इन्द्रस्य दुःखप्राप्तिः—त्रिशिरोवधः, वृत्रोत्पत्तिः, जृम्भिकाजननम्
Indra’s Distress: Slaying of Triśiras, Birth of Vṛtra, and the Origin of Yawning
सो<वर्धत दिवं स्तब्ध्वा सूर्यवैश्वानरोपम: । कि करोमीति चोवाच कालसूर्य इवोदित:,उनके इतना कहते ही सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी वृत्रासुर सारे आकाशको आक्रान्त करके बहुत बड़ा हो गया। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो प्रलयकालका सूर्य उदित हुआ हो। उसने पूछा--'पिताजी! मैं क्या करूँ?”
so ’vardhata divaṁ stabdhvā sūryavaiśvānaro’pamaḥ | kiṁ karomīti covāca kālasūrya ivoditaḥ ||
ସେ କଥା କୁହାଯାଇମାତ୍ରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଓ ବୈଶ୍ୱାନର ଅଗ୍ନି ସମ ତେଜସ୍ବୀ ବୃତ୍ରାସୁର ଆକାଶକୁ ଯେନ ଥମ୍ଭାଇ ସମଗ୍ର ଗଗନକୁ ଆକ୍ରାନ୍ତ କରି ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଶାଳ ହେଲା। ସେ ପ୍ରଳୟକାଳରେ ଉଦିତ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପରି ଦିଶୁଥିଲା। ତାପରେ ସେ ପଚାରିଲା— “ପିତା, ମୁଁ କ’ଣ କରିବି?”
शल्य उवाच