
ब्राह्मणानुयात्रा—शौनकोपदेशः (Brāhmaṇas Follow into Exile and Śaunaka’s Instruction)
Upa-parva: Āraṇyaka-parva: Brāhmaṇa-Anuyāna and Śaunaka-Upadeśa (Forest Departure Discourse)
Vaiśaṃpāyana describes dawn preparations for forest departure, with brāhmaṇas preceding the party. Yudhiṣṭhira states their dispossession and the dangers of the wilderness, urging the brāhmaṇas to return to avoid hardship. The brāhmaṇas refuse, pledging loyalty and self-sufficiency; they offer spiritual support through japa, contemplation, and consoling narratives. Yudhiṣṭhira expresses shame at their potential suffering and condemns the agents of the kingdom’s seizure, yet clarifies that any desire for resources would be solely to maintain dependents. Śaunaka then delivers a systematic upadeśa: grief and fear overwhelm the unwise, not the discerning; mental suffering aggravates bodily suffering; attachment (sneha) is identified as the root of mental distress, generating desire, craving (tṛṣṇā), and the cycle of anxiety. Wealth is analyzed as a persistent source of fear and suffering through acquisition, protection, loss, and expenditure; contentment is framed as the highest ease. The discourse outlines an eightfold dharma path (ijyā, adhyayana, dāna, tapas, satya, kṣamā, dama, alobha), distinguishes orientations (pitṛyāna/devayāna), and recommends disciplined practice, culminating in counsel that Yudhiṣṭhira seek siddhi through tapas for sustaining the brāhmaṇas.
Chapter Arc: पुरवासियों के लौट जाने के बाद वन-प्रवेश की दहलीज़ पर खड़े पाण्डवों के सामने ब्राह्मणों का समूह आता है—और युधिष्ठिर पहली बार निर्वासन को केवल राजनैतिक हार नहीं, आत्म-शिक्षा का अवसर बनाकर बोलते हैं। → युधिष्ठिर अपने हृत-राज्य, हृत-श्री और हृत-सर्वस्व की स्थिति बताते हुए वन के भय—व्याल, सरीसृप, दोष-बहुलता—का स्मरण करते हैं; साथ ही मनुष्य के भीतर प्रतिदिन उगते शोक-भय के असंख्य ‘स्थान’ दिखाकर बताते हैं कि बाहरी वन से अधिक कठिन भीतर का वन है। → वैराग्य-उपदेश का शिखर: ‘मन के दुःख का मूल स्नेह (आसक्ति) है’—और संचय/धन-संग्रह को उपद्रव का कारण बताकर त्याग की घोषणा; फिर तप, शम और योग-सिद्धि की ओर निर्णायक मोड़—‘तपसा सिद्धिमन्विच्छ’—द्विजों के भरण-पोषण और आत्म-मनोरथ की सिद्धि हेतु। → युधिष्ठिर का निष्कर्ष स्थिर होता है: दुःख का उपचार बाह्य साधनों में नहीं, मन-निग्रह, आसक्ति-क्षय, और तप-योग में है; धर्मशील पुरुष के लिए ‘अनिहार्य’ (अनावश्यक) संचय त्याज्य है, और ब्राह्मण-सेवा/भरण का संकल्प तप के साथ जुड़ता है। → वन-जीवन की वास्तविक परीक्षा अभी शेष है—क्या यह वैराग्य-प्रतिज्ञा आने वाले संकटों, याचकों और वन के प्रलोभनों/भयों के बीच अक्षुण्ण रह पाएगी?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें पुरवासियोंके लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला पहला अध्याय पूरा हुआ,हि मय >> () है 2 द्वितीयो&्ध्याय: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत वैशम्पायन उवाच प्रभातायां तु शर्वर्या तेषामक्लिष्टकर्मणाम् | वन॑ यियासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजो5ग्रत: वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! जब रात बीती और प्रभातका उदय हुआ तथा अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले पाण्डव वनकी ओर जानेके लिये उद्यत हुए, उस समय भिक्षान्नभोजी ब्राह्मण साथ चलनेके लिये उनके सामने खड़े हो गये
Waiśampāyana berkata: Ketika malam telah berlalu dan fajar menyingsing, para Pāṇḍava—yang gagah tanpa perlu bersusah payah—bersiap berangkat menuju hutan. Saat itu para brāhmaṇa yang hidup dari sedekah berdiri di hadapan mereka, siap menyertai perjalanan.
Verse 2
तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । वयं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रिय:,तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने उनसे कहा--“ब्राह्मणो! हमारा राज्य, लक्ष्मी और सर्वस्व जूएमें हरण कर लिया गया है। हम फल, मूल तथा अन्नके आहार-पर रहनेका निश्चय करके दुःखी होकर वनमें जा रहे हैं। वनमें बहुत-से दोष हैं। वहाँ सर्प-बिच्छू आदि असंख्य भयंकर जन्तु हैं इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पाण्डवानां प्रव्रजने द्वितीयो5ध्याय: ।। २ || इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें पाण्डवोंका प्रव्रजन (वनगमन)- विषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ
Lalu Raja Yudhiṣṭhira, putra Kuntī, berkata kepada mereka: “Wahai para brāhmaṇa, seluruh milik kami telah dirampas; kerajaan kami direbut; kemuliaan dan keberuntungan raja pun lenyap. Dengan tekad hidup dari buah, umbi, dan biji-bijian sederhana, kami pergi ke hutan dengan hati berduka. Hutan penuh bahaya dan cela; di sana ada tak terhitung makhluk mengerikan—ular, kalajengking, dan lainnya.”
Verse 3
फलमूलाशनाहारा वनं गच्छाम दु:ःखिता: । वनं च दोषबहुलं बहुव्यालसरीसूपम्,तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने उनसे कहा--“ब्राह्मणो! हमारा राज्य, लक्ष्मी और सर्वस्व जूएमें हरण कर लिया गया है। हम फल, मूल तथा अन्नके आहार-पर रहनेका निश्चय करके दुःखी होकर वनमें जा रहे हैं। वनमें बहुत-से दोष हैं। वहाँ सर्प-बिच्छू आदि असंख्य भयंकर जन्तु हैं
“Dengan makanan berupa buah dan umbi, kami pergi ke hutan dalam dukacita. Namun hutan itu penuh kesukaran dan bahaya, dipenuhi banyak binatang buas dan makhluk melata.”
Verse 4
परिक्लेशश्व वो मन्ये ध्रुवं तत्र भविष्यति । ब्राह्मणानां परिक्लेशो दैवतान्यपि सादयेत् । कि पुनर्मामितो विप्रा निवर्तध्वं यथेष्टत:,“मैं समझता हूँ, वहाँ आपलोगोंको अवश्य ही महान् कष्टका सामना करना पड़ेगा। ब्राह्मणोंको दिया हुआ क्लेश तो देवताओंका भी विनाश कर सकता है, फिर मेरी तो बात ही क्या है? अतः ब्राह्मणो! आपलोग यहाँसे अपने अभीष्ट स्थानको लौट जाया
“Aku yakin, bila kalian pergi ke sana, kalian pasti akan menghadapi kesusahan besar. Penderitaan yang ditimpakan kepada para brāhmaṇa dapat menjatuhkan bahkan para dewa—apalagi orang seperti aku. Karena itu, wahai para vipra, kembalilah dari sini; pergilah ke mana pun yang kalian kehendaki.”
Verse 5
ब्राह्मणा ऊचु गतिर्या भवतां राजंस्तां वयं गन्तुमुद्यता: | ना्हस्यस्मान् परित्यक्तुं भक्तान् सद्धर्मदर्शिन:,ब्राह्मणोंने कहा--राजन्! आपकी जो गति होगी उसे भुगतनेके लिये हम भी उद्यत हैं। हम आपके भक्त तथा उत्तम धर्मपर दृष्टि रखनेवाले हैं। इसलिये आपको हमारा परित्याग नहीं करना चाहिये
Para brāhmaṇa berkata: “Wahai Raja, ke mana pun jalan hidup dan nasib menuntunmu, kami pun siap menempuhnya bersamamu. Jangan tinggalkan kami—para pengikutmu yang berbakti dan memandang pada dharma yang sejati.”
Verse 6
अनुकम्पां हि भक्तेषु देवता हापि कुर्वते । विशेषतो ब्राह्म॒णेषु सदाचारावलम्बिषु,देवता भी अपने भक्तोंपर विशेषत: सदाचारपरायण ब्राह्मणोंपर तो अवश्य ही दया करते हैं
Para dewa menaruh belas kasih kepada para pemuja mereka; terlebih lagi, mereka sungguh melimpahkan rahmat kepada para brāhmaṇa yang teguh dalam tata laku mulia dan disiplin dharma.
Verse 7
युधिछिर उवाच ममापि परमा भक्तित्रह्मणेषु सदा द्विजा: । सहायविपरिभ्रंशस्त्वयं सादयतीव माम्,युधिष्ठटिर बोले--विप्रगण! मेरे मनमें भी ब्राह्मणोंके प्रति उत्तम भक्ति है, किंतु यह सब प्रकारके सहायक साधनोंका अभाव ही मुझे दुःखमग्न-सा किये देता है। जो फल-मूल एवं शहद आदि आहार जुटाकर ला सकते थे वे ही ये मेरे भाई शोकजनित दुःखसे मोहित हो रहे हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai kaum dwija, aku pun senantiasa menaruh bhakti tertinggi kepada para brāhmaṇa. Namun runtuhnya segala penopang—hilangnya bantuan dan sumber daya—seakan mengikis tenagaku dan menenggelamkanku dalam duka.”
Verse 8
आहरेयुरिमे येडषपि फलमूलमधूनि च । त इमे शोकजेैर्दु:खैर्भ्रातरो मे विमोहिता:,युधिष्ठटिर बोले--विप्रगण! मेरे मनमें भी ब्राह्मणोंके प्रति उत्तम भक्ति है, किंतु यह सब प्रकारके सहायक साधनोंका अभाव ही मुझे दुःखमग्न-सा किये देता है। जो फल-मूल एवं शहद आदि आहार जुटाकर ला सकते थे वे ही ये मेरे भाई शोकजनित दुःखसे मोहित हो रहे हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Bahkan mereka yang sanggup pergi dan membawa pulang makanan—buah, umbi, dan madu—justru saudara-saudaraku itulah yang kini terbingungkan, dikuasai duka yang lahir dari kesedihan.”
Verse 9
द्रौपद्या विप्रकर्षण राज्यापहरणेन च । दुःखार्दितानिमान् क्लेशैरनईहहं योक्तुमिहोत्सहे,द्रौपदीके अपमान तथा राज्यके अपहरणके कारण ये दुःखसे पीडित हो रहे हैं, अतः मैं इन्हें (आहार जुटानेका आदेश देकर) अधिक क्लेशमें नहीं डालना चाहता
Yudhiṣṭhira berkata: “Karena penghinaan terhadap Draupadī dan perampasan kerajaan, mereka ini telah lebih dahulu dilanda duka. Maka aku tidak ingin mengikat mereka di sini pada kesukaran yang lebih berat dengan beban tambahan.”
Verse 10
ब्राह्मणा ऊचु अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत् ते हृदि पार्थिव । स्वयमाह्त्य चान्नानि त्वानुयास्यथामहे वयम्,ब्राह्मण बोले--पृथ्वीनाथ! आपके हृदयमें हमारे पालन-पोषणकी चिन्ता नहीं होनी चाहिये। हम स्वयं ही अपने लिये अन्न आदिकी व्यवस्था करके आपके साथ चलेंगे
Para brāhmaṇa berkata: “Wahai raja, janganlah timbul kecemasan di hatimu tentang pemeliharaan kami. Kami sendiri akan mengusahakan makanan dan keperluan, lalu mengikuti engkau.”
Verse 11
अनुध्यानेन जप्येन विधास्याम: शिवं तव । कथाभिश्चाभिरम्याभि: सह रंस्थामहे वयम्,हम आपके अभीष्टचिन्तन और जपके द्वारा आपका कल्याण करेंगे तथा आपको सुन्दर-सुन्दर कथाएँ सुनाकर आपके साथ ही प्रसन्नतापूर्वक वनमें विचरेंगे
Yudhiṣṭhira berkata: “Dengan senantiasa merenungkan kesejahteraanmu dan melantunkan japa suci, kami akan mengupayakan kemuliaan dan keselamatanmu. Dan dengan kisah-kisah yang indah, kami akan tinggal bersamamu, mengembara di rimba dengan hati yang riang.”
Verse 12
युधिछिर उवाच एवमेतन्न संदेहो रमे5हं सतत द्विजै: । न्यूनभावात् तु पश्यामि प्रत्यादेशमिवात्मन:,युधिष्ठिरने कहा--महात्माओ! आपका कहना ठीक है। इसमें संदेह नहीं कि मैं सदा ब्राह्मणोंके साथ रहनेमें ही प्रसन्नताका अनुभव करता हूँ, किंतु इस समय धन आदिसे हीन होनेके कारण मैं देख रहा हूँ कि मेरे लिये यह अपकीर्तिकी-सी बात है
Yudhiṣṭhira berkata: “Memang demikian; tiada keraguan. Aku selalu bersukacita dalam pergaulan para dvija (brāhmaṇa). Namun kini, karena jatuh dalam kekurangan, aku merasakannya seakan-akan celaan dilemparkan kepada diriku sendiri—laksana tanda aib.”
Verse 13
कथं द्रक्ष्यामि व: सर्वान् स््वयमाहृतभोजनान् । मद्धक्त्या क्लिश्यतो<नर्हान् धिक् पापान् धृतराष्ट्रजान्,आप सब लोग स्वयं ही आहार जुटाकर भोजन करें, यह मैं कैसे देख सकूँगा? आपलोग कष्ट भोगनेके योग्य नहीं हैं, तो भी मेरे प्रति स्नेह होनेके कारण इतना क्लेश उठा रहे हैं। धृतराष्ट्रके पापी पुत्रोंको धिकक््कार है
Yudhiṣṭhira berkata: “Bagaimana mungkin aku sanggup melihat kalian semua harus mencari makanan sendiri dan hidup dari apa yang kalian peroleh? Kalian tidak patut menanggung derita; namun karena kasih dan kesetiaan kepada diriku, kalian menahan sengsara demikian. Celakalah putra-putra Dhṛtarāṣṭra yang berdosa!”
Verse 14
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा स नृप: शोचन् निषसाद महीतले । तमध्यात्मरतो विद्वान् शौनको नाम वै द्विज:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! इतना कहकर धर्मराज युधिष्ठिर शोकमग्न हो चुपचाप पृथ्वीपर बैठ गये। उस समय अध्यात्मविषयमें रत अर्थात् परमात्म-चिन्तनमें तत्पर विद्वान ब्राह्मण शौनकने, जो कर्मयोग और सांख्ययोग--दोनों ही निष्ठाओंके विचारमें प्रवीण थे, राजासे इस प्रकार कहा--
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja! Setelah berkata demikian, sang raja Yudhiṣṭhira—diliputi duka—terdiam dan duduk di atas tanah. Lalu brāhmaṇa bijak bernama Śaunaka, yang tekun dalam perenungan adhyātma dan mahir menimbang baik jalan karma-yoga maupun sāṅkhya-yoga, berbicara kepada raja demikian.”
Verse 15
योगे सांख्ये च कुशलो राजानमिदमत्रवीत्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! इतना कहकर धर्मराज युधिष्ठिर शोकमग्न हो चुपचाप पृथ्वीपर बैठ गये। उस समय अध्यात्मविषयमें रत अर्थात् परमात्म-चिन्तनमें तत्पर विद्वान ब्राह्मण शौनकने, जो कर्मयोग और सांख्ययोग--दोनों ही निष्ठाओंके विचारमें प्रवीण थे, राजासे इस प्रकार कहा--
Brāhmaṇa dvija bernama Śaunaka, yang mahir dalam yoga dan sāṅkhya, berkata kepada sang raja: “Wahai Raja, dengarkanlah; apa adanya akan kukatakan.”
Verse 16
शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्,'शोकके सहस्रों और भयके सैकड़ों स्थान हैं। वे मूढ़ मनुष्यपर प्रतिदिन अपना प्रभाव डालते हैं; परंतु ज्ञानी पुरुषपर वे प्रभाव नहीं डाल सकते
Ada ribuan sebab untuk duka dan ratusan sebab untuk takut. Hari demi hari semuanya mencengkeram orang yang dungu; namun tidak dapat menaklukkan orang bijaksana.
Verse 17
न हि ज्ञानविरुद्धेषु बहुदोषेषु कर्मसु । श्रेयोधातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधा:,“अनेक दोषोंसे युक्त, ज्ञानविरुद्ध एवं कल्याणनाशक कर्मोमें आप-जैसे ज्ञानवान् पुरुष नहीं फँसते हैं
Orang bijak sepertimu tidak akan terjerat dalam perbuatan yang bertentangan dengan pengetahuan sejati, sarat banyak cela, dan menghancurkan yang sungguh bermanfaat.
Verse 18
अष्टाज्जां बुद्धिमाहुर्या सर्वाश्रेयोडभिघातिनीम् । श्रुतिस्मृतिसमायुक्तां राजन् सा त्वय्यवस्थिता,“राजन! योगके आठ अंग--यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधिसे सम्पन्न, समस्त अमंगलोंका नाश करनेवाली तथा श्रुतियों और स्मृतियोंके स्वाध्यायसे भलीभाँति दृढ़ की हुई जो उत्तम बुद्धि कही गयी है, वह आपमें स्थित है
Wahai Raja, kebijaksanaan luhur itu dikatakan beranggota delapan—berhias disiplin yoga—yang menumbangkan segala penghalang kesejahteraan sejati. Diteguhkan oleh telaah Śruti dan Smṛti, kebijaksanaan itu bersemayam dalam dirimu.
Verse 19
अर्थकृच्छेषु दुर्गेषु व्यापत्सु स्वजनस्य च । शारीरमानसैर्द:खैर्न सीदन्ति भवद्विधा:,“अर्थसंकट, दुस्तर दुःख तथा स्वजनोंपर आयी हुई विपत्तियोंमें आप-जैसे ज्ञानी शारीरिक और मानसिक दु:खोंसे पीडित नहीं होते
Dalam kesempitan harta, dalam bencana yang sukar dilampaui, dan dalam malapetaka yang menimpa kaum sendiri, orang bijak sepertimu tidak tenggelam oleh derita jasmani maupun batin.
Verse 20
श्रूयतां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा । आत्मव्यवस्थानकरा गीता: श्लोका महात्मना,'पूर्वकालमें महात्मा राजा जनकने अन्तःकरणको स्थिर करनेवाले कुछ श्लोकोंका गान किया था। मैं उन श्लोकोंका वर्णन करता हूँ, आप सुनिये---
Dengarkanlah; akan kuceritakan bagaimana dahulu kala Mahātma Raja Janaka melantunkan syair-syair yang meneguhkan dan menempatkan diri pada ketetapan batin. Syair-syair itulah yang akan kuuraikan.
Verse 21
मनोदेहसमुत्थाभ्यां दुःखाभ्यामर्दितं जगत् । तयोव्याससमासा भ्यां शमोपायमिमं शृणु,“सारा जगत् मानसिक और शारीरिक दु:खोंसे पीडित है। उन दोनों प्रकारके दुःखोंकी शान्तिका यह उपाय संक्षेप और विस्तारसे सुनिये
Waiśampāyana berkata: “Seluruh dunia ditimpa dua macam penderitaan—yang timbul dari batin (pikiran) dan yang timbul dari raga (tubuh). Kini dengarkan upaya untuk menenteramkan keduanya, dijelaskan secara ringkas dan juga lebih terperinci.”
Verse 22
व्याधेरनिष्टसंस्पर्शाच्छूमादिष्टविवर्जनात् । दुःखं चतुर्भि: शारीरं कारणै: सम्प्रवर्तते,“रोग, अप्रिय घटनाओंकी प्राप्ति, अधिक परिश्रम तथा प्रिय वस्तुओंका वियोग--इन चार कारणोंसे शारीरिक दु:ख प्राप्त होता है
Waiśampāyana berkata: Penderitaan jasmani timbul dari empat sebab—penyakit, bersentuhan dengan yang tidak disukai, keletihan karena kerja berlebihan, dan perpisahan dari yang dicintai.
Verse 23
तदा तत्प्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात् । आधिव्याधिप्रशमनं क्रियायोगद्धयेन तु,'समयपर इन चारों कारणोंका प्रतीकार करना एवं कभी भी उसका चिन्तन न करना --ये दो क्रियायोग (दुःखनिवारक उपाय) हैं। इन्हींसे आधि-व्याधिकी शान्ति होती है
Waiśampāyana berkata: Dengan menanggulangi sebab-sebab itu pada waktunya dan dengan tidak terus-menerus memikirkannya, maka duka batin dan penyakit jasmani diredakan—itulah dua disiplin tindakan (kriyā-yoga).
Verse 24
मतिमन्तो हातो वैद्या: शमं प्रागेव कुर्वते । मानसस्य प्रियाख्यानै: सम्भोगोपनयैर्नणाम्,“अतः बुद्धिमान् तथा विद्दान् पुरुष प्रिय वचन बोलकर तथा हितकर भोगोंकी प्राप्ति कराकर पहले मनुष्योंके मानसिक दुःखोंका ही निवारण किया करते हैं
Waiśampāyana berkata: Karena itu para tabib yang bijaksana dan terampil terlebih dahulu menegakkan ketenangan. Dengan tutur kata yang menyenangkan, kisah-kisah yang menghibur, serta menyediakan kenikmatan yang menyehatkan, mereka mula-mula meredakan duka batin manusia.
Verse 25
मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते । अय:पिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम्,“क्योंकि मनमें दुःख होनेपर शरीर भी संतप्त होने लगता है; ठीक वैसे ही, जैसे तपाया हुआ लोहेका गोला डाल देनेपर घड़ेमें रखा हुआ शीतल जल भी गरम हो जाता है
Waiśampāyana berkata: “Bila duka timbul dalam batin, tubuh pun ikut terbakar olehnya—laksana air di dalam kendi menjadi panas ketika segumpal besi yang membara dijatuhkan ke dalamnya.”
Verse 26
मानसं शमयेत् तस्माज्ज्ञानेनाग्निमिवाम्बुना | प्रशान्ते मानसे हास्य शारीरमुपशाम्यति,“इसलिये जलसे अग्निको शान्त करनेकी भाँति ज्ञानके द्वारा मानसिक दुःखको शान्त करना चाहिये। मनका दुःख मिट जानेपर मनुष्यके शरीरका दुःख भी दूर हो जाता है
Karena itu, hendaknya seseorang menenteramkan batin dengan pengetahuan sejati, sebagaimana api dipadamkan oleh air. Bila batin telah hening dan deritanya reda, penderitaan yang terasa pada tubuh pun turut surut.
Verse 27
मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते । स्नेहात् तु सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च,“मनके दुःखका मूल कारण क्या है? इसका पता लगानेपर 'स्नेह' (संसारमें आसक्ति)- की ही उपलब्धि होती है। इसी स्नेहके कारण ही जीव कहीं आसक्त होता और दुःख पाता है
Vaiśampāyana berkata: “Akar duka batin dipahami sebagai sneha—kelekatan. Karena kelekatan itu makhluk hidup melekat, lalu bersekutu dengan penderitaan.”
Verse 28
स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च । शोकहर्षो तथा55यास: सर्व स्नेहात् प्रवर्तते,“दुःखका मूल कारण है आसक्ति। आसक्तिसे ही भय होता है। शोक, हर्ष तथा क्लेश --इन सबकी प्राप्ति भी आसक्तिके कारण ही होती है। आसक्तिसे ही विषयोंमें भाव और अनुराग होते हैं। ये दोनों ही अमंगलकारी हैं। इनमें भी पहला अर्थात् विषयोंके प्रति भाव महान् अनर्थकारक माना गया है
Vaiśampāyana berkata: “Duka berakar pada kelekatan, dan takut pun lahir dari kelekatan. Duka-cita dan sukacita, demikian pula letih dan derita—semuanya bergerak dari kelekatan.”
Verse 29
स्नेहाद भावो<नुरागश्न प्रजज्ञे विषये तथा । अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरु: स्मृत:,“दुःखका मूल कारण है आसक्ति। आसक्तिसे ही भय होता है। शोक, हर्ष तथा क्लेश --इन सबकी प्राप्ति भी आसक्तिके कारण ही होती है। आसक्तिसे ही विषयोंमें भाव और अनुराग होते हैं। ये दोनों ही अमंगलकारी हैं। इनमें भी पहला अर्थात् विषयोंके प्रति भाव महान् अनर्थकारक माना गया है
Vaiśampāyana berkata: “Dari kelekatan lahir bhāva—kecenderungan yang menetap—dan juga anurāga—ketertarikan yang menggebu—terhadap objek-objek indria. Keduanya menjauhkan dari kesejahteraan sejati; dan di antara keduanya, bhāva yang menetap pada objek diingat sebagai sebab mudarat yang lebih berat.”
Verse 30
कोटराग्निर्यथाशेषं समूलं पादपं दहेत् धर्मार्थो तु तथाल्पो5पि रागदोषो विनाशयेत्,“जैसे खोखलेमें लगी हुई आग सम्पूर्ण वृक्षको जड़-मूलसहित जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार विषयोंके प्रति थोड़ी-सी भी आसक्ति धर्म और अर्थ दोनोंका नाश कर देती है
Vaiśampāyana berkata: “Seperti api yang menyala di rongga pohon membakar habis seluruh pohon hingga ke akar, demikian pula bahkan sedikit kelekatan—lahir dari rāga dan doṣa—dapat memusnahkan dharma dan artha sekaligus.”
Verse 31
विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे । विरागं भजते जनन््तुर्निर्विरो निरवग्रह:,“विषयोंके प्राप्त न होनेपर जो उनका त्याग करता है, वह त्यागी नहीं है; अपितु जो विषयोंके प्राप्त होनेपर भी उनमें दोष देखकर उनका परित्याग करता है, वस्तुतः वही त्यागी है--वही वैराग्यको प्राप्त होता है। उसके मनमें किसीके प्रति द्वेषभाव न होनेके कारण वह निर्वेर तथा बन्धनमुक्त होता है
Vaiśampāyana berkata: “Seseorang bukanlah pertapa sejati hanya karena, ketika objek-objek indria tidak didapat, ia ‘melepaskannya’. Pertapa sejati ialah dia yang, meski objek-objek itu tersedia, melihat cacatnya dan melepaskan keterikatan padanya. Ia meraih vairāgya (ketidakmelekatan); tanpa permusuhan kepada siapa pun, ia menjadi tanpa dendam dan bebas dari belenggu kemelekatan.”
Verse 32
तस्मात् स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसंचयात् । स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत्,“इसलिये मित्रों तथा धनराशिको पाकर इनके प्रति स्नेह (आसक्ति) न करे। अपने शरीरसे उत्पन्न हुई आसक्तिको ज्ञानसे निवृत्त करे
Karena itu, jangan mencari keterikatan karena sahabat atau karena timbunan harta. Dan keterikatan yang timbul dari pengenalan-diri pada tubuh sendiri hendaknya dipalingkan kembali dan disingkirkan dengan pengetahuan yang membedakan (viveka).
Verse 33
ज्ञानान्वितेषु युक्तेषु शास्त्रज्ञेषु कृतात्मसु । न तेषु सज्जते स्नेह: पद्मपत्रेष्विवोदकम्,'जो ज्ञानी, योगयुक्त, शास्त्रज्ञ तथा मनको वशमें रखनेवाले हैं, उनपर आसक्तिका प्रभाव उसी प्रकार नहीं पड़ता, जैसे कमलके पत्तेपर जल नहीं ठहरता
Pada mereka yang berpengetahuan sejati—teguh dalam yoga, memahami śāstra, dan menguasai diri—keterikatan tidak melekat; bagaikan air yang tak dapat tinggal di atas daun teratai.
Verse 34
रागाभिभूत: पुरुष: कामेन परिकृष्यते । इच्छा संजायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते,“रागके वशीभूत हुए पुरुषको काम अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। फिर उसके मनमें कामभोगकी इच्छा जाग उठती है। तत्पश्चात् तृष्णा बढ़ने लगती है। तृष्णा सबसे बढ़कर पापिष्ठ (पापमें प्रवृत्त करनेवाली) तथा नित्य उद्वेग करनेवाली बतायी गयी है। उसके द्वारा प्राय: अधर्म ही होता है। वह अत्यन्त भयंकर पापाबन्धनमें डालनेवाली है
Ketika seseorang dikuasai oleh rāga (keterlekatan), kāma (hasrat) menyeretnya. Lalu timbul keinginan untuk menikmati objek-objek indria; sesudah itu tṛṣṇā (dahaga/ketamakan) makin membesar.
Verse 35
तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता । अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी,“रागके वशीभूत हुए पुरुषको काम अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। फिर उसके मनमें कामभोगकी इच्छा जाग उठती है। तत्पश्चात् तृष्णा बढ़ने लगती है। तृष्णा सबसे बढ़कर पापिष्ठ (पापमें प्रवृत्त करनेवाली) तथा नित्य उद्वेग करनेवाली बतायी गयी है। उसके द्वारा प्राय: अधर्म ही होता है। वह अत्यन्त भयंकर पापाबन्धनमें डालनेवाली है
Tṛṣṇā (dahaga/ketamakan) dikenang sebagai yang paling berdosa di antara segala dosa, sebab ia terus-menerus menimbulkan kegelisahan. Ia memperbanyak adharma; dan, mengerikan dalam dayanya, ia mengikat manusia pada belenggu akibat dosa.
Verse 36
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्य॑ति जीर्यत: । योडसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजत: सुखम्,“खोटी बुद्धिवाले मनुष्योंके लिये जिसे त्यागना अत्यन्त कठिन है, जो शरीरके जरासे जीर्ण हो जानेपर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती तथा जिसे प्राणनाशक रोग बताया गया है, उस तृष्णाको जो त्याग देता है, उसीको सुख मिलता है
Waiśampāyana berkata— Dahaga hasrat itu amat sukar ditanggalkan oleh mereka yang tersesat budinya; meski tubuh menua, ia sendiri tak menua; dan ia disebut penyakit yang merenggut nyawa. Kebahagiaan adalah milik orang yang menanggalkan dahaga itu.
Verse 37
अनाइम्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम् विनाशयति भूतानि अयोनिज इवानल:,“यह तृष्णा यद्यपि मनुष्योंके शरीरके भीतर ही रहती है, तो भी इसका कहीं आदि- अन्त नहीं है। लोहेके पिण्डकी आगके समान यह तृष्णा प्राणियोंका विनाश कर देती है
Waiśampāyana berkata— Hasrat itu, meski bersemayam di dalam tubuh manusia, tiada berawal. Laksana api yang menyala tanpa sumber, ia melalap makhluk hidup dan menjerumuskan mereka ke dalam kebinasaan.
Verse 38
यथैध: स्वसमुत्थेन वह्लिना नाशमृच्छति । तथाकृतात्मा लोभेन सहजेन विनश्यति,'जैसे काष्ठ अपनेसे ही उत्पन्न हुई आगसे जलकर भस्म हो जाता है, उसी प्रकार जिसका मन वशमें नहीं है, वह मनुष्य अपने शरीरके साथ उत्पन्न हुए लोभके द्वारा स्वयं नष्ट हो जाता है
Seperti kayu yang binasa oleh api yang timbul dari kayu itu sendiri, demikian pula orang yang tak menaklukkan diri hancur oleh loba yang lahir bersama tubuh—membawa kehancurannya sendiri.
Verse 39
राजत: सलिलादमन्नेश्षलोरत: स्वजनादपि । भयमर्थवतां नित्यं मृत्यो: प्राणभूतामिव,“धनवान् मनुष्योंको राजा, जल, अग्नि, चोर तथा स्वजनोंसे भी सदा उसी प्रकार भय बना रहता है, जैसे सब प्राणियोंको मृत्युसे
Waiśampāyana berkata— Bagi orang berharta, ketakutan selalu ada: dari raja, dari air, dari api, dari pencuri, bahkan dari kaum sendiri—sebagaimana semua makhluk hidup senantiasa berada di bawah bayang-bayang takut akan maut.
Verse 40
यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिश्रि: श्वापदैर्भुवि । भक्ष्यते सलिले मत्स्यैस्तथा सर्वत्र वित्तवान्,'जैसे मांसके टुकड़ेको आकाशमें पक्षी, पृथ्वीपर हिंस्र जन्तु तथा जलमें मछलियाँ खा जाती हैं, उसी प्रकार धनवान् पुरुषको सब लोग सर्वत्र नोचते रहते हैं
Waiśampāyana berkata— Seperti sepotong daging direnggut dan dimakan—oleh burung di langit, oleh binatang buas di bumi, dan oleh ikan di air—demikian pula orang berharta, di mana pun, senantiasa menjadi sasaran rebutan orang lain.
Verse 41
अर्थ एव हि केषांचिदनर्थ भजते नृणाम् | अर्थश्रेयसि चासक्तो न श्रेयो विन्दते नर:,“कितने ही मनुष्योंके लिये अर्थ ही अनर्थका कारण बन जाता है; क्योंकि अर्थद्वारा सिद्ध होनेवाले श्रेय (सांसारिक भोग)-में आसक्त मनुष्य वास्तविक कल्याणको नहीं प्राप्त होता
Bagi banyak manusia, harta justru menjadi sebab petaka; sebab orang yang terpaut pada “kebaikan” berupa kenikmatan duniawi yang dicapai melalui harta, tidak memperoleh kesejahteraan sejati.
Verse 42
तस्मादर्थागमा: सर्वे मनोमोहविवर्धना: । कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च,“इसलिये धन-प्राप्तिके सभी उपाय मनमें मोह बढ़ानेवाले हैं। कृपणता, घमण्ड, अभिमान, भय और उद्वेग इन्हें विद्वानोंने देहधारियोंके लिये धनजनित दुःख माना है। धनके उपार्जन, संरक्षण तथा व्ययमें मनुष्य महान् दुःख सहन करते हैं और धनके ही कारण एक- दूसरेको मार डालते हैं। धनको त्यागनेमें भी महान् दुःख होता है और यदि उसकी रक्षा की जाय तो वह शत्रुका-सा काम करता है:
Karena itu, segala cara memperoleh harta hanya menambah delusi dalam batin. Kekikiran, kesombongan dan keangkuhan, rasa takut, serta kegelisahan—itulah duka yang lahir dari harta bagi makhluk berbadan, demikian diakui para bijak.
Verse 43
अर्थजानि विदु: प्राज्ञा: दुःखान्येतानि देहिनाम् । अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये,“इसलिये धन-प्राप्तिके सभी उपाय मनमें मोह बढ़ानेवाले हैं। कृपणता, घमण्ड, अभिमान, भय और उद्वेग इन्हें विद्वानोंने देहधारियोंके लिये धनजनित दुःख माना है। धनके उपार्जन, संरक्षण तथा व्ययमें मनुष्य महान् दुःख सहन करते हैं और धनके ही कारण एक- दूसरेको मार डालते हैं। धनको त्यागनेमें भी महान् दुःख होता है और यदि उसकी रक्षा की जाय तो वह शत्रुका-सा काम करता है:
Vaiśampāyana berkata: Orang bijak mengetahui semuanya ini sebagai penderitaan yang lahir dari harta bagi makhluk berbadan—dalam memperolehnya, dalam menjaganya, dan kembali dalam kehilangannya.
Verse 44
सहन्ति च महद् दु:खं घ्नन्ति चैवार्थकारणात् । अर्था दु:खं परित्यक्तुं पालिताश्वैव शत्रव:,“इसलिये धन-प्राप्तिके सभी उपाय मनमें मोह बढ़ानेवाले हैं। कृपणता, घमण्ड, अभिमान, भय और उद्वेग इन्हें विद्वानोंने देहधारियोंके लिये धनजनित दुःख माना है। धनके उपार्जन, संरक्षण तथा व्ययमें मनुष्य महान् दुःख सहन करते हैं और धनके ही कारण एक- दूसरेको मार डालते हैं। धनको त्यागनेमें भी महान् दुःख होता है और यदि उसकी रक्षा की जाय तो वह शत्रुका-सा काम करता है:
Mereka menanggung penderitaan besar, dan demi harta mereka bahkan saling membunuh. Meninggalkan harta pun menyakitkan; dan bila dijaga serta dipelihara, ia bertingkah laku laksana musuh.
Verse 45
दुःखेन चाधिगम्यन्ते तस्मान्नाशं न चिन्तयेत् । असंतोषपरा मूढा: संतोष॑ यान्ति पण्डिता:,“धनकी प्राप्ति भी दुःखसे ही होती है। इसलिये उसका चिन्तन न करे; क्योंकि धनकी चिन्ता करना अपना नाश करना है। मूर्ख मनुष्य सदा असंतुष्ट रहते हैं और विद्वान् पुरुष संतुष्ट
Harta diperoleh dengan susah payah; karena itu jangan menenggelamkan diri dalam memikirkannya, sebab kecemasan akan harta adalah jalan menuju kebinasaan. Orang bodoh selalu tidak puas; orang bijak mencapai kepuasan (santoṣa).
Verse 46
अन्तो नास्ति पिपासाया: संतोष: परमं सुखम् | तस्मात् संतोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिता:,“धनकी प्यास कभी बुझती नहीं है; अतः संतोष ही परम सुख है। इसीलिये ज्ञानीजन संतोषको ही सबसे उत्तम समझते हैं
Tiada akhir bagi dahaga keinginan; hanya kepuasan batin (santoṣa) adalah kebahagiaan tertinggi. Karena itu, di dunia ini orang bijak memandang kepuasan batin sebagai kebaikan yang paling utama.
Verse 47
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचय: । ऐश्वर्य प्रियसंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डित:,'यौवन, रूप, जीवन, रत्नोंका संग्रह, ऐश्वर्य तथा प्रियजनोंका एकत्र निवास--ये सभी अनित्य हैं; अतः विद्वान् पुरुष उनकी अभिलाषा न करे
Masa muda, keelokan, hidup itu sendiri, timbunan permata, kekuasaan duniawi, bahkan kenyamanan tinggal bersama orang-orang tercinta—semuanya tidak kekal. Karena itu orang bijak tidak melekat padanya dengan kerakusan.
Verse 48
त्यजेत संचयांस्तस्मात्तज्जान् क्लेशान् सहेत च | न हि संचयवान् कश्रिद् दृश्यते निरुपद्रव: । अतश्न धार्मिकै: पुंभिरनीहार्थ: प्रशस्पते,“इसलिये धन-संग्रहका त्याग करे और उसके त्यागसे जो क्लेश हो, उसे धैर्यपूर्वक सह ले। जिनके पास धनका संग्रह है, ऐसा कोई भी मनुष्य उपद्रवरहित नहीं देखा जाता। अतः धर्मात्मा पुरुष उसी धनकी प्रशंसा करते हैं जो दैवेच्छासे न्यायपूर्वक स्वतः प्राप्त हो गया हो
Karena itu hendaknya orang meninggalkan kebiasaan menimbun harta, dan dengan tabah menanggung kesukaran yang timbul dari pelepasan itu. Sebab tak seorang pun yang memiliki timbunan simpanan terlihat bebas dari gangguan. Maka orang-orang saleh memuji penghidupan yang tanpa mencengkeram—harta yang datang dengan sendirinya pada waktunya, sesuai keadilan dan kehendak takdir.
Verse 49
धर्मार्थ यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता । प्रक्षालनाद्धि पंकस्य श्रेयो न स्पर्शन॑ नृणाम्,'जो धर्म करनेके लिये धनोपार्जनकी इच्छा करता है उसका धनकी इच्छा न करना ही अच्छा है। कीचड़ लगाकर धोनेकी अपेक्षा मनुष्योंके लिये उसका स्पर्श न करना ही श्रेष्ठ है
Bagi orang yang mencari harta demi dharma sekalipun, lebih baik ia tanpa hasrat akan harta. Sebab bagi manusia, lebih utama tidak menyentuh lumpur sama sekali daripada mengotorinya lalu mencucinya.
Verse 50
युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमरहसि । धर्मेण यदि ते कार्य विमुक्तेच्छो भवार्थत:,'युधिष्ठिर! इस प्रकार आपके लिये किसी भी वस्तुकी अभिलाषा करनी उचित नहीं है। यदि आपको थधर्मसे ही प्रयोजन हो तो धनकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर दें"
Wahai Yudhiṣṭhira, dengan demikian tidak patut bagimu memelihara kerinduan pada apa pun. Jika tujuanmu sungguh hendak dipenuhi melalui dharma, maka jadilah pada hakikatnya orang yang telah melepaskan hasrat—bebas dari dahaga akan harta dan keuntungan.
Verse 51
युधिछिर उवाच नार्थोपभोगलिप्सार्थमियमर्थेप्सुता मम । भरणार्थ तु विप्राणां ब्रह्मन् काडक्षे न लोभत:,युधिष्ठिरने कहा--ब्रह्मन! मैं जो धन चाहता हूँ वह इसलिये नहीं कि मुझे धनसम्बधी भोग भोगनेकी इच्छा है। मैं तो ब्राह्मणोंक भरण-पोषणके लिये ही धनकी इच्छा रखता हूँ, लोभवश नहीं
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Brahmana, hasratku akan kekayaan bukanlah karena dahaga menikmati harta benda. Aku mencari sarana hanya untuk memelihara dan menanggung para Brahmana—bukan karena ketamakan.”
Verse 52
कथं हा[स्मद्विधो ब्रह्मन् वर्तमानो गृहाश्रमे । भरणं पालन चापि न कुर्यादनुयायिनाम्,विप्रवर! गृहस्थ-आश्रममें रहनेवाला मेरे-जैसा पुरुष अपने अनुयायियोंका भरण- पोषण भी न करे, यह कैसे उचित हो सकता है?
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Brahmana utama, bagaimana mungkin seorang seperti aku—yang hidup dalam tahap grihastha—tidak menafkahi dan melindungi para pengikut serta mereka yang bergantung padaku?”
Verse 53
संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते । तथैवापचमाने भ्य: प्रदेयं गृहमेधिना,गृहस्थके भोजनमें देवता, पितर, मनुष्य एवं समस्त प्राणियोंका हिस्सा देखा जाता है। गृहस्थका यह धर्म है कि वह अपने हाथसे भोजन न बनानेवाले संन्यासी आदिको अवश्य पका-पकाया अन्न दे
Yudhiṣṭhira berkata: “Nyata terlihat bahwa dalam apa pun yang dimasak dan dimiliki, semua makhluk mempunyai bagiannya—para dewa, para leluhur, manusia, dan segenap makhluk hidup. Karena itu, kewajiban seorang grihastha ialah memberi makanan matang kepada mereka yang tidak memasak bagi dirinya sendiri—para sanyasi dan sejenisnya.”
Verse 54
तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनूता । सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन,आसनके लिये तृण (कुश), बैठनेके लिये स्थान, जल और चौथी मधुर वाणी, सत्पुरुषोंके घरमें इन चार वस्तुओंका अभाव कभी नहीं होता
Yudhiṣṭhira berkata: “Rumput untuk alas duduk, tempat untuk duduk, air, dan—keempat—ucapan yang lembut serta benar: di rumah orang berbudi, empat hal ini tak pernah putus.”
Verse 55
देयमार्तस्य शयनं स्थितश्रान्तस्य चासनम् | तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम्,रोग आदिसे पीड़ित मनुष्यको सोनेके लिये शय्या, थके-माँदे हुएको बैठनेके लिये आसन, प्यासेको पानी और भूखेको भोजन तो देना ही चाहिये
Yudhiṣṭhira berkata: “Kepada yang menderita berikanlah tempat berbaring; kepada yang berdiri dan letih berikanlah tempat duduk; kepada yang haus berikanlah air; dan kepada yang lapar berikanlah makanan. Inilah kewajiban dharma yang tampak sebagai welas asih—pertolongan nyata yang segera.”
Verse 56
चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्यात् सुभाषिताम् । उत्थाय चासन दद्यादेष धर्म: सनातन: । प्रत्युत्थायाभिगमन कुर्यानन््यायेन चार्चनम्,जो अपने घरपर आ जाय, उसे प्रेमभरी दृष्टिसे देखे, मनसे उसके प्रति उत्तम भाव रखे, उससे मीठे वचन बोले और उठकर उसके लिये आसन दे। यह गृहस्थका सनातन धर्म है। अतिथिको आते देख उठकर उसकी अगवानी और यथोचित रीतिसे उसका आदर-सत्कार करे
Bila seorang tamu datang ke rumah, pandanglah ia dengan tatapan yang ramah, berikan niat baik dari hati, ucapkan kata-kata yang lembut dan terpilih; lalu bangkitlah dan sediakan tempat duduk baginya—itulah dharma abadi seorang perumah tangga. Karena itu, ketika melihat tamu tiba, berdirilah menyambutnya dan hormatilah ia dengan tata laku jamuan yang patut dan benar.
Verse 57
अग्निहोत्रमनड्वांश्व॒ ज्ञातयो5तिथिबान्धवा: । पुत्रा दाराश्च भृत्याश्व निर्दहेयुरपूजिता:,यदि गृहस्थ मनुष्य अग्निहोत्र, साँड, जाति-भाई, अतिथि-अभ्यागत, बन्धु-बान्धव, स्त्री-पुत्र तथा भृत्यजनोंका आदर-सत्कार न करे तो वे अपनी क्रोधाग्निसे उसे जला सकते हैं
Bila seorang perumah tangga tidak menghormati Agnihotra yang suci, lembu penarik bajak, kaum kerabat, para tamu yang datang, sanak-saudara—beserta putra, istri, dan para pelayan—maka ketika dibiarkan tanpa penghormatan, mereka dapat membakarnya dengan api amarah mereka.
Verse 58
आत्मार्थ पाचयेन्नान्नं न वृथा घातयेत् पशून् । न च तत् स्वयमश्रीयाद् विधिवद् यन्न निर्वपेत्,केवल अपने लिये अन्न न पकावे (देवता-पितरों एवं अतिथियोंके उद्देश्यसे ही भोजन बनानेका विधान है), निकम्मे पशुओंकी भी हिंसा न करे और जिस वस्तुको विधिपूर्वक देवता आदिके लिये अर्पित न करे, उसे स्वयं भी न खाय
Jangan memasak makanan semata-mata untuk diri sendiri; jangan membunuh hewan tanpa tujuan yang benar; dan apa pun yang belum dipersembahkan menurut tata aturan kepada para dewa dan penerima yang berhak, janganlah dimakan sendiri.
Verse 59
श्वभ्यश्न श्वपचेभ्यश्व वयोभ्यश्वावपेद् भुवि । वैश्वदेवं हि नामैतत् सायं प्रातश्न॒ दीयते,कुत्तों, चाण्डालों और कौवोंके लिये पृथ्वीपर अन्न डाल दे। यह वैश्वदेव नामक महान् यज्ञ है, जिसका अनुष्ठान प्रातःकाल और सायंकालमें भी किया जाता है
Letakkan makanan di tanah bagi anjing, bagi kaum terbuang (śvapaca), dan bagi burung-burung. Inilah upacara agung bernama Vaiśvadeva, yang dipersembahkan pada petang dan juga pada pagi hari.
Verse 60
विघसाशी भवेत् तस्मान्नित्यं चामृतभोजन: । विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम्,अतः गृहस्थ मनुष्य प्रतिदिन विघस एवं अमृत भोजन करे। घरके सब लोगोंके भोजन कर लेनेपर जो अन्न शेष रह जाय उसे “विघस” कहते हैं तथा बलि-वैश्वदेवसे बचे हुए अन्नका नाम 'अमृत' है
Karena itu seorang perumah tangga hendaknya setiap hari hidup sebagai vighasāśin dan juga menikmati amṛta. Makanan yang tersisa setelah semua orang makan disebut vighasa; dan makanan yang tersisa setelah persembahan yajña—seperti bali dan vaiśvadeva—disebut amṛta.
Verse 61
चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्याच्च सूनृताम् । अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञ: पठचदक्षिण:,अतिथिको नेत्र दे (उसे प्रेमभरी दृष्टिसे देखे), मन दे (मनसे हित-चिन्तन करे) तथा मधुर वाणी प्रदान करे (सत्य, प्रिय, हितकी बात कहे)। जब वह जाने लगे तब कुछ दूरतक उसके पीछे-पीछे जाय और जबतक वह घरपर रहे तबतक उसके पास बैठे (उसकी सेवामें लगा रहे)। यह पाँच प्रकारकी दक्षिणाओंसे युक्त अतिथि-यज्ञ है
Yudhiṣṭhira berkata: “Berikan kepada tamu terhormat anugerah mata—tatapan penuh kasih dan hormat; anugerah batin—perhatian serta niat baik; dan anugerah tutur yang disebut sūnṛtā—benar, menyenangkan, dan membawa manfaat. Saat ia beranjak pergi, antarkanlah beberapa jarak; dan selama ia tinggal di rumah, duduklah dekatnya dalam pelayanan. Inilah ‘atithi-yajña’, persembahan bagi tamu, yang diperlengkapi dengan lima bentuk dakṣiṇā.”
Verse 62
यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते | भ्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत्,जो गृहस्थ अपरिचित थके-माँदे पथिकको प्रसन्नतापूर्वक भोजन देता है, उसे महान् पुण्यफलकी प्राप्ति होती है
Yudhiṣṭhira berkata: “Siapa pun—seorang perumah tangga di perjalanan—yang memberi makanan dengan hati lapang kepada pengembara yang letih, tersesat, dan tak dikenalnya, akan memperoleh buah kebajikan yang besar.”
Verse 63
एवं यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे । तस्य धर्म परं प्राहुः कथं वा विप्र मन्यसे,ब्रह्मन! जो गृहस्थ इस वृत्तिसे रहता है, उसके लिये उत्तम धर्मकी प्राप्ति बतायी गयी है, अथवा इस विषयमें आपकी क्या सम्मति है?
Yudhiṣṭhira berkata: “Barangsiapa, hidup dalam tahap perumah tangga, berperilaku demikian dan menempuh penghidupan seperti itu—mereka menyatakan bahwa baginya inilah dharma yang tertinggi. Bagaimana pendapatmu, wahai brāhmaṇa?”
Verse 64
शौनक उवाच अहो बत महत् कष्ट विपरीतमिदं जगत् | येनापत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति,शौनकजीने कहा--अहो! बहुत दुःखकी बात है, इस जगत्में विपरीत बातें दिखायी देती हैं। साधु पुरुष जिस कर्मसे लज्जित होते हैं, दुष्ट मनुष्योंको उसीसे प्रसन्नता प्राप्त होती है
Śaunaka berkata: “Aduhai, betapa berat dan pedih—dunia ini tampak terbalik. Perbuatan yang membuat orang saleh merasa malu, justru itulah yang memuaskan orang jahat.”
Verse 65
शिक्षोदरकृते<प्राज्ञ: करोति विघसं बहु | मोहरागवशाक्रान्त इन्द्रियार्थवशानुग:,अज्ञानी मनुष्य अपनी जननेन्द्रिय तथा उदरकी तृप्तिके लिये मोह एवं रागके वशीभूत हो विषयोंका अनुसरण करता हुआ नाना प्रकारकी विषय-सामग्रीको यज्ञावशेष मानकर उसका संग्रह करता है
Dikuasai delusi dan keterikatan, orang yang tak bijak—tunduk pada tarikan objek-objek indria—mengumpulkan banyak kenikmatan demi memuaskan indria dan perutnya, seakan-akan semuanya itu ‘vighasa’, sisa persembahan yajña.
Verse 66
हियते बुध्यमानो5पि नरो हारिभिरिन्द्रियै: । विमूढसंज्ञो दुष्टाश्वैरुदभ्रान्तैरिव सारथि:,समझदार मनुष्य भी मनको हर लेनेवाली इन्द्रियोंद्रारा विषयोंकी ओर खींच लिया जाता है। उस समय उसकी विचारशक्ति मोहित हो जाती है। जैसे दुष्ट घोड़े वशमें न होनेपर सारथिको कुमार्गमें घसीट ले जाते हैं, यही दशा उस अजितेन्द्रिय पुरुषकी भी होती है
Bahkan orang yang arif pun terseret oleh indria yang mencuri ketenangan batin dan menariknya menuju objek-objek kenikmatan. Pada saat itu kesadarannya menjadi kabur—laksana sais yang diseret keluar dari jalan benar oleh kuda-kuda liar yang tak terlatih. Demikianlah keadaan orang yang belum menaklukkan indria.
Verse 67
षडिन्द्रियाणि विषयं समागच्छन्ति वै यदा । तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसंकल्पजं मन:,जब मन और पाँचों इन्द्रियाँ अपने विषयोंमें प्रवृत्त होती हैं, उस समय प्राणियोंके पूर्वसंकल्पके अनुसार उसीकी वासनासे वासित मन विचलित हो उठता है
Ketika enam indria bergerak menuju objeknya masing-masing, maka pikiran—yang lahir dari niat-niat terdahulu dan diwarnai kesan laten—muncul dan menjadi gelisah.
Verse 68
मनो यस्येन्द्रियस्पेह विषयान् याति सेवितुम् | तस्यौत्सुक्यं सम्भवति प्रवृत्तिश्नोपजायते,मन जिस इन्द्रियके विषयोंका सेवन करने जाता है, उसीमें उस विषयके प्रति उत्सुकता भर जाती है और वह इन्द्रिय उस विषयके उपभोगमें प्रवृत्त हो जाती है
Bila pikiran seseorang, didorong oleh hasrat indria, pergi untuk menikmati objek-objek indria, maka timbullah kegairahan terhadapnya; lalu indria pun menjadi aktif mengejar kenikmatan itu.
Verse 69
ततः संकल्पबीजेन कामेन विषयेषुभि: । विद्धः पतति लोभाग्नौ ज्योतिर्लोभात् पतड़वत्,तदनन्तर संकल्प ही जिसका बीज है, उस कामके द्वारा विषयरूपी बाणोंसे बिंधकर मनुष्य ज्योतिके लोभसे पतंगकी भाँति लोभकी आगमें गिर पड़ता है
Kemudian, didorong oleh nafsu yang benihnya hanyalah tekad batin, tertusuk panah-panah berupa objek indria, seseorang jatuh ke dalam api ketamakan—seperti ngengat yang karena mendamba cahaya, menerjang nyala api.
Verse 70
ततो विहारैराहारैमोहितश्न यथेप्सया । महामोहे सुखे मग्नो नात्मानमवबुध्यते,इसके बाद इच्छानुसार आहार-विहारसे मोहित हो महामोहमय सुखमें निमग्न रहकर वह मनुष्य अपने आत्माके ज्ञानसे वंचित हो जाता है
Sesudah itu, terbius oleh makan dan hiburan yang dituruti sesuka hati, ia tenggelam dalam kebahagiaan yang lahir dari delusi besar dan tidak terjaga pada kebenaran Sang Diri (Ātman).
Verse 71
एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु । अविद्याकर्मतृष्णाभि भ्राम्यमाणो5थ चक्रवत्,इस प्रकार अविद्या, कर्म और तृष्णाद्वारा चक्रकी भाँति भ्रमण करता हुआ मनुष्य संसारकी विभिन्न योनियोंमें गिरता है
Demikianlah, digerakkan bagaikan roda oleh avidyā (ketidaktahuan), oleh daya karma, dan oleh tṛṣṇā (nafsu-keinginan), manusia jatuh berulang-ulang ke dalam berbagai yoni di saṃsāra.
Verse 72
ब्रह्मादिषु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते । जले भुवि तथा55काशे जायमान: पुन: पुन:,फिर तो ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सभी प्राणियोंमें तथा जल, भूमि और आकाशमें वह मनुष्य बारंबार जन्म लेकर चक्कर लगाता रहता है
Lalu ia terus berputar dalam saṃsāra—lahir berulang-ulang di antara makhluk dari Brahmā hingga sehelai rumput, dan juga dalam ranah air, bumi, serta angkasa.
Verse 73
अबुधानां गतिस्त्वेषा बुधानामपि मे शृणु । ये धर्मे श्रेयसि रता विमोक्षरतयो जना:,यह अविवेकी पुरुषोंकी गति बतायी गयी है। अब आप मुझसे विवेकी पुरुषोंकी गतिका वर्णन सुनें। जो धर्म एवं कल्याणमार्ममें तत्पर हैं और मोक्षके विषयमें जिनका निरन्तर अनुराग है, वे विवेकी हैं
Inilah jalan kaum yang tidak bijak; kini dengarkan pula dariku jalan kaum bijak—mereka yang tekun pada dharma yang membawa śreyas dan yang senantiasa mencintai mokṣa.
Verse 74
तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च । तस्माद् धर्मानिमान् सर्वान् नाभिमानात् समाचरेत्,वेदकी यह आज्ञा है कि कर्म करो और कर्म छोड़ो; अतः आगे बताये जानेवाले इन सभी धर्मोका अहंकारशून्य होकर अनुष्ठान करना चाहिये
Inilah sabda Veda: “Lakukanlah karma,” dan juga, “Tinggalkanlah karma.” Maka semua dharma yang akan diuraikan hendaknya dijalankan tanpa abhimāna—tanpa keakuan dan kebanggaan diri.
Verse 75
इज्याध्ययनदानानि तप: सत्यं क्षमा दम: । अलोभ इति मार्गो<यं धर्मस्याष्टविध: स्मृत:,यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम तथा लोभका परित्याग--ये धर्मके आठ मार्ग हैं
Ijyā (yajña/pemujaan), adhyayana (studi Weda), dāna (derma), tapas (laku tapa), satya (kebenaran), kṣamā (pemaafan), dama (pengendalian batin dan indria), serta alobha (tanpa ketamakan)—inilah delapan jalan dharma yang dikenal.
Verse 76
अत्र पूर्वक्षतुर्वर्ग: पितृयाणपथे स्थित: । कर्तव्यमिति यत् कार्य नाभिमानात् समाचरेत्,इनमें पहले बताये हुए चार धर्म पितृयानके मार्गमें स्थित हैं; अर्थात् इन चारोंका सकामभावसे अनुष्ठान करनेपर ये पितृयानमार्गसे ले जाते हैं। अग्निहोत्र और संध्योपासनादि जो अवश्य करनेयोग्य कर्म हैं, उन्हें कर्तव्य-बुद्धिसे ही अभिमान छोड़कर करे
Di sini, empat kelompok dharma yang telah dijelaskan sebelumnya berdiri pada jalan yang disebut Pitṛyāna: bila keempatnya dijalankan dengan hasrat akan buah hasil, maka ia menuntun melalui jalur para leluhur itu. Namun apa pun perbuatan yang wajib—seperti agnihotra dan pemujaan sandhyā—hendaknya dilakukan semata-mata karena kewajiban, dengan menanggalkan kesombongan dan rasa penting diri.
Verse 77
उत्तरो देवयानस्तु सद्धिराचरित: सदा । अष्ट ड्रेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत्,अन्तिम चार धर्मोंको देवयानमार्गका स्वरूप बताया गया है। साधु पुरुष सदा उसी मार्गका आश्रय लेते हैं। आगे बताये जानेवाले आठ अंगोंसे युक्त मार्गद्वारा अपने अन्तःकरणको शुद्ध करके कर्तव्य-कर्मोंका कर्तृत्वके अभिमानसे रहित होकर पालन करे
Jalan yang lebih luhur adalah Devayāna, yang senantiasa ditempuh oleh orang-orang saleh. Dengan memurnikan batin melalui jalan yang beranggota delapan, hendaknya seseorang menjalankan kewajiban-kewajibannya tanpa kesombongan sebagai pelaku.
Verse 78
सम्यक्संकल्पसंबन्धात् सम्यक् चेन्द्रियनिग्रहात् । सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक् च गुरुसेवनात्,पूर्णतया संकल्पोंको एक ध्येयमें लगा देनेसे, इन्द्रियोंको भली प्रकार वशमें कर लेनेसे, अहिंसादि व्रतोंका अच्छी प्रकार पालन करनेसे, भली प्रकार गुरुकी सेवा करनेसे, यथायोग्य योगसाधनोपयोगी आहार करनेसे, वेदादिका भली प्रकार अध्ययन करनेसे, कर्मोंको भलीभाँति भगवत्समर्पण करनेसे और चित्तका भली प्रकार निरोध करनेसे मनुष्य परम कल्याणको प्राप्त होता है
Dengan menautkan tekad secara benar pada satu tujuan yang luhur; dengan mengekang indra secara tepat; dengan memelihara laku-ikrar khusus seperti ahiṃsā; dan dengan mengabdi penuh hormat kepada guru—dengan itulah manusia meraih kebaikan tertinggi.
Verse 79
सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक् चाध्ययनागमात् | सम्यक्कर्मोपसंन्यासात् सम्यक् चित्तनिरोधनात्,पूर्णतया संकल्पोंको एक ध्येयमें लगा देनेसे, इन्द्रियोंको भली प्रकार वशमें कर लेनेसे, अहिंसादि व्रतोंका अच्छी प्रकार पालन करनेसे, भली प्रकार गुरुकी सेवा करनेसे, यथायोग्य योगसाधनोपयोगी आहार करनेसे, वेदादिका भली प्रकार अध्ययन करनेसे, कर्मोंको भलीभाँति भगवत्समर्पण करनेसे और चित्तका भली प्रकार निरोध करनेसे मनुष्य परम कल्याणको प्राप्त होता है
Melalui pengaturan yang benar atas makanan dan laku hidup; melalui belajar yang semestinya serta perolehan pengetahuan suci; melalui upasaṃnyāsa yang tepat atas perbuatan—yakni meletakkannya dalam sikap persembahan kepada Yang Ilahi; dan melalui pengekangan batin yang mantap—dengan sarana-sarana yang terlatih ini manusia mencapai kebaikan tertinggi.
Verse 80
एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषव: । रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्य देवता गता:,संसारको जीतनेकी इच्छावाले बुद्धिमान् पुरुष इसी प्रकार राग-द्वेषसे मुक्त होकर कर्म करते हैं। इन्हीं नियमोंके पालनसे देवतालोग एऐश्वर्यको प्राप्त हुए हैं
Demikianlah para bijak yang ingin menaklukkan putaran saṃsāra bertindak—menjalankan kewajiban tanpa keterikatan dan tanpa kebencian. Dengan menegakkan disiplin-disiplin inilah para dewa pun meraih kedaulatan serta kemakmuran ilahi.
Verse 81
रुद्रा: साध्यास्तथा55दित्या वसवो5थ तथाश्रिनौ । योगैश्वर्येण संयुक्ता धारयन्ति प्रजा इमा:,रुद्र, साध्य, आदित्य, वसु तथा दोनों अश्विनीकुमार योगजनित ऐश्वर्यसे युक्त होकर इन प्रजाजनोंका धारण-पोषण करते हैं
Para Rudra, Sādhya, Āditya, Vasu, dan juga kedua Aśvin—berbekal kewibawaan luhur yang lahir dari yoga—menegakkan serta memelihara segenap makhluk ini.
Verse 82
तथा त्वमपि कौन्तेय शममास्थाय पुष्कलम् | तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत,कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार आप भी मन और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमें करके तपस्याद्वारा सिद्धि तथा योगजनित ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी चेष्टा कीजिये
Wahai putra Kuntī, demikian pula engkau: tegakkanlah ketenteraman batin yang melimpah, kuasai indria dan pikiran; lalu melalui tapa, upayakanlah siddhi, dan juga kesempurnaan-kesempurnaan yoga, wahai Bhārata.
Verse 83
पितृमातृमयी सिद्धि: प्राप्ता कर्ममयी च ते । तपसा सिद्धिमन्विच्छ द्विजानां भरणाय वै,यज्ञ, युद्धादि कर्मोंसे प्राप्त होनेवाली सिद्धि पितृ-मातृमयी (परलोक और इहलोकमें भी लाभ पहुँचानेवाली) है, जो आपको प्राप्त हो चुकी है। अब तपस्याद्वारा वह योगसिद्धि प्राप्त करनेका प्रयत्न कीजिये जिससे ब्राह्मणोंका भरण-पोषण हो सके
Engkau telah meraih keberhasilan yang lahir dari tindakan—keberhasilan yang membawa kebaikan bagi leluhur dan ibu-ibu, bagi dunia ini dan dunia sana. Kini, melalui tapa, carilah siddhi yang lebih luhur, agar terjamin pemeliharaan kaum dwija (para brahmana).
Verse 84
सिद्धा हि यद् यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहात् तस्मात्तप: समास्थाय कुरुष्वात्ममनोरथम्,सिद्ध पुरुष जो-जो वस्तु चाहते हैं, उसे अपने तपके प्रभावसे प्राप्त कर लेते हैं। अतः आप तपस्याका आश्रय लेकर अपने मनोरथकी पूर्ति कीजिये
Para siddha, berkat anugerah yang lahir dari tapa, mampu mewujudkan apa pun yang sungguh mereka kehendaki. Maka, berpeganglah pada tapa yang tertib, dan genapilah maksud hatimu.
Yudhiṣṭhira faces a duty-conflict between accepting devoted brāhmaṇas as companions and preventing their foreseeable hardship in the wilderness, balancing compassion, responsibility for dependents, and the ethics of burdening others.
Sorrow is managed by diagnosing its cognitive root: attachment (sneha) generates desire and craving (tṛṣṇā), which amplify fear and suffering; knowledge, restraint, and contentment stabilize the mind, thereby easing both mental and bodily distress.
No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-function is prescriptive: it frames tapas and disciplined conduct as pragmatic and soteriologically aligned means to sustain dependents and to prevent grief from governing ethical judgment.