इन्द्रस्य दुःखप्राप्तिः—त्रिशिरोवधः, वृत्रोत्पत्तिः, जृम्भिकाजननम्
Indra’s Distress: Slaying of Triśiras, Birth of Vṛtra, and the Origin of Yawning
कि कार्यमिति वै राजन् विचिन्त्य भयमोहिता: । जग्मु: सर्वे महात्मानं मनोभिर्विष्णुमव्ययम् । उपविष्टा मन्दराग्रये सर्वे वृत्रवधेप्सव:,भारत! त्वष्टाके तेजसे मोहित हुए सब देवता देवराज इन्द्र तथा ऋषियोंसे मिलकर सलाह करने लगे कि अब हमें क्या करना चाहिये? राजन्! भयसे मोहित हुए सब देवता बहुत देरतक सोच-विचार करके मन-ही-मन अविनाशी परमात्मा भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और वे वृत्रासुरके वधकी इच्छासे मन्दराचलके शिखरपर ध्यानस्थ होकर बैठ गये
kiṁ kāryam iti vai rājan vicintya bhaya-mohitāḥ | jagmuḥ sarve mahātmānaṁ manobhir viṣṇum avyayam | upaviṣṭā mandarāgrye sarve vṛtra-vadhepsavaḥ |
‘ହେ ରାଜନ, ଏବେ କ’ଣ କରିବା?’—ଭୟରେ ମୋହିତ ହୋଇ ସେମାନେ ବିଚାର କଲେ। ପରେ ସମସ୍ତେ ମନେ-ମନେ ମହାତ୍ମା, ଅବ୍ୟୟ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କ ଶରଣକୁ ଗଲେ। ବୃତ୍ରବଧର ଇଚ୍ଛାରେ ସେମାନେ ମନ୍ଦର ପର୍ବତର ଶିଖରେ ଏକାଗ୍ର ନିଶ୍ଚୟରେ ବସିଲେ।
शल्य उवाच