Adhyaya 28
Bhishma ParvaAdhyaya 2843 Verses

Adhyaya 28

ध्यानयोगः — Dhyāna-Yoga (Discipline of Meditation and Mental Restraint)

Upa-parva: Bhagavad Gītā (Yoga-Śāstra) — Dhyāna-Yoga Discourse Unit

This chapter defines true renunciation and yoga as compatible with responsible action performed without attachment to results (karma-phala-tyāga). It outlines a graded yogic method: for the beginner, disciplined action supports ascent; for the established practitioner, calmude (śama) becomes primary. The text describes the marks of yogic maturity—non-attachment to sense-objects and actions, relinquishment of proliferating intentions (saṅkalpa), and equanimity across opposites (heat/cold, pleasure/pain, honor/disgrace). Practical instructions follow: solitary practice in a clean place, stable posture, aligned body, focused gaze, mental restraint, and brahmacarya-oriented discipline, aiming at purification and nirvāṇa-oriented peace. A moderation principle is introduced (balanced diet, recreation, work, sleep), and the stabilized mind is compared to a lamp in a windless place. The chapter defines yoga as disconnection from the conjunction with distress and prescribes persistent effort without despondency, including techniques for repeatedly returning the wandering mind to the self. Arjuna then raises the problem of mental volatility and asks about the fate of one who fails to attain completion; Kṛṣṇa answers that no constructive effort is lost, describing favorable rebirths and eventual attainment, culminating in praise of the devotee-yogin as foremost.

Chapter Arc: अर्जुन के भीतर संशय की धुंध है—भगवान् के वचनों का तात्पर्य उसे ‘मिले हुए-से’ प्रतीत होते हैं; कर्म, बुद्धियोग और त्याग के बीच वह अर्थ खोजता है। → कृष्ण योग की परम्परा का स्मरण कराते हैं—यह राजर्षियों द्वारा जाना गया, पर काल के प्रवाह में लुप्त-सा हो गया। फिर वे बताते हैं कि लोग सिद्धि की आकांक्षा से देवताओं की उपासना करते हैं, और कर्म-फल की चाह मनुष्य को अनेक मार्गों में बाँट देती है। → कृष्ण का निर्णायक उद्घोष—‘परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुष्कृताम्, धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे’—अर्जुन के प्रश्न को केवल युद्ध-नीति नहीं, युग-धर्म के विराट विधान में उठा देता है। → कृष्ण कर्मयोग का सार बाँधते हैं: गुण-कर्म के विभाग से वर्ण-व्यवस्था का विधान, कर्मों का परमात्मा में अर्पण, और ज्ञान से संशय-छेदन। जो योग-संन्यस्त कर्म और ज्ञान-छिन्न संशय है, उसे कर्म बाँध नहीं सकते। → अंतिम आदेश की धार—‘हृदयस्थ अज्ञानजनित संशय को ज्ञानासि से काट; योग में स्थित होकर उठ खड़ा हो’—अर्जुन को निर्णय के द्वार पर छोड़ देता है।

Shlokas

Verse 1

अपन क्रातज बछ। अं क्ााज ३. भगवानके वचनोंका तात्पर्य न समझनेके कारण अर्जुनको भी भगवानके वचन मिले हुए-से प्रतीत होते थे; क्योंकि 'बुद्धियोगकी अपेक्षा कर्म अत्यन्त निकृष्ट है, तू बुद्धिका ही आश्रय ग्रहण कर” (गीता २।४९) इस कथनसे तो अर्जुनने समझा कि भगवान्‌ ज्ञानकी प्रशंसा और कर्मोकी निन्‍्दा करते हैं और मुझे ज्ञानका आश्रय लेनेके लिये कहते हैं तथा “बुद्वियुक्त पुरुष पुण्य-पापोंको यहीं छोड़ देता है” (गीता २५०) इस कथनसे यह समझा कि पुण्य-पापरूप समस्त कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेवालेको भगवान्‌ “बुद्धियुक्त” कहते हैं। इसके विपरीत “तेरा कर्ममें अधिकार है” (गीता २। ४७) “तू योगमें स्थित होकर कर्म कर” (गीता २।४८) इन वाक्योंसे अर्जुनने यह बात समझी कि भगवान्‌ मुझे कर्मोंमें नियुक्त कर रहे हैं; इसके सिवा *“निस्त्रैगुण्यो भव”, “आत्मवान्‌ भव” (गीता २।४५) आदि वाक्योंसे कर्मका त्याग और “तस्माद्‌ युध्यस्व भारत” (गीता २।१८), “ततो युद्धाय युज्यस्व” (गीता २।३८), “तस्माद्‌ योगाय युज्यस्व” (गीता २।५०) आदि वचनोंसे उन्होंने कर्मकी प्रेरणा समझी। इस प्रकार उपर्युक्त वचनोंमें उन्हें विरोध दिखायी दिया। २. प्रकृतिसे उत्पन्न सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (गीता ३।२८), मेरा इनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है--ऐसा समझकर मन, इन्टद्रिय और शरीरद्वारा होनेवाली समस्त क्रियाओंमें कर्तापनके अभिमानसे सर्वथा रहित हो जाना; किसी भी क्रियामें या उसके फलमें किंचिन्मात्र भी अहंता, ममता, आसक्ति और कामनाका न रहना तथा सच्चिदानन्दघन ब्रह्मसे अपनेको अभिन्न समझकर निरन्तर परमात्माके स्वरूपमें स्थित हो जाना अर्थात्‌ ब्रह्मभूत (ब्रह्मस्वरूप) बन जाना (गीता ५।२४: ६।२७)--यह पहली निष्ठा है। इसका नाम ज्ञाननिष्ठा है। ३. वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके अनुसार जिस मनुष्यके लिये जिन कर्मोंका शास्त्रमें विधान है, जिनका अनुष्ठान करना मनुष्यके लिये अवश्यकर्तव्य माना गया है, उन शास्त्रविहित स्वाभाविक कर्मोंका न्यायपूर्वक, अपना कर्तव्य समझकर अनुष्ठान करना; उन कर्मोमें और उनके फलमें ममता, आसक्ति और कामनाका सर्वथा त्याग करके प्रत्येक कर्मकी सिद्धि और असिद्धिमें तथा उसके फलमें सदा ही सम रहना (गीता २।४७-४८) एवं इन्द्रियोंके भोगोंमें और कर्मोमें आसक्त न होकर समस्त संकल्पोंका त्याग करके योगारूढ़ हो जाना (गीता ६।४)--यह कर्मयोगकी निष्ठा है तथा परमेश्वरको सर्वशक्तिमान्‌, सर्वाधार, सर्वव्यापी, सबके सुहृद्‌ और सबके प्रेरक समझकर और अपनेको सर्वथा उनके अधीन मानकर समस्त कर्म और उनका फल भगवान्‌के समर्पण करना (गीता ३।३०; ९।२७-२८), उनकी आज्ञा और प्रेरणाके अनुसार उनकी पूजा समझकर जैसे वे करवावें, वैसे ही समस्त कर्म करना; उन कर्मोंमें या उनके फलनमें किंचिन्मात्र भी ममता, आसक्ति या कामना न रखना; भगवानके प्रत्येक विधानमें सदा ही संतुष्ट रहना तथा निरन्तर उनके नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूपका चिन्तन करते रहना (गीता १०।९; १२।६; १८।५७)--यह भक्तिप्रधान कर्मयोगकी निष्ठा है। ३. कर्मोंका आरम्भ न करने और कर्मोंका त्याग करनेकी बात कहकर अलग-अलग यह भाव दिखाया है कि कर्मयोगीके लिये विहित कर्मोंका न करना योगनिष्ठाकी प्राप्तिमें बाधक है; किंतु सांख्ययोगीके लिये कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देना सांख्यनिष्ठाकी प्राप्तिमें बाधक नहीं है, किंतु केवल उसीसे उसे सिद्धि नहीं मिलती, सिद्धिकी प्राप्तिके लिये उसे कर्तापनका त्याग करके सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें अभेदभावसे स्थित होना आवश्यक है। अतएव उसके लिये कर्मोंका स्वरूपत:ः त्याग करना मुख्य बात नहीं है, भीतरी त्याग ही प्रधान है और कर्मयोगीके लिये स्वरूपसे कर्मोका त्याग न करना विधेय है। २. यद्यपि गुणातीत ज्ञानी पुरुषका गुणोंसे या उनके कार्यसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता; अत: वह गुणोंके वशमें होकर कर्म करता है, यह कहना नहीं बन सकता; तथापि मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदिका संघातरूप जो उसका शरीर लोगोंकी दृष्टिमें वर्तमान है, उसके द्वारा उसके और लोगोंके प्रारब्धानुसार क्रियाका होना अनिवार्य है; क्योंकि वह गुणोंका कार्य होनेसे गुणोंसे अतीत नहीं है, बल्कि उस ज्ञानीका शरीरसे सर्वथा अतीत हो जाना ही गुणातीत हो जाना है। 3. यहाँ 'कर्मन्द्रियाणि” पदका पारिभाषिक अर्थ नहीं है; इसलिये जिनके द्वारा मनुष्य बाहरकी क्रिया करता है अर्थात्‌ शब्दादि विषयोंको ग्रहण करता है, उन श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना और प्राण तथा वाणी, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा--इन दसों इन्द्रियोंका वाचक है; क्योंकि गीतामें श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियोंके लिये कहीं भी 'ज्ञानेन्द्रिय” शब्दका प्रयोग नहीं हुआ है। इसके सिवा यहाँ कर्मेन्द्रियोंका अर्थ केवल वाणी आदि पाँच इन्द्रियाँ मान लेनेसे श्रोत्र और नेत्र आदि इन्द्रियोंको रोकनेकी बात शेष रह जाती है और उसके रह जानेसे मिथ्याचारीका स्वाँग भी पूरा नहीं बनता; तथा वाणी आदि इन्द्रियोंको रोककर श्रोत्रादि इन्द्रियोंके द्वारा वह क्या करता है, यह बात भी यहाँ बतलानी आवश्यक हो जाती है। ४. यहाँ 'स विशिष्यते” पदका अभिप्राय कर्मयोगीको पूर्ववर्णित केवल मिथ्याचारीकी अपेक्षा ही श्रेष्ठ बतलाना नहीं है; क्योंकि पूर्वश्लोकमें वर्णित मिथ्याचारी तो आसुरी सम्पदावाला दम्भी है। उसकी अपेक्षा तो सकामभावसे विहित कर्म करनेवाला मनुष्य भी बहुत श्रेष्ठ है; फिर दैवी सम्पदायुक्त कर्मयोगीको मिथ्याचारीकी अपेक्षा श्रेष्ठ बतलाना तो किसी वेश्याकी अपेक्षा सती स्त्रीको श्रेष्ठ बतलानेकी भाँति कर्मयोगीकी स्तुतिमें निन्दा करनेके समान है। अतः यहाँ यही मानना ठीक है कि 'स विशिष्यते” से कर्मयोगीको सर्वश्रेष्ठ बतलाकर उसकी प्रशंसा की गयी है। ५, इस कथनसे भगवानने अर्जुनके उस भ्रमका निराकरण किया है, जिसके कारण उन्होंने यह समझ लिया था कि भगवानके मतमें कर्म करनेकी अपेक्षा उनका न करना श्रेष्ठ है। अभिप्राय यह है कि कर्तव्यकर्म करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण शुद्ध होता है तथा कर्तव्यकर्मोंका त्याग करनेसे वह पापका भागी होता है एवं निद्रा, आलस्य और प्रमादमें फँसकर अधोगतिको प्राप्त होता है (गीता १४।१८); अत: कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना सर्वथा श्रेष्ठ है। ३. समस्त मनुष्योंके लिये वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके भेदसे भिन्न-भिन्न यज्ञ, दान, तप, प्राणायाम, इन्द्रियसंयम, अध्ययन-अध्यापन, प्रजापालन, युद्ध, कृषि, वाणिज्य और सेवा आदि कर्तव्यकर्मोंसे सिद्ध होनेवाला जो स्वधर्म है--उसका नाम यज्ञ है। २. इस कथनसे ब्रह्माजीने यह भाव दिखलाया है कि इस प्रकार अपने-अपने स्वार्थका त्याग करके एक-दूसरेको उन्नत बनानेके लिये अपने कर्तव्यका पालन करनेसे तुमलोग इस सांसारिक उन्नतिके साथ-साथ परमकल्याणरूप मोक्षको भी प्राप्त हो जाओगे। अभिप्राय यह है कि यहाँ देवताओंके लिये तो ब्रह्माजीका यह आदेश है कि मनुष्य यदि तुमलोगोंकी सेवा, पूजा, यज्ञादि न करें तो भी तुम कर्तव्य समझकर उनकी उन्नति करो और मनुष्योंके प्रति यह आदेश है कि देवताओंकी उन्नति और पुष्टिके लिये ही स्वार्थत्यागपूर्वक देवताओंकी सेवा, पूजा, यज्ञादि कर्म करो। इसके सिवा अन्य ऋषि, पितर, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदिको भी निःस्वार्थभावसे स्वधर्मपालनके द्वारा सुख पहुँचाओ। ३. देवतालोग सृष्टिके आदिकालसे मनुष्योंको सुख पहुँचानेके लिये--उनकी आवश्यकताओंको पूर्ण करनेके निमित्त पशु, पक्षी, औषध, वृक्ष, तृण आदिके सहित सबकी पुष्टि कर रहे हैं और अन्न, जल, पुष्प, फल, धातु आदि मनुष्योपयोगी समस्त वस्तुएँ मनुष्योंको दे रहे हैं; जो मनुष्य उन सब वस्तुओंको उन देवताओंका ऋण चुकाये बिना--उनका न्यायोचित स्वत्व उन्हें अर्पण किये बिना स्वयं अपने काममें लाता है, वह चोर होता है। ४. सृष्टिकार्यके सुचारुरूपसे संचालनमें और सृष्टिके जीवोंका भलीभाँति भरण-पोषण होनेमें पाँच श्रेणीके प्राणियोंका परस्पर सम्बन्ध है--देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और अन्य प्राणी। इन पाँचोंके सहयोगसे ही सबकी पुष्टि होती है। देवता समस्त संसारको इष्ट भोग देते हैं, ऋषि-महर्षि सबको ज्ञान देते हैं, पितरलोग संतानका भरण-पोषण करते और हित चाहते हैं, मनुष्य कर्मोके द्वारा सबकी सेवा करते हैं और पशु, पक्षी, वृक्षादि सबके सुखके साधनरूपमें अपनेको समर्पित किये रहते हैं। इन पाँचोंमें योग्यता, अधिकार और साधनसम्पन्न होनेके कारण सबकी पुष्टिका दायित्व मनुष्यपर है। इसीसे मनुष्य शास्त्रीय कर्मोंके द्वारा सबकी सेवा करता है। पंच महायज्ञसे यहाँ लोकसेवारूप शास्त्रीय सत्कर्म ही विवक्षित है। इस दृष्टिसे मनुष्यका यह कर्तव्य है कि वह जो कुछ भी कमावे, उसमें इन सबका भाग समझे; क्योंकि वह सबकी सहायता और सहयोगसे ही कमाता-खाता है। इसीलिये जो यज्ञ करनेके बाद बचे हुए अन्नको अर्थात्‌ इन सबको उनका प्राप्प भाग देकर उससे बचे हुए अन्नको खाता है, उसीको शास्त्रकार अमृताशी (अमृत खानेवाला) बतलाते हैं। ३. मनुष्यके द्वारा की जानेवाली शास्त्रविहित क्रियाओंसे यज्ञ होता है, यज्ञसे वृष्टि होती है, वृष्टिसे अन्न होता है, अन्नसे प्राणी उत्पन्न होते हैं, पुनः उन प्राणियोंके ही अन्तर्गत मनुष्यके द्वारा किये हुए कर्मोंसे यज्ञ और यज्ञसे वृष्टि होती है। इस तरह यह सृष्टिपरम्परा सदासे चक्रकी भाँति चली आ रही है। २. उपर्युक्त विशेषणोंसे युक्त महापुरुष परमात्माको प्राप्त है, अतएव उसके समस्त कर्तव्य समाप्त हो चुके हैं, वह कृतकृत्य हो गया है; क्योंकि मनुष्यके लिये जितना भी कर्तव्यका विधान किया गया है, उस सबका उद्देश्य केवलमात्र एक परम कल्याणस्वरूप परमात्माको प्राप्त करना है; अतएव वह उद्देश्य जिसका पूर्ण हो गया, उसके लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता, उसके कर्तव्यकी समाप्ति हो जाती है। १. राजा जनककी भाँति ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग करके केवल परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही कर्म करनेवाले अश्वपति, इक्ष्वाकु, प्रह्नाद, अम्बरीष आदि जितने भी महापुरुष हो चुके हैं, वे सब प्रधान-प्रधान महापुरुष आसक्तिरहित कमोंके द्वारा ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए थे तथा और भी आजतक बहुत-से महापुरुष ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग करके कर्मयोगद्वारा परमात्माको प्राप्त कर चुके हैं; यह कोई नयी बात नहीं है। अत: यह परमात्माकी प्राप्तिका स्वतन्त्र और निश्चित मार्ग है, इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है। इसके अतिरिक्त कर्मोंद्वारा जिसका अन्त:करण शुद्ध हो जाता है, उसे परमात्माकी कृपासे तत्त्वज्ञान अपने-आप मिल जाता है (गीता ४।३८) तथा कर्मयोगयुक्त मुनि तत्काल ही परमात्माको प्राप्त हो जाता है (गीता ५।६)--इस कथनसे भी इसकी अनादिता सिद्ध होती है। २. समस्त प्राणियोंके भरण-पोषण और रक्षणका दायित्व मनुष्यपर है; अत: अपने वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके अनुसार कर्तव्यकर्मोंका भलीभाँति आचरण करके जो दूसरे लोगोंको अपने आदर्शके द्वारा दुर्गुण-दुराचारसे हटाकर स्वधर्ममें लगाये रखना है--यही लोकसंग्रह है। अतः कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको परम श्रेयरूप परमेश्वरकी प्राप्तिके लिये तो आसक्तिसे रहित होकर कर्म करना उचित है ही, इसके सिवा लोकसंग्रहके लिये भी मनुष्यको कर्म करते रहना उचित है, उसका त्याग करना किसी प्रकार भी उचित नहीं है। 3. श्रेष्ठ पुरुष स्वयं आचरण करके और लोगोंको शिक्षा देकर जिस बातको प्रामाणिक कर देता है अर्थात्‌ लोगोंके अन्तःकरणमें विश्वास करा देता है कि अमुक कर्म अमुक मनुष्यको इस प्रकार करना चाहिये, उसीके अनुसार साधारण मनुष्य चेष्टा करने लग जाते हैं। ४. बहुत लोग तो मुझे बड़ा शक्तिशाली और श्रेष्ठ समझते हैं और बहुत-से मर्यादापुरुषोत्तम समझते हैं, इस कारण जिस कर्मको मैं जिस प्रकार करता हूँ, दूसरे लोग भी मेरी देखा-देखी उसे उसी प्रकार करते हैं अर्थात्‌ मेरी नकल करते हैं। ऐसी स्थितिमें यदि मैं कर्तव्यकर्मोंकी अवहेलना करने लगूँ, उनमें सावधानीके साथ विधिपूर्वक न बरतूँ तो लोग भी उसी प्रकार करने लग जायँ और ऐसा करके स्वार्थ और परमार्थ दोनोंसे वंचित रह जायँ। अतएव लोगोंको कर्म करनेकी रीति सिखलानेके लिये मैं समस्त कर्मोमें स्वयं बड़ी सावधानीके साथ विधिवत्‌ बरतता हूँ, कभी कहीं भी जरा भी असावधानी नहीं करता। ५, जिस समय कर्तव्यश्रष्ट हो जानेसे लोगोंमें सब प्रकारकी संकरता फैल जाती है, उस समय मनुष्य भोगपरायण और स्वार्थान्ध होकर भिन्न-भिन्न साधनोंसे एक-दूसरेका नाश करने लग जाते हैं, अपने अत्यन्त क्षुद्र और क्षणिक सुखोपभोगके लिये दूसरोंका नाश कर डालनेमें जरा भी नहीं हिचकते। इस प्रकार अत्याचार बढ़ जानेपर उसीके साथ-साथ नयी-नयी दैवी विपत्तियाँ भी आने लगती हैं, जिनके कारण सभी प्राणियोंके लिये आवश्यक खान-पान और जीवनधारणकी सुविधाएँ प्राय: नष्ट हो जाती हैं; चारों ओर महामारी, अनावृष्टि, जल-प्रलय, अकाल, अग्निकोप, भूकम्प और उल्कापात आदि उत्पात होने लगते हैं। इससे समस्त प्रजाका विनाश हो जाता है। अत: भगवानने “मैं समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ” इस वाक्यसे यह भाव दिखलाया है कि यदि मैं शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर दूँ तो मुझे उपर्युक्त प्रकारसे लोगोंको उच्छुंखल बनाकर समस्त प्रजाका नाश करनेमें निमित्त बनना पड़े। ३. स्वाभाविक स्नेह, आसक्ति और भविष्यमें उससे सुख मिलनेकी आशा होनेके कारण माता अपने पुत्रका जिस प्रकार सच्ची हार्दिक लगन, उत्साह और तत्परताके साथ लालन-पालन करती है, उस प्रकार दूसरा कोई नहीं कर सकता; इसी तरह जिस मनुष्यकी कर्मोमें और उनसे प्राप्त होनेवाले भोगोंमें स्वाभाविक आसक्ति होती है और उनका विधान करनेवाले शास्त्रोंमें जिसका विश्वास होता है, वह जिस प्रकार सच्ची लगनसे श्रद्धा और विधिपूर्वक शास्त्रविहित कर्मोंको सांगोपांग करता है, उस प्रकार जिनकी शास्त्रोंमें श्रद्धा और शास्त्रविहित क्मामें प्रवृत्ति नहीं है, वे मनुष्य नहीं कर सकते। अतएव यहाँ “यथा” और “तथा” का प्रयोग करके भगवान्‌ यह भाव दिखलाते हैं कि अहंता, ममता, आसक्ति और कामनाका सर्वथा अभाव होनेपर भी ज्ञानी महात्माओंको केवल लोकसंग्रहके लिये कर्मासक्त मनुष्योंकी भाँति ही शास्त्रविहित कर्मोंका विधिपूर्वक सांगोपांग अनुष्ठान करना चाहिये। २. मनुष्योंको निष्काम कर्मका और तत्त्वज्ञानका उपदेश देते समय ज्ञानीको इस बातका पूरा खयाल रखना चाहिये कि उसके किसी आचार-व्यवहार और उपदेशसे उनके अन्तः:करणमें कर्तव्यकर्मोके या शास्त्रादिके प्रति किसी प्रकारकी अश्रद्धा या संशय उत्पन्न न हो जाय; क्योंकि ऐसा हो जानेसे वे जो कुछ शास्त्रविहित कर्मोंका श्रद्धापूर्वक सकामभावसे अनुष्ठान कर रहे हैं, उसका भी ज्ञानके या निष्कामभावके नामपर परित्याग कर देंगे। इस कारण उन्नतिके बदले उनका वर्तमान स्थितिसे भी पतन हो जायगा। अतएव भगवान्‌के कहनेका यहाँ यह भाव नहीं है कि अज्ञानियोंको तत्त्वज्ञानका उपदेश नहीं देना चाहिये या निष्कामभावका तत्त्व नहीं समझाना चाहिये, उनका तो यहाँ यही कहना है कि अज्ञानियोंके मनमें न तो ऐसा भाव उत्पन्न होने देना चाहिये कि तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये या तत्त्वज्ञान प्राप्त होनेके बाद कर्म अनावश्यक है, न यही भाव पैदा होने देना चाहिये कि फलकी इच्छा न हो तो कर्म करनेकी जरूरत ही क्या है और न इसी भ्रममें रहने देना चाहिये कि फलासक्तिपूर्वक सकामभावसे कर्म करके स्वर्ग प्राप्त कर लेना ही बड़े-से-बड़ा पुरुषार्थ है, इससे बढ़कर मनुष्यका और कोई कर्तव्य ही नहीं है; बल्कि अपने आचरण तथा उपदेशोंद्वारा उनके अन्तःकरणसे आसक्ति और कामनाके भावोंको हटाते हुए उनको पूर्ववत्‌ श्रद्धापूर्वक कर्म करनेमें लगाये रखना चाहिये। 3. वास्तवमें आत्माका कर्मोंसे सम्बन्ध न होनेपर भी अज्ञानी मनुष्य तेईस तत्त्वोंके इस संघातमें आत्माभिमान करके उसके द्वारा किये जानेवाले कर्मोंसे अपना सम्बन्ध स्थापन करके अपनेको उन कर्मोंका कर्ता मान लेता है--अर्थात्‌ मैं निश्चय करता हूँ, मैं संकल्प करता हूँ, मैं सुनता हूँ, देखता हूँ, खाता हूँ, पीता हूँ, सोता हूँ, चलता हूँ--इत्यादि प्रकारसे हरेक क्रियाको अपने द्वारा की हुई समझता है। ३. त्रिगुणात्मक मायाके कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय--इन सबके समुदायका नाम “गुणविभाग” है और इनकी परस्पर चेष्टाओंका नाम “कर्मविभाग' है। इन गुणविभाग और कर्मविभागसे आत्माको पृथक्‌ अर्थात्‌ निर्लेप जानना ही इनका तत्त्व जानना है। २. कर्मोमें लगे हुए अधिकारी सकाम मनुष्योंको “कर्म अत्यन्त ही परिश्रमसाध्य हैं, कर्मोमें रखा ही क्या है, यह जगत्‌ मिथ्या है, कर्ममात्र ही बन्धनके हेतु हैं" ऐसा उपदेश देकर शास्त्रविहित कर्मोंसे हटाना या उनमें उनकी श्रद्धा और रुचि कम कर देना उचित नहीं है; क्योंकि ऐसा करनेसे उनके पतनकी सम्भावना है। ३. सर्वन्तिर्यामी परमेश्वरके गुण, प्रभाव और स्वरूपको समझकर उनपर विश्वास करनेवाले और निरन्तर सर्वत्र उनका चिन्तन करते रहनेवाले चित्तके द्वारा जो भगवान्‌को सर्वशक्तिमान्‌, सर्वाधार, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर तथा परम प्राप्य, परम गति, परम हितैषी, परम प्रिय, परम सुहृद्‌ और परम दयालु समझकर, अपने अन्तःकरण और इन्द्रियोंसहित शरीरको, उनके द्वारा किये जानेवाले कर्मोंकोी और जगत्‌के समस्त पदार्थोंको भगवान्‌के जानकर उन सबमें ममता और आसक्तिका सर्वथा त्याग कर देना तथा मुझमें कुछ भी करनेकी शक्ति नहीं है, भगवान्‌ ही सब प्रकारकी शक्ति प्रदान करके मेरे द्वारा अपने इच्छानुसार यथायोग्य समस्त कर्म करवा रहे हैं, मैं तो केवल निमित्तमात्र हूँ---इस प्रकार अपनेको सर्वथा भगवानके अधीन समझकर भगवानके अआज्ञानुसार उन्हींके लिये उन्हींकी प्रेरणासे जैसे वे करावें वैसे ही समस्त कर्मोंको कठपुतलीकी भाँति करते रहना, उन कर्मोंसे या उनके फलसे किसी प्रकारका भी अपना मानसिक सम्बन्ध न रखकर सब कुछ भगवान्‌का समझना--यही “अध्यात्मचित्तसे समस्त कर्मोको भगवान्‌में समर्पण कर देना' है। २. इससे यह भाव दिखलाया गया है कि जिस प्रकार समस्त नदियोंका जल जो स्वाभाविक ही समुद्रकी ओर बहता है, उसके प्रवाहको हठपूर्वक रोका नहीं जा सकता; उसी प्रकार समस्त प्राणी अपनी-अपनी प्रकृतिके अधीन होकर प्रकृतिके प्रवाहमें पड़े हुए प्रकृतिकी ओर जा रहे हैं; इसलिये कोई भी मनुष्य हठपूर्वक सर्वथा कर्मोंका त्याग नहीं कर सकता। हाँ, जिस तरह नदीके प्रवाहको एक ओरसे दूसरी ओर घुमा दिया जा सकता है, उसी प्रकार मनुष्य अपने उद्देश्यका परिवर्तन करके उस प्रवाहकी चालको बदल सकता है यानी राग-द्वेषका त्याग करके उन कर्मोको परमात्माकी प्राप्तिमें सहायक बना सकता है। ३. जिस प्रकार अपने निश्चित स्थानपर जानेके लिये राह चलनेवाले किसी मुसाफिरको मार्गमें विघ्न करनेवाले लुटेरोंसे भेंट हो जाय और वे मित्रताका-सा भाव दिखलाकर और उसके साथी गाड़ीवान आदिसे मिलकर उनके द्वारा उसकी विवेकशक्तिमें भ्रम उत्पन्न कराकर उसे मिथ्या सुखोंका प्रलोभन देकर अपनी बातोंमें फँसा लें और उसे अपने गन्तव्य स्थानकी ओर न जाने देकर उसके विपरीत जंगलमें ले जायँ और उसका सर्वस्व लूटकर उसे गहरे गड़्ढेमें गिरा दें, उसी प्रकार ये राग-द्वेष कल्याणमार्गमें चलनेवाले साधकसे भेंट करके मित्रताका भाव दिखलाकर उसके मन और इन्द्रियोंमें प्रविष्ट हो जाते हैं और उसकी विवेकशक्तिको नष्ट करके तथा उसे सांसारिक विषयभोगोंके सुखका प्रलोभन देकर पापाचारमें प्रवृत्त कर देते हैं। इससे उसका साधन-क्रम नष्ट हो जाता है और पापोंके फलस्वरूप उसे घोर नरकोंमें पड़कर भयानक दु:खोंका उपभोग करना होता है। $. वैश्य और क्षत्रिय आदिकी अपेक्षा ब्राह्मणके विशेष धर्मोंमें अहिंसादि सदगुणोंकी बहुलता है, गृहस्थकी अपेक्षा संन्यास-आश्रमके धर्मोंमें सदगुणोंकी बहुलता है, इसी प्रकार शूद्रकी अपेक्षा वैश्य और क्षत्रियके कर्म अधिक गुणपयुक्त हैं। अत: यह भाव समझना चाहिये कि जो कर्म गुणयुक्त हों और जिनका अनुष्ठान भी पूर्णतया किया गया हो, किंतु वे अनुष्ठान करनेवालेके लिये विहित न हों, दूसरोंके लिये ही विहित हों, वैसे परधर्मकी अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म ही अति उत्तम है। जैसे देखनेमें कुरूप और गुणहीन होनेपर भी अपने पतिका सेवन करना ही स्त्रीके लिये कल्याणप्रद है, उसी प्रकार देखनेमें सदगुणोंसे हीन होनेपर तथा अनुष्ठानमें अंग-वैगुण्य हो जानेपर भी जिसके लिये जो कर्म विहित है, वही उसके लिये कल्याणप्रद है; फिर जो स्वधर्म सर्वगुणसम्पन्न है और जिसका सांगोपांग पालन किया जाता है, उसके विषयमें तो कहना ही क्या है? २. किसी प्रकारकी आपत्ति आनेपर मनुष्य अपने धर्मसे न डिगे और उसके कारण उसका मरण हो जाय तो वह मरण भी उसके लिये कल्याण करनेवाला हो जाता है। 3. मनुष्यको बिना इच्छा पापोंमें नियुक्त करनेवाला न तो प्रारब्ध है और न ईश्वर ही है, यह काम ही इस मनुष्यको नाना प्रकारके भोगोंमें आसक्त करके उसे बलात्‌ पापोंमें प्रवृत्त करता है; इसलिये यह महान्‌ पापी है। ४. इस कथनसे यह दिखलाया गया है कि यह काम ही मल, विक्षेप और आवरण--इन तीनों दोषोंके रूपमें परिणत होकर मनुष्यके ज्ञानको आच्छादित किये रहता है। यहाँ धुएँके स्थानमें 'विक्षेप" को समझना चाहिये। जिस प्रकार धूआँ चंचल होते हुए भी अग्निको ढक लेता है, उसी प्रकार “विक्षेप” चंचल होते हुए भी ज्ञानको ढके रहता है; क्योंकि बिना एकाग्रताके अन्त:करणमें ज्ञानशक्ति प्रकाशित नहीं हो सकती, वह दबी रहती है। मैलके स्थानमें मल" दोषको समझना चाहिये। जैसे दर्पणपर मैल जम जानेसे उसमें प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता, उसी प्रकार पापोंके द्वारा अन्तःकरणके अत्यन्त मलिन हो जानेपर उसमें वस्तु या कर्तव्यका यथार्थ स्वरूप प्रतिभासित नहीं होता। इस कारण मनुष्य उसका यथार्थ विवेचन नहीं कर सकता एवं जेरके स्थानमें 'आवरण” को समझना चाहिये। जैसे जेरसे गर्भ सर्वधा आच्छादित रहता है, उसका कोई अंश भी दिखलायी नहीं देता, वैसे ही आवरणसे ज्ञान सर्वथा ढका रहता है। जिसका अन्त:करण अज्ञानसे मोहित रहता है, वह मनुष्य निद्रा और आलस्यादिके सुखमें फँसकर किसी प्रकारका विचार करनेमें प्रवृत्त ही नहीं होता। $. यहाँ 'ज्ञानी' शब्द यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवाले विवेकशील साधकोंका वाचक है। यह कामरूप शत्रु उन साधकोंके अन्तःकरणमें विवेक, वैराग्य और निष्कामभावको स्थिर नहीं होने देता, उनके साधनमें बाधा उपस्थित करता रहता है। इस कारण इसको ज्ञानियोंका “नित्य वैरी” बतलाया गया है। २. यह “काम' मनुष्यके मन, बुद्धि और इन्द्रियोंमें प्रविष्ट होकर उसकी विवेकशक्तिको नष्ट कर देता है और भोगोंमें सुख दिखलाकर उसे पापोंमें प्रवृत्त कर देता है, जिससे मनुष्यका अध:पतन हो जाता है। इसलिये शीघ्र ही सचेत हो जाना चाहिये। ३. भगवानके निर्गुण-निराकार तत्त्वके प्रभाव, माहात्म्य और रहस्यसे युक्त यथार्थ ज्ञानको 'ज्ञान' तथा सगुण-निराकार और दिव्य साकार तत्त्वके लीला, रहस्य, गुण, महत्त्व और प्रभावसे युक्त यथार्थ ज्ञानको “विज्ञान” कहते हैं। इस ज्ञान और विज्ञानकी यथार्थ प्राप्तिके लिये हृदयमें जो आकांक्षा उत्पन्न होती है, उसको यह महान्‌ कामरूप शत्रु अपनी मोहिनी शक्तिके द्वारा नित्य-निरन्तर दबाता रहता है अर्थात्‌ उस आकांक्षाकी जागृतिसे उत्पन्न ज्ञान-विज्ञानके साधनोंमें बाधा पहुँचाता रहता है, इसी कारण ये प्रकट नहीं हो पाते, इसीलिये कामको उनका नाश करनेवाला बतलाया गया है। ४. आत्मा सबका आधार, कारण, प्रकाशक और प्रेरक तथा सूक्ष्म, व्यापक, श्रेष्ठ, बलवान्‌ और नित्य चेतन होनेके कारण उसे “अत्यन्त पर” कहा गया है। ५, शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और जीव--इन सभीका वाचक आत्मा है। उनमेंसे सर्वप्रथम इन्द्रियोंको वशमें करनेके लिये इकतालीसतवें श्लोकमें कहा जा चुका है। शरीर इन्द्रियोंके अन्तर्गत आ ही गया, जीवात्मा स्वयं वशमें करनेवाला है। अब बचे मन और बुद्धि, बुद्धिको मनसे बलवान्‌ कहा है; अतः इसके द्वारा मनको वशमें किया जा सकता है। इसीलिये “आत्मानम्‌' का अर्थ “मन” और “आत्मना' का अर्थ 'बुद्धि' किया गया है। ६. भगवानने गीताके छठे अध्यायमें मनको वशमें करनेके लिये अभ्यास और वैराग्य--ये दो उपाय बतलाये हैं (गीता ६।३५)। प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें मनुष्यका स्वाभाविक राग-द्वेष रहता है, विषयोंके साथ इन्द्रियोंका सम्बन्ध होते समय जब-जब राग-द्वेषका अवसर आवे, तब-तब बड़ी सावधानीके साथ बुद्धिसे विचार करते हुए राग-द्वेषके वशमें न होनेकी चेष्टा रखनेसे शनैः:-शनै: राग-द्वेष कम होते चले जाते हैं। यहाँ बुद्धिसे विचारकर इन्द्रियोंके भोगोंमें दुःख और दोषोंका बार-बार दर्शन कराकर मनकी उनमें अरुचि उत्पन्न कराना “वैराग्य” है और व्यवहारकालनमें स्वार्थके त्यागकी और ध्यानके समय मनको परमेश्वरके चिन्तनमें लगानेकी चेष्टा रखना और मनको भोगोंकी प्रवृत्तिसे हटाकर परमेश्वरके चिन्तनमें बार- बार नियुक्त करना “अभ्यास” है। अवश्य ही आत्मामें अनन्त बल है, वह कामको मार सकता है। वस्तुतः उसीके बलको पाकर सब बलवान्‌ और क्रियाशील होते हैं; परंतु वह अपने महान्‌ बलको भूल रहा है और जैसे प्रबल शक्तिशाली सम्राट्‌ अज्ञानवश अपने बलको भूलकर अपनी अपेक्षा सर्वथा बलहीन क्षुद्र नौकर-चाकरोंके अधीन होकर उनकी हाँ-में-हाँ मिला देता है, वैसे ही आत्मा भी अपनेको बुद्धि, मन और इन्द्रियोंके अधीन मानकर उनके कामप्रेरित उच्छृंखलतापूर्ण मनमाने कार्योंमें मूक अनुमति दे रहा है। इसीसे उन बुद्धि, मन और इन्द्रियोंके अंदर छिपा हुआ काम जीवात्माको विषयोंका प्रलोभन देकर उसे संसारमें फँसाता रहता है। अतएव यह आवश्यक है कि आत्मा अपने स्वरूपको और अपनी शक्तिको पहचानकर बुद्धि, मन और इन्द्रियोंको वशमें करे। अन्तमें इनको वशमें कर लेनेपर काम सहज ही मर सकता है। कामको मारनेका वस्तुतः अक्रिय आत्माके लिये यही तरीका है। इसलिये बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके कामको मारना चाहिये। अष्टाविशो< ध्याय: (श्रीमद्भगवद्गीतायां चतुर्थो5 ध्याय:) सगुण भगवान्‌के प्रभाव, निष्काम कर्मयोग तथा योगी महात्मा पुरुषोंके आचरण और उनकी महिमाका वर्णन करते हुए विविध यज्ञों एवं ज्ञानकी महिमाका वर्णन सम्बन्ध--गीताके तीसरे अध्यायके चौथे शलोकसे लेकर उनतीसवें #लोकतक भगवान्‌ने बहुत प्रकारसे विहित कमोंके आचरणकी आवश्यकताका प्रतिपादन करके तीसवें श्लोकमें अर्जुनकों भक्तिप्रधान कर्मयोयकी विधिसे ममता; आसक्ति और कामनाका सर्वथा त्याग करके भगवदर्पणबुद्धिये कर्म करनेकी आज्ञा दी। उसके बाद इकतीसवेंसे पैतीयवें *“लोकतक उस सिद्धान्तके अनुसार कर्म करनेवालोंकी प्रशंसा और न करनेवालोंकी निन्‍दा करके राग- द्वेषके वश्ें न होनेके लिये कहते हुए स्वधर्मपालनपर जोर दिया। फिर छत्तीसवें #लोकमें अर्जुनके पूछनेपर सैंतीसवेंसे अध्याय-समाप्तिपर्यन्त कामको सारे अनर्थोका हेतु बतलाकर बुद्धिके द्वारा इन्द्रियों और मनको वशमें करके उसे मारनेकी आज्ञा दी; परंतु कर्मयोगका तत्त्व बड़ा ही गहन है; इसलिये अब भगवान्‌ पुनः उसके सम्बन्धमे बहुत-सी बातें बतलानेके उद्देश्यसे उसीका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले तीन श्लोकोर्में उस कर्मयोगकी परम्परा बतलाकर उसकी अनादिता सिद्ध करते हुए प्रशंसा करते हैं-- श्रीभगवानुवाच इमं विवस्वते योगं* प्रोक्ततानहमव्ययम्‌ । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवे5ब्रवीत्‌,श्रीभगवान्‌ बोले--मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था, सूर्यने अपने पुत्र वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकुसे कहा

Arjuna said: Confused by the Lord’s earlier statements that seemed to alternately praise wisdom and urge action, Arjuna begins to question how these teachings fit together—whether he should renounce action or perform his duty in battle with the right understanding.

Verse 2

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु: । स कालेनेह महता योगो नष्ट: परंतप,हे परंतप अर्जुन! इस प्रकार परम्परासे प्राप्त इस योगको राजर्षियोंने जाना; किंतु उसके बाद वह योग बहुत कालसे इस पृथ्वीलोकमें लुप्तप्राय हो गयाः

This Yoga was handed down through an unbroken lineage, and the royal sages came to know it in that way. But with the passage of a long time in this world, that discipline was lost—O scorcher of foes—so its guiding ethical clarity faded from common practice.

Verse 3

इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‌्गीतापरवके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‌गीतोपनिषद्‌, श्रीकृष्णाजुनसंवादमें कर्मयोग नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ,स एवायं मया तेड्द्य योग: प्रोक्त: पुरातन: । भक्तोडसि मे सखा चेति रहस्यं होतदुत्तमम्‌

This very ancient discipline of yoga has now been taught by me to you today. Because you are my devoted follower and also my friend, I have disclosed to you this supreme secret—an ethical and spiritual teaching meant to guide action with inner clarity and loyalty to dharma even amid the pressures of war.

Verse 4

तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है; क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात्‌ गुप्त रखनेयोग्य विषय हैः ।। अजुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वत: । कथमेतद्‌ विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति,अर्जुन बोले--आपका जन्म तो अर्वाचीन--अभी हालका है और सूर्यका जन्म बहुत पुराना है अर्थात्‌ कल्पके आदिमें हो चुका था; तब मैं इस बातको कैसे समझूँ कि आपहीने कल्पके आदिदमें सूर्यसे यह योग कहा था? इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्धगवदगीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्तसु ब्रह्मुविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थो5ध्याय:

Arjuna said: “Your birth is recent, whereas the Sun-god’s birth is ancient. How am I to understand that you taught this Yoga to him in the beginning?”

Verse 5

श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप,श्रीभगवान्‌ बोले--हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैंः। उन सबको तू नहीं जानता, किंतु मैं जानता हूँ

The Blessed Lord said: “Arjuna, scorcher of foes, many births of Mine and of yours have passed. I know them all, but you do not know them.” In the ethical frame of the dialogue, Kṛṣṇa establishes His superior, continuous knowledge across lives, preparing Arjuna to trust divine guidance beyond ordinary human memory and to act in accordance with dharma rather than personal confusion.

Verse 6

सम्बन्ध-- भगवान्‌के मुखसे यह बात सुनकर कि अबतक मेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं. यह जाननेकी इच्छा होती है कि आपका जन्म किस प्रकार होता है और आपके जन्ममें तथा अन्य लोगोंके जन्ममें क्या भेद है। अतएव इस बातको समझानेके लिये भगवान्‌ अपने जन्मका तत्त्व बतलाते हैं-- अजोऊ5पि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्व॒रोडपि सन्‌ । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममाययाएें,मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूं

Arjuna said: Though You are unborn and of imperishable essence, and though You are the Lord of all beings, You still manifest by taking command of Your own primordial nature—appearing through Your own divine power. The ethical point is that the Lord’s embodiment is not compelled by karma like ordinary births; it is a purposeful self-manifestation for the protection of dharma and the guidance of beings.

Verse 7

सम्बन्ध-- इस प्रकार भगवान्‌के मुखये उनके जन्मका तत्त्व युननेपर यह जिज्ञासा होती है कि आप किस-किस समय और किन-किन कारणोंसे इस प्रकार अवतार धारण करते हैं। इसपर भगवान्‌ दो शलोकोंमें अपने अवतारके अवसर, हेतु और उद्देश्य बतलाते हैं-- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदा55त्मानं सृजाम्यहम्‌,हे भारत! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है,” तब-तब ही मैं अपने रूपको रचता हूँ अर्थात्‌ साकाररूपसे लोगोंके सम्मुख प्रकट होता हूँ

Whenever righteousness declines, O Bhārata, and unrighteousness rises in strength, then I bring forth Myself—manifesting in a tangible form before the world. The verse frames divine intervention not as arbitrary miracle, but as a moral response to systemic collapse: when ethical order falters and injustice becomes dominant, the Divine appears to restore balance and protect the conditions in which dharma can be lived.

Verse 8

परित्राणाय साधूनां: विनाशाय च दुष्कृताम्‌ः । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे,साधु पुरुषोंका उद्धार करनेके लिये, पाप-कर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी अच्छी तरहसे स्थापना करनेके लिये* मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ

To protect the righteous, to destroy those who commit wrongdoing, and to firmly re-establish dharma, I manifest myself age after age.

Verse 9

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सो<र्जुन,हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात्‌ निर्मल और अलौकिक हैं--इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है*, वह शरीरको त्यागकर फिर जन्मको प्राप्त नहीं होता; किंतु मुझे ही प्राप्त होता है

My birth and my actions are divine—pure and beyond ordinary limitation. Whoever truly understands this in its reality, after leaving the body does not enter another birth; rather, that person attains Me.

Verse 10

वीतरागभयक्रोधा मन्मयाः मामुपाश्रिता:३ | बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:

Freed from attachment, fear, and anger, absorbed in Me and taking refuge in Me, many have been purified by the austerity of true knowledge and have attained My state of being. The verse frames liberation as an ethical and inward transformation—mastery over passions and steadfast refuge—rather than mere ritual or external achievement.

Verse 11

पहले भी जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये थे और जो मुझमें अनन्यप्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहनेवाले बहुत-से भक्त उपर्युक्त ज्ञानरूप तपसे पवित्र होकर मेरे स्वरूपको प्राप्त हो चुके हैं ।। ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌ । मम वत्मनिवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:,हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ;* क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गकका अनुसरण करते हैं;

Arjuna, in whatever manner people approach and take refuge in Me, in that very manner I respond to them. For, in every way, all human beings are following My path—each according to their own disposition and chosen mode of seeking. Ethically, the verse affirms a reciprocal moral order: sincere intention and the form of one’s devotion shape the kind of divine guidance and fruition one receives, while all pursuits ultimately move within the larger framework of the Divine.

Verse 12

सम्बन्ध-- यदि यह बात है, तो फिर लोग भगवान्‌को न भजकर अन्य देवताओंकी उपासना क्यों करते हैं? इसपर कहते हैं-- काड्क्षन्त: कर्मणां सिद्धि यजन्त इह देवता: । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा,इस मनुष्यलोकमें कर्मोंके फलको चाहनेवाले लोग देवताओंका पूजन किया करते हैं; क्योंकि उनको कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है

Those who long for success in their actions worship the gods here in this human world, for the attainments born of action come quickly. The verse highlights a common ethical tendency: people often choose what yields immediate, visible results, even if it keeps their devotion tied to limited, outcome-driven aims rather than the highest good.

Verse 13

चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: । तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्‌

I have brought forth the fourfold social order, distributing it according to the differentiation of qualities and actions. Yet know Me also as its author—and at the same time as the non-agent, the imperishable: the source of order who remains untouched by the binding sense of doership.

Verse 14

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र--इन चार वर्णोंका समूह गुण और कर्मोंके विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है।* इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्मका कर्ता होनेपर भी मुझ अविनाशी परमेश्वरको तू वास्तवमें अकर्ता ही जानः ।। न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योडभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते,कर्मोके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते--इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोसे नहीं बँधता4

The fourfold social order—brāhmaṇa, kṣatriya, vaiśya, and śūdra—was brought forth by me, distinguished according to the distribution of qualities and the kinds of work they perform. Yet, though I am the source of that ordering, know me as truly non-doing and imperishable. Actions do not stain me, nor do I crave the fruits of action. Whoever understands me in this truth is likewise not bound by actions. Ethically, the teaching redirects Arjuna from anxiety about role and consequence toward disciplined duty without possessiveness, grounded in insight into the Lord’s transcendence.

Verse 15

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वरपि मुमुक्षुभि: । कुरु कर्मव तस्मात्त्व॑ पूर्व: पूर्वतरं कृतम्‌,पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किये हैं।* इसलिये तू भी पूर्वजोंद्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही कर

Knowing this, even the seekers of liberation in ancient times performed action. Therefore you too should perform action—indeed the very duties practiced from long ago by the forefathers—so that your conduct remains aligned with the established path of righteous living.

Verse 16

कि कर्म किमकर्मेति कवयो<प्यत्र मोहिता: । तत्‌ ते कर्म प्रवक्ष्यामि यजउज्ञात्वा मोक्ष्यसेडशुभात्‌,कर्म क्या है? और अकर्म क्‍या है?--इस प्रकार इसका निर्णय करनेमें बुद्धिमान्‌ पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिये वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभसे अर्थात्‌ कर्मबन्धनसे मुक्त हो जायगा

Arjuna said: “What is action, and what is non-action? Even the wise are bewildered here. Therefore I ask you to explain to me the true principle of action—knowing which I may be freed from what is inauspicious, namely the binding consequences of action.”

Verse 17

कर्मणो हाापि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण: । अकर्मणकश्ष बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति:,कर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये: और अकर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये* तथा विकर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये;४ क्योंकि कर्मकी गति गहन है

One must understand what action truly is, and also what wrongful or forbidden action is; and one must understand what non-action is as well—for the real course and consequence of action is profoundly subtle and difficult to discern.

Verse 18

सम्बन्ध-- इस प्रकार श्रोताके अन्तःकरणमें रुचि और श्रद्धा उत्पन्न करनेके लिये कर्मतत्वको गहन एवं उसका जानना आवश्यक बतलाकर अब अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार भगवान्‌ कर्मका तत्त्व समझाते हैं-- कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य: । स बुद्धिमान मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत्‌,जो मनुष्य कर्ममें अकर्म देखता है और जो अकर्ममें कर्म देखता है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मोंको करनेवाला हैः

The one who can discern non-action within action, and action within non-action, is truly wise among human beings. Such a person is disciplined in yoga and, though acting in the world, is understood to have accomplished the whole of action—because their deeds are performed with right understanding and without binding attachment.

Verse 19

सम्बन्ध-- इस प्रकार कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म-दर्शनका महत्त्व बतलाकर अब पाँच शलोकोंमें भिन्न-भिन्न शैलीसे उपर्युक्त कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनपूर्वक कर्म करनेवाले सिद्ध और साधक पुरुषोंकी असंगताका वर्णन करके उस विषयको स्पष्ट करते हैं-- यस्य सर्वे समारम्भा: कामसंकल्पवर्जिता: । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:,जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्पके होते हैं: तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निके द्वारा भस्म हो गये हैं,/ उस महापुरुषको ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं

The wise call that person a true sage whose every undertaking is free from desire and self-serving intention, and whose actions have been burned away in the fire of knowledge. Such a one still acts in the world according to what is right, yet remains inwardly unattached, because insight has dissolved the binding force of karma.

Verse 20

त्यक्त्वा कर्मफलासड़ूं नित्यतृप्तो निराश्रय: । कर्मण्यभिप्रवृत्तो5पियं नैव किंचित्‌ करोति सः,जो पुरुष समस्त कर्मोमें और उनके फलमें आसक्तिका सर्वथा त्याग करके संसारके आश्रयसे रहित हो गया है और परमात्मामें नित्यतृप्त है, वह कर्मोमें भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता

Arjuna said: One who has completely abandoned attachment to the fruits of action, who is ever content within, and who depends on nothing in the world—though fully engaged in action—truly does not act at all. Ethically, the verse points to inner freedom: when work is done without possessiveness and without craving for outcomes, the person remains unstained by action even while performing duties.

Verse 21

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रह:* । शारीरं केवल कर्म कुर्वन्‌ नाप्रोति किल्बिषम्‌,जिसका अन्तःकरण और इन्द्रियोंके सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगोंकी सामग्रीका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित पुरुष केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापको नहीं प्राप्त होताई

One who is free from expectation, who has mastered mind and self, and who has abandoned all possessiveness—such a person, even while performing only the actions required for maintaining the body, does not incur moral taint or sin. The teaching frames ethical action as duty done without craving or ownership, so that necessary work sustains life without binding the doer.

Verse 22

यदृच्छाला भसंतुष्टो: द्वन्द्धातीतो विमत्सर: । सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते,जो बिना इच्छाके अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थमें सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्याका सर्वथा अभाव हो गया है, जो हर्ष-शोक आदि द्वद्धोंसे सर्वथा अतीत हो गया है--ऐसा सिद्धि और असिद्धिमें सम रहनेवालाः कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधतारई

One who remains content with whatever comes unasked, who has gone beyond the pairs of opposites and is free from envy, and who stays even-minded in success and failure—such a practitioner of disciplined action, though acting, is not bound by action. In the war-setting of the Gītā’s counsel, this describes the inner freedom required to act rightly without being driven by craving, rivalry, or fear of outcomes.

Verse 23

गतसड्स्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतस: । यज्ञायाचरत: कर्म समग्र प्रविलीयते

For one who has gone beyond attachment, who is inwardly free, whose mind is firmly established in true knowledge, and who performs action as an offering to sacrifice (yajña), all karma is wholly dissolved—its binding residue does not cling, because the deed is done without possessiveness and for a sacred purpose rather than for personal gain.

Verse 24

२३ ।। सम्बन्ध-- पूर्वश्लीकर्में यह बात कही ययी कि यज्ञके लिये कर्म करनेवाले पुरुषके समस्त कर्म विलीन हो जाते हैं। वहाँ केवल अग्निरें हविका हवन करना ही यज्ञ है और उसका सम्पादन करनेके लिये की जानेवाली क्रिया ही यज्ञके लिये कर्म करना है, इतनी ही बात नहीं है; इसी भावको युस्पष्ट करनेके लिये अब भगवान्‌ सात श्लोकॉरमें भिन्न-भिन्न योगियोद्रारया किये जानेवाले परमात्माकी प्राप्तिके साधनरूप शास्त्रविह्ित कर्तव्यकर्मोका विभिन्न यज्ञोंके नामसे वर्णन करते हैं-- ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हवि््रह्याग्नौ ब्रह्मणा हुतम्‌ । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना,जिस यज्ञमें अर्पण अर्थात्‌ खुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किये जानेयोग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कतकि द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देना-रूप क्रिया भी ब्रह्म है--उस ब्रह्मकर्ममें स्थित रहनेवाले योगीद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है

In this sacrifice, the act of offering is Brahman; the oblation is Brahman; the fire into which it is offered is Brahman; and the one who offers is Brahman. For the yogin whose mind is absorbed in Brahman as action itself, the goal reached through such action is Brahman alone. Ethically, the verse reframes duty and ritual as a discipline of non-ego: when action is performed without possessiveness and with steady contemplative insight, it ceases to bind and becomes a means of liberation.

Verse 25

दैवमेवापरे यज्ञ योगिन: पर्युपासते । ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुद्धति,दूसरे योगीजन देवताओंके पूजनरूप यज्ञका ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं: और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मरूप अग्निमें अभेददर्शनरूप यज्ञके द्वारा ही आत्मरूप यज्ञका हवन किया करते हैं

Arjuna said: Some yogins worship the divine powers alone as their sacrificial offering; others, seeing Brahman as the very fire, pour the sacrifice into that fire by the sacrifice itself—offering the self through the act of inner worship. The teaching contrasts outward ritual directed to deities with inward sacrifice grounded in non-dual insight, presenting both as disciplined paths of reverent action.

Verse 26

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुद्धति । शब्दादीन्‌ विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्नति,अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियोंको संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं* और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयोंको इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं?

Arjuna said: Some practitioners offer the senses—beginning with hearing—into the fires of self-restraint; others offer the objects of sense—beginning with sound—into the fires of the senses. In this way, different yogins enact inner sacrifice: either by withdrawing the faculties into disciplined control, or by meeting sense-objects with purified, regulated perception so that desire is consumed rather than fed.

Verse 27

भीष्मपर्वणि तु सप्तविंशोडध्याय:,भीष्मपर्वमें सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुद्दति ज्ञानदीपिते दूसरे योगीजन इन्द्रियोंकी सम्पूर्ण क्रियाओंको और प्राणोंकी समस्त क्रियाओंको ज्ञानसे प्रकाशित आत्म-संयमयोगरूप अग्निमें हवन किया करते हैं?

Others, pursuing a disciplined inner path, offer as a sacrifice all the activities of the senses and even the functions of the vital breaths into the fire of self-restraint, kindled and illumined by knowledge. The ethical point is that true renunciation is not mere withdrawal from action, but the conscious consecration of one’s faculties—sense-impulses and life-forces—into a steady, knowing mastery of the self.

Verse 28

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्व॒ यतयः संशितव्रता:,कई पुरुष द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं," कितने ही तपस्यारूप यज्ञ करनेवाले हैं: तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करनेवाले हैं* और कितने ही अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतोंसे युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्याय-रूप ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं;

Arjuna said: Some perform sacrifice through material offerings; others make sacrifice through austerity. Still others undertake sacrifice through disciplined yoga. And there are striving ascetics of sharpened vows—committed to non-violence and other restraints—who offer the sacrifice of sacred study and the sacrifice of knowledge. The verse frames diverse spiritual disciplines as ethically meaningful “yajñas,” emphasizing inner purification and self-mastery alongside outward ritual.

Verse 29

अपाने जुद्वति प्राणं प्राणेडपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा:

Arjuna said: Some offer the outgoing breath into the incoming breath, and others offer the incoming breath into the outgoing. Restraining the courses of both inhalation and exhalation, they become wholly devoted to the discipline of breath-control—seeking inner mastery through regulated life-force rather than outward action.

Verse 30

अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुद्बति | सर्वेड्प्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा:

Others, disciplined in their intake of food, offer their very life-breaths into the life-breaths—practising inner sacrifice through regulated vital energies. All these, being knowers of sacrifice, have their impurities worn away by sacrificial discipline.

Verse 31

२९-३० ।। सम्बन्ध-- इस प्रकार यज्ञ करनेवाले साधकोंकी प्रशंसा करके अब उन यज्ञोंकी करनेसे होनेवाले लाभ और न करनेसे होनेवाली हानि दिखलाकर भगवान्‌ उपर्युक्त प्रकारसे यज्ञ करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन करते हैं-- यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्‌ | नायं लोको>स्त्ययज्ञस्य कुतो<न्य: कुरुसत्तम,हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं* और यज्ञ न करनेवाले पुरुषके लिये तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?

Those who partake of the nectar-like remnants of sacrifice—living on what is left after offering—attain the eternal Brahman. But for one who does not perform sacrifice, even this human world is not truly conducive to well-being; how then could any other world be so, O best of the Kurus?

Verse 32

सम्बन्ध-- सोलहवें श्लोकमें भगवान्‌ने यह बात कही थी कि मैं तुम्हें वह कर्मतत्व बतलाऊँगा; जिसे जानकर तुम अशुभसे मुक्त हो जाओगे। उस प्रतिज्ञाके अनुसार अठारहवें श्लोकसोे यहाँतक उस कर्मतत््वका वर्णन करके अब उसका उपसंहार करते हैं-- एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्‌ विद्धि तान्‌ स्वनिवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे,इसी प्रकार और भी बहुत तरहके यज्ञ वेदकी वाणीमें विस्तारसे कहे गये हैं। उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीरकी क्रियाद्वारा सम्पन्न होनेवाले जान; इस प्रकार तत्त्वसे जानकर उनके अनुष्ठानद्वारा तू कर्माबन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जायगा

Arjuna said: “Thus, many kinds of sacrificial disciplines are set forth in the mouth of the Veda. Know all of them to arise from action—performed through body, senses, and mind. When you understand this truth and undertake them in that spirit, you will be released from the bondage of karma.”

Verse 33

सम्बध--यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उन यज्ञोंगेंसे कौन-सा यज्ञ श्रेष्ठ है। इसपर भगवान्‌ कहते हैं-- श्रेयान्‌ द्रव्यमयाद्‌ यज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परंतप | सर्व क्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते,है परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ हैः तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञानमें समाप्त हो जाते हैं:

The Blessed Lord said: “O scorcher of foes, the sacrifice offered through knowledge is superior to the sacrifice made of material offerings. For, O Pārtha, all action in its entirety finds its culmination and completion in knowledge.”

Verse 34

तद्‌ विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्ननेन" सेवया5 । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन:,उस ज्ञानको तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियोंक पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत्‌ प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे वे परमात्मतत्त्वको भलीभाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञानका उपदेश करेंगे

Know that truth by approaching a realized teacher: bow down in reverence, inquire with sincere and searching questions, and render service. Those wise ones who have directly seen reality will instruct you in true knowledge.

Verse 35

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्थात्मन्यथो मयि,जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार मोहको नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन! जिस ज्ञानके द्वारा तू सम्पूर्ण भूतोंको निःशेषभावसे पहले अपनेमें? और पीछे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें देखेगाई

Knowing this, O son of Pāṇḍu, you will not again fall into delusion in this way. By this knowledge you will see all beings without remainder—first within your own Self, and then in Me.

Verse 36

अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम: । सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि,यदि तू अन्य सब पापियोंसे भी अधिक पाप करनेवाला है, तो भी तू ज्ञारूप नौकाद्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्रसे भलीभाँति तर जायगाउ

Arjuna said: Even if you are the most sinful of all sinners, you will still cross over all wrongdoing by the boat of complete knowledge alone. The verse affirms that true spiritual knowledge has the power to carry a person beyond even the gravest moral burden, offering ethical renewal rather than despair.

Verse 37

यथैधांसि समिद्धो<ग्निर्भस्मसात्कुरुतेडर्जुन । ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा,क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रजजलित अग्नि ईंधनोंको भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको भस्ममय कर देता हैः

Arjuna, just as a blazing fire reduces fuel to ashes, so too the fire of true knowledge reduces all actions—and their binding consequences—to ashes. In the midst of war, this teaching redirects attention from mere outward deeds to the inner freedom that comes when wisdom dissolves the roots of karmic bondage.

Verse 38

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्‌ स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति,इस संसारमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञानको कितने ही कालसे कर्मयोगके द्वारा शुद्धान्त:करण हुआ मनुष्य अपने- आप ही आत्मामें पा लेता है:

For in this world there is nothing as purifying as knowledge. That knowledge, in due course, is found within the Self by one who has been perfected through yoga—whose inner being has been refined by disciplined action and steady practice.

Verse 39

श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति,जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान्‌” मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है तथा ज्ञानको प्राप्त होकर वह बिना विलम्बके--तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है

Arjuna said: The person who is endowed with faith, devoted to that (teaching and its practice), and self-controlled in the senses attains true knowledge. Having gained that knowledge, he soon reaches the highest peace—peace that culminates in realization of the Supreme.

Verse 40

अज्ञक्षाश्रद्धानक्ष संशयात्मा विनश्यति । नायं लोको<5स्ति न परो न सुखं संशयात्मन:,विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थसे अवश्य भ्रष्ट हो जाता है।* ऐसे संशययुक्त मनुष्यके लिये न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही हैः

Arjuna said: The ignorant person, lacking faith and ruled by doubt, comes to ruin. For one whose inner self is dominated by doubt, there is neither fulfillment in this world nor any good in the next—nor even happiness.

Verse 41

किंतु हे धनंजय! जिसने कर्मयोगकी विधिसे समस्त कर्मोंका परमात्मामें अर्पण कर दिया हैः और जिसने विवेकद्वारा समस्त संशयोंका नाश कर दिया है,* ऐसे वशमें किये हुए अन्तःकरणवाले पुरुषको कर्म नहीं बाँधतेः

But, O Dhanañjaya, the person who—according to the discipline of karma-yoga—has offered all actions to the Supreme Self, and who has destroyed every doubt through discerning wisdom: for such a one, whose inner instrument is brought under mastery, actions do not bind. The ethical point is that responsibility in action remains, yet the bondage of action falls away when deeds are surrendered to the Highest and guided by clear understanding rather than confusion or self-interest.

Verse 42

तस्मादज्ञानसम्भूत॑ हृत्स्थं ज्ञानासिना55त्मन: । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्लोत्तिष्ठ भारत,इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन! तू हृदयमें स्थित इस अज्ञानजनित अपने संशयका विवेकज्ञानरूप तलवारद्वारा छेदन करके* समत्वरूप कर्मयोगमें स्थित हो जा और युद्धके लिये खड़ा हो जा

Verse 412

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्‌ । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय

Arjuna said: One who has laid down all actions into Yoga, whose doubts have been cut apart by true knowledge, and who is self-possessed—such a person is not bound by actions, O Dhanañjaya. In the ethical frame of the Gītā’s battlefield teaching, this declares that inner freedom comes not from abandoning duty, but from performing it without possessive attachment, with clarity of understanding and mastery of the self.

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns feasibility and stability: Arjuna accepts the ideal of equanimous yoga but questions how an inherently restless mind can sustain it, and what ethical-spiritual status applies to an aspirant who strives sincerely yet does not reach completion.

Yoga is operationalized as disciplined attention and equanimity grounded in non-attachment: steady practice (abhyāsa) paired with dispassion (vairāgya), supported by moderation and repeated mental redirection, yields inner peace and a universalized vision of the self in all beings.

Rather than a formal phalaśruti formula, the chapter provides a doctrinal assurance: constructive spiritual effort is not nullified; even if practice is interrupted, the aspirant attains supportive conditions in subsequent life and progresses toward final attainment, with devotionally oriented yoga described as the highest integration.