Mahabharata Adhyaya 145
Drona ParvaAdhyaya 14578 Versesपाण्डव पक्ष को तात्कालिक राहत; पर नैतिक विवाद और प्रतिशोध की आग से युद्ध का ताप और बढ़ता है।

Adhyaya 145

धृष्टद्युम्नस्य द्रोणाभिमुख्यं तथा सात्यकि-कर्ण-समागमः (Dhṛṣṭadyumna’s advance toward Droṇa and the Sātyaki–Karṇa confrontation)

Upa-parva: Droṇa-vadha-prasaṅga (Night engagement around Droṇa’s protection and counter-assaults)

Sañjaya reports that, amid an intensely tumultuous and fear-inducing engagement, Dhṛṣṭadyumna repeatedly draws and readies his bow, advancing upon Droṇa’s ornamented chariot with the explicit intention of ending the ācārya’s command. The Pāñcālas and Pāṇḍavas move to support and encircle him, while Droṇa’s side responds by surrounding and defending Droṇa with coordinated missile fire. Dhṛṣṭadyumna strikes Droṇa with five arrows and roars; Droṇa answers with a heavier volley, cutting Dhṛṣṭadyumna’s bow, forcing a re-armament. Dhṛṣṭadyumna launches a formidable arrow toward Droṇa, but Karṇa intercepts and slices it into multiple parts before it reaches the chariot, then joins others in concentrated attacks on Dhṛṣṭadyumna. Dhṛṣṭadyumna retaliates under pressure, kills Drumasena by decapitation, and breaks Karṇa’s bow, provoking Karṇa’s intensified counter-barrage. As multiple Kaurava champions converge, Sātyaki arrives to relieve Dhṛṣṭadyumna’s crisis, initiating a fierce, balanced duel with Karṇa. Sātyaki wounds Vṛṣasena; Karṇa, believing his son incapacitated, increases pressure on Sātyaki. The chapter closes with the broader battlefield swelling in violence and sound—especially the distant, unmistakable resonance of Arjuna’s Gāṇḍīva—prompting Karṇa to counsel Duryodhana on exploiting the moment by targeting Sātyaki and Dhṛṣṭadyumna and dispatching Śakuni (Saubala) with a large force against the Pāṇḍavas.

Chapter Arc: रणभूमि में भूरिश्रवा सात्यकि को पकड़ कर वध के लिए उद्यत है; उसी क्षण अदृश्य-वेग से किरीटी अर्जुन का बाण उठता है और प्रहार करने को उठी भुजा कटकर भूमि पर सर्प-सी गिरती है। → एकभुज भूरिश्रवा क्रोध और अपमान से दहक उठता है—वह सात्यकि को छोड़कर अर्जुन को धिक्कारता है कि यह ‘वार्ष्णेय’ (सात्यकि) को बचाने हेतु किया गया क्षुद्र कर्म है, जो वासुदेव-मत के अनुरूप नहीं। क्षत्रिय-समाज और रथी-समूह इस विवाद को सुनते हैं; युद्ध का नियम, प्रतिज्ञा और मित्र-रक्षा—तीनों टकराते हैं। → भूरिश्रवा, प्रतिज्ञा-भंग और अपमान की आग में, युद्ध से विरत होकर प्रायोपवेशन/योग-ध्यान का आश्रय लेता है—नेत्र सूर्य में, मन शीतल जल में समाहित कर ‘महोपनिषद्’ के भाव में स्थित होता है; उसी समय सात्यकि, अपने पूर्व अपमान/प्रतिज्ञा की स्मृति से प्रेरित होकर, उस विरक्त-स्थित शत्रु का वध कर देता है। → देव, सिद्ध, चारण और मनुष्य विस्मित होते हैं—एक ओर भूरिश्रवा का तपोमय अंत, दूसरी ओर रण-धर्म की कठोरता। अर्जुन की प्रतिज्ञा-रक्षा (सात्यकि की रक्षा) और सात्यकि का प्रतिशोध—दोनों के कारण यह वध ‘धर्म’ के प्रश्न को और तीखा कर देता है; युद्ध का नैतिक ध्रुव डगमगाता है। → भूरिश्रवा-वध के बाद प्रतिज्ञाओं की श्रृंखला और तीव्र होती है—अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा और अगले प्रतिशोध की छाया रणभूमि पर उतर आती है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ श्लोक मिलाकर कुल ७३ ३ “लोक हैं।) #.१०3८६>-> हु #+ ३. पृथ्वीपर घुमाना। २. प्रतिद्वन्द्यीकी ओर बढ़ना। 3. पीछे लौटना। ४. पछाड़ना। ५. पृथ्वीपर पटकना। ६. उछलकर खड़ा होना। ७. पीठ लगाना। त्रिचत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: भूरिश्रवाका अर्जुनको उपालम्भ देना

قال سنجيا: أيها الملك، إن ذلك الذراع النبيل—المزيَّن بسوارٍ بهيّ—قُطع وسقط على الأرض وهو لا يزال قابضًا على السيف. وقد بثَّ سقوطه حزنًا غريبًا طاغيًا في قلوب الأحياء، إذ كان علامةً على انقلابٍ صادم في ميزان الشرف في ساحة القتال: فالبأس والكرامة يُمحَيان بصرامة الحرب ووحشيتها التي لا رجعة فيها.

Verse 2

प्रहरिष्यन्‌ हृतो बाहुरदृश्येन किरीटिना । वेगेन न्‍न्यपतद्‌ भूमौ पठ्चास्य इव पन्नग:

قال سنجيا: لما ارتفع ذلك الذراع ليضرب، قطعه سهمٌ خفيٌّ خاطف أطلقه أرجونا ذو التاج؛ ثم هوى إلى الأرض بقوة عظيمة كأنه حيّة ذات خمسة رؤوس. وتُبرز هذه الصورة دقة الحرب القاسية—إذ تُكبح نية الإيذاء في لحظتها بمهارةٍ أسمى—كما تلمّح إلى ثقل العنف أخلاقيًا: فما إن يُطلَق حتى يعود بعواقب مرعبة.

Verse 3

स मोघं कृतमात्मानं दृष्टवा पार्थेन कौरव: । उत्सृज्य सात्यकिं क्रोधाद्‌ गर्हयामास पाण्डवम्‌

قال سنجيا: لما رأى نفسه قد جُعلت مساعيه هباءً على يد بارثا (أرجونا)، غضب الكاورافي بهوريشرافاس، فأطلق سَاتْيَكِي وشرع يوبّخ أرجونا الباندافي. ويُظهر هذا الموقف كيف يمكن لغضب الحرب أن ينقل المحارب من قتالٍ مباشر إلى اتهامٍ أخلاقي، فيحوّل خيبة النفس إلى لومٍ للخصم.

Verse 4

(स विबाहुर्महाराज एकपक्ष इवाण्डज: । एकचक्रो रथो यद्धद्‌ धरणीमास्थितो नृपः । उवाच पाण्डवं चैव सर्वक्षत्रस्थ शृण्वतः ।।

قال بهوريشرافا: «ويحك يا ابن كونتي، لقد صنعتَ صنيعًا قاسيًا. فإني حين لم أكن أراك وكنتُ مشتبكًا في القتال مع غيرك، قطعتَ ذراعي.»

Verse 5

कि नु वक्ष्यसि राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्‌ । कि कुर्वाणो मया संख्ये हतो भूरिश्रवा रणे

قال بهوريشرافا: «فماذا ستقول للملك يودهيشثيرا، ابن الدارما؟ أستقول إن بهوريشرافا قُتل على يدي في المعركة وهو منشغلٌ بأمرٍ آخر؟»

Verse 6

इदमिन्द्रेण ते साक्षादुपदिष्टं महात्मना । अस्त्रं रुद्रेण वा पार्थ द्रोणेनाथ कृपेण वा,पार्थ! इस अस्त्र-विद्याका उपदेश तुम्हें साक्षात्‌ महात्मा इन्द्रने दिया है, या रुद्र, द्रोण अथवा कृपाचार्यने?

سألَ بُهُورِشْرَفَا أرجونا سؤالًا لاذعًا عن مصدر علمه المهيب بالأسلحة: «أهذا السلاحُ بعينه علَّمك إيّاه إندرا العظيمُ مباشرةً؟ أم رودرا؟ أم درونا؟ أم كِرِبا، يا بارثا؟»

Verse 7

ननु नामास्त्रधर्मज्ञस्त्वं लोके5 भ्यधिक: परै: । सोथ्युध्यमानस्य कथं रणे प्रहृतवानसि

قال بُهُورِشْرَفَا: «إنك لمشهورٌ في هذا العالم بأنك أفقهُ الناس بدَرْمَةِ السلاح وقانون القتال. فكيف ضربتَ في ساحة الحرب من لم ينهض أصلًا ليقاتلك؟»

Verse 8

न प्रमत्ताय भीताय विरथाय प्रयाचते । व्यसने वर्तमानाय प्रहरन्ति मनस्विन:,मनस्वी पुरुष असावधान, डरे हुए, रथहीन, प्राणों-की भिक्षा माँगनेवाले तथा संकटमें पड़े हुए मनुष्यपर प्रहार नहीं करते हैं

قال بُهُورِشْرَفَا: «إن ذوي الهمة لا يضربون الغافل، ولا الخائف، ولا من سقط عن مركبته، ولا من يستجدي الحياة—ولا من هو واقعٌ في البلاء. فمثلُ هذه الضربة ليست شجاعةً، بل خرقٌ لأخلاق المحارب.»

Verse 9

इदं तु नीचाचरितमसत्पुरुषसेवितम्‌ | कथमाचरितं पार्थ पापकर्म सुदुष्करम्‌,पार्थ! यह नीच पुरुषोंद्वारा आचरित और दुष्ट पुरुषोंद्वारा सेवित अत्यन्त दुष्कर पापकर्म तुमने कैसे किया?

قال بُهُورِشْرَفَا: «إن هذا الفعل دنيءُ السيرة، لا يلازمه إلا الأراذل ويألفه الأشرار. فكيف أقدمتَ، يا بارثا، على إثمٍ فادحٍ بالغِ العُسر؟»

Verse 10

आर्येण सुकरं त्वाहुरार्यकर्म धनंजय । अनार्यकर्म त्वार्येण सुदुष्करतमं भुवि

قال بُهُورِشْرَفَا: «يا دهنَنْجَيا، يقول الناس إن الفعلَ النبيل يسهل على النبيل. ولكن على النبيل نفسه، أن يأتي فعلًا دنيئًا هو أعسرُ ما يكون على وجه الأرض.»

Verse 11

येषु येषु नरव्यात्र यत्र यत्र च वर्तते । आशु तच्छीलतामेति तदिदं त्वयि दृश्यते

قال بهوريشرافا: «يا نمرَ الرجال، إنّ المرءَ حيثما أقام ومع مَن خالط، سرعان ما يكتسب طباعَهم وسيرتَهم. وتلك الحقيقةُ بعينها تُرى فيك أنت أيضًا، يا نمرَ الرجال.»

Verse 12

कथं हि राजवंश्यस्त्वं कौरवेयो विशेषत: । क्षत्रधर्मादपक्रान्त: सुवृत्तश्नरितव्रत:

«كيف لك—وأنت من سلالة الملوك، بل ومن مواليد بيت الكورويين خاصة—أن تنحرف عن دارما الكشاتريا؟ لقد كان سلوكك كريمًا، وكنت تحفظ نذورًا رفيعة.»

Verse 13

इदं तु यदत्तिक्षुद्रं वार्ष्णेयार्थे कृतं त्वया । वासुदेवमतं नूनं नैतत्‌ त्वय्युपपद्यते

«أما هذا الفعل منك—وهو في غاية الدناءة—الذي فعلته لأجل الوارشنِيَّة (قضية كريشنا)، فلا بد أنه جارٍ على مشورة فاسوديفا. إن نيةً وضيعة كهذه لا تليق بك.»

Verse 14

को हि नाम प्रमत्ताय परेण सह युध्यते । ईदृशं व्यसन दद्यादू यो न कृष्णसखो भवेत्‌

قال بهوريشرافا: «مَن ذا الذي يقاتل خصمًا غافلًا ثم يُنزل به بلاءً كهذا؟ إن فعلًا كهذا لا يقدر عليه من ليس بصديقٍ لكريشنا.»

Verse 15

व्रात्या: संक्लिष्टकर्माण: प्रकृत्यैव च गर्लहिता: । वृष्ण्यन्धका: कथं पार्थ प्रमाणं भवता कृता:

قال بهوريشرافا: «إنّ الفريشنيين والأندهكيين كأشباه المنبوذين؛ أعمالهم ملوّثة، وهم بطبعهم موضعُ لوم. يا بارثا، يا ابنَ كونتي، كيف اتخذتهم سُلطةً وميزانًا للصواب وحسن السلوك؟»

Verse 16

अर्जुन उवाच व्यक्त हि जीर्यमाणो<5पि बुद्धि जरयते नर:

قال أرجونا: «إنه لَبيِّنٌ أن الإنسان إذا شاخ شاخت معه بصيرته وضعفت. لذلك فما نطقتَ به آنفًا كلامٌ عبثٌ لا طائل منه. أنت تعرف كريشنا، ربَّ الحواسِّ ومُدبِّرَها، وتعرفني أنا أيضًا—أرجونا ابنَ باندو—ومع ذلك لا تزال تتكلم بما هو كالتقريع لنا.»

Verse 17

अनर्थकमिदं सर्व यत्‌ त्वया व्यादह्वतं प्रभो । जानन्नेव हषीकेशं गर्हसे मां च पाण्डवम्‌

قال أرجونا: «يا مولاي، إن كل ما تفوَّهتَ به آنفًا لا معنى له. مع أنك تعرف هريشيكيشا (كريشنا)، سيدَ الحواس، وتعرفني أنا—أرجونا ابنَ باندو—فإنك لا تزال تذمّنا.»

Verse 18

संग्रामाणां हि धर्मज्ञ: सर्वशास्त्रार्थपारग: । न चाधर्ममहं कुर्या जानंश्वैव हि मुहासे

إني عارفٌ بدَرْمَةِ القتال، مُحيطٌ بمعاني الفيدا والكتب كلِّها. لا يمكنني أن أرتكب الأدهرما؛ ومع ذلك، وأنت تعلم هذا، ما زلتَ واقعًا في الوهم بشأنِي.

Verse 19

युध्यन्ति क्षत्रिया: शत्रून्‌ स्वै: स्वैः परिवृता नरा: । भ्रातृभि: पितृभि: पुत्रैस्तथा सम्बन्धिबान्धवै:

قال أرجونا: «إن محاربي الكشاتريا يقاتلون أعداءهم وهم محاطون برجالهم—بإخوتهم وآبائهم وأبنائهم، وكذلك بالأقارب وذوي الأرحام والعشيرة.»

Verse 20

स कथं सात्यकिं शिष्यं सुखसम्बन्धमेव च,(निकृष्यमाणं तं दृष्टवा कथं शत्रुवशं गतम्‌ । त्वया विकृष्यमाणं च दृष्टवानस्मि निष्क्रियम्‌ ।।

قال أرجونا: «كيف لي أن أتخلى عن ساتياكي—تلميذي وقريبي العزيز—وقد رأيته يُجرُّ ويُساق إلى سلطان العدو؟ لقد رأيتُك بعيني تسحبه، حتى صار عاجزًا ساكنًا لا حراك به. لقد نزع التعلّق حتى عن حياته التي يعسر التفريط بها، ويقاتل من أجلي؛ وفي لهيب المعركة يقف عن يميني كأنه ذراعي نفسها. فإذا رأيته يتألّم على يديك، فكيف يمكنني أن أتغافل عنه؟»

Verse 21

अस्मदर्थ च युध्यन्तं त्यक्त्वा प्राणान्‌ सुदुस्त्यजान्‌ । मम बाहुं रणे राजन्‌ दक्षिण युद्धदुर्मदम्‌,(निकृष्यमाणं तं दृष्टवा कथं शत्रुवशं गतम्‌ । त्वया विकृष्यमाणं च दृष्टवानस्मि निष्क्रियम्‌ ।।

قال أرجونا: «من أجلي يقاتل ساتياكي، وقد طرح التعلّق حتى بتلك الأنفاس الحياتية التي يعسر على المرء أن يتركها. أيها الملك، في لهيب المعركة هو كذراعي اليمنى في ساحة الوغى. فلما رأيته يُجرّ، وقد وقع تحت سلطان العدو وصار عاجزًا وأنت تشدّه، كيف لي أن أتغافل عن كربه؟»

Verse 22

न चात्मा रक्षितव्यो वै राजन्‌ रणगतेन हि । यो यस्य युज्यते<र्थेषु स वै रक्ष्यो नराधिप

قال أرجونا: «أيها الملك، من دخل ساحة القتال لا يليق به أن لا يفكر إلا في حماية نفسه. يا سيد الرجال، من انخرط في قضية غيره وواجباته، فإنما يوجب عليه ذلك الرابط أن يُحمى ممن يخدم قضيته.»

Verse 23

तै रक्ष्यममाणै: स नृपो रक्षितव्यो महामृधे । यद्यहं सात्यकिं पश्ये वध्यमानं महारणे

«إن الذين يُحمَون عليهم، في ذلك الاصطدام العظيم، أن يحموا ملكهم ردًّا للجميل. ولو أني في هذه المعركة الجليلة رأيت ساتياكي يُقتل أمام عيني، لثقل عليّ حزن الفراق كإثمٍ يجلب الخراب. لذلك حميته—فلماذا تغضب مني إذن؟»

Verse 24

ततस्तस्य वियोगेन पाप॑ मेडनर्थतो भवेत्‌ | रक्षितश्न मया यस्मात्‌ तस्मात्‌ क्रुध्यसि कि मयि

«وعندئذٍ، بسبب الفراق عنه، يقع عليّ إثمٌ يجلب البلاء. ولأني قد حميته، فلماذا تغضب مني لهذا السبب؟ وعلى النحو نفسه، فإن الأصدقاء الأوفياء الذين هم تحت الحماية عليهم، في المعركة العظمى، واجبُ صونِ ملكهم. ولو أني في هذه الحرب الجليلة رأيت ساتياكي يموت أمام عيني، لثقلت خسارته عليّ كزلةٍ مُهلكة؛ لذلك حميته. فلماذا تصبّ سخطك عليّ؟»

Verse 25

यच्च मे गर्हसे राजन्नन्येन सह संगतम्‌ | अहं त्वया विनिकृतस्तत्र मे बुद्धिविभ्रम:

«أيها الملك، حين توبّخني بتهمة أني، بينما كنتَ منشغلاً بقتال غيرك، عاملتُك بالخديعة، فإن اتهامك يوقع عقلي في اضطراب—ويحملني على التساؤل: ما الذي يكون حقًّا هو الصواب وسط حِيَل الحرب ومكائدها؟»

Verse 26

कवचं धुन्वतस्तुभ्यं रथं चारोहत: स्वयम्‌ । धनुर्ज्या कर्षतश्चैव युध्यतः सह शत्रुभि:

قال أرجونا: «إنك أنتَ بنفسك، وأنت تهزُّ درعك، قد اعتليتَ عربةَ الحرب؛ وشددتَ وترَ القوس وقاتلتَ في قلب جموع الأعداء. وفي مثل ذلك الاضطرام—حيث تتلاطم العرباتُ والفيلةُ والفرسانُ والمشاةُ كبحرٍ عميق، ويستعر صدامُ الجموع المحتشدة من الفريقين—كيف يُزعم أن هذا كان “نزالاً فردياً” بين محاربٍ ومحارب، كأن المعركة معزولةٌ عن المَلحمة الدائرة من حولها؟»

Verse 27

एवं रथगजाकीर्णे हयपत्तिसमाकुले । सिंहनादोद्धतरवे गम्भीरे सैन्यसागरे

قال أرجونا: «في ذلك المحيط العميق من الجيوش—المكتظّ بالعربات والفيلة، والمزدحم بالفرسان والمشاة، والمروّع بزئير صيحات القتال كزئير الأسد—حيث كان محاربو الفريقين المجتمعون يتبادلون القتل، لقيتَ ساتياكي مواجهةً مباشرة. ففي مثل هذا الاضطراب، كيف يُقال إنه كان “نزالاً فردياً” بين محاربٍ ومحارب؟»

Verse 28

स्वै: परैश्न समेतेभ्य: सात्वतेन च संगमे । एकस्यैकेन हि कथं संग्राम: सम्भविष्यति

قال أرجونا: «في الصدام الذي اجتمع فيه رجالُنا ورجالُ العدو معاً، وحيث لقيتَ ساتياكي أيضاً، كيف يمكن الزعم بأن هناك “قتالاً” لمحاربٍ واحدٍ ضد محاربٍ واحد؟ في اضطرام حربٍ كهذا، مع تقاطر المقاتلين وتزاحمهم، لا يستقيم تصورُ نزالٍ منفصلٍ معزول.»

Verse 29

बहुभि: सह संगम्य निर्जित्य च महारथान्‌ | श्रान्तश्न श्रान्तवाहश्न विमना: शस्त्रपीडित:

قال أرجونا: «بعد أن خاض القتال مع كثير من المحاربين وغلب عدداً كبيراً من عظماء مقاتلي العربة، أضحى ساتياكي مُنهكاً. وخيوله أيضاً أضناها العناء، وهو—وقد أثقلته ضربات السلاح—قد فترت عزيمته وانكسر خاطره.»

Verse 30

ईदृशं सात्यकिं संख्ये निर्जित्य च महारथम्‌ । अधिकत्वं विजानीषे स्ववीर्यवशमागतम्‌

قال أرجونا: «إذ غلبتَ ساتياكي في القتال—وهو من عظماء مقاتلي العربة—حسبتَ نفسك أرفع منه، وتوهّمتَ أنه قد أُخضع لسلطانك بقوة بأسك أنت.»

Verse 31

यदिच्छसि शिरश्नलास्य असिना हन्तुमाहवे | तथा कृच्छूगतं चैव सात्यकिं क: क्षमिष्यति,इसलिये तुम युद्धस्थलमें तलवारसे उसका सिर काट लेना चाहते थे। सात्यकिको वैसे संकटमें देखकर मेरे पक्षका कौन वीर सहन करेगा?

قال أرجونا: «إن كنتَ حقًّا تريد أن تُسقطه في ساحة القتال بسيفك وتفصل رأسه، فمن من فرساننا يطيق أن يرى ساتياكي وقد أُلقي في مثل هذا الخطر؟ إن رؤيةَ ضيقه لا تُحتمل لصفّنا.»

Verse 32

त्वं वै विगर्हयात्मानमात्मानं यो न रक्षसि । कथं करिष्यसे वीर यो वा त्वां संश्रयेज्जन:

«إنك حقًّا توبّخ نفسك، إذ إنك لا تقدر حتى على حماية ذاتك. أيها البطل، فكيف ستستطيع أن تحمي من يلجأ إليك طالبًا الملاذ والعون؟»

Verse 33

संजय उवाच एवमुक्तो महाबाहुर्यूपकेतुर्महायशा: । युयुधानं समुत्सृज्य रणे प्रायमुपाविशत्‌

قال سانجيا: «أيها الملك، لما خوطب بتلك الكلمات، أطلق المحارب عظيم الذراعين، ذائع الصيت، الذي يحمل لواؤه شعار اليُوبا (عمود القربان)، يويودانا، ثم جلس في ساحة القتال نفسها متخذًا “برايا” — نذرًا زاهدًا بالصوم حتى الموت.»

Verse 34

शरानास्तीर्य सव्येन पाणिना पुण्यलक्षण: । यियासुर्ब्रह्य लोकाय प्राणान्‌ प्राणेष्वधाजुहोत्‌

قال سانجيا: «إن بهوريشرافا، صاحب العلامات الطاهرة، بسط السهام بيده اليسرى وجعلها مقعدًا مقدسًا؛ ثم، رغبةً في الرحيل إلى برهمالوكـا، قدّم أنفاسه الحيوية في الأنفاس نفسها—قربانًا باطنيًّا أُنجز بانضباط حبس النفس وضبطه.»

Verse 35

सूर्य चक्षु: समाधाय प्रसन्न सलिले मन: । ध्यायन्‌ महोपनिषदं योगयुक्तो5भवन्मुनि:

قال سانجيا: «ثبّت بصره في الشمس، وأودع قلبه الساكن في الماء الصافي؛ ثم، وهو متّحد باليوغا، تأمّل البرهمان الأعلى كما تُعلّمه حكمة الأوبانيشاد العظمى، فغدا مُنيًّا قائمًا في السكون والتأمل.»

Verse 36

ततः स सर्वसेनायां जन: कृष्णधनंजयौ । गर्हयामास तं॑ चापि शशंस पुरुषर्षभम्‌,तदनन्तर सारी कौरव-सेनाके लोग श्रीकृष्ण और अर्जुनकी निन्दा तथा नरश्रेष्ठ भूरिश्रवाकी प्रशंसा करने लगे

قال سنجيا: ثم إن الناس في صفوف الجيش كلّه أخذوا يعيبون كريشنا ودهاننجايا (أرجونا)، وفي المقابل راحوا يمدحون ذلك «الثور بين الرجال». ففي أجواء الميدان المشحونة بالمعيار الأخلاقي يتقلّب حكم العامة سريعًا: يندّدون بما يُرى ظلمًا، ويعظّمون البأس والوفاء لشرف المحارب.

Verse 37

निन्द्यमानौ तथा कृष्णौ नोचतु: किंचिदप्रियम्‌ । ततः प्रशस्यमानश्नव नाहृष्यद्‌ यूपकेतन:

قال سنجيا: ومع أن «الكريشنَين» كانا يُعابان، لم ينطقا بكلمة واحدة قاسية أو مُنفِّرة. وحين مُدِحا لم يطِشْ يوباكيتانا فرحًا—بل ظل ثابتًا بين الذم والمدح.

Verse 38

उनके द्वारा निन्दित होनेपर भी श्रीकृष्ण और अर्जुनने कोई अप्रिय बात नहीं कही तथा प्रशंसित होनेपर भी यूपकेतु भूरिश्रवाने हर्ष नहीं प्रकट किया ।।

قال سنجيا: حتى حين وُجِّهت إليهما الإهانات لم يقل كريشنا وأرجونا كلمةً غير لائقة؛ وحتى حين مُدِح يوباكيتو بهوريشرافاس لم يُبدِ سرورًا، أيها الملك. ولكن لما أخذ أبناؤك يتكلمون بمثل ذلك الكلام المُعيِّر على شاكلة بهوريشرافاس، لم يستطع دهاننجايا (أرجونا) أن يحتمل في قلبه ما قالوه وما قاله بهوريشرافاس، فاضطرب باطنه بسخطٍ مكتوم.

Verse 39

असंक्रुद्धमना वाच: स्मारयन्निव भारत | उवाच पाण्डुतनय: साक्षेपमिव फाल्गुन:

قال سنجيا: يا بهاراتا، إن ابن باندو—فالغونا (أرجونا)—وعقله غير متأجّج بالغضب البتّة، تكلّم كأنه يذكّرهم بأمورٍ سالفة، وكأنه يوجّه إلى الكورافا تعريضًا لاذعًا. وتُبرز الآية ضبطَ المحارب لنفسه: فحتى في قلب المعركة تنبع كلمات أرجونا من التذكّر واللوم الأخلاقي، لا من سخطٍ منفلت.

Verse 40

मम सर्वेडपि राजानो जानन्त्येव महाव्रतम्‌ । न शक्‍यो मामको हन्तुं यो मे स्थादू बाणगोचरे

قال سنجيا: «إن جميع الملوك يعلمون نذري العظيم: لا يستطيع عدوٌّ أن يقتل أحدًا من خاصّتي ما دام في مدى سهامي.»

Verse 41

यूपकेतो निरीक्ष्यैतन्न मार्महसि गर्लितुम्‌ न हि धर्ममविज्ञाय युक्त गर्हयितुं परम्‌

قال سنجيا: «يا يُوبَكيتو، بعد أن تأمّلتَ هذا الأمر فلا ينبغي لك أن تَلومني. فإن من غير معرفةٍ بحقيقة الدَّرما لا يَحسُن توبيخُ غيرك».

Verse 42

आत्तशस्त्रस्य हि रणे वृष्णिवीरं जिघांसत: । यदहं बाहुमच्छैत्सं न स धर्मो विगर्हित:

قال سنجيا: «فإنك في ساحة القتال، والسلاح في يدك، كنتَ عازمًا على قتل بطل الفِرِشْنِي سَاتْيَكِي. وفي تلك الحال، فإن قطعي لذراعك ليس فعلًا يُعاب؛ بل هو فعلٌ قويم أُنجز لحماية من التمسَ الملجأ.»

Verse 43

न्यस्तशस्त्रस्य बालस्य विरथस्य विवर्मण: । अभिमन्योर्व॑धं तात धार्मिक: को नु पूजयेत्‌

قال سنجيا: «يا عزيزي، حين كان الفتى أبهِمانيو قد ألقى سلاحه وصار بلا مركبةٍ وبلا درع، فمن من أهل الاستقامة يمكنه أن يمدح قتله في تلك الحال؟»

Verse 44

(दुर्योधनस्य क्षुद्रस्यथ न प्रमाणेडवतिष्ठत: । सौमदत्तेरव॑ध: साधु: स वै साहाय्यकारिण: ।।

قال أرجونا: «لأن دوريوذانا الحقير لا يقف ضمن حدود السلوك القويم، فإن قتل ابن سوماداتّا (بهوريشرَفَس)—بوصفه معينًا له—كان أمرًا لائقًا. وعندما تكون الحياة في خطر، فقراري الراسخ أن أحمي قومي—ولا سيما أولئك الأبطال الذين يُصرَعون أمام عينيّ. لقد أخضع بهوريشرَفَس، الكورو العظيم النفس، ساتْيَكِي لسلطانه؛ ولذلك، صونًا لنذري، فعلتُ ما فعلت.» قال سنجيا: «يا ملك، ثم إن أرجونا—وقد لان قلبه رحمةً، وتفكّر في أمور شتّى، وأثقلته الكآبة—خاطب بهوريشرَفَس الكورو مرةً أخرى: ‘العار على شريعة الكشاتريا (kṣatriya-dharma) التي أوصلتك—وأنت سيدٌ بين الرجال، مانحُ الملجأ وجديرٌ بأن يُلتمس ملجأً—إلى هذه الحال. لولا نذرٌ سابق، فمن في هذا العالم، حتى لو كان مثلي، يقدر اليوم أن يضرب شيخًا موقّرًا مثلك؟’ فلما خوطب بهوريشرَفَس بكلام بارثا، مسّ الأرض برأسه، ثم رفع بذراعه اليسرى ذراعه اليمنى وألقاها نحو أرجونا.»

Verse 45

एतत्‌ पार्थस्य तु वचस्तत: श्र॒ुत्वा महाद्युति: । यूपकेतुर्महाराज तूष्णीमासीदवाड्मुख:,महाराज! पार्थकी उपर्युक्त बात सुनकर यूप-चिह्लित ध्वजावाले महातेजस्वी भूरिश्रवा नीचे मुँह किये मौन रह गये

فلما سمع يُوبَكيتو، المحارب المتلألئ، كلام بارثا—يا ملك—أطرق بوجهه ولزم الصمت.

Verse 46

अर्जुन उवाच या प्रीतिर्थर्मराजे मे भीमे च बलिनां वरे । नकुले सहदेवे च सा मे त्वयि शलाग्रज

قال أرجونا: «إن المودّة التي أحملها لِدَهرماراجا يُدْهِشْتِهيرا، ولبهيما—أوّل الأقوياء—ولِنَكولا وسَهَديفا، هي بعينها المودّة التي أحملها لك أيضًا، يا أخا شالا الأكبر. وحتى في لهيب المعركة أعترف بما يشبه حرمة القرابة، وبمطالب الشرف التي تُوثِقُ أواصر المحاربين النبلاء».

Verse 47

मया त्वं समनुज्ञात: कृष्णेन च महात्मना । गच्छ पुण्यकृताललोकान्‌ शिबिरौशीनरो यथा,मैं और महात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण आपको यह आज्ञा देते हैं कि आप उशीनरपुत्र शिबिके समान पुण्यात्मा पुरुषोंके लोकोंमे जायेँ

قال أرجونا: «لقد مُنِحتَ الإذن مني، ومن كريشنا العظيم النفس أيضًا. فامضِ الآن إلى العوالم التي ينالها أهل البرّ—مثل شيبي ابن أُشينارا».

Verse 48

वासुदेव उवाच ये लोका मम विमला: सकृद्‌ विभाता ब्रह्माद्ये: सुरवृषभैरपीष्यमाणा: । तान्‌ क्षिप्रं ब्रज सतताग्निहोत्रयाजिन्‌ मत्तुल्यो भव गरुडोत्तमाड्यान:

قال فاسوديفا: «امضِ سريعًا إلى عوالمي الطاهرة التي لا دنس فيها، المتلألئة على الدوام، والتي يتوق حتى براهما وأفاضل الآلهة إلى بلوغها أبدًا. يا من يواظب على قربان الأَغْنِيهوترا بلا انقطاع، ادخلها حالًا؛ وكن مثلي—مَن يجوب وهو جالس على غارودا الأسمى».

Verse 49

संजय उवाच उत्थित: स तु शैनेयो विमुक्त: सौमदत्तिना । खड्गमादाय चिच्छित्सु: शिरस्तस्य महात्मन:

قال سنجيا: «أيها الملك! لما أطلق بهوريشرَفَس، ابن سومَدَتّا، سراحه، نهض ساتْيَكي من نسل شِني ووقف. ثم تناول سيفه وعزم على قطع رأس بهوريشرَفَس، ذلك العظيم الهمة».

Verse 50

निहतं पाण्डुपुत्रेण प्रसक्त भूरिदक्षिणम्‌ इयेष सात्यकिह्न्तुं शलाग्रजमकल्मषम्‌

قال سنجيا: «لما قُتِل بهوريدكشِنا—وهو منغمس في القتال—على يد أحد أبناء باندو، عزم أخو شالا الأكبر، المحارب الذي لا دنس فيه، على قتل ساتْيَكي».

Verse 51

निकृत्तभुजमासीनं छिन्नहस्तमिव द्विपम्‌ । शलके बड़े भाई प्रचुर दक्षिणा देनेवाले भूरिश्रवा सर्वथा निष्पाप थे। पाण्डुपुत्र अर्जुनने उनकी बाँह काटकर उनका वध-सा ही कर दिया था और इसीलिये वे आमरण अनशनका निश्चय लेकर ध्यान आदि अन्य कार्योमें आसक्त हो गये थे। उस अवस्थामें सात्यकिने बाँह कट जानेसे सूँड़ कटे हाथीके समान बैठे हुए भूरिश्रवाको मार डालनेकी इच्छा की || ५०६ || क्रोशतां सर्वसैन्यानां निन्द्यमान: सुदुर्मना:

Sañjaya said: Bhūriśravas, his arm severed, sat there like an elephant whose trunk has been cut off. As all the warriors cried out and condemned the act, Sātyaki—his mind darkened and agitated—pressed on with the intent to kill him. Though Kṛṣṇa and Arjuna, and many others on both sides, tried to restrain him, Sātyaki, unmoved by the outcry of the entire host, slew the vow-observing Bhūriśravas—an act widely judged blameworthy because it struck a disarmed, ascetic-minded foe.

Verse 52

वार्यमाण: स कृष्णेन पार्थेन च महात्मना । भीमेन चक्ररक्षाभ्याम श्वत्थाम्ना कृपेण च

Sañjaya said: Though he was being restrained by Kṛṣṇa and by the great-souled Pārtha (Arjuna), and also by Bhīma, by the two protectors of the chariot-wheel, and by Aśvatthāman and Kṛpa, he did not desist. The scene underscores a moral crisis on the battlefield: even when eminent warriors urge restraint, the momentum of wrath and the pressure of public outcry can drive a fighter toward an act that will be judged against dharma—especially when the opponent is under a vow and has been rendered vulnerable.

Verse 53

कर्णेन वृषसेनेन सैन्धवेन तथैव च । विक्रोशतां च सैन्यानामवधीत्‌ तं धृतव्रतम्‌

Sañjaya said: Even as Karṇa, Vṛṣasena, and Jayadratha (the lord of Sindhu) protested, and as the armies cried out in alarm, Sātyaki nevertheless slew that steadfast man of vowed conduct. The moment is ethically charged: the battlefield’s collective outcry and the attempts of great warriors to restrain him highlight how rage and the momentum of violence can overwhelm the restraints of dharma, even when the victim is known for ascetic resolve and disciplined vows.

Verse 54

प्रायोपविष्टाय रणे पार्थेन छिन्नबाहवे । सात्यकि: कौरवेयाय खड्गेनापाहरच्छिर:

Sañjaya said: When Bhūriśravas—his arm severed in battle by Pārtha (Arjuna)—sat down on the battlefield undertaking the vow of fasting unto death, Sātyaki struck him with a sword and cut off his head. The moment is ethically charged: it depicts the collapse of restraint amid war, where a warrior engaged in a death-vow is slain, raising questions about dharma, vengeance, and the limits of righteous conduct in combat.

Verse 55

-7““«मन्धनी0 ५ पी एक /ि ” कक कक * ब्की . नाभ्यनन्दन्त सैन्यानि सात्यकिं तेन कर्मणा । अर्जुनेन हतं॑ पूर्व यज्जघान कुरूद्गबहम्‌

Sañjaya said: The armies did not rejoice at that deed of Sātyaki—because he slew Bhūriśravas, the foremost of the Kurus, who had already been struck down earlier by Arjuna. In the moral atmosphere of the battle, this act was seen not as a clean victory but as a troubling killing of one already disabled, and thus it drew no acclaim from the soldiers.

Verse 56

सहस्राक्षसमं चैव सिद्धचारणमानवा: । भूरिश्रवसमालोक्य युद्धे प्रायगतं हतम्‌

قال سنجيا: لما رأوا بُهُورِيشرَفَس—وقد دُفع في المعركة إلى حافة الموت ثم قُتل—نظر السِّدْهَةُ والشارَنَةُ والناس، بل وحتى كائنات كإندرا، في دهشة. ويُبرز هذا المشهد كيف يصبح سقوطُ محاربٍ عظيمٍ مَشهداً أخلاقياً للعوالم، يدعو إلى التأمل في ثمن الغضب وهشاشة الحياة وسط الحرب.

Verse 57

पक्षवादांश्व सुबहून्‌ प्रावदंस्तव सैनिका:

قال سنجيا: لقد جادل جنودك طويلاً، وساقوا حججاً كثيرة مع ساتياكي وضده. ثم انتهوا إلى قولهم: «لا ذنب لساتياكي في هذا الأمر؛ هكذا كان لا بد أن يقع. فلا تُسكنوا الغضب في قلوبكم، فإن الغضب نفسه أشدُّ ما يجلب الشقاء للبشر.»

Verse 58

न वार्ष्णेयस्यापराधो भवितव्यं हि तत्‌ तथा । तस्मान्मन्युर्न व: कार्य: क्रोधो दुः:खतरो नृणाम्‌

قال سنجيا: «ليس هذا ذنبَ الفارْشْنِيَّة (ساتياكي)؛ بل كان لا بد أن يقع على هذا النحو. فلا تفسحوا للضغينة مكاناً، فإن الغضب مصدرٌ أعمق للمعاناة عند البشر.»

Verse 59

हन्तव्यश्वैव वीरेण नात्र कार्या विचारणा । विहितो हास्य धात्रैव मृत्यु: सात्यकिराहवे

قال سنجيا: «لقد كان حقّاً أن يُقتل على يد ذلك البطل؛ فلا مجال للتروّي هنا. فإن الخالق نفسه قد قضى له بالموت في ساحة القتال.»

Verse 60

सात्यकिरुवाच न हन्तव्यो न हन्तव्य इति यन्मां प्रभाषत । धर्मवादैरधर्मिष्ठा धर्मकज्चुकमास्थिता:

قال ساتياكي: «يا من آثرتم الأدهرما ووقفتم متدثّرين بعباءة الدهرما! في هذه الساعة تكررون عليّ مراراً: “لا تقتل، لا تقتل”، متسترين بخطبٍ عن الحق—فاسمعوا جوابي.»

Verse 61

यदा बाल: सुभद्राया: सुतः शस्त्रविना कृत: । युष्माभिनििहतो युद्धे तदा धर्म: क्व वो गत:

قال سانجيا: «حين جُرِّد ابن سوبهادرا الفتى من سلاحه ثم قتلتموه في ساحة القتال، فأين ذهب دارماكم في تلك اللحظة؟»

Verse 62

मया त्वेतत्‌ प्रतिज्ञातं क्षेपे कस्मिंश्षिदेव हि । यो मां निष्पिष्य संग्रामे जीवन्‌ हन्यात्‌ पदा रुषा

قال سانجيا: «لقد قطعتُ على نفسي هذا النذر حقًّا—في مناسبة ما—أن من يسحقني في المعركة ثم يبقى حيًّا، ثم يجيء بعد ذلك في غضبه فيقضي عليّ بقدمه…»

Verse 63

चेष्टमानं प्रतीघाते सभुजं मां सचक्षुष:

قال سانجيا: «إن ذراعيّ ما زالتا معي، وقد سعيتُ على الدوام لأن أردّ الضربة التي وُجِّهت إليّ. ومع ذلك، إن كنتم—ولكم عيون—تعدّونني كأنني قُتلتُ سلفًا، فذلك لا يكشف إلا بلادة فهمكم. يا أبطال الكورو الأوائل! لقد قضيتُ ثأري حقًّا بقتل بهوريشرافاس، وفي نظري كان ذلك صوابًا محضًا.»

Verse 64

मन्यध्वं मृत इत्येवमेतद्‌ वो बुद्धिलाघवम्‌ । युक्तो हास्य प्रतीघात: कृतो मे कुरुपुड्रवा:

قال سانجيا: «إن ظننتم: “إنه ميت لا محالة”، فذلك لا يدل إلا على سطحية حكمكم. يا أكرم الكورو! لقد كانت المعاقبة في هذه القضية لائقة حقًّا؛ وقد أخذتُ ثأري كما ينبغي.»

Verse 65

यत्‌ तु पार्थन मां दृष्टवा प्रतिज्ञामभिरक्षता | सखडूगो<स्य हतो बाहुरेतेनैवास्मि वज्चित:

لكن حين رأى بارثا (أرجونا) ضيقي، عمل صونًا لنذره، فقطع ذراع بهوريشرافاس مع سيفه. وبذلك الفعل نفسه حُرِمتُ من مجد أن أقتل بهوريشرافاس بيدي أنا.

Verse 66

भवितव्यं हि यद्‌ भावि दैवं चेष्टयतीव च । सो<यं हतो विमर्देडस्मिन्‌ किमत्राधर्मचेष्टितम्‌

قال سانجيا: «إن ما قُدِّر أن يقع فسيَقَع حقًّا، وكأن القدر نفسه يُحرِّك الأفعال على وفقه. وهكذا، في هذا الصدام بعينه، قُتِلَ بهوريشرافاس موافقًا لما كُتِب له. فماذا في هذا يُسمّى فعلًا خارجًا عن الدارما؟»

Verse 67

अपि चायं पुरा गीत: श्लोको वाल्मीकिना भुवि । न हन्तव्या: स्त्रिय इति यद्‌ ब्रवीषि प्लवड्भम

قال سانجيا: «وفوق ذلك، قديمًا على هذه الأرض نفسها أنشد فالمِيكي هذا الشِّلوكَة: “لا ينبغي قتل النساء.” يا محارب القِرَدة، ما دمت تقول ذلك، فجوابي: إن الرجل الحازم المجتهد يُعَدّ عنده دائمًا جديرًا بالفعل ما يُنزل الألم بالأعداء.»

Verse 68

सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा । पीडाकरममित्राणां यत्‌ स्यात्‌ कर्तव्यमेव तत्‌

قال سانجيا: «في كل زمان، لا يَنبغي لذوي العزم والسعي إلا أن يفعلوا ما يُوقع الأذى والضيق بالأعداء.»

Verse 69

संजय उवाच एवमुक्ते महाराज सर्वे कौरवपुड्रवा: । न सम किंचिदभाषन्त मनसा समपूजयन्‌

قال سانجيا: «يا مولاي الملك، لما قيل ذلك لم يُجِبْ أحدٌ من خِيار الكورافا بشيء. بل إنهم في قلوبهم أكرموه صامتين، مُستحسنين كلامه ومادحين موقفه.»

Verse 70

मन्त्राभिपूतस्य महाध्वरेषु यशस्विनो भूरिसहस्रदस्य च । मुनेरिवारण्यगतस्य तस्य न तत्र कश्चिद्‌ वधमभ्यनन्दत

قال سانجيا: «لم يُبدِ أحدٌ هناك رضًا عن قتل بهوريشرافاس—ذلك المشهور الذي طُهِّر بالتكريس المقرون بالمانترا في القرابين العظمى، وذاع صيته لكثرة ما قدّم من عطايا بالآلاف في اليَجْنَات، وكان جالسًا كالمُنيّ الزاهد ساكن الغابة. لقد بدا موته، وإن وقع في أتون الحرب، أمرًا مُقلقًا من جهة الدارما، لا مما يُستقبل بالتهليل.»

Verse 71

वर देनेवाले भूरिश्रवाका नीले केशोंसे अलंकृत तथा कबूतरके समान लाल नेत्रोंवाला वह कटा हुआ सिर ऐसा जान पड़ता था, मानो अश्वमेधके मेध्य अश्वका कटा हुआ मस्तक अग्निकुण्डके भीतर रखा गया हो

قال سانجيا: إن الرأس المقطوع لبهوريشرَفاس—المشهور بكونه واهبَ النِّعَم—المزيَّن بشَعرٍ داكن، ذو عينين محمرّتَين كعيني الحمامة، بدا كأنّه رأسُ الفرس المُكرَّس في قربان الأشفاميدها قد قُطع ووُضع داخل حفرة النار.

Verse 72

स तेजसा शस्त्रकृतेन पूतो महाहवे देहवरं विसृज्य । आक्रामदूर्ध्व वरदो वराहों व्यावृत्त्य धर्मेण परेण रोदसी

قال سانجيا: لقد تطهّر في تلك المعركة العظمى بوهج الأسلحة المحرِق، فطرح جسده الرفيع. ثم إن بهوريشرَفاس—الجديرَ بالمنح والواهبَ للمنح—ارتقى صعودًا؛ وبالدهرما العليا تجاوز الأرض والسماء إلى العوالم الأسمى.

Verse 73

सुनीलकेशं वरदस्य तस्य शूरस्य पारावतलोहिताक्षम्‌ | अश्वस्य मेध्यस्य शिरो निकृत्तं न्यस्तं हविर्धानमिवान्तरेण

قال سانجيا: «إن رأس ذلك البطل، واهبِ النِّعَم—ذو الشعر الشديد السواد والعينين الحمراوين كعيني الحمامة—قد قُطع ووُضع جانبًا، كأنه قُربانٌ أُودِع في إناء التقدمة.»

Verse 143

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भूरिश्रवोवधे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:

وهكذا تنتهي الفَصْلَةُ الثالثةُ والأربعون بعد المئة من «دروṇa پرفا» في «شري مهابهاراتا»—ضمن مقطع مقتل جَيَدْرَثَ—وخاصةً خبرَ مقتل بهوريشرَفاس.

Verse 153

एवमुक्तो रणे पार्थों भूरिश्रवसमब्रवीत्‌ | रणभूमिमें भूरिश्रवाके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उससे कहा

فلما خوطِبَ بذلك في ساحة القتال، أجاب بارثا (أرجونا) بهوريشرَفاس.

Verse 196

वयस्यैरथ मित्रैश्व ते च बाहुं समाश्रिता: । क्षत्रियलोग अपने-अपने भाई

قال أرجونا: «إنّ الكشاتريا يدخلون ساحة القتال ضدّ أعدائهم وهم محاطون بإخوتهم وآبائهم وأبنائهم وذوي قرباهم وعشيرتهم ورفاقهم من أترابهم، ومعهم الأصدقاء. غير أنّهم جميعًا يعتمدون على قوة ذراع ذلك المحارب الأسمى، ويتّخذون من بأسه ملجأً.»

Verse 563

अपूजयन्त त॑ देवा विस्मितास्ते5स्य कर्मभि: । युद्धमें प्रायोपवेशन करनेवाले

قال سنجيا: «لقد أكرمته الآلهة، مدهوشةً من أفعاله. ولمّا رأوا بهوريشرافاس—بطلاً كإندرا في البأس—قد قُتل وهو قد أخذ على نفسه صومَ الموت في ساحة القتال، أنشد السِدّها والشارَنا والبشر والآلهة مدائحه، إذ أدهشتهم عظمة سلوكه.»

Verse 623

स मे वध्यो भवेच्छत्रुर्यद्यपि स्यान्मुनिव्रत: । मैंने तो पहलेसे ही यह प्रतिज्ञा कर रखी है कि जिसके द्वारा कभी भी मेरा तिरस्कार हो जायगा अथवा जो संग्रामभूमिमें मुझे पटककर जीते-जी रोषपूर्वक मुझे लात मारेगा

قال سنجيا: «ذلك العدوّ سأقتله لا محالة. لقد عقدتُ من قبل هذا النذر: من أهانني في أيّ وقت، أو من طرحني أرضًا في ساحة القتال ثم—وأنا بعدُ حيّ—ركلني غضبًا، فمهما يكن جالسًا على نذر الصمت كالرُّهّاب من الحكماء، فلا بدّ أن يُعدَّ هدفًا مشروعًا للموت على يدي.»

Frequently Asked Questions

The narrative frames the tension between eliminating a decisive commander for strategic necessity and the ethical weight of targeting a revered teacher-figure (ācārya), while both sides justify escalation through duty-based reasoning.

Collective outcomes in crisis are shaped less by isolated prowess than by coordination, timely intervention, and the cascading effects of intent; agency operates within networks of protection, counsel, and consequence.

No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions as narrative-ethical documentation, where significance arises from situating tactical decisions within the epic’s broader inquiry into duty, leadership, and moral cost.

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