Sarasvatī–Tārkṣya Saṃvāda: Agnihotra-vidhi, Dāna-phala, and Mokṣa-prasaṅga (सरस्वती–तार्क्ष्यसंवादः)
इमामत्रोपमां चापि निबोध वदतां वर । मनुष्यलोके यच्छेय: परं मन्ये युधिछिर,वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! मनुष्यलोकमें मैं जिसे परम कल्याणकी बात समझता हूँ, उसके विषयमें यह उदाहरण सुनो। कोई मनुष्य इस लोकमें ही परम सुख पाता है, परलोकमें नहीं। किसीको परलोकमें ही परम कल्याणकी प्राप्ति होती है, इस लोकमें नहीं। किसीको इहलोक और परलोक दोनोंमें परम श्रेयकी प्राप्ति होती है; तथा किसीको न तो परलोकमें उत्तम सुख मिलता है और न इस लोकमें ही
imām atropamāṃ cāpi nibodha vadatāṃ vara | manuṣyaloke yac chreyaḥ paraṃ manye yudhiṣṭhira ||
Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, yang terbaik di antara para penutur, dengarkan pula sebuah perumpamaan di sini. Tentang apa yang kupandang sebagai kebaikan tertinggi bagi manusia di dunia ini, akan kukatakan.”
मार्कण्डेय उवाच