
Chapter 378: Brahma-jñāna (Knowledge of Brahman)
भगवान अग्नि साधनों की क्रमिक उपलब्धियाँ बताते हैं—यज्ञ से दिव्य/लोकिक पद, तप से ब्रह्मा का स्थान, वैराग्ययुक्त संन्यास से प्रकृति-लय, और ज्ञान से कैवल्य। ज्ञान को चेतन-अचेतन का विवेक कहा गया है; परमात्मा सर्वाधार हैं, विष्णु और यज्ञेश्वर के रूप में स्तुत, जिन्हें प्रवृत्ति-मार्गी कर्मकाण्डी पूजते हैं और निवृत्ति-मार्गी ज्ञानयोगी साक्षात् करते हैं। शाब्द-ब्रह्म वेद/आगम-आधारित है, पर-ब्रह्म विवेक से अनुभूत; ‘भगवान’ शब्द की व्युत्पत्ति और छह भग—ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य—समझाए गए हैं। बन्धन का कारण अविद्या है—आत्मा पर अनात्मा का अध्यास; जल-अग्नि-घट के दृष्टान्त से आत्मा को प्रकृति के अधर्म से पृथक दिखाया गया है। साधना में विषयों से मन हटाकर हरि को ब्रह्मरूप स्मरण, और यम-नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, समाधि से ब्रह्म में मन का योग स्थिर करना कहा गया है। निराकार कठिन होने से पहले साकार ध्यान, अंत में अभेद-बोध; भेद अज्ञानजन्य है।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुराणे समाधिर्नाम सप्तसप्तत्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथाष्टसप्तत्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः ब्रह्मज्ञानं अग्निर् उवाच यज्ञैश् च देवानाप्नोति वैराजं तपसा पदं ब्रह्मणः कर्मसन्न्यासाद्वैराग्यात् प्रकृतौ लयं
इस प्रकार अग्नि-महापुराण में ‘समाधि’ नामक तीन सौ सतहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब तीन सौ अठहत्तरवाँ अध्याय ‘ब्रह्मज्ञान’ आरम्भ होता है। अग्नि ने कहा—यज्ञों से देवों तथा वैराज (विराट्) पद की प्राप्ति होती है; तप से ब्रह्मा का पद; और कर्म-सन्न्यास तथा वैराग्य से प्रकृति में लय प्राप्त होता है।
Verse 2
ज्ञानात् प्राप्नोति कैवल्यं पञ्चैता गतयःस्मृताः प्रीतितापविषादादेर्विनिवृत्तिर्विरक्तता
ज्ञान से कैवल्य (परम एकान्त मुक्ति) प्राप्त होती है; ये पाँच गतियाँ स्मृत हैं। और विरक्तता—प्रीति, ताप, विषाद आदि भावों की निवृत्ति—कही गई है।
Verse 3
सन्न्यासः कर्मणान्त्यागः कृतानामकृतैः सह अव्यक्तादौ विशेषान्ते विकारो ऽस्मिन्निवर्तते
संन्यास कर्मों का त्याग है—किए हुए और शेष रह गए अकृत कर्मों के अभिमान सहित। इस तत्त्व में अव्यक्त से लेकर विशेषों के अन्त तक समस्त विकार निवृत्त हो जाते हैं।
Verse 4
चेतनाचेतनान्यत्वज्ञानेन ज्ञानमुच्यते परमात्मा च सर्वेषामाधारः परमेश्वरः
चेतन और अचेतन के भेद का विवेक ही ‘ज्ञान’ कहा जाता है। और परमात्मा परमेश्वर है—जो सब प्राणियों का आधार और आश्रय है।
Verse 5
विष्णुनाम्ना च देवेषु वेदान्तेषु च गीयते यज्ञेश्वरो यज्ञपुमान् प्रवृत्तैर् इज्यते ह्य् असौ
वह देवों में और वेदान्त में ‘विष्णु’ नाम से गाया जाता है। वही यज्ञेश्वर, यज्ञ-पुरुष है; यज्ञकर्म में प्रवृत्त जन उसी की आराधना करते हैं।
Verse 6
निवृत्तैर् ज्ञानयोगेन ज्ञानमूर्तिः स चेक्ष्यते ह्रस्वदीर्घप्लुताद्यन्तु वचस्तत्पुरुषोत्तमः
जो ज्ञानयोग द्वारा विषय-निवृत्त हो गए हैं, वे उस ज्ञानमूर्ति को निश्चय ही देखते हैं। और वाणी—ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत आदि मात्राओं से आरम्भ होकर—अन्ततः वही परम पुरुष है।
Verse 7
तत्प्राप्तिहेतुर्ज्ञानञ्च कर्म चोक्तं महामुने आगमोक्तं विवेकाच्च द्विधा ज्ञानं तथोच्यते
हे महामुने, उस तत्त्व की प्राप्ति के हेतु ज्ञान और कर्म—दोनों कहे गए हैं। और ज्ञान भी दो प्रकार का कहा गया है—आगम (शास्त्र) से उपदिष्ट तथा विवेक से उत्पन्न।
Verse 8
शब्दब्रह्मागममयं परं ब्रह्म विवेकजम् द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये ब्रह्मशब्दपरञ्च यत्
परब्रह्म ‘शब्द-ब्रह्म’ रूप आगममय है और विवेकजन्य ज्ञान से अनुभूत होता है। इसलिए दो ब्रह्म जानने योग्य हैं—शब्दरूप ब्रह्म और परम ब्रह्म।
Verse 9
वेदादिविद्या ह्य् अपरमक्षरं ब्रह्मसत्परम् तदेतद्भगवद्वाच्यमुपचारे ऽर्चने ऽन्यतः
वेद आदि विद्याएँ वास्तव में परम अक्षर—परम सत्य ब्रह्म—में पर्यवसित होती हैं। वही (परम) अर्चना-उपचार और अन्य प्रसंगों में भक्तिपरक रूढ़ि से ‘भगवान्’ शब्द से कहा जाता है।
Verse 10
सम्भर्तेति तथा भर्ता भकारो ऽर्थद्वयान्वितः नेता गमयिता स्रष्टा गकारो ऽयं महमुने
‘भ’ अक्षर दो अर्थों से युक्त है—सम्भर्ता (पालन करने वाला) और भर्ता (आधार/धारण करने वाला)। ‘ग’ अक्षर नेता, गमयिता (प्रवर्तक) और स्रष्टा है, हे महर्षे।
Verse 11
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः ज्ञानवैराग्ययोश् चैव षणां भग इतीङ्गना
समग्र ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—इन छह का नाम ‘भग’ कहा गया है।
Verse 12
वसन्ति विष्णौ भुतानि स च धातुस्त्रिधात्मकः एवं हरौ हि भगवान् शब्दो ऽन्यत्रोपचारतः
समस्त भूत विष्णु में वास करते हैं और वही त्रिधात्मक धातु (मूल तत्त्व) है। इसलिए ‘भगवान्’ शब्द हरि के लिए मुख्य है; अन्यत्र वह केवल उपचार (गौण प्रयोग) से कहा जाता है।
Verse 13
उत्पत्तिं प्रलयश् चैव भूतानामगतिं गतिं वेत्ति विद्यामविद्याञ्च स वाच्यो भगवानिति
जो प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय, उनकी अगति और गति (असहाय अवस्था तथा सत्य मार्ग), तथा विद्या और अविद्या—इन दोनों को जानता है, वही ‘भगवान्’ कहलाता है।
Verse 14
ज्ञानशक्तिः परैश्वर्यं वीर्यं तेजांस्यशेषतः भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर् गुणादिभिः
ज्ञान-शक्ति, परम ऐश्वर्य, वीर्य और तेज—ये सब पूर्ण रूप से ‘भगवान्’ शब्द के वाच्य हैं; और यह किसी भी हेय (दोषपूर्ण) गुण आदि से रहित है।
Verse 15
खाण्डिक्यजनकायाह योगं केशिध्वजः पुरा अनात्मन्यात्मबुद्धिर्या आत्मस्वमिति या मतिः
पूर्वकाल में केशिध्वज ने खाण्डिक्य-जनक को योग का उपदेश दिया—कि जो बुद्धि अनात्मा में आत्मा का आरोप करती है, और जो ‘यह मेरा है’ (आत्मस्व) ऐसी मति है, वही मूल भ्रान्ति है।
Verse 16
अविद्याभवम्भूतिर्वीजमेतद्द्विधा स्थिरम् पञ्चभूतात्मके देहे देही मोहतमाश्रितः
अविद्या और भव-सम्भूति (संसार-भाव का उदय) यही बीज है—यह दो प्रकार का, दृढ़ रूप से स्थापित है। पंचभूतात्मक देह में देही मोह-तम (घोर अन्धकार) का आश्रय लेकर स्थित रहता है।
Verse 17
अहमेतदितीत्युच्चैः कुरुते कुमतिर्मतिं इत्थञ्च पुत्रपौत्रेषु तद्देहोत्पातितेषु च
‘मैं ही यह (देह) हूँ’—ऐसा सोचकर कुमति पुरुष ऊँचे स्वर से ऐसी धारणा प्रकट करता है; और इसी प्रकार पुत्र-पौत्रों के विषय में भी—जो उसी देह से उत्पन्न हुए हैं—यह भ्रान्ति बनी रहती है।
Verse 18
करोति पण्डितः साम्यमनात्मनि कलेवरे सर्वदेहोपकाराय कुरुते कर्म मानवः
पण्डित जन उस देह के प्रति, जो आत्मा नहीं है, समभाव रखता है; और मनुष्य को सभी देहधारियों के हित के लिए कर्म करना चाहिए।
Verse 19
देहश्चान्यो यदा पुंसस्तदा बन्धाय तत्परं निर्वाणमय एवायमात्मा ज्ञानमयो ऽमलः
जब मनुष्य देह को आत्मा से भिन्न मानकर उसी में आसक्त होता है, वही आसक्ति बन्धन का कारण बनती है; पर यह आत्मा वास्तव में निर्वाणस्वरूप, ज्ञानमय और निर्मल है।
Verse 20
दुःखज्ञानमयो ऽधर्मः प्रकृतेः स तु नात्मनः जलस्य नाग्निना सङ्गः स्थालीसङ्गात्तथापि हि
दुःख और (भ्रम)ज्ञान से युक्त अधर्म प्रकृति का है, आत्मा का नहीं। जल का अग्नि से प्रत्यक्ष संसर्ग नहीं होता; वह तो पात्र (हांडी) के संसर्ग से ही ऐसा प्रतीत होता है।
Verse 21
शब्दास्ते कादिका धर्मास्तत् कृता वै महामुने तथात्मा प्रकृतौ सङ्गादहंमानादिभूषितः
‘क’ आदि ध्वनियाँ ही धर्म (नियम/लक्षण) हैं—हे महामुने—ये प्रतिपादित किए गए हैं। इसी प्रकार आत्मा प्रकृति के संग से अहंकार आदि से ‘अलंकृत’ प्रतीत होती है।
Verse 22
भजते प्राकृतान्धर्मान् अन्यस्तेभ्यो हि सो ऽव्ययः वन्धाय विषयासङ्गं मनो निर्विषयं धिये
वह लौकिक (प्राकृत) धर्मों का आचरण करे, फिर भी उनसे वास्तव में भिन्न—अव्यय—है। विषयों में आसक्ति बन्धन के लिए है; और बुद्धि के लिए मन को निर्विषय (विषयरहित) करना चाहिए।
Verse 23
विषयात्तत्समाकृष्य ब्रह्मभूतं हरिं स्मरेत् आत्मभावं नयत्येनं तद्ब्रह्मध्यायिनं मुने
विषयों से मन को खींचकर ब्रह्मस्वरूप हरि का स्मरण करे। हे मुनि, यह साधना ब्रह्म-ध्यान करने वाले को आत्मभाव (आत्म-स्थिति) तक ले जाती है।
Verse 24
विचार्य स्वात्मनः शक्त्या लौहमाकर्षको यथा आत्मप्रयत्नसापेक्षा विशिष्टा या मनोगतिः
जैसे चुम्बक अपनी ही शक्ति से लोहे को खींचता है, वैसे ही मन की वह विशिष्ट गति आत्म-प्रयत्न (स्व-अनुशीलन) पर निर्भर रहती है।
Verse 25
तस्या ब्रह्मणि संयोगो योग इत्य् अभिधीयते विनिष्पन्दः समाधिस्थः परं ब्रह्माधिगच्छति
उस (मन) का ब्रह्म में संयोग ‘योग’ कहलाता है। समाधि में स्थित, स्पन्दन-रहित होकर, साधक परम ब्रह्म को प्राप्त करता है।
Verse 26
यमैः सन्नियमैः स्थित्या प्रत्याहृत्या मरुज्जयैः प्राणायामेन पवनैः प्रत्याहारेण चेन्द्रियैः
यमों और सुस्थापित नियमों से; आसन-स्थैर्य से; प्रत्याहृति से; मरुत् (प्राणवायु) पर विजय से; प्राणायाम तथा वायु-प्रवाहों के नियमन से; और प्रत्याहार—अर्थात् इन्द्रियों के संयम से।
Verse 27
वशीकृतैस्ततः कुर्यात् स्थितं चेतः शुभाश्रये आश्रयश्चेतसो ब्रह्म मूर्तञ्चामूर्तकं द्विधा
तत्पश्चात् इन्द्रियों को वश में करके मन को किसी शुभ आश्रय पर स्थिर करे। मन का आश्रय ब्रह्म है, जो दो प्रकार का है—मूर्त (साकार) और अमूर्त (निराकार)।
Verse 28
सनन्दनादयो ब्रह्मभावभावनया युताः कर्मभावनया चान्ये देवाद्याः स्थावरान्तकाः
सनन्दन आदि ब्रह्म-भाव की भावना से युक्त हैं; अन्य—देवों से लेकर स्थावर प्राणियों तक—कर्म-सम्बन्धी भावना से युक्त कहे गए हैं।
Verse 29
हिरण्यगर्भादिषु च ज्ञानकर्मात्मिका द्विधा त्रिविधा भावना प्रोक्ता विश्वं ब्रह्म उपास्यते
हिरण्यगर्भ आदि के विषय में भावना ज्ञान-स्वरूप और कर्म-स्वरूप—ऐसी द्विविध, तथा त्रिविध भी कही गई है; इसी से विश्वरूप ब्रह्म की उपासना की जाती है।
Verse 30
प्रत्यस्तमितभेदं यत् सत्तामात्रमगोचरं वचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्म संज्ञितम्
जिसमें भेद लीन हो गए हों, जो केवल सत् है, वाणी की पहुँच से परे है और आत्मानुभूति से ही जाना जाता है—वही ज्ञान ‘ब्रह्म’ कहलाता है।
Verse 31
तच्च विष्णोः परं रूपमरूपस्याजमक्षरं अशक्यं प्रथमं ध्यातुमतो मूर्तादि चिन्तयेत्
विष्णु का वह परम रूप—जो अरूप, अज और अक्षर है—आरम्भ में ध्यान करने योग्य नहीं; इसलिए मूर्ति आदि सगुण रूप से ही चिन्तन करना चाहिए।
Verse 32
सद्भावभावमापन्नस्ततो ऽसौ परमात्मना भवत्यभेदी भेदश् च तस्याज्ञानकृतो भवेत्
सद्भाव की अवस्था को प्राप्त होकर वह परमात्मा से अभिन्न हो जाता है; और उसमें जो भेद प्रतीत होता है, वह केवल अज्ञान से उत्पन्न होता है।
Sacrifice yields divine/Virāj states, tapas yields Brahmā’s station, renunciation with dispassion yields dissolution into prakṛti, and knowledge yields kaivalya—placing Brahma-jñāna as the direct route to liberation.
Śabda-brahman is Brahman approached through āgama/veda as sacred sound and doctrinal transmission, while para-brahman is realized through viveka and direct self-awareness beyond speech and distinctions.
Because the formless, unborn, imperishable supreme is difficult to grasp initially; therefore saguṇa contemplation serves as an entry-point that matures into nirguṇa realization and non-difference.
Avidyā: the superimposition of ‘I’ upon the body (anātman) and ‘mine’ upon related extensions, producing ego-sense and attachment through prakṛti.
It supplies the para-vidyā capstone: it reframes pravṛtti (ritual/action) and nivṛtti (knowledge/withdrawal) as a coherent ladder, and then gives operational yogic steps (yama-niyama through samādhi) to convert doctrine into realization.