
Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर को प्रसन्न कर, अर्जुन का मन एक ही लक्ष्य पर टिकता है—आज सूतपुत्र कर्ण का वध। वह गोविन्द से कहता है कि रथ फिर से कसकर तैयार हो, उत्तम अश्व जोते जाएँ और समस्त आयुध सज्ज हों; रणयात्रा अभी, शीघ्र। → दारुक रथ को चर्म-आवरण सहित युद्धोपकरणों से सुसज्जित करता है। मार्ग में शुभ शकुन और संकेत मिलते हैं, पर भीतर एक दूसरी धारा भी बहती है—अर्जुन के शरीर में पसीना छूटता है और मन में भारी चिन्ता उठती है कि आगे क्या होगा। श्रीकृष्ण उसी क्षण उसे धैर्य, नीति और लक्ष्य-स्मरण से बाँधते हैं: कर्ण ही वह मूल है जिसके सहारे दुर्योधन स्वयं को वीर मानता है। → श्रीकृष्ण का तीक्ष्ण प्रोत्साहन निर्णायक बनता है—‘रथियों में श्रेष्ठ सूतपुत्र को आज कालवश कर; उसे मारकर धर्मराज को प्रीति दे।’ अर्जुन के भीतर संदेह और संकल्प का संघर्ष चरम पर पहुँचता है; कर्ण की सामर्थ्य (बल, अभिमान, अस्त्र-विद्या, युद्ध-कौशल, देश-काल-ज्ञान) का स्मरण भी उसी क्षण उसे और कस देता है। → रथ पूर्णतः तैयार है, रणयात्रा निश्चित है। अर्जुन का लक्ष्य स्पष्ट कर दिया गया है—कर्ण-वध केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं, बल्कि कौरव-बल की जड़ काटने का उपाय है। श्रीकृष्ण का आश्वासन और नीति-निर्देश अर्जुन को आगे बढ़ने योग्य बनाते हैं। → अर्जुन की भीतर की चिन्ता बनी रहती है—कर्ण जैसा महारथी सामने है; अब अगला अध्याय उसी टकराव की ओर धकेलता है।
Verse 1
अफ्--_क+ द्विसप्ततितमो< ध्याय: श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रणयात्रा, मार्गमें शुभ शकुन तथा श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रोत्साहन देना संजय उवाच प्रसाद्य धर्मराजान प्रहृष्टेनान्तरात्मना । पार्थ: प्रोवाच गोविन्द सूतपुत्रवधोद्यत:,संजय कहते हैं--राजन्! इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिरको प्रसन्न करके अर्जुन सूतपुत्र कर्णका वध करनेके लिये उद्यत हो प्रसन्नचित्त होकर श्रीकृष्णसे बोले--
Sanjaya said: Having satisfied Dharmarāja (Yudhiṣṭhira), Pārtha (Arjuna)—his inner being uplifted and joyful—spoke to Govinda (Kṛṣṇa), resolved upon the slaying of Karṇa, the charioteer’s son. The moment frames Arjuna’s vow as an act undertaken after securing the king’s assent, aligning personal resolve with royal duty and the larger demands of dharma in war.
Verse 2
कल्पतां मे रथो भूयो युज्यन्तां च हयोत्तमा: । आयुधानि च सर्वाणि सज्जन्तां मे महारथे,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “Let my chariot be made ready again; let the finest horses be yoked. Let every weapon be set in readiness on my great chariot. Go forth quickly, O Govinda—driven by the resolve to slay the charioteer’s son.”
Verse 3
उपावृत्ताश्न तुरगाः शिक्षिताश्षाश्वसादिभि: । रथोपकरणै: सज्जा उपायान्तु त्वरान्विता:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “Let the horses, well-rested and trained by the grooms, be brought quickly, fully harnessed with the chariot-gear. Go forth at once, O Govinda, driven by the resolve to slay the charioteer’s son.”
Verse 4
एवमुक्तो महाराज फाल्गुनेन महात्मना,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” महाराज! महात्मा अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने दारुकसे कहा --'सारथे! समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ भरतभूषण अर्जुनने जैसा कहा है, उसके अनुसार सारी तैयारी करो”
Sañjaya said: “O King, thus addressed by the great-souled Phālguna (Arjuna), ‘Go swiftly, Govinda—moved by the resolve to slay the charioteer’s son.’”
Verse 5
उवाच दारुक॑ कृष्ण: कुरु सर्व यथाब्रवीत् | अर्जुनो भरतश्रेष्ठ: श्रेष्ठ: सर्वधनुष्मताम्,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” महाराज! महात्मा अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने दारुकसे कहा --'सारथे! समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ भरतभूषण अर्जुनने जैसा कहा है, उसके अनुसार सारी तैयारी करो”
Sañjaya said: Krishna spoke to Daruka, “Do everything exactly as he has said. Arjuna, the best of the Bharatas and foremost among all archers, is resolved to slay the charioteer’s son. Therefore, Govinda, set out at once.”
Verse 6
आज्ञप्तस्त्वथ कृष्णेन दारुको राजसत्तम | योजयामास स रथं वैयाघ्रं शत्रुतापनम्,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: Then, commanded by Kṛṣṇa, Dāruka—the best of charioteers—harnessed that tiger-like, enemy-scorching chariot. (Kṛṣṇa urged:) “Go swiftly, Govinda, with the resolve to slay the charioteer’s son.”
Verse 7
युक्त तु तं रथं दृष्टया दारुकण महात्मना,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” महामना दारुकके द्वारा जोतकर लाये हुए उस रथको देखकर अर्जुन धर्मराजसे आज्ञा ले ब्राह्मणोंसे स््वस्तिवाचन कराकर कल्याणके आश्रयभूत उस परम मंगलमय उत्तम रथपर आरूढ हुए
Sañjaya said: Seeing that chariot duly harnessed by the great-souled Dāruka, Arjuna said, “Go quickly, O Govinda, with the resolve to slay the charioteer’s son (Karṇa).” The verse marks the war’s urgency, yet casts it as a deliberate, purpose-driven advance—an ethically weighted resolve borne under the dharmic burden of battle.
Verse 8
आपूृच्छ् धर्मराजान ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च । सुमड्रलस्वस्त्ययनमारुरोह रथोत्तमम्,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” महामना दारुकके द्वारा जोतकर लाये हुए उस रथको देखकर अर्जुन धर्मराजसे आज्ञा ले ब्राह्मणोंसे स््वस्तिवाचन कराकर कल्याणके आश्रयभूत उस परम मंगलमय उत्तम रथपर आरूढ हुए
Sañjaya said: Having taken leave of King Yudhiṣṭhira and asked the brāhmaṇas to pronounce blessings of well-being, Arjuna mounted the finest of chariots—an auspicious car attended by rites of good fortune. Then he urged Govinda to depart at once, driven by the resolve to confront and slay the charioteer’s son (Karṇa). Even in war’s haste, the warrior moves within dharma: seeking leave, honoring sacred speech, and advancing with solemn purpose rather than mere rage.
Verse 9
तस्य राजा महाप्राज्ञो धर्मराजो युधिष्ठिर: । आशिषोथ्युद्धक्त स ततः प्रायात् कर्णरथं प्रति,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” उस समय महाबुद्धिमान् धर्मराज राजा युधिष्ठिरने अर्जुनको आशीर्वाद दिये। तत्पश्चात् उन्होंने कर्णके रथकी ओर प्रस्थान किया
Sañjaya said: Then King Yudhiṣṭhira, lord of dharma and a man of great wisdom, bestowed blessings upon Arjuna. Thereafter he set out toward Karṇa’s chariot. He urged Govinda to depart at once, driven by the resolve to bring down the sūta’s son (Karṇa), and to proceed swiftly for that purpose.
Verse 10
भारत! महाधनुर्धर अर्जुनको आते देख समस्त प्राणियोंको यह विश्वास हो गया कि अब कर्ण महामनस्वी पाण्डुपुत्र अर्जुनके हाथसे अवश्य मारा जायगा,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “O Bhārata! Seeing the great bowman Arjuna advancing, all beings became convinced: ‘Now Karṇa, the high-minded one, will surely be slain by Pāṇḍu’s son Arjuna.’ ‘Go quickly, Govinda, with the intent to kill the charioteer’s son. Govinda, have my chariot made ready again; yoke the finest horses to it; and in that vast chariot arrange and place every kind of missile and weapon. Let the horses—trained and exercised by skilled riders—come here at once, fully equipped with the chariot’s gear. And you, with the desire to bring down the sūta’s son, depart from here without delay.’
Verse 11
बभूवुर्विमला: सर्वा दिशो राजन् समन्ततः । चाषाक्ष शतपत्राश्न क्रौज्चाश्रैव जनेश्वर,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: O King, on every side the quarters became clear and bright. Cranes and other auspicious birds were seen, O lord of men. Then he urged Govinda: “Go quickly, with the resolve to slay the charioteer’s son. Let my chariot be made ready at once; yoke again the finest horses. Arrange in my great car every kind of weapon and missile. Let the horses—trained and exercised by skilled riders—come here swiftly, fully equipped with the fittings of the chariot. And you, Govinda, depart from here without delay, intent on the death of the sūta’s son.”
Verse 12
बहव: पक्षिणो राजन् पुन्नामान: शुभा: शिवा:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “O King, many auspicious and benign birds, bearing favorable names, are calling out. Go forth quickly, O Govinda, with the resolve to slay the charioteer’s son.”
Verse 13
कड्का गृश्रा बका: श्येना वायसाश्न विशाम्पते,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “O lord of men, the kites, vultures, cranes, hawks, and crows are gathering. Go forth quickly, O Govinda, with the resolve to strike down the charioteer’s son.”
Verse 14
अग्रतस्तस्य गच्छन्ति मांसहेतोर्भयानका: । प्रजानाथ! कंक, गृध्र, बक, बाज और कौए आदि भयानक पक्षी मांसके लिये उनके आगे-आगे जा रहे थे ।। निमित्तानि च धन्यानि पाण्डवस्य शशंसिरे,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “In front of him went terrifying birds, driven by the lure of flesh—herons, vultures, cranes, hawks, crows, and the like—moving ahead as if anticipating slaughter. And auspicious omens, too, proclaimed good fortune for the Pāṇḍava. ‘Go quickly, Govinda,’ (Arjuna urged), ‘with the resolve to slay the charioteer’s son.’”
Verse 15
प्रयातस्याथ पार्थस्य महान् स्वेदो व्यजायत,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: As Pārtha set out, a great sweat arose upon him. He urged, “Go swiftly, Govinda—driven by the resolve to slay the charioteer’s son.”
Verse 16
ततो गाण्डीवधन्वानमब्रवीन्मधुसूदन:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: Then Madhusūdana (Kṛṣṇa) addressed the wielder of the Gāṇḍīva (Arjuna): “Go swiftly, O Govinda—driven by the resolve to slay the charioteer’s son.”
Verse 17
दृष्टवा पार्थ तथा यान्तं चिन्तापरिगतं तदा । रथमें बैठकर चलते समय गाण्डीवधारी अर्जुनको चिन्तामग्न देख भगवान् श्रीकृष्णने उनसे इस प्रकार कहा ।। वायुदेव उवाच गाण्डीवधन्चन् संग्रामे ये त्वया धनुषा जिता:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: Seeing Arjuna, wielder of the Gāṇḍīva, setting forth with his mind seized by anxious thought, Lord Śrī Kṛṣṇa addressed him thus. Then comes a stern call to make the chariot ready—yoke again the finest horses, arm the great car with every weapon—and to depart at once with the resolve to slay the “charioteer’s son” (Karna). In its ethical cadence it presses the urgency of battle-duty and firm resolve, while revealing the inward strain that even a righteous warrior may carry into war.
Verse 18
दृष्टवा हि बहव: शूरा: शक्रतुल्यपराक्रमा:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “Seeing that many heroes, equal in prowess to Indra, are present, depart at once, O Govinda—set forth quickly with the resolve to slay the charioteer’s son (Karna).” The line carries the battlefield’s urgency, pressing for decisive action—strategic and morally weighty—to end a formidable foe whose survival prolongs slaughter.
Verse 19
को हि द्रोणं च भीष्मं च भगदत्तं च मारिष,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “O revered one, who could stand against Droṇa and Bhīṣma, and Bhagadatta as well? Go forth quickly, O Govinda, with the resolve to slay the charioteer’s son.” In the war’s moral air, the line joins urgency to strategic necessity: it presses Kṛṣṇa (Govinda) to act decisively against Karṇa, deemed a grave threat, while invoking the daunting stature of earlier champions—an ethical tension between protecting one’s own and the relentless escalation of violence.
Verse 20
तमायान्तं महेष्वासं दृष्टवा भूतानि भारत । निहतं मेनिरे कर्ण पाण्डवेन महात्मना,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजं च सुदक्षिणम् । श्रुतायुषं महावीर्यमच्युतायुषमेव च । प्रत्युदगम्य भवेत् क्षेमी यो न स्यात् त्वमिव प्रभो
Sañjaya said: “O Bhārata, when the great archer came into view, the beings on the battlefield thought Karṇa had been slain by the high-souled Pāṇḍava. ‘Go quickly, Govinda, with the intent to kill the charioteer’s son (Karna).’ If one were to go out to meet Vindānu-vinda of Avanti, the Kāmboja, Sudakṣiṇa, the mighty Śrutāyus, and Acyutāyus, he might return safely—yet none could do so as you can, O Lord.”
Verse 21
प्रभो! आर्य! जो तुम्हारे-जैसा वीर न हो, ऐसा कौन पुरुष द्रोणाचार्य, भीष्म, भगदत्त, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण, महापराक्रमी श्रुतायु तथा अच्युतायुका सामना करके सकुशल रह सकता था ।। तव ह्[ुस्त्राणि दिव्यानि लाघवं बलमेव च । असम्मोहश्न युद्धेषु विज्ञानस्य च संतति:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” तुम्हारे पास दिव्य अस्त्र हैं, तुममें फुर्ती है, बल है, युद्धके समय तुम्हें घबराहट नहीं होती, तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंका विस्तृत ज्ञान है तथा लक्ष्यको वेधने तथा गिरानेकी कला ज्ञात है। अर्जुन! लक्ष्यको वेधते समय तुम्हारा चित्त एकाग्र रहता है। गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण देवताओं तथा चराचर प्राणियोंको तुम एक साथ मार सकते हो
Sañjaya said: “O lord, O noble one—what man, lacking a hero like you, could confront Droṇācārya, Bhīṣma, Bhagadatta, the Avanti princes Vinda and Anuvinda, the Kāmboja king Sudakṣiṇa, and the mighty Śrutāyu and Acyutāyu, and still remain unharmed? You possess divine weapons, swiftness, and strength; in battle you do not lose your composure, and you have an unbroken mastery of martial knowledge. Therefore, O Govinda, set out at once with the resolve to slay the charioteer’s son (Karna).”
Verse 22
वेध: पातश्चव लक्ष्येषु योगश्वैव तथार्जुन भवान् देवान् सगन्धर्वान् हन्यात् सह चराचरान्,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” तुम्हारे पास दिव्य अस्त्र हैं, तुममें फुर्ती है, बल है, युद्धके समय तुम्हें घबराहट नहीं होती, तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंका विस्तृत ज्ञान है तथा लक्ष्यको वेधने तथा गिरानेकी कला ज्ञात है। अर्जुन! लक्ष्यको वेधते समय तुम्हारा चित्त एकाग्र रहता है। गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण देवताओं तथा चराचर प्राणियोंको तुम एक साथ मार सकते हो
Sañjaya said: “Arjuna, you possess the arts of piercing and bringing down targets, and you are steadfast in disciplined skill. With such prowess, if you so chose, you could slay even the gods together with the Gandharvas, along with all beings—moving and unmoving. Therefore, O Govinda, depart at once, intent on the death of the charioteer’s son.”
Verse 23
पृथिव्यां तु रणे पार्थ न योद्धा त्वत्सम: पुमान् । धनुग्रहा हि ये केचित् क्षत्रिया युद्धदुर्मदा:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “O Pārtha, on this earth, in battle there is no man equal to you as a warrior. Whatever Kṣatriyas there are who take up the bow—though maddened by the pride of war—none match you. Therefore, O Govinda, depart at once, intent on the slaying of the charioteer’s son (Karna).”
Verse 24
आ देवात् त्वत्समं तेषां न पश्यामि शृणोमि च । कुन्तीकुमार! इस भूमण्डलपर दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान योद्धा नहीं है। यहाँसे देवलोकतक धनुष धारण करनेवाले जो कोई भी रणदुर्मद क्षत्रिय हैं, उनमेंसे किसीको भी मैं तुम्हारे समान न तो देखता हूँ और न सुनता ही हूँ ।। ब्रह्मणा च प्रजा: सृष्टवा गाण्डीवं च महद् धनु:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” येन त्वं युध्यसे पार्थ तस्मान्नास्ति त्ववा सम: । पार्थ! ब्रह्माजीने सम्पूर्ण प्रजाकी सृष्टि की है और उन्होंने ही उस विशाल धनुष गाण्डीवकी भी रचना की है, जिसके द्वारा तुम युद्ध करते हो; अतः तुम्हारी समानता करनेवाला कोई नहीं है
Sañjaya said: “O son of Kuntī, among all those warriors—from this earth up to the realm of the gods—who bear the bow and are fierce with battle-pride, I neither see nor even hear of anyone equal to you. On this whole earth there is no second man who matches you as a fighter.”
Verse 25
।। अवश्यं तु मया वाच्यं यत् पथ्यं तव पाण्डव,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “Yet I must say what is wholesome for you, O Pāṇḍava. Go quickly, O Govinda, with the resolve to slay the charioteer’s son (Karna).”
Verse 26
मावमंस्था महाबाहो कर्णममाहवशोभिनम् | पाण्डुनन्दन! तो भी जो बात तुम्हारे लिये हितकर हो, उसे बता देना मैं आवश्यक समझता हूँ। महाबाहो! संग्राममें शोभा पानेवाले कर्णकी अवहेलना न करना ।। कर्णो हि बलवान दृप्तः कृतास्त्रश्न महारथ:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “O mighty-armed one, do not belittle Karna, the ornament of battle. O son of Pandu, I consider it necessary to tell you what is truly for your good: do not treat with contempt Karna, who shines in war. For Karna is powerful, proud, a master of weapons, and a great chariot-warrior. Go quickly, O Govinda, with the resolve to slay the charioteer’s son.”
Verse 27
बहुनात्र किमुक्तेन संक्षेपाच्छूणु पाण्डव,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” पाण्डुनन्दन! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ, संक्षेपसे ही सुन लो। मैं महारथी कर्णको तुम्हारे समान या तुमसे भी बढ़कर मानता हूँ। अतः: महासमरमें महान् प्रयत्न करके तुम्हें उसका वध करना होगा
Sañjaya said: “Why speak at length? Hear it in brief, O Pāṇḍava. Set out at once, O Govinda, resolved to slay the charioteer’s son.”
Verse 28
त्वत्समं त्वद्विशिष्टं वा कर्ण मन््ये महारथम् । परम॑ यत्नमास्थाय त्वया वध्यो महाहवे,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” पाण्डुनन्दन! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ, संक्षेपसे ही सुन लो। मैं महारथी कर्णको तुम्हारे समान या तुमसे भी बढ़कर मानता हूँ। अतः: महासमरमें महान् प्रयत्न करके तुम्हें उसका वध करना होगा
Sañjaya said: “Karna, I deem, is a great chariot-warrior equal to you—or even superior. Therefore, in the great battle you must exert the utmost effort to slay him. Go quickly, O Govinda, resolved to strike down the charioteer’s son.”
Verse 29
तेजसा वह्लिसदृशो वायुवेगसमो जवे । अन्तकप्रतिम: क्रोधे सिंहसंहननो बली,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” कर्ण तेजमें अग्निके सदृश, वेगमें वायुके समान, क्रोधमें यमराजके तुल्य, सुदृढ़ शरीरमें सिंहके सदृश तथा बलवान् है
Sañjaya said: “Karna is like blazing fire in splendor, like the wind in speed, like Death itself in wrath, lion-built in frame, and mighty in strength. Therefore, Govinda, set out at once—driven by the resolve to slay the charioteer’s son.”
Verse 30
अष्टरल्निर्महाबाहुर्व्यूढोरस्क: सुदुर्जय: । अभिमानी च शूरश्व प्रवीर: प्रियदर्शन:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये”
Sañjaya said: “He is a mighty-armed warrior, broad-chested and arrayed in battle-formation, exceedingly hard to overcome—proud, valiant, a foremost hero, and pleasing to behold. Go quickly, O Govinda, with the resolve to slay the charioteer’s son.”
Verse 31
उसके शरीरकी ऊँचाई आठ रत्नि- (एक सौ अड़सठ अंगुल) है। उसकी भुजाएँ बड़ी- बड़ी और छाती चौड़ी है। उसे जीतना अत्यन्त कठिन है। वह अभिमानी, शौर्यसम्पन्न, प्रमुख वीर और प्रियदर्शन (सुन्दर) है ।। सर्वयोधगुणैर्युक्तो मित्राणामभयंकर: । सतत पाण्डवद्देषी धार्तराष्ट्रहिते रत:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” उसमें योद्धाओंके सभी गुण हैं। वह अपने मित्रोंको अभय देनेवाला है तथा दुर्योधनके हितमें तत्पर रहकर पाण्डवोंसे सदा द्वेष रखता है
Sañjaya said: “He is endowed with every excellence of a warrior; to his allies he is a giver of fearlessness. Ever hostile to the Pāṇḍavas, he is devoted to the welfare of the Dhārtarāṣṭras. Therefore, O Govinda, set out at once—intent on the slaying of the charioteer’s son.”
Verse 32
सर्वैरवध्यो राधेयो देवैरपि सवासवै: । ऋते त्वामिति मे बुद्धिस्तदद्य जहि सूतजम्,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” मेरा तो ऐसा विचार है कि राधापुत्र कर्ण तुम्हें छोड़कर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अवध्य है; अतः तुम आज सूतपुत्रका वध करो
Sañjaya said: “To all others, Radheya (Karna) is invincible—even to the gods together with Indra. My conviction is that only you are the exception. Therefore, today slay the charioteer’s son. Go quickly, O Govinda, with the resolve to bring down the son of a sūta.”
Verse 33
देवैरपि हि संयत्तैर्ि भ्रद्धिर्मासशोणितम् । अशक्य: स रथो जेतुं सर्वैरपि युयुत्सभि:,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” समस्त देवता भी यदि रक्त-मांसयुक्त शरीरको धारण करके युद्धकी अभिलाषा लेकर विजयके लिये प्रयत्नशील हो रणभूमिमें आ जायेँ तो उनके लिये रथसहित कर्णको जीतना असम्भव है
Sanjaya said: “Go quickly, Govinda, intent on slaying the charioteer’s son. ‘Govinda, let my chariot be made ready at once. Yoke again the finest horses; in my great chariot arrange every kind of weapon and missile. Let the horses—trained and exercised by skilled riders—come here immediately, fully equipped with all chariot-gear; and you, with the resolve to kill the charioteer’s son, depart from here without delay.’ For even if the gods themselves—armed and eager for battle, bearing bodies of flesh and blood—were to come to the field striving for victory, it would be impossible for them, though all were desirous of fighting, to conquer Karna together with his chariot.
Verse 34
दुरात्मानं पापवृत्तं नृशंसं दुष्टप्रज्ञं पाण्डवेयेषु नित्यम् । हीनस्वार्थ पाण्डवेयैर्विरो थे हत्वा कर्ण निश्चितार्थों भवाद्य,अतः आज तुम दुरात्मा, पापाचारी, क्रूर, पाण्डवोंके प्रति सदा दुर्भावना रखनेवाले और किसी स्वार्थके बिना ही पाण्डव-विरोधमें तत्पर हुए कर्णका वध करके सफलमनोरथ हो जाओ
Vāyu said: “Karna is a wicked-souled man—sinful in conduct, ruthless, and of perverted judgment—ever hostile toward the sons of Pāṇḍu. Having taken up enmity with the Pāṇḍavas without any worthy personal aim, he stands fixed in that resolve. Therefore, today, by slaying Karna, fulfill your purpose and make your endeavor successful.”
Verse 35
त॑ सूतपुत्र॑ रथिनां वरिष्ठ निष्कालिकं कालवशं नयाद्य । त॑ सूतपुत्रं रथिनां वरिष्ठ हत्वा प्रीतिं धर्मराजे कुरुष्व,रथियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र अपनेको कालके वशमें नहीं समझता है। तुम उसे आज ही कालके अधीन कर दो। रथियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र कर्णको मारकर धर्मराज युधिष्छिरको प्रसन्न करो
Vāyu said: “O best of chariot-warriors, bring that charioteer’s son under the power of Time today—he does not regard himself as subject to fate. Slay Karṇa, the foremost among chariot-fighters, and thereby give satisfaction to Dharmarāja Yudhiṣṭhira.”
Verse 36
जानामि ते पार्थ वीर्य यथावद् दुर्वारणीयं च सुरासुरैश्न । सदावजानाति हि पाण्डुपुत्रा- नसौ दर्पात् सूतपुत्रो दुरात्मा,पार्थ! मैं तुम्हारे उस बल-पराक्रमको अच्छी तरह जानता हूँ, जिसका निवारण करना देवताओं और असुरोंके लिये भी कठिन है। दुरात्मा सूतपुत्र कर्ण घमंडमें आकर सदा पाण्डवोंका अपमान करता है
Vāyu said: “O Pārtha, I know well your true might—so irresistible that even gods and demons would find it hard to check. Yet, out of arrogance, that wicked son of a charioteer, Karṇa, continually insults the sons of Pāṇḍu.”
Verse 37
आत्मानं मन्यते वीरं येन पाप: सुयोधन: । तमद्य मूलं पापानां जहि सौतिं धनंजय,धनंजय! जिसके साथ होनेसे पापी दुर्योधन अपनेको वीर मानता है, वह सूतपुत्र कर्ण ही सारे पापोंकी जड़ है; अत: आज तुम उसे मार डालो
Vāyu said: “Because of him the sinful Suyodhana (Duryodhana) imagines himself a hero. Karṇa, the charioteer’s son, is the very root of these wrongs. Therefore, today, Dhanañjaya, strike down Sūti.”
Verse 38
खड्गजिद्द धनुरास्यं शरदंष्टं तरस्विनम् | दृप्तं पुरुषशार्टूलं जहि कर्ण धनंजय,अर्जुन! कर्ण पुरुषोंमें सिंहके समान है, तलवार ही उसकी जिह्ठा है, धनुष ही उसका फैला हुआ मुख है, बाण उसकी दाढ़ें हैं, वह अत्यन्त वेगशशाली और अभिमानी है। तुम उसका वध करो
Vāyu said: “O Dhanañjaya Arjuna, strike down Karṇa. He is like a lion among men—his tongue is a sword, his gaping mouth is the bow, and his teeth are arrows. He is exceedingly swift and swollen with pride. Therefore, slay him.”
Verse 39
अहं त्वामनुजानामि वीर्येण च बलेन च । जहि कर्ण रणे शूर मातज्रमिव केसरी,जैसे सिंह मतवाले हाथीको मार डालता है, उसी प्रकार तुम भी अपने बल और पराक्रमसे रणभूमिमें शूरवीर कर्णको मार डालो। इसके लिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ
Vāyu said: “I grant you leave and empower you with valor and strength. Slay Karṇa in battle, O hero—just as a lion brings down a mighty elephant. By my command, act decisively on the battlefield.”
Verse 40
यस्य वीर्येण वीर्य ते धार्तराष्ट्रोडवमन्यते । तमद्य पार्थ संग्रामे कर्ण वैकर्तनं॑ जहि,पार्थ! जिसके बलसे दुर्योधन तुम्हारे बल-पराक्रमकी अवहेलना करता है, उस वैकर्तन कर्णको आज तुम युद्धमें मार डालो
Vāyu said: “It is relying on that man’s might that Dhṛtarāṣṭra’s son dares to slight your own valor. Therefore, O Pārtha, today in the battle, strike down Karṇa, Vaikartana—the ‘son of the cutter’.”
Verse 66
सज्जं निवेदयामास पाण्डवस्य महात्मन: । नृपश्रेष्ठ! श्रीकृष्णके इस प्रकार आदेश देनेपर दारुकने व्याप्र-चर्मसे आच्छादित तथा शत्रुओंको तपानेवाले रथको जोतकर तैयार कर दिया और महामना पाण्डुकुमार अर्जुनके पास आकर निवेदन किया कि “आपका रथ सब सामग्रियोंसे सुसज्जित है”
Dāruka approached the great-souled Arjuna, son of Pāṇḍu, and reported: “O best of kings! At Śrī Kṛṣṇa’s command, I have yoked and made ready the war-chariot, covered with tiger-skin and fierce to the foes; and I have come to declare: ‘Your chariot is fully equipped with every requisite.’”
Verse 71
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत कर्णपर्वमें अर्जुनका प्रतिज्ञाविषयक एक सौ इकद्वत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
Sañjaya concludes: Thus ends, in the Karṇa Parva of the revered Mahābhārata, the one-hundred-and-seventy-first chapter, centered on Arjuna’s vow—closing a narrative unit in which personal resolve is cast as a moral commitment amid the pressures of war.
Verse 72
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कृष्णार्जुनसंवादे द्विसप्ततितमो5ध्याय:
Thus, in the Śrī Mahābhārata, within the Karṇa Parva, in the dialogue between Kṛṣṇa and Arjuna, ends the seventy-second chapter—a colophon marking the close of a section of the war narrative framed through counsel and reflection on right conduct amid battle.
Verse 113
प्रदक्षिणमकुर्वन्त तदा वै पाण्डुनन्दनम् | राजन! सम्पूर्ण दिशाएँ सब ओरसे निर्मल हो गयी थीं। नरेश्वर! नीलकण्ठ, सारस और क्रौंच पक्षी पाण्डुनन्दन अर्जुनको दाहिने रखते हुए जाने लगे
Sañjaya said: Then the beings there began to circumambulate the son of Pāṇḍu. O King, the quarters on every side became wholly clear and pure. O lord of men, blue-throated birds, cranes, and krauñca-birds proceeded with Arjuna—the son of Pāṇḍu—kept to their right, an auspicious sign that framed him as protected by favorable omens amid the moral strain of war.
Verse 126
त्वरयन्तोडर्जुनं युद्धे हृष्टरूपा ववाशिरे । राजन! पुरुष जातिवाले बहुत-से शुभकारक मंगलदायक पक्षी अर्जुनको युद्धके लिये उतावले करते हुए बड़े हर्षमें भरकर चहचहा रहे थे
Sañjaya said: O King, many auspicious, beneficent birds—of the kind associated with good omens—chirped joyfully, as if urging Arjuna to hasten into battle. Their delighted cries signaled a favorable turn, strengthening resolve amid the moral weight of war.
Verse 143
विनाशमरिसैन्यानां कर्णस्य च वध प्रति । इस प्रकार बहुत-से शुभ शकुन पाण्डुपुत्र अर्जुनको उनके शत्रुओंके विनाश तथा कर्णके वधकी सूचना दे रहे थे
Sañjaya said: “Thus, many auspicious omens were indicating to Arjuna, the son of Pāṇḍu, the destruction of the enemy forces and, in particular, the impending slaying of Karṇa.”
Verse 176
न तेषां मानुषो जेता त्वदन्य इह विद्यते । श्रीकृष्ण बोले--गाण्डीवधारी अर्जुन! तुमने अपने धनुषसे जिन-जिन वीरोंपर विजय पायी है, उन्हें जीतनेवाला इस संसारमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मनुष्य नहीं है
Vāyu said: “Among those warriors, no human victor exists here other than you. Apart from you, there is no man in this world capable of conquering the heroes whom you have already subdued by the power of your bow.”
Verse 186
त्वां प्राप्प समरे शूरं ते गता: परमां गतिम् | मैंने देखा है इन्द्रके समान पराक्रमी बहुत-से शूरवीर समरांगणमें तुझ शौर्यसम्पन्न वीरके पास आकर परम गतिको प्राप्त हो गये
O hero, having reached you in battle, they have attained the highest end. Many valiant warriors—mighty like Indra—came before you on the field, and, meeting your prowess, passed on to their supreme destiny.
Verse 263
कृती च चित्रयोधी च देशकालस्य कोविद: । क्योंकि कर्ण बलवान, अभिमानी, अस्त्रविद्याका विद्वान, महारथी, युद्धकुशल, विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाला तथा देशकालको समझनेवाला है
Vāyu-deva said: “He is capable and accomplished; he fights in wondrous, unconventional ways; and he is discerning about place and time.”
Verse 1536
चिन्ता च विपुला जज्ञे कथं चेद॑ भविष्यति | युद्धके लिये प्रस्थान करनेपर कुन्तीकुमार अर्जुनके शरीरमें बड़े जोरसे पसीना छूटने लगा तथा मन-ही-मन भारी चिन्ता होने लगी कि “यह सब कैसे होगा?”
Sañjaya said: A great anxiety arose—wondering, “How will all this turn out?” As Arjuna, Kuntī’s son, set out for battle, his body broke into a heavy sweat and his mind was seized by deep apprehension.