये हैं। समस्त इन्द्रियोंका स्वामी या प्रेरक मन कहलाता है। उसका लक्षण है प्रार्थना (कैसी वस्तुकी चाह)। मनको भी इन्द्रिय ही माना गया है ।। नियुद्धक्ते च सदा तानि भूतानि मनसा सह । नियमे च विसगे च मनस: कारण प्रभु: ।। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्व॒ स्वभावश्नेतना धृति: । भूताभूतविकारश्न॒ शरीरमिति संस्थितम्‌ ।। जो प्रभु (आत्मा) मनके नियन्त्रण और सृष्टिमें कारण है, वही मनसहित सम्पूर्ण भूतोंकों सदा विभिन्न कार्योमें नियुक्त करता है। इन्द्रिय, इन्द्रियोंके विषय, स्वभाव, चेतना, धृति तथा भूताभूत-विकार--ये सब मिलकर शरीर हैं ।। शरीराच्च परो देही शरीरं च व्यपाश्रित: । शरीरिण: शरीरस्य सो&चन्‍्तरं वेत्ति वै मुनि: ।। शरीरसे परे शरीरधारी आत्मा है, जो शरीरका ही आश्रय लेकर रहता है। जो शरीर और शरीरीका अन्तर जानता है, वही मुनि है ।। रस: स्पर्शश्न गन्धश्न रूपं शब्दविवर्जितम्‌ | अशरीरं शरीरेषु दिदृक्षेत निरिन्द्रियम्‌ ।। रस, स्पर्श, गन्ध, रूप और शब्दसे रहित, इन्द्रियहीन अशरीरी आत्माको शरीरके भीतर देखनेकी इच्छा करे ।। अव्यक्तं सर्वदेहेषु मत्येंष्वमरमाश्रितम्‌ । यः पश्येत्‌ परमात्मानं बन्धनै: स विमुच्यते ।। जो सम्पूर्ण मर्त्य शरीरोंमें अव्यक्त भावसे स्थित एवं अमर है, उस परमात्माको जो देखता है, वह बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ।। स हि सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च । वसत्येको महावीययों नानाभावसमन्वित: ।। नैव चोर्ध्व न तिर्यक्‌ च नाथस्तान्न कदाचन । इन्द्रियैरिह बुद्ध्या वा न दृश्येत कदाचन ।। नाना भावोंसे युक्त वह महापराक्रमी परमात्मा अकेला ही सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें निवास करता है। वह न ऊपर, न अगल-बगलमें और न नीचे ही कभी दिखायी देता है। वह यहाँ इन्द्रियों अथवा बुद्धिके द्वारा कदापि दिखायी नहीं देता ।। नदद्वारं पुरं गत्वा सततं नियतो वशी । ईश्वर: सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च ।। तमेवाहुरणुभ्योडणुं त॑ं महद्भ्यो महत्तरम्‌ बहुधा सर्वभूतानि व्याप्य तिष्ठति शाश्वतम्‌ ।। क्षेत्रज्ममकतः कृत्वा सर्व क्षेत्रमथैकत: । एवं संविमृशेज्ज्ञानी संयत: सततं हृदि ।। नौ द्वारवाले नगर (शरीर) में जाकर वह सदा नियमपूर्वक निवास करता है। सबको वशमें रखता है। सम्पूर्ण लोकोंमें चराचर प्राणियोंका शासन करनेवाला ईश्वर भी वही है। उसे अणुसे भी अणु और महानसे भी महान्‌ कहते हैं। वह नाना प्रकारके सभी प्राणियोंको व्याप्त करके सदा स्थित रहता है। क्षेत्रञ्को एक ओर करके दूसरी ओर सम्पूर्ण क्षेत्रको पृथक्‌ करके रखे। संयमपूर्वक रहनेवाला ज्ञानी पुरुष सदा इस प्रकार अपने हृदयमें विचार करता रहे--जड और चेतनकी पृथक्‌ताका विवेचन किया करे ।। पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुड्क्ते प्रकृतिजान्‌ गुणान्‌ । अकतलिपको नित्यो मध्यस्थ: सर्वकर्मणाम्‌ ।। पुरुष प्रकृतिमें स्थित रहकर ही उससे उत्पन्न हुए त्रिगुणात्मक पदार्थोकोी भोगता है। वह अकर्ता, निर्लेप, नित्य और समस्त कर्मोका मध्यस्थ है ।। कार्यकरणकर्तत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते । पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ।। अजरो<डयमचिन्त्योडयमव्यक्तोडयं सनातन: । देही तेजोमयो देहे तिष्ठतीत्यपरे विदु: ।। अपरे सर्वलोकांश्व॒ व्याप्य तिष्ठन्तमी श्वरम्‌ । ब्रुवते केचिदत्रैव तिलतैलवदास्थितम्‌ ।। कार्य और करणको उत्पन्न करनेमें हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष (जीवात्मा) सुख-दुःखके भोक्तापनमें हेतु कहा जाता है। दूसरे लोग ऐसा मानते हैं कि तेजोमय आत्मा इस शरीरके भीतर स्थित है। यह अजर, अचिन्त्य, अव्यक्त और सनातन है। कुछ विचारक सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हुए परमेश्वरको ही तिलमें तेलकी भाँति इस शरीरमें जीवात्मारूपसे विद्यमान बताते हैं ।। अपरे नास्तिका मूढा भिन्नत्वात्‌ स्थूललक्षणै: । नास्त्यात्मेति विनिश्षित्य प्रजास्ते निरयालया: ।। एवं नानाविधानेन विमृशन्ति महेश्वरम्‌ ।। दूसरे मूर्ख नास्तिक मनुष्य स्थूल लक्षणोंसे भिन्न होनेके कारण आत्माकी सत्ता ही नहीं मानते हैं। “आत्मा नहीं है' ऐसा निश्चय कर वे लोग नरकके निवासी होते हैं। इस प्रकार महेश्वरके विषयमें नाना प्रकारसे विचार करते हैं ।। उमोवाच ऊहवान्‌ ब्राह्मणो लोके नित्यमक्षरमव्ययम्‌ | अस्त्यात्मा सर्वदेहेषु हेतुस्तत्र सुदुर्गमः ।। उमाने कहा--भगवन्‌! लोकमें जो विचारशील ब्राह्मण है, वह तो यही बताता है कि सम्पूर्ण शरीरमें नित्य, अक्षर, अविनाशी आत्मा अवश्य है। परंतु इसकी सत्यतामें क्या कारण है, इसे जानना अत्यन्त कठिन है ।। श्रीमहेश्वर उवाच ऋषिभि श्षापि देवैश्व व्यक्तमेष न दृश्यते । दृष्टवा तु तं महात्मानं पुनस्तन्न निवर्तते ।। तस्मात्‌ तद्दर्शनादेव विन्दते परमां गतिम्‌ | इति ते कथितो देवि सांख्यधर्म: सनातन: ।। कपिलादिभिराचार्य: सेवित: परमर्षिशभि: ।। श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! ऋषि और देवता भी इस परमात्माको प्रत्यक्ष नहीं देख पाते हैं। जो वास्तवमें उन परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है, वह पुनः इस संसारमें नहीं लौटता है। देवि! अतः उस परमात्माके दर्शनसे ही परमगतिकी प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार यह सनातन सांख्यधर्म तुम्हें बताया गया है; जो कपिल आदि आचार्यों एवं महर्षियोंद्वारा सेवित है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन] श्रीमहेश्वर उवाच सांख्यज्ञाने नियुक्तानां यथावत्‌ कीर्तितं मया । योगथधर्म पुनः कृत्स्नं कीर्तयिष्यामि ते शूणु ।। श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! जो लोग सांख्यज्ञानमें नियुक्त हैं, उनके धर्मका मैंने यथावत्‌ रूपसे वर्णन किया। अब तुमसे पुनः सम्पूर्ण योगधर्मका प्रतिपादन करूँगा, सुनो ।। स च योगो द्विधा भिन्नो ब्रह्मुदेवर्षिसम्मत: । समानमुभयत्रापि वृत्तं शास्त्रप्रचोदितम्‌ ।। वह ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंद्वारा सम्मत योग सबीज और निर्बीजके भेदसे दो प्रकारका है। उन दोनोंमें ही शास्त्रोक्त सदाचार समान है ।। सचाष्टगुणमैश्वर्यमधिकृत्य विधीयते । सायुज्यं सर्वदेवानां योगधर्म: पराश्रित: ।। ज्ञानं सर्वस्य योगस्य मूलमित्यवधारय । व्रतोपवासनियमै: तत्‌ सर्व चापि बृंहयेत्‌ ।। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व--इन आठ भेदोंवाले ऐश्वर्यपर अधिकार करके योगका अनुष्ठान किया जाता है। सम्पूर्ण देवताओंका सायुज्य पराश्रित योगधर्म है। ज्ञान सम्पूर्ण योगका मूल है, ऐसा समझो। साधकको व्रत, उपवास और नियमोंद्वारा उस सम्पूर्ण ज्ञानकी वृद्धि करनी चाहिये ।। ऐकाग्र्यं बुद्धिमनसोरिन्द्रियाणां च सर्वश: । आत्मनोड्व्ययिन: प्राज्ञे ज्ञाममेतत्‌ तु योगिनाम्‌ ।। अर्चयेद्‌ ब्राह्मुणानग्निं देवतायतनानि च । वर्जयेदशिवं भावं सर्वसत्त्वमुपाश्रित: ।। बुद्धिमती पार्वती! अविनाशी आत्मामें बुद्धि, मन और सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी एकाग्रता हो, यही योगियोंका ज्ञान है। ब्राह्मण, अग्नि और देवमन्दिरोंकी पूजा करे तथा पूर्णतः सत्त्वगुणका आश्रय लेकर अमांगलिक भावको त्याग दे ।। दानमध्ययन श्रद्धा व्रतानि नियमास्तथा । सत्यमाहारशुद्धिश्व॒ शौचमिन्द्रियनि ग्रह: ।। एतैश्व वर्धते तेज: पापं चाप्यवधूयते ।। दान, अध्ययन, श्रद्धा, व्रत, नियम, सत्य, आहार-शुद्धि, शौच और इन्द्रिय-निग्रह-- इनके द्वारा तेजकी वृद्धि होती है और पाप धुल जाता है ।। निर्धूतपापस्तेजस्वी निराहारो जितेन्द्रिय: । अमोधघो निर्मलो दान्त: पश्चाद्‌ योगं समाचरेत्‌ ।। जिसका पाप धुल गया है, वह पहले तेजस्वी, निराहार, जितेन्द्रिय, अमोघ, निर्मल और मनका दमन करनेमें समर्थ हो जाय। तत्पश्चात्‌ योगका अभ्यास करे ।। एकान्ते विजने देशे सर्वतः संवृते शुचौ । कल्पयेदासन तत्र स्वास्तीर्ण मृदुभि: कुशै: ।। एकान्त निर्जन प्रदेशमें, जो सब ओरसे घिरा हुआ और पवित्र हो, कोमल कुशोंसे एक आसन बनावे और उसे वहाँ भलीभाँति बिछा दे ।। उपविश्यासने तस्मिन्नजुकायशिरो धर: । अव्यग्र: सुखमासीन: स्वाज्रानि न विकम्पयेत्‌ ।। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशक्षानवलोकयन्‌ ।। उस आसनपर बैठकर अपने शरीर और गर्दनको सीधी किये रहे। मनमें किसी प्रकारकी व्यग्रता न आने दे। सुखपूर्वक बैठकर अपने अंगोंको हिलने-डुलने न दे। अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर दृष्टिपात न करते हुए ध्यानमग्न हो जाय ।। मनो<वस्थापनं देवि योगस्योपनिषद्‌ भवेत्‌ । तस्मात्‌ सर्वप्रयत्नेन मनो5वस्थापयेत्‌ सदा ।। त्वक्छरोत्रं च ततो जिद्ठां प्राणं चक्षुश्न संहरेत्‌ । पज्चेन्द्रियाणि संधाय मनसि स्थापयेद्‌ बुध: ।। देवि! मनको दृढ़तापूर्वक स्थापित करना योगकी सिद्धिका सूचक है; अतः सम्पूर्ण प्रयत्न करके मनको सदा स्थिर रखे। त्वचा, कान, जिह्ला, नासिका और नेत्र--इन सबको विषयोंकी ओरसे समेटे। पाँचों इन्द्रियोंको एकाग्र करके विद्वान्‌ पुरुष उन्हें मनमें स्थापित करे ।। सर्व चापोहा[ संकल्पमात्मनि स्थापयेन्मन: । यदैतान्यवतिष्ठन्ते मन:षष्ठानि चात्मनि ।। प्राणापानौ तदा तस्य युगपत्‌ तिष्ठतो वशे । प्राणे हि वशमापन्ने योगसिद्धिर्ध्॒ुवा भवेत्‌ ।। शरीरं चिन्तयेत्‌ सर्व विपाट्य च समीपत: । अन्तर्देहगतिं चापि प्राणानां परिचिन्तयेत्‌ ।। फिर सारे संकल्पोंको हटाकर मनको आत्मामें स्थापित करे। जब मनसहित ये पाँचों इन्द्रियाँ आत्मामें स्थिर हो जाती हैं, तब प्राण और अपान वायु एक ही साथ वशमें हो जाते हैं। प्राणके वशमें हो जानेपर योगसिद्धि अटल हो जाती है। सारे शरीरको निकटसे उजाड़- उघाड़कर देखे और यह क्या है? इसका चिन्तन करे। शरीरके भीतर जो प्राणोंकी गति है, उसपर भी विचार करे |। ततो मूर्धानमग्निं च शरीरं परिपालयेत्‌ | प्राणो मूर्थनि च श्वासो वर्तमानो विचेष्टते ।। सज्जस्तु सर्वभूतात्मा पुरुष: स सनातन: । मनो बुद्धिरहड्कारो भूतानि विषयाश्च सः ।। बस्तिमूलं गुदं चैव पावकं च समाश्रित: । वहन्‌ मूत्र पुरीषं च सदापान: प्रवर्तते ।। अथ प्रवृत्तिर्देहिषु कर्मापानस्य सम्मतम्‌ | उदीरयन्‌ सर्वधातून्‌ अत ऊर्ध्व॑ प्रवर्तते ॥। उदान इति त॑ विद्युरध्यात्मकृशला जना: ।। तत्पश्चात्‌ मूर्धा, अग्नि और शरीरका परिपालन करे। मूर्धामें प्राणकी स्थिति है, जो श्वासरूपमें वर्तमान होकर चेष्टा करता है। सदा सन्नद्ध रहनेवाला प्राण ही सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा सनातन पुरुष है। वही मन, बुद्धि, अहंकार, पंचभूत और विषयरूप है। वस्तिके मूलभाग, गुदा और अग्निके आश्रित हो अपानवायु सदा मल-मूत्रका वहन करती हुई अपने कार्यमें प्रवृत्त होती है। देहोंमें प्रवत्ति अपानवायुका कर्म मानी गयी है। जो वायु समस्त धातुओंको ऊपर उठाती हुई अपानसे ऊपरकी ओर प्रवृत्त होती है, उसे अध्यात्मकृशल मनुष्य 'उदान' मानते हैं। संधौ संधौ स निर्विष्ट: सर्वचेष्टाप्रवर्तक: । शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ।। धातुष्वग्नौ च वितत: समानो5ग्नि: समीरण: ।। स एव सर्वचेष्टानामन्तकाले निवर्तक: ।। जो वायु मनुष्योंके शरीरोंकी एक-एक संधिमें व्याप्त होकर उनकी सम्पूर्ण चेष्टाओंमें प्रवृत्तक होती है, उसे “व्यान' कहते हैं। जो धातुओं और अग्निमें भी व्याप्त है, वह अग्निस्वरूप 'समान' वायु है। वही अन्तकालमें समस्त चेष्टाओंका निवर्त्तक होता है ।। प्राणानां संनिपातेषु संसर्गाद्‌ यः प्रजायते । ऊष्मा सोअग्निरिति ज्ञेय: सो5न्नं पचति देहिनाम्‌ ।। अपानप्राणयोर्मध्ये व्यानोदानावुपाश्रितौ । समन्वितः समानेन सम्यक्‌ पचति पावक: ।। शरीरमध्ये नाभि: स्यान्नाभ्यामग्नि: प्रतिष्ठित: । अग्नौ प्राणाश् संयुक्ता प्राणेष्वात्मा व्यवस्थित: ।। समस्त प्राणोंका परस्पर संयोग होनेपर संसर्गवश जो ताप प्रकट होता है, उसीको अग्नि जानना चाहिये। वह अग्नि देहधारियोंके खाये हुए अन्नको पचाती है। अपान और प्राण वायुके मध्यभागमें व्यान और उदान वायु स्थित है। समान वायुसे युक्त हुई अग्नि सम्यक्‌ रूपसे अन्नका पाचन करती है। शरीरके मध्यभागमें नाभि है। नाभिके भीतर अग्नि प्रतिष्ठित है। अग्निसे प्राण जुड़े हुए हैं और प्राणोंमें आत्मा स्थित है ।। पक्वाशयस्त्वधो नाभेरूथध्वमामाशयस्तथा । नाभिम॒ध्ये शरीरस्य सर्वप्राणाश्ष संश्रिता: ।। स्थिता: प्राणादय: सर्वे तिर्यगूर्ध्वम धश्षरा: । वहन्त्यन्नरसान्‌ नाड्यो दशप्राणाग्निचोदिता: ।। योगिनामेष मार्गस्तु पञठ्चस्वेतेषु तिष्ठति । जितश्रम: समासीनो मूर्थन्यात्मानमादथेत्‌ ।। नाभिके नीचे पक्‍्वाशय और ऊपर आमाशय है। शरीरके ठीक मध्यभागमें नाभि है और समस्त प्राण उसीका आश्रय लेकर स्थित हैं। समस्त प्राण आदि ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलनमें विचरनेवाले हैं। दस प्राणोंसे तथा अग्निसे प्रेरित हो नाड़ियाँ अन्नरसका वहन करती हैं। यह योगियोंका मार्ग है, जो पाँचों प्राणोंमें स्थित है। साधकको चाहिये कि श्रमको जीतकर आसनपर आसीन हो आत्माको ब्रह्मरन्ध्रमें स्थापित करे ।। मूर्थन्यात्मानमाधाय भ्रुवोर्मध्ये मनस्तथा । संनिरुध्य ततः प्राणानात्मानं चिन्तयेत्‌ परम्‌ ।। प्राणे त्वपानं युज्जीत प्राणांश्वापानकर्मणि । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरो भवेत्‌ ।। मूर्धामें आत्माको स्थापित करके दोनों भौंहोंके बीचमें मनका अवरोध करे। तत्पश्चात्‌ प्राणको भलीभाँति रोककर परमात्माका चिन्तन करे। प्राणमें अपानका और अपान कर्ममें प्राणोंका योग करे। फिर प्राण और अपानकी गतिको अवरुद्ध करके प्राणायाममें तत्पर हो जाय ।। एवमन्त: प्रयुञज्जीत पड्च प्राणान्‌ परस्परम्‌ | विजने सम्मिताहारो मुनिस्तूष्णी निरुच्छवसन्‌ ।। अश्रान्तश्निन्तयेद्‌ योगी उत्थाय च पुनः पुनः । तिष्ठन्‌ गच्छन्‌ स्वपन्‌ वापि युञ्जीतैवमतन्द्रित: ।। इस प्रकार एकान्त प्रदेशमें बैठकर मिताहारी मुनि अपने अन्तःकरणमें पाँचों प्राणोंका परस्पर योग करे और चुपचाप उच्छवासरहित हो बिना किसी थकावटके ध्यानमग्न रहे। योगी पुरुष बारंबार उठकर भी चलते, सोते या ठहरते हुए भी आलस्य छोड़कर योगाभ्यासमें ही लगा रहे ।। एवं नियुञ्जतस्तस्य योगिनो युक्तचेतस: । प्रसीदति मन: क्षिप्रं प्रसन्ने दृश्यते परम्‌ ।। विधूम इव दीप्तो5ग्निरादित्य इव रश्मिमान्‌ । वैद्युतो उग्निरिवाकाशे पुरुषो दृश्यतेडव्यय: ।। इस प्रकार जिसका चित्त ध्यानमें लगा हुआ है, ऐसे योगाभ्यासपरायण योगीका मन शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता है और मनके प्रसन्न होनेपर परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार हो जाता है। उस समय अविनाशी पुरुष परमात्मा धूमरहित प्रकाशित अग्नि, अंशुमाली सूर्य और आकाशमें चमकने-वाली बिजलीके समान दिखायी देता है ।। दृष्टवा तदा मनो ज्योतिरैश्वर्याष्टगुणैर्युत: । प्राप्रोति परमं स्थान स्मृहणीयं सुरैरपि ।। उस अवस्थामें मनके द्वारा ज्योतिर्मय परमेश्वरका दर्शन करके योगी अणिमा आदि आठ ऐश्चर्योंसे युक्त हो देवताओंके लिये भी स्पृहणीय परमपदको प्राप्त कर लेता है ।। इमान्‌ योगस्य दोषांश्व दशैव परिचक्षते । दोषैर्विघ्नो वरारोहे योगिनां कविभि: स्मृत: ।। वरारोहे! विद्दानोंने दोषोंसे योगियोंके मार्गमें विघ्नकी प्राप्ति बतायी है। वे योगके निम्नांकित दस ही दोष बताते हैं ।। काम: क्रोधो भयं स्वप्न: स्नेहमत्यशनं तथा । वैचित्त्यं व्याधिरालस्यं लोभश्व दशम: स्मृतः ।। काम, क्रोध, भय, स्वप्र, स्नेह, अधिक भोजन, वैचित्त्य (मानिसक विकलता), व्याधि, आलस्य और लोभ--ये ही उन दोषोंके नाम हैं। इनमें लोभ दसवाँ दोष है ।। एतैस्तेषां भवेद्‌ विघ्नो दशभिद्देवकारितै: । तस्मादेतानपास्यादौ युञ्जीत च परं मन: ।। इमानपि गुणानष्टौ योगस्य परिचक्षते । गुणैस्तैरष्टभिर्दिव्यमैश्वर्यमधिगम्यते ।। देवताओंद्वारा पैदा किये गये इन दस दोषोंसे योगियोंको विघ्न होता है; अत: पहले इन दस दोषोंको हटाकर मनको परमात्मामें लगावे। योगके निम्नांकित आठ गुण बताये जाते हैं, जिनसे युक्त दिव्य ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है ।। अणिमा महिमा चैव प्राप्ति: प्राकाम्यमेव हि । ईशित्वं च वशित्वं च यत्र कामावसायिता ।। एतानष्टौ गुणान्‌ प्राप्प कथंचिद्‌ योगिनां वरा: । ईशा: सर्वस्य लोकस्य देवानप्यतिशेरते ।। योगो<स्ति नैवात्यशिनो न चैकान्तमनश्नत: । न चातिस्वप्नशीलस्य नातिजागरतस्तथा ।। अणिमा, महिमा और गरिमा, लघिमा तथा प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, जिसमें इच्छाओंकी पूर्ति होती है। योगियोंमें श्रेष्ठ पुरुष किसी तरह इन आठ गुणोंको पाकर सम्पूर्ण जगतपर शासन करनेमें समर्थ हो देवताओंसे भी बढ़ जाते हैं। जो अधिक खानेवाला अथवा सर्वथा न खानेवाला है, अधिक सोनेवाला अथवा सर्वथा जागनेवाला है, उसका योग सिद्ध नहीं होता ।। युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। अनेनैव विधानेन सायुज्यं तत्‌ प्रकल्प्यते । सायुज्यं देवसात्‌ कृत्वा प्रयुज्जीतात्मभक्तित:ः ।। अनन्यमनसा देवि नित्यं तद्गतचेतसा । सायुज्यं प्राप्यते देवैर्यत्नेन महता चिरात्‌ ।। हविर्भिरर्चनैहोमि: प्रणामैर्नित्यचिन्तया । अर्चयित्वा यथाशक्ति स्वकं देवं विशन्ति ते ।। दुःखोंका नाश करनेवाला यह योग उसी पुरुषका सिद्ध होता है, जो यथायोग्य आहार- विहार करनेवाला है, कर्मोमें उपयुक्त चेष्टा करता है तथा उचित मात्रामें सोता और जागता है। इसी विधानसे देवसायुज्य प्राप्त होता है। अपनी भक्तिसे देवताओंका सायुज्य प्राप्त करके योगसाधनामें तत्पर रहे। देवि! प्रतिदिन एकाग्र और अनन्य चित्त हो चिरकालतक महान्‌ यत्न करनेसे देवताओंके साथ सायुज्य प्राप्त होता है। योगीजन हविष्य, पूजा, हवन, प्रणाम तथा नित्य चिन्तनके द्वारा यथाशक्ति आराधना करके अपने इष्टदेवके स्वरूपमें प्रवेश कर जाते हैं ।। सायुज्यानां विशिष्टं च मामकं वैष्णवं तथा । मां प्राप्य न निवर्तन्ते विष्णुं वा शुभलोचने । इति ते कथितो देवि योगधर्म: सनातन: । न शक्‍्यं प्रष्टमन्यैयों योगधर्मस्त्वया विना ।। शुभलोचने! सायुज्योंमें मेरा तथा श्रीविष्णुका सायुज्य श्रेष्ठ हैं। मुझे या भगवान्‌ विष्णुको प्राप्त करके मनुष्य पुनः संसारमें नहीं लौटते हैं। देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे सनातन योग-धर्मका वर्णन किया है। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इस योगधर्मके विषयमें प्रश्न नहीं कर सकता था ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य] उमोवाच त्रियक्ष त्रिदशश्रेष्ठ >यम्बक त्रिदशाधिप । त्रिपुरान्तक कामाड्हर त्रिपथगाधर ।। दक्षयज्ञप्रमथन शूलपाणेडरिसूदन । नमस्ते लोकपालेश लोकपालवरप्रद ।। उमाने पूछा--तीन नेत्रधारी! त्रिदशश्रेष्ठ! देवेश्वर! >यम्बक! त्रिपुरोंका विनाश और कामदेवके शरीरको भस्म करनेवाले गंगाधर! दक्षयज्ञका नाश करनेवाले त्रिशूलधारी! शत्रुसूदन! लोकपालोंको भी वर देनेवाले लोकपालेश्वर! आपको नमस्कार है ।। नैकशाखमपर्यन्तम ध्यात्मज्ञानमुत्तमम्‌ | अप्रतर्क्यमविज्ञेयं सांख्यपोगसमन्वितम्‌ ।। भवता परिपृष्टेन शृण्वन्त्या मम भाषितम्‌ | इदानीं श्रोतुमिच्छामि सायुज्यं त्वद्वतं विभो ।। कथं परिचरन्त्येते भक्तास्त्वां परमेष्ठिनम्‌ । आचार: कीदृशस्तेषां केन तुष्टो भवेद्‌ भवान्‌ ।। वर्ण्यमानं त्वया साक्षात्‌ प्रीणयत्यधिकं हि माम्‌ ।। आपने मेरे पूछनेपर सुननेके लिये उत्सुक हुई मुझ दासीको वह उत्तम अध्यात्मज्ञान बताया है, जो अनेक शाखाओंसे युक्त, अनन्त, अतर्क्य, अविज्ञेय और सांख्ययोगसे युक्त है। प्रभो! इस समय मैं आपसे आपका ही सायुज्य सुनना चाहती हूँ। ये भक्तजन आप परमेष्ठीकी परिचर्या कैसे करते हैं? उनका आचार कैसा होता है? किस साधनसे आप संतुष्ट होते हैं? साक्षात्‌ आपके द्वारा प्रतिपादित होनेपर यह विषय मुझे अधिक प्रसन्नता प्रदान करता है ।। श्रीमहेश्वर उवाच हन्त ते कथयिष्यामि मम सायुज्यमद्भुतम्‌ । येन ते न निवर्तन्ते युक्ता: परमयोगिन: ।। श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे अपने अदभुत सायुज्यका वर्णन करता हूँ, जिससे युक्त हो वे परम योगी पुरुष फिर संसारमें नहीं लौटते हैं ।। अव्यक्तो5हमचिन्त्योःहं पूर्वरपि मुमुक्षुभि: । सांख्ययोगौ मया सृष्टी सर्व चापि चराचरम्‌ ।। पहलेके मुमुश्षुओंद्वारा भी मैं अव्यक्त और अचिन्त्य ही रहा हूँ। मैंने ही सांख्य और योगकी सृष्टि की है। समस्त चराचर जगतको भी मैंने ही उत्पन्न किया है ।। अर्चनीयोडहमीशो5हमव्ययो5हं सनातन: । अहं प्रसन्नो भक्तानां ददाम्यमरतामपि ।। मैं पूजनीय ईश्वर हूँ। मैं ही अविनाशी सनातन पुरुष हूँ। मैं प्रसन्न होकर अपने भक्तोंको अमरत्व भी देता हूँ ।। न मां विदु: सुरगणा मुनयश्व तपोधना: । त्वत्प्रियार्थमहं देवि मद्विभूतिं ब्रवीमि ते ।। आश्रमेभ्यश्षतुर्भ्यो5हं चतुरो ब्राह्मणान्‌ शुभे । मद्धक्तान्‌ निर्मलान्‌ पुण्यान्‌ समानीय तपस्विन: ।। व्याचख्ये5हं तथा देवि योगं पाशुपतं महत्‌ ।। देवता तथा तपोधन मुनि भी मुझे अच्छी तरह नहीं जानते हैं। देवि! तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं अपनी विभूति बतलाता हूँ। शुभे! देवि! मैंने चारों आश्रमोंसे चार पुण्यात्मा तपस्वी ब्राह्मणोंको, जो मेरे भक्त और निर्मलचित्त थे, लाकर उनके समक्ष महान्‌ पाशुपत योगकी व्याख्या की थी ।। गृहीतं तच्च तै: सर्व मुखाच्च मम दक्षिणात्‌ । श्र॒ुत्वा तत्‌ त्रिषु लोकेषु स्थापितं चापि तै:पुन: ।। इदानीं च त्वया पृष्टो वदाम्पेकमना: शृणु ।। अहं पशुपतिर्नाम मद्धक्ता ये च मानवा: | सर्वे पाशुपता ज्ञेया भस्मदिग्धतनूरुहा: ।। मेरे दक्षिणवर्ती मुखसे वह सब उपदेश सुनकर उन्होंने ग्रहण किया और पुनः उसकी तीनों लोकोंमें स्थापना की। इस समय तुम्हारे पूछनेपर मैं उसी पाशुपत योगका वर्णन करता हूँ, एकचित्त होकर सुनो। मेरा ही नाम पशुपति है। अपने रोम-रोममें भस्म रमाये रहनेवाले जो मेरे भक्त मनुष्य हैं, उन्हें पाशुपत जानना चाहिये ।। रक्षार्थ मड्न्‍नलार्थ च पवित्रार्थ च भामिनि । लिज्ार्थ चैव भक्तानां भस्म दत्तं मया पुरा ।। तेन संदिग्धसर्वाज्ञा भस्मना ब्रह्मचारिण: | जटिला मुण्डिता वापि नानाकारशिखण्डिन: ।। विकृता: पिड्नलाभाश्च नग्ना नानाप्रकारिण: । भैक्ष॑ं चरन्त: सर्वत्र निःस्पूहा निष्परिग्रहा: ।। मृत्पात्रहस्ता मद्भक्ता मन्निवेशितबुद्धय: । चरन्तो निखिल लोक॑ मम हर्षविवर्धना: ।। भामिनि! पूर्वकालमें मैंने रक्षाके लिये, मंगलके लिये, पवित्रताके लिये और पहचानके लिये भी अपने भक्तोंको भस्म प्रदान किया था। उस भस्मसे सम्पूर्ण अंगोंको लिप्त करके ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले जटाधारी, मुण्डित अथवा नाना प्रकारकी शिखा धारण करनेवाले, विकृत वेश, पिंगलवर्ण, नग्न देह और नाना वेश धारण किये मेरे नि:स्पृह और परिग्रहशून्य भक्त मुझमें ही मन-बुद्धि लगाये, मिट्टीका पात्र हाथमें लिये सब ओर भिक्षाके लिये विचरते रहते हैं। समस्त लोकमें विचरते हुए वे भक्तजन मेरे हर्षकी वृद्धि करते हैं ।। मम पाशुपतं दिव्यं योगशास्त्रमनुत्तमम्‌ । सूक्ष्मं सर्वेषु लोकेषु विमृशन्तश्चरन्ति ते ।। सभी लोकोंमें मेरे परम उत्तम सूक्ष्म एवं दिव्य पाशुपत योगशास्त्रका विचार करते हुए वे विचरण करते हैं ।। एवं नित्याभियुक्तानां मद्धभक्तानां तपस्विनाम्‌ उपायं चिन्तयाम्याशु येन मामुपयान्ति ते ।। इस तरह नित्य मेरे ही चिन्तनमें संलग्न रहनेवाले अपने तपस्वी भक्तोंके लिये मैं ऐसा उपाय सोचता रहता हूँ, जिससे वे शीघ्र मुझे प्राप्त हो जाते हैं ।। स्थापितं त्रिषु लोकेषु शिवलिड्ूं मया मम । नमस्कारेण वा तस्य मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै: ।। इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्व बहुदक्षिणा: । शिवलिड्डप्रणामस्य कलां ना्हन्ति षोडशीम्‌ ।। तीनों लोकोंमें मैंने अपने स्वरूपभूत शिवलिंगोंकी स्थापना की है, जिनको नमस्कारमात्र करके मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। होम, दान, अध्ययन और बहुत-सी दक्षिणावाले यज्ञ भी शिवलिंगको प्रणाम करनेसे मिले हुए पुण्यकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ।। अर्चया शिवलिड्स्य परितुष्याम्यहं प्रिये | शिवलिडज्जर्चनायां तु विधानमपि मे शृणु ।। प्रिये! शिवलिंगकी पूजासे मैं बहुत संतुष्ट होता हूँ। तुम शिवलिंग-पूजनका विधान मुझसे सुनो ।। गोक्षीरनवनीताभ्यामर्चयेद्‌ यः शिवं मम । इष्टस्य हयमेधस्य यत्‌ फलं तत्‌ फलं भवेत्‌ ।। घृतमण्डेन यो नित्यमर्चयेद्‌ यः शिवं मम । स फल प्राप्तुयान्मर्त्यों ब्राह्मणस्याग्निहोत्रिण: ।। केवलेनापि तोयेन स्नापयेद्‌ यः शिवं मम । स चापि लभते पुण्यं प्रियं च लभते नर: ।। जो गोदुग्ध और माखनसे मेरे शिवलिंगकी पूजा करता है, उसे वही फल प्राप्त होता है जो कि अश्वमेध यज्ञ करनेसे मिलता है। जो प्रतिदिन घृतमण्डसे मेरे शिवलिंगका पूजन करता है, वह मनुष्य प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मणके समान पुण्यफलका भागी होता है। जो केवल जलसे भी मेरे शिवलिंगको नहलाता है, वह भी पुण्यका भागी होता और अभीष्ट फल पा लेता है ।। सघृतं गुग्गुलं सम्यग्‌ धूपयेद्‌ यः शिवान्तिके । गोसवस्य तु यज्ञस्य यत्‌ फलं तस्य तद्‌ भवेत्‌ ।। यस्तु गुग्गुलपिण्डेन केवलेनापि धूपयेत्‌ । तस्य रुक्‍्मप्रदानस्य यत्‌ फलं तस्य तद्‌ भवेत्‌ ।। यस्तु नानाविधी: पुष्पैर्मम लिड़ं समर्चयेत्‌ । स हि धेनुसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात्‌ ।। यस्तु देशान्तरं गत्वा शिवलिड़ं समर्चयेत्‌ तस्मात्‌ सर्वमनुष्येषु नास्ति मे प्रियकृत्तम: ।। जो शिवलिंगके निकट घृतमिश्रित गुग्गुलका उत्तम धूप निवेदन करता है, उसे गोसव नामक यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो केवल गुग्गुलके पिण्डसे धूप देता है, उसे सुवर्णदानका फल मिलता है। जो नाना प्रकारके फूलोंसे मेरे लिंगकी पूजा करता है, उसे सहस्र धेनुदानका फल प्राप्त होता है। जो देशान्तरमें जाकर शिवलिंगकी पूजा करता है, उससे बढ़कर समस्त मनुष्योंमें मेरा प्रिय करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ।। एवं नानाविधैद्रव्यै: शिवलिड्ं समर्चयेत्‌ । मत्समानो मनुष्येषु न पुनर्जायते नरः ।। अर्चनाभिननमस्कारैरुपहारै: स्तवैरपि । भक्तो मामर्चयेन्नित्यं शिवलिड्रेष्वतन्द्रित: ।। पलाशबिल्वपत्राणि राजवृक्षस्रजस्तथा । अर्कपुष्पाणि मेध्यानि मत्प्रियाणि विशेषत: ।। इस प्रकार भाँति-भाँतिके द्रव्योंद्वारा जो शिवलिंगकी पूजा करता है, वह मनुष्योंमें मेरे समान है। वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता है। अतः भक्त पुरुष अर्चनाओं, नमस्कारों, उपहारों और स्तोत्रोंद्वारा प्रतिदिन आलस्य छोड़कर शिवलिंगोंके रूपमें मेरी पूजा करे। पलाश और बेलके पत्ते, राजवृक्षके फूलोंकी मालाएँ तथा आकके पवित्र फूल मुझे विशेष प्रिय हैं ।। फलं वा यदि वा शाकं पुष्पं वा यदि वा जलम्‌ | दत्तं सम्प्रीणयेद्‌ देवि भक्तैर्मदूगतमानसै: । ममापि परितुष्टस्य नास्ति लोकेषु दुर्लभम्‌ | तस्मात्‌ ते सततं भक्ता मामेवाभ्यर्चयन्त्युत ।। देवि! मुझमें मन लगाये रहनेवाले मेरे भक्तोंका दिया हुआ फल, फूल, साग अथवा जल भी मुझे विशेष प्रिय लगता है। मेरे संतुष्ट हो जानेपर लोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है; इसलिये भक्तजन सदा मेरी ही पूजा किया करते हैं ।। मद्धभक्ता न विनश्यन्ति मद्धक्ता वीतकल्मषा: । मद्धभक्ता: सर्वलोकेषु पूजनीया विशेषत: ।। मदद्वेषिणश्न ये मर्त्या मद्धभक्तद्वेषिणोडपि वा । यान्ति ते नरकं घोरमिष्टवा क्रतुशतैरपि ।। मेरे भक्त कभी नष्ट नहीं होते। उनके सारे पाप दूर हो जाते हैं तथा मेरे भक्त तीनों लोकोंमें विशेषरूपसे पूजनीय हैं। जो मनुष्य मुझसे या मेरे भक्तोंसे द्वेष करते हैं, वे सौ यज्ञोंका अनुष्ठान कर लें तो भी घोर नरकमें पड़ते हैं ।। एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं योगं पाशुपतं महत्‌ | मद्धक्तैर्मनुजैदेंवि श्राव्यमेतद्‌ दिने दिने ।। शृणुयाद्‌ यः पठेद्‌ वापि ममेदं धर्मनिश्चयम्‌ । स्वर्ग कीर्ति धनं धान्यं लभते स नरोत्तम: ।। देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे महान्‌ पाशुपत योगकी व्याख्या की है। मुझमें भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको प्रतिदिन इसका श्रवण करना चाहिये। जो श्रेष्ठ मानव मेरे इस धर्मनिश्चयका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह इस लोकमें धनधान्य और कीर्ति तथा परलोकमें स्वर्ग पाता है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्व॒रसंवादे पजञ्चचत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्या भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादाविषयक एक सौ पैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Nothing in this world is dearer than one’s own life-breath. Therefore compassion toward living beings must be practiced: as one wishes kindness and protection for oneself, so should one extend the same to others.

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira’s fourfold inquiry: what constitutes śreyas, what conduct produces happiness, by what one becomes free from pāpa, and what practice destroys kalmaṣa (moral impurity).

Regular, disciplined remembrance and praise—reciting an authoritative list of devas, ṛṣis, rājarṣis, and sacred places at both twilight junctions—functions as a purificatory practice shaping conduct and reducing moral stain.

Yes. The text states that one who kīrtanas, praises, and honors these enumerated beings and loci is freed from faults (kilbiṣa/pāpa), protected from fear, and the closing prayer seeks absence of obstacles and attainment of steady success and higher destiny.