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The Dhyanabindu Upanishad, traditionally affiliated with the Atharvaveda and counted among the Yoga Upanishads, is a compact yet influential manual of meditative discipline (dhyāna) oriented toward Advaitic realization. Its title—“the bindu (point/seed) of meditation”—signals a central concern: the inward gathering of attention from the many (sense-objects, discursive thought) into a single-pointed contemplative focus that culminates in the recognition of the Self (Ātman) as non-different from Brahman. While it shares the Upanishadic metaphysical horizon of liberation (mokṣa) through knowledge (jñāna), it is distinctive in presenting yogic method as the practical bridge from conceptual understanding to direct realization. Historically, the text belongs to the later stratum of Upanishadic literature in which classical yoga, mantra, and subtle-body contemplations are integrated into Vedāntic soteriology. Its idiom resonates with post-Pātañjala yoga culture—emphasizing concentration, inner sound, and the management of mind (manas) and breath (prāṇa)—yet it consistently frames these practices as preparatory and revelatory rather than merely therapeutic. The Upanishad thus exemplifies a broader medieval synthesis: yogic techniques are adopted, but their final meaning is interpreted through the Upanishadic claim that the ultimate reality is the non-dual Self. Philosophically, the Dhyanabindu Upanishad treats the mind’s outward flow as the root of bondage and proposes dhyāna as the disciplined reversal of that flow. It employs the imagery of bindu and nāda (inner sound) to describe the progressive interiorization of awareness: from gross supports (form, mantra, breath) to subtler supports (sound, luminosity, witnessing consciousness), and finally to supportless absorption where the distinction between meditator, meditation, and object is dissolved. The text also underscores ethical and ascetic supports—restraint, moderation, and steadiness—as necessary conditions for stable contemplation. A key theme is the pedagogical movement from “with support” (sālambana) meditation to “without support” (nirālambana) realization. The Upanishad’s yoga is not an end in itself but a means to remove ignorance (avidyā) and reveal the ever-present Self. In this way, it articulates a practical Advaita: liberation is not produced by practice, but practice refines attention and purifies the mind so that the already-liberated nature of Ātman-Brahman becomes evident. The text’s enduring significance lies in this integration of contemplative technique with Upanishadic non-duality, making it a bridge between yogic praxis and Vedāntic insight.
Start ReadingDhyāna as the central discipline: turning attention inward from sense-objects to the witnessing Self
Bindu symbolism: single-pointed concentration as the “seed” that gathers the mind and dissolves distraction
Nāda (inner sound) and subtle contemplation: progressive interiorization from gross to subtle supports
Sālambana to nirālambana: moving from supported meditation (mantra/form/breath) to supportless absorption
Mind (manas) as the locus of bondage and release: mastery of thought-waves leads to clarity and freedom
Yoga as a means to jñāna: practices purify and steady the mind so non-dual knowledge can dawn
Non-duality (Advaita): Ātman is Brahman; liberation is recognition, not production
Ethical/disciplinary foundations: restraint, moderation, and steadiness as prerequisites for deep meditation
105 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.
Verse 1
यदि शैलसमं पापं विस्तीर्णं बहुयोजनम् । भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन ॥१॥
मान लो तुम्हारा पाप इतना बड़ा हो जितना कोई पहाड़। वो कितने भी फैला हो, ध्यान से सब टूट जाता है। कोई और तरीका नहीं है जो इतना काम करे। यह सिर्फ ध्यान से होता है।
Moksha (purification through dhyāna leading toward liberation)Verse 2
बीजाक्षरं परं बिन्दुं नादो तस्योपरि स्थितम् । सशब्दं चाक्षरे क्षीणे निःशब्दं परमं पदम् ॥२॥
ॐ का सीधा बिंदु में जाता है। उसके ऊपर एक साउंड रहता है। जब वो साउंड खत्म हो जाता है, तब एक सुनसान स्थिति मिलती है। वहाँ कोई आवाज़ नहीं होती।
Brahman (as nirśabda/niḥśabda parama-pada; progression from nāma-śabda to the transcendental)Verse 3
अनाहतं तु यच्छब्दं तस्य शब्दस्य यत्परम् । तत्परं विन्दते यस्तु स योगी छिन्नसंशयः ॥३॥
वो आवाज़ जो किसी से नहीं बनी, उसके पार जो है वो असली चीज़ है। जिसे वो मिल जाता है, वो सच्चा योगी है। उसके दिल में कोई शक नहीं रहता।
Atman/Brahman (transcending subtle phenomena to the non-dual reality)Verse 4
वालाग्रशतसाहस्रं तस्य भागस्य भागिनः । तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम् ॥४॥
बालों की नोक से भी छोटा हिस्सा सोचो। उससे भी छोटा, फिर उसका आधा। जब वो इतना छोटा भी खत्म हो जाता है, तब असली खुद मिलता है। वहाँ कोई दाग नहीं।
Atman/Brahman as nirañjana (stainless) beyond the subtlest subtlety; transcendence of the ‘minute’ (aṇutva) in meditationVerse 5
पुष्पमध्ये यथा गन्धः पयोमध्ये यथा घृतम् । तिलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव काञ्चनम् ॥ एवं सर्वाणि भूतानि मणौ सूत्र इवात्मनि । स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥५-६॥
फूल में खुशबू होती है, दूध में घी छुपा होता है। तिल में तेल होता और पत्थर में सोना। सब जगह भगवान छुपा है, जैसे मोती में धागा। जो यह समझता है, वो हमेशा शांत रहता है।
All-pervasion (sarvagatatva) of Atman/Brahman; immanence with transcendence; Brahmavidyā and Brahma-niṣṭhāVerse 6
पुष्पमध्ये यथा गन्धः पयोमध्ये यथा घृतम् । तिलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव काञ्चनम् ॥ एवं सर्वाणि भूतानि मणौ सूत्र इवात्मनि । स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥५-६॥
जैसे फूल में खुशबू होती है, जैसे दूध में घी छुपा होता है, जैसे तिल में तेल होता है, जैसे पत्थर में सोने की चमक होती है। वैसे ही सारी चीज़ें आत्मा में हैं, जैसे मोती के धागे में पिरी होती है। जो बंदा समझदार है और घुल मिल नहीं जाता, वो ब्रह्मन को जानता है और ब्रह्मन में रहता है।
Non-dual immanence; Atman as inner essence of all beings; Brahman-abidanceVerse 7
तिलानां तु यथा तैलं पुष्पे गन्ध इवाश्रितः । पुरुषस्य शरीरे तु स बाह्याभ्यन्तरे स्थितः ॥७॥
जैसे तिल में तेल भरा होता है और फूल में खुशबू बसी होती है, वैसे ही इंसान के शरीर में वो आत्मा है। बाहर भी है और अंदर भी।
Ātman/Brahman as immanent (antarvyāptatā)Verse 8
वृक्षं तु सकलं विद्याच्छाया तस्यैव निष्कला । सकले निष्कले भावे सर्वत्रात्मा व्यवस्थितः ॥८॥
पेड़ को देखो, उसके तो पत्ते, तानें, ढाल सब अलग अलग दिखते हैं। लेकिन उसकी छाया एक पीस होती है, टुकड़ों में नहीं होती। वैसे ही दुनिया में जो दिखता है वो टुकड़ों वाला है, और जो नहीं दिखता वो बिना टुकड़ों वाला है। आत्मा दोनों में है, हर जगह।
Sakala–niṣkala (manifest–formless) and sarvavyāptatā of ĀtmanVerse 9
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षिभिः । पृथिव्यग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥ अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके । अन्तरिक्षं यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥ उकारे तु लयं प्राप्ते ...
जो लोग मुक्ति चाहते हैं उनको ओम शब्द को ध्यान में रखना चाहिए। यह एक अक्षर वाला ब्रह्मन है। ओम के पहले हिस्से में 'अ' करता है। इसमें ज़मीन, आग, ऋग्वेद और 'भु' शब्द आते हैं। ब्रह्मा इसका अधिकारी है। दूसरे हिस्से में 'उ' आता है। इसमें आकाश, हवा, यजुर्वेद और 'भुवह' शब्द हैं। विष्णु इसका अधिकारी है। तीसरे हिस्से में 'म' आता है। इसमें स्वर्ग, सूरज, सामवेद और 'स्वह' शब्द हैं। महेश्वर इसका अधिकारी है। ओम के तीन हिस्से हैं, और इसमें पाँच देवी देवता बसते हैं। जो ओम को नहीं जानता वो ब्रह्मन को नहीं जान सकता। ओम धनुष है, आत्मा बाण है, और ब्रह्मन निशाना है। ध्यान से मारो, और तुम खुद बाण बन जाओगे। जब यह सब समझ आता है तो सारी करम खत्म हो जाती हैं।
Praṇava (Oṃ) as Brahman; laya (dissolution) of mind; upāsanā leading to jñāna; transcendence of guṇasVerse 10
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षिभिः । पृथिव्यग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥ अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके । अन्तरिक्षं यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥ उकारे तु लयं प्राप्ते ...
जो मुक्ति ढूंढते हैं वो ओम को ध्यान में रखें। यह एक अक्षर वाला ब्रह्मन है। ओम के पहले हिस्से 'अ' में ज़मीन, आग, ऋग्वेद और 'भु' शब्द आते हैं। ब्रह्मा इसका अधिकारी है। दूसरा हिस्सा 'उ' में आकाश, हवा, यजुर्वेद और 'भुवह' शब्द हैं। विष्णु इसका अधिकारी है। तीसरा हिस्सा 'म' में स्वर्ग, सूरज, सामवेद और 'स्वह' शब्द हैं। महेश्वर इसका अधिकारी है। ओम के तीन हिस्से हैं और इसमें पाँच देवी देवता हैं। जो ओम को नहीं जानता वो ब्रह्मन को नहीं पहुंच सकता। ओम धनुष है, आत्मा बाण है, ब्रह्मन निशाना है। ध्यान से मारो, और तुम खुद बाण बन जाओगे। जब यह सब साफ दिखता है तो सारी करम रुक जाती हैं।
Praṇava (Oṃ) as Brahman; laya (dissolution) of the cosmos into Oṃ; Atman–Brahman realizationVerse 11
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षिभिः । पृथिव्यग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥ अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके । अन्तरिक्षं यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥ उकारे तु लयं प्राप्ते ...
ॐ एक अक्षर वाली चीज़ है जो ब्रह्मा है। जो लोग मुक्ति चाहते हैं वो इसको ध्यान में रखें। धरती, आग और ऋग्वेद - यह सब 'भूः' में आते हैं। ब्रह्मा इसका अध्यक्ष है। 'अ' अक्षर में जब मन लय होता है, तब अंतरिक्ष, यजुर्वेद, हवा और 'भुवः' - यह सब विष्णु के साथ मिल जाते हैं। 'उ' अक्षर में जब लय होता है, तब आकाश, सूरज, सामवेद और 'स्वः' - यह सब महेश्वर के साथ मिलते हैं। 'म' अक्षर में जब लय होता है, तब 'अ' पीला रंग का होता है जो रजो गुण है। 'उ' साफ-साफ व्हाइट रंग का है जो सात्विक है। 'म' काला रंग का है जो तामसिक है। ॐ का आठ हिस्से हैं, चार पैर हैं, तीन स्थान हैं और पाँच देवी-देवता हैं। जो ॐ को नहीं जानता वो ब्रह्मा को नहीं पा सकता। ॐ धनुष है, आप खुद तीर हो, और ब्रह्मा निशाना है। ध्यान से मारो, और तीर की तरह उसमें घुल जाओ। जब वो सच्चाई दिखती है, तब सारे करम रुक जाते हैं।
Oṃ as upāsya (object of meditation) and as the integrative symbol of Brahman; non-doership through realizationVerse 12
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षिभिः । पृथिव्यग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥ अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके । अन्तरिक्षं यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥ उकारे तु लयं प्राप्ते ...
ॐ एक मात्रा वाली ब्रह्मा की चीज़ है। जो लोग मुक्ति ढूंढते हैं वो इसका ध्यान करें। ज़मीन, आग और ऋग्वेद - यह सब 'भूः' है। पितामह ब्रह्मा इसका स्वामी है। जब 'अ' अक्षर में मन घुल जाता है, तब आसमान के बीच का हिस्सा, यजुर्वेद और हवा - यह सब 'भुवः' के साथ विष्णु में मिल जाते हैं। जब 'उ' अक्षर में मन घुल जाता है, तब आकाश, सूरज और सामवेद - यह सब 'स्वः' के साथ महेश्वर में मिल जाते हैं। जब 'म' अक्षर में मन घुल जाता है, तब 'अ' अक्षर पीला रंग का है और रजो गुण है। 'उ' अक्षर व्हाइट रंग का है और सात्विक है। 'म' अक्षर काला है और तामसिक है। ॐ आठ अंगों वाला है, चार पैर वाला है, तीन जगह वाला है और पाँच देवता वाला है। जो ॐ को नहीं समझता वो ब्रह्मा को नहीं पा सकता। ॐ धनुष है, आप खुद तीर हो, ब्रह्मा निशाना है। ध्यान से चलाओ, और तीर की तरह उसमें घुल जाओ। जब वो दिख जाता है, ऊपर वाला और नीचे वाला, तब सारे करम खत्म हो जाते हैं।
Praṇava-vidyā; absorption (laya) and transcendence of guṇas; liberation (mokṣa) through Brahma-jñānaVerse 13
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षिभिः । पृथिव्यग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥ अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके । अन्तरिक्षं यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥ उकारे तु लयं प्राप्ते ...
ॐ सिर्फ एक अक्षर है, और यह ब्रह्मा है। जो लोग मुक्ति चाहते हैं वो इसका ध्यान करें। पृथ्वी, आग और ऋग्वेद - यह सब 'भूः' में आते हैं। पितामह इसका अध्यक्ष है। जब 'अ' अक्षर में लय होता है, तब अंतरिक्ष, यजुर्वेद और वायु - यह सब 'भुवः' हैं, और विष्णु जनार्दन है। जब 'उ' अक्षर में लय होता है, तब द्यौ, सूर्य और सामवेद - यह सब 'स्वः' हैं, और महेश्वर है। जब 'म' अक्षर में लय होता है, तब 'अ' अक्षर पीला रंग का है और रजो गुण है। 'उ' अक्षर सात्विक है और व्हाइट रंग का है। 'म' अक्षर काला है और तामसिक है। ॐ आठ अंगों वाला है, चार पैर वाला है, तीन स्थान वाला है और पाँच देवता वाला है। जो ॐ को नहीं जानता वो ब्रह्मा को नहीं पा सकता। ॐ धनुष है, आप खुद तीर हो, और ब्रह्मा निशाना है। ध्यान से मारो, और तीर की तरह उसमें घुल जाओ। जब वो दिख जाता है, ऊपर वाला और नीचे वाला, तब सारे करम रुक जाते हैं।
Praṇava (Oṃ) as Brahman; laya (dissolution) of mind into the syllables; cessation of karma in Brahma-darśanaVerse 14
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षिभिः । पृथिव्यग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥ अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके । अन्तरिक्षं यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥ उकारे तु लयं प्राप्ते ...
ॐ एक अक्षर वाली ब्रह्मा की बात है। जो लोग मुक्ति ढूंढते हैं वो इसका ध्यान रखें। धरती, आग और ऋग्वेद - यह सब 'भूः' हैं, और पितामह इसका स्वामी है। जब 'अ' अक्षर में मन घुल जाता है, तब अंतरिक्ष, यजुर्वेद और हवा - यह सब 'भुवः' हैं, और विष्णु जनार्दन है। जब 'उ' अक्षर में मन घुल जाता है, तब आकाश, सूरज और सामवेद - यह सब 'स्वः' हैं, और महेश्वर है। जब 'म' अक्षर में मन घुल जाता है, तब 'अ' अक्षर पीला रंग का है और रजो गुण है। 'उ' अक्षर सात्विक है और व्हाइट रंग का है। 'म' अक्षर काला है और तामसिक है। ॐ आठ अंगों वाला है, चार पैर वाला है, तीन स्थान वाला है और पाँच देवता वाला है। जो ॐ को नहीं जानता वो ब्रह्मा को नहीं पा सकता। ॐ धनुष है, आप खुद तीर हो, और ब्रह्मा निशाना है। ध्यान से मारो, और तीर की तरह उसमें घुल जाओ। जब वो दिख जाता है, ऊपर वाला और नीचे वाला, तब सारे करम खत्म हो जाते हैं।
Oṃkāra-upāsanā culminating in Brahma-jñāna; guṇa-transcendenceVerse 15
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षिभिः । पृथिव्यग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥ अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके । अन्तरिक्षं यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥ उकारे तु लयं प्राप्ते ...
ॐ एक ही अक्षर में ब्रह्मा है। जो लोग मुक्ति चाहते हैं वो इसका ध्यान करें। ज़मीन, आग और ऋग्वेद - यह सब 'भूः' हैं, और पितामह इसका अध्यक्ष है। जब 'अ' अक्षर में मन मिल जाता है, तब अंतरिक्ष, यजुर्वेद और वायु - यह सब 'भुवः' हैं, और विष्णु जनार्दन है। जब 'उ' अक्षर में मन मिल जाता है, तब द्यौ, सूर्य और सामवेद - यह सब 'स्वः' हैं, और महेश्वर है। जब 'म' अक्षर में मन मिल जाता है, तब 'अ' अक्षर पीला रंग का है और रजो गुण है। 'उ' अक्षर सात्विक है और व्हाइट रंग का है। 'म' अक्षर काला है और तामसिक है। ॐ आठ अंगों वाला है, चार पैर वाला है, तीन स्थान वाला है और पाँच देवता वाला है। जो ॐ को नहीं जानता वो ब्रह्मा को नहीं पा सकता। ॐ धनुष है, आप खुद तीर हो, और ब्रह्मा निशाना है। ध्यान से मारो, और तीर की तरह उसमें घुल जाओ। जब वो दिख जाता है, ऊपर वाला और नीचे वाला, तब सारे करम रुक जाते हैं।
Non-dual realization through praṇava; akartṛtva (end of doership)Verse 16
ओङ्कारप्रभवा देवा ओङ्कारप्रभवाः स्वराः । ओङ्कारप्रभवं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥१६॥
सब देवता ओम से पैदा हुए। सब स्वर ओम से निकले। ओम से ही पूरी दुनिया बनी - तीनो लोक, जो चलता है और जो नहीं चलता। सब कुछ ओम से शुरू हुआ।
Brahman as Śabda (Oṃ/Pranava) and cosmic causalityVerse 17
ह्रस्वो दहति पापानि दीर्घः सम्पत्प्रदोऽव्ययः । अर्धमात्रा समायुक्तः प्रणवो मोक्षदायकः ॥१७॥
जब तुम ओम को छोटा बोलो तो वो पाप जला देता है। जब लंबा बोलो तो वो आपको समृद्धि देता है, यह कभी खत्म नहीं होता। और जब ओम को आधा मात्रा के साथ जोड़ो, तो वो मुक्ति देता है।
Mokṣa through Oṃ-upāsanā; purification (pāpa-kṣaya) and liberation via PranavaVerse 18
तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् । अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित् ॥१८॥
जैसे तेल का बहता हुआ धारा बिना टूटे, वैसे ही ओम का आधा हिस्सा है। जैसे घंटे की आवाज़ गूँजती रहती है, वैसे ही यह भी है। यह बात शब्दों में नहीं बता सकते। जो यह समझता है, वो सच में वेद जानता है।
Nāda-brahman and the ineffable (avācya) reality indicated by OṃVerse 19
हृत्पद्मकर्णिकामध्ये स्थिरदीपनिभाकृतिम् । अङ्गुष्ठमात्रमचलं ध्यायेदोङ्कारमीश्वरम् ॥१९॥
अपने दिल के अंदर एक कमल है, उसके बीच में ओम का ध्यान करो। वो एक दिया की लौ जैसा है - जो हिलता नहीं है। उसका साइज़ अंगूठा जैसा है। यह ईश्वर रूप है।
Brahman/Īśvara as Oṃ; inner Self (Ātman) as luminous consciousnessVerse 20
इडया वायुमापूर्य पूरयित्वोदरस्थितम् । ओङ्कारं देहमध्यस्थं ध्यायेज्ज्वालावलीवृतम् ॥ ब्रह्मा पूरक इत्युक्तो विष्णुः कुम्भक उच्यते । रेचो रुद्र इति प्रोक्तः प्राणायामस्य देवताः ॥२०-२१॥
साँस अंदर खींचो, पेट को भर के रखना। फिर ओम का ध्यान करो, जो शरीर के बीच में है, आग से घिरा हुआ। साँस अंदर खींचना ब्रह्मा है, साँस रोकना विष्णु है, साँस बाहर करना रुद्र है। यह तीनो प्राणायाम के देवता हैं।
Oṃ as the inner support (ālambana) for prāṇāyāma leading to purification and realization; integration of yoga practice with Brahman/Īśvara contemplationVerse 21
इडया वायुमापूर्य पूरयित्वोदरस्थितम् । ओङ्कारं देहमध्यस्थं ध्यायेज्ज्वालावलीवृतम् ॥ ब्रह्मा पूरक इत्युक्तो विष्णुः कुम्भक उच्यते । रेचो रुद्र इति प्रोक्तः प्राणायामस्य देवताः ॥२०-२१॥
इडा नाली से हवा अंदर ले लो और उसे पेट में भर के रखो। फिर ओम का ध्यान करो जो शरीर के बीच में है, आग की तरह चमक रहा है। साँस अंदर लेने को ब्रह्मा कहते हैं। साँस रोक के रखने को विष्णु कहते हैं। साँस बाहर निकालने को रुद्र कहते हैं। यह तीनों प्राणायाम के देवता हैं।
Prāṇa-sādhana with Oṃ as support; purification leading toward Brahman-knowledgeVerse 22
आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासादेव पश्येन्निगूढवत् ॥२२॥
अपने आप को नीचे वाली लकड़ी समझो और ओम को ऊपर वाली लकड़ी। ध्यान करते रहो, जैसे दोनों लकड़ियाँ रगड़ के आग निकलती है। वैसे ही प्रैक्टिस से वो छुपा हुआ सच दिखने लगेगा।
Ātman–Brahman realization through praṇava-upāsanā (inner realization of the Self)Verse 23
ओङ्कारध्वनिनादेन वायोः संहरणान्तिकम् । यावद्बलं समादध्यात् सम्यङ्नादलयावधि ॥२३॥
ओम की आवाज़ से साँस को अंदर खींचो, जैसे वो घर जा रही हो। जितना हो सके उतना ध्यान से करो, जब तक कि आवाज़ में ही मिल जाए।
Prāṇa-saṃhāra (withdrawal of vital force) and nāda-laya as a meditative means toward Brahman-realizationVerse 24
गमागमस्थं गमनादिशून्यम् ओङ्कारमेकं रविकोटिदीप्तिम् । पश्यन्ति ये सर्वजनान्तरस्थं हंसात्मकं ते विरजा भवन्ति ॥२४॥
जो लोग ओम को देखते हैं जो आता जाता है पर उसमे कोई हिलना नहीं, जो दस लाख सूरज जैसा चमकता है और सबके अंदर बसता है, वो लोग बिल्कुल साफ हो जाते हैं। उनमे कोई मैला नहीं रहती।
Brahman as the inner Self (antarātman) indicated by Oṃ; purity (virajatva) through realization of the Haṃsa/Paramahaṃsa principleVerse 25
यन्मनस्त्रिजगत्सृष्टिस्थितिव्यसनकर्मकृत् । तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥
जो मन तीनों दुनिया को बनाता है, चलाता है और मिटाता है, जब वो मन मिट जाता है, तब विष्णु का सचला घर मिलता है।
Moksha (cessation of mind; entry into the supreme state)Verse 26
अष्टपत्रं तु हृत्पद्मं द्वात्रिंशत्केसरान्वितम् । तस्य मध्ये स्थितो भानुर्भानुमध्यगतः शशी॥
दिल के अंदर एक कमल है। उसके आठ पत्ते हैं और बत्तीस ताँगें हैं। उसके बीच में सूरज है। सूरज के बीच में चाँद है।
Dhyāna (inner visualization of the heart-lotus; antaryāmin focus)Verse 27
शशिमध्यगतो वह्निर्वह्निमध्यगता प्रभा । प्रभामध्यगतं पीठं नानारत्नप्रवेष्टितम्॥ तस्य मध्यगतं देवं वासुदेवं निरञ्जनम् । श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं मुक्तामणिविभूषितम्॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम् । ए...
चाँद के बीच में आग है। आग के बीच में चमक है। उस चमक के बीच में एक सिंहासन है, जो कितने ही रत्नों से बना है। उस सिंहासन के बीच में वासुदेव भगवान बैठे हैं। उनके सीने पर श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि है। मोती और रत्नों से सजे हैं वो। बिल्कुल साफ शीशे जैसा चमकता है, जैसे करोड़ों चाँद चमक रहे हों। ऐसे ही महाविष्णु का ध्यान करो, झुक के, नम्रता से।
Īśvara-dhyāna leading to Brahman-realization (saguṇa-upāsanā as support for nirguṇa insight)Verse 28
शशिमध्यगतो वह्निर्वह्निमध्यगता प्रभा । प्रभामध्यगतं पीठं नानारत्नप्रवेष्टितम् ॥ तस्य मध्यगतं देवं वासुदेवं निरञ्जनम् । श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं मुक्तामणिविभूषितम् ॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम् ।...
चाँद के बीच में आग है। आग के बीच में चमक है। उस चमक के बीच में एक सिंहासन है, बहुत सारे रत्नों से बना। उस सिंहासन के बीच में वासुदेव भगवान हैं। उनके सीने पर श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि है। मोती और रत्नों से सजे हैं वो। बिल्कुल साफ शीशे जैसा चमकता है, जैसे करोड़ों चाँद चमक रहे हों। ऐसे ही महाविष्णु का ध्यान करो, झुक के, नम्रता से।
Upāsanā (saguṇa-brahma-dhyāna) as a means toward inner purification and mokṣaVerse 29
शशिमध्यगतो वह्निर्वह्निमध्यगता प्रभा । प्रभामध्यगतं पीठं नानारत्नप्रवेष्टितम् ॥ तस्य मध्यगतं देवं वासुदेवं निरञ्जनम् । श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं मुक्तामणिविभूषितम् ॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम् ।...
चाँद के बीच में आग है। आग के बीच में चमक है। उस चमक के बीच में एक सिंहासन है, बहुत सारे रत्नों से बना। उस सिंहासन के बीच में वासुदेव भगवान हैं। उनके सीने पर श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि है। मोती और रत्नों से सजे हैं वो। बिल्कुल साफ शीशे जैसा चमकता है, जैसे करोड़ों चाँद चमक रहे हों। ऐसे ही महाविष्णु का ध्यान करो, झुक के, नम्रता से।
Īśvara-upāsanā (personal-form meditation) leading to antaḥkaraṇa-śuddhiVerse 30
अतसीपुष्पसंकाशं नाभिस्थाने प्रतिष्ठितम् । चतुर्भुजं महाविष्णुं पूरकेण विचिन्तयेत् ॥ कुम्भकेन हृदिस्थाने चिन्तयेत्कमलासनम् । ब्रह्माणं रक्तगौराभं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥
साँस अंदर लेते वक्त महाविष्णु का ध्यान करो। चार हाथ वाले, नीली फूल जैसा रंग, नाभि के पास खड़े। साँस रोके रखो, उस वक्त दिल के पास ब्रह्मा का ध्यान करो। कमल पर बैठे, लाल-गेहरा रंग, चार चेहरा वाले, दादा के जैसा।
Prāṇāyāma-yukta upāsanā (breath-linked meditation) and internalization of deities as yogic supportsVerse 31
अतसीपुष्पसंकाशं नाभिस्थाने प्रतिष्ठितम् । चतुर्भुजं महाविष्णुं पूरकेण विचिन्तयेत् ॥ कुम्भकेन हृदिस्थाने चिन्तयेत् कमलासनम् । ब्रह्माणं रक्तगौराभं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥
साँस अंदर लेते वक्त नाभि में महाविष्णु को सोचो। वो चार हाथ वाले हैं, रंग अतसी के फूल जैसा नीला। साँस रोके तो दिल में ब्रह्मा को सोचो। वो कमल पे बैठे हैं, चार चेहरा वाले हैं, रंग लाल-गेहरा मिक्स है। ये दोनों पुरानी दुनिया के गुरु हैं।
Upāsanā (saguna-dhyāna) as an aid toward Atman-realizationVerse 32
रेचकेन तु विद्यात्मा ललाटस्थं त्रिलोचनम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् ॥ अञ्जपत्रमधःपुष्पमूर्ध्वनालमधोमुखम् । कदलीपुष्पसंकाशं सर्ववेदमयं शिवम् । शतारं शतपत्राढ्यं विकीर्णाम्बुजकर्णिकम् । तत्रा...
साँस बाहर छोड़ते वक्त माथे पर शिव जी को सोचो। वो तीन आँखों वाले हैं, बिल्कुल साफ शीशे जैसा, कोई भी पाप नहीं बचता। फिर एक उल्टा कमल सोचो, फूल नीचे, डाली ऊपर। उसमे शिव जी हैं, केले के फूल जैसे, सारे वेदों से बने। उस कमल में सूरज, चाँद और आग एक के ऊपर एक सोचो। कमल खोलो, उसके बीज को पकड़ो, और खुद को पक्का पा जाओगे।
Atman-Brahman realization supported by yogic dhāraṇā; purification (pāpa-nāśana) and niṣkala (partless) Brahman-pointerVerse 33
रेचकेन तु विद्यात्मा ललाटस्थं त्रिलोचनम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् ॥ अञ्जपत्रमधःपुष्पमूर्ध्वनालमधोमुखम् । कदलीपुष्पसंकाशं सर्ववेदमयं शिवम् । शतारं शतपत्राढ्यं विकीर्णाम्बुजकर्णिकम् । तत्रा...
साँस बाहर करते वक्त माथे पर शिव जी को सोचो। तीन आँखें हैं उनकी, बिल्कुल साफ शीशे जैसा दिखते हैं, पाप मिटा देते हैं। फिर एक उल्टा कमल सोचो, फूल नीचे और डाली ऊपर। उसमे सूरज, चाँद और आग एक के ऊपर एक दिखाओ। कमल खोलो, उसके बीज को पकड़ो, और खुद को पक्का महसूस करोगे।
Same as Dhyanabindu.32: niṣkala reality approached through yogic upāsanāVerse 34
रेचकेन तु विद्यात्मा ललाटस्थं त्रिलोचनम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् ॥ अञ्जपत्रमधःपुष्पमूर्ध्वनालमधोमुखम् । कदलीपुष्पसंकाशं सर्ववेदमयं शिवम् ॥ शतारं शतपत्राढ्यं विकीर्णाम्बुजकर्णिकम् । तत्रा...
साँस बाहर छोड़ते वक्त माथे पर शिव जी को सोचो। वो तीन आँखों वाले हैं, साफ शीशे जैसा, पाप खत्म करने वाले। एक उल्टा कमल सोचो, फूल नीचे और डाली ऊपर। वो केले के फूल जैसा है, शिव जी उसमे हैं जो सारे वेद से बने हैं। उसमे सूरज, चाँद और आग एक के ऊपर एक दिखाओ। कमल खोलो, बीज पकड़ो, और खुद को पक्का पा जाओगे।
Ātman–Brahman realization through inner visualization (dhyāna) and purification; nirvikala (partless) consciousnessVerse 35
रेचकेन तु विद्यात्मा ललाटस्थं त्रिलोचनम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् ॥ अञ्जपत्रमधःपुष्पमूर्ध्वनालमधोमुखम् । कदलीपुष्पसंकाशं सर्ववेदमयं शिवम् ॥ शतारं शतपत्राढ्यं विकीर्णाम्बुजकर्णिकम् । तत्रा...
साँस बाहर करते वक्त माथे पर शिव जी को सोचो। तीन आँखें हैं उनकी, साफ शीशे जैसा, पाप नहीं बचता। एक उल्टा कमल सोचो, फूल नीचे और डाली ऊपर। वो केले के फूल जैसा है, शिव जी उसमे हैं जो सारे वेद से बने हैं। उसमे सूरज, चाँद और आग एक के ऊपर एक सोचो। कमल खोलो, बीज पकड़ो, और खुद को पक्का महसूस करोगे।
Nirvikala (partless) Self as Śiva; dhyāna leading to steadiness (dhruvatva) in ĀtmanVerse 36
त्रिस्थानं च त्रिमात्रं च त्रिब्रह्म च त्रयाक्षरम् । त्रिमात्रमर्धमात्रं वा यस्तं वेद स वेदवित् ॥३६॥
ओम शब्द तीन जगह पे है और तीन मात्रा का है। यह तीन रूप वाला ब्रह्मन है और तीन अक्षरों में बंटा है। जो इंसान इस तीन मात्रा वाले चीज़ को जानता है, या फिर आधा मात्रा वाले को भी जानता है, वो वेद का ज्ञाता है।
Praṇava (Oṃ) as Brahman; mātrā-doctrine culminating in amātrā/ardhamātrā (the transcendent ‘half-measure’)Verse 37
तैलधारामिवाच्छिन्नदीर्घघण्टानिनादवत् । बिन्दुनादकलातीतं यस्तं वेद स वेदवित् ॥३७॥
जैसे तेल का बहता हुआ धारा बिना टूटे चलता रहता है। वैसे ही घंटे की आवाज़ जो लंबी तक जाती है। जो उस चीज़ को जानता है जो बिंदु, नाद और कला से भी आगे है, वो वेद का ज्ञाता है।
Brahman (turiya beyond subtle supports such as nāda/bindu)Verse 38
यथैवोत्पलनालेन तोयमाकर्षयेन्नरः । तथैवोत्कर्षयेद्वायुं योगी योगपथे स्थितः ॥३८॥
जैसे कोई इंसान कमल के डांडे से पानी ऊपर खींचता है। वैसे ही जो योगी योग के रास्ते पर चल रहा है, वो अपनी साँस को ऊपर खींचता है।
Prāṇa (vāyu) as a means to inner absorption leading toward mokṣaVerse 39
अर्धमात्रात्मकं कृत्वा कोशीभूतं तु पङ्कजम् । कर्षयेन्नलमात्रेण भ्रुवोर्मध्ये लयं नयेत् ॥३९॥
कमल को आधा मात्रा जैसा छोटा कर दो। फिर उसे खोली जैसा बना दो। सिर्फ डांडे के मात्रा से उसे खींचो। और भ्रों के बीच में उसे ले जाके मिला दो।
Laya (dissolution of mind) leading toward samādhi and Brahman-realizationVerse 40
भ्रुवोर्मध्ये ललाटे तु नासिकायास्तु मूलतः । जानीयादमृतं स्थानं तद्ब्रह्मायतनं महत् ॥४०॥
भ्रों के बीच, माथे पर, नाक की जड़ के पास। यह जगह अमृत वाली जगह है, यहाँ मरण नहीं है। यह ब्रह्मन का मुख्य स्थान है।
Brahman (as inner locus of realization)Verse 41
आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा । ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट् ॥४१॥
योग के छह हिस्से हैं। पहला आसन, मतलब आप कैसे बैठते हो। दूसरा साँस रोकना, तीसरा इंद्रियों को अंदर खींचना। चौथा ध्यान लगाना, पाँचवा गहरी मेडिटेशन, छठा समाधि। ये चीज़ों को योग के अंग कहते हैं।
Mokṣa (via yoga as a means of mental purification and absorption)Verse 42
आसनानि च तावन्ति यावन्त्यो जीवजातयः । एतेषानतुलान्भेदान्विजानाति महेश्वरः ॥४२॥
दुनिया में जितने जानवर हैं, उतने ही आसन हैं। इतने सारे टाइप्स हैं कि कोई काउंट नहीं कर सकता। महेश्वर को ही पता है कितने प्रकार के आसन हैं।
Īśvara (as omniscient source/knower of yogic means)Verse 43
छिद्रं भद्रं तथा सिंहं पद्मं चेति चतुष्टयम् । आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ॥४३॥
चार खास आसन हैं - चिद्र, भद्र, सिंह और पद्म। बॉडी के अंदर पहला चक्र आधार है, जो नीचे होता है। दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान है, जो उसके ऊपर आता है।
Yoga (subtle-body mapping as an aid to Self-knowledge)Verse 44
योनिस्थानं तयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते । आधाराख्ये गुदस्थाने पङ्कजं यच्चतुर्दलम् ॥ तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता । योनिमध्ये स्थितं लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं तथा ॥ मस्तके मणिवद्भिन्नं यो ज...
इन दोनों चक्रों के बीच एक जगह है जिसे योनि स्थान कहते हैं। यह काम रूप है, मतलब इच्छा का स्थान। आधार चक्र गुद के पास है, वहाँ एक कमल है चार पंखड़ियों वाला। उसके बीच में योनि है, जिसे सिद्ध लोग भी मानते हैं। योनि के बीच लिंग है, जो वेस्ट की तरफ मुख किए है। जो इसको जानता है, वो योग जानता है। यह गरम सोना जैसा चमकता है, बिजली की तरह चमके। एक स्क्वेयर है, आग के ऊपर और लिंग के नीचे। 'स्व' शब्द से प्राण बनता है, और स्वाधिष्ठान इसका आधार है।
Upāsanā/Dhyāna as a means to citta-śuddhi leading toward Mokṣa (with kuṇḍalinī-symbolism)Verse 45
योनिस्थानं तयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते । आधाराख्ये गुदस्थाने पङ्कजं यच्चतुर्दलम् ॥ तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता । योनिमध्ये स्थितं लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं तथा ॥ मस्तके मणिवद्भिन्नं यो ज...
इन दोनों चक्रों के बीच एक जगह है जिसे योनि स्थान कहते हैं। यह काम रूप है, मतलब इच्छा का स्थान। आधार चक्र गुद के पास है, वहाँ एक कमल है चार पंखड़ियों वाला। उसके बीच में योनि है, जिसे सिद्ध लोग भी मानते हैं। योनि के बीच लिंग है, जो वेस्ट की तरफ मुख किए है। जो इसको जानता है, वो योग जानता है। यह गरम सोना जैसा चमकता है, बिजली की तरह चमके। एक स्क्वेयर है, आग के ऊपर और लिंग के नीचे। 'स्व' शब्द से प्राण बनता है, और स्वाधिष्ठान इसका आधार है।
Upāsanā/Dhyāna (cakra-dhāraṇā as preparatory discipline)Verse 46
योनिस्थानं तयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते । आधाराख्ये गुदस्थाने पङ्कजं यच्चतुर्दलम् ॥ तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता । योनिमध्ये स्थितं लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं तथा ॥ मस्तके मणिवद्भिन्नं यो ज...
गुदा और लिंग के बीच में एक स्थान है, उसे योनि कहते हैं। यह इच्छा से बना है। गुदा के पास आधार नाम का स्थान है, वहाँ चार पंख वाली कमल है। उसके बीच में काम नाम की योनि है, सिद्ध लोग इसकी पूजा करते हैं। योनि के बीच में लिंग है, जो वेस्ट की तरफ है। जो इसको जाने, जो ऊपर से टूटा है जैसे मणि, वो योग जानता है। यह गरम सोना जैसा दिखता है, बिजली की तरह चमकता है। आग के ऊपर और लिंग के नीचे एक स्क्वायर चक्र है। अपनी आवाज़ से प्राण उठता है, स्वाधिष्ठान इसका आधार है।
Prāṇa (vital force) and subtle-body loci as supports for inner realization (toward Mokṣa)Verse 47
योनिस्थानं तयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते । आधाराख्ये गुदस्थाने पङ्कजं यच्चतुर्दलम् ॥ तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता । योनिमध्ये स्थितं लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं तथा ॥ मस्तके मणिवद्भिन्नं यो ज...
दोनों के बीच में योनि स्थान है, यह इच्छा रूप है। गुदा के पास आधार में चार पंख वाली कमल है। उसके बीच काम योनि है, सिद्ध लोग इसकी इज्जत करते हैं। योनि के बीच लिंग है, वेस्ट की तरफ। जो इसको जाने, जो ऊपर से टूटा है जैसे मणि, वो योग जानता है। यह गरम सोना जैसा है, बिजली की तरह चमकता है। आग के ऊपर और लिंग के नीचे स्क्वायर चक्र है। अपनी आवाज़ से प्राण बनता है, स्वाधिष्ठान इसका आधार है।
Transformation of kāma through yogic dhāraṇā; prāṇa as the operative power in sādhanaVerse 48
स्वाधिष्ठानं ततश्चक्रं मेढ्रमेव निगद्यते । मणिवत्तन्तुना यत्र वायुना पूरितं वपुः ॥ तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् । द्वादशारमहाचक्रे पुण्यपापनियन्त्रितः ॥ तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्त्वं न ...
फिर स्वाधिष्ठान चक्र लिंग के पास है। वहाँ हवा से शरीर भर जाता है, जैसे मोती के धागे से। नाभि के पास का चक्र मणिपूरक है। बड़ा चक्र में बारह स्पोक्स हैं, पुण्य और पाप से बंधा है। जीव तब तक भटकता है जब तक सच नहीं मिलता। लिंग के ऊपर और नाभि के नीचे कंद है, अंडे जैसा। वहाँ से हज़ारों नाड़ियाँ निकलती हैं, बात्तर हज़ार। इनमें से बात्तर खास हैं।
Saṃsāra under puṇya-pāpa (karma) until tattva-jñāna; prāṇa-nāḍī system as yogic support toward MokṣaVerse 49
स्वाधिष्ठानं ततश्चक्रं मेढ्रमेव निगद्यते । मणिवत्तन्तुना यत्र वायुना पूरितं वपुः ॥ तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् । द्वादशारमहाचक्रे पुण्यपापनियन्त्रितः ॥ तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्त्वं न ...
स्वाधिष्ठान चक्र लिंग के पास है। वहाँ मोती जैसी डोर से शरीर हवा से भरता है। नाभि के चक्र को मणिपूरक कहते हैं। उस बड़े चक्र में बारह स्पोक्स हैं, पुण्य पाप से चलता है। जीव तब तक भटकता है जब तक सच नहीं मिलता। लिंग के ऊपर नाभि के नीचे कंद है, अंडे जैसा। वहाँ से बात्तर हज़ार नाड़ियाँ निकलती हैं, इनमें से बात्तर खास हैं।
Moksha (liberation) contrasted with bondage through karma; subtle-body anatomy (nāḍī–cakra–prāṇa) as an aid to realization of tattvaVerse 50
स्वाधिष्ठानं ततश्चक्रं मेढ्रमेव निगद्यते । मणिवत्तन्तुना यत्र वायुना पूरितं वपुः ॥ तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् । द्वादशारमहाचक्रे पुण्यपापनियन्त्रितः ॥ तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्त्वं न ...
स्वाधिष्ठान चक्र लिंग के पास है। वहाँ मोती जैसी डोर से प्राण शरीर भरता है। नाभि का चक्र मणिपूरक है, उसमें बारह स्पोक्स हैं। पुण्य पाप से जीव बंधा है। तब तक भटकता है जब तक सच नहीं मिलता। लिंग के ऊपर नाभि के नीचे कंद है, अंडे जैसा। वहाँ से बात्तर हज़ार नाड़ियाँ निकलती हैं, इनमें से बात्तर खास बताए गए हैं।
Karma-bandha vs tattva-jñāna; sādhana through prāṇa-manas regulationAnswers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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