
अलायुधस्य भीमवधसंकल्पः (Alāyudha’s Resolve to Confront Bhīma)
Upa-parva: Niśā-yuddha (Night-Engagement Episodes) — Alāyudha’s Advance
Saṃjaya reports that, amid ongoing combat, the rākṣasa-king Alāyudha advances with a large and fearsome host toward Duryodhana, explicitly motivated by remembered prior enmities. He recalls the deaths of his rākṣasa kin/associates—Hiḍimba, Baka, and Kirmīra—at Bhīma’s hands, and also references the earlier affront involving Hiḍimbā. Declaring intent to kill (and consume) the Pāṇḍavas with his followers, he requests that the Kaurava forces be held back while he engages them. Duryodhana responds with approval, stating that his troops, driven by vengeance, will rally with Alāyudha placed in the forefront. The chapter then provides a vivid martial description: Alāyudha’s radiant chariot likened to the sun, its banners and fittings, the sound of its movement, the extraordinary horses, and his formidable weaponry—imagery that parallels Ghaṭotkaca’s battlefield presence. The passage closes by noting the surrounding engagement as Pāṇḍava warriors fight vigorously on all sides, situating Alāyudha’s approach within a wider nocturnal escalation of hostilities.
Chapter Arc: युद्ध-धूलि के बीच श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के पास विजय-संदेश लेकर आते हैं—जयद्रथ का वध हो चुका है और अर्जुन की प्रतिज्ञा पूर्ण हुई है। → युधिष्ठिर के मन में एक साथ दो धाराएँ उठती हैं—एक ओर अपार राहत कि सूर्यास्त से पहले प्रतिज्ञा निभ गई, दूसरी ओर यह आशंका कि इस विजय की कीमत कितनी भारी पड़ी होगी। श्रीकृष्ण अर्जुन के पराक्रम का वृत्तांत सुनाते हुए युद्ध-क्षय और शत्रु-सेना के संहार का संकेत देते हैं। → घोषणा अपने चरम पर पहुँचती है: अर्जुन ने रण में सैन्य-क्षय कर ‘सिन्धुराज’ (जयद्रथ) का शिर हर लिया—युधिष्ठिर के सामने प्रतिज्ञा-पूर्ति का निर्णायक प्रमाण रख दिया जाता है। → युधिष्ठिर श्रीकृष्ण और अर्जुन का कुशल-प्रश्न करते हुए उन्हें विजयी लौटता देख हर्ष व्यक्त करते हैं; पाण्डव-सेना प्रसन्न होकर पुनः युद्ध में उत्साह से लग जाती है। → विजय के उल्लास के साथ ही अगली घड़ी का संकेत छिपा है—जयद्रथ-वध के प्रतिशोध में कौरव-पक्ष का उग्र प्रत्याघात और द्रोण की अगली रणनीति अब अवश्य तीव्र होगी।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल ६५ श्लोक हैं।) ऑपनआक्ात बा अर क्ाज एकोनपज्चाशर्दाधिकशततमो< ध्याय: श्रीकृष्णका युधिष्ठिससे विजयका समाचार सुनाना और युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णाकी स्तुति तथा अर्जुन
قال سنجيا: ثم دنا من الملك يودهيشثيرا ابن الدَّرما، فانحنى له (شري كريشنا) وقلبه مفعم بالغبطة، إذ إن سيد السِّندهو (جايادراثا) قد قُتل على يد بارثا (أرجونا).
Verse 2
दिष्टया वर्धसि राजेन्द्र हतशत्रुर्नरोत्तम | दिष्ट्या निस्तीर्णवांश्वैव प्रतिज्ञामनुजस्तव
قال سنجيا: «بحسن الطالع تزدهر يا سيد الملوك—يا خير الرجال—فقد قُتل عدوك. وبذلك الطالع نفسه أتمَّ أخوك الأصغر نذره ونجا منه ظافرًا.»
Verse 3
'राजेन्द्र! सौभाग्यसे आपका अभ्युदय हो रहा है। नरश्रेष्ठ. आपका शत्रु मारा गया। आपके छोटे भाईने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली, यह महान् सौभाग्यकी बात है' ।।
قال سنجيا: «أيها الملك، بحسن الطالع ترتفع قضيتك. يا خير الرجال، لقد قُتل عدوك. وقد أتمَّ أخوك الأصغر نذره—وذلك حظ عظيم.» فلما خاطبه كريشنا بهذا امتلأ قاهرُ مدائن الأعداء فرحًا؛ ثم إن الملك يودهيشثيرا، يا بهاراتا، قفز من عربته.
Verse 4
प्रमृज्य वदनं शुभ्र॑ पुण्डरीकसमप्रभम्
قال سنجيا: ثم مسح وجهه—وكان ناصعًا مشرقًا كزهرة لوتس بيضاء—واستجمع وقاره وثباته.
Verse 5
प्रियमेतदुपश्रुत्य त्वत्त: पुष्करलोचन
قال سنجيا: «يا كريشنا ذا العينين كاللوتس! إن سماعي هذا الخبر المحبوب منك يجعل فرحي بلا حدّ. وكما أن الرجل الذي يتوق إلى السباحة عبر المحيط لا يبلغ الشاطئ البعيد، كذلك أنا حين أسمع هذه البشرى العزيزة من شفتيك لا أجد لابتهاجي نهاية. لقد أتى أرجونا الحكيم ببطولة مدهشة حقًّا.»
Verse 6
नान््तं गच्छामि हर्षस्य तितीर्षुरुदधेरिव । अत्यद्भुतमिदं कृष्ण कृतं पार्थेन धीमता
قال سانجيا: «يا كِرِشنا، إن فرحي لا حدّ له—كالرجل الذي يتوق إلى عبور المحيط فلا يجد شاطئه البعيد. إن ما أنجزه بارثا (أرجونا) الحكيم لَحقًّا أمرٌ مدهش.»
Verse 7
दिष्ट्या पश्यामि संग्रामे तीर्णभारी महारथौ । दिष्ट्या विनिहतः पाप: सैन्धव: पुरुषाधम:
قال سانجيا: «بحسن الطالع أرى في ساحة القتال أنكما، أيها الفارسان العظيمان على المركبتين، قد تحررتما من ثقل نذركما. وبذلك الطالع نفسه قُتل السِّيندهافي الآثم—جايادراثا، أحطّ الناس.»
Verse 8
कृष्ण दिष्ट्या मम प्रीतिर्महती प्रतिपादिता । त्वया गुप्तेन गोविन्द घ्नता पापं जयद्रथम्
قال سانجيا: «يا كِرِشنا، يا جوفيندا! بحسن الطالع عَظُم فرحي، لأن أرجونا، المحفوظ بحمايتك، قد قتل جايادراثا الآثم. لقد جلب هذا الفعل إلى قلبي سرورًا عميقًا.»
Verse 9
किं तु नात्यद्धुतं तेषां येषां नस्त्वं समाश्रय: । न तेषां दुष्कृतं किंचित् त्रिषु लोकेषु विद्यते
قال سانجيا: «غير أن ذلك ليس بعجيب لمن اتخذك ملجأً. فمن تحميه لا يستحيل عليه شيء حقًّا في أي موضع من العوالم الثلاثة. وبنعمتك، يا جوفيندا، سينالون النصر على أعدائهم لا محالة.»
Verse 10
सर्वलोकगुरुयेषां त्वं नाथो मधुसूदन । त्वत्प्रसादाद्धि गोविन्द वयं जेष्यामहे रिपून्
قال سانجيا: «يا مدهوسودانا، إن النصر واليُمن ليسا بعجيبين لمن كنتَ له ربًّا وملجأً—وأنت معلّم العوالم كلها. يا جوفيندا، بنعمتك سنقهر أعداءنا لا محالة. فمن تحرسه لا يعسر عليه شيء حقًّا في أي موضع من العوالم الثلاثة.»
Verse 11
स्थित: सर्वात्मना नित्य॑ प्रियेषु च हितेषु च । त्वां चैवास्माभिराश्रित्य कृत: शस्त्रसमुद्यम:
قال سنجيا: «ثابتين بكل كياننا—دائمين في المودّة وحسن النيّة—معتمدين عليك وحدك، قد نهضنا بجهد السلاح.»
Verse 12
असम्भाव्यमिदं कर्म देवैरपि जनार्दन
قال سنجيا: «إن هذا الفعل عسير التصوّر—حتى على الآلهة—يا جاناردانا.»
Verse 13
बाल्यात् प्रभृति ते कृष्ण कर्माणि श्रुतवानहम्
قال سنجيا: «يا شري كريشنا! منذ صباك وأنا أسمع بأعمالك.»
Verse 14
अमानुषाणि दिव्यानि महान्ति च बहूनि च तदैवाज्ञासिषं शत्रून् हतान् प्राप्तां च मेदिनीम्
قال سنجيا: «منذ اللحظة التي سمعتُ فيها بما صنعتَ من أعمال كثيرة فوق طاقة البشر، إلهيةٍ وعظيمةٍ وجليلة، أيقنتُ في الحال أن أعدائي قد قُتلوا سلفًا، وأن سيادة الأرض قد آلت إلى يدي.»
Verse 15
त्वत्प्रसादसमुत्थेन विक्रमेणारिसूदन । सुरेशत्वं गत: शक्रो हत्वा दैत्यानू सहस्रश:,'शत्रुसूदन! आपकी कृपासे प्राप्त हुए पराक्रमद्वारा इन्द्र सहस्रों दैत्योंका संहार करके देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुए हैं
قال سنجيا: «يا أريسودانا، بفضل البأس الذي نهض من نعمتك، قتل شَكْرَة (إندرا) الدايتيين بالآلاف، وبذلك نال سيادة الآلهة.»
Verse 16
त्वत्प्रसादाद्धुघीकेश जगत् स्थावरजज्भमम् । स्ववर्त्मनि स्थितं वीर जपहोमेषु वर्तते
قال سنجيا: «يا هريشيكيشا، بفضلك يثبت هذا العالم كله—الثابت والمتحرّك—على مساره اللائق به. وإذ يلتزم حدوده المقدّرة، ينصرف إلى أعمال البرّ كالتلاوة وتقديم القرابين في القربان الناري.»
Verse 17
एकार्णवमिदं पूर्व सर्वमासीत् तमोमयम् | त्वत्प्रसादान्महाबाहो जगत् प्राप्तं नरोत्तम
قال سنجيا: «في البدء كان هذا كله محيطًا واحدًا، غارقًا ومكوَّنًا من ظلمة. وبفضلك الكريم، يا عظيم الساعد، يا خيرَ الرجال، بلغ العالم صورته الحاضرة المتجلّية.»
Verse 18
स्रष्टारं सर्वलोकानां परमात्मानमव्ययम् । ये पश्यन्ति हृषीकेशं न ते मुहान्ति कहिचित्
قال سنجيا: «الذين يُبصرون هريشيكيشا—الذاتَ العليا غيرَ الفانية، خالقَ العوالم كلّها—لا تغلبهم الغوايةُ أبدًا.»
Verse 19
पुराणं परम देवं देवदेवं सनातनम् | ये प्रपन्ना: सुरगुरुं न ते मुहान्ति कर्िचित्
قال سنجيا: «أنتَ الإنسانُ الأول، الإلهُ الأسمى، إلهُ الآلهة، الربُّ الأزلي، ومعلّمُ السماويّين. والذين يلجؤون إلى حماك لا يقعون في الغواية في أيّ وقت.»
Verse 20
अनादिनिधन देवं लोककर्तारमव्ययम् | ये भक्तास्त्वां हृषीकेश दुर्गाण्यतितरन्ति ते,“हृषीकेश! आप आदि-अन्तसे रहित विश्वविधाता और अविकारी देवता हैं। जो आपके भक्त हैं, वे बड़े-बड़े संकटोंसे पार हो जाते हैं
قال سنجيا: «يا هريشيكيشا، أنتَ الإلهُ الذي لا يموت، بلا بداية ولا نهاية—صانعُ العوالم الذي لا يتبدّل. والذين يخلصون لك بالعبادة يعبرون حتى أشدَّ الأخطار بأسًا.»
Verse 21
परं पुराणं पुरुषं पराणां परमं च यत् | प्रपद्यतस्तत् परमं परा भूतिर्विधीयते,“आप परम पुरातन पुरुष हैं। परसे भी पर हैं। आप परमेश्वरकी शरण लेनेवाले पुरुषको परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है
قال سنجيا: إنّه الشخص الأسمى، القديم الأول، المتعالي حتى على أعلى العُلى. ومن يلجأ إليه ويعتصم به يُقضى له بالارتقاء الأقصى—بالرخاء الأسمى والتمام والكمال.
Verse 22
गायन्ति चतुरो वेदा यश्च वेदेषु गीयते । त॑ प्रपद्य महात्मानं भूतिमश्षाम्यनुत्तमाम्
قال سنجيا: «إنّ الفيدات الأربع تُنشِد مجده، وفي الفيدات كلّها يُتغنّى به. فإذا اعتصمتُ بتلك النفس العظيمة نلتُ الخير الذي لا يُدانيه خير—الرخاء الحقّ والعافية.»
Verse 23
परमेश परेशेश तिर्यगीश नरेश्वर । सर्वेश्वरेश्वरेशेश नमस्ते पुरुषोत्तम
يُحيّي سنجيا «بوروشوتّما» قائلاً: «يا بوروشوتّما! أنت الإله الأعلى، ربّ الأرباب؛ سيّد الدوابّ والطير والناس. وأنت كذلك سيّد أولئك الآلهة الذين يُسمَّون هم أيضاً “أرباباً”، كإندرا وحُرّاس العوالم. لك السجود والتحية.»
Verse 24
त्वमीशेशेश्वरेशान प्रभो वर्धस्व माधव । प्रभवाप्यय सर्वस्य सर्वात्मन् पृुथुलोचन
قال سنجيا: «يا مَادهافا واسع العينين! أنت ربّ الأرباب والحاكم الأعلى. يا مولاي، لتسُدْ مجدُك وسلطانُك. يا نفسَ الكلّ، أنت وحدك سببُ نشأة العالم كلّه وفنائه.»
Verse 25
धनंजयसखा यश्चन धनंजयहितकश्षन यः । धनंजयस्य गोप्ता तं प्रपद्य सुखमेधते,“जो अर्जुनके मित्र, अर्जुनके हितैषी और अर्जुनके रक्षक हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेकर मनुष्य सुखी होता है
قال سنجيا: هو صديق أرجونا، والساعي لخير أرجونا، وحامي أرجونا—ومن اعتصم بذلك الربّ كريشنا نما في السعادة والعافية.
Verse 26
मार्कण्डेय: पुराणर्षिश्नरितज्ञस्तवानघ । माहात्म्यमनुभावं च पुरा कीर्तितवान् मुनि:
قال سنجيا: «يا من لا إثم عليه! إنَّ الحكيم القديم ماركاندييا—العارف بالتراث المقدّس والحافظ لما توارثته الذاكرة—يعرفك حقّ المعرفة. ومنذ زمن بعيد أعلن ذلك الناسك لي جلالك وقوّتك العجيبة.»
Verse 27
असितो देवलश्लैव नारदश्न महातपा: । पितामहश्न मे व्यासस्त्वामाहुर्विधिमुत्तमम्,“असित, देवल, महातपस्वी नारद तथा मेरे पितामह व्यासने आपको ही सर्वोत्तम विधि बताया है
قال سنجيا: «إنَّ أسيتا، وديفالا، ونارادا صاحب الزهد العظيم، وجدّي فياسا—جميعهم أعلنوا أنك المرجع الأعلى في صواب الإجراء وحسن السلوك.»
Verse 28
त्वं तेजस्त्वं परं ब्रह्म त्वं सत्यं त्वं महत् तपः । त्वं श्रेयस्त्वं यशक्षाग्रयं कारणं जगतस्तथा
قال سنجيا: «أنت الإشراق؛ وأنت البراهمان الأعلى. أنت الحق؛ وأنت الزهد العظيم. أنت الخير الأسمى؛ وأنت المجد الجدير بالثناء؛ وأنت عِلّة العالم. منك ينبثق هذا الكون كلّه، المتحرّك والساكن؛ وعند زمن الفناء يعود فينحلّ ويذوب فيك وحدك.»
Verse 29
त्वया सृष्टमिदं सर्व जगत् स्थावरजड्भमम् । प्रलये समनुप्राप्ते त्वां वै निविशते पुन:
قال سنجيا: «هذا الكون كلّه، الساكن والمتحرّك، قد خُلِق على يديك. فإذا جاء الفناء في أوانه عاد فدخل فيك من جديد.»
Verse 30
अनादिनिधनं देवं विश्वस्येशं जगत्पते । धातारमजमव्यक्तमाहुर्वेदविदो जना:
قال سنجيا: إنَّ العارفين بالڤيدا يصفونه بأنه الربّ الإلهي—لا بداية له ولا نهاية—حاكم الكون، سيّد العالم: الخالق والحافظ، غير مولود وغير متجلٍّ.
Verse 31
अपि देवा न जानन्ति गुह्माद्यं जगत्पतिम्
قال سانجيا: حتى الآلهة لا يدركون إدراكًا تامًّا ربَّ العالم، إذ إن حقيقته مستورة عميقة.
Verse 32
नारायणं परं देवं परमात्मानमी श्वरम् । ज्ञानयोनिं हरिं विष्णुं मुमुक्षूणां परायणम् । परं पुराणं पुरुष पुराणानां परं च यत्
قال سانجيا: «(أنحني) لنارايانا—الإله الأعلى، والذات العليا، والربّ السيّد؛ منبع المعرفة الحقّة؛ هاري، فيشنو—الملاذ الأقصى لطالبي التحرّر؛ الشخص الأسمى الأزلي، وتلك الحقيقة التي تعلو على كل ما هو عتيق ومقدّس».
Verse 33
“आपका रहस्य गूढ़ है। आप सबके आदि कारण और इस जगतके स्वामी हैं। आप ही परमदेव, नारायण, परमात्मा और ईश्वर हैं। ज्ञानस्वरूप श्रीहरि तथा मुमुक्षुओंके परम आश्रय भगवान् विष्णु भी आप ही हैं। आपके यथार्थ स्वरूपको देवता भी नहीं जानते हैं। आप ही परम पुराणपुरुष तथा पुराणोंसे भी परे हैं ।।
قال سانجيا: «سِرُّك عميق. أنت العلّة الأولى لكل شيء، وربُّ هذا العالم. أنت وحدك الإله الأعلى—نارايانا، والذات العليا، والربّ السيّد. أنت شري هاري، صورة المعرفة ذاتها، وأنت أيضًا بهاجافان فيشنو—الملاذ الأسمى لطالبي التحرّر. حتى الآلهة لا تعرف حقيقتك على وجهها. أنت الشخص الأسمى الأزلي، ومع ذلك فأنت متعالٍ حتى على البورانات. لا أحد—لا في الأرض ولا في السماء—يستطيع أن يُحصي تمامًا مثل هذه الصفات لك، ولا أعمالك عبر الماضي والحاضر والمستقبل. وكما يحمي إندرا الآلهة، كذلك ينبغي أن نُحمى نحن جميعًا حمايةً كاملةً بك. لقد وجدناك صديقًا مُحسنًا، مكتملًا بكل فضيلة.»
Verse 34
सर्वतो रक्षणीया: सम शक्रेणेव दिवौकस: । यैस्त्वं सर्वगुणोपेत: सुहृन्न उपपादित:
قال سانجيا: «ينبغي أن نُحمى بك من كل وجه، كما تُحمى الآلهة بشَكرا (إندرا). فبهذه الصفات عينها مُنِحتَ لنا صديقًا مُحسنًا، موفورَ كلِّ كمال.»
Verse 35
इत्येवं धर्मराजेन हरिरुक्तो महायशा: । अनुरूपमिदं वाक्यं प्रत्युवाच जनार्दन:,धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर महायशस्वी भगवान् जनार्दनने उनके कथनके अनुरूप इस प्रकार उत्तर दिया--
قال سانجيا: وهكذا، لما خاطبه دارماراجا، أجاب هاري الجليل—جاناردانا—بكلامٍ لائقٍ يوافق قول يودهيشثيرا، منسجمًا مع الدارما ومع جلال الموقف.
Verse 36
पर्यष्वजत् तदा कृष्णावानन्दाश्रुपरिप्लुत: । भारत! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले राजा युधिष्ठिर हर्षमें भरकर अपने रथसे कूद पड़े और आनन्दके आँसू बहाते हुए उन्होंने उस समय श्रीकृष्ण और अर्जुनको हृदयसे लगा लिया
قال سانجيا: عندئذٍ قفز الملك يودهيشثيرا، وقد غمرته دموع الفرح، فاحتضن كريشنا وأرجونا من صميم قلبه. «يا منحدرَ بهاراتا! إنما قُتل الآثم جايادراثا بفضل تقشّفك الشديد، وبفضل تمسّكك الأسمى بالدارما، وبفضل صلاحك القدّيسي واستقامتك ووضوحك». وتُصوِّر هذه اللحظة النصر لا بوصفه ظفرًا حربيًا فحسب، بل ثمرةً أخلاقيةً للثبات على البرّ والحق.
Verse 37
अयं च पुरुषव्याप्र त्ववनुध्यानसंवृतः । हत्वा योधसहस््राणि न्यहन् जिष्णुर्जयद्रथम्
قال سانجيا: «يا نمرَ الرجال! لقد كان جِشنو (أرجونا) في حِمى تأمّلك الدائم المبارك؛ فقتل آلاف المقاتلين ثم أردى جايادراثا. وهكذا أثمرت العزيمة الباطنة الثابتة والسندُ القائم على الحق وسط زحام الحرب الرهيب.»
Verse 38
कृतित्वे बाहुवीय्यें च तथैवासम्भ्रमेडपि च । शीघ्रतामोघबुद्धित्वे नास्ति पार्थसम: क्वचित्
قال سانجيا: «في المهارة والإنجاز، وفي قوة الذراعين، وكذلك في رباطة الجأش التي لا تتزعزع؛ وفي السرعة وفي حُسن التقدير الذي لا يخطئ—لا أحد يساوي بارثا (أرجونا) في أي موضع.» وفي الإطار الأخلاقي للحرب، ليس هذا مدحًا مجردًا، بل إقرارٌ بأن الإتقان المنضبط والعقل الثابت، إذا اتّسقا مع الواجب، صارا قوةً حاسمةً وسط الفوضى.
Verse 39
तदयं भरतश्रेष्ठ भ्राता तेडद्य यदर्जुन: । सैन्यक्षयं रणे कृत्वा सिन्धुराजशिरो5हरत्,“भरतश्रेष्ठ) इसीलिये आज आपके इस छोटे भाई अर्जुनने संग्राममें शत्रुसेनाका संहार करके सिंधुराजका सिर काट लिया है”
قال سانجيا: «لذلك، يا خيرَ آلِ بهاراتا، إن أخاك أرجونا—بعد أن أوقع الفناء بجيش العدو في المعركة—قد أخذ اليوم رأسَ ملك السِّندهو. ويُعرض هذا الفعل بوصفه إتمامًا لغايةٍ مُقسَمٍ عليها، وسط مطالب الحرب القاسية حيث تلتقي العزيمة الشخصية بواجب القتال.»
Verse 40
ततो धर्मसुतो जिष्णुं परिष्वज्य विशाम्पते । प्रमृज्य वदनं तस्य पर्याश्चवासयत प्रभु:,प्रजानाथ! तब धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उनका मुँह पोंछकर उन्हें आश्वासन देते हुए कहा--
قال سانجيا: ثم إن دهرماسوتا (يودهيشثيرا)، يا سيّدَ الناس، احتضن جِشنو (أرجونا). ومسح وجهه، فهدّأه ذلك الملك النبيل وطمأنه—فعلُ رعايةٍ أخوية وقيادةٍ قائمة على الدارما وسط وطأة الحرب.
Verse 41
अतीव सुमहत् कर्म कृतवानसि फाल्गुन । असहां चाविषहां च देवैरपि सवासवै:
قال سنجيا: «يا فالغونا (أرجونا)، لقد أنجزتَ اليوم عملاً بالغ العِظَم—ثقيلاً مهيباً إلى حدٍّ أن الآلهة، وإندرا فيهم، لا يطيقون حمل عبئه ولا إتمامه.»
Verse 42
दिष्ट्या निस्तीर्णभारो5सि हतारिश्नासि शत्रुहन् । दिष्ट्या सत्या प्रतिज्ञेयं कृता हत्वा जयद्रथम्
قال سنجيا: «لقد حالفك الحظ—يا قاتل الأعداء. فبقتل خصومك قد تحرّرتَ الآن من عبء نذرك. وإنه لَمِن البِشرى أنَّك، بقتل جايدَرَثا، قد جعلتَ عهدك الجليل صادقاً متحققاً.»
Verse 43
एवमुक्त्वा गुडाकेशं धर्मराजो महायशा: । पस्पर्श पुण्यगन्धेन पृष्ठे हस्तेन पार्थिव:,महायशस्वी धर्मराज राजा युधिष्ठिरने निद्राविजयी अर्जुनसे ऐसा कहकर उनकी पीठपर पवित्र सुगन्धसे युक्त अपना हाथ फेरा
قال سنجيا: وبعد أن قال ذلك لغوداكِيشا (أرجونا)، مدَّ دارماراجا (يودهيشتِهيرا)، الملكُ العظيمُ الصيت، يده المعطّرة بعطرٍ مقدّس، ولمس ظهره برفق—إشارةُ مودةٍ قائمةٍ على الدارما، تبعث الطمأنينة وسط كرب الحرب.
Verse 44
एवमुक्तौ महात्मानावुभौ केशवपाण्डवौ । तावब्रूतां तदा कृष्णौ राजानं पृथिवीपतिम्,उनके ऐसा कहनेपर महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनने उस समय उन पृथ्वीपति नरेशसे इस प्रकार कहा--
قال سنجيا: فلما قيلت تلك الكلمات، خاطب البطلان العظيمان—كيشافا (كريشنا) والباندَفي (أرجونا)—الملكَ، سيدَ الأرض، في ذلك الحين على هذا النحو.
Verse 45
तव कोपाग्निना दग्ध: पापो राजा जयद्रथ: । उत्तीर्ण चापि सुमहद् धार्तराष्ट्रबलं रणे
قال سنجيا: «يا مولاي الملك! لقد احترق الملك الآثم جايدَرَثا بنار غضبك. وحتى اختراق جيش الكورافا العظيم لدوريودَهَنا في ساحة القتال لم يتحقق إلا بفضلك.»
Verse 46
अब्रवीद् वासुदेवं च पाण्डवं च धनंजयम् | फिर उनके कमलके समान कान्तिमान् सुन्दर मुखपर हाथ फेरते हुए वे वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुनसे इस प्रकार बोले--
قال سنجيا: ثم توجّه بالكلام إلى فاسوديفا (كريشنا) وإلى الباندَفي دهننجايا (أرجونا) قائلاً: «يا بهاراتا! يا قاهر الأعداء! إن هؤلاء الكاورافا، وقد صُرِعوا بسخطك، يُقتَلون الآن، وقد قُتِلوا من قبل، وسيُبادون إبادةً تامّة فيما يأتي».
Verse 47
त्वां हि चक्षुर्ठणं वीर॑ं कोपयित्वा सुयोधन: । समित्रबन्धु: समरे प्राणांस्त्यक्ष्यति दुर्मति:
«لأن سُيودَهَنَة (دوريودَهَنَة) قد أغضب بطلاً مثلك—من تكفيه نظرةٌ ممتلئةٌ بالغضب ليُحرق بها الخصم—فإن ذلك الأحمق سيُلقي بروحه في ساحة القتال مع أصدقائه وذوي قرباه.»
Verse 48
तव क्रोधहत: पूर्व देवैरपि सुदुर्जय: । शरतल्पगत: शेते भीष्म: कुरुपितामह:
قال سنجيا: «إن بهيشما، جدَّ الكورو—الذي كان في سالف الأيام عسيرَ الغلبة حتى على الآلهة—قد صار الآن مضطجعاً على سريرٍ من السهام، صريعاً بسخطك.»
Verse 49
दुर्लभो विजयस्तेषां संग्रामे रिपुसूदन । याता मृत्युवशं ते वै येषां क्रुद्धो+सि पाण्डव
قال سنجيا: «يا قاهر الأعداء، يا باندَفي! إن النصر في المعركة عسيرٌ على من تغضب عليه. حقّاً، إن من وقع عليه غضبك قد دخل سلفاً في سلطان الموت.»
Verse 50
राज्यं प्राणा: श्रिय: पुत्रा: सौख्यानि विविधानि च | अचिरात् तस्य नश्यन्ति येषां क्रुद्धो+सि मानद
قال سنجيا: «أيها الملك الذي يكرم الناس! إن الذين أثرتَ عليهم غضبك ستزول قريباً مملكتهم، وأرواحهم، ونعمتهم، وأبناؤهم، ومتعهم على اختلافها.»
Verse 51
विनष्टान् कौरवान् मन्ये सपुत्रपशुबान्धवान् | राजधर्मपरे नित्यं त्वयि क्रुद्धे परंतप
قال سنجيا: «إني لأعدّ الكورافا قد هلكوا سلفًا—مع أبنائهم ومواشيهم وذوي قرباهم—فإذا غضبتَ أنت، الثابتَ أبدًا على راجادهَرما (شريعة الملك)، يا مُحْرِقَ الأعداء، نزلت بهم الهلكة لا محالة».
Verse 52
ततो भीमो महाबाहु: सात्यकिश्न महारथः । अभिवाद्य गुरुं ज्येष्ठ॑ मार्गणै: क्षतविक्षतौ
ثم إنّ بهيما عظيمَ الساعدين، وساتياكيَ الفارسَ العظيمَ على العربة، قدّما التحيةَ والإجلالَ لمعلّمهما الأكبر الموقَّر، ثم وقفا—وقد مُزِّقا بالسهام وجُرحا جراحًا بالغة—غيرَ أنّهما لم يتركا سمتَ الوقار.
Verse 53
क्षितावास्तां महेष्वासौ पाञ्चाल्यै: परिवारितौ | तौ दृष्टवा मुदितौ वीरौ प्राञ्जली चाग्रत: स्थितौ
قال سنجيا: كان الراميان العظيمان مطروحين على الأرض، وقد أحاط بهما البانشالا. فلما رآهما فارسان شجاعان ابتهجا، ووقفا أمامهما ويداهما مضمومتان علامةَ التوقير.
Verse 54
अभ्यनन्दत कौन्तेयस्तावुभौ भीमसात्यकी । तदनन्तर
قال سنجيا: رحّب ابنُ كونتي (يودهيشثيرا) ببهِيما وساتياكي كليهما ترحيبًا حارًّا. وابتهج إذ رأى البطلين قد نَجَوَا من «بحر الجيش» المعادي—وإن كانا جريحين مُنهكَين من وطأة القتال. «طوبى لي إذ أراكما، أيها الشجاعان، وقد انفلتما من بحر الجموع.»
Verse 55
द्रोणग्राहदुराधर्षाद्धार्दिक्यमकरालयात् । वे बोले--'बड़े सौभाग्यकी बात है कि मैं तुम दोनों शूरवीरोंको शत्रुसेनाके समुद्रसे पार हुआ देख रहा हूँ। वह सैन्यसागर द्रोणाचार्यरूपी ग्राहके कारण दुर्धर्ष है और कृतवर्मा जैसे मगरोंका वासस्थान बना हुआ है || ५४ $ || दिष्ट्या विनिर्जिता: संख्ये पृथिव्यां सर्वपार्थिवा:
قال سنجيا: «طوبى لي إذ أراكما، أيها الشجاعان، وقد عبرتما بحرَ جيشِ العدو. إن ذلك البحر عسيرُ الاقتحام، لأن دروناآتشاريّا فيه كالغِرَاهَة (تمساحٍ جبار)، وهو مأوى لمكارا مثل كريتَفَرما. وبحسن الطالع أيضًا، فقد غُلِب ملوكُ الأرض غلبةً حاسمةً في ساحة القتال.»
Verse 56
दिष्ट्या द्रोणोजित: संख्ये हार्दिक्यश्च महाबल:
قال سَنْجَيا: «بحُسن الطالع هُزِمَ المُعلِّم دْرونا وكِرتَفَرما العظيمُ البأس في ساحة القتال. وبالقدر كذلك أُدْفِعَ كَرْنا إلى الهزيمة في ميدان الحرب بسِهامِكما. يا أبطالَ الرجال وخِيارَهم! لقد صرفتما الملكَ شَالْيا أيضًا عن القتال.»
Verse 57
दिष्ठ्या विकर्णिशभि: कर्णो रणे नीत: पराभवम् | विमुखश्न कृत: शल्यो युवाभ्यां पुरुषर्षभी
قال سَنْجَيا: «بحُسن الطالع دُفِعَ كَرْنا—ومعه فيكارْني وشابهي—إلى الهزيمة في ساحة القتال. وأنتما، يا من أنتما كالثورين بين الرجال، قد صرفتما الملكَ شَالْيا عن القتال أيضًا.»
Verse 58
दिष्ट्या युवां कुशलिनौ संग्रामात् पुनरागतौ । पश्यामि रथिनां श्रेष्ठावुभौ युद्धविशारदौ
قال سَنْجَيا: «بحُسن الطالع عدتما أنتما الاثنان سالمَين من المعركة. إنّي أراكما كليكما—وأنتما أبرعُ فرسانِ العربات وأمهرُهم في الحرب—قد رجعتما غيرَ مُصابَين؛ وهذا لي موضعُ راحةٍ وفرحٍ عظيم.»
Verse 59
मम वाक्यकरीौ वीरौ मम गौरवयन्त्रितौ । सैन्यार्णवं समुत्तीर्णो दिष्ट्या पश्यामि वामहम्
قال سَنْجَيا: «أنتما الفارسان اللذان ينفّذان قولي، وقد ربطكما بي الشرفُ وألزمكما الوفاءُ، فأنجزتما أمري. وبحُسن الطالع أراكما الآن وقد عبرتما ما وراءَ ‘بحرِ الجيش’؛ إنّها لنعمةٌ حقًّا.»
Verse 60
समरश्लाघधिनौ वीरौ समरेष्वपराजितौ । मम वाक्यसमोौ चैव दिष्ट्या पश्यामि वामहम्
قال سَنْجَيا: «أنتما الفارسان، كما وصفتُكما: تفتخران بساحات الوغى ولا تُغلَبان في صدام السلاح. وبحُسن الطالع أراكما هنا كليكما سالمَين غيرَ مُصابَين.»
Verse 61
इत्युक्त्वा पाण्डवो राजन् युयुधानवृकोदरौ । सस्वजे पुरुषव्याप्रौ हर्षाद् वाष्पं मुमोच ह
قال سنجيا: «فلما قال ذلك، أيها الملك، عانق الباندڤا (يودهيشثيرا) يويودھانا (ساتياكي) وفريكودارا (بيماسين)، وهما من أعتى أبطال الرجال؛ وغلبته الفرحة فذرف الدموع.»
Verse 62
ततः प्रमुदितं सर्व बलमासीद् विशाम्पते । पाण्डवानां रणे हृष्टं युद्धाय तु मनो दधे
قال سنجيا: «ثم، يا سيد الناس، سُرَّت الجموع كلها. وإذ طربت للقتال ضد الباندڤا، عقدت عزمها عقدًا راسخًا على الحرب.»
Verse 116
सुरैरिवासुरवधे शक्रं शक्रानुजाहवे । “उपेन्द्र! आप सदा सब प्रकारसे हमारे प्रिय और हितसाधनमें लगे हुए हैं। हमलोगोंने आपका ही आश्रय लेकर श्त्रोंद्वारा युद्धकी तैयारी की है। ठीक उसी तरह
«يا أوبيندرا (كريشنا)! إنك على الدوام حبيبٌ إلينا، ساعٍ إلى مصلحتنا بكل وجه. لقد اتخذناك ملاذًا فتهيّأنا للحرب بالسلاح، كما تتخذ الآلهةُ إندرا ملاذًا وتنهض في ساحة القتال لقتل الأسورا.»
Verse 126
त्वद्बुद्धिबलवीर्येण कृतवानेष फाल्गुन: । “जनार्दन! आपकी ही बुद्धि, बल और पराक्रमसे इस अर्जुनने यह देवताओंके लिये भी असम्भव कर्म कर दिखाया है
قال سنجيا: «يا جناردانا (كريشنا)! بذكائك وقوتك وبأسك البطولي، أنجز هذا الفالغونا (أرجونا) عملاً يستحيل حتى على الآلهة.»
Verse 149
प्रजानाथ! तदनन्तर पाण्डवोंकी सारी सेनाने युद्धस्थलमें प्रसन्न एवं उत्साहित होकर संग्राममें ही मन लगाया ।।
قال سنجيا: «يا سيد الناس، بعد ذلك سُرَّ جيشُ الباندڤا كلُّه في ساحة القتال واشتدّت حميّته، فصرف همَّه كلَّه إلى المعركة.» وهكذا ينتهي، في «المهابهارتا» الممجَّدة، ضمن «دروṇa پرفا»، في قسم مقتل جايا دراثا، الفصلُ المتعلّق بفرح يودهيشثيرا—الفصل 149.
Verse 306
भूतात्मानं महात्मानमनन्तं विश्वतोमुखम् । “जगत्पते! वेदवेत्ता पुछ्णष आपको आदि-अन्तसे रहित
قال سنجيا: «يا ربَّ الكون! إن العارفين بالڤيدا يخاطبونك بأسماء كثيرة: بلا بداية ولا نهاية، ذو هيئةٍ إلهية، ربُّ الجميع، المُقيمُ والداعم، غيرُ مولود، غيرُ متجلٍّ؛ أنت الذاتُ الباطنةُ في الكائنات، الروحُ العظمى، اللامتناهي، وذو الوجوه في كلِّ الجهات».
Verse 553
युवां विजयिनौ चापि दिष्ट्या पश्यामि संयुगे । 'युद्धमें सारे भूपाल पराजित हो गये और संग्राम-भूमिमें मैं तुम दोनोंको विजयी देख रहा हूँ--यह बड़े हर्षका विषय है
قال سنجيا: «بحسن الطالع أراكما كليكما ظافرين في المعركة. لقد غُلِبَ جميعُ الملوك في القتال، ورؤيتكما واقفَين منتصرَين على ساحة الوغى لَأمرٌ يبعث على فرحٍ عظيم.»
The dilemma centers on retaliatory violence justified by prior wrongs: Alāyudha frames his campaign as vengeance for slain kin, while Duryodhana endorses escalation for advantage—raising the question of whether remembrance of injury can ethically authorize widening harm.
The chapter illustrates how vairāgni (the ‘fire’ of enmity) shapes perception and policy: grievance memory can become a strategic asset yet also a destabilizing force that narrows ethical deliberation and amplifies collective suffering.
No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; its function is primarily historiographic and thematic—documenting motives, authorization, and battlefield spectacle to clarify causal chains within the war’s moral and tactical progression.
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