वेध: पातश्चव लक्ष्येषु योगश्वैव तथार्जुन भवान् देवान् सगन्धर्वान् हन्यात् सह चराचरान्,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” तुम्हारे पास दिव्य अस्त्र हैं, तुममें फुर्ती है, बल है, युद्धके समय तुम्हें घबराहट नहीं होती, तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंका विस्तृत ज्ञान है तथा लक्ष्यको वेधने तथा गिरानेकी कला ज्ञात है। अर्जुन! लक्ष्यको वेधते समय तुम्हारा चित्त एकाग्र रहता है। गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण देवताओं तथा चराचर प्राणियोंको तुम एक साथ मार सकते हो
sañjaya uvāca | vedhaḥ pātaś caiva lakṣyeṣu yogaś caiva tathārjuna | bhavān devān sagandharvān hanyāt saha carācarān | prayāhi śīghraṃ govinda sūtaputra-jighāṃsayā ||
Sañjaya said: “Arjuna, you possess the arts of piercing and bringing down targets, and you are steadfast in disciplined skill. With such prowess, if you so chose, you could slay even the gods together with the Gandharvas, along with all beings—moving and unmoving. Therefore, O Govinda, depart at once, intent on the death of the charioteer’s son.”
संजय उवाच