Adhyaya 184
Vana ParvaAdhyaya 18497 Verses

Adhyaya 184

Sarasvatī–Tārkṣya Saṃvāda: Agnihotra-vidhi, Dāna-phala, and Mokṣa-prasaṅga (सरस्वती–तार्क्ष्यसंवादः)

Upa-parva: Sarasvatī–Tārkṣya Saṃvāda (Agnihotra–Dāna–Mokṣa Instruction Episode)

Mārkaṇḍeya introduces a teaching associated with the Sarasvatī, addressed to ‘Parapuraṃjaya,’ and asks the listener to hear what the wise Tārkṣya had asked. Tārkṣya inquires into śreyas and the practical maintenance of svadharma: how to offer into fire, how to worship, and under what conditions dharma does not decline. Sarasvatī replies by first praising Vedic knowledge and disciplined self-study as a path toward divine proximity, then describes auspicious realms and enumerates dāna-results: gifting cows, a bull, garments, and gold correspond to distinct heavenly attainments. The discourse turns to agnihotra qualifications—purity, washed hands, brahma-knowledge, and especially śraddhā; offerings are said to be rejected when faith is absent, and employing an unqualified non-śrotriya in devahavya is criticized as futile. Merit from sustained oblations is framed as purifying ancestral lines. Tārkṣya then asks Sarasvatī’s identity; she states she has come from/for agnihotra to cut doubts of eminent brāhmaṇas and that ritual excellence nourishes her presence and efficacy. Finally, Tārkṣya asks for the highest, sorrowless mokṣa; Sarasvatī outlines it as known to Veda-knowers and ascetics through svādhyāya, dāna, vrata, and puṇya-yoga, concluding with visionary imagery of a supreme locus where gods perform excellent rites.

Chapter Arc: काम्यकवन में निर्वासित पाण्डवों के आश्रम पर ब्राह्मणों की भीड़ उमड़ पड़ती है; उसी जनसमूह के बीच एक द्विज अर्जुन का प्रिय सखा बनकर शुभ समाचार का संकेत देता है—शौर्यवान शौरि (श्रीकृष्ण) स्वयं आने वाले हैं। → युधिष्ठिर के मन में वनवास, राज्य-हरण और भविष्य की अनिश्चितता का भार है; ब्राह्मणों की उपस्थिति धर्म-पालन की कसौटी बनती है, और कृष्ण के आगमन की प्रतीक्षा आशा व चिंता—दोनों को तीव्र करती है। → भगवान मधुसूदन का आगमन: वे अर्जुन, द्रौपदी और पुरोहित का यथावत् पूजन कर युधिष्ठिर के पास बैठते हैं; युधिष्ठिर के मुख से निर्भय स्वीकार निकलता है—'केशव! पाण्डवों की गति आप ही हैं, आप ही शरण हैं; कालोदय पर कर्म-सम्पादन भी आप ही कराएंगे।' → कृष्ण की उपस्थिति से आश्रम का वातावरण आश्वस्त होता है; धर्म और कर्म के संदर्भ में युधिष्ठिर को धैर्य मिलता है—कर्मानुसार गति, पुण्य से स्वर्ग-प्राप्ति और क्लेश के पार सुख की संभावना का भरोसा स्थापित होता है। → कृष्ण और मुनिवर (मार्कण्डेय/नारद) के आगमन के बाद आगे होने वाले उपदेश/कथा-विस्तार की भूमिका बनती है—पाण्डवों के आगामी कर्म-पथ और समय-चक्र का संकेत देकर अध्याय अगले संवाद पर छोड़ देता है।

Shlokas

Verse 1

हि >> आय न हुक अत अप त्रयशीर्त्याधिकशततमोब< ध्याय: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान्‌ श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन वैशम्पायन उवाच काम्यकं प्राप्प कौरव्य युधिष्ठिरपुरोगमा: । कृतातिथ्या मुनिगणैर्निषेदु: सह कृष्णया,वैशम्पायनजी कहते हैं--कुरुनन्दन जनमेजय! काम्यकवनमें पहुँचनेपर वहाँके मुनियोंने युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंका यथोचित आदर-सत्कार किया। फिर वे द्रौपदीके साथ वहाँ रहने लगे। जब वे विश्वासपात्र पाण्डव वहाँ निवास करने लगे, तब बहुत-से ब्राह्मणोंने आकर सब ओसरसे उन्हें घेर लिया (और उन्हींके साथ रहने लगे)। तदनन्तर एक दिन एक ब्राह्मण आया। उसने यह सूचना दी कि सबको वशमें रखनेवाले उदारबुद्धि महाबाहु भगवान्‌ श्रीकृष्ण, जो अर्जुनके प्रिय सखा हैं, अभी यहाँ पधारेंगे

Waiśampāyana berkata: Wahai keturunan Kuru, Janamejaya, ketika Yudhiṣṭhira beserta para Pāṇḍava—dipimpin olehnya—tiba di hutan Kāmyaka, para kelompok resi menyambut mereka dengan jamuan dan penghormatan yang semestinya. Sesudah itu, bersama Kṛṣṇā (Draupadī), mereka menetap di sana—sebuah masa pembuangan di mana dharma tetap ditegakkan melalui saling hormat antara pertapa dan raja, dan di mana akibat moral dari perbuatan segera menjadi pokok tanya dan ajaran.

Verse 2

ततस्तान्‌ परिविश्वस्तान्‌ वसतः पाण्डुनन्दनान्‌ | ब्राह्मणा बहवस्तत्र समन्तात्‌ पर्यवारयन्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--कुरुनन्दन जनमेजय! काम्यकवनमें पहुँचनेपर वहाँके मुनियोंने युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंका यथोचित आदर-सत्कार किया। फिर वे द्रौपदीके साथ वहाँ रहने लगे। जब वे विश्वासपात्र पाण्डव वहाँ निवास करने लगे, तब बहुत-से ब्राह्मणोंने आकर सब ओसरसे उन्हें घेर लिया (और उन्हींके साथ रहने लगे)। तदनन्तर एक दिन एक ब्राह्मण आया। उसने यह सूचना दी कि सबको वशमें रखनेवाले उदारबुद्धि महाबाहु भगवान्‌ श्रीकृष्ण, जो अर्जुनके प्रिय सखा हैं, अभी यहाँ पधारेंगे

Sesudah itu, ketika putra-putra Pāṇḍu tinggal di sana dengan rasa aman dan saling percaya, banyak brāhmaṇa datang dari segala arah, mengelilingi mereka dan menetap dalam kebersamaan mereka. Adegan ini menegaskan bahwa orang-orang yang teguh pada dharma, bahkan dalam pembuangan, menjadi tempat berlindung bagi kaum terpelajar dan para pencari suaka; dan dharma seorang raja ialah melindungi serta memelihara mereka.

Verse 3

अथाब्रवीद्‌ द्विज: ककश्िदर्जुनस्य प्रियः सखा । स एष्यति महाबाहुर्वशी शौरिरुदारधी:,वैशम्पायनजी कहते हैं--कुरुनन्दन जनमेजय! काम्यकवनमें पहुँचनेपर वहाँके मुनियोंने युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंका यथोचित आदर-सत्कार किया। फिर वे द्रौपदीके साथ वहाँ रहने लगे। जब वे विश्वासपात्र पाण्डव वहाँ निवास करने लगे, तब बहुत-से ब्राह्मणोंने आकर सब ओसरसे उन्हें घेर लिया (और उन्हींके साथ रहने लगे)। तदनन्तर एक दिन एक ब्राह्मण आया। उसने यह सूचना दी कि सबको वशमें रखनेवाले उदारबुद्धि महाबाहु भगवान्‌ श्रीकृष्ण, जो अर्जुनके प्रिय सखा हैं, अभी यहाँ पधारेंगे

Lalu seorang brāhmaṇa berkata—seorang sahabat karib Arjuna: “Śauri (Śrī Kṛṣṇa) yang perkasa, berpengendalian diri, dan berhati luhur itu akan segera datang ke sini.”

Verse 4

विदिता हि हरेयूयमिहायाता: कुरूद्वहा: । सदा हि दर्शनाकाडुक्षी श्रेयो5न्वेषी च वो हरि:,कुरुश्रेष्ठ पाण्डवो! आपलोगोंका यहाँ आना भगवान्‌ श्रीकृष्णको ज्ञात हो चुका है। वे सदा आपलोगोंको देखनेके लिये उत्सुक रहते हैं और आपके कल्याणकी बात सोचते रहते हैं

“Wahai yang terbaik di antara Kuru, kedatangan kalian ke sini telah diketahui oleh Hari (Śrī Kṛṣṇa). Ia senantiasa rindu berjumpa dengan kalian dan terus-menerus mencari apa yang sungguh membawa kebaikan bagi kalian.”

Verse 5

बहुवत्सरजीवी च मार्कण्डेयो महातपा: । स्वाध्यायतपसा युक्तः क्षिप्रं युष्मान्‌ समेष्यति,एक शुभ समाचार और है, चिरंजीवी महातपस्वी मार्कण्डेय मुनि, जो स्वाध्याय और तपस्यामें संलग्न रहा करते हैं, शीघ्र ही आपलोगोंसे मिलेंगे

“Dan ada kabar baik lainnya: resi Mārkaṇḍeya yang berumur panjang, seorang pertapa agung—senantiasa tekun dalam svādhyāya dan tapa—akan segera datang menemui kalian.”

Verse 6

तथैव ब्रुवतस्तस्य प्रत्यदृश्यत केशव: । शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेन रथिनां वर:,ब्राह्मण इस प्रकारकी बातें कह ही रहा था कि शैब्य और सुग्रीव नामक अअश्रोंसे जुते हुए रथद्वारा रथियोंमें श्रेष्ठ भगवान्‌ श्रीकृष्ण आते हुए दिखायी दिये। जैसे शचीके साथ इन्द्र आये हों, उसी प्रकार सत्यभामाके साथ देवकीनन्दन श्रीहरि उन कुरुकुलशिरोमणि पाण्डवोंसे मिलने वहाँ आये

Ia masih berbicara demikian ketika Keśava tampak—yang utama di antara para kusir—datang dengan kereta yang ditarik kuda bernama Śaibya dan Sugrīva. Kedatangannya menjadi tanda pertolongan ilahi yang tepat waktu: bagi mereka yang teguh pada dharma, bantuan hadir bukan hanya sebagai kuasa, melainkan sebagai tuntunan yang selaras dengan dharma.

Verse 7

मघवानिव पौलोम्या सहित: सत्यभामया । उपायाद्‌ देवकीपूुत्रो दिदृक्षु: कुरुसत्तमान्‌,ब्राह्मण इस प्रकारकी बातें कह ही रहा था कि शैब्य और सुग्रीव नामक अअश्रोंसे जुते हुए रथद्वारा रथियोंमें श्रेष्ठ भगवान्‌ श्रीकृष्ण आते हुए दिखायी दिये। जैसे शचीके साथ इन्द्र आये हों, उसी प्रकार सत्यभामाके साथ देवकीनन्दन श्रीहरि उन कुरुकुलशिरोमणि पाण्डवोंसे मिलने वहाँ आये

Vaiśampāyana berkata: sebagaimana Indra (Maghavān) datang bersama Paulomī (Śacī), demikian pula putra Devakī, Śrī Kṛṣṇa, tiba bersama Satyabhāmā, rindu hendak melihat para Kuru termulia, yakni para Pāṇḍava. Kedatangannya menandai dukungan yang tepat waktu dan kasih sayang—bahwa sahabat yang teguh pada dharma tidak meninggalkan orang berbudi saat tertimpa derita.

Verse 8

अवतीर्य रथात्‌ कृष्णो धर्मराजं यथाविधि । ववन्दे मुदितो धीमान्‌ भीमं च बलिनां वरम्‌,परम बुद्धिमान श्रीकृष्णने रथसे उतरकर बड़ी प्रसन्नताके साथ धर्मराज युधिष्ठिर तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमको विधिपूर्वक प्रणाम किया

Turun dari keretanya, Kṛṣṇa—bijaksana dan bersukacita di dalam hati—memberi hormat dengan tata cara yang semestinya kepada Dharmarāja Yudhiṣṭhira, dan juga menunduk kepada Bhīma, yang utama di antara para kuat. Adegan ini menegaskan bahwa kebesaran sejati tampak dalam disiplin menghormati dharma serta memuliakan otoritas dan kekuatan yang benar.

Verse 9

पूजयामास धौम्यं च यमाभ्यामभिवादित: । परिष्वज्य गुडाकेशं द्रौपदी पर्यसान्त्वयत्‌,फिर धौम्य मुनिका पूजन किया। तत्पश्चात्‌ नकुल-सहदेवने आकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये। इसके बाद निद्राविजयी अर्जुनको हृदयसे लगाकर श्रीकृष्णने द्रौपदीको भलीभाँति सान्त्वना दी। परमप्रिय वीरवर अर्जुनको दीर्घकालके बाद आया देख शत्रुदमन श्रीकृष्णने उन्हें बार-बार हृदयसे लगाया

Vaiśampāyana berkata: Ia menghormati resi Dhaumya dengan semestinya—yang sebelumnya telah diberi salam hormat oleh kedua saudara kembar. Lalu, setelah memeluk Guḍākeśa (Arjuna), ia menenangkan Draupadī dengan sungguh-sungguh. Melihat Arjuna, sahabat tercinta yang kembali setelah lama, sang penunduk musuh merangkulnya berulang kali—tanda hormat, kasih, dan pemulihan semangat setelah derita.

Verse 10

स दृष्टवा फाल्गुनं वीरं चिरस्य प्रियमागतम्‌ । पर्यष्वजत दाशार्ह: पुन: पुनररिंदम:,फिर धौम्य मुनिका पूजन किया। तत्पश्चात्‌ नकुल-सहदेवने आकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये। इसके बाद निद्राविजयी अर्जुनको हृदयसे लगाकर श्रीकृष्णने द्रौपदीको भलीभाँति सान्त्वना दी। परमप्रिय वीरवर अर्जुनको दीर्घकालके बाद आया देख शत्रुदमन श्रीकृष्णने उन्हें बार-बार हृदयसे लगाया

Melihat Phālguna (Arjuna), sang pahlawan—sahabat tercinta yang kembali setelah lama—Dāśārha (Śrī Kṛṣṇa), penunduk musuh, memeluknya berulang kali. Adegan ini menegaskan kehangatan dharmis dalam kekerabatan dan persahabatan: sambutan luhur bagi sekutu yang telah menanggung derita, serta pemulihan semangat dan persatuan.

Verse 11

तथैव सत्यभामापि द्रौपदी परिषस्वजे । पाण्डवानां प्रियां भार्या कृष्णस्य महिषी प्रिया,इसी प्रकार श्रीकृष्णकी प्यारी रानी सत्यभामाने भी पाण्डवोंकी प्रिय पत्नी पांचालीका आलिंगन किया

Demikian pula Satyabhāmā, permaisuri tercinta Śrī Kṛṣṇa, memeluk Draupadī—istri yang dikasihi para Pāṇḍava.

Verse 12

ततस्ते पाण्डवा: सर्वे सभार्या: सपुरोहिता: । आनर्चु: पुण्डरीकाक्षं परिवद्रुश्चन सर्वश:,तदनन्तर पत्नी और पुरोहितसहित समस्त पाण्डवोंने कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्णका पूजन किया और सब-के-सब उन्हें घेरकर बैठ गये

Kemudian semua Pāṇḍava—bersama para istri dan pendeta keluarga—memuja Tuhan Kṛṣṇa yang bermata teratai; sesudah memberi hormat, mereka semua mengelilinginya dan duduk.

Verse 13

कृष्णस्तु पार्थेन समेत्य विद्वान्‌ धनंजयेनासुरतर्जनेन । बभौ यथा भूतपतिर्महात्मा समेत्य साक्षाद्‌ भगवान्‌ गुहेन,सर्वज्ञ भगवान्‌ श्रीकृष्ण असुरोंको भयभीत करनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुनसे मिलकर उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे परम महात्मा साक्षात्‌ भगवान्‌ भूतनाथ शंकर कार्तिकेयसे मिलकर शोभा पाते हैं

Śrī Kṛṣṇa yang mahatahu, setelah bertemu Pārtha Arjuna—Dhanaṃjaya, penggentar para asura—tampak makin bercahaya, laksana Mahātman, Penguasa makhluk, Śiva sendiri, ketika bersatu dengan Guha (Kārttikeya).

Verse 14

ततः समस्तानि किरीटमाली वनेषु वृत्तानि गदाग्रजाय । उक्त्वा यथावत्‌ पुनरन्वपृच्छत्‌ कथं सुभद्रा च स चाभिमन्यु:,तदनन्तर किरीटधारी अर्जुनने गदके बड़े भाई भगवान्‌ श्रीकृष्णकोी वनवासके सारे वत्तान्त यथार्थरूपसे बताकर पुनः उनसे पूछा--'सुभद्रा और अभिमन्यु कैसे हैं?

Lalu Arjuna, sang pahlawan bermahkota, menceritakan dengan benar dan berurutan kepada Śrī Kṛṣṇa—kakak dari sang pemegang gada—segala yang terjadi di rimba; kemudian ia bertanya lagi: “Bagaimana Subhadrā, dan bagaimana Abhimanyu?”

Verse 15

स पूजयित्वा मधुहा यथावत्‌ पार्थ च कृष्णां च पुरोहितं च । उवाच राजानमभिप्रशंसन्‌ युधिष्ठिरं तत्र सहोपविश्य,भगवान्‌ मधुसूदनने अर्जुन, द्रौपदी तथा पुरोहित धौम्यका सम्मान करके सबके साथ बैठकर राजा युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए कहा--

Setelah memberi penghormatan sebagaimana mestinya kepada Madhusūdana (Śrī Kṛṣṇa), juga kepada Pārtha (Arjuna), Kṛṣṇā (Draupadī), dan pendeta keluarga, ia pun duduk bersama mereka di sana; lalu, sambil memuji Raja Yudhiṣṭhira, ia berbicara.

Verse 16

धर्म: पर: पाण्डव राज्यलाभात्‌ तस्यार्थमाहुस्तप एव राजन्‌ । सत्यार्जवाभ्यां चरता स्वधर्म जितस्त्वयायं च परश्च॒ लोक:,“राजन! पाण्डुनन्दन! राज्यलाभकी अपेक्षा धर्म महान्‌ है। धर्मकी वृद्धिके लिये तपको ही प्रधान साधन बताया गया है। आप सत्य और सरलता आदि सदगुणोंके साथ-साथ स्वधर्मका पालन करते हैं, अतः आपने इस लोक और परलोक दोनोंको जीत लिया है

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, putra Pāṇḍu, dharma lebih tinggi bahkan daripada memperoleh kerajaan. Demi pertumbuhan dan pemenuhan dharma, tapa (tapas) dinyatakan sebagai sarana yang utama. Karena engkau hidup menurut kewajibanmu sendiri, menegakkan kebenaran dan kelurusan hati, engkau telah menaklukkan dunia ini dan dunia seberang.”

Verse 17

अधीतमग्रे चरता व्रतानि सम्यग धनुर्वेदमवाप्यकृत्स्नम्‌ । क्षात्रेण धर्मेण वसूनि लब्ध्वा सर्वे हमवाप्ता: क्रतव: पुराणा:,“आपने सबसे पहले ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया है। तत्पश्चात्‌ सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की है। इसके बाद क्षत्रिय-धर्मके अनुसार धनका उपार्जन करके समस्त प्राचीन यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। नरेश्वर! जिसमें गँवारोंकी आसक्ति हुआ करती है, उस स्त्री-सम्बन्धी भोगमें आपका अनुराग नहीं है। आप कामनासे प्रेरित होकर कुछ नहीं करते हैं और धनके लोभसे धर्मका त्याग नहीं करते हैं। इसी प्रभावसे धर्मराज कहलाते हैं

Waiśampāyana berkata: “Mula-mula, sambil menjalankan laku seperti brahmacarya, engkau menuntaskan seluruh pembelajaran suci (Veda). Setelah itu engkau menguasai sepenuhnya ilmu memanah (dhanurveda). Lalu, menurut dharma seorang ksatria, engkau menghimpun kekayaan dan melaksanakan semua yajña kuno. Demikianlah hidupmu menanjak dengan tertib—pengendalian diri, ilmu, kepiawaian perang, kemakmuran yang benar, dan penyempurnaan yajña—menunjukkan bahwa engkau bertindak karena dharma, bukan karena nafsu atau loba.”

Verse 18

नग्राम्यधर्मेषु रतिस्तवास्ति कामान्न किंचित्‌ कुरुषे नरेन्द्र | न चार्थलोभात्‌ प्रजहासि धर्म तस्मात्‌ प्रभावादसि धर्मराज:,“आपने सबसे पहले ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया है। तत्पश्चात्‌ सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की है। इसके बाद क्षत्रिय-धर्मके अनुसार धनका उपार्जन करके समस्त प्राचीन यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। नरेश्वर! जिसमें गँवारोंकी आसक्ति हुआ करती है, उस स्त्री-सम्बन्धी भोगमें आपका अनुराग नहीं है। आप कामनासे प्रेरित होकर कुछ नहीं करते हैं और धनके लोभसे धर्मका त्याग नहीं करते हैं। इसी प्रभावसे धर्मराज कहलाते हैं

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, engkau tidak bersenang dalam kenikmatan yang kasar dan rendah. Karena dorongan nafsu engkau tidak melakukan apa pun yang tercela, dan karena loba harta engkau tidak meninggalkan dharma. Oleh kekuatan watak inilah engkau dikenal sebagai ‘Dharma-rāja’.”

Verse 19

दानं च सत्यं च तपश्च राजन्‌ श्रद्धा च बुद्धिश्न क्षमा धृतिश्न । अवाप्य राष्ट्राणि वसूनि भोगा- नेषा परा पार्थ सदा रतिस्ते,“राजन! आपने राज्य, धन और भोगोंको पाकर भी सदा दान, सत्य, तप, श्रद्धा, बुद्धि, क्षमा तथा धृति--इन सदगुणोंसे ही प्रेम किया है

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, sekalipun telah meraih kerajaan, kekayaan, dan kenikmatan, wahai Pārtha, kegembiraanmu yang tertinggi dan tetap selalu tertambat pada kebajikan ini saja—kedermawanan, kebenaran, tapa, keyakinan, kebijaksanaan, pemaafan, dan keteguhan.”

Verse 20

वनमें पाण्डवोंसे श्रीकृष्ण-सत्यभामाका मिलना यदा जनौघ: कुरुजाड्लानां कृष्णां सभायामवशामपश्यत्‌ | अपेतधर्मव्यवहार वृत्तं सहेत तत्‌ पाण्डव कस्त्वदन्य:,'पाण्डुनन्दन! कुरुजांगलदेशकी जनताने द्यूतसभामें द्रौयदीको जिस विवश-अवस्थामें देखा था और उस समय उसके साथ जो पापपूर्ण बर्ताव किया गया था, उसे आपके सिवा दूसरा कौन सह सकता था?

Waiśampāyana berkata: “Ketika khalayak Kurujāṅgala melihat Kṛṣṇā (Draupadī) di balairung, tak berdaya, dan menyaksikan perlakuan yang telah menyimpang dari dharma—perbuatan yang berdosa itu—siapa selain engkau, wahai Pāṇḍava, yang sanggup menanggungnya? Wahai putra Pāṇḍu, siapa lagi selain engkau yang dapat memikul apa yang dilakukan kepadanya di balairung dadu saat ia tampak begitu tak berdaya?”

Verse 21

असंशयं सर्वसमृद्धकाम: क्षिप्रं प्रजा: पालयितासि सम्यक्‌ । इमे वयं निग्रहणे कुरूणां यदि प्रतिज्ञा भवत: समाप्ता,“धर्मराज! अब शीघ्र ही आपके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे और आप राजसिंहासनपर आरूढ़ होकर न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यदि आपकी वनवासविषयक प्रतिज्ञा पूरी हो जाय, तो हम सब लोग आपके विरोधी कौरवोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत हैं!

Waiśampāyana berkata: “Tanpa ragu, segala tujuanmu akan tercapai sepenuhnya. Segera engkau akan naik ke singgasana dan memerintah rakyat dengan adil. Jika ikrarmu tentang tinggal di hutan telah genap, maka kami semua siap bergerak untuk mengekang dan menghukum para Kaurawa yang menentangmu.”

Verse 22

धौम्यं च भीम॑ च युधिष्ठिरं च यमौ च कृष्णां च दशार्हसिंह: । उवाच दिष्ट्या भवतां शिवेन प्राप्त: किरीटी मुदितः कृतास्त्र:,तदनन्तर युदुकुलसिंह भगवान्‌ श्रीकृष्णने धौम्य, युधिष्ठिर भीमसेन, नकुल, सहदेव और द्रौपदीकी ओर देखते हुए कहा--'सौभाग्यकी बात है कि आपलोगोंद्वारा की हुई मंगलकामनासे किरीटधारी अर्जुन अस्त्रविद्याके पारंगत विद्वान्‌ होकर सानन्द लौट आये हैं

Waiśampāyana berkata: Lalu Śrī Kṛṣṇa, singa kaum Daśārha, memandang Dhaumya, Bhīma, Yudhiṣṭhira, kedua saudara kembar, dan Kṛṣṇā (Draupadī), lalu bersabda: “Sungguh mujur—berkat restu dan doa baik kalian semua—Arjuna sang pemakai mahkota telah kembali dengan gembira, setelah menuntaskan ilmu senjata.”

Verse 23

प्रोवाच कृष्णामपि याज्ञसेनीं दशार्हभर्ता सहित: सुहृद्धिः । दिष्टया समग्रासि धनंजयेन समागतेत्येवमुवाच कृष्ण:,इसके बाद दशार्हकुलके स्वामी श्रीकृष्ण, जो अपने सुहृदोंसे घिरे हुए थे, यज्ञसेनकुमारी द्रौपदीसे बोले--“कृष्णे! अर्जुनसे मिलकर तेरी सारी कामना सफल हो गयी, यह बड़े आनन्दकी बात है। तेरे पुत्र बड़े सुशील हैं। धनुर्वेदमें उनका विशेष अनुराग है। वे अपने सुहृदोंसहित सत्पुरुषोंद्वारा आचरित सदाचार और धर्मका पालन करते हैं

Waiśampāyana berkata: Dikelilingi para sahabatnya, Kṛṣṇa—penguasa kaum Dāśārha—berkata kepada Kṛṣṇā (Draupadī), putri Yājñasena: “Berbahagialah engkau, wahai Kṛṣṇā; dengan kedatangan Dhanañjaya engkau menjadi utuh. Pertemuanmu dengannya adalah pertanda mujur.”

Verse 24

कृष्णे धरनुर्वेदरतिप्रधाना- स्तवात्मजास्ते शिशव: सुशीला: । सद्धिः सदैवाचरितं सुहृद्धि- श्वरन्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि,इसके बाद दशार्हकुलके स्वामी श्रीकृष्ण, जो अपने सुहृदोंसे घिरे हुए थे, यज्ञसेनकुमारी द्रौपदीसे बोले--“कृष्णे! अर्जुनसे मिलकर तेरी सारी कामना सफल हो गयी, यह बड़े आनन्दकी बात है। तेरे पुत्र बड़े सुशील हैं। धनुर्वेदमें उनका विशेष अनुराग है। वे अपने सुहृदोंसहित सत्पुरुषोंद्वारा आचरित सदाचार और धर्मका पालन करते हैं

“Wahai Kṛṣṇā! Putra-putramu berbudi halus dan berwatak luhur; kegemaran utama mereka ialah dhanurveda, ilmu memanah. Mereka senantiasa berjalan bersama sahabat, menapaki tata laku baik dan dharma yang dijalankan para bijak, wahai Yājñasenī.”

Verse 25

राज्येन राष्ट्रश्न निमन्त्रयमाणा: पित्रा च कृष्णे तव सोदरैश्न । न यज्ञसेनस्य न मातुलानां गृहेषु बाला रतिमाप्नुवन्ति,“कृष्णे! तुम्हारे पिता और भाइयोंने राज्य तथा राजकीय उपकरणों--यान-वाहन आदिकी सुविधा दिखाकर अनेक बार आमन्त्रित किया, तो भी तुम्हारे बच्चे अपने नाना यज्ञसेन और मामा धृष्टद्युम्न आदिके घरोंमें रहना पसंद नहीं करते हैं--वहाँ उनका मन नहीं लगता है

“Wahai Kṛṣṇā! Walau ayahmu dan saudara-saudaramu berulang kali mengundang mereka—menawarkan kemewahan kuasa kerajaan dan segala sarana negeri—anak-anakmu tidak menemukan kesenangan tinggal di rumah Yājñasena maupun di rumah para paman dari pihak ibu; hati mereka tidak betah di sana.”

Verse 26

आनर्तमेवाभिमुखा: शिवेन गत्वा धरनुर्वेदरतिप्रधाना: । तवात्मजा वृष्णिपुरं प्रविश्य न दैवतेभ्य: स्पृहयन्ति कृष्णे,“कृष्णे! उनका थभरनुर्वेदमें विशेष प्रेम है। वे आनर्त देशमें ही कुशलपूर्वक जाकर वृष्णिपुरी द्वारकामें रहते हैं। वहाँ रहकर उन्हें देवताओंके लोकमें भी जानेकी इच्छा नहीं होती

Waiśampāyana berkata: Putra-putramu, yang kegembiraan utamanya adalah ilmu memanah, berangkat dengan pertanda baik dan menuju langsung ke Ānarṭa. Memasuki kota kaum Vṛṣṇi, mereka menetap di wilayah Kṛṣṇa; dan tinggal di sana, mereka tidak lagi merindukan bahkan alam para dewa, sebab mereka telah puas sepenuhnya dalam perlindungan yang benar dan aman itu.

Verse 27

यथा त्वमेवार्हसि तेषु वृत्तं प्रयोक्तुमार्या च तथैव कुन्ती । तेष्वप्रमादेन तथा करोति तथैव भूयश्व तथा सुभद्रा,“उन बालकोंको तुम सदाचारकी जैसी शिक्षा दे सकती हो, आर्या कुन्ती भी उन्हें जैसा सदाचार सिखा सकती हैं, वैसी शिक्षा देनेकी योग्यता सुभद्रामें भी है। वह बड़ी सावधानीके साथ वैसी ही शिक्षा देकर उन सब बालकोंको सदाचारमें प्रतिष्ठित करती है

Waiśampāyana berkata: “Sebagaimana engkau layak menanamkan tata laku yang benar pada anak-anak itu, demikian pula Kuntī yang mulia layak melakukannya. Dan Subhadrā juga—dengan kewaspadaan tanpa lalai—mengajarkan disiplin yang sama berulang-ulang, meneguhkan mereka semua dalam budi pekerti yang baik.”

Verse 28

यथानिरुद्धस्य यथाभिमन्यो- यथा सुनीथस्य यथैव भानो: । तथा विनेता च गतिश्व कृष्णे तवात्मजानामपि रौक्मिणेय:,“कृष्णे। रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्म जिस प्रकार अनिरुद्ध, अभिमन्यु, सुनीथ और भानुको धनुर्वेदकी शिक्षा देते हैं, उसी प्रकार वे तुम्हारे पुत्रोंके भी शिक्षक और संरक्षक हैं

Waiśampāyana berkata: “Wahai Kṛṣṇe, sebagaimana Raukmineya (Pradyumna) menjadi pelatih dan penuntun bagi Aniruddha, Abhimanyu, Sunītha, dan Bhānu, demikian pula dialah pengajar dan pelindung bagi putra-putramu.”

Verse 29

गदासिचर्मग्रहणेषु शूरा- नस्त्रेषु शिक्षासु रथाश्वयाने । सम्यग्‌ विनेता विनयत्यतन्तद्र- स्तांश्वाभिमन्यु: सततं कुमार:,'शिक्षा देनेमें नीेपूण और आलस्यरहित कुमार अभिमन्यु तुम्हारे शूर-वीर पुत्रोंको गदा और ढाल-तलवारके दाँव-पेंच सिखाते हैं। अन्यान्य अस्त्रोंकी भी शिक्षा देते हैं। साथ ही रथ चलाने और घोड़े हाँकनेकी कला भी सिखाते हैं। वे सदा उनकी शिक्षा-दीक्षामें संलग्न रहते हैं

Waiśampāyana berkata: Pangeran muda Abhimanyu—terlatih baik dan tak pernah bermalas—senantiasa menertibkan serta mengajar putra-putramu yang gagah. Ia mengajarkan cara memegang dan menggunakan gada, pedang, dan perisai; melatih mereka dalam senjata-senjata lain; serta mengajarkan mengemudikan kereta perang dan mengendalikan kuda. Demikianlah ia terus-menerus mencurahkan diri pada pendidikan dan pembentukan mereka.

Verse 30

स चापि सम्यक्‌ प्रणिधाय शिक्षां शस्त्राणि चैषां विधिवत्‌ प्रदाय | तवात्मजानां च तथाभिमन्यो: पराक्रमैस्तुष्यति रौक्मिणेय:,“अस्त्र-शस्त्रोंके प्रयोगकी उत्तम शिक्षा दे उनके लिये उन्होंने विधिपूर्वक नाना प्रकारके शस्त्र भी दे रक्खे हैं। तुम्हारे पुत्रों और अभिमन्युके पराक्रम देखकर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न बहुत संतुष्ट रहते हैं

Waiśampāyana berkata: Setelah menaruh perhatian yang semestinya pada latihan mereka dan menganugerahkan berbagai senjata kepada mereka menurut tata aturan, putra Rukmiṇī (Pradyumna) tetap sangat berkenan, menyaksikan keberanian putra-putramu dan Abhimanyu.

Verse 31

यदा विहारं प्रसमीक्षमाणा: प्रयान्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि । एकैकमेषामनुयान्ति तत्र रथाक्ष यानानि च दन्तिनश्ष,'याज्ञसेनी! तुम्हारे पुत्र जब नगरकी शोभा देखनेके लिये घूमने निकलते हैं, उस समय उनमेंसे प्रत्येकके लिये रथ, घोड़े, हाथी और पालकी आदि सवारियाँ पीछे-पीछे जाती हैं!

Waiśampāyana berkata: “Wahai Yājñasenī, setiap kali putra-putramu keluar untuk menikmati rekreasi dan memandang kemegahan kota, masing-masing diikuti dari belakang oleh rombongan kendaraan yang lengkap—kereta perang dan berbagai tunggangan lain, bahkan gajah—yang mengiringinya.”

Verse 32

अथाब्रवीद्‌ धर्मराजं तु कृष्णो दशार्हयोधा: कुकुरान्धकाश्न । एते निदेशं तव पालयन्त- स्तिष्ठन्तु यत्रेच्छसि तत्र राजन्‌,तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिस्से कहा--“राजन्‌! दशार्ह, कुकुर और अंधकवंशके योद्धा जहाँ आप चाहें, वहीं आपकी आज्ञाका पालन करते हुए खड़े रह सकते हैं

Kemudian Kṛṣṇa berkata kepada Dharmarāja Yudhiṣṭhira: “Wahai Raja, para kesatria dari garis Daśārha, Kukura, dan Andhaka siap menaati perintahmu. Biarkan mereka berjaga di mana pun engkau kehendaki.”

Verse 33

आवर्ततां कार्मुकवेगवाता हलायुधप्रग्रहणा मधूनाम्‌ । सेना तवार्थेषु नरेन्द्र यत्ता ससादिपत्त्यश्वरथा सनागा,“नरेन्द्र! जिसके धनुषका वेग वायुवेगके समान हैं, हल धारण करनेवाले बलरामजी जिसके सेनापति हैं, वह सवारोंसहित हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसे भरी हुई मथुरा- प्रान्तवासी गोपोंकी चतुरंगिणी सेना सदा युद्धके लिये संनद्ध हो आपकी अभीष्ट-सिद्धिके लिये निरन्तर तत्पर रहती है

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, demi kepentinganmu berdiri senantiasa siap sedia bala tentara empat-anggota milik kaum Madhu dari wilayah Mathurā—para pemanahnya secepat angin, dipimpin Baladeva sang Halāyudha—lengkap dengan gajah, kereta, kuda, dan infanteri, selalu bersenjata dan siap perang untuk menunaikan apa yang engkau kehendaki.”

Verse 34

प्रस्थाप्यतां पाण्डव धार्तराष्ट्र: सुयोधन: पापकृतां वरिष्ठ: । स सानुबन्ध: ससुहृद्गण श्न भौमस्य सौभाधिपतेश्व मार्गम्‌,पाण्डुनन्दन! अब आप पापात्माओंके शिरोमणि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको उसके सुहृदों और सम्बन्धियों-लहित उसी मार्गपर भेज दीजिये, जहाँ भौमासुर और शाल्व गये हैं

Waiśampāyana berkata: “Wahai Pāṇḍava, biarkan Suyodhana, putra Dhṛtarāṣṭra—yang terdepan di antara para pelaku dosa—diberangkatkan menempuh jalan yang sama seperti yang ditempuh Bhaumāsura dan penguasa Śaubha, Śālva, bersama para pengikut dan lingkaran sahabatnya.”

Verse 35

काम॑ तथा तिष्ठ नरेन्द्र तस्मिन्‌ यथा कृतस्ते समय: सभायाम्‌ । दाशार्हयोधैस्तु हतारियोध॑ प्रतीक्षतां नागपुरं भवन्तम्‌,“महाराज! आप चाहें तो सभामें जो प्रतिज्ञा आपने की है, उसीके पालनमें लगे रहें। यदि आपकी आज्ञा हो तो यदुवंशी योद्धा आपके समस्त शत्रुओंको मार डालें और हस्तिनापुर नगर आपके शुभागमनकी प्रतीक्षा करता रहे

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, bila engkau menghendaki, tetaplah teguh pada jalan itu, menepati ikrar yang kau ucapkan di balairung sidang. Atau, bila engkau memerintah, biarkan para kesatria Dāśārha (Yādava) menumpas seluruh prajurit musuhmu, sementara kota Nāgapura (Hastināpura) menanti kepulanganmu yang membawa berkah.”

Verse 36

व्यपेतमन्युर्व्यपनीतपाप्मा विहृत्य यत्रेच्छसि तत्र कामम्‌ | ततः: प्रसिद्ध प्रथमं विशोक: प्रपत्स्यसे नागपुरं सुराष्ट्रम,“राजन! आप क्रोध, दीनता और दुःखसे दूर रहकर जहाँ-जहाँ आपकी इच्छा हो वहाँ- वहाँ घूम लीजिये। तत्पश्चात्‌ शोकरहित हो अपनी प्रसिद्ध और उत्तम राजधानी हस्तिनापुरमें प्रवेश कीजियेगा”

Wahai Raja! Setelah amarah sirna dan noda dosa tersingkir, mengembaralah dengan bebas ke mana pun hatimu berkehendak. Sesudah itu, tanpa duka dan sebagai yang utama, masuklah ke kota rajamu yang termasyhur—Nāgapura/Hastināpura—yang mulia.

Verse 37

ततस्तदाज्ञाय मतं महात्मा यथाददुक्तं पुरुषोत्तमेन । प्रशस्य विप्रेक्ष्य च धर्मराज: कृताञ्जलि: केशवमित्युवाच,पुरुषोत्तम भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपना मत अच्छी तरह व्यक्त कर दिया था। उसे जानकर महात्मा धर्मराजने भगवान्‌ केशवकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और हाथ जोड़कर उनकी ओर देखते हुए कहा--

Lalu, setelah memahami maksud itu sebagaimana telah diucapkan oleh Puruṣottama, Dharmarāja yang berhati agung memuji Keśava dengan sangat. Dengan kedua telapak tangan dirapatkan, menatap beliau, ia pun berkata.

Verse 38

असंशयं केशव पाण्डवानां भवान्‌ गतिस्त्वच्छरणा हि पार्था: | कालोदये तच्च ततश्व भूयः कर्ता भवान्‌ कर्म न संशयोडस्ति,“केशव! इसमें संदेह नहीं कि आप ही पाण्डवोंके अवलम्ब हैं। कुन्तीके हम सभी पुत्र आपकी ही शरणमें हैं। जब समय आयेगा, तब आप पुनः अपने इस कथनके अनुसार सब कार्य करेंगे, इसमें संदेह नहीं है

Wahai Keśava! Tiada keraguan: engkaulah tumpuan dan perlindungan Pāṇḍava; kami, putra-putra Kuntī, berlindung hanya padamu. Ketika saatnya tiba, engkau akan kembali menunaikan apa yang telah kau janjikan dan menyelesaikan tugas yang harus terjadi—tanpa ragu.

Verse 39

यथाप्रतिज्ञं विहतश्ष॒ काल: सर्वा: समा द्वादश निर्जनेषु । अज्ञातचर्या विधिवत्‌ समाप्य भवद्गता: केशव पाण्डवेया:,“भगवन्‌! हमने अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार बारह वर्षोका सारा समय निर्जन वनोंमें घूमकर बिता दिया है। अब अज्ञातवासकी अवधि भी विधिपूर्वक पूर्ण कर लेनेपर हम समस्त पाण्डव आपकी आज्ञाके अधीन हो जायूँगे। नाथ! आपकी भी बुद्धि सदा ऐसी ही बनी रहे। ये पाण्डव सदा सत्यके पालनमें संलग्न रहे हैं। प्रभो! दान-धर्मसे युक्त हम सभी कुन्तीपुत्र सेवक, परिजन, स्त्री, पुत्र तथा बन्धु-बान्धवोंसहित केवल आपकी ही शरणमें हैं!

Wahai Keśava! Sesuai ikrar, dua belas tahun telah berlalu di rimba yang sunyi. Setelah masa hidup tanpa dikenali diselesaikan dengan semestinya, para putra Pāṇḍu kini datang kepadamu dan menempatkan diri di bawah perintahmu.

Verse 40

एषैव बुद्धिर्जुषतां सदा त्वां सत्ये स्थिता: केशव पाण्डवेया: । सदानधर्मा: सजना: सदारा: सबान्धवास्त्वच्छरणा हि पार्था:,“भगवन्‌! हमने अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार बारह वर्षोका सारा समय निर्जन वनोंमें घूमकर बिता दिया है। अब अज्ञातवासकी अवधि भी विधिपूर्वक पूर्ण कर लेनेपर हम समस्त पाण्डव आपकी आज्ञाके अधीन हो जायूँगे। नाथ! आपकी भी बुद्धि सदा ऐसी ही बनी रहे। ये पाण्डव सदा सत्यके पालनमें संलग्न रहे हैं। प्रभो! दान-धर्मसे युक्त हम सभी कुन्तीपुत्र सेवक, परिजन, स्त्री, पुत्र तथा बन्धु-बान्धवोंसहित केवल आपकी ही शरणमें हैं!

Wahai Bhagavān! Semoga ketetapan budi ini senantiasa bersemayam dalam dirimu. Wahai Keśava! Para Pāṇḍava teguh dalam kebenaran. Senantiasa tekun dalam dana dan dharma, berbudi baik; beserta istri-istri dan seluruh sanak-keluarga, para Pārtha—putra-putra Pṛthā—berlindung hanya padamu.

Verse 41

वैशम्पायन उवाच तथा वदति वार्ष्णेये धर्मराजे च भारत । अथ पश्चात्‌ तपोवृद्धों बहुवर्षमहस्रधूकू

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Bhārata, ketika Vārṣṇeya (Kṛṣṇa) berbicara demikian dan Dharmarāja (Yudhiṣṭhira) mendengarkan, kemudian tampaklah seorang yang dibesarkan oleh tapa—yang telah menanggung dan menjalankan tapa selama beribu-ribu tahun.”

Verse 42

प्रत्यदृश्यत धर्मात्मा मार्कण्डेयो महातपा: । अजरश्नामरश्नरैव रूपौदार्यगुणान्वित:

Kemudian tampaklah resi Mārkaṇḍeya yang berhati dharma, seorang pertapa agung—tak menua dan tak fana, dianugerahi keelokan mulia serta kebajikan yang utama.

Verse 43

व्यदृश्यत तथा युक्तो यथा स्यात्‌ पजचविंशक: । वैशम्पायनजी कहते हैं--भारत! भगवान्‌ श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर जब इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय अनेक सहसख्र वर्षोकी अवस्थावाले तपोवृद्ध धर्मात्मा महातपस्वी मार्कण्डेय मुनि आते दिखायी दिये। वे रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा अजर-अमर थे। वैसे बड़े-बूढ़े होनेपर भी वे ऐसे दिखायी दे रहे थे, मानो पच्चीस वर्षकी अवस्थाके तरुण हों ।। तमागतमृषिं वृद्ध बहुवर्षमहस्रिणम्‌

Ia tampak sepadan seperti seorang pemuda berusia dua puluh lima tahun; namun dialah resi tua yang baru tiba itu, yang telah matang oleh beban ribuan tahun.

Verse 44

आनर्चुब्रद्विणा: सर्वे कृष्णश्च॒ सह पाण्डवै: । तमर्चितं सुविश्वस्तमासीनमृषिसत्तमम्‌ | ब्राह्मणानां मतेनाह पाण्डवानां च केशव:

Lalu semua brāhmaṇa, dan Kṛṣṇa bersama para Pāṇḍava, memuja resi utama itu dengan hormat. Setelah dihormati sebagaimana mestinya dan duduk tenteram dalam kepercayaan mereka, Keśava pun berbicara menurut pertimbangan para brāhmaṇa dan para Pāṇḍava.

Verse 45

हजारों वर्षोकी अवस्थावाले उन वृद्ध महर्षिके पधारनेपर पाण्डवोंसहित भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा समस्त ब्राह्मणोंने उनका पूजन किया। पूजित होनेपर जब वे अत्यन्त विश्वास करनेयोग्य मुनिश्रेष्ठ आसनपर विराजमान हो गये, तब वहाँ आये हुए ब्राह्मणों और पाण्डवोंकी सम्मतिसे भगवान्‌ श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा ।। श्रीकृष्ण उवाच शुश्रूषव: पाण्डवास्ते ब्राह्मणाश्व समागता: । द्रौपदी सत्यभामा च तथाहं परमं वच:,श्रीकृष्ण बोले--मार्कण्डेयजी! आपके उपदेश सुननेकी इच्छासे यहाँ पाण्डवोंके साथ-साथ बहुत-से ब्राह्मण भी पधारे हुए हैं। द्रौपदी, सत्यभामा तथा मैं, सब लोग आपकी उत्तम वाणीका रसास्वादन करना चाहते हैं। आप प्राचीनकालके नरेशों, नारियों तथा महर्षियोंकी पुरातन पुण्य कथाएँ सुनाइये और हमलोगोंसे सनातन सदाचारका वर्णन कीजिये

Śrī Kṛṣṇa berkata: “Wahai Mārkaṇḍeya, para Pāṇḍava datang dengan hasrat untuk mendengarkan ajaranmu, dan banyak brāhmaṇa pun telah berkumpul di sini. Draupadī, Satyabhāmā, dan aku juga ingin mengecap kemuliaan tuturmu. Kisahkanlah kepada kami riwayat suci masa lampau—tentang raja-raja, para wanita mulia, dan para maharsi—serta jelaskanlah tata laku benar yang abadi.”

Verse 46

पुरावृत्ता: कथा: पुण्या: सदाचारान्‌ सनातनान्‌ | राज्ञां सत्रीणामृषीणां च मार्कण्डेय विचक्ष्व न:,श्रीकृष्ण बोले--मार्कण्डेयजी! आपके उपदेश सुननेकी इच्छासे यहाँ पाण्डवोंके साथ-साथ बहुत-से ब्राह्मण भी पधारे हुए हैं। द्रौपदी, सत्यभामा तथा मैं, सब लोग आपकी उत्तम वाणीका रसास्वादन करना चाहते हैं। आप प्राचीनकालके नरेशों, नारियों तथा महर्षियोंकी पुरातन पुण्य कथाएँ सुनाइये और हमलोगोंसे सनातन सदाचारका वर्णन कीजिये

Śrī Kṛṣṇa berkata: “Wahai Mārkaṇḍeya, tuturkan kepada kami kisah-kisah suci masa lampau—tentang para raja, perempuan-perempuan mulia yang setia pada dharma, dan para resi—serta jelaskan tuntunan perilaku benar yang abadi. Melalui kisah teladan itu kami ingin memahami jalan dharma yang kekal.”

Verse 47

वैशम्पायन उवाच तेषु तत्रोपविष्टेषु देवर्षिरपि नारद: । आजगाम विशुद्धात्मा पाण्डवानवलोकक:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! वे सब लोग वहाँ बैठे ही थे कि विशुद्ध अन्तःकरणवाले देवर्षि नारद भी पाण्डवोंसे मिलनेके लिये वहाँ आये

Vaiśampāyana berkata: Ketika mereka semua sedang duduk di sana, datang pula dewa-resi Nārada, suci jiwanya, untuk menjenguk para Pāṇḍava.

Verse 48

तमप्यथ महात्मानं सर्वे ते पुरुषर्षभा: । पाद्यार््यभ्यां यथान्यायमुपतस्थूर्मनीषिण:,तब उन सभी श्रेष्ठ मनीषी पुरुषोंने उन महात्मा नारदजीको भी पाद्य आदि देकर उनका यथायोग्य सत्कार किया

Kemudian para tokoh utama itu—bijak dan menjunjung tata krama—menghampiri Nārada yang berhati luhur, dan sesuai adat menghormatinya dengan mempersembahkan air pembasuh kaki serta arghya.

Verse 49

] | (((2: ६ नारदस्त्वथ देवर्षिज्ञात्वा तांस्तु कृतक्षणान्‌ । मार्कण्डेयस्य वदतस्तां कथामन्वमोदत,तब देवर्षि नारदने उन सबको कथा सुननेके लिये अवसर निकालकर तैयार हुआ जान वक्ता मार्कण्डेय मुनिकी उस कथा सुननेके विचारका अनुमोदन किया

Lalu dewa-resi Nārada, mengetahui bahwa mereka telah menyiapkan waktu luang dan siap mendengarkan, menyetujui kisah yang disampaikan oleh resi Mārkaṇḍeya.

Verse 50

उवाच चैनं कालज्ञ: स्मयन्निव सनातन: । ब्रह्में कथ्यतां यत्‌ ते पाण्डवेषु विवक्षितम्‌,उस समय उपर्युक्त अवसरके ज्ञाता सनातन भगवान्‌ श्रीकृष्णने मार्कण्डेयजीसे मुसकराते हुए कहा--“'महर्ष!ी आप पाण्डवोंसे जो कुछ कहना चाहते थे, वह कहिये”

Saat itu Śrī Kṛṣṇa, Sang Abadi yang mengetahui saat yang tepat, berkata kepadanya sambil tersenyum lembut: “Wahai resi Brahmana, katakanlah apa pun yang hendak engkau sampaikan mengenai para Pāṇḍava.”

Verse 51

एवमुक्त: प्रत्युवाच मार्कण्डेयो महातपा: । क्षणं कुरुध्वं विपुलमाख्यातव्यं भविष्यति,उनके ऐसा कहनेपर महातपस्वी मार्कण्डेय मुनिने कहा--'पाण्डवो! तुम सब लोग क्षणभरके लिये चुप हो जाओ; क्योंकि मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है”

Mendengar demikian, resi agung Mārkaṇḍeya menjawab: “Wahai para Pāṇḍava, diamlah sejenak; sebab banyak hal harus kukisahkan kepadamu dengan panjang lebar.”

Verse 52

एवमुक्ता: क्षणं चक्कु: पाण्डवा: सह तैर्दविजै: | मध्यन्दिने यथा55दित्यं प्रेक्षन्तस्ते महामुनिम्‌,उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर उन ब्राह्मणोंसहित पाण्डव मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी उन महामुनिको देखते हुए उनके वक्तव्यको सुननेके लिये चुप हो गये

Mendengar perintah itu, para Pāṇḍava bersama para brāhmaṇa pun terdiam sejenak. Menatap mahāmuni yang bercahaya laksana matahari tengah hari, mereka hening, siap menyimak sabdanya.

Verse 53

वैशम्पायन उवाच तं॑ विवक्षन्तमालक्ष्य कुरुगाजो महामुनिम्‌ | कथासंजननार्थाय चोदयामास पाण्डव:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महामुनि मार्कण्डेयजीको बोलनेके लिये उद्यत देख कुरुराज पाण्बुपुत्र युधिष्ठिरने कथा प्रारम्भ करनेके लिये इस प्रकार प्रेरित किया --

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya, melihat sang mahāmuni bersiap untuk bertutur, raja Kuru, Pāṇḍava Yudhiṣṭhira, mendorongnya demikian agar kisah pun bermula.”

Verse 54

भवान्‌ दैवतदैत्यानामृषीणां च महात्मनाम्‌ | राजर्षीणां च सर्वेषां चरितज्ञ: पुरातन:,“महामुने! आप देवताओं, दैत्यों, ऋषियों, महात्माओं तथा समस्त राजर्षियोंके चरित्रोंको जाननेवाले प्राचीन महर्षि हैं

“Wahai Mahāmuni, engkau adalah resi purba yang mengetahui laku dan riwayat para dewa, para Dānava, para ṛṣi, para mahātmā, dan seluruh rājaṛṣi.”

Verse 55

सेव्यश्नोपासतिव्यश्ष मतो न: कड्क्षितश्चिरम्‌ अयं च देवकीपुत्र: प्राप्तोडः्मानवलोकक:,“हमारे मनमें दीर्घकालसे यह इच्छा थी कि हमें आपकी ये सेवा और सत्संगका शुभ अवसर मिले। ये देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी हमसे मिलनेके लिये यहाँ पधारे हैं

“Sejak lama kami merindukan kesempatan suci untuk melayani dan bersatsang denganmu. Dan kini putra Devakī, Śrī Kṛṣṇa sendiri, telah datang kemari untuk menemui kami.”

Verse 56

भवत्येव हि मे बुद्धिर्दष्टवा55त्मानं सुखाच्च्युतम्‌ धारीराष्टरं श्र दुर्वत्तानृध्यतः प्रेक्ष्य सर्वश:,“ब्रह्म! जब मैं अपनेको सुखसे वज्चित पाता हूँ और दुराचारी धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सब प्रकारसे समृद्धिशाली होते देखता हूँ, तब स्वभावतः ही मेरे मनमें एक विचार उठता है

Ketika aku melihat diriku terlepas dari kebahagiaan, dan menyaksikan putra-putra Dhṛtarāṣṭra yang berperangai buruk itu makmur dalam segala hal, maka dengan sendirinya timbul suatu pikiran di dalam benakku.

Verse 57

कर्मण: पुरुष: कर्ता शुभस्याप्यशुभस्य वा । स फलं तदुपाश्नाति कथं कर्ता स्विदीश्वर:,“मैं सोचता हूँ, शुभ और अशुभ कर्म करनेवाला जो पुरुष है, वह अपने उन कर्मोंका फल कैसे भोगता है तथा ईश्वर उन कर्मफलोंका रचयिता कैसे होता है? ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर! सुख और दु:खकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोमें मनुष्योंकी प्रवृत्ति कैसे होती है? मनुष्यका किया कर्म इस लोकमें ही उसका अनुसरण करता है अथवा पारलौकिक शरीरमें भी

Manusialah pelaku perbuatan, baik yang baik maupun yang buruk, dan ia sendiri menikmati buahnya. Lalu bagaimana Tuhan dapat disebut pelaku? Wahai yang terbaik di antara para pengenal Brahman, bagaimana manusia terdorong melakukan perbuatan yang mendatangkan suka dan duka? Apakah perbuatan yang dilakukan di sini hanya mengikuti di dunia ini, ataukah menyertai pula ke tubuh yang diambil di kelahiran berikutnya?

Verse 58

कुतो वा सुखदु:खेषु नृणां ब्रह्म॒विदां वर । इह वा कृतमन्वेति परदेहेडथ वा पुन:,“मैं सोचता हूँ, शुभ और अशुभ कर्म करनेवाला जो पुरुष है, वह अपने उन कर्मोंका फल कैसे भोगता है तथा ईश्वर उन कर्मफलोंका रचयिता कैसे होता है? ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर! सुख और दु:खकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोमें मनुष्योंकी प्रवृत्ति कैसे होती है? मनुष्यका किया कर्म इस लोकमें ही उसका अनुसरण करता है अथवा पारलौकिक शरीरमें भी

Wahai yang terbaik di antara para pengenal Brahman, dari sumber apakah suka dan duka timbul bagi manusia? Apakah perbuatan yang dilakukan di sini mengikuti seseorang hanya di dunia ini, ataukah mengejarnya kembali dalam tubuh yang lain juga?

Verse 59

देही च देहं संत्यज्य मृग्यमाण: शुभाशुभै: । कथं संयुज्यते प्रेत्य इह वा द्विजसत्तम,'द्विजश्रेष्ठ देहधारी जीव अपने शरीरका त्याग करके जब परलोकमें चला जाता है, तब उसके शुभ और अशुभ कर्म उसको कैसे प्राप्त करते हैं और इहलोक और परलोकमें जीवका उन कर्मोंके फलसे किस प्रकार संयोग होता है?

Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, ketika jiwa yang berjasad meninggalkan tubuh dan pergi ke alam berikut—seakan dikejar oleh perbuatan baik dan buruknya—bagaimana tindakan-tindakan itu menjangkaunya? Dan di dunia ini maupun di dunia sana, dengan cara bagaimana makhluk hidup terhubung dengan buah dari perbuatannya?

Verse 60

ऐहलौकिकमेवेह उताहो पारलौकिकम्‌ | क्व च कर्माणि तिष्ठन्ति जन्तो: प्रेतस्य भार्गव,'भृगुनन्दन! कर्मोका फल इसी लोकमें प्राप्त होता है या परलोकमें? प्राणीकी मृत्यु हो जानेपर उसके कर्म कहाँ रहते हैं?

Wahai Bhārgava, kesayangan kaum Bhṛgu, apakah buah perbuatan diterima di dunia ini saja, atau di alam seberang? Dan ketika makhluk telah mati dan menjadi arwah yang berangkat, di manakah perbuatannya berdiam?

Verse 61

मार्कण्डेय उवाच त्वद्युक्तोडयमनुप्रश्नो यथावद्‌ वदतां वर । विदितं वेदितव्यं ते स्थित्यर्थ त्वं तु पृष्छसि,मार्कण्डेयजी बोले--वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुम्हारा यह प्रश्न यथार्थ और युक्तिसंगत है। तुम्हें जाननेयोग्य सभी बातोंका ज्ञान है, तो भी तुम केवल लोक-मर्यादाकी रक्षाके लिये यह प्रश्न उपस्थित करते हो

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, yang terbaik di antara para penutur, pertanyaan lanjutanmu ini tepat dan tersusun dengan benar. Segala yang patut diketahui telah engkau ketahui; namun engkau tetap menanyakannya demi menegakkan tatanan yang benar dan menjaga kepatutan umum—agar dharma berdiri teguh di dunia.”

Verse 62

अत्र ते कथयिष्यामि तदिहैकमना: शृणु । यथेहामुत्र च नर: सुखदुःखमुपाश्चुते,मनुष्य इहलोक या परलोकमें जिस प्रकार सुख और दुःख भोगता है, इसके विषयमें तुम्हें अपना विचार बताऊँगा। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो

Sekarang akan kujelaskan kepadamu—dengarkan dengan pikiran yang terpusat. Akan kukatakan bagaimana seseorang, baik di dunia ini maupun di alam sesudahnya, mengalami suka dan duka—bagaimana akibat itu ditemui sebagai buah perbuatannya.

Verse 63

निर्मलानि शरीराणि विशुद्धानि शरीरिणाम्‌ । ससर्ज धर्मतन्त्राणि पूर्वोत्पन्न: प्रजापति:

Mārkaṇḍeya berkata: “Bagi makhluk yang berjasad, Prajāpati—yang muncul paling awal—menciptakan tubuh-tubuh yang tak bernoda dan suci; dan ia pun menegakkan tatanan dharma, kerangka aturan yang mengatur laku benar dan hukum kosmis.”

Verse 64

सर्वप्रथम प्रजापति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। उन्होंने जीवोंके लिये निर्मल तथा विशुद्ध शरीर बनाये। साथ ही धर्मका ज्ञान करानेवाले धर्मशास्त्रोंको प्रकट किया ।। अमोघफलसंकल्पा: सुव्रता: सत्यवादिन: । ब्रह्मभूता नरा: पुण्या: पुराणा: कुरुसत्तम,उस समयके सब मनुष्य उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा सत्यवादी थे। उनका अभीष्ट फलविषयक संकल्प कभी व्यर्थ नहीं होता था। कुरुश्रेष्ठ) वे सभी मनुष्य ब्रह्मस्वरूप, पुण्यात्मा और चिरजीवी थे

Mārkaṇḍeya berkata: “Pada permulaan, Prajāpati Brahmā muncul. Demi kesejahteraan makhluk hidup, ia membentuk tubuh-tubuh yang murni dan tak bernoda, serta menampakkan Dharma-śāstra yang mengajarkan pengetahuan tentang kebenaran. Pada zaman purba itu, wahai yang terbaik di antara para Kuru, semua manusia teguh dalam laku tapa dan ikrar yang luhur serta berkata benar. Niat mereka untuk meraih buah yang mulia tak pernah meleset; mereka bagaikan Brahman, berhati suci, dan berumur panjang.”

Verse 65

सर्वे देवै: समायान्ति स्वच्छन्देन नभस्तलम्‌ | ततश्न पुनरायान्ति सर्वे स्वच्छन्दचारिण:,सभी स्वच्छन्दतापूर्वक आकाशमार्गसे उड़कर देवताओंसे मिलने जाते और स्वच्छन्दचारी होनेके कारण इच्छा होते ही पुनः वहाँसे लौट आते थे। वे अपनी इच्छा होनेपर ही मरते और इच्छाके अनुसार ही जीवित रहते थे। स्वतन्त्रतापूर्वक सर्वत्र विचरण करते थे। उनके मार्ममें बाधाएँ बहुत कम आती थीं। उन्हें कोई भय नहीं होता था। वे उपद्रवशून्य तथा पूर्णकाम थे

Mārkaṇḍeya berkata: “Mereka semua, sesuka hati, menempuh jalan langit untuk menemui para dewa; lalu, karena bebas bergerak, mereka kembali lagi kapan pun mereka menghendaki. Hidup mereka dituntun oleh pilihan, bukan paksaan—melangkah ke mana saja tanpa belenggu, jarang menemui rintangan, tak tersentuh rasa takut, bebas dari gangguan, dan terpenuhi segala hasratnya.”

Verse 66

स्वच्छन्दमरणा श्चासन्‌ नरा: स्वच्छन्दचारिण: । अल्पबाधा निरातज्ठा: सिद्धार्था निरुपद्रवा:,सभी स्वच्छन्दतापूर्वक आकाशमार्गसे उड़कर देवताओंसे मिलने जाते और स्वच्छन्दचारी होनेके कारण इच्छा होते ही पुनः वहाँसे लौट आते थे। वे अपनी इच्छा होनेपर ही मरते और इच्छाके अनुसार ही जीवित रहते थे। स्वतन्त्रतापूर्वक सर्वत्र विचरण करते थे। उनके मार्ममें बाधाएँ बहुत कम आती थीं। उन्हें कोई भय नहीं होता था। वे उपद्रवशून्य तथा पूर्णकाम थे

Pada zaman itu manusia hidup sebagai pengembara yang merdeka, bergerak menurut kehendak sendiri. Mereka menemui kematian hanya ketika memilihnya, dan hidup selama yang mereka inginkan. Dengan sedikit penderitaan dan tanpa rasa takut, tujuan mereka terpenuhi dan mereka tak tersentuh oleh gangguan.

Verse 67

द्रष्टारो देवसड्घानामृषीणां च महात्मनाम्‌ | प्रत्यक्षा: सर्वधधर्माणां दान्ता विगतमत्सरा:,देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंके समुदायका उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन होता था। वे सभी धर्मोको प्रत्यक्ष करनेवाले, जितेन्द्रिय तथा ईष्यासि रहित होते थे

Mereka adalah para pelihat yang menyaksikan langsung perhimpunan para dewa dan para resi agung. Segala dharma tampak nyata di hadapan mereka; mereka mengekang indria dan bebas dari iri hati.

Verse 68

आसन्‌ वर्षसहस्त्रीयास्तथा पुत्रसहस्रिण: | उनकी आयु हजारों वर्षोकी होती थी और वे हजार-हजार पुत्र उत्पन्न करते थे ।। ६७ $ई || ततः कालान्तरे<न्यस्मिन्‌ पथिवीतलचारिण:,तदनन्तर कुछ कालके पश्चात्‌ भूतलपर विचरनेवाले मनुष्य काम और क्रोधके वशीभूत हो गये। वे छल-कपट और दम्भसे जीविका चलाने लगे। उनके मनको लोभ और मोहने दबा लिया। इन दोषोंके कारण उन्हें इच्छा न होते हुए भी अपना शरीर त्यागनेके लिये विवश होना पड़ा

Umur mereka mencapai ribuan tahun, dan mereka memperanakkan ribuan putra. Namun setelah berlalu masa yang panjang, keadaan manusia yang hidup di muka bumi mulai berubah.

Verse 69

कामक्रोधाभिभूतास्ते मायाव्याजोपजीविन: । लोभमोहाभिकभूताश्ष त्यक्ता देहैस्ततो नरा:,तदनन्तर कुछ कालके पश्चात्‌ भूतलपर विचरनेवाले मनुष्य काम और क्रोधके वशीभूत हो गये। वे छल-कपट और दम्भसे जीविका चलाने लगे। उनके मनको लोभ और मोहने दबा लिया। इन दोषोंके कारण उन्हें इच्छा न होते हुए भी अपना शरीर त्यागनेके लिये विवश होना पड़ा

Sesudah itu, manusia dikuasai nafsu dan amarah. Mereka mencari nafkah melalui tipu daya, kelicikan, dan kepura-puraan; keserakahan serta delusi menindih batin mereka. Karena cela-cela itu, mereka terpaksa meninggalkan tubuh—meski tidak menghendakinya.

Verse 70

अशुभै: कर्मभि: पापास्तिर्यड्निरयगामिन: । संसारेषु विचित्रेषु पच्यमाना: पुनःपुन:,वे पापपरायण हो अपने अशुभ कर्मोंके फलस्वरूप पशु-पक्षी आदिकी योनियोंमें जाने और नरकमें गिरने लगे। विचित्र सांसारिक योनियोंमें बारंबार जन्म लेकर दुःखसे संतप्त होने लगे

Menjadi pendosa karena perbuatan yang tidak suci, mereka—oleh buah karma itu—jatuh ke kelahiran tiryak (binatang dan burung) dan juga ke neraka. Dalam ragam kelahiran samsara yang beraneka, mereka matang dalam derita, berulang kali.

Verse 71

मोघेष्टा मोघसंकल्पा मोघज्ञाना विचेतस: । सर्वाभिशड्किनश्वैव संवृत्ता: क्लेशदायिन:,उनकी कामनाएँ, उनके संकल्प और उनके ज्ञान सभी निष्फल थे। उनकी स्मरण-शक्ति क्षीण हो गयी थी। वे सभी परस्पर संदेह करते हुए एक-दूसरेके लिये क्लेशदायक बन गये

Upaya mereka menjadi sia-sia, tekad mereka tak berbuah, bahkan pengetahuan mereka pun mandul. Batin mereka goyah dan daya ingat merosot. Saling mencurigai dalam segala hal, mereka berubah menjadi sumber derita bagi satu sama lain.

Verse 72

अशुभै: कर्मभिश्चापि प्रायश: परिचिद्विता: । दौष्कुल्या व्याधिबहुला दुरात्मानो5प्रतापिन:,उनके शरीरमें प्रायः उनके अशुभ कर्मोंके चिह्न (कोढ़ आदि) प्रकट होने लगे। कोई अधम कुलमें जन्म लेते, कोई बहुत-से रोगोंके शिकार बने रहते और कोई दुष्ट स्वभावके हो जाते थे। उनमेंसे कोई भी प्रतापी नहीं होता था

Mereka pada umumnya ditandai oleh jejak perbuatan buruk—di tubuh muncul tanda-tanda seperti kusta dan penyakit lain. Ada yang lahir dalam keluarga hina, ada yang terus-menerus didera banyak penyakit, dan ada yang menjadi berhati jahat. Tak seorang pun di antara mereka memiliki wibawa dan keperkasaan.

Verse 73

भवन्त्यल्पायुष: पापा रौद्रकर्मफलोदया: । नाथन्त: सर्वकामानां नास्तिका भिन्नचेतस:,इस प्रकार पापकर्मामें प्रवृत्त होनेवाले पापियोंकी आयु उनके कर्मानुसार बहुत कम हो गयी। उनके पापकर्मोंके भयंकर फल प्रकट होने लगे। वे अपनी सभी अभीष्ट वस्तुओंके लिये दूसरोंके सामने हाथ फैलाकर याचना करने लगे। कितने ही नास्तिक और विचलितचित्त हो गये

Demikianlah para pendosa yang tenggelam dalam perbuatan jahat menjadi berumur pendek sesuai dengan karmanya. Buah mengerikan dari tindakan keji mereka mulai tampak. Demi setiap keinginan, mereka mengulurkan tangan memohon sandaran pada orang lain. Banyak yang menjadi ingkar, dan banyak pula yang pikirannya terpecah serta gelisah.

Verse 74

जन्तो: प्रेतस्प कौन्तेय गति: स्वैरिह कर्मभि: । प्राज्ञस्थ हीनबुद्धेश्न कर्मकोश: क्व तिष्ठति,कुन्तीनन्दन! इस संसारमें मृत्युके पश्चात्‌ जीवकी गति उनके अपने-अपने कर्मोंके अनुसार ही होती है। परंतु मरनेके बाद ज्ञानी और अज्ञानीकी कर्मराशि कहाँ रहती है? कहाँ रहकर वह पुण्य अथवा पापका फल भोगता है? इस दृष्टिसे जो तुमने प्रश्न किया है, उसके उत्तरमें मैं सिद्धान्त बता रहा हूँ, सुनो

Wahai putra Kuntī, sesudah kematian, perjalanan makhluk ditentukan oleh perbuatannya sendiri. Namun setelah seseorang wafat—baik ia bijak maupun dungu—di manakah timbunan karmanya berdiam, dan dari landasan apa ia mengalami buah kebajikan dan dosa? Karena engkau bertanya dari sudut pandang itu, akan kukemukakan ajaran yang telah ditetapkan; dengarkanlah.

Verse 75

क्वस्थस्तत्‌ समुपाश्चाति सुकृतं यदि वेतरत्‌ । इति ते दर्शनं यच्च तत्राप्यनुनयं शृणु,कुन्तीनन्दन! इस संसारमें मृत्युके पश्चात्‌ जीवकी गति उनके अपने-अपने कर्मोंके अनुसार ही होती है। परंतु मरनेके बाद ज्ञानी और अज्ञानीकी कर्मराशि कहाँ रहती है? कहाँ रहकर वह पुण्य अथवा पापका फल भोगता है? इस दृष्टिसे जो तुमने प्रश्न किया है, उसके उत्तरमें मैं सिद्धान्त बता रहा हूँ, सुनो

Di manakah ia berdiam dan mengalami hasil—kebajikan atau kebalikannya? Karena dari sudut pandang itulah engkau bertanya, dengarkan pula kesimpulan yang telah ditetapkan mengenai hal itu, wahai putra Kuntī.

Verse 76

अयमादिशरीरेण देवसूष्टेन मानव: । शुभानामशुभानां च कुरुते संचयं महत्‌,यह मनुष्य ईश्वरके रचे हुए पूर्वशरीरके द्वारा (अन्तःकरणमें) शुभ और अशुभ कर्मोंकी बहुत बड़ी राशि संचित कर लेता है। फिर आयु पूरी होनेपर वह इस जरा-जर्जर स्थूल शरीरका त्याग करके उसी क्षण किसी दूसरी योनि (शरीर)-में प्रकट होता है। एक शरीरको छोड़ने और दूसरेको ग्रहण करनेके बीचमें क्षणभरके लिये भी वह असंसारी नहीं होता

Melalui tubuh asal yang dibentuk oleh Sang Dewa, manusia menimbun simpanan besar perbuatan baik dan buruk; dan batin itulah yang sarat pahala dan dosa, membentuk penjelmaan berikutnya beserta akibat moral yang mengikutinya.

Verse 77

आयुषोबचन्ते प्रहायेदं क्षीणप्रायं कलेवरम्‌ | सम्भवत्येव युगपद्‌ योनौ नास्त्यन्तराभव:,यह मनुष्य ईश्वरके रचे हुए पूर्वशरीरके द्वारा (अन्तःकरणमें) शुभ और अशुभ कर्मोंकी बहुत बड़ी राशि संचित कर लेता है। फिर आयु पूरी होनेपर वह इस जरा-जर्जर स्थूल शरीरका त्याग करके उसी क्षण किसी दूसरी योनि (शरीर)-में प्रकट होता है। एक शरीरको छोड़ने और दूसरेको ग्रहण करनेके बीचमें क्षणभरके लिये भी वह असंसारी नहीं होता

Ketika jatah umur telah habis, tubuh ini—yang hampir lapuk—ditinggalkan; dan pada saat yang sama juga terjadi kelahiran dalam rahim lain (penjelmaan lain): tidak ada keadaan perantara di antaranya.

Verse 78

तत्रास्य स्वकृतं कर्म छायेवानुगतं सदा । फलत्यथ सुखाहें वा दुःखाहों वाथ जायते,वहाँ दूसरे स्थूल शरीरमें उसके पूर्वजन्मका किया हुआ कर्म छायाकी भाँति सदा उसके पीछे लगा रहता और यथासमय अपना फल देता है। इसलिये जीव सुख अथवा दुःख भोगनेके योग्य होकर जन्म लेता है। यमराजके विधान (पुण्य और पापके फल-भोग)-में नियुक्त हुआ जीव अपने शुभ अथवा अशुभ लक्षणोंद्वारा अपनेको मिले हुए सुख अथवा दुःखका निवारण करनेमें असमर्थ है। यह बात ज्ञान-दृष्टिवाले महात्मा पुरुषोंद्वारा देखी जाती है

Di sana, dalam keadaan berjasad yang baru, perbuatan yang dilakukannya sendiri selalu mengikutinya bagaikan bayangan dan, pada waktunya, berbuah. Karena itu makhluk hidup terlahir layak mengalami kebahagiaan atau penderitaan.

Verse 79

कृतान्तविधिसंयुक्त: स जन्तुर्लक्षणै: शुभै: । अशुभेर्वा निरादानो लक्ष्यते ज्ञानदृष्टिभि:,वहाँ दूसरे स्थूल शरीरमें उसके पूर्वजन्मका किया हुआ कर्म छायाकी भाँति सदा उसके पीछे लगा रहता और यथासमय अपना फल देता है। इसलिये जीव सुख अथवा दुःख भोगनेके योग्य होकर जन्म लेता है। यमराजके विधान (पुण्य और पापके फल-भोग)-में नियुक्त हुआ जीव अपने शुभ अथवा अशुभ लक्षणोंद्वारा अपनेको मिले हुए सुख अथवा दुःखका निवारण करनेमें असमर्थ है। यह बात ज्ञान-दृष्टिवाले महात्मा पुरुषोंद्वारा देखी जाती है

Terikat pada ketetapan Kṛtānta (hukum tak terelakkan), makhluk itu—meski menanggung tanda-tanda baik atau buruk—tampak bagi para bijak sebagai tak berdaya menolak apa yang telah ditetapkan baginya.

Verse 80

एषा तावदबुद्धीनां गतिरुक्ता युधिष्ठिर । अतः: परं ज्ञानवतां निबोध गतिमुत्तमाम्‌,युधिष्ठिर! यह तत्त्वज्ञानशून्य मूढ़ मनुष्योंकी स्वर्ग-नरकरूप गति बतायी गयी है। अब इसके बाद विवेकी पुरुषोंको प्राप्त होनेवाली उत्तम गतिका वर्णन सुनो

Wahai Yudhiṣṭhira, sejauh ini telah diuraikan jalan nasib mereka yang tanpa pengertian sejati. Kini dengarkan dariku jalan yang lebih luhur, yang menjadi milik orang bijak berpengetahuan.

Verse 81

मनुष्यास्तप्ततपस: सर्वागमपरायणा: । स्थिरव्रता: सत्यपरा गुरुशुश्रूषणे रता:,ज्ञानी मनुष्य तपस्वी, सम्पूर्ण शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर, स्थिरतापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, सत्यपरायण, गुरुसेवामें संलग्न, सुशील, शुक्ताजातीय (सात््विक), क्षमाशील, जितेन्द्रिय और अत्यन्त तेजस्वी होते हैं। वे शुद्ध योनिमें जन्म लेते और प्राय: शुभ लक्षणोंसे सुशोभित होते हैं

Mārkaṇḍeya berkata: “Orang-orang semacam itu—mereka yang telah ditempa oleh panas tapa, tekun pada seluruh warisan śāstra dan āgama, teguh memegang vrata, berpegang pada kebenaran, dan bersukacita dalam pengabdian kepada guru—menjadi bijaksana dan berdisiplin. Mereka terlahir dalam garis keturunan yang murni dan, pada umumnya, dihiasi tanda-tanda mujur; bercahaya oleh pengendalian diri, kesabaran, dan sinar batin.”

Verse 82

सुशीला: शुक्लजातीया: क्षान्ता दान्ता: सुतेजस: । शुचियोन्यन्तरगता: प्रायश: शुभलक्षणा:,ज्ञानी मनुष्य तपस्वी, सम्पूर्ण शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर, स्थिरतापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, सत्यपरायण, गुरुसेवामें संलग्न, सुशील, शुक्ताजातीय (सात््विक), क्षमाशील, जितेन्द्रिय और अत्यन्त तेजस्वी होते हैं। वे शुद्ध योनिमें जन्म लेते और प्राय: शुभ लक्षणोंसे सुशोभित होते हैं

Mereka yang berperilaku luhur dan berwatak murni (sāttvika)—sabar, menahan diri, dan bercahaya oleh daya batin—terlahir dalam garis keturunan yang bersih dan mulia, dan pada umumnya dihiasi tanda-tanda mujur.

Verse 83

जितेन्द्रियत्वाद्‌ वशिन: शुक्लत्वान्मन्दरोगिण: । अल्पाबाधपरित्रासाद भवन्ति निरुपद्रवा:,जितेन्द्रिय होनेके कारण वे मनको वशमें रखते हैं और सात््विक अन्त:करणके होनेके कारण नीरोग होते हैं। दुःख और त्रासके क्षीण होनेके कारण वे उपद्रवरहित होते हैं। विवेकी पुरुष गर्भसे गिरते, जन्म लेते अथवा गर्भमें ही रहते समय भी ज्ञानदृष्टिसे अपने-आपका और परमात्माका सर्वथा यथार्थ अनुभव करते हैं

Karena menaklukkan indra, mereka menguasai batin. Karena kemurnian sāttvika dalam diri, mereka jarang tersentuh penyakit. Dan karena duka serta takut hampir tak menyapa, mereka hidup tanpa gangguan.

Verse 84

च्यवन्तं जायमानं च गर्भस्थं चैव सर्वश: । स्वमात्मान परं चैव बुध्यन्ते ज्ञानचक्षुषा,जितेन्द्रिय होनेके कारण वे मनको वशमें रखते हैं और सात््विक अन्त:करणके होनेके कारण नीरोग होते हैं। दुःख और त्रासके क्षीण होनेके कारण वे उपद्रवरहित होते हैं। विवेकी पुरुष गर्भसे गिरते, जन्म लेते अथवा गर्भमें ही रहते समय भी ज्ञानदृष्टिसे अपने-आपका और परमात्माका सर्वथा यथार्थ अनुभव करते हैं

Baik ketika tergelincir dari rahim, ketika dilahirkan, maupun ketika masih berada dalam kandungan—pada setiap tahap—orang yang arif melihat, dengan mata pengetahuan, diri sejatinya dan Yang Mahatinggi, dalam kebenaran sepenuhnya.

Verse 85

ऋषयस्ते महात्मान: प्रत्यक्षागमबुद्धयः । कर्मभूमिमिमां प्राप्प पुनर्यान्ति सुरालयम्‌,लौकिक तथा शास्त्रीय ज्ञानको प्रत्यक्ष करनेवाले वे महामना ऋषि इस कर्मभूमिमें आकर फिर देवलोकमें चले जाते हैं

Para resi agung itu—yang pemahamannya berakar pada penyaksian langsung sekaligus kewibawaan āgama—datang ke dunia ini, ladang tempat karma dijalankan; dan setelah menuntaskan tujuannya, mereka berangkat kembali ke kediaman para dewa.

Verse 86

किंचिद्‌ दैवाद्धठात्‌ किंचित्‌ किंचिदेव स्वकर्मभि: । प्राप्रुवन्ति नरा राजन्‌ मा ते<स्त्वन्या विचारणा,राजन! विवेकी मनुष्य कर्मोंका कुछ फल प्रारब्धवश प्राप्त करते हैं, कुछ कर्मोका फल हठात्‌ प्राप्त होता है और कुछ कर्मोंका फल अपने उद्योगसे ही प्राप्त होता है। इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Raja, manusia memperoleh sebagian hasil karena takdir, sebagian datang tiba-tiba tanpa diduga, dan sebagian lagi melalui perbuatan serta upaya mereka sendiri. Karena itu, janganlah engkau menyimpan anggapan yang berlawanan tentang perkara ini.”

Verse 87

इमामत्रोपमां चापि निबोध वदतां वर । मनुष्यलोके यच्छेय: परं मन्ये युधिछिर,वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! मनुष्यलोकमें मैं जिसे परम कल्याणकी बात समझता हूँ, उसके विषयमें यह उदाहरण सुनो। कोई मनुष्य इस लोकमें ही परम सुख पाता है, परलोकमें नहीं। किसीको परलोकमें ही परम कल्याणकी प्राप्ति होती है, इस लोकमें नहीं। किसीको इहलोक और परलोक दोनोंमें परम श्रेयकी प्राप्ति होती है; तथा किसीको न तो परलोकमें उत्तम सुख मिलता है और न इस लोकमें ही

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, yang terbaik di antara para penutur, dengarkan pula sebuah perumpamaan di sini. Tentang apa yang kupandang sebagai kebaikan tertinggi bagi manusia di dunia ini, akan kukatakan.”

Verse 88

इह वैकस्य नामुत्र अमुत्रैकस्य नो इह । इह वामुत्र चैकस्य नामुत्रैकस्य नो इह,वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! मनुष्यलोकमें मैं जिसे परम कल्याणकी बात समझता हूँ, उसके विषयमें यह उदाहरण सुनो। कोई मनुष्य इस लोकमें ही परम सुख पाता है, परलोकमें नहीं। किसीको परलोकमें ही परम कल्याणकी प्राप्ति होती है, इस लोकमें नहीं। किसीको इहलोक और परलोक दोनोंमें परम श्रेयकी प्राप्ति होती है; तथा किसीको न तो परलोकमें उत्तम सुख मिलता है और न इस लोकमें ही

Mārkaṇḍeya berkata: “Di dunia ini, seseorang memperoleh kesejahteraan, namun tidak di alam berikutnya; yang lain memperoleh kesejahteraan di alam berikutnya, namun tidak di sini. Seorang ketiga meraih kebaikan sejati di kedua alam; dan seorang keempat tidak mendapatkannya, baik di sini maupun kelak.”

Verse 89

धनानि येषां विपुलानि सन्ति नित्यं रमन्ते सुविभूषिताड्गा: । तेषामयं शत्रुवरघ्न लोको नासौ सदा देहसुखे रतानाम्‌,जिनके पास बहुत धन होता है, वे अपने शरीरको हर तरहसे सजाकर नित्य विषयोंमें रमण करते अर्थात्‌ विषय-सुख भोगते हैं। शुत्रुसूदन! सदा अपने शरीरके ही सुखमें आसक्त हुए उन मनुष्योंको केवल इसी लोकमें सुख मिलता है, परलोकमें उनके लिये सुखका सर्वथा अभाव है

Markaṇḍeya berkata: “Mereka yang memiliki harta berlimpah, menghias tubuhnya dengan segala cara, senantiasa bersenang-senang dalam objek-objek indria dan hidup demi kenikmatan. Wahai penumpas musuh, bagi orang yang selalu terpaut pada kesenangan jasmani, kebahagiaan hanya milik dunia ini; di alam sana tak ada kebahagiaan bagi mereka sama sekali.”

Verse 90

ये योगयुक्तास्तपसि प्रसक्ता: स्वाध्यायशीला जरयन्ति देहान्‌ । जितेन्द्रिया: प्राणिवधे निवृत्ता- स्तेषामसौ नायमरिघ्न लोक:,शत्रुसूदन! जो लोग इस लोकमें योगसाधन करते हैं, तपस्यामें संलग्न होते हैं और स्वाध्यायमें तत्पर रहते हैं तथा इस प्रकार प्राणियोंकी हिंसासे दूर रहकर इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए (तपस्याद्वारा) अपने शरीरको दुर्बल कर देते हैं, उनके लिये इस लोकमें सुख नहीं है। वे परलोकमें ही परम कल्याणके भागी होते हैं

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai penumpas musuh, mereka yang terlatih dalam yoga, tekun dalam tapa, dan teguh dalam swādhyāya; yang menaklukkan indria, menjauh dari pembunuhan makhluk hidup, dan mengikis tubuh lewat laku asketis—bagi mereka, dunia ini bukan tempat kebahagiaan duniawi. Kebaikan tertinggi mereka dicapai di alam seberang.”

Verse 91

ये धर्ममेव प्रथमं चरन्ति धर्मेण लब्ध्वा च धनानि काले | दारानवाप्य क्रतुभिर्यजन्ते तेषामयं चैव परश्षच लोक:,जो लोग कर्तव्य-बुद्धिसे पहले धर्मका ही आचरण करते हैं और उस धर्मसे ही (न्याययुक्त) धनका उपार्जन कर यथासमय स्त्रीसे विवाह करके उसके साथ यज्ञ-याग और ईश्वरभक्ति आदिका अनुष्ठान करते हैं, उनके लिये इहलोक और परलोक दोनों ही सुखद हैं

Markandeya berkata: Mereka yang menempatkan dharma sebagai yang utama dalam perilaku, yang pada waktunya memperoleh kekayaan dengan cara yang benar, dan yang setelah beristri melaksanakan yajña serta pemujaan menurut tata-ritus yang ditetapkan—bagi mereka, dunia ini dan dunia sana sama-sama menjadi mujur dan membahagiakan.

Verse 92

ये नैव विद्यां न तपो न दानं न चापि मूढा: प्रजने यतन्ति | न चानुगच्छन्ति सुखानि भोगां- स्तेषामयं नैव परश्ष लोक:,जो मूढ़ न विद्याके लिये, न तपके लिये और न दानके लिये ही प्रयत्न करते हैं एवं न धर्मपूर्वक संतानोत्पादनके लिये ही यत्नशील होते हैं, वे न तो सुख पाते हैं और न भोग ही भोगते हैं। उनके लिये न तो इस लोकमें सुख है और न परलोकमें

Markandeya berkata: Orang-orang yang tersesat—yang tidak berusaha untuk ilmu, tidak untuk tapa, tidak untuk sedekah, dan bahkan tidak berikhtiar memperoleh keturunan secara benar menurut dharma—mereka tidak meraih kebahagiaan dan tidak pula sungguh menikmati kenikmatan hidup. Bagi mereka, tiada kesejahteraan di dunia ini, dan tiada pula di dunia sana.

Verse 93

सर्वे भवन्तस्त्वतिवीर्यसत्त्वा दिव्यौजस: संहननोपपन्ना: । लोकादमुष्मादवनिं प्रपन्ना: स्वधीतविद्या: सुरकार्यहेतो:,राजा युधिष्ठिर! तुम सब लोग बड़े पराक्रमी और धैर्यवान्‌ हो। तुममें अलौकिक ओज भरा है। तुम सुदृढ़ शरीरसे सम्पन्न हो और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये परलोकसे इस पृथिवीपर अवतीर्ण हुए हो। यही कारण है कि तुमने सभी उत्तम विद्याएँ सीख ली हैं

Markandeya berkata: Kalian semua dianugerahi keberanian dan keteguhan yang luar biasa. Cahaya ilahi memenuhi diri kalian; tubuh kalian kuat dan tersusun kokoh. Demi menuntaskan tugas para dewa, kalian turun ke bumi ini dari alam sana; karena itulah kalian menguasai setiap cabang ilmu yang mulia.

Verse 94

कृत्वैव कर्माणि महान्ति शूरा- स्तपोदमाचारविहारशीला: । देवानृषीन्‌ प्रेतगणांश्व॒ सर्वान्‌ संतर्पयित्वा विधिना परेण,तुम सभी शूर-वीर तथा तपस्या, इन्द्रियसंयम और उत्तम आचार-व्यवहारमें सदा ही तत्पर रहनेवाले हो। अतः (इस संसारमें बड़े-बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य करके) देवताओं, ऋषियों और समस्त पितरोंको उत्तम विधिसे तृप्त करोगे। तत्पश्चात्‌ अपने सत्कर्मोंके फलस्वरूप तुम सब लोग क्रमसे पुण्यात्माओंके निवास स्थान परम स्वर्गलोकको चले जाओगे। इसीलिये कौरवराज! तुम (अपने वर्तमान कष्टको देखकर) मनमें किसी प्रकारकी शंकाको स्थान न दो। यह क्लेश तो तुम्हारे भावी सुखका ही सूचक है

Markandeya berkata: Setelah menuntaskan perbuatan-perbuatan besar, kalian para pahlawan—senantiasa tekun dalam tapa, pengendalian diri, dan laku yang mulia—akan memuaskan para dewa, para resi, dan seluruh golongan arwah leluhur menurut tata-ritus yang paling luhur.

Verse 95

स्वर्ग परं पुण्यकृतो निवासं क्रमेण सम्प्राप्स्यथ कर्मभि: स्वै: । मा भूद्‌ विशड्का तव कौरवेन्द्र दृष्टवा55त्मन: क्लेशमिमं सुखाहम्‌,तुम सभी शूर-वीर तथा तपस्या, इन्द्रियसंयम और उत्तम आचार-व्यवहारमें सदा ही तत्पर रहनेवाले हो। अतः (इस संसारमें बड़े-बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य करके) देवताओं, ऋषियों और समस्त पितरोंको उत्तम विधिसे तृप्त करोगे। तत्पश्चात्‌ अपने सत्कर्मोंके फलस्वरूप तुम सब लोग क्रमसे पुण्यात्माओंके निवास स्थान परम स्वर्गलोकको चले जाओगे। इसीलिये कौरवराज! तुम (अपने वर्तमान कष्टको देखकर) मनमें किसी प्रकारकी शंकाको स्थान न दो। यह क्लेश तो तुम्हारे भावी सुखका ही सूचक है

Markandeya berkata: Dengan perbuatan kalian sendiri, setahap demi setahap kalian akan mencapai surga tertinggi—tempat tinggal orang-orang saleh. Karena itu, wahai raja Kuru, jangan biarkan keraguan timbul di hatimu saat melihat kesusahan ini; penderitaan ini hanyalah pertanda kebahagiaan yang akan datang.

Verse 182

इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनपवकि अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें काम्यकवनगमनविषयक एक सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-182 dari Vana Parva dalam Śrī Mahābhārata, pada bagian Markandeya-samāsya Parva, yang mengisahkan perjalanan menuju hutan Kāmyaka.

Verse 183

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि तयशीत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, di bagian yang dikenal sebagai Markandeya-samāsya Parva, bab ke-183 berakhir.

Frequently Asked Questions

How a person can pursue śreyas through ritual action—offering into fire and worship—without ‘falling’ from svadharma, i.e., how correct practice, timing, and qualification prevent dharma from being undermined by improper performance.

Ritual and ethical action must be grounded in purity, knowledge/competence, and śraddhā; dāna and vrata yield graded results, yet the highest aim is the ‘parama, viśoka’ state approached by Veda-knowers through sustained disciplines (svādhyāya, dāna, vrata, puṇya-yoga).

Yes: it provides explicit outcome-linking (e.g., gifts of cow/bull/garments/gold to distinct attainments, and prolonged agnihotra to purification of ancestral lines), emphasizing that outcomes are conditioned by qualification and faith rather than by mechanical offering alone.