इन्द्रस्य दुःखप्राप्तिः—त्रिशिरोवधः, वृत्रोत्पत्तिः, जृम्भिकाजननम्
Indra’s Distress: Slaying of Triśiras, Birth of Vṛtra, and the Origin of Yawning
स्वान्यड्रान्यभिसंक्षिप्य निष्क्रान्तो बलनाशन: । ततः प्रभूृति लोकस्य जृम्भिका प्राणसंश्रिता,तब उन महासत्त्वशाली देवताओंने जँभाईकी सृष्टि की, जो वृत्रासुरका नाश करनेवाली थी। जँभाई लेते समय जब वृत्रासुरने अपना मुख फैलाया, तब बलनाशक इन्द्र अपने अंगोंको समेटकर बाहर निकल आये। तभीसे सब लोगोंके प्राणोंमें जुम्भाशक्तिका निवास हो गया
svāny aṅgāny abhisaṅkṣipya niṣkrānto balanāśanaḥ | tataḥ prabhṛti lokasya jṛmbhikā prāṇasaṃśritā ||
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁବଳନାଶକ ଇନ୍ଦ୍ର ନିଜ ଅଙ୍ଗଗୁଡ଼ିକୁ ସଂକୋଚିତ କରି, ନିଜକୁ ଗୁଟିଏଇ ତାହାର ମୁଖରୁ ବାହାରି ଆସିଲେ। ସେହି ସମୟରୁ ସମସ୍ତ ଜୀବଙ୍କ ପ୍ରାଣରେ ଜୃମ୍ଭିକା—ଜମ୍ଭାଇର ଶକ୍ତି—ନିବାସ କଲା।
शल्य उवाच