
इन्द्रस्य दुःखप्राप्तिः—त्रिशिरोवधः, वृत्रोत्पत्तिः, जृम्भिकाजननम् (Indra’s Distress: Slaying of Triśiras, Birth of Vṛtra, and the Origin of Yawning)
Upa-parva: Indra–Triśiras–Vṛtra Itihāsa (embedded exemplum)
Yudhiṣṭhira asks how Indra, despite being a great sovereign accompanied by his consort, encountered intense distress. Śalya replies with an ancient itihāsa: Tvaṣṭṛ creates his son Triśiras (Viśvarūpa), an ascetic of formidable tapas and unusual three-faced form. Triśiras combines Vedic study, sensory discipline, and extraordinary perception; observing this, Indra becomes anxious that Triśiras may eclipse him. Indra first orders apsarases to lure Triśiras into kāmabhoga, but they fail because Triśiras retains self-control. Indra then resolves on lethal action, hurling the vajra to strike Triśiras down, yet remains unsettled by the fallen ascetic’s radiance. Indra commands Takṣā to sever Triśiras’s heads; Takṣā hesitates on ethical grounds (fear of blame and brahmahatyā), but complies after Indra asserts authority and promises ritual privilege. From the severed heads emerge birds (kapiñjala, tittiri, kalaviṅka) corresponding to Triśiras’s distinct mouths and practices. Learning of his son’s death, Tvaṣṭṛ, enraged, performs a rite to produce Vṛtra for Indra’s destruction, instructing him as “indraśatru.” Vṛtra grows to cosmic scale and battles Indra, even swallowing him; the gods create jṛmbhikā, enabling Indra’s escape when Vṛtra yawns, establishing yawning as a creaturely condition. The struggle continues as the devas seek counsel, moving toward Viṣṇu for a solution to Vṛtra’s defeat.
Chapter Arc: युधिष्ठिर शल्य से पूछते हैं—इन्द्र जैसे देवश्रेष्ठ ने किस प्रकार त्रिशिरा (विश्वरूप) का वध किया, वृत्रासुर कैसे उत्पन्न हुआ, और उस संग्राम में देवता कैसे पराजित हुए। → शल्य पुरातन आख्यान सुनाते हैं: प्रजापति त्वष्टा के तेजस्वी पुत्र विश्वरूप/त्रिशिरा का उदय, उसकी त्रिमुखी भयानक दीप्ति, इन्द्र का बढ़ता संदेह और भय, तथा ‘दुर्बल दिखने वाला भी शत्रु बढ़ जाए तो उपेक्षणीय नहीं’—इस नीति से प्रेरित होकर इन्द्र का वध-निश्चय। अप्सराओं को त्रिशिरा के समीप भेजकर उसे विचलित करने और अवसर साधने की योजना बनती है। → इन्द्र निर्णायक होकर वज्र-प्रहार का संकल्प करता है और त्रिशिरा-वध की ओर बढ़ता है; त्रिशिरा के मुखों/तेज से दिशाएँ मानो पीती हुई देखी जाती हैं—और उसी भयावह क्षण में देव-दानव संघर्ष का भाग्य पलटने लगता है। → त्रिशिरा-वध के परिणामस्वरूप त्वष्टा का क्रोध भड़कता है और उसी प्रतिशोध से वृत्रासुर की उत्पत्ति तथा इन्द्र-वृत्र युद्ध की भूमिका बनती है; संग्राम की उग्रता के बाद इन्द्र पीछे हटता है और देवताओं में गहरा विषाद छा जाता है—देवपक्ष की पराजय का संकेत स्पष्ट हो उठता है। → वृत्रासुर के उदय के साथ प्रश्न लटकता है—क्या इन्द्र अपने ही कर्म-फल (ब्रह्महत्या/अधर्म-आश्रित उपाय) के भार से मुक्त होकर विजय पा सकेगा, या देवता और अधिक पतन की ओर जाएंगे?
Verse 1
अपन हू< बछ। है २ >> नवमो<्ध्याय: इन्द्रके द्वारा त्रिेशिराका वध, वृत्रासुरकी उत्पत्ति, उसके साथ इन्द्रका युद्ध तथा देवताओंकी पराजय युधिछिर उवाच कथमिन्द्रेण राजेन्द्र सभार्येण महात्मना । दुःखं प्राप्तं परं घोरमेतदिच्छामि वेदितुम्,युधिष्ठिरने पूछा--राजेन्द्र! पत्नीसहित महामना इन्द्रने कैसे अत्यन्त भयंकर दुःख प्राप्त किया था? यह मैं जानना चाहता हूँ
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ମହାମନା ଇନ୍ଦ୍ର ନିଜ ପତ୍ନୀସହିତ କିପରି ପରମ ଘୋର ଦୁଃଖ ପ୍ରାପ୍ତ କଲେ? ଏହା ମୁଁ ଜାଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛି।
Verse 2
शल्य उवाच शृणु राजन् पुरावृत्तमितिहासं पुरातनम् । सभार्येण यथा प्राप्तं दु:खमिन्द्रेण भारत,शल्यने कहा--भरतवंशी नरेश! यह पूर्वकालमें घटित पुरातन इतिहास है। पत्नीसहित इन्द्रने जिस प्रकार महान् दुःख प्राप्त किया था, वह बताता हूँ, सुनो
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ରାଜନ! ଶୁଣ; ଏହା ପୂର୍ବକାଳରେ ଘଟିଥିବା ପୁରାତନ ଇତିହାସ। ଭରତବଂଶୀ! ଇନ୍ଦ୍ର ପତ୍ନୀସହିତ ଯେପରି ଦୁଃଖ ପ୍ରାପ୍ତ କଲେ, ମୁଁ ସେହି କଥା କହୁଛି—ଶୁଣ।
Verse 3
त्वष्टा प्रजापतिहासीद् देवश्रेष्ठोी महातपा: । स पुत्र वै त्रिशिरसमिन्द्रद्रोहात् किलासृजत्,त्वष्टा नामसे प्रसिद्ध एक प्रजापति थे, जो देवताओमें श्रेष्ठ और महान् तपस्वी माने जाते थे। कहते हैं, उन्होंने इन्द्रके प्रति द्रोहबुद्धि हो जानेके कारण ही एक तीन सिरवाला पुत्र उत्पन्न किया
ତ୍ୱଷ୍ଟା ନାମକ ଏକ ପ୍ରଜାପତି ଥିଲେ—ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଏବଂ ମହାତପସ୍ବୀ। କୁହାଯାଏ, ଇନ୍ଦ୍ର ପ୍ରତି ଦ୍ରୋହବୁଦ୍ଧି ଜନ୍ମିବାରୁ ସେ ‘ତ୍ରିଶିରା’ ନାମକ ତିନି ଶିର ଥିବା ପୁତ୍ରକୁ ସୃଷ୍ଟି କଲେ।
Verse 4
ऐन्द्रं स प्रार्थयत् स्थान विश्वरूपो महाद्युति: । तैस्त्रिभिवदनैघोरि: सूर्येन्दुज्वलनोपमै:,उस महातेजस्वी बालकका नाम था विश्वरूप। वह सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निके समान तेजस्वी एवं भयंकर अपने उन तीनों मुखोंद्वारा इन्द्रका स्थान पानेकी प्रार्थना करता था
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ବିଶ୍ୱରୂପ ନାମକ ସେ ମହାତେଜସ୍ୱୀ ବାଳକ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଐଶ୍ୱର୍ୟ-ସ୍ଥାନ ପାଇବାକୁ ପ୍ରାର୍ଥନା କରୁଥିଲା। ସୂର୍ଯ୍ୟ, ଚନ୍ଦ୍ର ଓ ଅଗ୍ନି ସମ ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଭୟଙ୍କର ତାହାର ତିନି ମୁଖ ଦ୍ୱାରା ସେ ସେଇ ପରମ ପଦ ଯାଚନା କରୁଥିଲା।
Verse 5
वेदानेकेन सो5धीते सुरामेकेन चापिबत् । एकेन च दिश: सर्वा: पिबन्निव निरीक्षते,वह अपने एक मुखसे वेदोंका स्वाध्याय करता, दूसरेसे सुरा पीता और तीसरेसे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर इस प्रकार देखता था, मानो उन्हें पी जायगा
ଗୋଟିଏ ମୁଖରେ ସେ ବେଦ ଅଧ୍ୟୟନ କରୁଥିଲା, ଅନ୍ୟ ମୁଖରେ ସୁରା ପାନ କରୁଥିଲା; ତୃତୀୟ ମୁଖରେ ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ଏମିତି ଚାହୁଁଥିଲା—ମନେ ହେଉଥିଲା ଯେ ଦିଗମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପିଇଯିବ।
Verse 6
स तपस्वी मृदुर्दान्तो धर्मे तपसि चोद्यत: । तपस्तस्य महत् तीव्र सुदुश्चवरमरिंदम,शत्रुदमन! त्वष्टाका वह पुत्र कोमल स्वभाववाला, तपस्वी, जितेन्द्रिय तथा धर्म और तपस्याके लिये सदा उद्यत रहनेवाला था। उसका बड़ा भारी तीव्र तप दूसरोंके लिये अत्यन्त दुष्कर था
ଶତ୍ରୁଦମନ! ତ୍ୱଷ୍ଟାଙ୍କ ସେଇ ପୁତ୍ର କୋମଳସ୍ୱଭାବୀ, ତପସ୍ୱୀ, ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ଏବଂ ଧର୍ମ ଓ ତପସ୍ୟାରେ ସଦା ଉଦ୍ୟତ ଥିଲା। ତାହାର ମହାନ୍ ଓ ତୀବ୍ର ତପ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଷ୍କର ଥିଲା।
Verse 7
तस्य दृष्टवा तपोवीर्य सत्यं चामिततेजस: । विषादमगमच्छक्र इन्द्रोडयं मा भवेदिति,उस अमिततेजस्वी बालकका तपोबल तथा सत्य देखकर इन्द्रको बड़ा दुःख हुआ। वे सोचने लगे, “कहीं यह इन्द्र न हो जाय
ସେଇ ଅମିତତେଜସ୍ୱୀ ବାଳକର ତପୋବଳ ଓ ସତ୍ୟ ଦେଖି ଶକ୍ର ଇନ୍ଦ୍ର ଗଭୀର ବିଷାଦରେ ପଡ଼ିଲେ। ସେ ଭାବିଲେ—“ଏହା କେଉଁଠି ଇନ୍ଦ୍ର ନ ହୋଇଯାଉ।”
Verse 8
इस प्रकार श्रीमह्या भारत उद्योगपवकि अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें शल्यवाक्यविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ,कथं सज्जेच्च भोगेषु न च तप्येन्महत् तपः । विवर्धमानस्त्रिशिरा: सर्व हि भुवनं ग्रसेत् “क्या उपाय किया जाय, जिससे यह भोगोंमें आसक्त हो जाय और भारी तपस्यामें प्रवृत्त न हो? क्योंकि यह वृद्धिको प्राप्त हुआ त्रिशिरा तीनों लोकोंको अपना ग्रास बना लेगा'
“କେଉଁ ଉପାୟ କରାଯାଉ, ଯାହାଦ୍ୱାରା ଏହା ଭୋଗରେ ଆସକ୍ତ ହେବ ଏବଂ ମହାତପ କରିବ ନାହିଁ? କାରଣ ବଳରେ ବୃଦ୍ଧି ପାଉଥିବା ତ୍ରିଶିରା ନିଶ୍ଚୟ ସମଗ୍ର ଭୁବନକୁ ଗ୍ରସି ନେବ।”
Verse 9
इति संचिन्त्य बहुधा बुद्धिमान् भरतर्षभ । आज्ञापयत् सो5प्सरसस्त्वष्टपुत्रप्रलो भने,भरतश्रेष्ठ इस तरह बहुत सोच-विचार करके बुद्धिमान् इन्द्रने त्वष्टाके पुत्रको लुभानेके लिये अप्सराओं-को आज्ञा दी-- इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्रविजये नवमो5ध्याय:
ଏପରି ନାନା ପ୍ରକାରେ ଚିନ୍ତା କରି, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ବୁଦ୍ଧିମାନ ଇନ୍ଦ୍ର ତ୍ୱଷ୍ଟାଙ୍କ ପୁତ୍ରକୁ ପ୍ରଲୋଭିତ କରିବା ପାଇଁ ଅପ୍ସରାମାନଙ୍କୁ ଆଜ୍ଞା ଦେଲେ।
Verse 10
यथा स सज्जेत् त्रिशिरा: कामभोगेषु वै भृशम् । क्षिप्रं कुरुत गच्छध्वं प्रलोभयत मा चिरम्,“अप्सराओ! जिस प्रकार त्रिशिरा कामभोगोंमें अत्यन्त आसक्त हो जाय, शीघ्र वैसा ही यत्न करो। जाओ, उसे लुभाओ, विलम्ब न करो
ଯେପରି ତ୍ରିଶିରା କାମଭୋଗରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆସକ୍ତ ହୋଇପଡ଼େ, ସେପରି ଶୀଘ୍ର ପ୍ରୟାସ କର। ତୁରନ୍ତ ଯାଅ; ତାକୁ ପ୍ରଲୋଭିତ କର; ବିଳମ୍ବ କରନି।
Verse 11
शुज्भारवेषा: सुश्रोण्यो हारैर्युक्ता मनोहरै: । हावभावसमायुक्ता: सर्वा: सौन्दर्यशोभिता:,'सुन्दरियो! तुम सब शृंगारके अनुरूप वेष धारण करके मनोहर हारोंसे विभूषित, हाव- भावसे संयुक्त तथा सौन्दर्यसे सुशोभित हो विश्वरूपको लुभाओ। तुम्हारा कल्याण हो, मेरे भयको शान्त करो। वरांगनाओ! मैं अपने आपको अस्वस्थचित्त देख रहा हूँ, अतः अबलाओ! तुम मेरे इस अत्यन्त घोर भयका शीघ्र निवारण करो”
ଶୁଭ ଆଭୂଷଣ ଓ ଶୃଙ୍ଗାରୋଚିତ ବେଷ ଧାରଣ କରି, ମନୋହର ହାରରେ ବିଭୂଷିତ, ହାବଭାବରେ ଯୁକ୍ତ, ସୌନ୍ଦର୍ୟରେ ଶୋଭିତ ସମସ୍ତ ସୁଶ୍ରୋଣୀମାନେ—(ଯାଅ)।
Verse 12
प्रलोभयत भद्ठे व: शमयध्वं भयं मम । अस्वस्थं हात्मना55त्मानं लक्षयामि वराड़ना: । भयं तन्मे महाघोरें क्षिप्रं नाशयताबला:,'सुन्दरियो! तुम सब शृंगारके अनुरूप वेष धारण करके मनोहर हारोंसे विभूषित, हाव- भावसे संयुक्त तथा सौन्दर्यसे सुशोभित हो विश्वरूपको लुभाओ। तुम्हारा कल्याण हो, मेरे भयको शान्त करो। वरांगनाओ! मैं अपने आपको अस्वस्थचित्त देख रहा हूँ, अतः अबलाओ! तुम मेरे इस अत्यन्त घोर भयका शीघ्र निवारण करो”
ହେ ଭଦ୍ରାମାନେ, ତାକୁ ପ୍ରଲୋଭିତ କରି ମୋର ଭୟକୁ ଶାନ୍ତ କର। ହେ ବରାଙ୍ଗନାମାନେ, ମୁଁ ମୋ ଅନ୍ତରେ ମୋ ମନକୁ ଅସ୍ୱସ୍ଥ ଦେଖୁଛି; ତେଣୁ, ହେ ଅବଳାମାନେ, ମୋର ଏହି ମହାଘୋର ଭୟକୁ ଶୀଘ୍ର ନାଶ କର।
Verse 13
अप्सरस ऊचु: तथा यत्नं करिष्याम: शक्र तस्य प्रलोभने । यथा नावाप्स्यसि भयं तस्माद् बलनिषूदन,अप्सराएँ बोलीं--शक्र! बलनिषूदन! हमलोग विश्वरूपको लुभानेके लिये ऐसा यत्न करेंगी, जिससे उनकी ओरसे आपको कोई भय नहीं प्राप्त होगा
ଅପ୍ସରାମାନେ କହିଲେ—ହେ ଶକ୍ର, ହେ ବଲନିଷୂଦନ! ତାକୁ ପ୍ରଲୋଭିତ କରିବା ପାଇଁ ଆମେ ଏପରି ପ୍ରୟାସ କରିବୁ ଯେ ତାହାରୁ ଆପଣଙ୍କୁ କୌଣସି ଭୟ ହେବ ନାହିଁ।
Verse 14
निर्दहन्निव चक्षु्भ्या योडसावास्ते तपोनिधि: । त॑ प्रलोभयितुं देव गच्छाम: सहिता वयम्
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ସେଇ ତପୋନିଧି ସେଠାରେ ବସିଛନ୍ତି, ଯେନେ ନିଜ ଚକ୍ଷୁଦ୍ୱାରା ଦହନ କରୁଛନ୍ତି। ହେ ଦେବ! ତାଙ୍କ ସଙ୍କଳ୍ପକୁ ଡଗମଗାଇବା ପାଇଁ ଆମେ ସମେତେ ଯାଉ।
Verse 15
यतिष्यामो वशे कर्तु व्यपनेतुं च ते भयम् । देव! जो तपोनिधि विश्वरूप अपने दोनों नेत्रोंसे सबको दग्ध करते हुए-से विराज रहे हैं, उन्हें प्रलोभनमें डालनेके लिये हम सब अप्सराएँ एक साथ जा रही हैं। वहाँ उन्हें वशमें करने तथा आपके भयको दूर हटानेके लिये हम पूर्ण प्रयत्न करेंगी ।। १४ ह ।। शल्य उवाच इन्द्रेण तास्त्वनुज्ञाता जम्मुस्त्रेशिरसो5न्तिकम् । तत्र ता विविधैभविलों भयन्त्यो वराड़्नना:,इन्द्रियाणि वशे कृत्वा पूर्वसागरसंनिभ: । शल्य बोले--राजन्! इन्द्रकी आज्ञा पाकर वे सब अप्सराएँ त्रिशिराके समीप गयीं। वहाँ उन सुन्दरियोंने भाँति-भाँतिके हाव-भावोंद्वारा उन्हें लुभानेका प्रयत्न किया तथा प्रतिदिन विश्वरूपको अपने अंगोंके सौन्दर्यका दर्शन कराया। तथापि वे महातपस्वी महर्षि उन सबको देखते हुए हर्ष आदि विकारोंको नहीं प्राप्त हुए; अपितु वे इन्द्रियोंको वशमें करके पूर्वसागरके समान शान्तभावसे बैठे रहे
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଅନୁମତି ପାଇ ସେଇ ଅପ୍ସରାମାନେ ତ୍ରିଶିରାଙ୍କ ସମୀପକୁ ଗଲେ। ସେଠାରେ ସେମାନେ ନାନା ପ୍ରକାର ହାବଭାବରେ ତାଙ୍କୁ ପ୍ରଲୋଭିତ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲେ। କିନ୍ତୁ ସେ ମହାତପସ୍ବୀ ଇନ୍ଦ୍ରିୟଗୁଡ଼ିକୁ ବଶ କରି, ପୂର୍ବ ସାଗର ପରି ଶାନ୍ତ ଓ ଅଚଳ ରହିଲେ।
Verse 16
नित्यं संदर्शयामासुस्तथैवाड्रेषु सौष्ठवम् । नाभ्यगच्छत् प्रहर्ष ता: स पश्यन् सुमहातपा:
ସେମାନେ ନିତ୍ୟ ନିଜ ଅଙ୍ଗସୌଷ୍ଠବ ଏଭଳି ଦେଖାଉଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ସେମାନଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ସୁମହାତପସ୍ବୀଙ୍କୁ ହର୍ଷ ଆସିଲା ନାହିଁ।
Verse 17
तास्तु यत्नं परं कृत्वा पुन: शक्रमुपस्थिता:
କିନ୍ତୁ ସେମାନେ ପରମ ଯତ୍ନ କରି ପୁନର୍ବାର ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ।
Verse 18
कृताञ्जलिपुटा: सर्वा देवराजमथाब्रुवन् न स शक्य: सुदुर्थर्षो चैर्याच्चालयितुं प्रभो
ସେମାନେ ସମସ୍ତେ କୃତାଞ୍ଜଳି ହୋଇ ଦେବରାଜଙ୍କୁ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଭୋ! ସେ ତାଙ୍କ ପଥରୁ ଚଳିତ ହେବା ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ। ସେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଧର୍ଷ; କେବଳ ଯୁକ୍ତି କିମ୍ବା ସାଧାରଣ ପ୍ରୟାସରେ ତାଙ୍କୁ କମ୍ପାଇ ପାରିବା ନାହିଁ।
Verse 19
यत् ते कार्य महाभाग क्रियतां तदनन्तरम् । वे सब अप्सराएँ (त्रेशिराको विचलित करनेका) पूरा प्रयत्न करके पुनः देवराज इन्द्रकी सेवामें उपस्थित हुईं और हाथ जोड़कर बोलीं--'प्रभो! वे त्रिशिरा बड़े दुर्धर्ष तपस्वी हैं, उन्हें धैर्यसे विचलित नहीं किया जा सकता। महाभाग! अब आपको जो कुछ करना हो, उसे कीजिये” || १७-१८ ह ।। सम्पूज्याप्सरस: शक्रो विसृज्य च महामति:
ମହାଭାଗ! ତୁମ ମନରେ ଯେ କାର୍ଯ୍ୟ ଅଛି, ତାହା ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ କର। ଅପ୍ସରାମାନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ଦେଇ ବିଦାୟ କରି, ମହାମତି ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହେଲେ।
Verse 20
स तूष्णीं चिन्तयन् वीरो देवराज: प्रतापवान्
ତେବେ ପ୍ରତାପବାନ ଦେବରାଜ ବୀର ଇନ୍ଦ୍ର ନିରବ ହୋଇ ଚିନ୍ତାରେ ଲୀନ ହେଲେ।
Verse 21
विनिश्चितमतिर्धीमान् वधे त्रेशिरसो5भवत् | प्रतापी वीर बुद्धिमान् देवराज इन्द्र चुपचाप सोचते हुए त्रिशिराके वधके विषयमें एक निश्चयपर पहुँच गये ।। वज्रमस्य क्षिपाम्यद्य स क्षिप्रं न भविष्यति
ଧୀମାନ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ର ତ୍ରିଶିରାଙ୍କ ବଧ ବିଷୟରେ ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ। କହିଲେ—“ଆଜି ମୁଁ ତାଙ୍କ ଉପରେ ବଜ୍ର ନିକ୍ଷେପ କରିବି; ସେ ଶୀଘ୍ର ରହିବେ ନାହିଁ।”
Verse 22
शास्त्रबुद्ध्या विनिश्ित्य कृत्वा बुद्धि वधे दृढाम्ू,शास्त्रयुक्त बुद्धिसे त्रिशिराके वधका दृढ़ निश्चय करके क्रोधमें भरे हुए इन्द्रने अग्निके समान तेजस्वी, घोर एवं भयंकर वज्रको त्रेशिराकी ओर चला दिया। उस वज्रकी गहरी चोट खाकर त्रिशिरा मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो वज्जके आघातसे टूटा हुआ पर्वतका शिखर भूतलपर पड़ा हो
ଶାସ୍ତ୍ରଯୁକ୍ତ ବୁଦ୍ଧିରେ ବିଚାର କରି ତ୍ରିଶିରାଙ୍କ ବଧରେ ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ କରି, କ୍ରୋଧରେ ଭରିଥିବା ଇନ୍ଦ୍ର ଅଗ୍ନିସମ ତେଜସ୍ବୀ, ଘୋର ଓ ଭୟାବହ ବଜ୍ରକୁ ତ୍ରିଶିରାଙ୍କ ଦିଗକୁ ନିକ୍ଷେପ କଲେ। ସେହି ବଜ୍ରର ଗଭୀର ଆଘାତରେ ତ୍ରିଶିରା ମୃତ୍ୟୁବରଣ କରି ପୃଥିବୀରେ ପଡ଼ିଲେ—ଯେପରି ବଜ୍ରାଘାତରେ ଭାଙ୍ଗି ପଡ଼ିଥିବା ପର୍ବତଶିଖର ଭୂତଳରେ ଲୁଟି ପଡ଼େ।
Verse 23
अथ वैश्वानरनिभं घोररूपं भयावहम् । मुमोच वज् संक्रुद्ध: शक्रस्त्रिशिरसं प्रति,शास्त्रयुक्त बुद्धिसे त्रिशिराके वधका दृढ़ निश्चय करके क्रोधमें भरे हुए इन्द्रने अग्निके समान तेजस्वी, घोर एवं भयंकर वज्रको त्रेशिराकी ओर चला दिया। उस वज्रकी गहरी चोट खाकर त्रिशिरा मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो वज्जके आघातसे टूटा हुआ पर्वतका शिखर भूतलपर पड़ा हो
ତାପରେ କ୍ରୋଧରେ ସଂକ୍ରୁଦ୍ଧ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ବୈଶ୍ୱାନର ସମ ତେଜସ୍ବୀ, ଘୋରରୂପ ଓ ଭୟାବହ ବଜ୍ରକୁ ତ୍ରିଶିରାଙ୍କ ପ୍ରତି ନିକ୍ଷେପ କଲେ।
Verse 24
स पपात हतस्तेन वज्नेण दृढ्माहत:ः । पर्वतस्येव शिखर प्रणुन्नं मेदिनीतले,शास्त्रयुक्त बुद्धिसे त्रिशिराके वधका दृढ़ निश्चय करके क्रोधमें भरे हुए इन्द्रने अग्निके समान तेजस्वी, घोर एवं भयंकर वज्रको त्रेशिराकी ओर चला दिया। उस वज्रकी गहरी चोट खाकर त्रिशिरा मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो वज्जके आघातसे टूटा हुआ पर्वतका शिखर भूतलपर पड़ा हो
ସେଇ ବଜ୍ରର ଦୃଢ଼ ଆଘାତରେ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ଆହତ ହୋଇ ସେ ହତ ହେଲା ଏବଂ ପୃଥିବୀରେ ପଡ଼ିଲା—ଯେପରି ବଜ୍ରାଘାତରେ ଭାଙ୍ଗି ପଡ଼ିଥିବା ପର୍ବତଶିଖର ଭୂମିରେ ଲୁଟି ପଡ଼େ।
Verse 25
त॑ तु वजहतं दृष्टया शयानमचलोपमम् । न शर्म लेभे देवेन्द्रो दीपितस्तस्य तेजसा,त्रिशिराको वज्रके प्रहारसे प्राणशून्य होकर पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर पड़ा देखकर भी देवराज इन्द्रको शान्ति नहीं मिली। वे उनके तेजसे संतप्त हो रहे थे
ବଜ୍ରାହତ ହୋଇ ପର୍ବତ ସମ ନିଶ୍ଚଳ ଭାବେ ପଡ଼ିଥିବା ତାକୁ ଦେଖିଲେ ମଧ୍ୟ ଦେବେନ୍ଦ୍ର ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଶାନ୍ତି ମିଳିଲା ନାହିଁ; ତାହାର ତେଜରେ ସେ ଯେନ ଦଗ୍ଧ ହେଉଥିଲେ।
Verse 26
हतो<पि दीप्ततेजा: स जीवन्निव हि दृश्यते । घातितस्य शिरांस्थाजौ जीवन्तीवाद्भुतानि वै
ହତ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ଦୀପ୍ତତେଜା ବ୍ୟକ୍ତି ଜୀବନ୍ତ ଭଳି ଦିଶୁଥିଲା; ଘାତିତର ଶିରମାନେ ମଧ୍ୟ ଯେନ ଜୀବନ୍ତ—ଏହା ନିଶ୍ଚୟ ଅଦ୍ଭୁତ।
Verse 27
क्योंकि वे मारे जानेपर भी अपने तेजसे उद्दीप्त होकर जीवित-से दिखायी देते थे। युद्धमें मारे हुए त्रिशिराके तीनों सिर जीते-जागते-से अद्भुत प्रतीत हो रहे थे ।। ततो5तिभीततगात्रस्तु शक्र आस्ते विचारयन् । अथाजगाम परशुं स्कन्धेनादाय वर्धकि:,इससे अत्यन्त भयभीत हो इन्द्र भारी सोच-विचारमें पड़ गये। इसी समय एक बढ़ई कंधेपर कुल्हाड़ी लिये उधर आ निकला
ମରିଗଲେ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ନିଜ ତେଜରେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ହୋଇ ଜୀବନ୍ତ ଭଳି ଦିଶୁଥିଲେ; ଯୁଦ୍ଧଭୂମିରେ ତ୍ରିଶିରାର ତିନୋଟି ଶିର ମଧ୍ୟ ଜୀବନ୍ତ ଭଳି ଅଦ୍ଭୁତ ଲାଗୁଥିଲା। ଏହା ଦେଖି ଶକ୍ର ଇନ୍ଦ୍ର ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଭୀତ ହୋଇ ଚିନ୍ତାରେ ବସିରହିଲେ। ସେଇ ସମୟରେ କାନ୍ଧରେ କୁହାଡ଼ି ନେଇ ଜଣେ ବଢ଼େଇ ସେଠାକୁ ଆସିଲା।
Verse 28
तदरण्यं महाराज यत्रास्तेडसौ निपातितः । स भीततस्तत्र तक्षाणं घटमानं शचीपति:,महाराज! वह बढ़ई उसी वनमें आया, जहाँ त्रिशिराको मार गिराया गया था। डरे हुए शचीपति इन्द्रने वहाँ अपना काम करते हुए बढ़ईको देखा। देखते ही पाकशासन इन्द्रने तुरंत उससे कहा--“बढ़ई! तू शीघ्र इस शवके तीनों मस्तकोंके टुकड़े-टुकड़े कर दे। मेरी इस आज्ञाका पालन कर'
ମହାରାଜ! ଯେଉଁ ଅରଣ୍ୟରେ ସେ ନିପାତିତ ହୋଇ ପଡ଼ିଥିଲା, ସେଇ ଅରଣ୍ୟକୁ ସେ ବଢ଼େଇ ଆସିଲା। ସେଠାରେ ଭୟଭୀତ ଶଚୀପତି ଇନ୍ଦ୍ର ତାକୁ କାମ କରୁଥିବା ଦେଖିଲେ।
Verse 29
अपश्यदब्रवीच्चैनं सत्वरं पाकशासन: । क्षिप्रं छिन्धि शिरांस्यस्य कुरुष्व वचनं मम,महाराज! वह बढ़ई उसी वनमें आया, जहाँ त्रिशिराको मार गिराया गया था। डरे हुए शचीपति इन्द्रने वहाँ अपना काम करते हुए बढ़ईको देखा। देखते ही पाकशासन इन्द्रने तुरंत उससे कहा--“बढ़ई! तू शीघ्र इस शवके तीनों मस्तकोंके टुकड़े-टुकड़े कर दे। मेरी इस आज्ञाका पालन कर'
ତାକୁ ସେଠାରେ ଦେଖି ପାକଶାସନ ଇନ୍ଦ୍ର ଅତ୍ୟନ୍ତ ତ୍ୱରାରେ ସଙ୍ଗେସଙ୍ଗେ କହିଲେ— “ଶୀଘ୍ର ଏହାର ମୁଣ୍ଡଗୁଡ଼ିକୁ କାଟି ଅଲଗା କର; ଏକ ମୁହୂର୍ତ୍ତ ମଧ୍ୟ ବିଳମ୍ବ କରନି। ମହାରାଜ! ମୋ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ କର।”
Verse 30
तक्षोवाच महास्कन्धो भृशं होष परशुर्न भविष्यति । कर्तु चाहं न शक्ष्यामि कर्म सद्धिर्विगर्हितम्,बढ़ईने कहा--इसके कंधे तो बड़े भारी और विशाल हैं। मेरी यह कुल्हाड़ी इसपर काम नहीं देगी और इस प्रकार किसी प्राणीकी हत्या करना तो साधु पुरुषों द्वारा निन्दित पापकर्म है, अतः मैं इसे नहीं कर सकूँगा
ବଢ଼େଇ କହିଲା— “ଏହାର କାନ୍ଧ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବଡ଼ ଓ ଭାରୀ; ମୋ କୁହାଡ଼ି ଏଥିରେ କାମ କରିବ ନାହିଁ। ତଦୁପରି ଏପରି ଭାବେ ପ୍ରାଣୀହତ୍ୟା କରିବା ସଜ୍ଜନମାନେ ନିନ୍ଦା କରନ୍ତି—ଏହା ପାପକର୍ମ; ତେଣୁ ମୁଁ କରିପାରିବି ନାହିଁ।”
Verse 31
इन्द्र वाच मा भैस्त्वं शीघ्रमेतद् वै कुरुष्व वचनं मम । मत्प्रसादाद्धि ते शस्त्र वजकल्पं भविष्यति,इन्द्रने कहा--बढ़ई! तू भय न कर। शीघ्र मेरी इस आज्ञाका पालन कर। मेरे प्रसादसे तेरी यह कुल्हाड़ी वज़के समान हो जायगी
ଇନ୍ଦ୍ର କହିଲେ— “ଭୟ କରନି, ବଢ଼େଇ। ଶୀଘ୍ର ମୋ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ କର। ମୋ ପ୍ରସାଦରେ ତୋର ଏହି କୁହାଡ଼ି ବଜ୍ରସମ ହେବ।”
Verse 32
तक्षोवाच क॑ भवन्तमहं विद्यां घोरकर्माणमद्य वै । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्वेन कथयस्व मे
ତକ୍ଷ କହିଲା— “ଆଜି ଏପରି ଘୋର କର୍ମ କରାଇବାକୁ ଯେ ଆପଣ ଆଦେଶ ଦେଉଛନ୍ତି, ଆପଣ କିଏ—ମୁଁ କିପରି ଜାଣିବି? ମୁଁ ଏହା ସତ୍ୟରେ ଶୁଣିବାକୁ ଚାହେଁ; ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ କହନ୍ତୁ।”
Verse 33
बढ़ईने पूछा--आज इस प्रकार भयानक कर्म करनेवाले आप कौन हैं, यह मैं कैसे समझूँ? मैं आपका परिचय सुनना चाहता हूँ। यह यथार्थरूपसे बताइये ।। इन्द्र रवाच अहमिन्द्रो देवराजस्तक्षन् विदितमस्तु ते । कुरुष्वैतद् यथोक्तं मे तक्षन् मात्र विचारय,इन्द्रने कहा--बढ़ई! तुझे मालूम होना चाहिये कि मैं देवराज इन्द्र हूँ। मैंने जो कुछ कहा है, उसे शीघ्र पूरा कर। इस विषयमें कुछ विचार न कर
ଇନ୍ଦ୍ର ଉତ୍ତର ଦେଲେ— “ତକ୍ଷ, ଜାଣି ରଖ—ମୁଁ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ର। ମୁଁ ଯେପରି କହିଛି ସେପରି ତୁରନ୍ତ କର; ଏଥିରେ ବିଚାର କରି ସମୟ ନଷ୍ଟ କରନି।”
Verse 34
तक्षोवाच क्रूरेण नापत्रपसे कथं शक्रेह कर्मणा । ऋष्िपुत्रमिमं हत्वा ब्रह्म॒हत्याभयं न ते,बढ़ईने कहा--देवराज! इस क्रूर कर्मसे आपको यहाँ लज्जा कैसे नहीं आती है? इस ऋषिकुमारकी हत्या करनेसे जो ब्रह्महत्याका पाप लगेगा, क्या उसका भय आपको नहीं है?
Takṣa said: “O Śakra (Indra), how do you feel no shame here for this cruel deed? Having slain this son of a ṛṣi, do you not fear the dread of brahmahatyā—the sin incurred by killing a brahmin?”
Verse 35
शक्र उवाच पश्चाद् धर्म चरिष्यामि पावनार्थ सुदुश्चरम् । शत्रुरेष महावीरयों वज्ेण निहतो मया,इन्द्रने कहा--यह मेरा महान् शक्तिशाली शत्रु था, जिसे मैंने वज़्से मार डाला है। इसके बाद ब्रह्महत्यासे अपनी शुद्धि करनेके लिये मैं किसी ऐसे धर्मका अनुष्ठान करूँगा, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त दुष्कर हो
Śakra (Indra) said: “After this, for the sake of purification, I shall undertake a dharma-observance that is exceedingly difficult. This was my mighty and powerful enemy, whom I have slain with the thunderbolt.”
Verse 36
अद्यापि चाहमुद्विग्नस्तक्षन्नस्माद् बिभेमि वै । क्षिप्रं छिन्धि शिरांसि त्वं करिष्येडनुग्रहं तव
Even now I remain deeply agitated; I truly fear this Takṣaka. Quickly cut off his heads—then I shall grant you my favor (as a boon).
Verse 37
बढ़ई! यद्यपि यह मारा गया है, तो भी अभीतक मुझे इसका भय बना हुआ है। तू शीघ्र इसके मस्तकोंके टुकड़े-टुकड़े कर दे। मैं तेरे ऊपर अनुग्रह करूँगा ।। शिर: पशोस्ते दास्यन्ति भागं यज्ञेषु मानवा: । एष ते&नुग्रहस्तक्षन् क्षिप्रं कुरुमम प्रियम्,मनुष्य हिंसाप्रधान तामस यज्ञोंमें पशुका सिर तेरे भागके रूपमें देंगे। बढ़ई! यह तेरे ऊपर मेरा अनुग्रह है। अब तू जल्दी मेरा प्रिय कार्य कर
Śakra said: “Carpenter, although this one has been slain, I still feel fear of him even now. Quickly cut his heads into pieces; I will show you favor. In the dark, violence-centered sacrifices performed by men, they will give you the head of the sacrificial animal as your share. This is my boon to you, carpenter—now swiftly do what pleases me.”
Verse 38
शल्य उवाच एतच्छुत्वा तु तक्षा स महेन्द्रवचनात् तदा । शिरांस्यथ त्रिशिरस: कुठारेणाच्छिनत् तदा,शल्य कहते हैं--राजन्! यह सुनकर बढ़ईने उस समय महेन्द्रकी आज्ञाके अनुसार कुठारसे त्रिशिराके तीनों सिरोंके टुकड़े-टुकड़े कर दिये
Śalya said: “O King, having heard this, the carpenter then, in accordance with Mahendra’s command, struck with an axe and cut off the heads of Triśiras—splitting them apart.”
Verse 39
निकृत्तेषु ततस्तेषु निष्क्रामन्नण्डजास्त्वथ । कपिज्जलास्तित्तिराश्न कलविड्काश्न सर्वश:,कट जानेपर उनके अंदरसे तीन प्रकारके पक्षी बाहर निकले, कपिंजल, तीतर और गौरैये
ତାପରେ ସେଗୁଡ଼ିକ (ଡିମ୍ବ) ଭାଙ୍ଗିଦିଆଯାଉଥିବାବେଳେ, ସବୁଦିଗରେ ଅଣ୍ଡଜ ପକ୍ଷୀମାନେ ବାହାରିଲେ—କପିଞ୍ଜଳ, ତିତ୍ତିର ଓ ଗୋରେଇ।
Verse 40
येन वेदानधीते सम पिबते सोममेव च । तस्माद् वक्त्राद् विनिश्वेरु: क्षिप्रं तस्प कपिञज्जला:,जिस मुखसे वे वेदोंका पाठ करते तथा केवल सोमरस पीते थे, उससे शीघ्रतापूर्वक कपिंजल पक्षी बाहर निकले थे
ଯେ ମୁଖରେ ସେ ବେଦ ପଢ଼ୁଥିଲା ଏବଂ କେବଳ ସୋମରସ ପିଉଥିଲା, ସେଇ ମୁଖରୁ ଶୀଘ୍ର କପିଞ୍ଜଳ ପକ୍ଷୀମାନେ ବାହାରିଲେ।
Verse 41
येन सर्वा दिशो राजन् पिबन्निव निरीक्षते | तस्माद् वकक्त्राद विनिश्रेरुस्तित्तिरास्तस्य पाण्डव,युधिष्ठिर! जिसके द्वारा वे सम्पूर्ण दिशाओंको इस प्रकार देखते थे, मानो पी जायूँगे, उस मुखसे तीतर पक्षी निकले
ହେ ରାଜନ! ଯେ ଦୃଷ୍ଟିରେ ସେ ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ପିଉଥିବା ପରି ଦେଖୁଥିଲା, ସେଇ ମୁଖରୁ—ହେ ପାଣ୍ଡବ—ତାହାର ତିତ୍ତିର ପକ୍ଷୀମାନେ ବାହାରିଲେ।
Verse 42
यत् सुरापं तु तस्यासीद् वक्त्र॑ त्रेशिरसस्तदा । कलविड्का: समुत्पेतु: श्येनाश्न भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! त्रेशिराका जो मुख सुरापान करनेवाला था, उससे गौरैये तथा बाज नामक पक्षी प्रकट हुए
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେତେବେଳେ ତ୍ରିଶିରାର ଯେ ମୁଖ ସୁରାପାନରେ ଆସକ୍ତ ଥିଲା, ସେଇ ମୁଖରୁ ଗୋରେଇ ଓ ଶ୍ୟେନ (ବାଜ) ପରି ପକ୍ଷୀମାନେ ଉଦ୍ଭବ ହେଲେ।
Verse 43
ततस्तेषु निकृत्तेषु विज्वरो मघवानथ । जगाम त्रिदिवं हृष्टस्तक्षापि स्वगृहान् ययौ,उन तीनों सिरोंके कट जानेपर इन्द्रकी मानसिक चिन्ता दूर हो गयी। वे प्रसन्न होकर स्वर्गको लौट गये तथा बढ़ई भी अपने घर चला गया
ସେ (ତିନି) ମୁଣ୍ଡ କାଟିଦିଆଯାଇବା ପରେ ମଘବାନ୍ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ମନସିକ ଚିନ୍ତା ଦୂର ହେଲା। ସେ ହର୍ଷିତ ହୋଇ ତ୍ରିଦିବ (ସ୍ୱର୍ଗ)କୁ ଫେରିଗଲେ, ଏବଂ ବଢ଼େଇ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଘରକୁ ଚାଲିଗଲା।
Verse 44
(तक्षापि स्वगृहं गत्वा नैव शंसति कस्यचित् | अथैनं नाभिजानन्ति वर्षमेक॑ तथागतम् ।। अथ संवत्सरे पूर्णे भूता: पशुपते: प्रभो । समाक्रोशन्त मघवान् नः प्रभुर्ब्रह्महा इति ।। तत इन्द्रो ब्रतं घोरमाचरत् पाकशासन: । तपसा च स संयुक्त: सह देवैर्मरुद्गणै: ।। समुद्रेषु पृथिव्यां च वनस्पतिषु स्त्रीषु च । विभज्य ब्रह्महत्यां च तान् वरैरप्पयपोजयत् ।। वरदस्तु वरं दत्त्वा पृथिव्यै सागराय च । वनस्पतिभ्य: स्त्रीभ्यश्न ब्रह्महत्यां नुनोद ताम् ।। ततस्तु शुद्धों भगवान् देवैलोंकैश्व पूजित: । इन्द्रस्थानमुपातिष्ठत् पूज्यमानो महर्षिभि: ।। ) उस बढ़ईने भी अपने घर जाकर किसीसे कुछ नहीं कहा। तदनन्तर इन्द्रने ऐसा काम किया है, यह एक वर्षतक किसीको मालूम नहीं हुआ। युधिष्ठिर! वर्ष पूर्ण होनेपर भगवान् पशुपतिके भूतगण यह हल्ला मचाने लगे कि हमारे स्वामी इन्द्र ब्रह्महत्यारे हैं। तब पाकशासन इन्द्रने ब्रह्महत्यासे मुक्ति पानेके लिये कठिन व्रतका आचरण किया। वे देवताओं तथा मरुद्गणोंके साथ तपस्यामें संलग्न हो गये। उन्होंने समुद्र, पृथ्वी, वृक्ष तथा स्त्रीसमुदायको अपनी ब्रह्महत्या बाँकर उन सबको अभीष्ट वरदान दिया। इस प्रकार वरदायक इन्द्रने पृथ्वी, समुद्र, वनस्पति तथा स्त्रियोंको वर देकर उस ब्रह्महत्याको दूर किया। तदनन्तर शुद्ध होकर भगवान् इन्द्र देवताओं, मनुष्यों तथा महर्षियोंसे पूजित होते हुए अपने इन्द्रपदपर आसीन हुए। मेने कृतार्थमात्मानं हत्वा शत्रुं सुरारिहा । त्वष्टा प्रजापति: श्रुत्वा शक्रेणाथ हतं सुतम्
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ସେଇ ବଢ଼େଇ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଘରକୁ ଫେରିଗଲା ଏବଂ କାହାକୁ କିଛି କହିଲା ନାହିଁ। ପୂରା ଗୋଟିଏ ବର୍ଷ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଇନ୍ଦ୍ର ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ କରିଛନ୍ତି ବୋଲି କାହାରୁ ଜଣା ପଡ଼ିଲା ନାହିଁ। ବର୍ଷ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେବା ସହିତ ଭଗବାନ ପଶୁପତିଙ୍କ ଭୂତଗଣ ହୁଙ୍କାର କଲେ—‘ମଘବାନ, ଆମ ପ୍ରଭୁ, ବ୍ରାହ୍ମଣହତ୍ୟାର ଦୋଷୀ!’ ତେବେ ପାକଶାସନ ଇନ୍ଦ୍ର ବ୍ରହ୍ମହତ୍ୟା ପାପରୁ ମୁକ୍ତି ପାଇବାକୁ ଘୋର ବ୍ରତ ଆଚରଣ କଲେ। ଦେବମାନେ ଓ ମରୁଦ୍ଗଣ ସହିତ ସେ ତପସ୍ୟାରେ ଲୀନ ହେଲେ। ସେଇ ବ୍ରହ୍ମହତ୍ୟାକୁ ସମୁଦ୍ର, ପୃଥିବୀ, ବନସ୍ପତି ଓ ସ୍ତ୍ରୀସମୁଦାୟ ମଧ୍ୟରେ ବାଣ୍ଟି ଦେଇ, ଇଚ୍ଛିତ ବର ଦେଇ ସେମାନଙ୍କୁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କଲେ। ଏଭଳି ଭାବେ ବରଦାତା ଇନ୍ଦ୍ର ପୃଥିବୀ, ସାଗର, ବନସ୍ପତି ଓ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ବର ଦେଇ ସେଇ ବ୍ରହ୍ମହତ୍ୟାକୁ ନିଜଠାରୁ ଦୂର କଲେ। ପରେ ଶୁଦ୍ଧ ହୋଇ, ଦେବମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମ୍ମାନିତ ଓ ମହର୍ଷିମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୂଜିତ ଭଗବାନ ଇନ୍ଦ୍ର ପୁନର୍ବାର ନିଜ ଇନ୍ଦ୍ରପଦରେ ଅଧିଷ୍ଠିତ ହେଲେ।
Verse 45
क्रोधसंरक्तनयन इदं वचनमत्रवीत् | दैत्योंका संहार करनेवाले इन्द्रने शत्रुको मारकर अपने आपको कृतार्थ माना। इधर त्वष्टा प्रजापतिने जब यह सुना कि इन्द्रने मेरे पुत्रको मार डाला है, तब उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और वे इस प्रकार बोले || ४४ ह |। त्वष्टोवाच तप्यमानं तपो नित्य क्षान्तं दान्तं जितेन्द्रियम् । विनापराधेन यतः: पुत्र हिंसितवान् मम,त्वष्टाने कहा--मेरा पुत्र सदा क्षमाशील, संयमी और जितेन्द्रिय रहकर तपस्यामें लगा हुआ था, तो भी इन्द्रने बिना किसी अपराधके उसकी हत्या की है
ତ୍ୱଷ୍ଟା କହିଲେ—ମୋ ପୁତ୍ର ସଦା ତପସ୍ୟାରେ ଲୀନ ଥିଲା; ସେ କଷ୍ଟସହିଷ୍ଣୁ, କ୍ଷମାଶୀଳ, ସଂୟମୀ ଓ ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ଥିଲା। ତଥାପି କୌଣସି ଅପରାଧ ବିନା ଇନ୍ଦ୍ର ମୋ ପୁତ୍ରକୁ ବଧ କଲେ।
Verse 46
तस्माच्छक्रविनाशाय वृत्रमुत्पादयाम्यहम् । लोकाः पश्यन्तु मे वीर्य तपसश्न॒ बल॑ महत्,अतः मैं भी देवेन्द्रके विनाशके लिये वृत्रासुरको उत्पन्न करूँगा। आज संसारके लोग मेरा पराक्रम तथा मेरी तपस्याका महान् बल देखें
ଏହେତୁ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ବିନାଶ ପାଇଁ ମୁଁ ବୃତ୍ରକୁ ଉତ୍ପନ୍ନ କରିବି। ଲୋକମାନେ ମୋ ପରାକ୍ରମ ଓ ମୋ ତପସ୍ୟାର ମହାବଳ ଦେଖୁନ୍ତୁ।
Verse 47
सच पश्यतु देवेन्द्रो दुरात्मा पापचेतन: । उपस्पृश्य ततः क्रुद्धस्तपस्वी सुमहायशा:,साथ ही वह पापात्मा और दुरात्मा देवेन्द्र भी मेरा महान् तपोबल देख ले। ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए तपस्वी एवं महायशस्वी त्वष्टाने आचमन करके अग्निमें आहुति दे घोर रूपवाले वृत्रासुरको उत्पन्न करके उससे कहा--*इन्द्रशत्रो! तू मेरी तपस्याके प्रभावसे खूब बढ़ जा'
ଏବଂ ସେଇ ଦୁରାତ୍ମା, ପାପଚେତନ ଦେବେନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ମୋ ମହାନ୍ ତପୋବଳ ଦେଖୁ। ଏହିପରି କହି କ୍ରୋଧରେ ଦଗ୍ଧ, ତପସ୍ବୀ ଓ ମହାୟଶସ୍ବୀ ତ୍ୱଷ୍ଟା ଆଚମନ କଲେ।
Verse 48
अग्नौ हुत्वा समुत्पाद्य घोर वृत्रमुवाच ह । इन्द्रशत्रो विवर्धस्व प्रभावात् तपसो मम,साथ ही वह पापात्मा और दुरात्मा देवेन्द्र भी मेरा महान् तपोबल देख ले। ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए तपस्वी एवं महायशस्वी त्वष्टाने आचमन करके अग्निमें आहुति दे घोर रूपवाले वृत्रासुरको उत्पन्न करके उससे कहा--*इन्द्रशत्रो! तू मेरी तपस्याके प्रभावसे खूब बढ़ जा'
ଅଗ୍ନିରେ ଆହୁତି ଦେଇ ସେ ଘୋର ବୃତ୍ରକୁ ଉତ୍ପନ୍ନ କରି ତାହାକୁ କହିଲେ—“ଇନ୍ଦ୍ରଶତ୍ରୋ! ମୋ ତପସ୍ୟାର ପ୍ରଭାବରେ ତୁ ଭଲଭାବେ ବୃଦ୍ଧି ପା, ବଳବାନ୍ ହେ।”
Verse 49
सो<वर्धत दिवं स्तब्ध्वा सूर्यवैश्वानरोपम: । कि करोमीति चोवाच कालसूर्य इवोदित:,उनके इतना कहते ही सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी वृत्रासुर सारे आकाशको आक्रान्त करके बहुत बड़ा हो गया। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो प्रलयकालका सूर्य उदित हुआ हो। उसने पूछा--'पिताजी! मैं क्या करूँ?”
ସେ କଥା କୁହାଯାଇମାତ୍ରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଓ ବୈଶ୍ୱାନର ଅଗ୍ନି ସମ ତେଜସ୍ବୀ ବୃତ୍ରାସୁର ଆକାଶକୁ ଯେନ ଥମ୍ଭାଇ ସମଗ୍ର ଗଗନକୁ ଆକ୍ରାନ୍ତ କରି ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଶାଳ ହେଲା। ସେ ପ୍ରଳୟକାଳରେ ଉଦିତ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପରି ଦିଶୁଥିଲା। ତାପରେ ସେ ପଚାରିଲା— “ପିତା, ମୁଁ କ’ଣ କରିବି?”
Verse 50
] ॥। फि ॥// ।॑ !!/ | / |, है शक्रं जहीति चाप्युक्तो जगाम त्रिदिवं ततः | ततो युद्धं समभवद् वृत्रवासवयो्महत्,तब त्वष्टाने कहा--“इन्द्रको मार डालो।” उनके ऐसा कहनेपर वृत्रासुर स्वर्गलोकमें गया। तदनन्तर वृत्रासुर तथा इन्द्रमें बड़ा भारी युद्ध छिड़ गया
ତେବେ ତ୍ୱଷ୍ଟା କହିଲେ— “ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)କୁ ବଧ କର।” ସେହି ଆଦେଶ ପାଇ ବୃତ୍ର ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ଗଲା। ତାପରେ ବୃତ୍ର ଓ ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ମଧ୍ୟରେ ମହାଭୟଙ୍କର ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ ହେଲା।
Verse 51
संक़रुद्धयोर्महाघोरं प्रसक्ते कुरुसत्तम । ततो जग्राह देवेन्द्र वत्रो वीर: शतक्रतुम्,कुरुश्रष्ठ! वे दोनों क्रोधमें भरे हुए थे। उनमें अत्यन्त घोर संग्राम होने लगा। तदनन्तर कुपित हुए वीर वृत्रासुरने शतक्रतु इन्द्रको पकड़ लिया और मुँह बाकर उन्हें उसके भीतर डाल लिया। वृत्रासुरके द्वारा इन्द्रके ग्रस लिये जानेपर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवता घबरा गये
କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଉଭୟେ କ୍ରୋଧରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଘୋର ଯୁଦ୍ଧରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହେବା ସମୟରେ, ବୀର ବୃତ୍ର ଦେବେନ୍ଦ୍ର ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ରକୁ ଧରିନେଲା।
Verse 52
अपावृत्याक्षिपद् वकत्रे शक्रं कोपसमन्वित: । ग्रस्ते वृत्रेण शक्रे तु सम्भ्रान्तास्त्रिदिवेश्वरा:,कुरुश्रष्ठ! वे दोनों क्रोधमें भरे हुए थे। उनमें अत्यन्त घोर संग्राम होने लगा। तदनन्तर कुपित हुए वीर वृत्रासुरने शतक्रतु इन्द्रको पकड़ लिया और मुँह बाकर उन्हें उसके भीतर डाल लिया। वृत्रासुरके द्वारा इन्द्रके ग्रस लिये जानेपर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवता घबरा गये
କ୍ରୋଧରେ ଭରିଥିବା ବୃତ୍ର ମୁହଁ ବିସ୍ତାର କରି ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)କୁ ଧରି ନିଜ ଜହ୍ନାରେ ଛାଡ଼ିଦେଲା। ବୃତ୍ର ଇନ୍ଦ୍ରକୁ ଗ୍ରସିଲା ପରେ ତ୍ରିଦିବର ଅଧିପତି ଦେବଗଣ ଆତଙ୍କିତ ହେଲେ।
Verse 53
असृजंस्ते महासत्त्वा जृम्भिकां वृत्रनाशिनीम् । विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्थादपावृतात्,तब उन महासत्त्वशाली देवताओंने जँभाईकी सृष्टि की, जो वृत्रासुरका नाश करनेवाली थी। जँभाई लेते समय जब वृत्रासुरने अपना मुख फैलाया, तब बलनाशक इन्द्र अपने अंगोंको समेटकर बाहर निकल आये। तभीसे सब लोगोंके प्राणोंमें जुम्भाशक्तिका निवास हो गया
ତେବେ ସେହି ମହାସତ୍ତ୍ୱଶାଳୀ ଦେବଗଣ ବୃତ୍ରନାଶିନୀ ‘ଜୃମ୍ଭିକା’ ଶକ୍ତିର ସୃଷ୍ଟି କଲେ। ପରେ ବୃତ୍ର ଜମ୍ଭାଇ ନେଇ ମୁହଁ ପ୍ରସାରିତ କରିବାବେଳେ, ବଳନାଶକ ଦେବେନ୍ଦ୍ର ଇନ୍ଦ୍ର ନିଜ ଅଙ୍ଗଗୁଡ଼ିକୁ ସମେଟି ସେହି ଖୋଲା ମୁହଁରୁ ବାହାରି ଆସିଲେ। ସେହି ଘଟଣାରୁ ହିଁ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ପ୍ରାଣବାୟୁରେ ଜମ୍ଭାଇର ଶକ୍ତି ବାସ କରିଲା।
Verse 54
स्वान्यड्रान्यभिसंक्षिप्य निष्क्रान्तो बलनाशन: । ततः प्रभूृति लोकस्य जृम्भिका प्राणसंश्रिता,तब उन महासत्त्वशाली देवताओंने जँभाईकी सृष्टि की, जो वृत्रासुरका नाश करनेवाली थी। जँभाई लेते समय जब वृत्रासुरने अपना मुख फैलाया, तब बलनाशक इन्द्र अपने अंगोंको समेटकर बाहर निकल आये। तभीसे सब लोगोंके प्राणोंमें जुम्भाशक्तिका निवास हो गया
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁବଳନାଶକ ଇନ୍ଦ୍ର ନିଜ ଅଙ୍ଗଗୁଡ଼ିକୁ ସଂକୋଚିତ କରି, ନିଜକୁ ଗୁଟିଏଇ ତାହାର ମୁଖରୁ ବାହାରି ଆସିଲେ। ସେହି ସମୟରୁ ସମସ୍ତ ଜୀବଙ୍କ ପ୍ରାଣରେ ଜୃମ୍ଭିକା—ଜମ୍ଭାଇର ଶକ୍ତି—ନିବାସ କଲା।
Verse 55
जद्वषुश्न सुरा: सर्वे शक्रं दृष्टवा विनि:सृतम् । ततः प्रववृते युद्ध वृत्रवासवयो: पुन:,इन्द्रको उसके मुखसे निकला हुआ देख सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। तदनन्तर वृत्रासुर तथा इन्द्रमें पुनः युद्ध होने लगा
ଶୁଷ୍ଣ ସହିତ ସମସ୍ତ ଦେବତା ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) କୁ ତାହାର ମୁଖରୁ ବାହାରୁଥିବା ଦେଖି ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ। ତାପରେ ବୃତ୍ର ଓ ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ମଧ୍ୟରେ ପୁନଃ ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ ହେଲା।
Verse 56
संरब्धयोस्तदा घोर सुचिरं भरतर्षभ । यदा व्यवर्धत रणे वृत्रो बलसमन्वित:,भरतश्रेष्ठ! क्रोधमें भरे हुए उन दोनों वीरोंका वह भयानक संग्राम बहुत देरतक चलता रहा। वृत्रासुर त्वष्टाेके तेज और बलसे व्याप्त हो जब युद्धमें अधिक बलशाली हो बढ़ने लगा, तब इन्द्र युद्धसे विमुख हो गये। इन्द्रके विमुख होनेपर सब देवताओंको बड़ा दुःख हुआ
ଭରତର୍ଷଭ! କ୍ରୋଧରେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ସେଇ ଦୁଇ ବୀରଙ୍କ ଭୟଙ୍କର ସଂଗ୍ରାମ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଚାଲିଲା। ବଳସମନ୍ୱିତ ବୃତ୍ର ଯୁଦ୍ଧରେ ଅଧିକ ପ୍ରବଳ ହେବାକୁ ଲାଗିଲେ, ଇନ୍ଦ୍ର ରଣରୁ ବିମୁଖ ହେଲେ; ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପ୍ରତ୍ୟାହାର ଦେଖି ସମସ୍ତ ଦେବତା ଶୋକାକୁଳ ହେଲେ।
Verse 57
त्वष्टस्तेजोबलाविद्धस्तदा शक्रो न्यवर्तत । निवृत्ते च तदा देवा विषादमगमन् परम्,भरतश्रेष्ठ! क्रोधमें भरे हुए उन दोनों वीरोंका वह भयानक संग्राम बहुत देरतक चलता रहा। वृत्रासुर त्वष्टाेके तेज और बलसे व्याप्त हो जब युद्धमें अधिक बलशाली हो बढ़ने लगा, तब इन्द्र युद्धसे विमुख हो गये। इन्द्रके विमुख होनेपर सब देवताओंको बड़ा दुःख हुआ
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ତେବେ ତ୍ୱଷ୍ଟୃ ପ୍ରଦତ୍ତ ତେଜ ଓ ବଳରେ ଆହତ ହୋଇ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ଯୁଦ୍ଧରୁ ପଛୁଆ ହେଲେ। ଏବଂ ସେ ନିବୃତ୍ତ ହେବା ସହିତ, ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଦେବତାମାନେ ପରମ ବିଷାଦକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ।
Verse 58
समेत्य सह शक्रेण त्वष्टस्तेजोविमोहिता: । आमन्त्रयन्त ते सर्वे मुनिभि: सह भारत,भारत! त्वष्टाके तेजसे मोहित हुए सब देवता देवराज इन्द्र तथा ऋषियोंसे मिलकर सलाह करने लगे कि अब हमें क्या करना चाहिये? राजन्! भयसे मोहित हुए सब देवता बहुत देरतक सोच-विचार करके मन-ही-मन अविनाशी परमात्मा भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और वे वृत्रासुरके वधकी इच्छासे मन्दराचलके शिखरपर ध्यानस्थ होकर बैठ गये
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ତ୍ୱଷ୍ଟୃର ତେଜରେ ମୋହିତ ସେଇ ସମସ୍ତ ଦେବତା ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ସହ ଏକତ୍ର ହୋଇ, ମୁନିମାନଙ୍କ ସହ ପରାମର୍ଶ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ—“ଏବେ ଆମେ କ’ଣ କରିବା ଉଚିତ?”
Verse 59
कि कार्यमिति वै राजन् विचिन्त्य भयमोहिता: । जग्मु: सर्वे महात्मानं मनोभिर्विष्णुमव्ययम् । उपविष्टा मन्दराग्रये सर्वे वृत्रवधेप्सव:,भारत! त्वष्टाके तेजसे मोहित हुए सब देवता देवराज इन्द्र तथा ऋषियोंसे मिलकर सलाह करने लगे कि अब हमें क्या करना चाहिये? राजन्! भयसे मोहित हुए सब देवता बहुत देरतक सोच-विचार करके मन-ही-मन अविनाशी परमात्मा भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और वे वृत्रासुरके वधकी इच्छासे मन्दराचलके शिखरपर ध्यानस्थ होकर बैठ गये
‘ହେ ରାଜନ, ଏବେ କ’ଣ କରିବା?’—ଭୟରେ ମୋହିତ ହୋଇ ସେମାନେ ବିଚାର କଲେ। ପରେ ସମସ୍ତେ ମନେ-ମନେ ମହାତ୍ମା, ଅବ୍ୟୟ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କ ଶରଣକୁ ଗଲେ। ବୃତ୍ରବଧର ଇଚ୍ଛାରେ ସେମାନେ ମନ୍ଦର ପର୍ବତର ଶିଖରେ ଏକାଗ୍ର ନିଶ୍ଚୟରେ ବସିଲେ।
Verse 166
इन्द्रियाणि वशे कृत्वा पूर्वसागरसंनिभ: । शल्य बोले--राजन्! इन्द्रकी आज्ञा पाकर वे सब अप्सराएँ त्रिशिराके समीप गयीं। वहाँ उन सुन्दरियोंने भाँति-भाँतिके हाव-भावोंद्वारा उन्हें लुभानेका प्रयत्न किया तथा प्रतिदिन विश्वरूपको अपने अंगोंके सौन्दर्यका दर्शन कराया। तथापि वे महातपस्वी महर्षि उन सबको देखते हुए हर्ष आदि विकारोंको नहीं प्राप्त हुए; अपितु वे इन्द्रियोंको वशमें करके पूर्वसागरके समान शान्तभावसे बैठे रहे
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ଇନ୍ଦ୍ରିୟଗୁଡ଼ିକୁ ବଶ କରି ସେ ପୂର୍ବ ସାଗର ପରି ଶାନ୍ତ ରହିଲେ। ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ଅପ୍ସରାମାନେ ତ୍ରିଶିରାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ; ନାନା ପ୍ରକାର ହାବଭାବରେ ତାଙ୍କୁ ମୋହିତ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲେ ଏବଂ ପ୍ରତିଦିନ ବିଶ୍ୱରୂପଙ୍କୁ ନିଜ ଅଙ୍ଗସୌନ୍ଦର୍ୟ ଦେଖାଇଲେ। ତଥାପି ସେ ମହାତପସ୍ବୀ ମହର୍ଷି, ସେମାନଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ ମଧ୍ୟ, ହର୍ଷାଦି ବିକାରକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ ନାହିଁ; ଇନ୍ଦ୍ରିୟଜୟ କରି ପୂର୍ବ ସାଗର ପରି ଅଚଳ ଶାନ୍ତିରେ ବସି ରହିଲେ।
Verse 196
चिन्तयामास तस्यैव वधोपायं युधिष्ठिर । युधिष्ठिर! तब परम बुद्धिमान् इन्द्रने अप्सराओंका आदर-सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया और वे त्रिशिराके वधका उपाय सोचने लगे
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ପରମ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଇନ୍ଦ୍ର ଅପ୍ସରାମାନଙ୍କୁ ସତ୍କାର କରି ବିଦାୟ ଦେଲେ ଏବଂ ସେହି ଜଣଙ୍କ ବଧର ଉପାୟ ଚିନ୍ତା କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 216
शत्रुः प्रवृद्धो नोपेक्ष्यो दुर्बलोडपि बलीयसा। (उन्होंने सोचा--) “आज मैं त्रिशिरापर वज्रका प्रहार करूँगा, जिससे वह तत्काल नष्ट हो जायगा। बलवान पुरुषको दुर्बल होनेपर भी बढ़ते हुए अपने शत्रुकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये'
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—“ଶତ୍ରୁ ବୃଦ୍ଧି ପାଉଥିଲେ, ସେ ଦୁର୍ବଳ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ବଳବାନ ଲୋକ ତାକୁ ଅବହେଳା କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।” ଏମିତି ଭାବି ସେ ନିଶ୍ଚୟ କଲା—“ଆଜି ମୁଁ ତ୍ରିଶିରା ଉପରେ ବଜ୍ରପ୍ରହାର କରିବି, ଯେପରି ସେ ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ନଶିଯାଉ।”
The central dilemma is whether perceived future risk justifies preemptive harm against a disciplined ascetic who is not shown committing an immediate offense; the narrative juxtaposes security logic with the moral and ritual liabilities of unjust violence.
Fear-driven governance that substitutes coercion for ethical deliberation can amplify instability: attempts to control power through seduction and then force create moral debt and retaliation, turning private anxiety into systemic crisis.
No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the chapter’s meta-function is exemplum-based—using etiological and moral causality to frame later political counsel within Udyoga-parva’s broader discourse on decision-making and consequence.