
Chapter Arc: Yudhishthira arrives at the forest lake and beholds a dreadful sight: Arjuna’s bow and arrows scattered, and his brothers—Arjuna, Bhima, Nakula, Sahadeva—lying fallen and motionless, as if life has fled them. → Grief-stricken, he searches for signs of wounds and finds none—no weapon-strikes, no footprints—only an uncanny stillness, convincing him that some vast, unseen being has struck them down. A disembodied Yaksha voice asserts dominion over the water and demands that Yudhishthira answer questions before drinking. → The Yaksha unleashes a cascade of riddling questions—about the self, fate, friendship, livelihood, refuge, and the essence of dharma—and Yudhishthira answers with steady clarity, refusing temptation and speaking of compassion, restraint of mind, and the enduring bond of the good. → Pleased, the Yaksha reveals his identity and power, admits he has felled the brothers, and—moved by Yudhishthira’s truthfulness and dharmic insight—grants boons that lead toward the restoration of the fallen brothers and the safeguarding of the Pandavas’ forest-journey. → The Yaksha’s final condition and the precise choice Yudhishthira must make (whom to revive and why) hangs over the scene, testing dharma against affection and strategy.
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल ४५३६ “लोक हैं।) हू... “+(>9) #:६.# #25-१ त्रयोदशाधिकत्रिशततमो< ध्याय: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों हल जीवित होनेका वरदान ना वैशग्पायन उवाच स ददर्श हतान् भ्रातूँललोकपालानिव च्युतान् | चुगान्ते समनुप्राप्ते शक्रप्रतिमगौरवान्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्छिरने इन्द्रके समान गौरवशाली अपने भाइयोंको सरोवरके तटपर निर्जीवकी भाँति पड़े हुए देखा; मानो प्रलय-कालमें सम्पूर्ण लोकपाल अपने लोकोससे भ्रष्ट होकर गिर गये हों
Vaiśampāyana berkata: Wahai Janamejaya! Yudhiṣṭhira melihat saudara-saudaranya tergeletak mati di tepi telaga, laksana para penjaga dunia yang jatuh dari kedudukannya pada akhir zaman. Mereka dahulu berwibawa bagaikan Indra, kini terhempas tak bergerak.
Verse 2
विनिकीर्णभनुर्बाणं दृष्टवा निहतमर्जुनम् । भीमसेनं यमौ चैव निर्विचेष्टान् गतायुष:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--
Melihat Arjuna terbunuh dengan busur dan anak panahnya berserakan, dan melihat Bhīmasena serta kedua saudara kembar itu pun tak bernyawa dan tak bergerak, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa meratap panjang.
Verse 3
स दीर्घमुष्णं नि:श्वस्य शोकबाष्पपरिप्लुत: । तान् दृष्टवा पतितान् भ्रातृन् सर्वाश्विन्तासमन्वितः,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--
Dengan menarik napas panjang yang panas, basah oleh air mata duka, dan memandang saudara-saudaranya tergeletak jatuh, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa—diliputi segala kecemasan—meratap panjang.
Verse 4
ननु त्वया महाबाहो प्रतिज्ञातं वृकोदर,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- महात्मनि महाबाहो कुरूणां कीर्तिविर्धने । वे बोले--“महाबाहु वृकोदर! तुमने यह प्रतिज्ञा की थी कि "मैं युद्धमें अपनी गदासे दुर्योधनकी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा। महाबाहो! तुम कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले थे। तुम्हारा हृदय विशाल था। वीर! आज तुम्हारे गिर जानेसे मेरे लिये वह सब कुछ व्यर्थ हो गया
Waiśaṃpāyana berkata: “Wahai Vṛkodara yang berlengan perkasa, bukankah engkau telah mengucapkan sumpah yang teguh itu?” Demikianlah Dharmaputra Yudhiṣṭhira, sang perkasa, meratap panjang. Melihat saudara-saudaranya rebah dan ikrar para kesatria seakan menjadi sia-sia, ia diliputi duka dan cemas; kata-katanya pun tertuju pada beratnya janji dalam dharma dan kehormatan wangsa.
Verse 5
सुयोधनस्य भेत्स्यामि गदया सक्थिनी रणे | व्यर्थ तदद्य मे सर्व त्वयि वीर निपातिते,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--
“Di medan perang akan kuhancurkan paha Suyodhana dengan gadaku”—itulah sumpahku; namun, wahai pahlawan, hari ini semuanya menjadi sia-sia karena engkau telah gugur. Demikian Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang perkasa meratap panjang, diliputi duka—seakan harapan dharma runtuh dan adharma menang.
Verse 6
मनुष्यसम्भवा वाचो विधर्मिण्य: प्रतिश्रुता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--
“Kata-kata yang lahir dari kelemahan manusia—janji yang menyimpang dari dharma—bagaimana mungkin berbuah?” Melihat malapetaka itu, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang perkasa pun terbakar duka dan meratap panjang.
Verse 7
देवाश्वापि यदावोचन् सूतके त्वां धनंजय,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि “कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि “ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे। युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे”
Waiśaṃpāyana berkata: “Wahai Dhanaṃjaya, ketika upacara kelahiranmu berlangsung, bahkan para dewa pun pernah berkata tentang dirimu.” Mengingat itu, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa meratap panjang. Kenangan akan sabda ilahi itu menambah dukanya—iman pada takdir berbenturan dengan kehilangan yang tampak di depan mata.
Verse 8
सहस्राक्षादनवर: कुन्ति पुत्रस्तवेति वै । उत्तरे पारियात्रे च जगुर्भूतानि सर्वश:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि “कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि “ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे। युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे”
“Kuntī, putramu ini sama sekali tidak kalah dari Indra yang bermata seribu”—demikian dikatakan; dan di wilayah utara Pāriyātra pun semua makhluk di segala penjuru mengumandangkan hal yang sama. Mengingat seruan semesta itu, Dharmaputra yang perkasa menanggung beban dukanya.
Verse 9
धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि “कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि “ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे। युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे”
Waiśaṃpāyana berkata— Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa meratap panjang. Ia melihat Arjuna tergeletak laksana telah mati, busur dan anak panahnya berserakan; Bhīmasena pun, demikian pula Nakula dan Sahadeva, terbaring tanpa nyawa, kaku tak bergerak. Menyaksikan itu, Yudhiṣṭhira menghela napas panjang yang panas dan berat; air mata duka meluap dari matanya dan membasahi dirinya. Melihat semua saudaranya roboh demikian, sang Dharmaputra tenggelam dalam kecemasan yang dalam dan lama meratap— “Dhanañjaya! Pada saat kelahiranmu, para dewa pun bersabda: ‘Kuntī! Putramu ini tidak akan kalah sedikit pun dari Indra yang bermata seribu.’ Dan di pegunungan Pāriyātra bagian utara, segenap makhluk berkata tentangmu: ‘Arjuna ini akan segera memulihkan kembali kemuliaan kerajaan Pāṇḍava yang hilang. Dalam pertempuran tak seorang pun akan menaklukkannya, dan ia pun takkan berhenti sebelum menaklukkan yang lain.’”
Verse 10
सो<यं मृत्युवशं यात: कथं जिष्णुर्महाबल: । अयं ममाशां संहत्य शेते भूमौ धनंजय:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--
Waiśaṃpāyana berkata: “Bagaimana Jiṣṇu (Arjuna) yang begitu perkasa ini jatuh ke dalam kuasa maut? Dhanañjaya ini terbaring di tanah seakan-akan meremukkan seluruh harapanku.” Melihat itu, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa meratap panjang dengan hati yang terbakar duka.
Verse 11
रणे प्रमत्तौ वीरौ च सदा शत्रुनिबर्हणी,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “कुन्तीके ये दोनों महाबली पुत्र भीमसेन और अर्जुन--जो किसी भी अस्त्रसे प्रतिहत न होनेवाले, समरांगणमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले तथा सदैव शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर थे, वे आज सहसा शत्रुके अधीन कैसे हो गये?
Waiśaṃpāyana berkata— Melihat kedua pahlawan itu—yang selalu mabuk oleh pertempuran dan senantiasa menjadi pembinasa musuh—tergeletak demikian, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa meratap panjang: “Bagaimana kedua putra Kuntī yang mahaperkasa—Bhīmasena dan Dhanañjaya—yang tak dapat ditahan oleh senjata apa pun, yang mengamuk di gelanggang perang dan selalu menumpas musuh—hari ini tiba-tiba jatuh ke bawah kuasa lawan?”
Verse 12
कथं रिपुवशं यातौ कुन्तीपुत्रौ महाबलौ । यौ सर्वास्त्राप्रतिहती भीमसेनधनंजयौ,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “कुन्तीके ये दोनों महाबली पुत्र भीमसेन और अर्जुन--जो किसी भी अस्त्रसे प्रतिहत न होनेवाले, समरांगणमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले तथा सदैव शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर थे, वे आज सहसा शत्रुके अधीन कैसे हो गये?
Waiśaṃpāyana berkata: “Bagaimana putra-putra Kuntī yang mahaperkasa—Bhīmasena dan Dhanañjaya—yang tak dapat ditahan oleh senjata apa pun, jatuh ke bawah kuasa musuh?” Melihat saudara-saudaranya tergeletak di tanah, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa dilanda duka dan meratap panjang.
Verse 13
अश्मसारमयं नून॑ हृदयं मम दुर्हदः । यमौ यदेतौ दृष्टवाद्य पतितौ नावदीर्यते,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “मुझ दुष्टका हृदय निश्चय ही पत्थर और लोहेका बना हुआ है, जो कि आज इन दोनों भाई नकुल और सहदेवको धरतीपर पड़ा देख विदीर्ण नहीं हो जाता है
Waiśaṃpāyana berkata: “Sungguh, hatiku—jahat adanya—pasti terbuat dari batu dan besi, sebab hari ini pun, melihat kedua saudara kembar itu terjatuh ke tanah, ia tidak juga terbelah.” Demikianlah Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa, diliputi duka dan mencela dirinya sendiri, meratap panjang.
Verse 14
शास्त्रज्ञा देशकालज्ञास्तपोयुक्ता: क्रियान्विता: । अकृत्वा सदृशं कर्म कि शेध्वं पुरुषर्षभा:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- 'पुरुषसिंह बन्धुओ! तुमलोग शास्त्रोंके विद्वान देशकालको समझनेवाले, तपस्वी और कर्मठ वीर थे। अपने योग्य पराक्रम किये बिना ही तुमलोग (प्राणहीन हो) कैसे सो रहे हो?
Waiśaṃpāyana berkata: “Wahai para lelaki unggul, kalian menguasai śāstra, paham tempat dan waktu, teguh dalam tapa, dan mantap dalam tindakan. Tanpa melakukan perbuatan yang sepadan dengan kekuatan kalian, mengapa kalian terbaring demikian?” Melihat saudara-saudaranya rebah tak bernyawa, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa diliputi duka; ia menarik napas panjang yang panas, matanya basah oleh air mata, dan meratap lama.
Verse 15
अविक्षतशरीराश्षाप्यप्रमृष्टशरासना: । असंज्ञा भुवि संगम्य कि शेध्वमपराजिता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “तुम्हारे शरीरोंमें कोई घाव नहीं है, तुमने धनुष-बाणका स्पर्शतक नहीं किया है तथा तुम किसीसे परास्त होनेवाले नहीं हो; ऐसी दशामें इस पृथ्वीपर संज्ञाशून्य होकर क्यों पड़े हो?”
Waiśaṃpāyana berkata: “Tubuh kalian tak terluka; busur dan anak panah pun belum tersentuh; dan kalian bukan orang yang mudah dikalahkan. Mengapa kalian tergeletak di bumi, jatuh tak sadar?” Melihat saudara-saudaranya rebah tanpa tanda luka, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa tenggelam dalam cemas dan duka, lalu meratap lama.
Verse 16
सानूनिवाद्रे: संसुप्तान् दृष्टवा भ्रातृून् महामति: । सुखं प्रसुप्तान् प्रस्विन्न: खिन्न: कष्टां दशां गत:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर धरतीपर पड़े हुए पर्वत-शिखरोंके समान अपने भाइयोंको इस प्रकार सुखकी नींद सोते देखकर बहुत दुःखी हुए। उनके सारे अंगोंमें पसीना निकल आया और वे अत्यन्त कष्टप्रद अवस्थामें पहुँच गये
Waiśaṃpāyana berkata: Melihat saudara-saudaranya terbaring di bumi laksana puncak-puncak gunung yang runtuh—seolah mereka tidur nyenyak—Yudhiṣṭhira yang berhati agung pun terguncang. Ketika ia menangkap kebenaran yang mengerikan, sekujur tubuhnya bermandikan keringat; ia jatuh ke dalam keadaan yang amat pedih. Tenggelam dalam duka dan cemas, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa meratap lama.
Verse 17
एवमेवेदमित्युक्त्वा धर्मात्मा स नरेश्वर: । शोकसागरमध्यस्थो दध्यौ कारणमाकुल:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “यह ऐसी ही होनहार है”, ऐसा कहकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर शोकसागरमें मग्न तथा व्याकुल होकर भाइयोंकी मृत्युके कारणपर विचार करने लगे
Waiśaṃpāyana berkata: Setelah berkata, “Memang begitulah—harus demikian,” raja yang saleh itu, gelisah seakan berdiri di tengah samudra duka, merenungkan sebabnya. Lalu Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa meratap lama, seolah mencari alasan dharma yang tersembunyi di balik malapetaka itu.
Verse 18
इतिकर्तव्यतां चेति देशकालविभागवित् | नाभिपेदे महाबाहुश्चिन्तयानो महामति:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- वे यह भी सोचने लगे कि “अब क्या करना चाहिये?” महाबुद्धिमान् महाबाहु युधिष्छिर देश और कालके तत्त्वको पृथकृ-पृथक् जाननेवाले थे; तो भी बहुत सोचने-विचारनेपर भी वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके
Waiśaṃpāyana berkata: Sambil berpikir, “Apa yang harus dilakukan sekarang?”, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa—meski mahapandai dan terampil menimbang pembagian tempat dan waktu—tetap tidak mampu mencapai keputusan, betapapun ia merenung. Dihantam duka, ia meratap lama.
Verse 19
विप्रणष्टां श्रियं चैषामाहर्ता पुनरज्जसा । नास्य जेता रणे कश्चिदजेता नैष कस्यचित्,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- अथ संस्तभ्य धर्मात्मा तदा55त्मानं तपोयुतः । एवं विलप्य बहुथा धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: तत्पश्चात् धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मनको स्थिर करके बहुत विलाप करनेके पश्चात् अपनी बुद्धिद्वारा यह विचार करने लगे--“इन वीरोंको किसने मार गिराया है? इनके शरीरोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातका कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थानपर किसी दूसरेके पैरोंका निशान ही है। मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयोंको मारा है
Waiśaṃpāyana berkata: “Ia akan segera memulihkan kembali kemakmuran mereka yang telah lenyap. Di medan perang tak seorang pun mampu menaklukkannya; dan ia pun tak pernah ditaklukkan oleh siapa pun.” Melihat saudara-saudaranya tergeletak, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa meratap panjang. Sesudah berkali-kali meluapkan duka, sang dharmatma yang bertapa itu meneguhkan diri dan mulai menimbang dengan budi.
Verse 20
बुद्धया विचिन्तयामास वीरा: केन निपातिता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- तत्पश्चात् धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मनको स्थिर करके बहुत विलाप करनेके पश्चात् अपनी बुद्धिद्वारा यह विचार करने लगे--“इन वीरोंको किसने मार गिराया है? इनके शरीरोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातका कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थानपर किसी दूसरेके पैरोंका निशान ही है। मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयोंको मारा है
Lalu Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa, setelah meratap panjang, merenung dengan budi yang diteguhkan: “Oleh siapa para pahlawan ini dijatuhkan?”
Verse 21
नैषां शस्त्रप्रहारो5स्ति पद नेहास्ति कस्यचित् । भूतं महदिदं मन्ये भ्रातरो येन मे हता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- तत्पश्चात् धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मनको स्थिर करके बहुत विलाप करनेके पश्चात् अपनी बुद्धिद्वारा यह विचार करने लगे--“इन वीरोंको किसने मार गिराया है? इनके शरीरोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातका कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थानपर किसी दूसरेके पैरोंका निशान ही है। मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयोंको मारा है
“Pada tubuh mereka tak ada bekas tebasan senjata; dan di sini pun tak tampak jejak kaki siapa pun. Aku mengira ini pasti perbuatan suatu makhluk gaib yang sangat kuat, yang telah membunuh saudara-saudaraku.” Demikianlah Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa meratap panjang.
Verse 22
एकाग्रं चिन्तयिष्यामि पीत्वा वेत्स्यामि वा जलम् | स्यात् तु दुर्योधनेनेदमुपांशुविहितं कृतम्,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “इस विषयमें मैं चित्तको एकाग्र करके फिर सोचूँगा अथवा पानी पीकर इस रहस्यको समझनेकी चेष्टा करूँगा। सम्भव है, दुर्योधनने चुपके-चुपके कोई षड्यन्त्र किया हो
“Aku akan merenung dengan pikiran yang terpusat; atau setelah minum air, aku akan berusaha memahami rahasia ini. Mungkin Duryodhana telah mengaturnya secara diam-diam.” Demikianlah Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa meratap panjang.
Verse 23
गान्धारराजरचितं सतत जिद्दाबुद्धिना । यस्य कार्यमकार्य वा सममेव भवत्युत,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “अथवा जिसकी बुद्धिमें सदा कुटिलता ही निवास करती है, उस गान्धारराज शकुनिकी भी यह करतूत हो सकती है। जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों बराबर हैं, उस अजितात्मा पापी शकुनिपर कौन वीर पुरुष विश्वास कर सकता है? अथवा गुप्तरूपसे नियुक्त किये हुए पुरुषोंद्वारा दुरात्मा दुर्योधनने ही यह हिंसात्मक प्रयोग किया होगा”
“Atau ini mungkin rekayasa raja Gāndhāra, Śakuni—yang budinya senantiasa bengkok, dan baginya yang patut dilakukan maupun yang tak patut dilakukan sama saja.” Demikianlah Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa meratap panjang.
Verse 24
कस्तस्य विश्वसेद् वीरो दुष्कृतेरकृतात्मन: । अथवा पुरुषैर्गूढै: प्रयोगो5यं दुरात्मन:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “अथवा जिसकी बुद्धिमें सदा कुटिलता ही निवास करती है, उस गान्धारराज शकुनिकी भी यह करतूत हो सकती है। जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों बराबर हैं, उस अजितात्मा पापी शकुनिपर कौन वीर पुरुष विश्वास कर सकता है? अथवा गुप्तरूपसे नियुक्त किये हुए पुरुषोंद्वारा दुरात्मा दुर्योधनने ही यह हिंसात्मक प्रयोग किया होगा”
Waiśaṃpāyana berkata: “Pahlawan mana yang dapat mempercayai orang seperti itu—yang tenggelam dalam perbuatan jahat dan tak mampu menaklukkan diri? Atau, siasat kejam ini mungkin dijalankan oleh para agen tersembunyi atas dorongan seseorang yang berhati busuk.” Melihat saudara-saudaranya tergeletak tak bernyawa, Dharmaputra Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa tenggelam dalam duka dan meratap panjang—mencurigai pengkhianatan serta mengecam kekacauan moral mereka yang menyamakan dharma dan adharma.
Verse 25
भवेदिति महाबुद्धिर्बहुधा तदचिन्तयत् | तस्यासीन्न विषेणेदमुदकं दूषितं यथा,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- इस प्रकार परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर भाँति-भाँतिकी चिन्ता करने लगे। (परीक्षा करनेपर) उन्हें इस बातका निश्चय हो गया था कि इस सरोवरके जलमें जहर नहीं मिलाया गया है
Waiśaṃpāyana berkata: Yudhiṣṭhira yang berhikmat besar merenungkannya dari banyak sisi—“Bagaimana ini bisa terjadi?” Setelah memeriksa, ia yakin bahwa air di sini tidak tercemar racun. Namun melihat saudara-saudaranya tergeletak, Dharmaputra yang berlengan perkasa tetap meratap panjang—berjuang memahami sebabnya dan mempertahankan kejernihan budi di tengah malapetaka.
Verse 26
मृतानामपि चैतेषां विकृतं नैव जायते । मुखवर्णा: प्रसन्ना मे ५ 40025 %8 [,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “क्योंकि मर जानेपर भी मेरे इन भाइयोंके शरीरमें कोई विकृति नहीं उत्पन्न हुई है। अब भी मेरे भाइयोंके मुखकी कान्ति प्रसन्न है।। इस तरह वे सोच-विचारमें ही डूबे रहे
Waiśaṃpāyana berkata: (Yudhiṣṭhira berkata,) “Bahkan setelah mati pun, pada mereka tak tampak perubahan atau cacat sedikit pun. Wajah mereka bagiku masih tampak tenang dan jernih.” Melihat keheningan yang ganjil itu, ia makin tenggelam dalam duka dan kecemasan.
Verse 27
एकैकशश्लोघबलानिमान् पुरुषसत्तमान् | को<न्य: प्रतिसमासेत कालान्तकयमादृते,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “मेरे इन पुरुषरत्न भाइयोंमेंसे प्रत्येकके शरीरमें बलका अगाध सिन्धु लहराता था। आयु पूर्ण होनेपर सबका अन्त कर देनेवाले यमराजके सिवा दूसरा कौन इनसे भिड़ सकता था?”
Waiśaṃpāyana berkata: (Yudhiṣṭhira berkata,) “Masing-masing dari para terbaik di antara manusia ini memiliki kekuatan yang patut dipuji; siapa lagi yang sanggup menghadapi mereka, selain Yama—pengakhir yang ditetapkan oleh Kala?” Melihat saudara-saudaranya jatuh, Dharmaputra yang berlengan perkasa meratap panjang dalam duka yang membakar.
Verse 28
एतेन व्यवसायेन तत् तोयं व्यवगाढवान् | गाहमानश्न तत् तोयमन्तरिक्षात् स शुश्रुवे,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- इस प्रकार निश्चय करके युधिष्ठिर जलमें उतरे। पानीमें प्रवेश करते ही उनके कानोंमें आकाशवाणी सुनायी दी
Waiśaṃpāyana berkata: Dengan tekad itu, Yudhiṣṭhira turun ke dalam air. Saat ia mengarungi air itu, ia mendengar suara dari angkasa. Melihat saudara-saudaranya tergeletak, Dharmaputra yang berlengan perkasa meratap panjang—namun dorongan dharma membuatnya tetap maju untuk mengetahui sebabnya.
Verse 29
यक्ष उवाच अहं बक: शैवलमत्स्यभक्षो नीता मया प्रेतवशं तवानुजा: । त्वं पज्चमो भविता राजपुत्र नचेत् प्रश्नान् पछतो व्याकरोषि,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- यक्ष बोला--राजकुमार! मैं सेवार और मछली खानेवाला बगुला हूँ। मैंने ही तुम्हारे छोटे भाइयोंको यमलोक भेजा है; अतः मेरे पूछनेपर यदि तुम मेरे प्रश्नोंका उत्तर न दोगे, तो तुम भी यमलोकके पाँचवें अतिथि होओगे
Yaksha berkata: “Aku seekor bangau, pemakan ganggang dan ikan. Aku telah menyerahkan adik-adikmu ke dalam kuasa Maut. Wahai pangeran, engkau akan menjadi yang kelima—kecuali engkau menjawab pertanyaan-pertanyaan yang kutanyakan.” Melihat Arjuna tergeletak tak bernyawa, busur dan anak panahnya berserakan, serta Bhima, Nakula, dan Sahadeva terbujur tanpa napas dan tanpa gerak, Yudhisthira—putra Dharma yang berlengan perkasa—menghela napas panjang yang membakar. Air mata duka meluap dari matanya dan membasahinya. Menyaksikan semua saudaranya tumbang demikian, ia tenggelam dalam kecemasan yang dalam dan meratap lama. Lalu Yaksha berkata lagi: “Pangeran, aku bangau yang hidup dari ganggang dan ikan; akulah yang membawa adik-adikmu ke alam Yama. Maka, bila engkau tidak menjawab saat ditanya, engkau pun akan menjadi tamu kelima di dunia Maut.”
Verse 30
मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय तत: पिब हरस्व च,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- तात! जल पीनेका साहस न करना। इसपर मेरा पहलेसे ही अधिकार हो गया है। कुन्तीकुमार! मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो और तब जल पीओ और ले भी जाओ
Vaiśaṃpāyana berkata: “Anakku, jangan bertindak gegabah. Air ini telah lebih dahulu menjadi milikku. Wahai putra Kuntī, jawablah pertanyaanku terlebih dahulu; barulah engkau boleh minum—dan bahkan membawa air itu.” Melihat Arjuna terbujur mati dengan busur dan anak panah berserakan, dan Bhīmasena, Nakula, serta Sahadeva pun tergeletak tanpa nyawa, Yudhisthira—putra Dharma yang berlengan perkasa—menghela napas panas dan berat; air mata duka meluap dan membasahi matanya. Diliputi kesedihan saat menyaksikan saudara-saudaranya tumbang, ia tenggelam dalam kecemasan yang dalam dan meratap lama.
Verse 31
युधिछिर उवाच रुद्राणां वा वसूनां वा मरुतां वा प्रधानभाक् । पृच्छामि को भवान् देवो नैतच्छकुनिना कृतम्,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- युधिष्ठिर बोले--मैं पूछता हूँ, तुम रुद्रों, वसुओं अथवा मरुद्गणोंमेंसे कौन-से प्रधान देवता हो? बताओ। यह काम किसी पक्षीका किया हुआ नहीं हो सकता?
Yudhisthira berkata: “Aku bertanya—apakah engkau yang utama di antara para Rudra, atau di antara para Vasu, atau di antara para Marut? Katakan, dewa siapakah engkau? Ini bukan perbuatan seekor burung biasa.”
Verse 32
हिमवान् पारियात्रश्न विन्ध्यो मलय एव च । चत्वार: पर्वता: केन पातिता भूरितेजस:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- मेरे महातेजस्वी भाई हिमवान, पारियात्र, विन्ध्य तथा मलय--इन चारों पर्वतोंके समान हैं। इन्हें किसने मार गिराया है?
Himavān, Pāriyātra, Vindhya, dan Malaya—empat gunung perkasa itu: siapakah yang telah merobohkan saudara-saudaraku yang bercahaya laksana pegunungan?
Verse 33
अतीव ते महत् कर्म कृतं च बलिनां वर । यान् न देवा न गन्धर्वा नासुराश्च न राक्षसा:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--
Wahai yang terbaik di antara para perkasa, engkau telah menuntaskan perbuatan yang amat besar—yang tak sanggup dilakukan para dewa, para Gandharva, para Asura, maupun para Rākṣasa.
Verse 34
विषहेरन् महायुद्धे कृतं ते तन्महादभुतम् । न ते जानामि यत् कार्य नाभिजानामि काड्क्षितम्
Yudhiṣṭhira berkata— “Bahwa engkau mampu bertahan dalam perang besar—apa yang telah kau lakukan sungguh menakjubkan. Namun aku tidak mengerti tugas apa yang kau maksud, dan aku pun tidak dapat menangkap apa yang kau kehendaki.”
Verse 35
बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर! तुमने यह अत्यन्त महान् कर्म किया है। बड़े-बड़े युद्धोंमें जिन वीरों-(के प्रभाव)-को देवता, गन्धर्व, असुर तथा राक्षस भी नहीं सह सकते थे, उन्हें गिराकर तुमने परम अद्भुत पराक्रम किया है। तुम्हारा कार्य क्या है? यह मैं नहीं जानता। तुम क्या चाहते हो? इसका भी मुझे पता नहीं है ।। कौतूहलं महज्जातं साध्वसं चागतं मम । येनास्म्युद्विग्नहरदय: समुत्पन्नशिरोज्वर:,पृच्छामि भगवंस्तस्मात् को भवानिह तिष्ठति । तुम्हारे विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो गया है। तुमसे मुझे कुछ भय भी लगने लगा है, जिससे मेरा हृदय उद्विग्न हो उठा है और सिरमें संताप होने लगा है। अतः भगवन! मैं विनयपूर्वक पूछता हूँ, तुम यहाँ कौन विराज रहे हो?
Yudhiṣṭhira berkata— “Wahai pahlawan, yang utama di antara para perkasa! Engkau telah menuntaskan perbuatan yang amat agung. Dalam peperangan besar ada para kesatria yang dayanya bahkan tak sanggup ditanggung para dewa, Gandharva, Asura, dan Rākṣasa—namun engkau menjatuhkan mereka dan memperlihatkan keberanian yang sungguh menakjubkan. Tetapi apa maksudmu, aku tidak tahu; dan apa yang kau cari pun aku tidak mengerti. Dalam diriku timbul rasa ingin tahu yang besar, dan juga seberkas gentar; hatiku gelisah dan seakan demam naik ke kepala. Maka, wahai yang mulia, dengan rendah hati aku bertanya: siapakah engkau yang berdiri di sini?”
Verse 36
यक्ष उवाच यक्षो5हमस्मि भद्रं ते नास्मि पक्षी जलेचर:
Yaksha berkata— “Aku adalah Yaksha; semoga kebaikan menyertaimu. Aku bukan burung, dan bukan pula makhluk yang bergerak di air.”
Verse 37
वैशग्पायन उवाच ततस्तामशिवां श्र॒ुत्वा वाचं स परुषाक्षराम्
Vaiśaṃpāyana berkata— “Lalu, setelah mendengar ucapan yang tidak membawa pertanda baik itu—keras pada tiap suku katanya—ia pun menanggapinya.”
Verse 38
यक्षस्य ब्रुवतो राजन्नुपक्रम्प तदा स्थित: । विरूपाक्षं महाकायं यक्षं तालसमुच्छुयम्
Vaiśaṃpāyana berkata— “Wahai Raja, ketika Yaksha itu berbicara, ia melangkah maju dan berdiri dekat dengannya—memandang Yaksha bermata ganjil lagi menggentarkan, bertubuh raksasa, dan menjulang setinggi pohon palmyra.”
Verse 39
ज्वलनार्कप्रतीकाशमधृष्यं पर्वतोपमम् । वृक्षमाश्रित्य तिष्ठन्तं ददर्श भरतर्षभ:
Vaiśaṃpāyana berkata—yang terbaik di antara Bharata melihatnya berdiri berlindung pada sebatang pohon—bercahaya laksana api dan matahari, tak tergoyahkan, dan menjulang seperti gunung.
Verse 40
मेघगम्भीरनादेन तर्जयन्तं महास्वनम् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! तत्पश्चात् उस समय इस प्रकार बोलनेवाले उस यक्षकी वह अमंगलमयी और कठोर वाणी सुनकर भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर उसके पास जाकर खड़े हो गये। उन्होंने देखा, एक विकट नेत्रोंवाला विशालकाय यक्ष वृक्षके ऊपर बैठा है। वह बड़ा ही दुर्धर्ष, ताड़के समान लंबा, अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी तथा पर्वतके समान ऊँचा है। वही अपनी मेघके समान गम्भीर नादयुक्त वाणीसे उन्हें फटकार रहा है। उसकी आवाज बहुत ऊँची है ।। यक्ष उवाच इमे ते भ्रातरो राजन् वार्यमाणा मयासकृत्,यक्षने कहा--राजन्! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्छिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है। कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ
Dengan suara sedalam gemuruh awan, Yaksha mengaum dan mengancam dengan nada yang dahsyat. Yudhiṣṭhira, yang terbaik di antara Bharata, mendekat dan melihat—seorang Yaksha raksasa bermata mengerikan duduk di pucuk pohon; tinggi laksana pohon palem, bercahaya seperti api dan matahari, dan menjulang seperti gunung. Dengan suara seberat awan ia membentak mereka. Yaksha berkata: “Wahai Raja, saudara-saudaramu ini telah berkali-kali kuperingatkan; namun mereka hendak mengambil air dengan paksa; maka kutumbangkan mereka. Wahai Yudhiṣṭhira, jika engkau ingin menjaga nyawamu, jangan minum air ini. Wahai Pārtha, jangan bertindak nekat—air ini berada di bawah kekuasaanku sejak semula. Putra Kuntī, jawab dahulu pertanyaanku; barulah engkau boleh minum dan membawa air itu.”
Verse 41
बलात् तोयं जिहीर्षन्तस्ततो वै मृदिता मया | न पेयमुदकं राजन् प्राणानिह परीप्सता,यक्षने कहा--राजन्! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्छिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है। कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ
Yaksha berkata: “Mereka hendak mengambil air dengan paksa; maka kutumbangkan mereka. Wahai Raja, jika engkau ingin menjaga nyawamu di sini, jangan minum air ini. Putra Kuntī, jawab dahulu pertanyaanku; barulah engkau boleh minum dan membawa air itu.”
Verse 42
पार्थ मा साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च,यक्षने कहा--राजन्! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्छिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है। कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ
Yaksha berkata: “Wahai Pārtha, jangan bertindak nekat; air ini telah lebih dahulu menjadi milikku. Putra Kuntī, jawab dahulu pertanyaanku; barulah engkau boleh minum dan membawa air itu.”
Verse 43
युधिछिर उवाच न चाहं कामये यक्ष तव पूर्वपरिग्रहम् । काम॑ नैतत् प्रशंसन्ति सन््तो हि पुरुषा: सदा,युधिष्ठिरने कहा--यक्ष! मैं तुम्हारे अधिकारकी वस्तुको नहीं ले जाना चाहता। मैं स्वयं ही अपनी बड़ाई करूँ; इस बातकी सत्पुरुष कभी प्रशंसा नहीं करते। मैं अपनी बुद्धिके अनुसार तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दूँगा, तुम मुझसे प्रश्न करो
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Yaksha, aku tidak ingin mengambil sesuatu yang telah berada di bawah klaimmu yang lebih dahulu. Orang-orang mulia tidak pernah memuji sikap membanggakan diri. Aku akan menjawab pertanyaanmu menurut pemahamanku—tanyakan apa yang kau kehendaki.”
Verse 44
यदात्मना स्वमात्मान प्रशंसे पुरुषर्षभ । यथाप्रज्ञं तु ते प्रश्नान् प्रतिवक्ष्यामि पूच्छ माम्,युधिष्ठिरने कहा--यक्ष! मैं तुम्हारे अधिकारकी वस्तुको नहीं ले जाना चाहता। मैं स्वयं ही अपनी बड़ाई करूँ; इस बातकी सत्पुरुष कभी प्रशंसा नहीं करते। मैं अपनी बुद्धिके अनुसार तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दूँगा, तुम मुझसे प्रश्न करो
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang terbaik di antara manusia, pujian yang diucapkan seseorang untuk dirinya sendiri bukanlah pujian yang disetujui oleh para bijak. Namun, menurut pemahamanku, aku akan menjawab pertanyaan-pertanyaanmu. Tanyalah aku.”
Verse 45
यक्ष उवाच कि स्विदादित्यमुन्नयति के च तस्याभितकश्नचरा: । कश्नैनमस्तं नयति कम्मेंश्ष प्रतेतिष्ठति,यक्षने पूछा--सूर्यको कौन ऊपर उठाता (उदित करता) है? उसके चारों ओर कौन चलते हैं? उसे अस्त कौन करता है? और वह किसमें प्रतिष्ठित है?
Yaksha bertanya: “Dengan kekuatan apa Matahari terangkat saat fajar? Siapa yang bergerak mengelilinginya dari segala sisi? Siapa yang membuatnya terbenam? Dan pada apa ia pada akhirnya bersandar?”
Verse 46
युधिछिर उवाच ब्रह्मादित्यमुन्नयति देवास्तस्याभितकश्चरा: । धर्मश्षास्तं नयति च सत्ये च प्रतितिष्ठति,युधिष्ठिर बोले--ब्रह्म सूर्यको ऊपर उठाता (उदित करता) है, देवता उसके चारों ओर चलते हैं, धर्म उसे अस्त करता है और वह सत्यमें प्रतिष्ठित है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Brahmā mengangkat Matahari saat fajar; para dewa bergerak mengelilinginya dari segala sisi. Dharma menuntunnya menuju terbenam, dan ia tegak berlandaskan Kebenaran.”
Verse 47
यक्ष उवाच केनस्विच्छोत्रियो भवति केनस्विद् विन्दते महत् । केनस्विद् द्वितीयवान् भवति राजन् केन च बुद्धिमान्,यक्षने पूछा--राजन्! मनुष्य श्रोत्रिय किससे होता है? महत्पदको किसके द्वारा प्राप्त करता है? वह किसके द्वारा द्वितीयवान् होता है? और किससे बुद्धिमान होता है?
Yaksha bertanya: “Wahai raja, dengan apa seseorang menjadi śrotriya sejati (teguh dalam ajaran suci)? Dengan apa ia meraih kebesaran? Dengan apa ia memperoleh ‘yang kedua’—penopang atau sahabat yang dapat diandalkan? Dan dengan apa ia menjadi bijaksana?”
Verse 48
युधिछिर उवाच श्रुतेन श्रोत्रियो भवति तपसा विन्दते महत् | धृत्या द्वितीयवान् भवति बुद्धिमान् वृद्धसेवया,युधिष्ठिर बोले--वेदाध्ययनके द्वारा मनुष्य श्रोत्रिय होता है, तपसे महत्पद प्राप्त करता है, धर्यसे द्वितीयवान् (दूसरे साथीसे युक्त) होता है और वृद्ध पुरुषोंकी सेवासे बुद्धिमान् होता है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Dengan śruti—yakni belajar Weda—seseorang menjadi śrotriya; dengan tapa ia meraih kebesaran. Dengan keteguhan hati ia memperoleh ‘yang kedua’—penopang dan sahabat; dan dengan melayani para sesepuh ia menjadi bijaksana.”
Verse 49
यक्ष उवाच कि ब्राह्मणानां देवत्वं कश्न धर्म: सतामिव । कश्चैषां मानुषो भाव: किमेषामसतामिव,यक्षने पूछा--्राह्मणोंमें देवत्व क्या है? उनमें सत्पुरुषोंका-सा धर्म क्या है? उनका मनुष्यभाव क्या है? और उनमें असत्पुरुषोंका-सा आचरण क्या है?
Yakṣa bertanya: “Apakah sifat ilahi pada para brāhmaṇa? Dharma apakah pada mereka yang menyerupai laku orang-orang bajik? Apa pada diri mereka yang semata-mata manusiawi? Dan apa pada mereka yang menyerupai perilaku orang-orang durjana?”
Verse 50
युधिछिर उवाच स्वाध्याय एपषां देवत्वं तप एषां सतामिव । मरणं मानुषो भाव: परिवादोडसतामिव,युधिष्ठिर बोले--वेदोंका स्वाध्याय ही ब्राह्मणोंमें देवत्व है, तप सत्पुरुषोंका-सा धर्म है, मरना मनुष्य-भाव है और निन्दा करना असत्पुरुषोंका-सा आचरण है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Bagi para brāhmaṇa, keilahian terletak pada svādhyāya—pembacaan dan pengkajian Veda yang tertib. Bagi orang bajik, tapa adalah dharma mereka. Kematian adalah keadaan manusia; tetapi mencela dan memfitnah adalah laku orang durjana.”
Verse 51
यक्ष उवाच कि क्षत्रियाणां देवत्वं कश्न धर्म: सतामिव । कश्नैषां मानुषो भाव: किमेषामसतामिव,यक्षने पूछा-.क्षत्रियोंमें देवत्व क्या है? उनमें सत्पुरुषोंका-सा धर्म क्या है? उनका मनुष्यभाव क्या है? और उनमें असत्पुरुषोंका-सा आचरण क्या है?
Yakṣa bertanya: “Pada seorang kṣatriya, apakah sifat yang menjadikannya ‘laksana dewa’? Dharma apakah padanya yang menyerupai laku orang-orang bajik? Apa yang semata-mata manusiawi padanya? Dan apa yang menyerupai cara orang-orang durjana?”
Verse 52
युधिछिर उवाच इष्वस्त्रमेषां देवत्वं यज्ञ एषां सतामिव । भयं वै मानुषो भाव: परित्यागोडसतामिव,युधिष्ठिर बोले--बाण विद्या क्षत्रियोंका देवत्व है, यज्ञ उनका सत्पुरुषोंका-सा धर्म है, भय मानवीय भाव है और शरणमें आये हुए दु:खियोंका परित्याग कर देना उनमें असत्पुरुषोंका-सा आचरण है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Bagi para kṣatriya, kemahiran busur-panah dan senjata adalah keilahian mereka; yajña adalah dharma mereka, seperti orang-orang saleh. Rasa takut memang naluri manusia; tetapi menelantarkan orang yang datang memohon perlindungan dalam derita adalah laku orang tak benar.”
Verse 53
यक्ष उवाच किमेकं यज्ञियं साम किमेकं यज्ञियं यजु: । का चैषां वृणुते यज्ञं कां यज्ञो नातिवर्तते,यक्षने पूछा--कौन एक वस्तु यज्ञिय साम है? कौन एक (यज्ञसम्बन्धी) यज्ञिय यजु है? कौन एक वस्तु यज्ञका वरण करती है? और किस एकका यज्ञ अतिक्रमण नहीं करता?
Yakṣa bertanya: “Apakah satu hal yang menjadi Sāman bagi yajña? Apakah satu hal yang menjadi Yajus bagi yajña? Yang manakah di antara ini yang memilih (menerima) yajña? Dan satu hal apakah yang tak pernah dilampaui oleh yajña?”
Verse 54
युधिछिर उवाच प्राणो वै यज्ञियं साम मनो वै यज्ञियं यजु: । ऋगेका वृणुते यज्ञ तां यज्ञो नातिवर्तते,युधिष्ठिर बोले--प्राण ही यज्ञिय साम है, मन ही यज्ञसम्बन्धी यजु है, एकमात्र ऋचा ही यज्ञका वरण करती है और उसीका यज्ञ अतिक्रमण नहीं करता
Yudhiṣṭhira berkata: “Napas itulah Sāman yang layak bagi yajña; pikiran itulah Yajus yang layak bagi yajña. Satu-satunya mantra Ṛk-lah yang memilih dan menegakkan yajña, dan yajña tidak melampaui batas Ṛk itu.”
Verse 55
यक्ष उवाच किंस्विदावपतां श्रेष्ठ किंस्विन्निवपतां वरम् | किंस्वित् प्रतिष्ठमानानां किंस्वित् प्रसवतां वरम्
Yakṣa berkata: “Bagi para pembajak, apakah yang terbaik? Bagi para penabur benih, apakah yang paling utama? Bagi mereka yang hendak tegak dalam kedudukan, apakah penopang terbaik? Dan bagi mereka yang melahirkan (menghasilkan), apakah yang paling mulia?”
Verse 56
यक्षने पूछा--खेती करनेवालोंके लिये कौन-सी वस्तु श्रेष्ठ है? बिखेरने (बोने) वालोंके लिये क्या श्रेष्ठ है? प्रतिष्ठाप्राप्त धनियोंके लिये कौन-सी वस्तु श्रेष्ठ है? तथा संतानोत्पादन करनेवालोंके लिये क्या श्रेष्ठ है? ।। युधिछिर उवाच वर्षमावपतां श्रेष्ठ बीज॑ निवपतां वरम् | गाव: प्रतिष्ठमानानां पुत्र: प्रसवतां वर:,महात्मनि महाबाहो कुरूणां कीर्तिविर्धने । वे बोले--“महाबाहु वृकोदर! तुमने यह प्रतिज्ञा की थी कि "मैं युद्धमें अपनी गदासे दुर्योधनकी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा। महाबाहो! तुम कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले थे। तुम्हारा हृदय विशाल था। वीर! आज तुम्हारे गिर जानेसे मेरे लिये वह सब कुछ व्यर्थ हो गया युधिष्ठिर बोले--खेती करनेवालोंके लिये वर्षा श्रेष्ठ है। बिखेरने (बोने) वालोंके लिये बीज श्रेष्ठ है। प्रतिष्ठाप्राप्त धनियोंके लिये गौ (का पालन-पोषण और संग्रह) श्रेष्ठ है और संतानोत्पादन करनेवालोंके लिये पुत्र श्रेष्ठ है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Bagi para penggarap, hujan adalah yang tertinggi; bagi para penabur, benih adalah yang terbaik. Bagi orang kaya yang telah mapan, ternak sapi adalah penopang terbaik; dan bagi mereka yang menghendaki keturunan, seorang putra adalah yang paling utama.”
Verse 57
यक्ष उवाच इन्द्रियार्थाननु भवन् बुद्धिमाँलल्लोकपूजित: । सम्मत: सर्वभूतानामुच्छवसन् को न जीवति,यक्षने पूछा--ऐसा कौन पुरुष है, जो बुद्धिमान, लोकमें सम्मानित और सब प्राणियोंका माननीय होकर एवं इन्द्रियोंक विषयोंको अनुभव करते तथा श्वास लेते हुए भी वास्तवमें जीवित नहीं है?
Yakṣa berkata: “Siapakah orang itu yang, meski menikmati objek-objek indria, cerdas, dihormati dunia, disetujui semua makhluk, dan masih bernapas, namun sesungguhnya tidak hidup?”
Verse 58
युधिछिर उवाच देवतातिथिभृत्यानां पितृणामात्मनश्न यः । न निर्वपति पज्चानामुच्छवसन् न स जीवति
Yudhiṣṭhira menjawab: “Seseorang yang tidak mempersembahkan bagian yang semestinya kepada lima pihak—para dewa, tamu, para pelayan/tanggungan, para leluhur, dan dirinya sendiri—meski ia masih bernapas, sesungguhnya ia tidak hidup.”
Verse 59
युधिष्ठिरने कहा--जो देवता, अतिथि, भरणीय कुटुम्बीजन, पितर और आत्मा--इन पाँचोंका पोषण नहीं करता, वह श्वास लेनेपर भी जीवित नहीं है ।। यक्ष उवाच किंस्विद् गुरुतरं भूमे: किंस्विदुच्चतरं च खात् । किंस्विच्छीघ्रतरं वायो: किंस्विद् बहुतरं तृणात्,यक्षने पूछा--पृथ्वीसे भी भारी क्या है? आकाशसे भी ऊँचा क्या है? वायुसे भी तेज चलनेवाला क्या है? और तिनकोंसे भी अधिक (असंख्य) क्या है?
Yudhiṣṭhira berkata: “Barangsiapa tidak memelihara lima ini—para dewa, tamu, sanak-keluarga yang wajib ditanggung, para leluhur, dan dirinya sendiri—ia, meski bernapas, sesungguhnya tidak hidup.” Yakṣa bertanya: “Apa yang lebih berat daripada bumi? Apa yang lebih tinggi daripada langit? Apa yang lebih cepat daripada angin? Dan apa yang lebih banyak daripada helai-helai rumput?”
Verse 60
युधिछ्िर उवाच माता गुरुतरा भूमे: खातू् पितोच्चतरस्तथा । मन: शीघ्रतरं वाताच्चिन्ता बहुतरी तृणात्,युधिष्ठिर बोले--माताका गौरव पृथ्वीसे भी अधिक है। पिता आकाशसे भी ऊँचा है। मन वायुसे भी तेज चलनेवाला है और चिन्ता तिनकोंसे भी अधिक असंख्य एवं अनन्त है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Ibu lebih berat—lebih mulia—daripada bumi; ayah lebih tinggi daripada langit. Pikiran lebih cepat daripada angin, dan kecemasan lebih banyak serta merata daripada helai-helai rumput.”
Verse 61
यक्ष उवाच किंस्वित् सुप्तं न निमिषति किंस्विज्जातं न चोपति | कस्यस्विद्धृदयं नास्ति किंस्विद् वेगेन वर्धते,यक्षने पूछा--कौन सोनेपर भी आँखें नहीं मूँदता? उत्पन्न होकर भी कौन चेष्टा नहीं करता? किसमें हृदय नहीं है? और कौन वेगसे बढ़ता है
Yakṣa bertanya: “Apakah yang, meski tidur, tidak berkedip? Apakah yang, meski lahir, tidak berusaha? Siapakah yang tidak memiliki hati? Dan apakah yang tumbuh cepat karena laju?”
Verse 62
युधिछिर उवाच मत्स्य: सुप्तो न निमिषत्यण्डं जातं न चोपति । अश्मनो हृदयं नास्ति नदी वेगेन वर्धते,युधिष्ठिर बोले--मछली सोनेपर भी आँखें नहीं मूँदती, अण्डा उत्पन्न होकर भी चेष्टा नहीं करता, पत्थरमें हृदय नहीं है और नदी वेगसे बढ़ती है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Ikan, meski tidur, tidak berkedip; telur, meski telah ada, tidak berusaha. Batu tidak memiliki hati; dan sungai membesar oleh derasnya arus.”
Verse 63
यक्ष उवाच किंस्वित् प्रवसतो मित्र किंस्विन्मित्रं गृहे सतः । आतुरस्य च किं मित्र किंस्विन्मित्रं मरिष्यत:,यक्षने पूछा--प्रवासी (परदेशके यात्री)-का मित्र कौन है? गृहवासी (गृहस्थ)-का मित्र कौन है? रोगीका मित्र कौन है? और मृत्युके समीप पहुँचे हुए पुरुषका मित्र कौन है?
Yakṣa bertanya: “Siapakah sahabat bagi seorang perantau? Siapakah sahabat bagi orang yang tinggal di rumah? Siapakah sahabat bagi orang sakit? Dan siapakah sahabat bagi orang yang telah mendekati maut?”
Verse 64
युधिछिर उवाच सार्थ: प्रवसतो मित्र भार्या मित्र गृहे सतः । आतुरस्य भिषड्मित्र दानं मित्र मरिष्यत:,युधिष्ठिर बोले--सहयात्रियोंका समुदाय अथवा साथमें यात्रा करनेवाला साथी ही प्रवासीका मित्र है, पत्नी गृहवासीका मित्र है, वैद्य रोगीका मित्र है और दान मुमूर्षु (अर्थात् मरनेवाले) मनुष्यका मित्र है
Yudhiṣṭhira berkata: Bagi perantau, kafilah dan para sesama pengembara adalah sahabatnya; bagi yang tinggal di rumah, istri adalah sahabat; bagi yang sakit, tabib adalah sahabat; dan bagi manusia yang mendekati ajal, sahabat sejatinya adalah dana—derma kebajikan yang menolongnya melampaui hidup ini.
Verse 65
यक्ष उवाच को35तिथि: सर्वभूतानां किंस्विद् धर्म सनातनम् | अमृतं किंस्विद् राजेन्द्र किंस्वित् सर्वमिदं जगत्,यक्षने पूछा--राजेन्द्र! समस्त प्राणियोंका अतिथि कौन है? सनातन धर्म कया है? अमृत क्या है? और यह सारा जगत् क्या है?
Yakṣa berkata: “Wahai raja, siapakah tamu bagi semua makhluk? Apakah Dharma yang kekal (Sanātana)? Apakah yang disebut ‘amṛta’ (keabadian/nectar)? Dan apakah sesungguhnya seluruh dunia ini?”
Verse 66
भवतां दिव्यवाचस्तु ता भवन्तु कथं मृषा । “साधारण मनुष्योंकी बातें तथा उनकी प्रतिज्ञाएँ तो झूठी निकल जाती हैं; परंतु तुमलोगोंके सम्बन्धमें जो दिव्य वाणियाँ हुई थीं, वे कैसे मिथ्या हो सकती हैं?,युधिछिर उवाच अतिथि: सर्वभूतानामग्नि: सोमो गवामृतम् | सनातनोअमृतो धर्मो वायु: सर्वमिदं जगत् युधिष्ठिर बोले--अग्नि समस्त प्राणियोंका अतिथि है, गौका दूध अमृत है, अविनाशी नित्य धर्म ही सनातन धर्म है और वायु यह सारा जगत् है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Api adalah tamu bagi semua makhluk; susu sapi adalah amṛta; Dharma yang tak binasa dan abadi itulah Sanātana Dharma; dan anginlah seluruh dunia ini—meresap ke segala penjuru.”
Verse 67
यक्ष उवाच किंस्विदेको विचरते जात: को जायते पुन: । किंस्विद्धिमस्य भैषज्यं किंस्विदावपनं महत्
Yakṣa bertanya: “Apakah yang berjalan sendirian? Siapakah yang lahir berulang-ulang? Apakah obat bagi keadaan ini? Dan apakah ‘penaburan’ yang agung—tindakan menabur yang menghasilkan buah tertinggi?”
Verse 68
यक्षने पूछा--अकेला कौन विचरता है? एक बार उत्पन्न होकर पुन: कौन उत्पन्न होता है? शीतकी ओषधि क्या है? और महान् आवपन (क्षेत्र) क्या है? ।। युधिछिर उवाच सूर्य एको विचरते चन्द्रमा जायते पुनः । अग्निर्हिमस्य भैषज्यं भूमिरावपनं महत्,युधिष्ठिर बोले--सूर्य अकेला विचरता है, चन्द्रमा एक बार जन्म लेकर पुनः जन्म लेता है, अग्नि शीतकी ओषधि है और पृथ्वी बड़ा भारी आवपन है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Matahari bergerak sendirian. Bulan, setelah lahir sekali, lahir kembali dan kembali. Api adalah obat bagi dingin. Dan bumi adalah ladang penaburan yang agung—hamparan luas tempat perbuatan ditanam dan berbuah.”
Verse 69
यक्ष उवाच किंस्विदेकपदं धर्म्य किंस्विदेकपर्द यश: । किंस्विदेकपदं स्वर्ग्य किंस्विदेकप्दं सुखम्,यक्षने पूछा--धर्मका मुख्य स्थान क्या है? यशका मुख्य स्थान क्या है? स्वर्गका मुख्य स्थान क्या है? और सुखका मुख्य स्थान क्या है?
Yaksha berkata: “Apakah satu landasan utama yang menjadikan seseorang sungguh-sungguh benar (dharma)? Apakah satu landasan utama bagi kemasyhuran? Apakah satu landasan utama yang menuntun ke surga? Dan apakah satu landasan utama bagi kebahagiaan?”
Verse 70
युधिछिर उवाच दाक्ष्यमेकपद धर्म्य दानमेकपर्द यश: । सत्यमेकपदं स्वर्ग्य शीलमेकपदं सुखम्,युधिछिर बोले--धर्मका मुख्य स्थान दक्षता है, यशका मुख्य स्थान दान है, स्वर्गका मुख्य स्थान सत्य है और सुखका मुख्य स्थान शील है
Yudhiṣṭhira berkata: “Kecakapan yang terampil adalah landasan utama dharma; kedermawanan adalah landasan utama kemasyhuran. Kebenaran adalah landasan utama menuju surga, dan keluhuran budi (perilaku baik) adalah landasan utama kebahagiaan.”
Verse 71
यक्ष उवाच किंस्विदात्मा मनुष्यस्य किंस्विद् दैवकृत: सखा । उपजीवनं किंस्विदस्य किंस्विदस्य परायणम्
Yakṣa berkata: “Apakah sesungguhnya diri (ātman) seorang manusia? Siapakah sahabat yang dianugerahkan oleh takdir? Apakah sarana penghidupannya? Dan apakah perlindungan tertinggi serta tempat kembali terakhirnya?”
Verse 72
यक्षने पूछा--मनुष्यकी आत्मा क्या है? इसका दैवकृत सखा कौन है? इसका उपजीवन (जीवनका सहारा) क्या है? और इसका परम आश्रय क्या है? ।। युधिछिर उवाच पुत्र आत्मा मनुष्यस्य भार्या दैवकृतः सखा | उपजीवनं च पर्जन्यो दानमस्य परायणम्,युधिष्ठिर बोले--पुत्र मनुष्यकी आत्मा है, स्त्री इसकी दैवकृत सहचरी है, मेघ उपजीवन है और दान इसका परम आश्रय है
Yudhiṣṭhira berkata: “Seorang putra adalah diri seorang manusia; seorang istri adalah sahabat yang ditetapkan oleh takdir. Awan pembawa hujan (Parjanya) adalah penopang penghidupannya, dan kedermawanan adalah perlindungan tertingginya.”
Verse 73
यक्ष उवाच धन्यानामुत्तमं किंस्विद् धनानां स्यात् किमुत्तमम् | लाभानामुत्तमं कि स्यात् सुखानां स्यात् किमुत्तमम्,यक्षने पूछा--धन्यवादके योग्य पुरुषोंमें उत्तम गुण क्या है? धनोंमें उत्तम धन क्या है? लाभोंमें प्रधान लाभ क्या है? और सुखोंमें उत्तम सुख क्या है?
Yakṣa berkata: “Di antara orang-orang yang patut disebut mulia, apakah yang paling utama? Di antara segala harta, harta apakah yang paling utama? Di antara segala keuntungan, keuntungan apakah yang paling utama? Dan di antara segala kebahagiaan, kebahagiaan apakah yang paling utama?”
Verse 74
युधिछिर उवाच धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम् । लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा,युधिष्ठिर बोले--धन्य पुरुषोंमें दक्षता ही उत्तम गुण है, धनोंमें शास्त्रज्ञान प्रधान है, लाभोंमें आरोग्य श्रेष्ठ है और सुखोंमें संतोष ही उत्तम सुख है
Yudhiṣṭhira berkata: “Di antara orang-orang yang beruntung, kecakapan adalah yang utama; di antara kekayaan, pengetahuan śāstra (śruta) adalah yang tertinggi; di antara keuntungan, kesehatan adalah yang terbaik; dan di antara kebahagiaan, kepuasan batin adalah yang paling luhur.”
Verse 75
यक्ष उवाच कश्च धर्म: परो लोके कश्न धर्म: सदाफल: । कि नयम्य न शोचन्ति कैश्नल संधिर्न जीर्यते,यक्षने पूछा--लोकमें श्रेष्ठ धर्म क्या है? नित्य फलवाला धर्म क्या है? किसको वशमें रखनेसे मनुष्य शोक नहीं करते? और किनके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती?
Yakṣa berkata: “Apakah dharma tertinggi di dunia ini? Dharma apakah yang berbuah tanpa gagal? Dengan mengekang apa manusia terbebas dari duka? Dan dengan siapa persahabatan yang telah terjalin tak pernah lapuk?”
Verse 76
युधिछिर उवाच आनुशंस्यं परो धर्मस्त्रयी धर्म: सदाफल: । मनो यम्य न शोचन्ति संधि: सदभिर्न जीर्यते,युधिष्ठिर बोले--लोकमें दया श्रेष्ठ धर्म है, वेदोक्त धर्म नित्य फलवाला है, मनको वशभमें रखनेसे मनुष्य शोक नहीं करते और सत्पुरुषोंके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती
Yudhiṣṭhira menjawab: “Belas kasih adalah dharma tertinggi; dharma yang diajarkan Veda (trayī) berbuah tanpa putus; dengan mengekang pikiran orang terbebas dari duka; dan persahabatan dengan orang saleh tak pernah lapuk.”
Verse 77
यक्ष उवाच कि नु हित्वा प्रियो भवति कि नु हित्वा न शोचति । कि नु हित्वार्थवान् भवति कि नु हित्वा सुखी भवेत्,यक्षने पूछा--किस वस्तुको त्यागकर मनुष्य प्रिय होता है? किसको त्यागकर शोक नहीं करता? किसको त्यागकर वह अर्थवान् होता है? और किसको त्यागकर सुखी होता है?
Yakṣa bertanya: “Dengan meninggalkan apa seseorang menjadi disayangi? Dengan meninggalkan apa ia tak lagi berduka? Dengan meninggalkan apa ia menjadi benar-benar makmur? Dan dengan meninggalkan apa ia menjadi bahagia?”
Verse 78
युधिछिर उवाच मान हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति । काम हित्वार्थवान् भवति लोभ हित्वा सुखी भवेत्,युधिष्ठिर बोले--मानको त्याग देनेपर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोधको त्यागकर शोक नहीं करता, कामको त्यागकर वह अर्थवान् होता है और लोभको त्यागकर सुखी होता है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Dengan meninggalkan kesombongan (māna) seseorang menjadi disayangi; dengan meninggalkan amarah ia tak lagi berduka; dengan meninggalkan nafsu-keinginan (kāma) ia menjadi makmur; dan dengan meninggalkan ketamakan (lobha) ia menjadi bahagia.”
Verse 79
यक्ष उवाच किमर्थ ब्राह्मणे दानं किमर्थ नटनर्तके । किमर्थ चैव भृत्येषु किमर्थ चैव राजसु,यक्षने पूछा--ब्राह्मणको किसलिये दान दिया जाता है? नट और नर्तकोंको क्यों दान देते हैं? सेवकोंको दान देनेका क्या प्रयोजन है? और राजाओंको क्यों दान दिया जाता है?
Yaksha berkata: “Untuk tujuan apa sedekah diberikan kepada seorang brāhmaṇa? Untuk tujuan apa diberikan kepada para aktor dan penari? Apa alasan memberi kepada para pelayan? Dan mengapa persembahan diberikan kepada para raja?”
Verse 80
युधिछिर उवाच धर्मार्थ ब्राह्मणे दानं यशो<र्थ नटनर्तके । भृत्येषु भरणार्थ वै भयार्थ चैव राजसु,युधिष्ठिर बोले--ब्राह्मणको धर्मके लिये दान दिया जाता है, नट-नर्तकोंको यशके लिये दान (धन) देते हैं, सेवकोंको उनके भरण-पोषणके लिये दान (वेतन) दिया जाता है और राजाओंको भयके कारण दान (कर) देते हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Sedekah kepada brāhmaṇa diberikan demi dharma; kepada aktor dan penari diberikan demi kemasyhuran dan penghormatan umum. Kepada para pelayan diberikan upah untuk pemeliharaan mereka; dan kepada raja diberikan karena takut—seperti pajak atau upeti.”
Verse 81
यक्ष उवाच केनस्विदावृतो लोक: केनस्विन्न प्रकाशते । केन त्यजति मित्राणि केन स्वर्ग न गच्छति,यक्षने पूछा--जगत् किस वस्तुसे ढका हुआ है? किसके कारण वह प्रकाशित नहीं होता? मनुष्य मित्रोंको किसलिये त्याग देता है? और स्वर्गमें किस कारण नहीं जाता?
Yakṣa berkata: “Dengan apa dunia ini terselubung? Karena apa ia tidak tampak bercahaya? Karena apa seseorang meninggalkan sahabat? Dan karena apa ia tidak mencapai surga?”
Verse 82
युधिछिर उवाच अज्ञानेनावृतो लोकस्तमसा न प्रकाशते । लोभात् त्यजति मित्राणि संगात् स्वर्ग न गच्छति,युधिष्ठिर बोले--जगत् अज्ञानसे ढका हुआ है, तमोगुणके कारण वह प्रकाशित नहीं होता, लोभके कारण मनुष्य मित्रोंको त्याग देता है और आसक्तिके कारण स्वर्गमें नहीं जाता
Yudhiṣṭhira berkata: “Dunia terselubung oleh ketidaktahuan; oleh tamas ia tidak bercahaya. Karena loba seseorang meninggalkan sahabat; dan karena keterikatan ia tidak mencapai surga.”
Verse 83
यक्ष उवाच मृतः कथं स्यात् पुरुष: कथ॑ राष्ट्र मृतं भवेत् । श्राद्ध मृतं कथं वा स्यात् कथं यज्ञों मृतो भवेत्
Yakṣa berkata: “Dalam hal apa seseorang disebut ‘mati’? Dalam hal apa sebuah kerajaan dapat disebut ‘mati’? Kapan suatu śrāddha dianggap ‘mati’—dan kapan suatu yajña dikatakan ‘mati’?”
Verse 84
यक्षने पूछा--पुरुष किस प्रकार मरा हुआ कहा जाता है? राष्ट्र किस प्रकार मर जाता है? श्राद्ध किस प्रकार मृत हो जाता है? और यज्ञ कैसे नष्ट हो जाता है? ।। युधिछिर उवाच मृतो दरिद्र: पुरुषो मृतं राष्ट्रमराजकम् मृतमश्रोत्रियं श्राद्ध मृतो यज्ञस्त्वदक्षिण:
Yaksha bertanya: “Bagaimana seseorang disebut ‘mati’? Bagaimana sebuah kerajaan ‘mati’? Bagaimana śrāddha menjadi ‘mati’? Dan bagaimana yajña binasa?” ॥ Yudhiṣṭhira menjawab: “Seorang manusia disebut ‘mati’ ketika ia jatuh ke dalam kemelaratan. Sebuah kerajaan ‘mati’ bila tanpa raja. Śrāddha ‘mati’ bila dipersembahkan kepada yang bukan śrotriya sejati. Dan yajña ‘mati’ bila dilakukan tanpa dakṣiṇā (imbalan persembahan) yang semestinya.”
Verse 85
युधिष्ठिर बोले--दरिद्र पुरुष मरा हुआ है यानी मरे हुएके समान है, बिना राजाका राज्य मर जाता है यानी नष्ट हो जाता है, श्रोत्रिय ब्राह्मणके बिना श्राद्ध मृत हो जाता है और बिना दक्षिणाका यज्ञ नष्ट हो जाता है ।। यक्ष उवाच का दिक् किमुदकं प्रोक्त किमन्नं किं च वै विषम् | श्राद्धस्य कालमाख्याहि तत: पिब हरस्व च,यक्षने पूछा--दिशा क्या है? जल क्या है? अन्न क्या है? विष क्या है? और श्राद्धका समय क्या है? यह बताओ। इसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ
Yaksha berkata: “Apa yang disebut ‘arah’? Apa yang disebut ‘air’? Apa itu ‘makanan’? Dan apa sesungguhnya ‘racun’? Katakan pula waktu yang tepat untuk śrāddha. Setelah itu, minumlah—dan bawalah air itu juga.”
Verse 86
युधिछिर उवाच सन््तो दिग् जलमाकाशं गौरन्न प्रार्थना विषम् | श्राद्धस्य ब्राह्मण: काल: कथं वा यक्ष मन्यसे,युधिष्ठिर बोले--सत्पुरुष दिशा हैं, आकाश जल है, पृथ्वी अन्न है, प्रार्थना (कामना) विष है और ब्राह्मण ही श्राद्धका समय है अथवा यक्ष! इस विषयमें तुम्हारी क्या मान्यता है?
Yudhiṣṭhira menjawab: “Orang-orang saleh itulah ‘arah’ yang sejati; langit itulah air; bumi itulah makanan; hasrat/permohonan yang mementingkan diri adalah racun; dan bagi śrāddha, Brāhmaṇa itulah ‘waktu’—yakni saat yang menentukan. Wahai Yaksha, bagaimana pendapatmu?”
Verse 87
यक्ष उवाच तप: कि लक्षणं प्रोक्तं को दमश्न प्रकीर्तित: । क्षमा च का परा प्रोक्ता का च ह्वी: परिकीर्तिता,यक्षने पूछा--तपका क्या लक्षण बताया गया है? दम किसे कहा गया है? उत्तम क्षमा क्या बतायी गयी है? और लज्जा किसको कहा गया है?
Yaksha bertanya: “Apa yang dinyatakan sebagai tanda utama tapas (laku tapa)? Apa yang dipuji sebagai dama (pengendalian diri)? Apa yang diajarkan sebagai kṣamā tertinggi (pemaafan/ketabahan)? Dan apa yang disebut hrī (rasa malu/modesti)?”
Verse 88
युधिछिर उवाच तप: स्वधर्मवर्तित्वं मनसो दमनं दम: । क्षमा द्न्द्सहिष्णुत्वं ह्वीरकार्यनिवर्तनम्,युधिष्ठिर बोले--अपने धर्ममें तत्पर रहना तप है, मनके दमनका ही नाम दम है, सर्दी- गरमी आदि द्वन्दोंको सहन करना क्षमा है तथा न करने योग्य कामसे दूर रहना लज्जा है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Berpegang teguh pada svadharma adalah tapas. Menundukkan batin adalah dama. Menahan pasangan-pasangan yang berlawanan—seperti dingin dan panas—itulah kṣamā. Dan hrī adalah berpaling dari perbuatan yang tak patut dilakukan.”
Verse 89
यक्ष उवाच किं ज्ञानं प्रोच्यते राजन् कः शमश्रन प्रकीर्तित: | दया च का परा प्रोक्ता कि चार्जवमुदाहतम्,यक्षने पूछा--राजन्! ज्ञान किसे कहते हैं? शम क्या कहलाता है? उत्तम दया किसका नाम है? और आर्जव (सरलता) किसे कहते हैं?
Yaksha berkata: “Wahai Raja, apakah yang disebut pengetahuan sejati? Apakah yang dimasyhurkan sebagai śama (pengendalian diri)? Apakah yang dikatakan sebagai welas asih tertinggi? Dan apakah yang dinyatakan sebagai ārjava (kelurusan hati)?”
Verse 90
युधिछिर उवाच ज्ञान तत्त्वार्थसम्बोध: शमक्षित्तप्रशान्तता | दया सर्वसुखैषित्वमार्जवं समचित्तता,युधिष्ठिर बोले--परमात्मतत्त्वका यथार्थ बोध ही ज्ञान है, चित्तकी शान्ति ही शम है, सबके सुखकी इच्छा रखना ही उत्तम दया है और समचित्त होना ही आर्जव (सरलता) है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Pengetahuan sejati adalah kesadaran yang tepat akan hakikat dan makna kenyataan. Śama adalah ketenteraman dan pemadaman gejolak batin. Welas asih adalah kehendak agar semua makhluk berbahagia. Dan ārjava adalah keseimbangan batin dalam segala keadaan.”
Verse 91
यक्ष उवाच कः शत्रुर्दुर्जय: पुंसां कश्न व्याधिरनन्तक: । कीदृशश्च स्मृतः साधुरसाधु: कीदृश: स्मृत:,यक्षने पूछा--मनुष्योंका दुर्जय शत्रु कौन है? अनन्त व्याधि कया है? साधु कौन माना जाता है? और असाधु किसे कहते हैं?
Yaksha berkata: “Apakah musuh manusia yang paling sukar ditaklukkan? Apakah penyakit yang tiada berkesudahan? Orang seperti apakah yang dikenang sebagai sādhū (orang baik), dan orang seperti apakah yang dikenang sebagai asādhū (orang jahat)?”
Verse 92
युधिछिर उवाच क्रोध: सुदुर्जय: शत्रुलोंभो व्याधिरनन्तक: । सर्वभूतहित: साधुरसाधुर्निर्देय: स्मृत:,युधिष्ठिर बोले--क्रोध दुर्जय शत्रु है, लोभ अनन्त व्याधि है तथा जो समस्त प्राणियोंका हित करनेवाला हो, वही साधु है और निर्दयी पुरुषको ही असाधु माना गया है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Amarah adalah musuh yang amat sukar ditaklukkan; ketamakan adalah penyakit yang tiada berujung. Orang yang mengupayakan kesejahteraan semua makhluk disebut sādhū; sedangkan yang kejam dan tak berbelas kasihan dikenang sebagai asādhū.”
Verse 93
यक्ष उवाच को मोह: प्रोच्यते राजन् कश्च मान: प्रकीर्तित: । किमालस्यं च विज्ञेयं कक्ष शोक: प्रकीर्तितः:,यक्षने पूछा--राजन्! मोह किसे कहते हैं? मान क्या कहलाता है? आलस्य किसे जानना चाहिये? और शोक किसे कहते हैं?
Yaksha berkata: “Wahai Raja, apakah yang disebut moha (kebingungan/khayal)? Apakah yang disebut māna (keangkuhan)? Apakah yang harus dipahami sebagai kemalasan? Dan apakah yang disebut duka (śoka)?”
Verse 94
युधिछिर उवाच मोहो हि धर्ममूढत्वं मानस्त्वात्माभिमानिता । धर्मनिष्क्रियता55लस्यं शोकस्त्वज्ञानमुच्यते,युधिष्ठिर बोले--धर्ममूढ़ता ही मोह है, आत्माभिमान ही मान है, धर्मका पालन न करना आलस्य है और अज्ञानको ही शोक कहते हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Kebingungan sejati adalah kemabukan batin yang membuat dharma tak lagi tampak. Kesombongan adalah keangkuhan diri. Kemalasan ialah enggan bertindak menurut dharma. Dan apa yang disebut orang sebagai ‘duka’ pada hakikatnya adalah ketidaktahuan.”
Verse 95
यक्ष उवाच कि स्थैर्यमृषिश्रि: प्रोक्ते कि च धैर्यमुदाह्तम् । स््नान॑ च किं पर प्रोक्तं दानं च किमिहोच्यते,यक्षने पूछा--ऋषियोंने स्थिरता किसे कहा है? धैर्य क्या कहलाता है? परम स्नान किसे कहते हैं? और दान किसका नाम है?
Yaksha berkata: “Apa yang oleh para resi disebut keteguhan? Dan apa yang dinyatakan sebagai ketabahan? Apa yang disebut sebagai ‘mandi’ tertinggi (penyucian sejati)? Dan apakah yang di sini disebut ‘pemberian’ (derma sejati)?”
Verse 96
युधिछिर उवाच स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्य धेर्यमिन्द्रियनिग्रह: । स्नान मनोमलत्यागो दान वै भूतरक्षणम्
Yudhiṣṭhira berkata: “Keteguhan adalah tetap berdiri dalam svadharma. Ketabahan adalah pengekangan indria. ‘Mandi’ adalah menanggalkan kotoran batin. Dan ‘pemberian’ sejati adalah melindungi makhluk hidup.”
Verse 97
युधिष्ठिर बोले--अपने धर्ममें स्थिर रहना ही स्थिरता है, इन्द्रियनिग्रह धैर्य है, मानसिक मलोंका त्याग करना परम स्नान है और प्राणियोंकी रक्षा करना ही दान है ।। यक्ष उवाच कः: पण्डित:ः पुमान् ज्ञेयो नास्तिक: कश्न उच्यते । को मूर्ख: कश्न काम: स्यात् को मत्सर इति स्मृतः,यक्षने पूछा--किस पुरुषको पण्डित समझना चाहिये, नास्तिक कौन कहलाता है? मूर्ख कौन है? काम क्या है? तथा मत्सर किसे कहते हैं?
Yaksha bertanya: “Orang seperti apakah yang patut dikenal sebagai benar-benar bijak? Siapa yang disebut tidak beriman? Siapa yang bodoh? Apakah itu hasrat (kāma)? Dan apakah yang dimaksud dengan iri dengki (matsara)?”
Verse 98
युधिछ्िर उवाच धर्मज्ञ: पण्डितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते । काम: संसारहेतुश्न हृत्तापो मत्सर: स्मृत:,युधिष्ठिर बोले--धर्मज्ञको पण्डित समझना चाहिये, मूर्ख नास्तिक कहलाता है और नास्तिक मूर्ख है तथा जो जन्म-मरणरूप संसारका कारण है, वह वासना काम है और हृदयकी जलन ही मत्सर है
Yudhiṣṭhira berkata: “Orang yang mengenal dharma patut diakui sebagai bijak; yang tidak beriman disebut bodoh. Kāma adalah sebab yang mengekalkan ikatan pada saṃsāra—kelahiran dan kematian; dan nyeri yang membakar di dalam hati itulah yang dikenang sebagai matsara (iri dengki).”
Verse 99
यक्ष उवाच को5हड्कार इति प्रोक्त: कश्न दम्भ: प्रकीर्तित: । कि तद् दैवं परं प्रोक्त कि तत् पैशुन्यमुच्यते,यक्षने पूछा--अहंकार किसे कहते हैं? दम्भ क्या कहलाता है? जिसे परम दैव कहते हैं, वह क्या है? और पैशुन्य किसका नाम है?
Yaksha berkata: “Apakah yang disebut keakuan (egoisme)? Apakah yang disebut dambha—kemunafikan atau kesalehan yang dipamerkan? Apakah yang dinyatakan sebagai ‘daiva’ tertinggi? Dan apakah yang disebut paiśunya—fitnah dan gunjingan yang berniat jahat?”
Verse 100
युधिछिर उवाच महाज्ञानमहड्कारो दम्भो धर्मो ध्वजोच्छूय: । दैवं दानफल प्रोक्तं पैशुन्यं परदूषणम्,युधिष्ठिर बोले--महान् अज्ञान अहंकार है, अपनेको झूठ-मूठ बड़ा धर्मात्मा प्रसिद्ध करना दम्भ है, दानका फल दैव कहलाता है और दूसरोंको दोष लगाना पैशुन्य (चुगली) है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Keakuan sejatinya adalah kebodohan besar. Dambha ialah memamerkan diri seolah-olah sangat saleh. Buah dari memberi (dāna) disebut ‘daiva’. Dan paiśunya ialah mencela, mencari-cari aib, serta menjelekkan orang lain.”
Verse 101
यक्ष उवाच धर्मश्चार्थक्ष॒ कामश्ष॒ परस्परविरोधिन: । एषां नित्यविरुद्धानां कथमेकत्र संगम:,यक्षने पूछा--धर्म, अर्थ और काम--ये सब परस्पर विरोधी हैं। इन नित्य-विरुद्ध पुरुषार्थोका एक स्थानपर कैसे संयोग हो सकता है?
Yaksha berkata: “Dharma, artha, dan kāma saling bertentangan. Jika tujuan-tujuan hidup ini senantiasa berlawanan, bagaimana mungkin ketiganya berpadu dalam satu jalan hidup?”
Verse 102
युधिषछ्िर उवाच यदा धर्मश्न भार्या च परस्परवशानुगौ । तदा धर्मार्थकामानां त्रयाणामपि संगम:,युधिछ्िर बोले--जब धर्म और भार्या-ये दोनों परस्पर अविरोधी होकर मनुष्यके वशमें हो जाते हैं, उस समय धर्म, अर्थ और काम--इन तीनों परस्पर विरोधियोंका भी एक साथ रहना सहज हो जाता है-
Yudhiṣṭhira menjawab: “Bila dharma dan istri berjalan selaras serta berada dalam kendali seseorang, maka dharma, artha, dan kāma—ketiganya pun dapat berpadu.”
Verse 103
यक्ष उवाच अक्षयो नरक: केन प्राप्यते भरतर्षभ । एतनमे मृच्छत: प्रश्ननं तच्छीघ्र॑ वक्तुमहसि,यक्षने पूछा--भरतश्रेष्ठ) अक्षय नरक किस पुरुषको प्राप्त होता है? मेरे इस प्रश्नका शीघ्र ही उत्तर दो
Yaksha berkata: “Wahai yang termulia di antara keturunan Bharata, dengan perilaku apakah seseorang memperoleh neraka yang tiada berakhir? Jawablah pertanyaanku ini dengan segera.”
Verse 104
युधिछिर उवाच ब्राह्मणं स््वयमाहूय याचमानमकिज्चनम् । पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात् सो$क्षयं नरक॑ व्रजेत्,युधिष्ठिर बोले--जो पुरुष भिक्षा माँगनेवाले किसी अकिज्चन ब्राह्मणको स्वयं बुलाकर फिर उसे “नाहीं' कर देता है, वह अक्षय नरकमें जाता है
Yudhiṣṭhira berkata: “Barangsiapa sendiri memanggil seorang Brahmana yang mengemis dan sangat papa, lalu kemudian berkata, ‘Tidak ada apa-apa (untukmu),’ orang itu pergi ke neraka yang tiada berakhir.”
Verse 105
वेदेषु धर्मशास्त्रेषु मिथ्या यो वै द्विजातिषु । देवेषु पितृधर्मेषु सो$क्षयं नरकं॑ व्रजेत्,जो पुरुष वेद, धर्मशास्त्र, ब्राह्मण, देवता और पितृधर्मोमें मिथ्याबुद्धि रखता है, वह अक्षय नरकको प्राप्त होता है
Yudhiṣṭhira berkata: “Siapa pun yang menyimpan penilaian palsu atau meremehkan terhadap Weda dan Dharmaśāstra, terhadap kaum dwija (Brahmana), serta terhadap para dewa dan kewajiban kepada leluhur—ia pergi ke neraka yang tak binasa.”
Verse 106
आश्रित्य यं वयं नाथ दुःखान्येतानि सेहिम । “वे ही महाबली अर्जुन आज मृत्युके अधीन कैसे हो गये? ये वे ही धनंजय मेरी आशालताको छिजन्न-भिन्न करके धरतीपर पड़े हैं; जिन्हें अपना रक्षक बनाकर और जिनका ही भारी भरोसा करके हमलोग ये सारे दुःख सहते आये हैं,विद्यमाने धने लोभाद् दानभोगविवर्जित: । पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात् सो$क्षयं नरकं॑ व्रजेत् धन पास रहते हुए भी जो लोभवश दान और भोगसे रहित है तथा (माँगनेवाले ब्राह्मणादिको एवं न्याययुक्त भोगके लिये स्त्री-पुत्रादिको) पीछेसे यह कह देता है कि मेरे पास कुछ नहीं है, वह अक्षय नरकमें जाता है
Vaiśaṃpāyana berkata: “Wahai tuan, bersandar kepadanyalah kami menanggung derita ini. Namun bila harta ada, tetapi karena loba seseorang menahan diri dari memberi dana dan dari menikmati secara patut, lalu kemudian berkata kepada para peminta atau yang berhak, ‘Aku tidak punya apa-apa,’ ia pergi ke neraka yang tak binasa.”
Verse 107
यक्ष उवाच राजन् कुलेन वृत्तेन स्वाध्यायेन श्रुतेन वा । ब्राह्म॒ण्यं केन भवति प्रब्रूहीतत् सुनिश्चितम्,यक्षने पूछा--राजन्! कुल, आचार, स्वाध्याय और शास्त्रश्रवण--इनमेंसे किसके द्वारा ब्राह्मणत्व सिद्ध होता है? यह बात निश्चय करके बताओ
Yakṣa berkata: “Wahai Raja, apakah Brahmanhood ditetapkan oleh kelahiran dalam garis keturunan, oleh laku hidup, oleh svādhyāya, atau oleh pengetahuan yang diperoleh lewat mendengar? Katakan dengan pasti—oleh yang manakah?”
Verse 108
युधिछिर उवाच शृणु यक्ष कुलं तात न स्वाध्यायो न च श्रुतम् । कारणं हि द्विजत्वे च वृत्तमेव न संशय:
Yudhiṣṭhira berkata: “Dengarkan, wahai Yakṣa, saudaraku; bukan garis keturunan, bukan svādhyāya, dan bukan pula sekadar pengetahuan dari mendengar. Dasar sejati dwijatva adalah laku hidup semata—tanpa keraguan.”
Verse 109
युधिष्ठिर बोले--तात यक्ष! सुनो न तो कुल ब्राह्मणत्वमें कारण है न स्वाध्याय और न शास्त्रश्रवण। ब्राह्मणत्वका हेतु आचार ही है, इसमें संशय नहीं है ।। वृत्तं यत्नेन संरक्ष्यं ब्राह्मणेन विशेषत: । अक्षीणवृत्तो न क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हत:,इसलिये प्रयत्नपूर्वक सदाचारकी ही रक्षा करनी चाहिये। ब्राह्मणको तो उसपर विशेषरूपसे दृष्टि रखनी जरूरी है; क्योंकि जिसका सदाचार अक्षुण्ण है, उसका ब्राह्मणत्व भी बना हुआ है और जिसका आचार नष्ट हो गया, वह तो स्वयं भी नष्ट हो गया
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Yakṣa yang mulia, dengarkan. Bukan kelahiran dalam suatu keluarga, bukan pula swādhyāya, bahkan bukan sekadar mendengar śāstra yang menjadi sebab sejati brahminhood. Dasar brahminhood hanyalah ācāra—laku dan budi pekerti; tentang ini tiada keraguan. Karena itu, jagalah hidup yang lurus dengan sungguh-sungguh; terlebih lagi seorang Brāhmaṇa wajib mengawasinya. Sebab siapa yang laku hidupnya tetap utuh tidaklah berkurang; tetapi siapa yang runtuh dalam laku, runtuhlah seluruh dirinya.”
Verse 110
पठका: पाठकाश्ैव ये चान्ये शास्त्रचिन्तका: । सर्वे व्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान् स पण्डित:,पढ़नेवाले, पढ़ानेवाले तथा शास्त्रका विचार करनेवाले--ये सब तो व्यसनी और मूर्ख ही हैं। पण्डित तो वही है, जो अपने (शास्त्रोक्त) कर्तव्यका पालन करता है
“Mereka yang hanya membaca, mereka yang mengajar, dan mereka yang sekadar merenungkan śāstra—bila berhenti pada kata-kata saja—semuanya menjadi pecandu perdebatan dan kebodohan. Yang sungguh pandita ialah dia yang berpegang pada tindakan benar, yang melaksanakan kewajiban sebagaimana diperintahkan śāstra.”
Verse 111
चतुर्वेदो<पि दुर्वत्त: स शूद्रादतिरिच्यते । योडग्निहोत्रपरो दान्तः स ब्राह्मण इति स्मृत:
“Sekalipun seseorang menguasai keempat Veda, bila laku hidupnya rusak, ia dipandang tidak lebih baik—bahkan lebih hina—daripada seorang Śūdra. Namun orang yang tekun pada Agnihotra, menahan diri, dan berdisiplin—dialah yang diingat sebagai Brāhmaṇa sejati.”
Verse 112
चारों वेद पढ़ा होनेपर भी जो दुराचारी है, वह अधमतामें शूद्रसे भी बढ़कर है। जो (नित्य) अग्निहोत्रमें तत्पर और जितेन्द्रिय है, वही “ब्राह्मण” कहा जाता है ।। यक्ष उवाच प्रियवचनवादी कि लभते विमृशितकार्यकर: कि लभते । बहुमित्रकर: किं लभते धर्मरत: कि लभते कथय,यक्षने पूछा--बताओ; मधुर वचन बोलनेवालेको क्या मिलता है? सोच-विचारकर काम करनेवाला क्या पा लेता है? जो बहुत-से मित्र बना लेता है, उसे क्या लाभ होता है? और जो धर्मनिष्ठ है, उसे क्या मिलता है?
Yakṣa bertanya: “Katakanlah—apa yang diperoleh orang yang bertutur kata manis? Apa yang diperoleh orang yang bertindak setelah menimbang dengan saksama? Apa manfaat bagi dia yang menghimpun banyak sahabat? Dan apa yang dicapai oleh orang yang teguh dalam dharma?”
Verse 113
युधिषछ्िर उवाच प्रियवचनवादी प्रियो भवति विमृशितकार्यकरोडथिकं जयति । बहुमित्रकर: सुखं वसते यश्ष धर्मरत: स गतिं लभते,युधिष्ठिर बोले--मधुर वचन बोलनेवाला सबको प्रिय होता है, सोच-विचारकर काम करनेवालेको अधिकतर सफलता मिलती है एवं जो बहुत-से मित्र बना लेता है, वह सुखसे रहता है और जो धर्मनिष्ठ है, वह सदगति पाता है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Orang yang bertutur kata manis menjadi disayangi. Orang yang bertindak setelah pertimbangan matang lebih sering meraih kemenangan. Orang yang memiliki banyak sahabat hidup dengan bahagia; dan orang yang teguh dalam dharma memperoleh jalan yang luhur—takdir yang baik.”
Verse 114
यक्ष उवाच को मोदते किमाश्चर्य क: पन्था: का च वार्तिका । ममैतांश्वतुरः प्रश्नान् कथयित्वा जलं पिब,यक्षने पूछा--सुखी कौन है? आश्वर्य क्या है? मार्ग क्या है और वार्ता क्या है? मेरे इन चार प्रश्नोंका उत्तर देकर जल पीओ
Yakṣa berkata: “Siapakah yang sungguh puas? Apakah keajaiban terbesar? Jalan apakah itu? Dan apakah wacana yang patut? Jawablah empat pertanyaanku ini, barulah minum air itu.”
Verse 115
युधिछिर उवाच पजञ्चमे5हनि षष्ठे वा शाकं पचति स्वे गृहे । अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते,युधिष्ठिर बोले--जलचर यक्ष! जिस पुरुषपर ऋण नहीं है और जो परदेशमें नहीं है, वह भले ही पाँचवें या छठे दिन अपने घरके भीतर साग-पात ही पकाकर खाता हो, तो भी वही सुखी है
Yudhiṣṭhira menjawab: “Wahai Yakṣa penghuni air! Orang yang bebas dari utang dan tidak hidup jauh dari rumah—meski pada hari kelima atau keenam di rumahnya ia hanya memasak sayur hijau sederhana—dialah yang sungguh bersukacita.”
Verse 116
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् | शेषा: स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमत: परम्,संसारसे रोज-रोज प्राणी यमलोकमें जा रहे हैं; किंतु जो बचे हुए हैं, वे सर्वदा जीते रहनेकी इच्छा करते हैं; इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा?
Hari demi hari makhluk-makhluk pergi ke kediaman Yama; namun mereka yang tertinggal tetap mendambakan hidup kekal. Keajaiban apa yang lebih besar daripada ini?
Verse 117
तर्कोउप्रतिष्ठ: श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्वं निहित॑ गुहायां महाजनो येन गत: स पन्था:,तर्ककी कहीं स्थिति नहीं है, श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं, एक ही ऋषि नहीं है कि जिसका मत प्रमाण माना जाय तथा धर्मका तत्त्व गुहामें निहित है अर्थात् अत्यन्य गूढ़ है; अत: जिससे महापुरुष जाते रहे हैं, वही मार्ग है
Penalaran tak memiliki landasan yang teguh; tradisi śruti pun beragam dan saling berbeda. Tiada satu resi pun yang pendapatnya dapat diterima sebagai ukuran terakhir. Hakikat dharma tersembunyi di kedalaman rahasia—amat halus. Karena itu, jalan yang patut diikuti ialah jalan yang telah ditempuh para mahājana.
Verse 118
अस्मिन् महामोहमये कटाहे सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन । मारसत्दर्वीपरिघट्टनेन भूतानि काल: पचतीति वार्ता,इस महामोहरूपी कड़ाहेमें भगवान् काल समस्त प्राणियोंको मास और ऋतुरूप करछीसे उलट-पलटकर सूर्यरूप अग्नि और रात-दिनरूप ईंधनके द्वारा राँध रहे हैं, यही वार्ता है
Di kawah maha-keterpesonaan ini, Kala—dengan api matahari, dengan bahan bakar malam dan siang, serta dengan sendok pengaduk berupa bulan-bulan dan musim—memasak semua makhluk. Inilah warta yang sejati.
Verse 119
यक्ष उवाच व्याख्याता मे त्वया प्रश्ना याथातथ्यं परंतप । पुरुष त्विदानीं व्याख्याहि यश्च सर्वधनी नर:
Yakṣa berkata: “Engkau telah menjelaskan pertanyaanku dengan benar sebagaimana adanya, wahai penakluk musuh. Kini jelaskanlah: manusia macam apakah yang sungguh disebut ‘memiliki segala kekayaan’?”
Verse 120
यक्षने पूछा--परंतप! तुमने मेरे सब प्रश्नोंके उत्तर ठीक-ठीक दे दिये, अब तुम पुरुषकी भी व्याख्या कर दो और यह बताओ कि सबसे बड़ा धनी कौन है? ।। युधिछिर उवाच दिवं स्पृशति भूमिं च शब्द: पुण्येन कर्मणा । यावत् स शब्दो भवति तावत् पुरुष उच्यते,युधिष्ठिर बोले--जिस व्यक्तिके पुण्यकर्मोकी कीर्तिका शब्द जबतक स्वर्ग और भूमिको स्पर्श करता है, तबतक वह पुरुष कहलाता है
Yudhiṣṭhira berkata: “Nama baik—lahir dari perbuatan bajik—menyentuh langit dan bumi. Selama kemasyhuran itu bertahan, selama itu pula seseorang sungguh disebut ‘puruṣa’.”
Verse 121
तुल्ये प्रियाप्रिये यस्य सुखदुःखे तथैव च । अतीतानागते चोभे स वै सर्वधनी नर:,जो मनुष्य प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख और भूत-भविष्यत्--इन द्वद्धोंमें सम है, वही सबसे बड़ा धनी है
Yudhiṣṭhira berkata: “Dialah yang sungguh paling kaya: orang yang tetap seimbang terhadap yang disukai dan yang tidak disukai, terhadap suka dan duka, dan demikian pula terhadap masa lampau maupun masa depan.”
Verse 122
(भूतभव्यभविष्येषु नि:स्पूह: शान्तमानस: । सुप्रसन्न: सदा योगी स वै सर्वधनी श्वरः ।।) जो भूत, वर्तमान और भविष्य सभी विषयोंकी ओरसे निःस्पृह, शान्तचित्त, सुप्रसन्न और सदा योगयुक्त है, वही सब धनियोंका स्वामी है ।। यक्ष उवाच व्याख्यात: पुरुषो राजन् यश्च सर्वधनी नर: । तस्मात् त्वमेकं भ्रातृणां यमिच्छसि स जीवतु,यक्षने कहा--राजन्! जो सबसे बढ़कर धनी पुरुष है, उसकी तुमने ठीक-ठीक व्याख्या कर दी; इसलिये अपने भाइयोंमेंसे जिस एकको तुम चाहो, वही जीवित हो सकता है
Ia yang bebas dari keinginan terhadap masa lampau, masa kini, dan yang akan datang—berhati tenteram, berwatak jernih dan ramah senantiasa, serta teguh bersemayam dalam yoga—dialah satu-satunya tuan atas segala kekayaan. Yakṣa berkata: “Wahai Raja, engkau telah tepat menjelaskan siapa manusia yang sungguh mahakaya. Maka, di antara saudara-saudaramu, siapa pun yang kau pilih—biarlah dia hidup.”
Verse 123
युधिछिर उवाच श्यामो य एष रक्ताक्षो बृहच्छाल इवोत्थित: । व्यूढोरस्को महाबाहुर्नकुलो यक्ष जीवतु,युधिष्ठिर बोले--यक्ष! यह जो श्यामवर्ण, अरुणनयन, सुविशाल शालवृक्षके समान ऊँचा और चौड़ी छातीवाला महाबाहु नकुल है, वही जीवित हो जाय
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Yakṣa, biarlah Nakula hidup—pahlawan berkulit gelap, bermata kemerahan, menjulang laksana pohon śāla yang agung, berdada bidang dan berlengan perkasa.”
Verse 124
यक्ष उवाच प्रियस्ते भीमसेनो5यमर्जुनो व: परायणम् | स कस्मान्नकुलं राजन् सापत्नं जीवमिच्छसि,यक्षने कहा--राजन्! यह तुम्हारा प्रिय भीमसेन है और यह तुमलोगोंका सबसे बड़ा सहारा अर्जुन है; इन्हें छोड़कर तुम किसलिये सौतेले भाई नकुलको जिलाना चाहते हो?
Yaksha berkata: “Wahai raja, Bhimasena ini engkau kasihi, dan Arjuna ini adalah sandaran terbesar kalian. Mengapa, dengan meninggalkan mereka, engkau hendak menghidupkan kembali Nakula—saudara seayah berlainan ibu?”
Verse 125
यस्य नागसहस्रेण दशसंख्येन वै बलम् | तुल्यं त॑ भीममुत्सूज्य नकुलं जीवमिच्छसि,जिसमें दस हजार हाथियोंके समान बल है, उस भीमको छोड़कर तुम नकुलको ही क्यों जिलाना चाहते हो?
Dia yang kekuatannya setara sepuluh ribu gajah—mengapa engkau meninggalkan Bhima yang demikian, dan justru ingin menghidupkan Nakula?
Verse 126
तथैनं मनुजाः प्राहुर्भीमसेनं प्रियं तव । अथ केनानुभावेन सापत्नं जीवमिच्छसि,सभी मनुष्य भीमसेनको तुम्हारा प्रिय बतलाते हैं; उसे छोड़कर भला सौतेले भाई नकुलमें तुम कौन-सा सामर्थ्य देखकर उसे जिलाना चाहते हो?
Orang-orang berkata bahwa Bhimasena-lah yang paling engkau kasihi. Lalu, dengan keutamaan atau daya apa engkau ingin menghidupkan Nakula—saudara seayah berlainan ibu—dengan meninggalkan Bhima?
Verse 127
यस्य बाहुबलं सर्वे पाण्डवा: समुपासते । अर्जुनं तमपाहाय नकुलं जीवमिच्छसि,जिसके बाहुबलका सभी पाण्डवोंको पूरा भरोसा है, उस अर्जुनको भी छोड़कर तुम्हें नकुलको जिला देनेकी इच्छा क्यों है?
Semua Pandawa bersandar pada kekuatan lengan Arjuna; mengapa engkau meninggalkannya dan justru ingin menghidupkan Nakula?
Verse 128
युधिछिर उवाच धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित: । तस्माद् धर्म न त्यजामि मा नो धर्मो हतोडवधीत्,युधिष्ठिर बोले--यदि धर्मका नाश किया जाय, तो वह नष्ट हुआ धर्म ही कर्ताको भी नष्ट कर देता है और यदि उसकी रक्षा की जाय, तो वही कर्ताकी भी रक्षा कर लेता है। इसीसे मैं धर्मका त्याग नहीं करता कि कहीं नष्ट होकर वह धर्म मेरा ही नाश न कर दे
Yudhisthira berkata: “Dharma yang dilanggar akan berbalik menghancurkan pelanggarnya; dharma yang dijaga akan melindungi penjaganya. Karena itu aku tidak meninggalkan dharma—agar dharma yang dirusak tidak kelak merusak diriku.”
Verse 129
आनुशंस्यं परो धर्म: परमार्थाच्च मे मतम् | आनृशंस्यं चिकीर्षामि नकुलो यक्ष जीवतु,यक्ष! मेरा ऐसा विचार है कि वस्तुतः अनृशंसता (दया तथा समता) ही परम धर्म है। यही सोचकर मैं सबके प्रति दया और समानभाव रखना चाहता हूँ; इसलिये नकुल ही जीवित हो जाय
Yudhiṣṭhira berkata: “Belas kasih adalah dharma tertinggi—itulah keyakinanku yang teguh, berlandaskan kebaikan tertinggi. Aku hendak bertindak tanpa kekejaman, dengan kebaikan hati; maka, wahai Yakṣa, biarlah Nakula hidup.”
Verse 130
धर्मशील: सदा राजा इति मां मानवा विदु: । स्वधर्मान्न चलिष्यामि नकुलो यक्ष जीवतु,यक्ष! लोग मेरे विषयमें ऐसा समझते हैं कि राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं; अतएव मैं अपने धर्मसे विचलित नहीं होऊँगा। मेरा भाई नकुल जीवित हो जाय
Yudhiṣṭhira berkata: “Orang-orang mengenalku sebagai raja yang senantiasa berpegang pada dharma. Karena itu aku tidak akan menyimpang dari kewajibanku yang benar. Wahai Yakṣa, biarlah Nakula hidup.”
Verse 131
कुन्ती चैव तु माद्री च द्वे भायें तु पितुर्मम । उभे सपुत्रे स्थातां वै इति मे धीयते मति:,मेरे पिताके कुन्ती और माद्री नामकी दो भार्याएँ रहीं। वे दोनों ही पुत्रवती बनी रहें, ऐसा मेरा विचार है
Yudhiṣṭhira berkata: “Ayahku memiliki dua istri—Kuntī dan Mādrī. Keyakinanku teguh: semoga keduanya tetap diberkahi dengan putra.”
Verse 132
यथा कुन्ती तथा माद्री विशेषो नास्ति मे तयो: । मातृभ्यां सममिच्छामि नकुलो यक्ष जीवतु,यक्ष! मेरे लिये जैसी कुन्ती है, वैसी ही माद्री। उन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। मैं दोनों माताओंके प्रति समानभाव ही रखना चाहता हूँ। इसलिये नकुल ही जीवित हो
Yudhiṣṭhira berkata: “Bagiku Kuntī sama seperti Mādrī; aku tidak melihat perbedaan di antara keduanya. Aku ingin memelihara penghormatan yang setara kepada kedua ibuku. Karena itu, wahai Yakṣa, biarlah Nakula yang hidup.”
Verse 133
यक्ष उवाच तस्य ते<र्थाच्च कामाच्च आनृशंस्यं परं मतम् | तस्मात् ते भ्रातर: सर्वे जीवन्तु भरतर्षभ,यक्षने कहा--भरतगश्रेष्ठ! तुमने अर्थ और कामसे भी अधिक दया और समताका आदर किया है, इसलिये तुम्हारे सभी भाई जीवित हो जायेँ
Yakṣa berkata: “Wahai yang termulia di antara keturunan Bharata, engkau menempatkan welas asih dan keadilan setara lebih tinggi daripada artha dan kāma. Karena itu, biarlah semua saudaramu hidup.”
Verse 312
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकुल आदि चारों भाइयोंके मूर्च्छित होकर गिरनेसे सम्बन्ध रखनेवाला तीन सौ बारहवाँ अध्याय प्रा हुआ ॥/
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata bagian Vana Parva, pada bagian Āraṇeya, dimulailah bab ke-312 yang berkaitan dengan peristiwa Nakula dan keempat saudara lainnya yang pingsan lalu jatuh ke tanah.
Verse 313
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि यक्षप्रश्नने त्रयोदशाधिकत्रिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहद्या भारत वनप्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें यक्षप्रश्रविषयक तीन सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata bagian Vana Parva, pada bagian Āraṇeya, bab ke-313 tentang pertanyaan-pertanyaan Yakṣa pun berakhir.
Verse 363
मयैते निहता:ः सर्वे भ्रातरस्ते महौजस: । यक्षने कहा--तुम्हारा कल्याण हो। मैं जलचर पक्षी नहीं हूँ, यक्ष हूँ। तुम्हारे ये सभी महान् तेजस्वी भाई मेरे द्वारा ही मारे गये हैं
Yakṣa berkata: “Semua saudaramu ini, yang perkasa dan bercahaya wibawanya, telah kubunuh.”