इन्द्रस्य दुःखप्राप्तिः—त्रिशिरोवधः, वृत्रोत्पत्तिः, जृम्भिकाजननम्
Indra’s Distress: Slaying of Triśiras, Birth of Vṛtra, and the Origin of Yawning
तक्षोवाच महास्कन्धो भृशं होष परशुर्न भविष्यति । कर्तु चाहं न शक्ष्यामि कर्म सद्धिर्विगर्हितम्,बढ़ईने कहा--इसके कंधे तो बड़े भारी और विशाल हैं। मेरी यह कुल्हाड़ी इसपर काम नहीं देगी और इस प्रकार किसी प्राणीकी हत्या करना तो साधु पुरुषों द्वारा निन्दित पापकर्म है, अतः मैं इसे नहीं कर सकूँगा
takṣovāca mahāskandho bhṛśaṃ hoṣa paraśur na bhaviṣyati | kartuṃ cāhaṃ na śakṣyāmi karma sadbhir vigarhitam ||
ବଢ଼େଇ କହିଲା— “ଏହାର କାନ୍ଧ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବଡ଼ ଓ ଭାରୀ; ମୋ କୁହାଡ଼ି ଏଥିରେ କାମ କରିବ ନାହିଁ। ତଦୁପରି ଏପରି ଭାବେ ପ୍ରାଣୀହତ୍ୟା କରିବା ସଜ୍ଜନମାନେ ନିନ୍ଦା କରନ୍ତି—ଏହା ପାପକର୍ମ; ତେଣୁ ମୁଁ କରିପାରିବି ନାହିଁ।”
शल्य उवाच