इन्द्रस्य दुःखप्राप्तिः—त्रिशिरोवधः, वृत्रोत्पत्तिः, जृम्भिकाजननम्
Indra’s Distress: Slaying of Triśiras, Birth of Vṛtra, and the Origin of Yawning
वेदानेकेन सो5धीते सुरामेकेन चापिबत् । एकेन च दिश: सर्वा: पिबन्निव निरीक्षते,वह अपने एक मुखसे वेदोंका स्वाध्याय करता, दूसरेसे सुरा पीता और तीसरेसे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर इस प्रकार देखता था, मानो उन्हें पी जायगा
vedānekēna so 'dhīte surām ekēna cāpibat | ekena ca diśaḥ sarvāḥ pibann iva nirīkṣate |
ଗୋଟିଏ ମୁଖରେ ସେ ବେଦ ଅଧ୍ୟୟନ କରୁଥିଲା, ଅନ୍ୟ ମୁଖରେ ସୁରା ପାନ କରୁଥିଲା; ତୃତୀୟ ମୁଖରେ ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ଏମିତି ଚାହୁଁଥିଲା—ମନେ ହେଉଥିଲା ଯେ ଦିଗମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପିଇଯିବ।
शल्य उवाच