धृष्टद्युम्नस्य द्रोणाभिमुख्यं तथा सात्यकि-कर्ण-समागमः
Dhṛṣṭadyumna’s advance toward Droṇa and the Sātyaki–Karṇa confrontation
कथं हि राजवंश्यस्त्वं कौरवेयो विशेषत: । क्षत्रधर्मादपक्रान्त: सुवृत्तश्नरितव्रत:,अन्यथा राजाके वंशज और विशेषत: कुरुकुलमें उत्पन्न होकर भी तुम क्षत्रिय-धर्मसे कैसे गिर जाते? तुम्हारा शील-स्वभाव तो बहुत उत्तम था और तुमने श्रेष्ठ व्रतोंका पालन भी किया था
«كيف لك—وأنت من سلالة الملوك، بل ومن مواليد بيت الكورويين خاصة—أن تنحرف عن دارما الكشاتريا؟ لقد كان سلوكك كريمًا، وكنت تحفظ نذورًا رفيعة.»
भूरिश्रवा उवाच