
मातङ्ग–शक्रसंवादः (Mataṅga–Śakra Dialogue on Tapas, Status, and Moral Qualities)
Upa-parva: Varṇa–Saṃskāra–Phala Anuśāsana (Matanga–Śakra Saṃvāda episode)
Bhīṣma recounts that Mataṅga, described as disciplined and firm in vow, undertakes severe austerity—standing on one foot for a hundred years. Śakra (Indra) addresses him repeatedly as Mataṅga petitions for a “supreme station” that is characterized as extremely difficult to obtain. Śakra warns that such overreaching is not Mataṅga’s proper dharma-path and that seeking the unattainable can lead to ruin; even with tapas, the requested transformation “will not be” in the manner desired. The discourse then outlines a graded sequence of births and statuses over extended time—moving from stigmatized human conditions through śūdra, vaiśya, rājanya, and further designations—emphasizing long durations of “parivartana” (repeated turning/recurrence) in each state. Finally, the text introduces moral-psychological obstacles (anger, elation, desire, aversion, excessive pride, and contentious speech) that can “enter” and degrade a twice-born person; if conquered, one attains a good end, but if they conquer him, he falls. Śakra concludes by advising Mataṅga to choose another boon, stating that brāhmaṇya is exceedingly rare.
Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय से कहते हैं कि पाण्डवों के समक्ष एक अद्भुत प्रसंग खुलता है—गड़ाजी (गङ्गा-तीर्थ) का माहात्म्य, जिसकी कीर्ति सूर्य-तप्त जल तक में पुण्य का संचार करती है। → युधिष्ठिर, भ्राताओं सहित, पितामह भीष्म से प्रश्नों की माला बाँधते हैं—कौन-से देश, जनपद, आश्रम, पर्वत और नदियाँ विशेष पुण्यदायी हैं? इसी जिज्ञासा के साथ गड़ाजी के जल, दर्शन और व्रत-तप की तुलनाएँ सामने आती हैं, जो साधारण पुण्य-कल्पनाओं को चुनौती देती हैं। → गड़ाजी के माहात्म्य का उत्कर्ष—सूर्य-किरणों से तपे गड़ाजल के पान, गड़ाजी में एक मास-निवास, और गङ्गा-दर्शन से उत्पन्न प्रसाद की तुलना ऐसे महातप से की जाती है जो युग-सहस्र तक एक पाँव पर खड़े रहने जैसा है; यहाँ तीर्थ-शक्ति का चरम प्रतिपादन होता है। → उपदेश का फल यह कि पाण्डवों का चित्त प्रसन्न और स्थिर होता है; मन्त्र-कोविद ब्राह्मण उदित सूर्य की भाँति उपस्थान करते हैं, और तप-प्रभाव से दिशाएँ प्रकाशित-सी प्रतीत होती हैं—श्रद्धा, विस्मय और शान्ति में अध्याय ठहरता है। → महर्षिगण भीष्म और पाण्डवों की अनुमति लेकर सबके देखते-देखते अन्तर्धान हो जाते हैं—यह संकेत छोड़ते हुए कि आगे भीष्म के मुख से तीर्थ-धर्म और पुण्य-मार्ग का प्रवाह और गहन होगा।
Verse 1
अत-#-#क+ षड्विशो<5ध्याय: श्रीगड़ाजीके माहात्म्यका वर्णन वैशम्पायन उवाच बृहस्पतिसमं बुद्ध्या क्षमया ब्रह्मण: समम् । पराक्रमे शक्रसममादित्यसमतेजसम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जो बुद्धिमें बृहस्पतिके, क्षमामें ब्रह्माजीके, पराक्रममें इन्द्रके और तेजमें सूर्यके समान थे, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले वे महातेजस्वी गड़ानन्दन भीष्मजी जब अर्जुनके हाथसे मारे जाकर युद्धमें वीरशय्यापर पड़े हुए कालकी बाट जोह रहे थे और भाइयों तथा अन्य लोगोंसहित राजा युधिष्ठिर उनसे तरह- तरहके प्रश्न कर रहे थे, उसी समय बहुत-से दिव्य महर्षि भीष्मजीको देखनेके लिये आये
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ឱ ជនមេជ័យ! ព្រះភីស្មៈ មហាវីរបុត្រនៃព្រះនាងគង្គា មានប្រាជ្ញាស្មើព្រះព្រហស្បតិ (Bṛhaspati) មានអត់ធ្មត់ស្មើព្រះព្រហ្មា (Brahmā) មានវីរភាពស្មើឥន្ទ្រ (Śakra) និងមានពន្លឺស្មើព្រះអាទិត្យ។ មិនដែលលំអៀងចេញពីធម៌នៃខ្លួនឡើយ ព្រះអង្គត្រូវអរជុនបាញ់ដួល ហើយដេកលើគ្រែព្រួញរបស់វីរបុរស រង់ចាំពេលវេលាដែលកំណត់។ ខណៈព្រះបាទយុធិស្ឋិរ ជាមួយបងប្អូន និងអ្នកដទៃ សួរព្រះអង្គដោយសំណួរជាច្រើនប្រការ នោះមានមហារិសីទេវភាពជាច្រើនមកដើម្បីទស្សនាព្រះភីស្មៈ។
Verse 2
गाड़ेयमर्जुनेनाजी निहतं भूरितेजसम् । भ्रातृभि: सहितो<अ्यैश्न पर्यपृच्छद् युधिछ्िर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जो बुद्धिमें बृहस्पतिके, क्षमामें ब्रह्माजीके, पराक्रममें इन्द्रके और तेजमें सूर्यके समान थे, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले वे महातेजस्वी गड़ानन्दन भीष्मजी जब अर्जुनके हाथसे मारे जाकर युद्धमें वीरशय्यापर पड़े हुए कालकी बाट जोह रहे थे और भाइयों तथा अन्य लोगोंसहित राजा युधिष्ठिर उनसे तरह- तरहके प्रश्न कर रहे थे, उसी समय बहुत-से दिव्य महर्षि भीष्मजीको देखनेके लिये आये
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ក្នុងសង្គ្រាមនោះ ព្រះបីស្មៈដ៏ភ្លឺរលោង—ព្រះរាជបុត្រនៃទន្លេគង្គា មានតេជៈអស្ចារ្យ—ត្រូវអរជុនបាញ់ធ្លាក់។ បន្ទាប់មក ព្រះបាទយុធិស្ឋិរៈ ដោយមានបងប្អូនរួមដំណើរ បានចូលទៅជិតព្រះអង្គ ហើយសួរព្រះអង្គអំពីរឿងជាច្រើន។ (នេះជាការរៀបចំឆាកសីលធម៌សម្រាប់ព្រះបីស្មៈបង្ហាញធម្មៈនៅពេលជិតស្លាប់ បន្ទាប់ពីការបំផ្លាញដោយសង្គ្រាម។)
Verse 3
शयानं वीरशयने कालाकाड्'क्षिणमच्युतम् । आज ममुर्भरतश्रेष्ठ द्रष्टकामा महर्षय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जो बुद्धिमें बृहस्पतिके, क्षमामें ब्रह्माजीके, पराक्रममें इन्द्रके और तेजमें सूर्यके समान थे, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले वे महातेजस्वी गड़ानन्दन भीष्मजी जब अर्जुनके हाथसे मारे जाकर युद्धमें वीरशय्यापर पड़े हुए कालकी बाट जोह रहे थे और भाइयों तथा अन्य लोगोंसहित राजा युधिष्ठिर उनसे तरह- तरहके प्रश्न कर रहे थे, उसी समय बहुत-से दिव्य महर्षि भीष्मजीको देखनेके लिये आये हि. न विन न मु 73
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ឱ កូនចៅភារតៈដ៏ប្រសើរ! ព្រះបីស្មៈកំពុងដេកលើវីរាសយ្យា (គ្រែព្រួញ) មាំមួន មិនរអិលរអួល កំពុងរង់ចាំម៉ោងកំណត់នៃមរណៈ; នៅទីនោះ មហាឥសីជាច្រើន—ប្រាថ្នាចង់ឃើញព្រះអង្គ—បានមកដល់។ ឆាកនេះបង្ហាញការគ្រប់គ្រងខ្លួនឯងដ៏មិនរលត់របស់ព្រះបីស្មៈទោះក្នុងទុក្ខវេទនា និងការគោរពដែលពួកឥសីមានចំពោះជីវិតដែលឧទ្ទិសដល់កាតព្វកិច្ច។
Verse 4
अन्रिर्वसिष्ठो5थ भृगुः पुलस्त्य: पुलह:ः क्रतुः । अज्धिरागौतमोडगस्त्य: सुमति: सुयतात्मवान्,उनके नाम ये हैं--अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अड्िरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឥសីទាំងនេះមាន—អត្រី, វសិષ્ઠ, ភ្រឹគុ, ពុលស្ត្យ, ពុលហ, ក្រតុ, អង្គិរាស, គោតម, អគស្ត្យ និងសុមតិ ដែលមានចិត្តខ្លួនត្រូវបានសម្រួលល្អ»។ ក្នុងបរិបទ វគ្គនេះចាប់ផ្តើមបញ្ជីគោរពនៃឥសីដ៏ឧត្តម បង្ហាញពួកគេជាគំរូនៃវិន័យ និងអំណាចវិញ្ញាណ—ជាអ្នកដែលជីវិត និងព្រះបន្ទូលត្រូវបានអំពាវនាវ ដើម្បីដាក់ធម្មៈឲ្យឈរលើខ្សែស្រឡាយបុរាណដ៏គួរគោរព។
Verse 5
विश्वामित्र: स्थूलशिरा: संवर्त: प्रमतिर्दम: । बृहस्पत्युशनोव्यासाश्ष्यवन: काश्यपो ध्रुव:,उनके नाम ये हैं--अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अड्िरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच प्न्गागाए ए््ग्राक्प्नार्याफ्रसाणक व्याप्त दत्गत्च एन नण्ड्डगाए 05 कि 0 377 “आते %&फस!! )॥| “-< ज।ड्ल 50 छ्ी(84॥( ्त पल 4 54॥&8
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «(ក្នុងចំណោមមហាឥសីទាំងនោះមាន) វិស្វាមិត្រ, ស្ថូលសិរា, សំវર્ત, ប្រមតិ, ដម, ព្រហស្បតិ, ឧសនៈ (សុក្រចារ្យ), វ្យាស, ច្យវន, កាស្យប និង ធ្រុវ»។ ក្នុងវគ្គនេះ រឿងរ៉ាវបន្តបញ្ជីគោរពនៃឥសីដ៏មានអំណាច—ជាអ្នកដែលជីវិត និងព្រះបន្ទូលត្រូវបានចាត់ទុកជាគំរូសីលធម៌ និងប្រភពធម្មៈ ដើម្បីឲ្យការបង្រៀនបន្ទាប់មានទម្ងន់ដោយសារប្រពៃណីបរិសុទ្ធ។
Verse 6
दुर्वासा जमदन्निश्चव मार्कण्डेयोडथ गालव: । भरद्वाजो<थ रैभ्यक्ष यवक्रीतस्त्रितस्तथा,उनके नाम ये हैं--अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अड्िरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «(ក្នុងចំណោមឥសីទាំងនោះ) មាន ទុរវាសា, ជមដគ្និ, មារកណ្ឌេយ, ហើយបន្ទាប់មក កាលវ; ភរទ្វាជ និង រៃភ្យ; យវក្រីត និង ត្រីត ដូចគ្នា»។ ក្នុងវគ្គនេះ មហាកាវ្យបន្តបញ្ជីគោរពនៃឥសី—អ្នកដែលល្បីដោយតបស្យា ចំណេះដឹង និងអំណាចសីលធម៌—ដោយបង្ហាញពួកគេជាគំរូ និងជាសាក្សីនៃធម្មៈ ដែលជីវិត និងព្រះបន្ទូលណែនាំការប្រព្រឹត្តត្រឹមត្រូវ។
Verse 7
स्थूलाक्ष: शबलाक्षश्न कण्वो मेधातिथि: कृश: । नारद: पर्वतश्चैव सुधन्वाथैकतो द्विज:,उनके नाम ये हैं--अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अड्िरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ក្នុងចំណោមឥសីទាំងនោះ មាន ស្ថូលាក្សៈ សបលាក្សៈ កណ្ណវៈ មេធាតិថិ និង ក្រឹសៈ; ហើយក៏មាន នារទៈ និង បរវតៈ ព្រមទាំង សុធន្វា និង ព្រាហ្មណ៍ ឯកតៈ ផងដែរ»។ ដោយពាក្យនេះ មហាកាវ្យបន្តរាយនាមឥសីដ៏ឧត្តមដោយក្តីគោរព—អ្នកប្រកបតបស្យា វិជ្ជាសក្ការៈ និងជាអ្នកបន្តបន្ទាប់ធម៌—បង្ហាញថា អំណាចសីលធម៌ក្នុង «មហាភារត» ស្ថិតលើសក្ខីភាព និងវត្តមានរបស់អ្នកឃើញពិត។
Verse 8
नितम्भूरभुवनो धौम्य: शतानन्दो5कृतव्रण: । जामदग्न्यस्तथा राम: कचश्चेत्येवमादय:,उनके नाम ये हैं--अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अड्िरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «(ក្នុងចំណោមឥសីទាំងនោះ) មាន និតម្ភូ ភុវន ធោម្យៈ សតានន្ទ អក្រឹតវ្រណៈ និង រាមៈ ជាមទគ្ន្យៈ (បរśុរាម) ហើយក៏មាន កច ផងដែរ—ជាមួយអ្នកដទៃជាច្រើន»។ ក្នុងបរិបទនេះ ខណ្ឌនេះជាបញ្ជីគោរពនៃឥសីដ៏គួរគោរព ដែលវត្តមាន និងអំណាចរបស់ពួកគេធ្វើឲ្យសុន្ទរកថាអំពីធម៌កាន់តែបរិសុទ្ធ ហើយរំលឹកថា ការបង្រៀនសីលធម៌មានមូលដ្ឋានលើតបស្យា ចំណេះដឹង និងការអត់ធ្មត់របស់អ្នកឃើញពិត។
Verse 9
समागता महात्मानो भीष्म द्रष्टे महर्षय: । तेषां महात्मनां पूजामागतानां युधिष्ठिर:
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ ឥសីមហាត្មាៗ (មហាឥសី) បានមកប្រជុំគ្នានៅទីនោះ ដើម្បីទស្សនា ភីष្មៈ។ យុធិષ્ઠិរៈ ដែលចងចាំធម៌ និងក្រមប្រពៃណី បានចេញទៅគោរពបូជាអ្នកឧត្តមទាំងនោះ ដែលទើបមកដល់។
Verse 10
ते पूजिता: सुखासीना: कथाश्षक्रुर्महर्षय:
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ ពេលបានទទួលការគោរពយ៉ាងសមគួរ រួចហើយ ឥសីមហាអ្នកទាំងនោះអង្គុយដោយសុខសាន្ត ហើយចាប់ផ្តើមសន្ទនាគ្នា។
Verse 11
भीष्मस्तेषां कथा: श्रुत्वा ऋषीणां भावितात्मनाम्
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ ភីष្មៈ បានស្តាប់រឿងរ៉ាវ និងពាក្យសន្ទនារបស់ឥសីទាំងនោះ—អ្នកមានចិត្តបានបណ្តុះបណ្តាល និងបរិសុទ្ធ—ហើយទទួលយកវាជាគន្លឹះធ្ងន់ធ្ងរ សម្រាប់ការប្រព្រឹត្តតាមធម៌។
Verse 12
ततस्ते भीष्ममामन्त्रय पाण्डवांश्व महर्षय:
បន្ទាប់មក ព្រះឥសីមហាឥសីទាំងនោះ បានអញ្ជើញនិយាយទៅកាន់ ភីෂ្ម ដោយក្តីគោរព ហើយក៏បានអញ្ជើញនិយាយទៅកាន់ បណ្ឌវទាំងឡាយផងដែរ—ជាសញ្ញាបង្ហាញការប្រែវគ្គនៃសន្ទនា ដែលអ្នកចាស់ទុំ និងអ្នកឃើញធម៌ សុំការយល់ព្រម និងការយកចិត្តទុកដាក់ មុននឹងបន្តឱវាទដែលមានមូលដ្ឋានលើធម៌។
Verse 13
तानृषीन् सुमहाभागानन्तर्धानगतानपि
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «សូម្បីតែព្រះឥសីដ៏មានសុភមង្គលយ៉ាងលើសលប់ទាំងនោះ—ទោះបីពួកគេបានដកខ្លួនចេញពីទិដ្ឋភាព ហើយលង់បាត់ទៅក្នុងភាពមើលមិនឃើញរួចហើយក្តី—ក៏នៅតែត្រូវបានលើកឡើង និងគិតគូរអំពីពួកគេដដែល»។
Verse 14
पाण्डवास्तुष्टवुः सर्वे प्रणेमुश्न मुहुर्मुहुः । उन महाभाग मुनियोंके अदृश्य हो जानेपर भी समस्त पाण्डव बारंबार उनकी स्तुति और उन्हें प्रणाम करते रहे ।। १३ $ ।। प्रसन्नमनस: सर्वे गाज़ेयं कुरुसत्तमम्
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ បណ្ឌវទាំងអស់ ដោយចិត្តពោរពេញដោយការគោរព បានសរសើរព្រះឥសីដ៏មានព្រលឹងធំទាំងនោះ ហើយក៏កោតសម្តែងការគោរពជាបន្តបន្ទាប់។ ទោះបីអ្នកបួសដ៏រុងរឿងទាំងនោះបានលង់បាត់ពីទិដ្ឋភាពទៅហើយក្តី បណ្ឌវទាំងឡាយក៏នៅតែបន្តការសម្តែងនមស្ការ—បង្ហាញថាកិត្តិយសពិត មិនអាស្រ័យលើការមើលឃើញដោយភ្នែកទេ ប៉ុន្តែអាស្រ័យលើការដឹងគុណ និងភាពទាបទន់តាមធម៌។
Verse 15
प्रभावात् तपसस्तेषामृषीणां वीक्ष्य पाण्डवा:
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ដោយឃើញពន្លឺរុងរឿងដែលកើតពីតបស្យា (ការប្រតិបត្តិអាសគេស) របស់ព្រះឥសីទាំងនោះ បណ្ឌវទាំងឡាយបានឈរយកចិត្តទុកដាក់ដោយក្តីគោរព ដោយទទួលស្គាល់អំណាចធម៌ និងកម្លាំងវិញ្ញាណដែលកើតពីការគ្រប់គ្រងខ្លួនយ៉ាងមានវិន័យ។
Verse 16
महाभाग्यं पर॑ं तेषामृषीणामनुचिन्त्य ते । पाण्डवा: सह भीष्मेण कथाश्षक्रुस्तदाश्रया:,उन महर्षियोंके महान् सौभाग्यका चिन्तन करके पाण्डव भीष्मजीके साथ उन्हींके सम्बन्धमें बातें करने लगे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ដោយគិតគូរអំពីសុភមង្គលដ៏លើសលប់របស់ព្រះឥសីទាំងនោះ បណ្ឌវទាំងឡាយ រួមជាមួយ ភីષ្ម បានចាប់ផ្តើមពិភាក្សាអំពីរឿងរ៉ាវ និងប្រធានបទដែលពាក់ព័ន្ធនឹងពួកគេ ដោយដាក់មូលដ្ឋានសន្ទនានៅលើប្រធានបទនោះឯង។
Verse 17
वैशम्पायन उवाच कथान्ते शिरसा पादौ स्पृष्टवा भीष्मस्य पाण्डव: । धर्म्य धर्मसुतः प्रश्न॑ पर्यपृच्छद् युधिष्ठिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! बातचीतके अन्तमें भीष्मके चरणोंमें सिर रखकर धर्मपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने यह धर्मानुकूल प्रश्न पूछा--
វៃសម្បាយនៈបានពោលថា៖ «ឱ ព្រះបាទជនមេជ័យ! នៅចុងបញ្ចប់នៃការសន្ទនា ព្រះយុធិષ્ઠិរៈ កូននៃបណ្ឌុ និងជាបុត្រនៃធម្មៈ បានដាក់ក្បាលប៉ះជើងព្រះភីស្មៈ ហើយសួរសំណួរដែលសមតាមធម្មៈនេះ»។
Verse 18
युधिछ्िर उवाच के देशा: के जनपदा आश्रमा: के च पर्वता: । प्रकृष्टा: पुण्यत: काश्न ज्ञेया नद्य: पितामह,युधिष्ठिर बोले--पितामह! कौन-से देश, कौन-से प्रान्त, कौन-कौन आश्रम, कौन-से पर्वत और कौन-कौन-सी नदियाँ पुण्यकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ समझने योग्य हैं?
ព្រះយុធិષ્ઠិរៈបានពោលថា៖ «ឱ ពិតាមហៈ! តើប្រទេសណា ដែនដីណា អាស្រមណា ភ្នំណា និងទន្លេណាខ្លះ គួរឲ្យដឹងថា ល្អឥតខ្ចោះបំផុតតាមទស្សនៈនៃបុណ្យសក្ការៈ? ហើយតាមមូលដ្ឋានអ្វី ទើបគេរាប់ថា ពិសេសបរិសុទ្ធ?»
Verse 19
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शिलोज्छवृत्ते: संवादं सिद्धस्य च युधिष्ठिर,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें शिलोज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले एक पुरुषका किसी सिद्ध पुरुषके साथ जो संवाद हुआ था, वह प्राचीन इतिहास सुनो
ព្រះភីស្មៈបានពោលថា៖ «ឱ យុធិષ્ઠិរៈ! ក្នុងរឿងនេះផងដែរ គេយកប្រវត្តិដ៏បុរាណមួយមកជាឧទាហរណ៍។ ចូរស្តាប់រឿងចាស់នោះ—សន្ទនារវាងបុរសម្នាក់ដែលរស់ដោយប្រមូលគ្រាប់ស្រូវធ្លាក់ (śiloccavṛtti) និងព្រះសិទ្ធៈមួយ—ដើម្បីបំភ្លឺអំពីធម្មៈនេះ»។
Verse 20
इमां कक्ित् परिक्रम्य पृथिवीं शैलभूषणाम् । असकृद ड्विपदां श्रेष्ठ: श्रेष्टस्य गृहमेधिन:,मनुष्योंमें श्रेष्ठ कोई सिद्ध पुरुष शैलमालाओंसे अलंकृत इस समूची पृथ्वीकी अनेक बार परिक्रमा करनेके पश्चात् शिलोज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले एक श्रेष्ठ गृहस्थके घर गया। उस गृहस्थने उसकी विधिपूर्वक पूजा की। वह समागत ऋषि वहाँ बड़े सुखसे रातभर रहा। उसके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी 5॥ ता ध ] गा 5त
ព្រះភីស្មៈបានពោលថា៖ «បន្ទាប់ពីបានធ្វើបរិក្រមជុំវិញផែនដីទាំងមូល ដែលតុបតែងដោយជួរភ្នំជាច្រើន ដងហើយដងទៀត បុរសម្នាក់ជាសិទ្ធៈ អ្នកល្អឥតខ្ចោះ និងជាអ្នកប្រសើរបំផុតក្នុងចំណោមមនុស្ស បានទៅដល់ផ្ទះរបស់គ្រួសារបុរសម្នាក់ដ៏ប្រសើរ។ គ្រួសារនោះបានគោរពបូជាគាត់តាមពិធីត្រឹមត្រូវ។ ឥសីដែលមកដល់បានស្នាក់នៅទីនោះពេញមួយរាត្រីដោយសុខសាន្ត មុខមាត់ពោរពេញដោយសេចក្តីរីករាយស្ងប់ស្ងាត់ ដែលកើតពីការទទួលភ្ញៀវតាមធម្មៈ»។
Verse 21
शिलवृत्तेगहं प्राप्त: स तेन विधिनार्चित: । उवास रजनी तत्र सुमुख: सुखभागृषि:,मनुष्योंमें श्रेष्ठ कोई सिद्ध पुरुष शैलमालाओंसे अलंकृत इस समूची पृथ्वीकी अनेक बार परिक्रमा करनेके पश्चात् शिलोज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले एक श्रेष्ठ गृहस्थके घर गया। उस गृहस्थने उसकी विधिपूर्वक पूजा की। वह समागत ऋषि वहाँ बड़े सुखसे रातभर रहा। उसके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी
ព្រះភីស្មៈបានពោលថា៖ «ពេលបានទៅដល់ផ្ទះរបស់គ្រួសារបុរសម្នាក់ដែលរស់ដោយវិន័យតឹងរឹងនៃការប្រមូលគ្រាប់ស្រូវធ្លាក់ (śiloccavṛtti) សិទ្ធៈនោះត្រូវបានគាត់គោរពបូជាតាមពិធីត្រឹមត្រូវ។ បន្ទាប់មក ឥសីបានស្នាក់នៅទីនោះពេញមួយរាត្រីដោយសុខសាន្ត; មុខមាត់របស់គាត់ស្ងប់ស្ងាត់ និងពេញដោយសេចក្តីរីករាយ—បង្ហាញពីការពេញចិត្តដែលកើតឡើងពេលការទទួលភ្ញៀវធ្វើតាមធម្មៈ»។
Verse 22
शिलवृत्तिस्तु यत् कृत्यं प्रातस्तत् कृतवान् शुचि: । कृतकृत्यमुपातिष्ठत् सिद्ध तमतिथिं तदा,सबेरा होनेपर वह शिलवृत्तिवाला गृहस्थ स्नान आदिसे पवित्र होकर प्रातः:कालीन नित्यकर्ममें लग गया। नित्यकर्म पूर्ण करके वह उस सिद्ध अतिथिकी सेवामें उपस्थित हुआ। इसी बीचमें अतिथिने भी प्रातःकालके स्नान-पूजन आदि आवश्यक कृत्य पूर्ण कर लिये थे
ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ ពេលព្រឹករះឡើង គ្រួសារបុរសអ្នកមានវិន័យក្នុងការប្រព្រឹត្តិ បានសម្អាតខ្លួនឲ្យបរិសុទ្ធ ហើយបំពេញកិច្ចព្រឹកដែលត្រូវធ្វើ។ ពេលបញ្ចប់វត្តប្រចាំថ្ងៃរួច គាត់ក៏ឈរត្រៀមបម្រើភ្ញៀវសិទ្ធៈដ៏សម្រេច—ដែលនៅចន្លោះពេលនោះផងដែរ បានបញ្ចប់ពិធីព្រឹកចាំបាច់របស់ខ្លួន ដូចជា ងូតទឹក និងបូជាទេវតា។
Verse 23
तौ समेत्य महात्मानौ सुखासीनौ कथा: शुभा: । चक्रतुर्वेदसम्बद्धास्तच्छेषकृतलक्षणा:,वे दोनों महात्मा एक-दूसरेसे मिलकर सुखपूर्वक बैठे तथा वेदोंसे सम्बद्ध और वेदान्तसे उपलक्षित शुभ चर्चाएँ करने लगे
បន្ទាប់មក មហાત્મាទាំងពីរនោះបានជួបគ្នា ហើយអង្គុយដោយសុខសាន្ត; ពួកគេបានចាប់ផ្តើមសន្ទនាដ៏មង្គល—ជាវិវាទនិងធម្មកថាដែលពាក់ព័ន្ធនឹងវេទៈ ហើយមានសញ្ញានៃវេដាន្តៈជាគោលបំណងបញ្ចប់។
Verse 24
शिलवृत्ति: कथान्ते तु सिद्धमामन्त्रय यत्नत: । प्रश्न॑ पप्रच्छ मेधावी यन्मां त्वं परिपृच्छसि,बातचीत पूरी होनेपर शिलोउ्छवृत्तिवाले बुद्धिमान् गृहस्थ ब्राह्मणने सिद्धको सम्बोधित करके यत्नपूर्वक वही प्रश्न पूछा, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो
ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ ពេលសន្ទនានោះដល់ទីបញ្ចប់ ព្រះព្រាហ្មណ៍គ្រួសារបុរសដ៏ប្រាជ្ញា អ្នករស់ដោយការរើសសំណល់ស្រូវ (ជីវិតបែបសិលវ្រឹត្តិ) បានអញ្ជើញសិទ្ធៈដោយប្រុងប្រយ័ត្ន ហើយសួរព្រះអង្គនូវសំណួរដដែល—សំណួរដែលឥឡូវនេះ អ្នកកំពុងសួរខ្ញុំ។
Verse 25
शिलवृत्तिस्वाच के देश:के जनपदा: के55श्रमा: के च पर्वता: । प्रकृष्टा: पुण्यत: काश्न ज्ञेया नद्यस्तदुच्यताम्,शिलवृत्तिवाले ब्राह्मणने पूछा--ब्रह्म! कौन-से देश, कौन-से जनपद, कौन-कौन आश्रम, कौन-से पर्वत और कौन-कौन-सी नदियाँ पुण्यकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ समझनेयोग्य हैं? यह बतानेकी कृपा करें
ព្រះព្រាហ្មណ៍អ្នករស់ដោយសិលវ្រឹត្តិបានសួរថា៖ «ឱ ព្រះព្រាហ្ម! តើប្រទេសណា នគរណា អាស្រមណា ភ្នំណា និងទន្លេណាខ្លះ គួរត្រូវបានចាត់ទុកថា ល្អឥតខ្ចោះបំផុតក្នុងទស្សនៈនៃបុណ្យកុសល? សូមមេត្តាប្រាប់ខ្ញុំ»។
Verse 26
सिद्ध उवाच ते देशास्ते जनपदास्ते5<श्रमास्ते च पर्वता: । येषां भागीरथी गड्ा मध्येनैति सरिद्वरा,सिद्धने कहा--ब्रह्मन्! वे ही देश, जनपद, आश्रम और पर्वत पुण्यकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनके बीचसे होकर सरिताओंमें उत्तम भागीरथी गड़ा बहती हैं इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गज्भामाहात्म्यक थने षड्विंशो5ध्याय:
សិទ្ធៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះព្រាហ្មណ៍! ប្រទេសទាំងនោះ នគរទាំងនោះ អាស្រមទាំងនោះ និងភ្នំទាំងនោះ គឺមានបុណ្យកុសលលើសគេ—ជាពិសេសបំផុត—ដែលនៅកណ្ដាលរបស់វា មានទន្លេភាគីរថី គង្គា អធិរាជនៃទន្លេទាំងឡាយ ហូរឆ្លងកាត់»។
Verse 27
/८-] __ 200+“7:. 5 फ्ड्लि कक तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैस्त्यागेन वा पुन: । गतिं तां न लभेज्जन्तुर्गज्भां संसेव्य यां लभेत्,गड़ाजीका सेवन करनेसे जीव जिस उत्तम गतिको प्राप्त करता है उसे वह तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा त्यागसे भी नहीं पा सकता
សត្វលោកមិនអាចឈានដល់គោលដៅដ៏អធិកអធមនោះ ដោយតបស្យា ដោយព្រហ្មចរិយា ដោយយញ្ញ ឬសូម្បីតែដោយការលះបង់ឡើយ។ ស្ថានភាពដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់នោះ ទើបបានសម្រេចដោយការចូលជ្រកពឹងផ្អែកលើព្រះគង្គា ដោយសេចក្តីស្មោះស្រឡាញ់។
Verse 28
स्पृष्टानि येषां गाड़ेयैस्तोयैर्गात्राणि देहिनाम् न्यस्तानि न पुनस्तेषां त्याग: स्वर्गाद् विधीयते,जिन देहधारियोंके शरीर गड्ाजीके जलसे भीगते हैं अथवा मरनेपर जिनकी हडियाँ गंगाजीमें डाली जाती हैं वे कभी स्वर्गसे नीचे नहीं गिरते
សិទ្ធាបានប្រកាសថា៖ អ្នកមានរាងកាយណាដែលអវយវៈត្រូវទឹកព្រះគង្គាប៉ះ ឬក្រោយស្លាប់ឆ្អឹងត្រូវបានដាក់បញ្ចូលក្នុងព្រះគង្គា—អ្នកទាំងនោះមិនធ្លាក់ចុះពីសួគ៌ម្តងទៀតឡើយ។
Verse 29
सर्वाणि येषां गाड़ेयैस्तोयै: कार्याणि देहिनाम् । गां त्यक्त्वा मानवा विप्र दिवि तिष्ठन्ति ते जना:,विप्रवर! जिन देहधारियोंके सम्पूर्ण कार्य गड़ाजलसे ही सम्पन्न होते हैं वे मानव मरनेके बाद पृथ्वीका निवास छोड़कर स्वर्गमें विराजमान होते हैं
សិទ្ធាបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រហ្មណ៍! មនុស្សណាដែលកិច្ចការទាំងអស់នៃជីវិតមានរាងកាយ ត្រូវបានបំពេញដោយទឹកគង្គា—ពេលស្លាប់បានលះចោលផែនដី—ពួកគេនឹងស្ថិតនៅសួគ៌»។
Verse 30
पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि ये नरा: । पश्चात् गड्ां निषेवन्ते तेडपि यान्त्युत्तमां गतिम्,जो मनुष्य जीवनकी पहली अवस्थामें पापकर्म करके भी पीछे गड़ाजीका सेवन करने लगते हैं वे भी उत्तम गतिको ही प्राप्त होते हैं
សិទ្ធាបាននិយាយថា៖ មនុស្សណាដែលនៅវ័យដំបូងបានធ្វើអំពើបាប ប៉ុន្តែក្រោយមកបានចាប់យកការប្រព្រឹត្តនៃការប្រើប្រាស់/ពឹងផ្អែកលើព្រះគង្គា—សូម្បីតែពួកគេក៏ឈានដល់គតិដ៏ឧត្តមដែរ។
Verse 31
स््नातानां शुचिभिस्तोयैर्गाज़ियै: प्रयतात्मनाम् । व्युष्टिर्भवति या पुंसां न सा क्रतुशतैरपि,गड़ाजीके पवित्र जलसे स्नान करके जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है उन पुरुषोंके पुण्यकी जैसी वृद्धि होती है; वैसी सैकड़ों यज्ञ करनेसे भी नहीं हो सकती
សិទ្ធាបាននិយាយថា៖ បុរសអ្នកមានវិន័យ ដែលងូតទឹកក្នុងទឹកបរិសុទ្ធនៃព្រះគង្គា ហើយធ្វើឲ្យចិត្តខាងក្នុងស្អាតបរិសុទ្ធ—ការកើនឡើងនៃបុណ្យដែលកើតមាន មិនអាចសម្រេចបានសូម្បីតែដោយធ្វើយញ្ញមួយរយដង។
Verse 32
यावदस्थि मनुष्यस्य गड्ातोयेषु तिष्ठतति । तावद्वर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते,मनुष्यकी हड्डी जितने समयतक गड्ाजीके जलमें पड़ी रहती है, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है
ព្រះសិទ្ធាបានប្រកាសថា៖ ដរាបណាឆ្អឹងរបស់មនុស្សម្នាក់នៅស្ថិតក្នុងទឹកទន្លេគង្គា ដរាបនោះគេត្រូវបានគោរពលើកតម្កើងនៅសួគ៌ ជាចំនួនពាន់ឆ្នាំតាមរយៈពេលនោះ។
Verse 33
अपहत्य तमस्तीव्रं यथा भात्युदये रवि: । तथापहत्य पाप्मानं भाति गड़ाजलोक्षित:,जैसे सूर्य उदयकालमें घने अन्धकारको विदीर्ण करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार गड़ाजलमें स्नान करनेवाला पुरुष अपने पापोंको नष्ट करके सुशोभित होता है
ដូចព្រះអាទិត្យនៅពេលរះ បំបែកភាពងងឹតក្រាស់ហើយភ្លឺចែងចាំង ដូច្នេះដែរ អ្នកដែលបានងូតក្នុងទឹកគដា ក៏ភ្លឺរលោងដោយបំផ្លាញបាបរបស់ខ្លួន។
Verse 34
विसोमा इव शर्वर्यों विपुष्पास्तरवो यथा । तद्धद् देशा दिशश्वैव हीना गज्भाजलै: शिवै:,जैसे बिना चाँदनीकी रात और बिना फूलोंके वृक्ष शोभा नहीं पाते, उसी प्रकार गड़ाजीके कल्याणमय जलसे वज्चित हुए देश और दिशाएँ भी शोभा एवं सौभाग्य हीन हैं
ដូចរាត្រីដែលគ្មានពន្លឺព្រះចន្ទ និងដូចដើមឈើដែលគ្មានផ្កា មិនអាចមានសោភ័ណភាពបាន ដូច្នេះដែរ ដែនដី និងទិសទាំងឡាយ ដែលខ្វះទឹកគដាដ៏ជាមង្គល ក៏ខ្វះសោភ័ណភាព និងសំណាងល្អ។
Verse 35
वर्णाश्रमा यथा सर्वे धर्मज्ञानविवर्जिता: । क्रतवश्चन॒ यथासोमास्तथा गड़ां विना जगत्,जैसे धर्म और ज्ञानसे रहित होनेपर सम्पूर्ण वर्णों और आश्रमोंकी शोभा नहीं होती है तथा जैसे सोमरसके बिना यज्ञ सुशोभित नहीं होते, उसी प्रकार गड़ाके बिना जगत्की शोभा नहीं है
ដូចវណ្ណៈ និងអាស្រាមទាំងអស់ បើខ្វះធម៌ និងចំណេះដឹង នោះមិនមានសោភ័ណភាពទេ ហើយដូចពិធីយញ្ញ បើគ្មានសោមរាស មិនអាចរុងរឿងបាន ដូច្នេះដែរ ពិភពលោកនេះ បើគ្មានគដា ក៏គ្មានសោភ័ណភាពឡើយ។
Verse 36
यथा हीन॑ नभो<र्केण भू:शैलै: खं च वायुना । तथा देशा दिशश्वैव गड़ाहीना न संशय:,जैसे सूर्यके बिना आकाश, पर्वतोंके बिना पृथ्वी और वायुके बिना अन्तरिक्षकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार जो देश और दिशाएँ गड़ाजीसे रहित हैं उनकी भी शोभा नहीं होती --इसमें संशय नहीं है
ដូចមេឃបើគ្មានព្រះអាទិត្យ ផែនដីបើគ្មានភ្នំ និងអាកាសធាតុបើគ្មានខ្យល់ មិនមានសោភ័ណភាពទេ ដូច្នេះដែរ ដែនដី និងទិសទាំងឡាយ បើខ្វះគដា ក៏ខ្វះសោភ័ណភាព—មិនមានសង្ស័យឡើយ។
Verse 37
त्रिषु लोकेषु ये केचित् प्राणिन: सर्व एव ते । तर्प्पमाणा: परां तृप्तिं यान्ति गज़ाजलै: शुभै:,तीनों लोकोंमें जो कोई भी प्राणी हैं, उन सबका गड़ाजीके शुभ जलसे तर्पण करनेपर वे सब परम तृप्ति लाभ करते हैं
ព្រះសិទ្ធៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «សត្វមានជីវិតទាំងឡាយណាដែលមាននៅក្នុងលោកទាំងបី—ទាំងអស់នោះ—ពេលបានទទួលការត្រពាំង (តರ್ಪណ) ដោយទឹកដ៏មង្គលដែលពាក់ព័ន្ធនឹងដំរី នោះសត្វទាំងអស់នឹងឈានដល់សេចក្តីពេញចិត្តដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់បំផុត»។
Verse 38
यस्तु सूर्येण निष्टप्तं गाड़ेयं पिबते जलम् । गवां निहरिनिर्मुक्तादू यावकात् तद् विशिष्यते,जो मनुष्य सूर्यकी किरणोंसे तपे हुए गड़ाजलका पान करता है, उसका वह जलपान गायके गोबरसे निकले हुए जौकी लप्सी खानेसे अधिक पवित्रकारक है
ព្រះសិទ្ធៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «អ្នកណាដែលផឹកទឹកដែលត្រូវកម្តៅដោយព្រះអាទិត្យ—ទឹកដែលយកមកពីប្រភពជ្រៅរឹងមាំ—នោះការផឹកទឹកនោះបង្កើតភាពបរិសុទ្ធលើសជាងការញ៉ាំបបរបាលីដែលធ្វើពីគ្រាប់ធញ្ញជាតិដែលបានបំបែកចេញពីលាមកគោ»។
Verse 39
इन्दुब्रतसहस्र॑ तु यश्चरेत् कायशोधनम् । पिबेद् यश्चापि गज्भाम्भ: समौ स्यातां न वा समौ,जो शरीरको शुद्ध करनेवाले एक सहस्र चान्द्रायण व्रतोंका अनुष्ठान करता है और जो केवल गड़ाजल पीता है, वे दोनों समान ही हैं अथवा यह भी हो सकता है कि दोनों समान नहों (गड़ाजल पीनेवाला बढ़ जाय)
ព្រះសិទ្ធៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «មនុស្សម្នាក់អាចអនុវត្តវ្រតចន្ទ្រាយណ (Cāndrāyaṇa) ដើម្បីសម្អាតរាងកាយដល់មួយពាន់ដង; មនុស្សម្នាក់ទៀតគ្រាន់តែផឹកទឹកគង្គា។ ទាំងពីរអាចត្រូវចាត់ថាស្មើគ្នា—ឬក៏អាចមិនស្មើគ្នា ដោយការផឹកទឹកគង្គាអាចលើសជាងនោះផង»។
Verse 40
तिछेद् युगसहस्न॑ तु पदेनैकेन यः पुमान् । मासमेकं तु गज्जायां समौ स्यातां न वा समौ,जो पुरुष एक हजार युगोंतक एक पैरसे खड़ा होकर तपस्या करता है और जो एक मासतक गड़ातटपर निवास करता है, वे दोनों समान हो सकते हैं अथवा यह भी सम्भव है कि समान न हों
ព្រះសិទ្ធៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «បុរសម្នាក់អាចឈរលើជើងតែមួយធ្វើតបស្យា រយៈពេលមួយពាន់យុគ; មនុស្សម្នាក់ទៀតស្នាក់នៅត្រឹមមួយខែនៅលើច្រាំងទន្លេគង្គា។ ទាំងពីរអាចស្មើគ្នាក្នុងផលបុណ្យ—ឬក៏អាចមិនស្មើគ្នា»។
Verse 41
लंबते5वाक्शिरा यस्तु युगानामयुतं पुमान् । तिष्ठेद् यथेष्टं यश्चापि गड़ायां स विशिष्यते,जो मनुष्य दस हजार युगोंतक नीचे सिर करके वृक्षमें लटका रहे और जो इच्छानुसार गड़ाजीके तटपर निवास करे, उन दोनोंमें गड़ाजीपर निवास करनेवाला ही श्रेष्ठ है
ព្រះសិទ្ធៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ទោះបីបុរសម្នាក់ព្យួរខ្លួនលើដើមឈើដោយក្បាលចុះក្រោម រយៈពេលដល់ដប់ពាន់យុគក៏ដោយ ក៏អ្នកដែលស្នាក់នៅលើច្រាំងទន្លេគង្គាតាមចិត្តប្រាថ្នា ត្រូវបានចាត់ថាលើសលប់ជាង»។
Verse 42
अग्नौ प्रास्तं प्रधूयेत यथा तूल॑ द्विजोत्तम । तथा गज्भजावगाढस्य सर्वपापं प्रधूयते,द्विजश्रेष्ठट जैसे अतामें डाली हुई रूई तुरंत जलकर भस्म हो जाती है, उसी प्रकार गड़ामें गोता लगानेवाले मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं
សិទ្ធៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះទ្វិជជនដ៏ប្រសើរ! ដូចជាកំបោរពពុះកប្បាសដែលគេបោះចូលក្នុងភ្លើង នឹងឆេះរលាយភ្លាមៗក្លាយជាផេះ ដូច្នោះដែរ បាបទាំងអស់របស់មនុស្សដែលលោតចុះងូតក្នុងទឹកគង្គា នឹងត្រូវលាងសម្អាតអស់ទៅ»។
Verse 43
भूतानामिह सर्वेषां दुः:खोपहतचेतसाम् | गतिमन्वेषमाणानां न गड़ासदृशी गति:,इस संसारमें दुःखसे व्याकुलचित होकर अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़नेवाले समस्त प्राणियोंके लिये गंगाजीके समान कोई दूसरा सहारा नहीं है
សម្រាប់សត្វមានជីវិតទាំងអស់ក្នុងលោកនេះ ដែលចិត្តត្រូវទុក្ខវេទនាប៉ះពាល់ និងកំពុងស្វែងរកទីពឹង និងផ្លូវទៅមុខ មិនមានទីពឹងណាមួយស្មើនឹងទន្លេគង្គាទេ។
Verse 44
भवन्ति निर्विषा: सर्पा यथा तार्क्ष्यस्य दर्शनात् । गज्जाया दर्शनात् तद्वत् सर्वपापै: प्रमुच्यते,जैसे गरुड़को देखते ही सारे सर्पोंके विष झड़ जाते हैं, उसी प्रकार गड़ाजीके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है
ដូចជាពស់ទាំងឡាយក្លាយជាមិនមានពិស ត្រឹមតែបានឃើញតារក្ស្យ (គរុឌ) ប៉ុណ្ណោះ ដូច្នោះដែរ ត្រឹមតែបានឃើញគង្គា មនុស្សក៏រួចផុតពីបាបទាំងអស់។
Verse 45
अप्रतिष्ठाक्ष ये केचिदर्धर्मशरणाश्ष ये । तेषां प्रतिष्ठा गड़ेह शरणं शर्म वर्म च,जगत्में जिनका कहीं आधार नहीं है; तथा जिन्होंने धर्मकी शरण नहीं ली है, उनका आधार और उन्हें शरण देनेवाली श्रीगड़ाजी ही हैं। वे ही उसका कल्याण करनेवाली तथा कवचकी भाँति उसे सुरक्षित रखनेवाली हैं
អ្នកណាខ្លះដែលគ្មានទីពឹងនៅទីណាមួយ ហើយអ្នកណាខ្លះដែលមិនបានចូលជ្រកក្រោមធម៌—សម្រាប់ពួកគេ គង្គានេះហើយជាគ្រឹះដ៏មាំមួន ជាទីជ្រក ជាសេចក្តីសុខសាន្ត និងជាខែលការពារ ដូចអាវុធពាក់កាយដែលរក្សាពួកគេឲ្យសុវត្ថិ។
Verse 46
प्रकृष्टेरशुभै्ग्रस्ताननेकै: पुरुषाधमान् । पततो नरके गज्ज संश्रितान् प्रेत्य तारयेत्,जो नीच मानव अनेक बड़े-बड़े अमड्नलकारी पापकर्मोंसे ग्रस्त होकर नरकमें गिरनेवाले हैं, वे भी यदि गड़ाजीकी शरणमें आ जाते हैं तो ये मरनेके बाद उनका उद्धार कर देती हैं
សូម្បីតែមនុស្សទាបថោកបំផុត ដែលត្រូវបាបធ្ងន់ធ្ងរជាច្រើនគ្របសង្កត់ ហើយកំពុងធ្លាក់ចូលនរក ក៏បើបានចូលជ្រកក្រោមគង្គា នាងនឹងសង្គ្រោះពួកគេក្រោយស្លាប់។
Verse 47
ते संविभक्ता मुनिभिरननुनं देवैः सवासवै: । येडभिगच्छन्ति सततं गड्जां मतिमतां वर,बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ ब्राह्यण! जो लोग सदा गड्जाजीकी यात्रा करते हैं, उनपर निश्चय ही इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता तथा मुनिलोग पृथक्-पृथक् कृपा करते आये हैं
អ្នកដែលធ្វើធម្មយាត្រាទៅកាន់ទន្លេគង្គា (Gaṅgā) ជានិច្ច នោះពិតប្រាកដជាទទួលបានព្រះគុណ និងអនុគ្រោះដ៏ច្បាស់លាស់ ពីពួកមុនី និងពីព្រះទេវតាទាំងឡាយ រួមទាំងវាសវៈ (ឥន្ទ្រ) ផងដែរ។ ព្រះសិទ្ធៈបញ្ជាក់ថា ការធម្មយាត្រាដោយស្ថិរភាពបែបនេះ នាំមកនូវព្រះពរ និងព្រះគុណពីអ្នកបួស និងទេវតា ហើយបង្ហាញថា អ្នកធម្មយាត្រានោះស្វែងរកការបរិសុទ្ធ និងរស់នៅដោយគោរពធម៌។
Verse 48
विनयाचारहीनाश्न अशिवाश्षन नराधमा: । ते भवन्ति शिवा विप्र ये वै गड़ामुपाश्रिता:,विप्रवर! विनय और सदाचारसे हीन अमड्रलकारी नीच मनुष्य भी गड़ाजीकी शरणमें जानेपर कल्याणस्वरूप हो जाते हैं
ព្រះសិទ្ធៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ ព្រាហ្មណៈ! សូម្បីតែមនុស្សទាបបំផុត—អ្នកខ្វះវិន័យ និងសុចរិតធម៌ ហើយលំអៀងទៅរកអំពើអសុភ—ក៏ក្លាយជាមង្គល និងនាំមកនូវសុខសាន្តបាន ដោយសារតែចូលទៅសុំជ្រកកោននៅកាន់ Gaḍā។ ឱ ព្រាហ្មណៈដ៏ប្រសើរ! វិន័យ និងសុចរិតធម៌ជាមធ្យោបាយពិតសម្រាប់ការកែលម្អខ្លួន; ទោះយ៉ាងណា សូម្បីអ្នកដែលខ្វះវា ក៏អាចត្រូវបានបង្វែរទៅរកល្អបាន ពេលស្វែងរកការការពារពីទីពឹងដ៏សុចរិត»។
Verse 49
यथा सुराणाममृतं पितृणां च यथा स्वधा । सुधा यथा च नागानां तथा गड्भाजलं नृणाम्,जैसे देवताओंको अमृत, पितरोंको स्वधा और नागोंको सुधा तृप्त करती है, उसी प्रकार मनुष्योंके लिये गंगाजल ही पूर्ण तृप्तिका साधन है
ដូចដែលអម្រឹតបំពេញចិត្តព្រះទេវតា ដូចដែលស្វធា (svadhā) បំពេញចិត្តបិត្រទេវតា និងដូចដែលសុធា (sudhā) បំពេញចិត្តពួកនាគ—ដូច្នោះដែរ ទឹកទន្លេគង្គា (Gaṅgā) តែមួយគត់ បំពេញចិត្តមនុស្សឲ្យពេញលេញ។ ដូចនេះ ព្រះសិទ្ធៈបានសរសើរទឹកគង្គាថា ជាទីពឹងដ៏បរិសុទ្ធ និងបំពេញបន្ថែមសម្រាប់ជីវិតធម៌របស់មនុស្ស ដោយដាក់វាស្មើនឹងអាហារប្រកបដោយក្រឹត្យានុគមន៍សម្រាប់សត្វមានលំដាប់នីមួយៗ។
Verse 50
उपासते यथा बाला मातर क्षुधयार्दिता: । श्रेयस्कामास्तथा गड़ामुपासन्तीह देहिन:,जैसे भूखसे पीड़ित हुए बच्चे माताके पास जाते हैं, उसी प्रकार कल्याणकी इच्छा रखनेवाले प्राणी इस जगतमें गड़ाजीकी उपासना करते हैं
ព្រះសិទ្ធៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ដូចកុមារដែលឃ្លាន និងរងទុក្ខដោយសារអាហារខ្វះខាត រត់ទៅរកម្តាយរបស់ខ្លួន—ដូច្នោះដែរ សត្វមានកាយនៅក្នុងលោកនេះ ដែលប្រាថ្នាការកុសល និងសុខមង្គលពិតប្រាកដ ក៏ស្វែងរកទីពឹងដោយការគោរពបូជាទៅកាន់ Gaḍā»។
Verse 51
स्वायम्भुवं यथा स्थान सर्वेषां श्रेष्ठमुच्यते । सस््नातानां सरितां श्रेष्ठा गड़ा तद्गदिहोच्यते,जैसे ब्रह्मलोक सब लोकोंसे श्रेष्ठ बताया जाता है, वैसे ही स्नान करनेवाले पुरुषोंके लिये गड़ाजी ही सब नदियोंमें श्रेष्ठ कही गयी हैं
ព្រះសិទ្ធៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ដូចដែលលោកស្វាយម្ភូវៈ (Svāyambhuva) របស់ព្រះព្រហ្មា ត្រូវបានប្រកាសថាជាស្ថានដ៏ប្រសើរបំផុត ក្នុងចំណោមលោកទាំងអស់—ដូច្នោះដែរ សម្រាប់អ្នកដែលស្វែងរកការបរិសុទ្ធដោយការងូតទឹក ទន្លេ Gaḍā ត្រូវបានប្រកាសថាជាទន្លេប្រសើរបំផុត ក្នុងចំណោមទន្លេទាំងឡាយ»។
Verse 52
यथोपजीविनां धेनुर्देवादीनां धरा स्मृता । तथोपजीविनां गज्जा सर्वप्राणभृतामिह,जैसे धेनुस्वरूपा पृथ्वी उपजीवी देवता आदिके लिये आदरणीय है, उसी प्रकार इस जगतमें गंगा समस्त उपजीवी प्राणियोंके लिये आदरणीय हैं
ដូចដែលផែនដីត្រូវបានចងចាំថាជា “គោ” សម្រាប់អ្នកដែលរស់ដោយអំណោយរបស់នាង ហើយហេតុនោះទេវតា និងសត្វលោកទាំងឡាយគោរពបូជា—ដូច្នេះដែរ ក្នុងលោកនេះ ទន្លេគង្គា គួរឲ្យគោរពបូជាដោយសត្វមានជីវិតទាំងអស់ដែលអាស្រ័យលើការចិញ្ចឹមជីវិត។
Verse 53
देवा: सोमार्कसंस्थानि यथा सत्रादिभिर्मखै: । अमृतान्युपजीवन्ति तथा गज्ाजलं नस:,जैसे देवता सत्र आदि यज्ञोंद्वारा चन्द्रमा और सूर्यमें स्थित अमृतसे आजीविका चलाते हैं, उसी प्रकार संसारके मनुष्य गंगाजलका सहारा लेते हैं
សិទ្ធាបាននិយាយថា៖ «ដូចដែលទេវតាអាស្រ័យលើអម្រឹតដែលស្ថិតនៅក្នុងព្រះចន្ទ និងព្រះអាទិត្យ តាមរយៈយញ្ញៈដូចជា សត្រា ជាដើម ដើម្បីចិញ្ចឹមជីវិត—ដូច្នេះដែរ មនុស្សក្នុងលោកនេះ អាស្រ័យលើទឹកគង្គា ដើម្បីរស់នៅ»។
Verse 54
जाह्नववीपुलिनोत्थाभि: सिकताभि: समुक्षितम् । आत्मानं मन्यते लोको दिविषछ्ठमिव शोभितम्,गंगाजीके तटसे उड़े हुए बालुका-कणोंसे अभिषिक्त हुए अपने शरीरको ज्ञानी पुरुष स्वर्गलोकमें स्थित हुआ-सा शोभासम्पन्न मानता है
ពេលរាងកាយត្រូវបានព្រួសព្រាតដោយខ្សាច់ដែលហើរឡើងពីច្រាំងទូលាយនៃជាហ្នវី (គង្គា) មនុស្សម្នាក់ក៏គិតថា ខ្លួនឯងរុងរឿងដូចជាអ្នកស្ថិតនៅសួគ៌។
Verse 55
जाह्नवीतीरसम्भूतां मृदं मूर्थध्ना बिभर्ति यः । बिभर्ति रूप॑ सो<र्कस्य तमोनाशाय निर्मलम्,जो मनुष्य गंगाके तीरकी मिट्टी अपने मस्तकमें लगाता है वह अज्ञानान्धकारका नाश करनेके लिये सूर्यके समान निर्मल स्वरूप धारण करता है
អ្នកណាដែលយកដីពីច្រាំងជាហ្នវី (គង្គា) មកលាបលើក្បាល នោះគេកាន់យករូបសភាពបរិសុទ្ធដូចព្រះអាទិត្យ ដើម្បីបំផ្លាញភាពងងឹតនៃអវិជ្ជា។
Verse 56
गड़ोर्मिभिरथो दिग्ध: पुरुषं पवनो यदा । स्पृशते सो<स्य पाप्मानं सद्य एवापकर्षति,गंगाकी तरंगमालाओंसे भीगकर बहनेवाली वायु जब मनुष्यके शरीरका स्पर्श करती है, उसी समय वह उसके सारे पापोंको नष्ट कर देती है
ពេលខ្យល់ដែលសើមដោយរលកនៃទន្លេគង្គា ប៉ះលើរាងកាយមនុស្ស នោះវាទាញយក និងបំផ្លាញបាបរបស់គេភ្លាមៗ។
Verse 57
व्यसनैरभितप्तस्य नरस्य विनशिष्यत: । गड्जादर्शनजा प्रीतिव्यसनान्यपकर्षति,दुर्व्स्सनजनित दु:खोंसे संतप्त होकर मरणासन्न हुआ मनुष्य भी यदि गंगाजीका दर्शन करे तो उसे इतनी प्रसन्नता होती है कि उसकी सारी पीड़ा तत्काल नष्ट हो जाती है
បុរសម្នាក់ដែលត្រូវគ្រោះមហន្តរាយដុតឆេះ ហើយកំពុងរអិលចូលទៅរកការបាត់បង់—សូម្បីតែនៅជិតមាត់ស្លាប់—បើបានឃើញទន្លេគង្គា (Gaṅgā) ក្តីរីករាយដែលកើតពីទស្សនៈនោះ នឹងកើតឡើងក្នុងចិត្ត ហើយភ្លាមៗទាញយកទុក្ខវេទនាទាំងអស់ចេញ បំបាត់ការឈឺចាប់ដែលកើតពីវាសនាអាក្រក់។
Verse 58
हंसारावै: कोकरवै रवैरन्यैश्व पक्षिणाम् । पस्पर्थ गज गन्धर्वान् पुलिनैश्व शिलोच्चयान्,हंसोंकी मीठी वाणी, चक्रवाकोंके सुमधुर शब्द तथा अन्यान्य पक्षियोंके कलरवोंद्वारा गंगाजी गन्धर्वोंसे होड़ लगाती हैं तथा अपने ऊँचे-ऊँचे तटोंद्वारा पर्वतोंके साथ स्पर्धा करती हैं
ទន្លេគង្គា (Gaṅgā) ដោយសំឡេងហង្សា សូរស្រែកផ្អែមល្ហែមរបស់បក្សីចក្រវាក និងបទចម្រៀងនានារបស់បក្សីផ្សេងៗ ហាក់ដូចជាប្រកួតប្រជែងជាមួយគន្ធರ್ವ (Gandharva) ទាំងឡាយ; ហើយដោយខ្សាច់ទួល និងច្រាំងខ្ពស់ៗ នាងហាក់ដូចជាប្រកួតជាមួយកំពូលភ្នំថ្ម។
Verse 59
हंसादिभि: सुबहुभिवविविधी: पक्षिभिवव॒ताम् | गड्ां गोकुलसम्बाधां दृष्टवा स्वर्गोडपि विस्मृत:,हंस आदि बहुसंख्यक एवं विविध पक्षियोंसे घिरी हुई तथा गौओंके समुदायसे व्याप्त हुई गंगाजीको देखकर मनुष्य स्वर्गलोकको भी भूल जाता है
ពេលឃើញទន្លេគង្គា (Gaṅgā) ដែលព័ទ្ធជុំវិញដោយបក្សីជាច្រើនប្រភេទដូចហង្សា និងពេញទៅដោយហ្វូងគោ មនុស្សម្នាក់ត្រូវទាក់ទាញដល់ថ្នាក់ភ្លេចសូម្បីតែស្ថានសួគ៌។
Verse 60
न सा प्रीतिर्दिविष्ठस्थ सर्वकामानुपाश्रत: । सम्भवेद् या परा प्रीतिर्गड्राया: पुलिने नृूणाम्,गंगाजीके तटपर निवास करनेसे मनुष्योंको जो परम प्रीति--अनुपम आनन्द मिलता है वह स्वर्गमें रहकर सम्पूर्ण भोगोंका अनुभव करनेवाले पुरुषको भी नहीं प्राप्त हो सकता
សេចក្តីរីករាយនោះ មិនអាចទទួលបានទេ—សូម្បីតែសម្រាប់អ្នកដែលរស់នៅសួគ៌ និងបានរីករាយគ្រប់បែបយ៉ាង។ ព្រះសុខដ៏អធិកអធម ដែលមនុស្សទទួលបានដោយរស់នៅលើច្រាំងខ្សាច់នៃទន្លេគង្គា (Gaṅgā) គឺខ្ពស់ជាងសេចក្តីរីករាយសួគ៌ទាំងអស់។
Verse 61
वाड्मन:कर्मजै ग्रस्त: पापैरपि पुमानिह । वीक्ष्य गड़ां भवेत् पूतो अत्र मे नास्ति संशय:,मन, वाणी और क्रियाद्वारा होनेवाले पापोंसे ग्रस्त मनुष्य भी गंगाजीका दर्शन करने मात्रसे पवित्र हो जाता है--इसमें मुझे संशय नहीं है
សូម្បីតែបុរសម្នាក់ដែលត្រូវបាបដែលកើតពីចិត្ត ពាក្យសម្តី និងកាយកម្មគ្របសង្កត់នៅក្នុងលោកនេះ ក៏ក្លាយជាបរិសុទ្ធបាន ដោយគ្រាន់តែបានឃើញទន្លេគង្គា (Gaṅgā) ប៉ុណ្ណោះ—ក្នុងរឿងនេះ ខ្ញុំមិនមានសង្ស័យឡើយ។
Verse 62
सप्तावरान् सप्त परान् पितृस्तेभ्यश्व ये परे । पुमांस्तारयते गज्जां वीक्ष्य स्पृष्टवावगाहु च,गंगाजीका दर्शन, उनके जलका स्पर्श तथा उस जलके भीतर स्नान करके मनुष्य सात पीढ़ी पहलेके पूर्वजोंका और सात पीढ़ी आगे होनेवाली संतानोंका तथा इनसे भी ऊपरके पितरों और संतानोंका उद्धार कर देता है
ព្រះសិទ្ធៈបានមានពាក្យថា៖ ដោយគ្រាន់តែបានឃើញទន្លេគង្គា ដោយប៉ះទឹករបស់នាង ហើយដោយងូតជ្រមុជក្នុងទឹកនោះ មនុស្សម្នាក់ក្លាយជាមូលហេតុនៃការរំដោះសម្រាប់វង្សត្រកូលរបស់ខ្លួន—បុព្វបុរស៧ជំនាន់ និងកូនចៅ៧ជំនាន់ ហើយសូម្បីតែបុព្វបុរស និងកូនចៅដែលលើសពីនោះផងដែរ។
Verse 63
श्रुताभिलषिता पीता स्पृष्टा दृष्टावगाहिता । गज्जा कप वंशौ विशेषत:,जो पुरुष ग॑ माहात्म्य सुनता, उनके तटपर जानेकी अभिलाषा रखता, उनका दर्शन करता, जल पीता, स्पर्श करता तथा उनके भीतर गोते लगाता है, उसके दोनों कुलोंका भगवती गंगा विशेषरूपसे उद्धार कर देती हैं
ព្រះសិទ្ធៈបានប្រកាសថា៖ ព្រះនាងគង្គា ជាអំណាចសង្គ្រោះដល់មនុស្សតាមវិធីជាច្រើន—ពេលបានស្តាប់មហិមារបស់នាង ពេលមានបំណងចង់ទៅដល់ច្រាំងនាង ពេលបានឃើញនាង ផឹកទឹកនាង ប៉ះទឹកនាង និងជ្រមុជខ្លួនក្នុងស្ទឹងនាង។ សម្រាប់មនុស្សដូច្នោះ ព្រះនាងគង្គាដ៏មានព្រះគុណ ប្រទានការរំដោះយ៉ាងពិសេស ដល់វង្សត្រកូលទាំងពីរ—ខាងឪពុក និងខាងម្តាយ។
Verse 64
दर्शनात् स्पर्शनात् पानात् तथा गड़्ेति कीर्तनात् । पुनात्यपुण्यान् पुरुषान शतशो5थ सहस्रश:,गंगाजी अपने दर्शन, स्पर्श, जलपान तथा अपने गंगानामके कीर्तनसे सैकड़ों और हजारों पापियोंको तार देती हैं
ព្រះសិទ្ធៈបានមានពាក្យថា៖ ដោយគ្រាន់តែបានឃើញនាង ដោយប៉ះនាង ដោយផឹកទឹកនាង ហើយដូចគ្នានេះ ដោយសូត្រកេរ្តិ៍នាម “គង្គា” នាងសម្អាតមនុស្សមានបាប—រាប់រយ និងរាប់ពាន់នាក់។
Verse 65
य इच्छेत् सफलं जन्म जीवितं श्रुतमेव च । स पितुृंस्तर्पयेद् गाड्रमभिगम्य सुरांसतथा,जो अपने जन्म, जीवन और वेदाध्ययनको सफल बनाना चाहता हो वह गंगाजीके पास जाकर उनके जलसे देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे
អ្នកណាដែលប្រាថ្នាឲ្យកំណើត ជីវិត និងសិក្សាព្រះវេទរបស់ខ្លួន មានផលពិតប្រាកដ គួរទៅកាន់ទន្លេគង្គា ហើយយកទឹកនាងធ្វើតර්បណ (tarpaṇa) ជាទានទឹកសម្រួលចិត្ត ដល់ទេវតា និងបិត្រ (បុព្វបុរស)។
Verse 66
न सुतैर्न च वित्तेन कर्मणा न च तत्फलम् | प्राप्तुयात् पुरुषो&त्यन्तं गड्जां प्राप्प यदाप्रुयात्,मनुष्य गंगास्नान करके जिस अक्षय फलको प्राप्त करता है उसे पुत्रोंसे, धनसे तथा किसी कर्मसे भी नहीं पा सकता
ព្រះសិទ្ធៈបានមានពាក្យថា៖ ផលដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់ និងមិនរលាយ ដែលមនុស្សទទួលបានដោយទៅដល់ទន្លេគង្គា ហើយងូតនៅទីនោះ មិនអាចទទួលបានដោយកូនប្រុស ដោយទ្រព្យសម្បត្តិ ឬដោយពិធីកម្មណាមួយ និងផលរបស់វាបានឡើយ។
Verse 67
जात्यन्धैरिह तुल्यास्ते मृत: पड़गुभिरेव च । समर्था ये न पश्यन्ति गड़ां पुण्यजलां शिवाम्,जो सामर्थ्य होते हुए भी पवित्र जलवाली कल्याणमयी गंगाका दर्शन नहीं करते वे जन्मके अन्धों, पंगुओं और मुर्दोके समान हैं
សិទ្ធាបានមានពាក្យថា៖ នៅទីនេះ អ្នកដែលមានសមត្ថភាព ប៉ុន្តែមិនបានឃើញទន្លេគង្គាដ៏មង្គល ដែលទឹកមានភាពបរិសុទ្ធ—គេមិនល្អជាងអ្នកខ្វាក់តាំងពីកំណើត អ្នកពិការ ឬសូម្បីតែអ្នកស្លាប់ឡើយ។
Verse 68
सा,भूतभव्यभविष्यज्ञैर्महर्षिभिरुपस्थिताम् । देवै: सेन्द्रैश्न को गड़ां नोपसेवेत मानव: भूत, वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता महर्षि तथा इन्द्र आदि देवता भी जिनकी उपासना करते हैं, उन गंगाजीका सेवन कौन मनुष्य नहीं करेगा?
នាង—គង្គា—ដែលត្រូវបានមហាឥសីដ៏ដឹងអតីត បច្ចុប្បន្ន និងអនាគត មកបម្រើគោរព ហើយសូម្បីតែទេវតាជាមួយឥន្ទ្រក៏គោរពបូជាដែរ—តើមនុស្សណាមិនទៅស្វែងរក និងទទួលទានទឹកគង្គានោះ?
Verse 69
वानप्रस्थैर्गहस्थैश्व यतिभिरन्रह्मचारिभि: । विद्यावद्धि: श्रितां गड़ां पुमान् को नाम नाश्रयेत्,ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी और विद्वान् पुरुष भी जिनकी शरण लेते हैं, ऐसी गंगाजीका कौन मनुष्य आश्रय नहीं लेगा?
សិទ្ធាបានមានពាក្យថា៖ ពេលដែលព្រៃវាសី និងគ្រួសារវាសី អ្នកបោះបង់លោក និងព្រះព្រហ្មចារី ហើយសូម្បីតែអ្នកប្រាជ្ញ ក៏យកគង្គាជាទីពឹង—តើមនុស្សណាអាចមិនស្វែងរកការការពាររបស់នាងបាន?
Verse 70
उत्क्रामद्िश्व यः प्राण: प्रयत: शिष्टसम्मत: । चिन्तयेन्मनसा गड़ां स गतिं परमां लभेत्,जो साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित तथा संयतचित्त मनुष्य प्राण निकलते समय मन-ही-मन गंगाजीका स्मरण करता है, वह परम उत्तम गतिको प्राप्त कर लेता है
សិទ្ធាបានមានពាក្យថា៖ មនុស្សមានវិន័យ ចិត្តស្ងប់ស្ងាត់ ដែលត្រូវបានសាធុបុរសគោរពរាប់អាន—បើនៅពេលដង្ហើមជីវិតកំពុងចាកចេញ គាត់រំលឹកគង្គានៅក្នុងចិត្ត—គាត់នឹងបានដល់គតិដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់បំផុត។
Verse 71
न भयेभ्यो भयं तस्य न पापेभ्यो न राजतः । आ देहपतनाद् गड़ामुपास्ते यः: पुमानिह,जो पुरुष यहाँ जीवनपर्यन्त गंगाजीकी उपासना करता है उसे भयदायक वस्तुओंसे, पापोंसे तथा राजासे भी भय नहीं होता
សិទ្ធាបានប្រកាសថា៖ មនុស្សណា នៅក្នុងលោកនេះ បូជាគង្គាជានិច្ច រហូតដល់រាងកាយរលំ (គឺរហូតដល់ស្លាប់) មនុស្សនោះមិនត្រូវបានគ្របដណ្ដប់ដោយភ័យពីអ្វីគួរភ័យទេ មិនភ័យបាបទេ ហើយសូម្បីតែអំណាចស្តេចក៏មិនធ្វើឲ្យភ័យបានដែរ។
Verse 72
महापुण्यां च गगनात् पतन्तीं वै महेश्वर: । दधार शिरसा गड्जां तामेव दिवि सेवते,भगवान् महेश्वरने आकाशसे गिरती हुई परम पवित्र गंगाजीको सिरपर धारण किया, उन्हींका वे स्वर्गमें सेवन करते हैं
ព្រះគង្គាដ៏មានបុណ្យធំ និងបរិសុទ្ធយ៉ាងខ្លាំង ដែលធ្លាក់ចុះពីមេឃ—ព្រះមហេស្វរ (ភគវាន) បានទទួលទ្រទ្រង់លើព្រះសិរ្សា។ សូម្បីនៅស្ថានសួគ៌ ព្រះអង្គក៏គោរពបម្រើ និងទទួលទានទឹកគង្គានោះដដែល ដោយបង្ហាញអំណាចនៃការគ្រប់គ្រងខ្លួន និងការបរិសុទ្ធ ដែលទ្រទ្រង់អ្វីដែលសុចរិត និងមានប្រយោជន៍ដល់លោកទាំងឡាយ។
Verse 73
अलंकृतास्त्रयो लोका: पथिभिविंमलैस्त्रिभि: | यस्तु तस्या जल॑ सेवेत् कृतकृत्य: पुमान् भवेत्,जिन्होंने तीन निर्मल मार्गोद्रारा आकाश, पाताल तथा भूतल--इन तीन लोकोंको अलंकृत किया है उन गंगाजीके जलका जो मनुष्य सेवन करेगा वह कृतकृत्य हो जायगा
លោកទាំងបីត្រូវបានអលង្ការដោយផ្លូវបីដ៏បរិសុទ្ធឥតមលិនរបស់នាង គឺស្ថានសួគ៌ បាតាល និងផែនដី។ មនុស្សណាដែលទទួលទានទឹកនៃព្រះគង្គា នោះនឹងក្លាយជាអ្នកបានសម្រេចគោលបំណងជីវិត ព្រោះការប៉ះពាល់នោះត្រូវបានចាត់ទុកថាបរិសុទ្ធ និងបំពេញការខិតខំក្នុងធម៌។
Verse 74
दिवि ज्योतिर्यथा5<दित्य: पितृणां चैव चन्द्रमा: । देवेशश्व॒ तथा नृणां गज्ञा च सरिता तथा,स्वर्गवासी देवताओंमें जैसे सूर्यका तेज श्रेष्ठ है, जैसे पितरोंमें चन्द्रमा तथा मनुष्योंमें राजाधिराज श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त सरिताओं में गंगाजी उत्तम हैं
សិទ្ធាបាននិយាយថា៖ «ដូចជាក្នុងស្ថានសួគ៌ ពន្លឺព្រះអាទិត្យលើសលប់ជាងគេ; ដូចជាក្នុងចំណោមបិត្រឹ (បុព្វបុរស) ព្រះចន្ទជាអ្នកដ៏មុខ; និងដូចជាក្នុងចំណោមមនុស្ស ព្រះមហាក្សត្រអធិរាជលើសគេ—ដូច្នេះដែរ ក្នុងចំណោមទន្លេទាំងអស់ ព្រះគង្គាជាទន្លេដ៏ប្រសើរបំផុត»។ វាបង្រៀនរបៀបធម៌ក្នុងការរៀបចំលំដាប់ឧត្តមភាព៖ ស្គាល់អ្វីដែលលើកតម្កើង និងជាគំរូក្នុងមណ្ឌលនីមួយៗ ហើយគោរពវាតាមសមគួរ។
Verse 75
मात्रा पित्रा सुतैदरिर्विमुक्तस्य धनेन वा । न भवेद्धि तथा दुःख यथा गड़ावियोगजम्,(गंगाजीमें भक्ति रखनेवाले पुरुषको) माता, पिता, पुत्र, स्त्री और धनका वियोग होनेपर भी उतना दुःख नहीं होता, जितना गंगाके बिछोहसे होता है
សិទ្ធាបាននិយាយថា៖ សូម្បីតែបែកចេញពីម្តាយ ពុក កូន ប្រពន្ធ ឬទ្រព្យសម្បត្តិ ក៏មិនមានទុក្ខដល់ថ្នាក់ដូចទុក្ខដែលកើតពីការបែកឆ្ងាយពីព្រះគង្គាទេ។ វាលើកតម្កើងភក្តីភាពចំពោះទន្លេបរិសុទ្ធជាជម្រកខ្ពស់បំផុត៖ ការបាត់បង់លោកិយធ្វើឲ្យសោកស្តាយ ប៉ុន្តែការខ្វះការភ្ជាប់ជាមួយប្រភពបរិសុទ្ធនៃការបរិសុទ្ធ និងការគាំទ្រធម៌ ត្រូវបានពណ៌នាថាជាកង្វះខាតជ្រាលជ្រៅបំផុត។
Verse 76
नारपण्यैनेष्टविषयैर्न सुतैर्न धनागमै: । तथा प्रसादो भवति गज्जां वीक्ष्य यथा भवेत्,इसी प्रकार उसे गंगाजीके दर्शनसे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी वनके दर्शनोंसे, अभीष्ट विषयसे, पुत्रोंसे तथा धनकी प्राप्तिसे भी नहीं होती
មិនមែនដោយការជួញដូរជាមួយមនុស្ស មិនមែនដោយការរីករាយនឹងវត្ថុដែលប្រាថ្នា មិនមែនដោយកូនៗ ឬដោយការទទួលបានទ្រព្យសម្បត្តិទេ ដែលអាចកើតមានសេចក្តីស្ងប់ស្ងាត់បែបនោះ។ តែសេចក្តីរីករាយ និងភាពច្បាស់លាស់ក្នុងចិត្ត ដែលកើតពីការមើលឃើញព្រះគង្គា លើសលប់ជាងអ្វីទាំងអស់នោះ។
Verse 77
पूर्णमिन्दु यथा दृष्ट्वा नृणां दृष्टि: प्रसीदति । तथा त्रिपथगां दृष्टवा नृणां दृष्टि: प्रसीदति,जैसे पूर्ण चन्द्रमाका दर्शन करके मनुष्योंकी दृष्टि प्रसन्न हो जाती है, उसी तरह त्रिपथगा गंगाका दर्शन करके मनुष्योंके नेत्र आनन्दसे खिल उठते हैं
ដូចជាមនុស្សទាំងឡាយបានឃើញព្រះចន្ទពេញវង់ នោះភ្នែក និងចិត្តក៏ស្ងប់សុខរីករាយ; ដូចគ្នានោះដែរ ពេលបានឃើញ ត្រីបថគា—ទន្លេគង្គា—នោះទស្សនៈរបស់មនុស្សក៏រីករាយ និងបរិសុទ្ធឡើង។
Verse 78
तद्भावस्तद्गतमनास्तन्निष्ठस्तत्परायण: । गड्जां योडनुगतो भकक््त्या स तस्या: प्रियतां व्रजेत्,जो गंगाजीमें श्रद्धा रखता, उन्हींमें मन लगाता, उन्हींके पास रहता, उन्हींका आश्रय लेता तथा भक्तिभावसे उन्हींका अनुसरण करता है वह भगवती भागीरथीका स्नेह-भाजन होता है
អ្នកណាមានជំនឿលើគង្គា ដាក់ចិត្តនៅលើនាង ស្ថិតនៅជិតនាង យកនាងជាទីពឹង និងដើរតាមនាងដោយភក្តី—អ្នកនោះនឹងក្លាយជាអ្នកដែលព្រះនាង ភាគីរថី ស្រឡាញ់ពេញចិត្ត។
Verse 79
भूस्थै: स्वःस्थैर्दिविष्ठै क्ष भूतिरुच्चावचैरपि । गड्जा विगाह्मया सततमेतत् कार्यतमं सताम्,पृथ्वी, आकाश तथा स्वर्गमें रहनेवाले छोटे-बड़े सभी प्राणियोंको चाहिये कि वे निरन्तर गंगाजीमें स्नान करें। यही सत्पुरुषोंका सबसे उत्तम कार्य है
សត្វមានជីវិតទាំងឡាយ—អ្នកនៅលើផែនដី អ្នកនៅលើមេឃ និងអ្នកនៅស្ថានសួគ៌—ទាំងតូចទាំងធំ គួរតែចុះងូតក្នុងគង្គាជានិច្ច។ នេះហើយជាកិច្ចប្រតិបត្តិដ៏ប្រសើរបំផុតរបស់អ្នកមានធម៌។
Verse 80
विश्वलोकेषु पुण्यत्वाद् गड़ाया: प्रथितं यश: । यत्पुत्रान्सगरस्येतो भस्माख्याननयद् दिवम्,सम्पूर्ण लोकोंमें परम पवित्र होनेके कारण गंगाजीका यश विख्यात है; क्योंकि उन्होंने भस्मीभूत होकर पड़े हुए सगरपुत्रोंको यहाँसे स्वर्गमें पहुँचा दिया
ក្នុងលោកទាំងអស់ គង្គាមានកេរ្តិ៍ឈ្មោះល្បីល្បាញ ដោយសារនាងបរិសុទ្ធយ៉ាងខ្ពង់ខ្ពស់; ព្រោះនាងបាននាំកូនប្រុសរបស់សគរ ដែលក្លាយជាផេះ ពីទីនេះទៅដល់ស្ថានសួគ៌។
Verse 81
वाय्वीरिताभि: सुमनोहराभि- द्रुताभिरत्यर्थसमुत्थिताभि: । गड़ोर्मिभिर्भानुमतीभिरिद्धा: सहस्नरश्मिप्रतिमा भवन्ति,वायुसे प्रेरित हो बड़े वेगसे अत्यन्त ऊँचे उठनेवाली गंगाजीकी परम मनोहर एवं कान्तिमयी तरंगमालाओंसे नहाकर प्रकाशित होनेवाले पुरुष परलोकमें सूर्यके समान तेजस्वी होते हैं
អ្នកដែលបានងូត ហើយត្រូវបានបំភ្លឺដោយរលកគង្គាដ៏ស្រស់ស្អាត កំពុងរត់លឿន ឡើងខ្ពស់យ៉ាងខ្លាំង និងភ្លឺរលោង ដោយខ្យល់ជំរុញ—នៅលោកក្រោយ នឹងភ្លឺចែងចាំងដូចព្រះអាទិត្យមានពន្លឺពាន់កាំរស្មី។
Verse 82
पयस्विनीं घृतिनीमत्युदारां समृद्धिनीं वेगिनीं दुर्विगाह्माम् । गड्डां गत्वा यै: शरीर विसूष्टं गता धीरास्ते विबुधै: समत्वम्,दुग्धके समान उज्ज्वल और घृतके समान स्निग्ध जलसे भरी हुई, परम उदार, समृद्धिशालिनी, वेगवती तथा अगाध जलराशिवाली गंगाजीके समीप जाकर जिन्होंने अपना शरीर त्याग दिया है वे धीर पुरुष देवताओंके समान हो गये
សិទ្ធៈបាននិយាយថា៖ បុរសមានចិត្តមាំមួនទាំងឡាយ ដែលបានទៅដល់ទន្លេគង្គា—ទឹកសដូចទឹកដោះគោ លំហូរលោងដូចឃី (ghee) មានមហាករុណា បង្កើនសម្បត្តិ លឿន ហើយពិបាកឆ្លង—ហើយនៅទីនោះបានបោះបង់រាងកាយរបស់ខ្លួន ពួកគេបានឈានដល់សមភាពជាមួយទេវតា។
Verse 83
अन्धान् जडान द्रव्यहीनांश्व गड़ा यशस्विनी बृहती विश्वरूपा । देवै: सेन्द्रैमुनिभिमाननवैश्व निषेविता सर्वकामैर्युनक्ति,इन्द्र आदि देवता, मुनि और मनुष्य जिनका सदा सेवन करते हैं वे यशस्विनी, विशालकलेवरा, विश्वरूपा गंगादेवी अपनी शरणमें आये हुए अन्धों, जडों और धनहीनोंको भी सम्पूर्ण मनोवाज्छित कामनाओंसे सम्पन्न कर देती हैं
សិទ្ធៈបាននិយាយថា៖ ព្រះនាងទន្លេគង្គា—មានកេរ្តិ៍ឈ្មោះ រូបកាយធំទូលាយ និងបង្ហាញខ្លួនជាច្រើនរូប—ទោះបីជាតែងតែត្រូវទេវតាជាមួយឥន្ទ្រា ព្រមទាំងឥសី និងមនុស្សមកស្វែងរកជានិច្ច ក៏នៅតែប្រទានគ្រប់បំណងដល់អ្នកដែលចូលជ្រកកោនក្នុងព្រះនាង ទោះជាខ្វាក់ ឬស្មារតីមិនច្បាស់ ឬខ្វះទ្រព្យសម្បត្តិក៏ដោយ។
Verse 84
ऊर्जावतीं महापुण्यां मधुमतीं त्रिवर्त्मगाम् । त्रिलोकगोफ्तीं ये गड्डां संश्रितास््ते दिवं गता:,गंगाजी ओजस्विनी, परम पुण्यमयी, मधुर जलराशिसे परिपूर्ण तथा भूतल, आकाश और पाताल--इन तीन मार्गोपर विचरनेवाली हैं। जो लोग तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली गंगाजीकी शरणमें आये हैं, वे स्वर्गलोकको चले गये
សិទ្ធៈបាននិយាយថា៖ «ទន្លេគង្គា ពោរពេញដោយឥទ្ធិពលវិញ្ញាណ មានបុណ្យដ៏អស្ចារ្យ និងទឹកផ្អែមល្ហែម។ ព្រះនាងធ្វើដំណើរតាមបីផ្លូវ—ផែនដី មេឃ និងលោកក្រោម—ហើយដូច្នេះការពារបីលោក។ អ្នកណាដែលចូលជ្រកកោនក្នុងគង្គា នឹងទៅដល់សួគ៌»។
Verse 85
यो वत्स्यति द्रक्ष्यति वापि मर्त्य- स्तस्मै प्रयच्छन्ति सुखानि देवा: । तद्धभाविता: स्पर्शनदर्शनेन इष्टां गतिं तस्य सुरा दिशन्ति,जो मनुष्य गंगाजीके तटपर निवास और उनका दर्शन करता है उसे सब देवता सुख देते हैं। जो गंगाजीके स्पर्श और दर्शनसे पवित्र हो गये हैं उन्हें गंगाजीसे ही महत्त्वको प्राप्त हुए देवता मनोवाञ्छित गति प्रदान करते हैं
មនុស្សណាដែលស្នាក់នៅលើច្រាំងទន្លេគង្គា ឬសូម្បីតែបានឃើញព្រះនាង ក៏ទេវតាទាំងឡាយប្រទានសុខដល់គាត់។ អ្នកដែលត្រូវបានបរិសុទ្ធ និងបម្លែងដោយការប៉ះ និងការមើលឃើញរបស់ព្រះនាង នឹងត្រូវទេវតាទាំងឡាយ—ដែលបានទទួលមហិមាដោយសារគង្គា—នាំទៅកាន់គោលដៅដែលប្រាថ្នា និងជាគុណមង្គល។
Verse 86
दक्षां पृश्चिं बृहतीं विप्रकृष्टां शिवामृद्धां भागिनीं सुप्रसन्नाम् । विभावरीं सर्वभूतप्रतिष्ठां गड़्ां गता ये त्रिदिवं गतास्ते,गंगा जगत्का उद्धार करनेमें समर्थ हैं। भगवान् पृश्चिगर्भकी जननी 'पृश्रि” के तुल्य हैं, विशाल हैं, सबसे उत्कृष्ट हैं, मंगलकारिणी हैं, पुण्यराशिसे समृद्ध हैं, शिवजीके द्वारा मस्तकपर धारित होनेके कारण सौभाग्यशालिनी तथा भक्तोंपर अत्यन्त प्रसन्न रहनेवाली हैं। इतना ही नहीं, पापोंका विनाश करनेके लिये वे कालरात्रिके समान हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी आश्रयभूत हैं। जो लोग गंगाजीकी शरणमें गये हैं वे स्वर्गलोकमें जा पहुँचे हैं
សិទ្ធៈបាននិយាយថា៖ «គង្គា ជាកូនស្រីរបស់ទក្ខៈ និងជាប្អូនស្រីរបស់ព្រឹស្និ—ធំទូលាយ ឧត្តម មង្គល និងសម្បូរបុណ្យ។ ព្រះនាងមានព្រះហឫទ័យអនុគ្រោះចំពោះអ្នកស្រឡាញ់ភក្តី ហើយមានសោភ័ណសំណាង ព្រោះព្រះសិវៈទ្រង់ដាក់ព្រះនាងលើក្បាល។ សម្រាប់ការបំផ្លាញបាប ព្រះនាងដូចរាត្រីនៃការលាយលះ ហើយជាជម្រក និងមូលដ្ឋានសម្រាប់សត្វទាំងអស់។ អ្នកដែលចូលជ្រកកោនក្នុងគង្គា នឹងទៅដល់លោកសួគ៌»។
Verse 87
ख्यातिर्यस्या: खं दिवं गां च नित्यं पुरा दिशो विदिशश्चवावतस्थे । तस्या जल सेव्य सरिद्वराया मर्त्या: सर्वे कृतकृत्या भवन्ति,आकाश, स्वर्ग, पृथ्वी, दिशा और विदिशाओंमें भी जिनकी ख्याति फैली हुई है, सरिताओंमें श्रेष्ठ उन भगवती भागीरथीके जलका सेवन करके सभी मनुष्य कृतार्थ हो जाते हैं
កេរ្តិ៍ឈ្មោះរបស់នាង តាំងពីបុរាណមក បានពាសពេញមេឃ ស្ថានសួគ៌ និងផែនដី ហើយបានតាំងមាំនៅគ្រប់ទិស និងទិសរង។ ដោយផឹកទឹកនៃទន្លេដ៏ប្រសើរបំផុតនោះ—ព្រះនាង ភាគីរថី—មនុស្សសព្វគ្នាក្លាយជាក្រមុំគ្រប់គ្រាន់ បានសម្រេចកិច្ចដែលគួរសម្រេច។
Verse 88
इयं गज्नेति नियतं प्रतिष्ठा गुहस्य रुक्मस्य च गर्भयोषा । प्रातस्त्रिवर्गा घृतवहा विपाष्मा गड़ावतीर्णा वियतो विश्वतोया,'ये गंगाजी हैं--ऐसा कहकर जो दूसरे मनुष्योंको उनका दर्शन कराता है, उसके लिये भगवती भागीरथी सुनिश्चित प्रतिष्ठा (अक्षय पद प्रदान करनेवाली) हैं। वे कार्तिकेय और सुवर्णको अपने गर्भमें धारण करनेवाली, पवित्र जलकी धारा बहानेवाली और पाप दूर करनेवाली हैं। वे आकाशसे पृथ्वीपर उतरी हुई हैं। उनका जल सम्पूर्ण विश्वके लिये पीने योग्य है। उनमें प्रातः:काल स्नान करनेसे धर्म, अर्थ और काम तीनों वर्गोंकी सिद्धि होती है
អ្នកណាដែលនិយាយដោយប្រាកដថា «នេះហើយជាគង្គា» ហើយនាំឲ្យអ្នកដទៃបានឃើញនាង នោះនឹងទទួលបានទីពឹងដ៏មាំមួន មិនរលាយ—នៃព្រះនាង ភាគីរថី។ នាងជាទន្លេបរិសុទ្ធ ដែលផ្ទុកក្នុងគភ៌ទាំងព្រះស្កន្ទ (គុហា/ការទិកេយ្យ) និងមាស; នាងបង្ហូរទឹកបរិសុទ្ធដូចជាឃី (ទឹកខ្លាញ់បរិសុទ្ធ) និងបំបាត់បាប។ នាងចុះពីមេឃមកផែនដី; ទឹករបស់នាងសមស្របសម្រាប់ពិភពលោកទាំងមូលផឹក។ ការងូតទឹកនៅពេលព្រឹកព្រលឹមក្នុងនាង នាំឲ្យសម្រេចគោលបំណងបី—ធម្មៈ អត្ថៈ និងកាមៈ។
Verse 89
(नारायणादक्षयात् पूर्वजाता विष्णो: पादात् शिशुमाराद् ध्रुवाच्च । सोमात् सूर्यान्मेरुरूपाच्च विष्णो: समागता शिवमूर्थ्नो हिमाद्रिम् ।।) भगवती गंगा पूर्वकालमें अविनाशी भगवान् नारायणसे प्रकट हुई हैं। वे भगवान् विष्णुके चरण, शिशुमार चक्र, ध्रुव, सोम, सूर्य तथा मेरुरूप विष्णुसे अवतरित हो भगवान् शिवके मस्तकपर आयी हैं और वहाँसे हिमालय पर्वतपर गिरी हैं ।। सुतावनी ध्रस्य हरस्य भार्या दिवो भुवश्चापि कृतानुरूपा । भव्या पृथिव्यां भागिनी चापि राजन् गड्जा लोकानां पुण्यदा वै त्रयाणाम्,गंगाजी गिरिराज हिमालयकी पुत्री, भगवान् शंकरकी पत्नी तथा स्वर्ग और पृथ्वीकी शोभा हैं। राजन! वे भूमण्डलपर निवास करनेवाले प्राणियोंका कल्याण करनेवाली, परम सौभाग्यवती तथा तीनों लोकोंको पुण्य प्रदान करनेवाली हैं
សិទ្ធាបាននិយាយថា៖ នៅសម័យបុរាណ ព្រះនាង គង្គា បានកើតចេញពីព្រះនារាយណៈដ៏អមតៈ។ នាងចុះពីជើងព្រះវិષ્ણុ—ឆ្លងកាត់មណ្ឌលសេឡេស្ទ្យាល់នៃ ឝិឝុមារ, ធ្រុវ, សោម, សូរ្យ និងវិષ્ણុក្នុងរូបមេរុ—ហើយមកសម្រាកលើក្បាលព្រះសិវៈ; ពីទីនោះ នាងធ្លាក់ចុះលើភ្នំហិមាល័យ។ នាងជាកូនស្រីនៃស្តេចភ្នំ ហិមាល័យ; ជាព្រះភរិយានៃ ហរ (សិវៈ); ជាគ្រឿងអលង្ការសមរម្យទាំងស្ថានសួគ៌ និងផែនដី។ ព្រះរាជា! នាងជាមង្គលលើផែនដី ជាអ្នកអនុគ្រោះដល់សត្វមានជីវិត និងជាអ្នកប្រទានបុណ្យដល់លោកទាំងបី។
Verse 90
मधुस्रवा घृतधारा घृतार्चि- महोर्मिभि: शोभिता ब्राह्मणैश्न । दिवश्ष्युता शिरसा55प्ता शिवेन गज्भावनीधात् त्रिदिवस्य माता,श्रीभागीरथी मधुका स्रोत एवं पवित्र जलकी धारा बहाती हैं। जलती हुई घीकी ज्वालाके समान उनका उज्ज्वल प्रकाश है। वे अपनी उत्ताल तरड़ों तथा जलमें स्नान- संध्या करनेवाले ब्राह्मणोंसे सुशोभित होती हैं। वे जब स्वर्गसे नीचेकी ओर चलीं तब भगवान् शिवने उन्हें अपने सिरपर धारण किया। फिर हिमालय पर्वतपर आकर वहाँसे वे इस पृथ्वीपर उतरी हैं। श्रीगंगाजी स्वर्गलोककी जननी हैं
សិទ្ធាបាននិយាយថា៖ ព្រះនាង ភាគីរថី ហូរដោយភាពផ្អែមល្ហែម បង្ហូរដូចជាខ្សែទឹកឃី ហើយភ្លឺរលោងដូចអណ្តាតភ្លើងឃី។ នាងរុងរឿងដោយរលកធំៗ និងដោយព្រះព្រាហ្មណ៍ដែលងូតទឹកក្នុងនាង ហើយប្រតិបត្តិពិធីសន្ធ្យា។ ពេលនាងចុះពីស្ថានសួគ៌ ព្រះសិវៈបានទទួល និងទ្រទ្រង់នាងលើក្បាល; បន្ទាប់មកដល់ហិមាល័យ នាងបានចុះមកផែនដី។ ដូច្នេះ គង្គា—ភាគីរថី—ត្រូវបានសរសើរថាជាមាតានៃលោកសួគ៌ ជាអ្នកបរិសុទ្ធ ជាមង្គល និងជាអ្នកគាំទ្រជីវិតធម្មៈតាមរយៈការប្រតិបត្តិពិធីសក្ការៈ។
Verse 91
योनिर्वरिष्ठा विरजा वितन्वी शय्याचिरा वारिवहा यशोदा । विश्वावती चाकृतिरिष्टसिद्धा गज़ोक्षितानां भुवनस्य पन्था:
សិទ្ធាបាននិយាយថា៖ នាងជាប្រភព និងគភ៌ដ៏ប្រសើរបំផុតនៃសត្វលោក—គ្មានមល សព្វគ្រប់ និងទូលាយឥតប្រមាណ; ជាទីសម្រាកបុរាណ; ជាអ្នកដឹកនាំទឹក; ជាអ្នកប្រទានកេរ្តិ៍ឈ្មោះ និងការចិញ្ចឹមបីបាច់។ នាងគាំទ្រពិភពលោកទាំងមូល; រូបរបស់នាងផ្ទាល់គឺជាការសម្រេចនៃអ្វីដែលប្រាថ្នា និងបានបំពេញត្រឹមត្រូវ។ នាងជាផ្លូវ និងជាគ្រឹះទ្រទ្រង់នៃលោក ដល់ថ្នាក់គាំទ្របានទាំងអំណាចធំ និងអ្វីដែលអស់កល្បជានិច្ច។
Verse 92
सबका कारण, सबसे श्रेष्ठ, रजोगुणरहित, अत्यन्त सूक्ष्म, मरे हुए प्राणियोंके लिये सुखद शगय्या, तीव्र वेगसे बहनेवाली, पवित्र जलका स्रोत बहानेवाली, यश देनेवाली, जगत्की रक्षा करनेवाली, सत्स्वरूपा तथा अभीष्टको सिद्ध करनेवाली भगवती गंगा अपने भीतर स्नान करनेवालोंके लिये स्वर्गका मार्ग बन जाती हैं ।। क्षान्त्या मह्मा गोपने धारणे च दीप्त्या कृशानोस्तपनस्य चैव । तुल्या गड्जा सम्मता ब्राह्मणानां गुहस्य ब्रह्म॒ण्यतया च नित्यम्,क्षमा, रक्षा तथा धारण करनेमें पृथ्वीके समान और तेजमें अग्नि एवं सूर्यके समान शोभा पानेवाली गंगाजी ब्राह्मणजातिपर सदा अनुग्रह करनेके कारण सुब्रह्मण्य कार्तिकेय तथा ब्राह्मणोंके लिये भी प्रिय एवं सम्मानित हैं
ព្រះសិទ្ធាប្រកាសថា ព្រះនាងគង្គា ជាមូលហេតុសកល និងជាអ្នកបរិសុទ្ធដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់បំផុត—ឥតមានការរំខានដោយរាជោគុណ (រាជស) ល្អិតល្អន់យ៉ាងក្រៃលែង ហើយជាគ្រែសុខសាន្តសម្រាប់សត្វដែលបានស្លាប់ទៅហើយ។ ទឹករបស់នាងហូរលឿន បញ្ចេញស្ទឹងទឹកបរិសុទ្ធ ប្រទានកេរ្តិ៍ឈ្មោះ ការពារពិភពលោក ជាសភាពពិត និងបំពេញបំណងដែលគេចង់បាន។ អ្នកណាអង្គុយងូតក្នុងទឹកនាង នាងក្លាយជាមាគ៌ាទៅសួគ៌។ ក្នុងការអត់ធ្មត់ នាងដូចផែនដី; ក្នុងការការពារ និងទ្រទ្រង់ នាងដូចផែនដីដែរ; និងក្នុងពន្លឺរលោង នាងដូចភ្លើង និងព្រះអាទិត្យ។ ព្រះនាងតែងតែទទួលការគោរពពីព្រះព្រាហ្មណ៍ ហើយក៏ជាទីស្រឡាញ់ និងគួរគោរពរបស់គុហៈ (ការទិកេយ្យ) ដោយសារនាងតែងអនុគ្រោះដល់អ្វីដែលជាប្រាហ្មណ្យ—ការគោរពព្រះព្រហ្ម និងការពាររបៀបសក្ការៈ។
Verse 93
भ्रातृभि: सहितश्चक्रे यथावदनुपूर्वश: । ये सभी महात्मा महर्षि जब भीष्मजीको देखनेके लिये वहाँ पधारे, तब भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने उनकी क्रमश: विधिवत् पूजा की,ऋषिष्टतां विष्णुपदीं पुराणां सुपुण्यतोयां मनसापि लोके । सर्वात्मना जाह्ववीं ये प्रपन्ना- स्ते ब्रह्मण: सदनं सम्प्रयाता: ऋषियोंद्वारा जिनकी स्तुति होती है, जो भगवान् विष्णुके चरणोंसे उत्पन्न, अत्यन्त प्राचीन तथा परम पावन जलसे भरी हुई हैं, उन गंगाजीकी जगत्में जो लोग मनके द्वारा भी सब प्रकारसे शरण लेते हैं वे देहत्यागके पश्चात् ब्रह्मलोकमें जाते हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ព្រះបាទយុធិષ્ઠិរ ដោយមានបងប្អូនរួមដំណើរ បានធ្វើការគោរពបូជាតាមលំដាប់ និងតាមវិធីដែលបានកំណត់ ដល់ព្រះមហាឥសីទាំងឡាយដែលមានចិត្តធំធេង មកទីនោះដើម្បីទស្សនាព្រះភីष្ម។ ហើយចំពោះទន្លេជាហ្នវី—ដែលឥសីទាំងឡាយសរសើរ កើតពីព្រះបាទរបស់ព្រះវិษ್ಣុ ជាបុរាណ និងពោរពេញដោយទឹកបរិសុទ្ធដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់—អ្នកណាដែលសូម្បីតែក្នុងចិត្ត ក៏ស្រឡាញ់ជ្រកកោននាងដោយសព្វអង្គ នោះក្រោយចាករាងកាយ នឹងទៅដល់លំនៅរបស់ព្រះព្រហ្ម (ព្រហ្មលោក)។
Verse 94
लोकानवेक्ष्य जननीव पुत्रान् सर्वात्मना सर्वगुणोपपन्नान् । तत्स्थनकं ब्राह्ममभीप्समानै- गज़ा सदैवात्मवशैरुपास्या,जैसे माता अपने पुत्रोंको स्नेहभरी दृष्टिसे देखती है और उनकी रक्षा करती है, उसी प्रकार गंगाजी सर्वात्मभावसे अपने आश्रयमें आये हुए सर्वगुणसम्पन्न लोकोंको कृपादृष्टिसे देखकर उनकी रक्षा करती हैं; अतः जो ब्रह्मलोकको प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं उन्हें अपने मनको वशमें करके सदा मातृभावसे गंगाजीकी उपासना करनी चाहिये
ដូចម្តាយមើលកូនដោយភ្នែកពោរពេញដោយស្នេហា ហើយការពារពួកគេ ដូច្នោះដែរ ព្រះនាងគង្គា មើលទៅលើលោកទាំងឡាយដែលមានគុណល្អគ្រប់ប្រការ និងបានមកជ្រកកោននាង ដោយសព្វអង្គ ហើយការពារពួកគេដោយព្រះមេត្តា។ ដូចហេតុនេះ អ្នកដែលប្រាថ្នាចង់ទៅដល់ព្រហ្មលោក គួរតែគ្រប់គ្រងចិត្តរបស់ខ្លួន ហើយបូជាព្រះនាងគង្គាជានិច្ច ដោយចិត្តមាតាបិតា។
Verse 95
उस्रां पुष्टां मिषतीं विश्वभोज्या- मिरावतीं धारिणीं भूधराणाम् | शिष्टाश्रयाममृतां ब्रह्म॒कान्तां गड्जां श्रयेदात्मवान् सिद्धिकाम:,जो अमृतमय दूध देनेवाली, गौके समान सबको पुष्ट करनेवाली, सब कुछ देखनेवाली, सम्पूर्ण जगत्के उपयोगमें आनेवाली, अन्न देनेवाली तथा पर्वतोंको धारण करनेवाली हैं, श्रेष्ठ पुरुष जिनका आश्रय लेते हैं और जिन्हें ब्रह्माजी भी प्राप्त करना चाहते हैं; तथा जो अमृतस्वरूप हैं, उन भगवती गंगाजीका सिद्धिकामी जितात्मा पुरुषोंको अवश्य आश्रय लेना चाहिये
សិទ្ធាបាននិយាយថា៖ បុរសដែលបានគ្រប់គ្រងខ្លួន និងប្រាថ្នាសម្រេចសិទ្ធិគួរតែជ្រកកោនព្រះនាងគង្គា—នាងដែលចិញ្ចឹមបីបាច់ និងមើលឃើញគ្រប់យ៉ាង ជាប្រយោជន៍ដល់ពិភពលោកទាំងមូល ជាអ្នកប្រទានអាហារ និងជាអ្នកទ្រទ្រង់ភ្នំទាំងឡាយ; នាងដែលមនុស្សល្អឥតខ្ចោះយកជាទីពឹង ដែលសូម្បីតែព្រះព្រហ្មក៏ប្រាថ្នាចង់ឈានដល់ និងដែលមានសភាពជាអមតៈ។ បទនេះបង្ហាញថា ការភក្តីចំពោះគង្គា មិនមែនជាការសរសើរទទេទេ ប៉ុន្តែជាវិន័យធម៌៖ ភាពទាបខ្លួន ការគ្រប់គ្រងខ្លួន និងការពឹងផ្អែកលើវត្តមានបរិសុទ្ធ ដើម្បីសម្រេចជោគជ័យខាងក្នុង។
Verse 96
प्रसाद्य देवान् सविभून् समस्तान् भगीरथस्तपसोग्रेण गड्भाम् । गामानयत् तामभिगम्य शश्चत् पुंसां भयं नेह चामुत्र विद्यात्,राजा भगीरथ अपनी उग्र तपस्यासे भगवान् शंकरसहित सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न करके गंगाजीको इस पृथ्वीपर ले आये। उनकी शरणमें जानेसे मनुष्यको इहलोक और परलोकमें भय नहीं रहता
ដោយការតបស្យាដ៏ខ្លាំងក្លា ព្រះបាទភគីរថ បានធ្វើឲ្យព្រះទេវទាំងអស់ រួមទាំងព្រះមហាទេវ (ព្រះសិវៈ) ពេញព្រះហឫទ័យ ហើយនាំព្រះនាងគង្គាចុះមកលើផែនដីនេះ។ អ្នកណាដែលចូលទៅជ្រកកោននាង នឹងគ្មានភ័យទាំងក្នុងលោកនេះ និងក្នុងលោកក្រោយ—ជានិច្ច។
Verse 97
उदाह्नत: सर्वथा ते गुणानां मयैकदेश: प्रसमीक्ष्य बुद्ध्या । शक्तिर्न मे काचिदिहास्ति वक्तुं गुणान् सर्वान् परिमातुं तथैव,ब्रह्मन्! मैंने अपनी बुद्धिसे सर्वथा विचारकर यहाँ गंगाजीके गुणोंका एक अंशमात्र बताया है। मुझमें कोई इतनी शक्ति नहीं है कि मैं यहाँ उनके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन कर सकूँ
ឱ ព្រាហ្មណ៍! បន្ទាប់ពីខ្ញុំបានពិចារណាដោយបញ្ញារបស់ខ្ញុំយ៉ាងពេញលេញ ខ្ញុំបាននិយាយនៅទីនេះត្រឹមតែភាគតិចនៃគុណធម៌របស់នាងតាមដែលអាចធ្វើបាន។ ខ្ញុំមិនមានអំណាចណាមួយនៅក្នុងលោកនេះដើម្បីរៀបរាប់—ឬវាស់វែងឲ្យគ្រប់—គុណសម្បត្តិទាំងមូលរបស់នាងឡើយ។
Verse 98
मेरो: समुद्रस्य च सर्वयत्नै: संख्योपलानामुदकस्य वापि | शक्यं वक्तुं नेह गड़ाजलानां गुणाख्यानं परिमातुं तथैव,कदाचित् सब प्रकारके यत्न करनेसे मेरु गिरिके प्रस्तरकणों और समुद्रके जलविन्दुओंकी गणना की जा सके; परंतु यहाँ गंगाजलके गुणोंका वर्णन तथा गणना करना कदापि सम्भव नहीं है
សិទ្ធៈបាននិយាយថា៖ ទោះបីមនុស្សខិតខំប្រឹងប្រែងគ្រប់យ៉ាងក៏ដោយ ក៏អាចនឹងរាប់បានចំនួនកម្ទេចថ្មលើភ្នំមេរុ ហើយសូម្បីតែអាចរាប់បានចំនួនដំណក់ទឹកនៃសមុទ្រផងដែរ; ប៉ុន្តែ នៅទីនេះ ការរៀបរាប់ និងការរាប់វាស់គុណធម៌នៃទឹកគង្គា មិនអាចធ្វើបានឡើយ។
Verse 99
तस्मादेतान् परया श्रद्धयोक्तान् गुणान् सर्वान् जाह्नवीयात् सदैव । भवेद् वाचा मनसा कर्मणा च भक््त्या युक्त: श्रद्धया श्रद्दधान:,अतः मैंने बड़ी श्रद्धाके साथ जो ये गंगाजीके गुण बताये हैं, उन सबपर विश्वास करके मन, वाणी, क्रिया, भक्ति और श्रद्धाके साथ आप सदा ही उनकी आराधना करें
ដូច្នេះ សូមមានជំនឿពេញលេញលើគុណធម៌ទាំងអស់នៃជាហ្នវី (គង្គា) ដែលបានប្រកាសដោយសេចក្តីស្រឡាញ់បូជាដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់នេះ ហើយសូមបូជានាងជានិច្ច—ដោយគ្រប់គ្រងវាចា ចិត្ត និងកាយកម្ម—ជាមួយនឹងភក្តីភាព ជំនឿ និងការគោរព។
Verse 100
लोकानिमांस्त्रीन्ू यशसा वितत्य सिद्धि प्राप्प महतीं तां दुरापाम् । गड्जाकृतानचिरेणैव लोकान् यथ्थेष्टमिष्टान् विहरिष्यसि त्वम्,इससे आप परम दुर्लभ उत्तम सिद्धि प्राप्त करके इन तीनों लोकोंमें अपने यशका विस्तार करते हुए शीघ्र ही गंगाजीकी सेवासे प्राप्त हुए अभीष्ट लोकोंमें इच्छानुसार विचरेंगे
សិទ្ធៈបាននិយាយថា៖ ដោយពង្រីកកេរ្តិ៍ឈ្មោះរបស់អ្នកទៅទូទាំងលោកទាំងបី អ្នកនឹងទទួលបានសិទ្ធិដ៏អធិកអធម និងពិបាករកបាននោះ។ ហើយមិនយូរប៉ុន្មានទេ ដោយបុណ្យកុសលកើតពីការបម្រើទន្លេគង្គា អ្នកនឹងទៅដល់លោកដែលប្រាថ្នា ដែលបានទទួលដោយបុណ្យនោះ ហើយអ្នកនឹងអាចដើរលេងនៅទីនោះដោយសេរី តាមចិត្តប្រាថ្នា។
Verse 101
तव मम च गुणैर्महानुभावा जुषतु मतिं सतत स्वधर्मयुक्तै: । अभिमतजनवत्सला हि गड्जा जगति युनक्ति सुखैश्ष भक्तिमन्तम्,महान् प्रभावशाली भगवती भागीरथी आपकी और मेरी बुद्धिको सदा स्वधर्मानुकूल गुणोंसे युक्त करें। श्रीगंगाजी बड़ी भक्तवत्सला हैं। वे संसारमें अपने भक्तोंको सुखी बनाती हैं
សូមព្រះនាងភាគីរថី (គង្គា) អ្នកមានព្រះហឫទ័យធំ និងមានអานุភាពខ្លាំង ដោយគុណធម៌ដែលសមស្របនឹងធម៌របស់មនុស្សម្នាក់ៗ សូមធ្វើឲ្យបញ្ញារបស់អ្នក និងរបស់ខ្ញុំ បរិសុទ្ធ និងមាំមួនជានិច្ច។ ព្រោះគង្គា ជាព្រះនាងដែលស្រឡាញ់អ្នកមានភក្តីភាពយ៉ាងពិតប្រាកដ; នាងធ្វើឲ្យអ្នកបូជានាងក្នុងលោកនេះ មានសុខសាន្ត និងសេចក្តីសុខ។
Verse 102
भीष्म उवाच इति परममतिर्गुणानशेषान् शिलरतसये त्रिपथानुयोगरूपान् । बहुविधमनुशास्य तथ्यरूपान् गगनततलं द्युतिमान् विवेश सिद्ध:,भीष्मजी कहते हैं-युधिष्ठि!र! वह उत्तम बुद्धिवाला परम तेजस्वी सिद्ध शिलोख्छतृत्तिद्वारा जीविका चलानेवाले उस ब्राह्मणसे त्रिपथगा गंगाजीके उपर्युक्त सभी यथार्थ गुणोंका नाना प्रकारसे वर्णन करके आकाशगमें प्रविष्ट हो गया
ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ ដូច្នេះ សិទ្ធៈដ៏មានប្រាជ្ញាខ្ពង់ខ្ពស់ និងពន្លឺរុងរឿងនោះ បានអប់រំប្រាហ្មណ៍អ្នករកជីវិតដោយសីលវ្រឹត្តិ (ប្រមូលគ្រាប់ធញ្ញជាតិដែលនៅសល់) ដោយវិធីជាច្រើន ហើយបានពណ៌នាឲ្យពេញលេញអំពីគុណធម៌ពិតប្រាកដដ៏ចម្រុះនៃ ត្រីបថគា—គង្គាដែលហូរតាមបីផ្លូវ—រួចក៏ចូលទៅក្នុងលំហអាកាសដ៏ធំទូលាយ។
Verse 103
शिलवृत्तिस्तु सिद्धस्य वाक्यै: सम्बोधितस्तदा | गड़ामुपास्य विधिवत् सिद्धि प्राप सुदुर्लभाम्,वह शिलोज्छतवृत्तिवाला ब्राह्मण सिद्धके उपदेशसे गंगाजीके माहात्म्यको जानकर उनकी विधिवत् उपासना करके परम दुर्लभ सिद्धिको प्राप्त हुआ
បន្ទាប់មក ប្រាហ្មណ៍អ្នកមានសីលវ្រឹត្តិ (រស់ដោយប្រមូលគ្រាប់ធញ្ញជាតិដែលនៅសល់) នោះ ត្រូវបានសិទ្ធៈអប់រំដោយព្រះវាចា ហើយបានបូជាគង្គាទេវីដោយវិធីត្រឹមត្រូវ។ ដោយសេចក្តីស្រឡាញ់បូជាដ៏មានវិន័យនោះ គាត់បានទទួលសិទ្ធិដ៏កម្រខ្លាំង។
Verse 104
तथा त्वमपि कौन्तेय भक््त्या परमया युत: । गड्भामभ्येहि सतत प्राप्स्यसे सिद्धिमुत्तमाम्,कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार तुम भी पराभक्तिके साथ सदा गंगाजीकी उपासना करो। इससे तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी
ដូច្នេះដែរ កូនកុន្តីអើយ អ្នកដែលពោរពេញដោយភក្តីដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់ ចូរចូលទៅជិត និងបូជាគង្គាជានិច្ច។ ដោយធ្វើដូច្នេះ អ្នកនឹងទទួលបានសិទ្ធិដ៏ឧត្តម។
Verse 105
वैशम्पायन उवाच श्रुत्वेतिहासं भीष्मोक्तं गज़ाया: स्तवसंयुतम् । युधिष्ठिर: परां प्रीतिमगच्छद् भ्रातृभि: सह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मजीके द्वारा कहे हुए श्रीगंगाजीकी स्तुतिसे युक्त इस इतिहासको सुनकर भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता हुई
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ ព្រះបាទជនមេជ័យអើយ! ពេលព្រះបាទយុធិષ્ઠិរ ស្តាប់ប្រវត្តិនេះដែលភីષ្មៈបាននិយាយ—ប្រកបដោយស្តុតិគង្គា—ព្រះអង្គមានព្រះហឫទ័យរីករាយយ៉ាងខ្លាំង ព្រមទាំងបងប្អូនទាំងឡាយ។
Verse 106
भीष्मश्रिता: सुमधुरा: सर्वेन्द्रियमनोहरा: । पूजनके पश्चात् वे महर्षि सुखपूर्वक बैठकर भीष्मजीसे सम्बन्ध रखनेवाली मधुर एवं मनोहर कथाएँ कहने लगे। उनकी वे कथाएँ सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनको मोह लेती थीं,इतिहासमिमं पुण्यं शृूणुयाद् यः पठेत वा । गड़्जाया: स्तवसंयुक्त स मुच्येत् सर्वकिल्बिषै: जो गड़्ाजीके स्तवनसे युक्त इस पवित्र इतिहासका श्रवण अथवा पाठ करेगा वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ បន្ទាប់ពីពិធីបូជាបានបញ្ចប់ មហារិសីទាំងឡាយអង្គុយដោយសុខសាន្ត ហើយចាប់ផ្តើមនិយាយរឿងរ៉ាវផ្អែមល្ហែម ន่ារីករាយ ដែលពាក់ព័ន្ធនឹងភីષ្មៈ—រឿងទាំងនោះទាក់ទាញអារម្មណ៍ទាំងអស់ និងចិត្ត។ អ្នកណាដែលស្តាប់ ឬអានប្រវត្តិសាស្ត្របរិសុទ្ធនេះ ដែលភ្ជាប់ជាមួយស្តុតិគង្គា នឹងរួចផុតពីបាបទាំងអស់។
Verse 113
मेने दिविष्ठमात्मानं तुष्टया परमया युत:ः । शुद्ध अन्तःकरणवाले उन ऋषि-मुनियोंकी बातें सुनकर भीष्मजी बहुत संतुष्ट हुए और अपनेको स्वर्गमें ही स्थित मानने लगे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ ដោយពោរពេញដោយសេចក្តីសុខសាន្តដ៏អតិបរមា ពីស្មៈបានគិតថា ខ្លួនដូចជាស្ថិតនៅសួគ៌រួចហើយ។ ពេលបានស្តាប់ពាក្យសម្តីដ៏បរិសុទ្ធពីក្នុងចិត្តរបស់ព្រះឥសីមុនីទាំងនោះ គាត់ក៏រីករាយពេញចិត្តយ៉ាងជ្រាលជ្រៅ។
Verse 123
अन्तर्धानं गता: सर्वे सर्वेषामेव पश्यताम् । तदनन्तर वे महर्षिगण भीष्मजी और पाण्डवोंकी अनुमति लेकर सबके देखते-देखते ही वहाँसे अदृश्य हो गये
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ ពួកគេទាំងអស់បានលង់បាត់ពីទស្សនៈ ខណៈដែលមនុស្សទាំងអស់កំពុងមើលឃើញ។ បន្ទាប់មក ព្រះឥសីមហាឥសីទាំងឡាយ—ក្រោយពេលសុំលាចេញដោយបានការអនុញ្ញាតពីព្រះបីស្មៈ និងបណ្ឌវទាំងប្រាំ—ក៏ក្លាយជាមិនអាចមើលឃើញនៅទីនោះភ្លាមៗ មុខមាត់មនុស្សទាំងអស់។
Verse 143
उपतस्थुर्यथोद्यन्तमादित्यं मन्त्रकोविदा: । जैसे वेदमन्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मण उगते हुए सूर्यका उपस्थान करते हैं, उसी प्रकार प्रसन्न चित्त हुए समस्त पाण्डव कुरुश्रेष्ठ गड़ानन्दन भीष्मको प्रणाम करने लगे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ ដូចជាព្រះព្រាហ្មណ៍ដែលជំនាញក្នុងមន្តវេទ ធ្វើពិធីគោរពបម្រើព្រះអាទិត្យពេលរះ ដូច្នោះដែរ បណ្ឌវទាំងអស់—មានចិត្តស្ងប់សុខ—បានកោតគោរពក្រាបថ្វាយបង្គំដល់ព្រះបីស្មៈ កុរុដ៏ប្រសើរបំផុត កូនប្រុសនៃព្រះនាងគង្គា។
Verse 153
प्रकाशन्तो दिश: सर्वा विस्मयं परम ययु: । उन ऋषियोंकी तपस्याके प्रभावसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित होती देख पाण्डवोंको बड़ा विस्मय हुआ
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ ទិសទាំងអស់ភ្លឺចែងចាំង ហើយបណ្ឌវទាំងប្រាំក៏ភ្ញាក់ផ្អើលអស្ចារ្យយ៉ាងខ្លាំង។ ពេលឃើញទិសទាំងមូលត្រូវបានបំភ្លឺដោយអានុភាពតបស្យា (ការតាំងចិត្តបួសបាប) របស់ព្រះឥសីទាំងនោះ ពួកគេក៏កើតសេចក្តីអស្ចារ្យយ៉ាងក្រៃលែង។
The tension lies between intense austerity aimed at acquiring a supreme social-spiritual status and the claim that such status cannot be secured merely by desire or forceful striving when ethical qualification and inner discipline are lacking.
Śakra advises redirecting effort away from hazardous over-aspiration and toward conquering internal adversaries—anger, desire, aversion, pride, and contentiousness—since these determine elevation or decline more reliably than status-seeking tapas.
Rather than a formal phalāśruti, it provides an evaluative closure: brāhmaṇya is declared “sudur-labha” (exceedingly rare), and the outcome is framed conditionally—victory over inner enemies yields a good end; defeat by them results in a fall.