इन्द्रस्य दुःखप्राप्तिः—त्रिशिरोवधः, वृत्रोत्पत्तिः, जृम्भिकाजननम्
Indra’s Distress: Slaying of Triśiras, Birth of Vṛtra, and the Origin of Yawning
यत् ते कार्य महाभाग क्रियतां तदनन्तरम् । वे सब अप्सराएँ (त्रेशिराको विचलित करनेका) पूरा प्रयत्न करके पुनः देवराज इन्द्रकी सेवामें उपस्थित हुईं और हाथ जोड़कर बोलीं--'प्रभो! वे त्रिशिरा बड़े दुर्धर्ष तपस्वी हैं, उन्हें धैर्यसे विचलित नहीं किया जा सकता। महाभाग! अब आपको जो कुछ करना हो, उसे कीजिये” || १७-१८ ह ।। सम्पूज्याप्सरस: शक्रो विसृज्य च महामति:
yat te kāryaṃ mahābhāga kriyatāṃ tadanantaram | sampūjyāpsarasaḥ śakro visṛjya ca mahāmatiḥ ||
ମହାଭାଗ! ତୁମ ମନରେ ଯେ କାର୍ଯ୍ୟ ଅଛି, ତାହା ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ କର। ଅପ୍ସରାମାନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ଦେଇ ବିଦାୟ କରି, ମହାମତି ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହେଲେ।
शल्य उवाच