इन्द्रस्य दुःखप्राप्तिः—त्रिशिरोवधः, वृत्रोत्पत्तिः, जृम्भिकाजननम्
Indra’s Distress: Slaying of Triśiras, Birth of Vṛtra, and the Origin of Yawning
अपावृत्याक्षिपद् वकत्रे शक्रं कोपसमन्वित: । ग्रस्ते वृत्रेण शक्रे तु सम्भ्रान्तास्त्रिदिवेश्वरा:,कुरुश्रष्ठ! वे दोनों क्रोधमें भरे हुए थे। उनमें अत्यन्त घोर संग्राम होने लगा। तदनन्तर कुपित हुए वीर वृत्रासुरने शतक्रतु इन्द्रको पकड़ लिया और मुँह बाकर उन्हें उसके भीतर डाल लिया। वृत्रासुरके द्वारा इन्द्रके ग्रस लिये जानेपर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवता घबरा गये
apāvṛtyākṣipad vaktre śakraṃ kopasamanvitaḥ | graste vṛtreṇa śakre tu sambhrāntās tridiveśvarāḥ ||
କ୍ରୋଧରେ ଭରିଥିବା ବୃତ୍ର ମୁହଁ ବିସ୍ତାର କରି ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)କୁ ଧରି ନିଜ ଜହ୍ନାରେ ଛାଡ଼ିଦେଲା। ବୃତ୍ର ଇନ୍ଦ୍ରକୁ ଗ୍ରସିଲା ପରେ ତ୍ରିଦିବର ଅଧିପତି ଦେବଗଣ ଆତଙ୍କିତ ହେଲେ।
शल्य उवाच