इन्द्रस्य दुःखप्राप्तिः—त्रिशिरोवधः, वृत्रोत्पत्तिः, जृम्भिकाजननम्
Indra’s Distress: Slaying of Triśiras, Birth of Vṛtra, and the Origin of Yawning
अपश्यदब्रवीच्चैनं सत्वरं पाकशासन: । क्षिप्रं छिन्धि शिरांस्यस्य कुरुष्व वचनं मम,महाराज! वह बढ़ई उसी वनमें आया, जहाँ त्रिशिराको मार गिराया गया था। डरे हुए शचीपति इन्द्रने वहाँ अपना काम करते हुए बढ़ईको देखा। देखते ही पाकशासन इन्द्रने तुरंत उससे कहा--“बढ़ई! तू शीघ्र इस शवके तीनों मस्तकोंके टुकड़े-टुकड़े कर दे। मेरी इस आज्ञाका पालन कर'
apaśyad abravīc cainaṃ satvaraṃ pākaśāsanaḥ | kṣipraṃ chindhi śirāṃsy asya kuruṣva vacanaṃ mama mahārāja |
ତାକୁ ସେଠାରେ ଦେଖି ପାକଶାସନ ଇନ୍ଦ୍ର ଅତ୍ୟନ୍ତ ତ୍ୱରାରେ ସଙ୍ଗେସଙ୍ଗେ କହିଲେ— “ଶୀଘ୍ର ଏହାର ମୁଣ୍ଡଗୁଡ଼ିକୁ କାଟି ଅଲଗା କର; ଏକ ମୁହୂର୍ତ୍ତ ମଧ୍ୟ ବିଳମ୍ବ କରନି। ମହାରାଜ! ମୋ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ କର।”
शल्य उवाच