Adhyaya 33
Vana ParvaAdhyaya 3391 Verses

Adhyaya 33

अध्याय ३३ — कर्म, दैव, हठ, स्वभाव और पुरुषार्थ पर द्रौपदी का उपदेश (Draupadī on Action, Fate, and Human Effort)

Upa-parva: Draupadī–Yudhiṣṭhira Saṃvāda (Karma–Daiva–Puruṣakāra Discourse)

Draupadī, speaking to Yudhiṣṭhira, begins by disclaiming contempt for dharma and for the cosmic governor (Prajāpati/Īśvara), framing her speech as the lament of one in distress. She advances a sustained thesis that embodied beings must act: only immobile entities ‘live’ without action, whereas humans seek livelihood and posthumous good through karma. She critiques two extremes—exclusive reliance on fate (diṣṭa/daiva) and rigid haṭha—praising instead karmabuddhi, a reasoned commitment to effort. The chapter classifies perceived sources of results: daiva (divine ordinance), haṭha (force/contingency), svabhāva (disposition), and intentional karma, while also integrating the doctrine of prior action (pūrvakarma) and the distributing role of Dhātā. Practical illustrations (the farmer who ploughs and sows yet depends on rain) show that effort is necessary though not always sufficient; therefore one should avoid self-reproach when outcomes fail despite proper action. The discourse concludes with counsel against lassitude, advocating vigilance, contextual planning (deśa-kāla-upāya), and sustained utthāna as the only viable path to stability and dignity in exile.

Chapter Arc: वन के तपोवन-जीवन में भीमसेन का धधकता प्रश्न उठता है—राज्य छिन गया, अपमान सहा गया; क्या अब भी क्षत्रिय-धर्म का मौन ही उचित है? → भीम युधिष्ठिर को स्मरण कराता है कि दुर्योधन ने धर्म, सरलता या बल से नहीं, बल्कि अक्षकूट (कपट-युक्त जुए) से राज्य छीना; और यह भी कि उसी समय धृतराष्ट्र-पुत्रों का वध न कर पाने का पश्चात्ताप अब भीतर-ही-भीतर जलाता है। वह युधिष्ठिर की दया-प्रधान नीति को ‘पुरुषार्थ-दुर्बल’ बताकर तीखे शब्दों में चुनौती देता है—राजा होकर भी तुम हमारे पराक्रम को देखकर अनर्थ नहीं समझते। → भीम का निर्णायक आह्वान—‘धर्म्या पदवीं’ अर्थात् सत्पुरुषोचित राजपथ पर लौटो; तपोवन में धर्म-काम-अर्थ से हीन होकर रहने का क्या प्रयोजन? वह चेतावनी देता है कि स्वधर्म से विचलन लोक-हास्य का कारण बनेगा, और फिर रणनीतिक आश्वासन जोड़ता है—सृञ्जय, कैकेय, वृष्णियों के वृषभ (कृष्ण) आदि सहयोगियों के साथ बलपूर्वक शत्रु-हस्तगत भूमि को वापस लाया जा सकता है। → अध्याय का अंत भीम के तर्क-प्रहार और युद्ध-प्रेरणा पर टिकता है—युधिष्ठिर के सामने धर्म की एक कठोर व्याख्या रख दी जाती है: क्षत्रिय के लिए राज्य-रक्षा और अन्याय-प्रतिरोध भी धर्म है; केवल सहनशीलता नहीं। → युधिष्ठिर इस उग्र प्रेरणा को कैसे ग्रहण करेंगे—क्या वे प्रतिज्ञा-धर्म और क्षत्रिय-धर्म के बीच संतुलन साधेंगे, या भीम की राह पर तत्काल प्रतिकार का संकल्प लेंगे?

Shlokas

Verse 1

#:73:.7 #::3-...7 (0) हि २ 7 त्रयस्त्रिंशो5 ध्याय: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध वैशम्पायन उवाच याज्ञसेन्या वच: श्रुत्वा भीमसेनो हामर्षण: । निःश्वसन्नुपसंगम्य क्रुद्धो राजानमब्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ट्रपदकुमारीका वचन सुनकर अमर्षमें भरे हुए भीमसेन क्रोधपूर्वक उच्छवास लेते हुए राजाके पास आये और इस प्रकार कहने लगे --

Vaiśampāyana berkata: Wahai Janamejaya! Mendengar kata-kata Yājñasenī (Draupadī), Bhīmasena yang menyala oleh amarah dan kehinaan mendekati sang raja, terengah-engah karena murka, lalu berkata demikian.

Verse 2

राज्यस्य पदवीं धर्म्या ब्रज सत्पुरुषोचिताम्‌ | धर्मकामार्थहीनानां कि नो वस्तुं तपोवने,“महाराज! श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये उचित और धर्मके अनुकूल जो राज्य-प्राप्तिका मार्ग (उपाय) हो, उसका आश्रय लीजिये। धर्म, अर्थ और काम--इन तीनोंसे वंचित होकर इस तपोवनमें निवास करनेपर हमारा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा

Wahai Maharaja! Tempuhlah jalan yang benar untuk merebut kembali kerajaan—jalan yang pantas bagi insan mulia dan selaras dengan dharma. Sebab bila kita tinggal di rimba tapa ini tanpa dharma, artha, dan kāma, tujuan apakah yang akan tercapai bagi kita?

Verse 3

नैव धर्मेण तद्‌ राज्यं नार्जवेन न चौजसा | अक्षकूटमधिष्ठाय हतं दुर्योधनेन वै,“दुर्योधनने धर्मसे, सरलतासे और बलसे भी हमारे राज्यको नहीं लिया है; उसने तो कपटपूर्ण जूएका आश्रय लेकर उसका हरण कर लिया है

Duryodhana tidak merampas kerajaan itu dari kita dengan dharma, bukan pula dengan kelurusan, dan bukan dengan kekuatan. Ia merebutnya semata-mata dengan bersandar pada tipu daya permainan dadu.

Verse 4

गोमायुनेव सिंहानां दुर्बलेन बलीयसाम्‌ । आमिषं विघसाशेन तद्वद्‌ राज्यं हि नो हृतम्‌,“बचे हुए अन्नको खानेवाले दुर्बल गीदड़ जैसे अत्यन्त बलिष्ठ सिंहोंका भोजन हर लें, उसी प्रकार शत्रुओंने हमारे राज्यका अपहरण किया है

Seperti seekor serigala-jakal yang lemah, pemakan sisa-sisa, merampas daging yang seharusnya menjadi santapan singa-singa perkasa—demikianlah musuh telah merenggut kerajaan kita.

Verse 5

धर्मलेशप्रतिच्छन्न: प्रभवं धर्मकामयो: । अर्थमुत्सृज्य कि राजन्‌ दुःखेषु परितप्यसे,“महाराज! धर्म और कामके उत्पादक राज्य और धनको खोकर लेशमात्र धर्मसे आवृत हुए अब आप क्‍यों दुःखसे संतप्त हो रहे हैं?

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, setelah engkau menanggalkan harta dan kedaulatan—sumber penopang dharma dan hasrat—kini engkau hanya terselubung oleh sekelumit dharma. Mengapa, di tengah derita ini, engkau masih terbakar oleh duka?”

Verse 6

भवतो5नवधानेन राज्यं न: पश्यतां हृतम्‌ | अहार्यमपि शक्रेण गुप्तं गाण्डीवधन्चना,“गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा सुरक्षित हमारे राज्यको इन्द्र भी नहीं छीन सकते थे, परंतु आपकी असावधानीसे वह हमारे देखते-देखते छिन गया

Waiśampāyana berkata: “Karena kelengahanmu, kerajaan kita dirampas di depan mata kita. Kerajaan yang dijaga Arjuna, pemegang Gāṇḍīva, bahkan Indra pun takkan mampu merebutnya; namun oleh kelalaianmu ia terlepas dari genggaman.”

Verse 7

कुणीनामिव बिल्वानि पड्गूनामिव धेनव: । ह्ृतमैश्वर्यमस्माकं जीवतां भवत:ः कृते,'जैसे लूलोंके पाससे उनके बेलफल और पंगुओंके निकटसे उनकी गायें छिन जाती हैं और वे जीवित रहकर भी कुछ कर नहीं पाते, उसी प्रकार आपके कारण जीते-जी हमारे राज्यका अपहरण कर लिया गया

Seperti buah bilva direnggut dari orang lumpuh, dan sapi dirampas dari orang pincang—mereka hidup namun tak berdaya—demikian pula, karena engkau, kemuliaan dan kekuasaan kami direnggut selagi kami masih bernyawa.

Verse 8

भवत: प्रियमित्येवं महद्‌ व्यसनमीदृशम्‌ । धर्मकामे प्रतीतस्य प्रतिपन्ना: सम भारत,भारत! आप धर्मकी इच्छा रखनेवाले हैं; इस रूपमें आपकी प्रसिद्धि है। अतः आपकी प्रिय अभिलाषा सिद्ध हो, इसीलिये हमलोग ऐसे महान्‌ संकटमें पड़ गये हैं

Wahai Bhārata, engkau termasyhur sebagai pencari dharma. Demi terpenuhinya kehendakmu yang tercinta, kami pun terjerumus ke dalam malapetaka sebesar ini.

Verse 9

कर्शयाम: स्वमित्राणि नन्दयामश्न शात्रवान्‌ । आत्मानं भवतां शास्त्रैर्नियम्य भरतर्षभ,“भरतकुलभूषण! आपके शासनसे अपने-आपको नियन्त्रणमें रखकर आज हमलोग अपने मित्रोंको दुःखी और शत्रुओंको सुखी बना रहे हैं

Wahai banteng di antara kaum Bharata, dengan mengekang diri menurut titahmu dan ketentuan śāstra, hari ini kami justru menyusahkan sahabat-sahabat kami dan menggembirakan musuh-musuh kami.

Verse 10

यद्‌ वयं न तदैवैतान्‌ धार्तराष्ट्रानू निहन्महि । भवत: शास्त्रमादाय तन्नस्तपति दुष्कृतम्‌,“आपके शासनको मानकर जो हमलोगोंने उसी समय इन धृतराष्ट्रपुत्रोंकी मार नहीं डाला, वह दुष्कर्म हमें आज भी संताप दे रहा है

Waiśampāyana berkata: “Karena menaati titahmu, kami tidak membunuh putra-putra Dhṛtarāṣṭra pada saat itu juga; perbuatan salah itulah yang hingga kini membakar kami dengan sesal.”

Verse 11

अथैनामन्ववेक्षस्व मृगचर्यामिवात्मन: । दुर्बलाचरितां राजन्‌ न बलस्थैनिषिविताम्‌,“राजन! मृगोंके समान अपनी इस वनचर्यापर ही दृष्टिपात कीजिये। दुर्बल मनुष्य ही इस प्रकार वनमें रहकर समय बिताते हैं। बलवान्‌ मनुष्य वनवासका सेवन नहीं करते

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, perhatikanlah sungguh-sungguh hidupmu di rimba ini—laksana jelajah rusa liar. Menghabiskan hari-hari di hutan seperti ini adalah laku orang lemah; bukan jalan yang ditempuh mereka yang berdaya.”

Verse 12

यां न कृष्णो न बीभत्सुर्नाभिमन्युर्न सूंजया: । न चाहमभिनन्दामि न च माद्रीसुतावुभौ,“श्रीकृष्ण, अर्जुन, अभिमन्यु, सूंजयवंशी वीर, मैं और ये नकुल-सहदेव--कोई भी इस वनचर्याको पसंद नहीं करते

Waiśampāyana berkata: “Hidup mengembara di hutan ini tidak disetujui oleh Kṛṣṇa, tidak pula oleh Arjuna (Bībhatsu), tidak oleh Abhimanyu, dan tidak oleh para pahlawan Sūṃjaya; aku pun tidak menyukainya, demikian pula kedua putra Mādrī—Nakula dan Sahadeva.”

Verse 13

भवान्‌ धर्मो धर्म इति सततं व्रतकर्शित: । कच्चिद्‌ राजन न निर्वेदादापन्न: क्लीबजीविकाम्‌,“राजन! आप “यह धर्म है, यह धर्म है', ऐसा कहकर सदा व्रतोंका पालन करके कष्ट उठाते रहते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप वैराग्यके कारण साहसशून्य हो नपुंसकोंका- सा जीवन व्यतीत करने लगे हों?

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, engkau terus-menerus berkata ‘dharma, dharma’ dan menyusut karena laku tapa dan brata. Jangan-jangan karena kejenuhan batin engkau jatuh pada hidup tanpa keberanian—laksana seorang pengecut?”

Verse 14

दुर्मनुष्या हि निर्वेदमफलं स्वार्थधातकम्‌ | अशक्ता: श्रियमाहर्तुमात्मन: कुर्वते प्रियम्‌,“अपनी खोयी हुई राज्यलक्ष्मीका उद्धार करनेमें असमर्थ दुर्बल मनुष्य ही निष्फल और स्वार्थनाशक वैराग्यका आश्रय लेते हैं और उसीको प्रिय मानते हैं

Waiśampāyana berkata: “Sesungguhnya, orang-orang lemah dan berhati rendah—yang tak sanggup merebut kembali kemuliaan kerajaan yang hilang—berlindung pada ‘detasemen’ yang mandul dan merusak kepentingan diri; lalu justru mencintainya seakan itu kebajikan.”

Verse 15

स भवान्‌ दृष्टिमाछछक्त: पश्यन्नस्मासु पौरुषम्‌ | आनृशंस्यपरो राजन्‌ नानर्थमवबुध्यसे,“राजन! आप समझदार, दूरदर्शी और शक्तिशाली हैं, हमारे पुरुषार्थको देख चुके हैं; तो भी इस प्रकार दयाको अपनाकर इससे होनेवाले अनर्थको नहीं समझ रहे हैं

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, engkau tajam budi dan mampu; engkau telah menyaksikan keperkasaan serta keteguhan tekad kami. Namun, karena berpegang pada belas kasih yang keliru, engkau tidak menyadari mudarat dan kekacauan yang akan timbul darinya.”

Verse 16

अस्मानमी धार्तराष्ट्रा: क्षममाणानलं सतः । अशक्तानिव मन्यन्ते तद्‌ दुःखं नाहवे वध:,“हम शत्रुओंके अपराधको क्षमा करते जा रहे हैं, इसलिये समर्थ होते हुए भी हमें ये धृतराष्ट्रके पुत्र निर्बल-से मानने लगे हैं, यही हमारे लिये महान्‌ दुःख है; युद्धमें मारा जाना कोई दुःख नहीं है

Vaiśampāyana berkata: “Karena kami terus-menerus memaafkan pelanggaran putra-putra Dhṛtarāṣṭra, mereka kini mengira kami—padahal mampu—seolah-olah tak berdaya. Itulah duka kami yang sesungguhnya; gugur di medan perang bukanlah duka.”

Verse 17

तत्र चेद्‌ युध्यमानानामजिह्यमनिवर्तिनाम्‌ | सर्वशो हि वध: श्रेयान्‌ प्रेत्मय लोकान्‌ लभेमहि,“ऐसी दशामें यदि हम पीठ न दिखाकर युद्धमें निष्कपटभावसे लड़ते रहें और उसमें हमारा वध भी हो जाय तो वह कल्याणकारक है; क्योंकि युद्धमें मरनेसे हमें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होगी

Vaiśampāyana berkata: “Dalam keadaan demikian, bila kami terus bertempur tanpa membelakangi musuh—lurus hati dan tak tergoyahkan—maka sekalipun kami terbunuh, itulah jalan yang lebih baik; sebab gugur di medan perang akan mengantarkan kami, setelah wafat, ke alam-alam yang luhur.”

Verse 18

अथवा वयमेवैतान्‌ निहत्य भरतर्षभ । आददीमटहि गां सर्वा तथापि श्रेय एव न:,“अथवा भरतश्रेष्ठ! यदि हम ही इन शत्रुओंको मारकर सारी पृथ्वी ले लें तो वही हमारे लिये कल्याणकर है

Vaiśampāyana berkata: “Atau, wahai yang termulia di antara Bharata, biarlah kami sendiri menumpas para musuh ini dan merebut seluruh bumi; sekalipun demikian, itulah juga yang menjadi kesejahteraan kami.”

Verse 19

सर्वथा कार्यमेतन्न: स्वधर्ममनुतिष्ठताम्‌ । काडुक्षतां विपुलां कीर्ति वैरं प्रतिचिकीर्षताम्‌,“हम अपने क्षत्रिय-धर्मके अनुष्ठानमें संलग्न हो वैरका बदला लेना चाहते हैं और संसारमें महान्‌ यशका विस्तार करनेकी अभिलाषा रखते हैं, अतः हमारे लिये सब प्रकारसे युद्ध करना ही उचित है

Vaiśampāyana berkata: “Bagi kami, dalam segala hal, inilah jalan yang patut—tetap menegakkan dharma kami sendiri, menghendaki pembalasan atas permusuhan, dan mendambakan kemasyhuran yang luas; maka bagi kami, berperanglah yang layak.”

Verse 20

आत्मार्थ युध्यमानानां विदिते कृत्यलक्षणे | अन्यैरपि हूते राज्ये प्रशंसैव न गर्हणा,'शत्रुओंने हमारे राज्यको छीन लिया है, ऐसे अवसरपर यदि हम अपने कर्तव्यको समझकर अपने लाभके लिये ही युद्ध करें तो भी इसके लिये जगत्‌में हमारी प्रशंसा ही होगी, निन्‍्दा नहीं होगी

Musuh telah merampas kerajaan kita. Pada saat seperti ini, bila kita memahami kewajiban dan berperang demi kepentingan diri sendiri sekalipun, dunia akan memuji kita—bukan mencela.

Verse 21

कर्शनार्थोीं हि यो धर्मो मित्राणामात्मनस्तथा । व्यसनं नाम तद्‌ राजन्‌ न धर्म: स कुधर्म तत्‌,“महाराज! जो धर्म अपने तथा मित्रोंके लिये क्लेश उत्पन्न करनेवाला हो, वह तो संकट ही है। वह धर्म नहीं, कुधर्म है

Wahai Raja! ‘Dharma’ yang menimbulkan penderitaan bagi diri sendiri dan bagi sahabat-sahabatnya, sesungguhnya hanyalah malapetaka. Itu bukan dharma—melainkan kudharma.

Verse 22

सर्वथा धर्मनित्यं तु पुरुष धर्मदुर्बलम्‌ त्यजतस्तात धर्मार्थो प्रेत दुःखसुखे यथा,“तात! जैसे मुर्दोकी दुःख और सुख दोनों नहीं होते, उसी प्रकार जो सर्वथा और सर्वदा धर्ममें ही तत्पर रहकर उसके अनुष्ठानसे दुर्बल हो गया है, उसे धर्म और अर्थ दोनों त्याग देते हैं

Wahai anak! Seperti orang mati yang tak mengenal duka maupun suka, demikian pula orang yang senantiasa terpaku pada dharma hingga menjadi lemah oleh pelaksanaannya—akan ditinggalkan oleh dharma dan artha, keduanya.

Verse 23

यस्य धर्मो हि धर्मार्थ क्लेशभाड़ू न स पण्डित: । न स धर्मस्य वेदार्थ सूर्यस्यान्ध: प्रभामिव,जिसका धर्म केवल धर्मके लिये ही होता है, वह धर्मके नामपर केवल क्लेश उठानेवाला मानव बुद्धिमान नहीं है। जैसे अन्धा सूर्यकी प्रभाको नहीं जानता, उसी प्रकार वह धर्मके अर्थको नहीं समझता है

Seseorang yang ‘dharmanya’ dijalankan hanya demi label dharma semata—hingga menjadi beban penderitaan—bukanlah orang bijak. Ia tak memahami makna dharma, sebagaimana orang buta tak dapat menangkap sinar matahari.

Verse 24

यस्य चार्थार्थमेवार्थ: स च नार्थस्य कोविद: । रक्षेत भूतको5रण्ये यथा गास्तादूगेव सः,“जिसका धन केवल धनके ही लिये है, दान आदिके लिये नहीं है, वह धनके तत्त्वको नहीं जानता। जैसे सेवक (ग्वालिया) वनमें गौओंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार वह भी उस धनका दूसरेके लिये रक्षकमात्र है

Orang yang memandang harta hanya demi harta itu sendiri—bukan untuk tujuan luhur seperti memberi dan pemakaian yang benar—tidak memahami hakikat kekayaan. Seperti gembala upahan yang menjaga sapi di hutan untuk orang lain, ia hanyalah penjaga harta yang pada akhirnya menjadi milik pihak lain.

Verse 25

अतिवेलं हि योर्दशर्थार्थी नेतरावनुतिष्ठति । स वध्य: सर्वभूतानां ब्रह्म॒हेव जुगुप्सित:,'जो केवल अर्थके ही संग्रहकी अत्यन्त इच्छा रखनेवाला है और धर्म एवं कामका अनुष्ठान नहीं करता है, वह ब्रह्महत्यारेके समान घृणाका पात्र है और सभी प्राणियोंके लिये वध्य है

Barangsiapa hanya bernafsu menimbun artha (harta) secara berlebihan dan tidak menunaikan dharma serta kāma, ia tercela laksana pembunuh brahmana, dan patut dihukum oleh segenap makhluk.

Verse 26

सतत यश्च कामार्थी नेतरावनुतिष्ठति । मित्राणि तस्य नश्यन्ति धर्मार्थभ्यां च हीयते,“इसी प्रकार जो निरन्तर कामकी ही अभिलाषा रखकर धर्म और अर्थका सम्पादन नहीं करता, उसके मित्र नष्ट हो जाते हैं (उसको त्यागकर चल देते हैं) और वह धर्म एवं अर्थ दोनोंसे वंचित ही रह जाता है

Demikian pula, siapa yang terus-menerus hanya mengejar kāma (kenikmatan) dan tidak menegakkan dharma serta artha, sahabat-sahabatnya akan lenyap; ia pun kehilangan dharma dan artha keduanya.

Verse 27

तस्य धर्मार्थहीनस्य कामान्ते निधन ध्रुवम्‌ । कामतो रममाणस्य मीनस्येवाम्भस: क्षये,“जैसे पानी सूख जानेपर उसमें रहनेवाली मछलीकी मृत्यु निश्चित है, उसी प्रकार जो धर्म-अर्थसे हीन होकर केवल काममें ही रमण करता है, उस काम (भोगसामग्री)-की समाप्ति होनेपर उसकी भी अवश्य मृत्यु हो जाती है

Bagi orang yang tanpa dharma dan artha namun hanya bersenang dalam kāma, kematian pasti datang ketika kenikmatan itu berakhir; sebagaimana ikan yang hidup di air niscaya mati saat air mengering.

Verse 28

तस्माद्‌ धर्मार्थयोर्नित्यं न प्रमाद्यन्ति पण्डिता: । प्रकृति: सा हि कामस्य पावकस्यारणिरयथा,“इसलिये विद्वान्‌ पुरुष कभी धर्म और अर्थके सम्पादनमें प्रमाद नहीं करते हैं। धर्म और अर्थ कामकी उत्पक्तिके स्थान हैं (अर्थात्‌ धर्म और अर्थसे ही कामकी सिद्धि होती है) जैसे अरणि अग्निका उत्पत्तिस्थान है

Karena itu orang bijak tak pernah lalai menjaga dan menegakkan dharma serta artha; sebab dharma dan artha adalah sumber lahirnya kāma, sebagaimana araṇi (kayu penggesek) melahirkan api.

Verse 29

सर्वथा धर्ममूलो<र्थों धर्मश्चार्थपरिग्रह: । इतरेतरयोर्नीतौ विद्धि मेघोदधी यथा,“अर्थका कारण है धर्म और धर्म सिद्ध होता है अर्थसंग्रहसे। जैसे मेघसे समुद्रकी पुष्टि होती है और समुद्रसे मेघकी पूर्ति। इस प्रकार धर्म और अर्थको एक-दूसरेके आश्रित समझना चाहिये

Artha pada segala hal berakar pada dharma, dan dharma pun diteguhkan oleh penghimpunan artha. Ketahuilah, keduanya saling menopang—laksana awan dan samudra yang saling menggenapi.

Verse 30

द्रव्यार्थस्पर्शसंयोगे या प्रीतिरुपजायते । स कामश्रित्तसंकल्प: शरीरं नास्य दृश्यते,स्त्री, माला, चन्दन आदि द्रव्योंके स्पर्श और सुवर्ण आदि धनके लाभसे जो प्रसन्नता होती है, उसके लिये जो चित्तमें संकल्प उठता है, उसीका नाम काम है। उस कामका शरीर नहीं देखा जाता (इसीलिये वह “अनंग” कहलाता है)

Waiśampāyana berkata: “Ketika sentuhan dan pergaulan dengan benda-benda yang diingini serta kenikmatan melahirkan kegembiraan, maka tekad batin yang condong kepada kenikmatan itu disebut kāma (hasrat). Hasrat itu tidak memiliki tubuh yang tampak; ia tidak terlihat sebagai wujud jasmani.”

Verse 31

अर्थार्थी पुरुषो राजन्‌ बृहन्तं धर्ममिच्छति । अर्थमिच्छति कामार्थी न कामादन्यमिच्छति,“राजन! धनकी इच्छा रखनेवाला पुरुष महान्‌ धर्मकी अभिलाषा रखता है और कामार्थी मनुष्य धन चाहता है। जैसे धर्मसे धनकी और धनसे कामकी इच्छा करता है, उस प्रकार वह कामसे किसी दूसरी वस्तुकी इच्छा नहीं करता है

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, orang yang mengejar harta juga menginginkan dharma yang luhur; sedangkan pencari kenikmatan menginginkan harta. Maka sebagaimana dharma dikejar demi harta dan harta demi kenikmatan, demikian pula si pencari kenikmatan, setelah terpaku pada pemuasan, tidak menghendaki apa pun selain kenikmatan itu sendiri.”

Verse 32

न हि कामेन कामोअनन्‍्य: साध्यते फलमेव तत्‌ । उपयोगात्‌ फलस्यैव काष्ठाद्‌ भस्मेव पण्डितै:,“जैसे फल उपभोगमें आकर कृतार्थ हो जाता है, उससे दूसरा फल नहीं प्राप्त हो सकता तथा जिस प्रकार काष्ठसे भस्म बन सकता है, परंतु उस भस्मसे दूसरा कोई पदार्थ नहीं बन सकता; इसी तरह बुद्धिमान्‌ पुरुष एक कामसे किसी दूसरे कामकी सिद्धि नहीं मानते, क्योंकि वह साधन नहीं, फल ही है

Waiśampāyana berkata: “Hasrat tidak dapat dipakai untuk menuntaskan hasrat lain yang terpisah; ia sendiri hanyalah buah yang dinikmati. Seperti buah yang setelah dinikmati tidak menghasilkan buah lain, dan seperti kayu yang dapat menjadi abu namun dari abu itu tak lahir zat baru—demikian pula orang bijak tidak menganggap satu hasrat sebagai sarana untuk memenuhi hasrat lain, sebab hasrat adalah hasil akhir, bukan alat pencapaian.”

Verse 33

इमाञ्छकुनकान्‌ राजन्‌ हन्ति वैतंसिको यथा । एतद्‌ रूपमधर्मस्य भूतेषु हि विहिंसता,'राजन्‌! जैसे पक्षियोंको मारनेवाला व्याध इन पक्षियोंकों मारता है, यह विशेष प्रकारकी हिंसा ही अधर्मका स्वरूप है (अत: वह हिंसक सबके लिये वध्य है)। वैसे ही जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य काम और लोभके वशीभूत होकर धर्मके स्वरूपको नहीं जानता, वह इहलोक और परलोकमें भी सब प्राणियोंका वध्य होता है इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि भीमवाक्ये त्रयस्त्रिंशो 5ध्याय: ।। ३३ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें भीमवाक्यविषयक तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, sebagaimana penangkap burung membunuh burung-burung ini, demikian pula kekerasan terhadap makhluk hidup adalah rupa adharma yang nyata. Menyakiti makhluk-makhluk itulah tanda ketidakbenaran.”

Verse 34

कामाल्लोभाच्च धर्मस्य प्रकृतिं यो न पश्यति । स वध्य: सर्वभूतानां प्रेत्य चेह च दुर्मति:,'राजन्‌! जैसे पक्षियोंको मारनेवाला व्याध इन पक्षियोंकों मारता है, यह विशेष प्रकारकी हिंसा ही अधर्मका स्वरूप है (अत: वह हिंसक सबके लिये वध्य है)। वैसे ही जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य काम और लोभके वशीभूत होकर धर्मके स्वरूपको नहीं जानता, वह इहलोक और परलोकमें भी सब प्राणियोंका वध्य होता है

Waiśampāyana berkata: “Orang yang, dikuasai hasrat dan ketamakan, tidak melihat hakikat dharma, ia yang berakal jahat dipandang layak dihukum oleh semua makhluk; dan ia menuai cela serta pembalasan, baik di dunia ini maupun setelah kematian.”

Verse 35

व्यक्त ते विदितो राजन्नर्थों द्रव्यपरिग्रह: । प्रकृतिं चापि वेत्थास्य विकृतिं चापि भूयसीम्‌,“राजन! आपको यह अच्छी तरह ज्ञात है कि धनसे ही भोग्य-सामग्रीका संग्रह होता है। धनका जो कारण है, उससे भी आप परिचित हैं और धनके द्वारा जो बहुत-से कार्य सिद्ध होते हैं, उसे भी आप जानते हैं

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, engkau mengetahui dengan jelas bahwa kekayaanlah yang memungkinkan diperolehnya berbagai barang dan sumber daya untuk dinikmati dan dipergunakan. Engkau pun memahami asal-muasalnya—apa yang melahirkan kekayaan—dan engkau mengetahui dengan baik banyaknya akibat serta pengaruh luas yang dapat ditimbulkan oleh kekayaan.”

Verse 36

तस्य नाशे विनाशे वा जरया मरणेन वा । अनर्थ इति मन्यन्ते सो5यमस्मासु वर्तते,“उस धनका अभाव होनेपर अथवा प्राप्त हुए धनका नाश होनेपर अथवा स्त्री आदि धनके जरा-जीर्ण एवं मृत्युग्रस्त होनेपर मनुष्यकी जो दशा होती है, उसीको सब लोग अनर्थ मानते हैं। वही इस समय हमलोगोंको भी प्राप्त हुआ है

Vaiśampāyana berkata: “Bila kekayaan tiada, atau harta yang telah diperoleh binasa, atau ‘kekayaan’ berupa istri dan sanak-kerabat menyusut oleh usia tua dan kematian—orang menyebut keadaan itu ‘kemalangan’. Kemalangan yang sama kini menimpa kami juga.”

Verse 37

इन्द्रियाणां च पठचानां मनसो हृदयस्य च । विषये वर्तमानानां या प्रीतिरुपजायते

Vaiśampāyana berkata: Ketika kelima indra—bersama pikiran dan hati—bergerak di antara objek-objeknya, kenikmatan yang timbul dari keterlibatan itu pun lahir.

Verse 38

एवमेव पृथग दृष्टवा धर्मार्थोी काममेव च

Demikian pula, setelah menelaah secara terpisah—dharma dan artha, serta juga kāma—(orang memahami tujuan dan batas masing-masing, tanpa mencampuradukkannya sebagai satu pengejaran).

Verse 39

न धर्मपर एव स्यान्न चार्थपरमो नर: । न कामपरमो वा स्यात्‌ सर्वान्‌ सेवेत सर्वदा

Vaiśampāyana berkata: Seseorang tidak seharusnya mengabdi semata-mata pada dharma saja, atau hanya mengejar artha, atau hidup hanya demi kāma. Sebaliknya, setiap saat ia hendaknya memelihara semuanya—menjaga keseimbangan antara kewajiban, kemakmuran, dan kenikmatan dalam ukuran yang patut.

Verse 40

धर्म पूर्वे धनं मध्ये जघन्ये काममाचरेत्‌ । अहन्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधि:

Waiśampāyana berkata: “Hendaknya seseorang menegakkan dharma terlebih dahulu, mengejar artha (kekayaan) pada tahap pertengahan, dan pada tahap akhir memperhatikan kāma (hasrat). Demikianlah ia harus menata dirinya hari demi hari—itulah ketentuan yang ditetapkan oleh śāstra.”

Verse 41

“इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम तीनोंको पृथक्‌ू-पृथक्‌ समझकर मनुष्य केवल धर्म, केवल अर्थ अथवा केवल कामके ही सेवनमें तत्पर न रहे। उन सबका सदा इस प्रकार सेवन करे, जिससे इनमें विरोध न हो। इस विषयमें शास्त्रोंका यह विधान है कि दिनके पूर्वभागमें धर्मका, दूसरे भागमें अर्थका और अन्तिम भागमें कामका सेवन करे ।। ३८-- ४० || काम पूर्वे धनं मध्ये जघन्ये धर्ममाचरेत्‌ । वयस्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधि:,“इसी प्रकार अवस्था-क्रममें शास्त्रका विधान यह है कि आयुके पूर्वभागमें (युवावस्थामें) कामका, मध्यभाग (प्रौढ़ावस्था)-में धनका तथा अन्तिम भाग (वृद्धावस्था)-में धर्मका पालन करे

Waiśampāyana berkata: “Dengan memahami dharma, artha, dan kāma sebagai tiga tujuan yang berbeda, seseorang jangan terpaut hanya pada satu saja—hanya dharma, hanya kekayaan, atau hanya kenikmatan. Ia hendaknya menempuh ketiganya sedemikian rupa sehingga tidak saling bertentangan. Inilah ketetapan śāstra: pada bagian awal hari perhatikan dharma, pada bagian tengah artha, dan pada bagian akhir kāma. Demikian pula menurut urutan tahap hidup, ordinansi śāstra menyatakan: pada bagian awal usia (masa muda) boleh mengikuti kāma, pada bagian tengah (masa dewasa) mengejar artha, dan pada bagian akhir (masa tua) menegakkan dharma.”

Verse 42

धर्म चार्थ च काम॑ च यथावद्‌ वदतां वर । विभज्य काले कालज्ञ: सर्वान्‌ सेवेत पण्डित:,“वक्ताओंमें श्रेष्ठ! उचित कालका ज्ञान रखनेवाला विद्दान्‌ पुरुष धर्म, अर्थ और काम तीनोंका यथावत्‌ विभाग करके उपयुक्त समयपर उन सबका सेवन करे

Waiśampāyana berkata: “Wahai yang terbaik di antara para penutur, orang bijak yang memahami waktu hendaknya membedakan dharma, artha, dan kāma dengan tepat, lalu menempuh masing-masing pada saat yang semestinya.”

Verse 43

मोक्षो वा परमं श्रेय एष राजन्‌ सुखार्थिनाम्‌ | प्राप्तिवा बुद्धिमास्थाय सोपायां कुरुनन्दन,“कुरुनन्दन! निरतिशय सुखकी इच्छा रखनेवाले मुमुक्षुओंके लिये यह मोक्ष ही परम कल्याणप्रद है। राजन! इसी प्रकार लौकिक सुखकी इच्छावालोंके लिये धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्गकी प्राप्ति ही परम श्रेय है। अतः महाराज! भक्ति और योगसहित ज्ञानका आश्रय लेकर आप शीघ्र ही या तो मोक्षकी प्राप्ति कर लीजिये अथवा धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्गकी प्राप्तिके उपायका अवलम्बन कीजिये। जो इन दोनोंके बीचमें रहता है, उसका जीवन तो आर्त मनुष्यके समान दुःखमय ही है

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, bagi mereka yang mendambakan kebahagiaan tertinggi yang tiada banding, mokṣa (pembebasan) adalah kebaikan yang paling utama. Atau, wahai kebanggaan Kuru, dengan menegakkan pengertian yang benar beserta sarana-sarananya, hendaknya seseorang menempuh tujuan-tujuan yang dapat diraih. Sebab orang yang menggantung di antara keduanya—tidak teguh mengejar pembebasan dan tidak pula mantap menempuh tujuan duniawi—hidupnya menjadi duka, seperti orang yang tertimpa derita.”

Verse 44

तद्‌ वा*<शु क्रियतां राजन प्राप्तिवाप्पधिगम्यताम्‌ । जीवितं ह्ातुरस्येव दुःखमन्तरवर्तिन:,“कुरुनन्दन! निरतिशय सुखकी इच्छा रखनेवाले मुमुक्षुओंके लिये यह मोक्ष ही परम कल्याणप्रद है। राजन! इसी प्रकार लौकिक सुखकी इच्छावालोंके लिये धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्गकी प्राप्ति ही परम श्रेय है। अतः महाराज! भक्ति और योगसहित ज्ञानका आश्रय लेकर आप शीघ्र ही या तो मोक्षकी प्राप्ति कर लीजिये अथवा धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्गकी प्राप्तिके उपायका अवलम्बन कीजिये। जो इन दोनोंके बीचमें रहता है, उसका जीवन तो आर्त मनुष्यके समान दुःखमय ही है

Waiśampāyana berkata: “Karena itu, wahai Raja, bertindaklah segera—entah raihlah apa yang hendak dicapai, atau capailah tujuan yang lebih tinggi. Sebab hidup orang yang terkatung-katung di tengah adalah menyakitkan, laksana hidup seorang yang sakit.”

Verse 45

विदितश्रैव मे धर्म: सततं चरितकश्न ते । जानन्तस्त्वयि शंसन्ति सुहृद: कर्मचोदनाम्‌,“मुझे मालूम है कि आपने सदा धर्मका ही आचरण किया है, इस बातको जानते हुए भी आपके हितैषी, सगे-सम्बन्धी आपको (धर्मयुक्त) कर्म एवं पुरुषार्थके लिये ही प्रेरित करते हैं

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, aku mengetahui benar bahwa engkau senantiasa hidup menurut dharma. Namun, meski mereka sepenuhnya sadar akan keteguhanmu dalam kebenaran, para sahabat baik dan kerabat dekatmu tetap mendorongmu menuju tindakan—menuju upaya dan ikhtiar yang selaras dengan dharma.”

Verse 46

दान॑ यज्ञा: सतां पूजा वेदधारणमार्जवम्‌ | एष धर्म: परो राजन्‌ बलवान प्रेत्य चेह च,“महाराज! इहलोक और परलोकमें भी दान, यज्ञ, संतोंका आदर, वेदोंका स्वाध्याय और सरलता आदि ही उत्तम एवं प्रबल धर्म माने गये हैं

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, sedekah, pelaksanaan yajña, memuliakan orang-orang saleh, memelihara serta mempelajari Weda, dan kelurusan hati—semua ini dipandang sebagai dharma yang tertinggi. Dharma ini berdaya, baik di dunia ini maupun setelah kematian di alam sana.”

Verse 47

एष नार्थविहीनेन शक्‍्यो राजन्‌ निषेवितुम्‌ । अखिलाः: पुरुषव्याप्र गुणा: स्युर्यद्यपीतरे,'पुरुषसिंह राजन! यद्यपि मनुष्यमें दूसरे सभी गुण मौजूद हों तो भी यह यज्ञ आदि रूप धर्म धनहीन पुरुषके द्वारा नहीं सम्पादित किया जा सकता

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, dharma ini—seperti yajña dan upacara sejenis—tidak dapat dijalankan dengan semestinya oleh orang yang tanpa harta. Wahai harimau di antara manusia, sekalipun segala kebajikan lain ada padanya, tetap saja dharma dalam bentuk yajña dan laku sejenis tidak dapat dilaksanakan oleh seorang yang kekurangan sarana.”

Verse 48

धर्ममूलं जगद्‌ राजन्‌ नान्यद्‌ धर्माद्‌ विशिष्यते । धर्मश्चार्थेन महता शक्‍यो राजन्‌ निषेवितुम्‌,“महाराज! इस जगत्‌का मूल कारण धर्म ही है। इस जगतमें धर्मसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। उस धर्मका अनुष्ठान भी महान्‌ धनसे ही हो सकता है

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, dunia ini berakar pada dharma; tiada sesuatu pun di dunia ini yang melampaui dharma. Dan dharma itu—pengamalannya yang teguh—wahai Raja, dapat ditempuh dengan semestinya hanya dengan kekayaan yang besar.”

Verse 49

नचार्थों भैक्ष्यचर्येण नापि क्लैब्येन कह्िचित्‌ । वेत्तुं शक्य: सदा राजन्‌ केवल धर्मबुद्धिना,“राजन्‌! भीख माँगनेसे, कायरता दिखानेसे अथवा केवल धर्ममें ही मन लगाये रहनेसे धनकी प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, harta tidak diperoleh dengan hidup dari meminta-minta, tidak pula dengan memperlihatkan kepengecutan; dan tidak mungkin pula didapat hanya dengan menambatkan pikiran pada dharma semata.”

Verse 50

प्रतिषिद्धा हि ते याच्ञा यया सिद्धयति वै द्विज: । तेजसैवार्थलिप्सायां यतस्व पुरुषर्षभ,“नरश्रेष्ठ! ब्राह्मण जिस याचनाके द्वारा कार्यसिद्धि कर लेता है वह तो आप कर नहीं सकते, क्‍योंकि क्षत्रियके लिये उसका निषेध है। अत: आप अपने तेजके द्वारा ही धन पानेका प्रयत्न कीजिये

Waiśampāyana berkata: “Wahai yang terbaik di antara manusia, cara meminta-minta yang dengannya seorang brāhmaṇa dapat menuntaskan maksudnya adalah terlarang bagimu, sebab itu dilarang bagi seorang kṣatriya. Maka, wahai banteng di antara para lelaki, berjuanglah meraih harta hanya dengan tejasmu sendiri—keperkasaan dan wibawamu.”

Verse 51

भैक्ष्यचर्या न विहिता न च विट्शूद्रजीविका । क्षत्रियस्य विशेषेण धर्मस्तु बलमौरसम्‌,'क्षत्रियके लिये न तो भीख माँगनेका विधान है और न वैश्य और शूद्रकी जीविका करनेका ही। उसके लिये तो बल और उत्साह ही विशेष धर्म हैं

Waiśampāyana berkata: “Bagi seorang kṣatriya, hidup dengan mengemis tidaklah ditetapkan; demikian pula mencari nafkah dengan pekerjaan yang layak bagi vaiśya atau śūdra bukanlah jalannya. Dharma khasnya adalah kekuatan bawaan dan semangat yang menyala.”

Verse 52

स्वथधर्म प्रतिपद्यस्व जहि शत्रून्‌ समागतान्‌ । धार्तराष्ट्रमवनं पार्थ मया पार्थेन नाशय,'पार्थ! अपने धर्मका आश्रय लीजिये, प्राप्त हुए शत्रुओंका वध कीजिये। मेरे तथा अर्जुनके द्वारा धृतराष्ट्रपुत्ररूपी जंगलको कटवा डालिये

Waiśampāyana berkata: “Berdirilah teguh pada svadharmamu. Tumpaslah musuh-musuh yang telah datang menghadang. Wahai Pārtha, dengan bantuanku dan bersama Arjuna, tebang dan binasakan rimba para Dhṛtarāṣṭra—putra-putra Dhṛtarāṣṭra.”

Verse 53

उदारमेव विद्वांसो धर्म प्राहुर्मनीषिण: । उदारं प्रतिपद्यस्व नावरे स्थातुमहसि,“मनीषी विद्वान्‌ दानशीलताको ही धर्म कहते हैं, अतः आप उस दानशीलताको ही प्राप्त कीजिये। आपको इस दयनीय अवस्थामें नहीं रहना चाहिये

Waiśampāyana berkata: “Para bijak dan arif menyatakan bahwa dharma sejati adalah kemurahan hati. Maka, tempuhlah keluhuran itu; engkau tidak patut tinggal dalam keadaan yang hina dan merosot ini.”

Verse 54

अनुबुध्यस्व राजेन्द्र वेत्थ धर्मान्‌ सनातनात्‌ | क्रूरकर्माभिजातो$सि यस्मादुद्धिजते जन:,“महाराज! आप सनातनधर्मोंको जानते हैं, आप कठोर कर्म करनेवाले क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुए हैं, जिससे सब लोग भयभीत रहते हैं; अतः अपने स्वरूप और कर्तव्यकी ओर ध्यान दीजिये

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja utama, sadarlah; engkau mengetahui dharma-dharma yang abadi. Engkau terlahir dalam wangsa kṣatriya yang dikenal dengan tindakan tegas dan keras, sehingga orang gentar karenanya; maka perhatikanlah hakikat dirimu dan kewajibanmu.”

Verse 55

प्रजापालनसम्भूतं फलं तव न गर्हितम्‌ । एष ते विहितो राजन्‌ धात्रा धर्म: सनातन:,“जब आप राज्य प्राप्त कर लेंगे, उस समय प्रजापालनरूप धर्मसे आपको जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होगी, वह आपके लिये गर्हित नहीं होगा। महाराज! विधाताने आप- जैसे क्षत्रियका यही सनातनधर्म नियत किया है

Ketika engkau telah memperoleh kerajaan, pahala kebajikan yang lahir dari dharma menjaga dan melindungi rakyat tidaklah tercela bagimu. Wahai Raja, demikianlah dharma abadi yang telah ditetapkan Sang Pencipta bagi seorang kṣatriya sepertimu.

Verse 56

तस्मादपचित: पार्थ लोके हास्यं गमिष्यसि । स्वथर्माद्धि मनुष्याणां चलन न प्रशस्यते,'पार्थ! उस धर्मसे हीन होनेपर तो संसारमें आप उपहासके पात्र हो जायँगे। मनुष्योंका अपने धर्मसे भ्रष्ट होना कुछ प्रशंसाकी बात नहीं है

Karena itu, wahai Pārtha, bila engkau menyimpang dari dharmamu, engkau akan menjadi bahan olok-olok di dunia. Sesungguhnya, bagi manusia, goyah dan berpaling dari svadharma tidaklah dipuji.

Verse 57

सक्षात्रं हृदयं कृत्वा त्यक्त्वेद शिथिलं मन: । वीर्यमास्थाय कौरव्य धुरमुद्वह धुर्यवत्‌,“कुरुनन्दन! अपने हृदयको क्षत्रियोचित उत्साहसे भरकर मनकी इस शिथिलताको दूर करके पराक्रमका आश्रय ले आप एक धुरन्धर वीर पुरुषकी भाँति युद्धका भार वहन कीजिये

Wahai Kauravya, teguhkan hatimu dengan semangat sejati seorang kṣatriya; buanglah kelemahan pikiran ini. Bernaunglah pada keberanian, dan pikullah beban peperangan laksana seorang jawara terdepan.

Verse 58

न हि केवलधर्मात्मा पृथिवीं जातु कश्नन | पार्थिवो व्यजयद्‌ राजन्‌ न भूतिं न पुन: श्रियम्‌,“महाराज! केवल धर्ममें ही लगे रहनेवाले किसी भी नरेशने आजतक न तो कभी पृथ्वीपर विजय पायी है और न ऐश्वर्य तथा लक्ष्मीको ही प्राप्त किया है

Wahai Raja, tiada penguasa di bumi yang semata-mata berpegang pada dharma pernah, pada waktu mana pun, menaklukkan dunia; dan dengan itu pula ia tidak meraih kemakmuran duniawi maupun kemegahan kerajaan.

Verse 59

जिद्नां दत्त्वा बहूनां हि क्षुद्राणां लुब्धचेतसाम्‌ । निकृत्या लभते राज्यमाहारमिव शल्यक:,'जैसे बहेलिया लुब्ध हृदयवाले छोटे-छोटे मृगोंको कुछ खानेकी वस्तुओंका लोभ देकर छलसे उन्हें पकड़ लेता है, उसी प्रकार नीतिज्ञ राजा शत्रुओंके प्रति कूटनीतिका प्रयोग करके उनसे राज्यको प्राप्त कर लेता है

Sebagaimana seorang pemburu menebar umpan bagi banyak makhluk kecil yang dikuasai ketamakan, lalu menangkapnya dengan tipu daya, demikian pula seorang raja yang paham nīti, dengan siasat terhadap musuh-musuhnya, dapat memperoleh sebuah kerajaan.

Verse 60

भ्रातर: पूर्वजाताश्न सुसमद्धा श्व सर्वश: । निकृत्या निर्जिता देवैरसुरा: पार्थिवर्षभ,“नृपश्रेष्ठ आप जानते हैं कि असुरगण देवताओंके बड़े भाई हैं, उनसे पहले उत्पन्न हुए हैं और सब प्रकारसे समृद्धिशाली हैं तो भी देवताओंने छलसे उन्हें जीत लिया

Vaiśampāyana berkata: “Wahai raja termulia, para Asura sesungguhnya adalah kakak-kakak para Deva—lahir lebih dahulu dan makmur dalam segala hal. Namun para Deva menaklukkan mereka dengan nikṛti: siasat dan tipu daya.”

Verse 61

एवं बलवत: सर्वमिति बुद्ध्वा महीपते । जहि शत्रून्‌ महाबाहो परां निकृतिमास्थित:,“महाराज! महाबाहो! इस प्रकार बलवान्‌का ही सबपर अधिकार होता है, यह समझकर आप भी कूटनीतिका आश्रय ले अपने शत्रुओंको मार डालिये

Vaiśampāyana berkata: “Wahai raja, setelah memahami bahwa di dunia ini segala sesuatu berada di bawah kuasa yang kuat, engkau pun—wahai yang berlengan perkasa—hendaknya menempuh nikṛti yang paling tinggi dan menumpas musuh-musuhmu.”

Verse 62

न हार्जुनसम: कश्रिद्‌ युधि योद्धा धनुर्धर: । भविता वा पुमान्‌ कश्चिन्मत्समो वा गदाधर:,'युद्धमें अर्जुनके समान कोई धनुर्धर अथवा मेरे समान गदाधारी योद्धा न तो है और न आगे होनेकी ही सम्भावना है

Vaiśampāyana berkata: “Di medan perang tak ada pemanah yang setara Arjuna; dan sebagai pejuang pemegang gada, tak ada—kini maupun kelak—seorang pun yang dapat menyamai aku.”

Verse 63

सत्त्वेन कुरुते युद्ध राजन्‌ सुबलवानपि । अप्रमादी महोत्साही सत्त्वस्थो भव पाण्डव,'पाण्डुनन्दन! अत्यन्त बलवान्‌ पुरुष भी आत्मबलसे ही युद्ध करता है, इसलिये आप सावधानीपूर्वक महान्‌ उत्साह और आत्मबलका आश्रय लीजिये

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, bahkan seorang yang sangat kuat pun berperang dengan sattva—kekuatan batin dan keteguhan hati. Maka, wahai Pāṇḍava, berjaga-jagalah; berdirilah teguh dalam semangat besar, berlandaskan ketabahan jiwa.”

Verse 64

सत्त्वं हि मूलमर्थस्य वितथं यदतो5न्यथा । नतु प्रसक्त भवति वृक्षच्छायेव हैमनी,“आत्मबल ही धनका मूल है, इसके विपरीत जो कुछ है, वह मिथ्या है; क्योंकि हेमन्त- ऋतुमें वृक्षोंकी छायाके समान वह आत्माकी दुर्बलता किसी भी कामकी नहीं है

Vaiśampāyana berkata: “Sattva—kekuatan batin—adalah akar sejati kemakmuran. Apa pun yang dikatakan sebaliknya adalah keliru. Sebab tanpa kekuatan itu, harta tidak benar-benar melekat atau berguna—laksana teduhnya pohon di musim dingin, yang sedikit manfaatnya.”

Verse 65

अर्थत्यागोडपि कार्य: स्वादर्थ श्रेयांसमिच्छता । बीजौपम्येन कौन्तेय मा ते भूदत्र संशय:,“कुन्तीकुमार! जैसे किसान अधिक अन्नराशि उपजानेकी लालसासे धान्य आदिके अल्प बीजोंका भूमिमें परित्याग कर देता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ अर्थ पानेकी इच्छासे अल्प अर्थका त्याग किया जा सकता है। आपको इस विषयमें संशय नहीं करना चाहिये

Waiśampāyana berkata: “Wahai putra Kuntī, siapa yang menghendaki kebaikan yang lebih tinggi bagi dirinya harus siap melepaskan keuntungan kecil yang ada di hadapan. Seperti petani yang mengharapkan panen besar menaburkan sedikit benih ke dalam tanah, demikian pula ‘artha’ yang kecil dapat dikorbankan demi memperoleh ‘artha’ yang lebih luhur. Jangan ada keraguan dalam hatimu tentang hal ini.”

Verse 66

अर्थेन तु समो नार्थो यत्र लभ्येत नोदय: । न तत्र विपण: कार्य: खरकण्डूयनं हि तत्‌,“जहाँ अर्थका उपयोग करनेपर उससे अधिक या समान अर्थकी प्राप्ति न हो वहाँ उस अर्थको नहीं लगाना चाहिये, क्योंकि वह (परस्पर) गधोंके शरीरको खुजलानेके समान व्यर्थ है

Waiśampāyana berkata: Jangan menanamkan harta di tempat yang pemakaiannya tidak menghasilkan keuntungan—bahkan pengembalian yang setara pun tidak. Tawar-menawar semacam itu sia-sia, bagaikan keledai saling menggaruk: lelah tanpa faedah.

Verse 67

एवमेव मनुष्येन्द्र धर्म त्यक्त्वाल्पकं नर: । बृहन्तं धर्ममाप्रोति स बुद्ध इति निश्चितम्‌,“नरेश्वर! इसी प्रकार जो मनुष्य अल्प धर्मका परित्याग करके महान धर्मकी प्राप्ति करता है, वह निश्चय ही बुद्धिमान है

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja manusia, demikian pula, bila seseorang meninggalkan dharma yang kecil lalu meraih dharma yang lebih besar dan lebih teguh, ia sungguh patut disebut bijaksana.”

Verse 68

अमित्रं मित्रसम्पन्नं मित्रैर्भिन्दन्ति पण्डिता: । भिन्नैमित्रै: परित्यक्तं दुर्बल॑ कुर्वते वशम्‌,“मित्रोंसे सम्पन्न शत्रुको विद्वान्‌ पुरुष अपने मित्रोंद्वारा भेदनीतिसे उसमें और उसके मित्रोंमें फ़ूट डाल देते हैं, फिर भेदभाव होनेपर मित्र जब उसको त्याग देते हैं, तब वे उस दुर्बल शत्रुको अपने वशमें कर लेते हैं

Waiśampāyana berkata: Orang bijak memecah-belah musuh yang kuat karena sokongan sekutu dengan memakai kawan-kawan mereka untuk menabur perpecahan antara musuh itu dan para pendukungnya. Ketika perpecahan terjadi dan sekutu-sekutunya meninggalkannya, mereka menundukkan musuh yang telah melemah itu ke dalam kendali mereka.

Verse 69

सत्त्वेन कुरुते युद्ध राजन्‌ सुबलवानपि । नोद्यमेन न होत्राभि: सर्वाः स्वीकुरुते प्रजा:,“राजन! अत्यन्त बलवान्‌ पुरुष भी आत्मबलसे ही युद्ध करता है, वह किसी अन्य प्रयत्नसे या प्रशंसाद्वारा सब प्रजाको अपने वशमें नहीं करता

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, bahkan seorang yang sangat kuat pun berperang dengan daya sattu—keteguhan batinnya sendiri. Namun ia tidak dapat menundukkan seluruh rakyat hanya dengan pengerahan tenaga, ataupun dengan pujian dan seruan ritual para hotṛ. Kekuatan dapat memaksa pertempuran, tetapi tidak dengan sendirinya meraih kesetiaan rakyat.”

Verse 70

सर्वथा संहतैरेव दुर्बलैर्बलवानपि । अमित्र: शक्‍्यते हन्तुं मधुहा भ्रमरैरिव,'जैसे मधुमक्खियाँ संगठित होकर मधु निकालने-वालेको मार डालती हैं, उसी प्रकार सर्वथा संगठित रहनेवाले दुर्बल मनुष्योंद्वारा बलवान्‌ शत्रु भी मारा जा सकता है

Wahai Raja, sebagaimana kawanan lebah yang bersatu dapat membunuh si pengambil madu, demikian pula orang-orang lemah yang sepenuhnya bersatu mampu menewaskan musuh yang kuat.

Verse 71

यथा राजन्‌ प्रजा: सर्वा: सूर्य: पाति गभस्तिभि: । अत्ति चैव तथैव त्वं सदृश: सवितुर्भव,राजन! जैसे भगवान्‌ सूर्य पृथ्वीके रसको ग्रहण करते और अपनी किरणोंद्वारा वर्षा करके उन सबकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी प्रजाओंसे कर लेकर उनकी रक्षा करते हुए सूर्यके ही समान हो जाइये

Wahai Raja, sebagaimana Sang Surya memelihara dan melindungi seluruh rakyat dengan sinarnya—menyedot kelembapan bumi lalu mengembalikannya sebagai hujan—demikian pula engkau: pungutlah pajak dari rakyat dan sebagai gantinya lindungilah mereka; jadilah laksana Surya.

Verse 72

एतच्चापि तपो राजन्‌ पुराणमिति न: श्रुतम्‌ । विधिना पालन भूमेर्यत्‌ कृतं न: पितामहै:,'राजेन्द्र! हमारे बाप-दादोंने जो किया है, वह धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन भी प्राचीनकालसे चला आनेवाला तप ही है; ऐसा हमने सुना है

Wahai Rajendra, kami pun mendengar sebagai ajaran purba: bahwa memelihara dan melindungi bumi menurut tata aturan yang benar—sebagaimana dilakukan para leluhur kami—itulah sendiri suatu tapa (laku asketis).

Verse 73

न तथा तपसा राजॉल्लोकान प्राप्रोति क्षत्रिय: । यथा सृष्टेन युद्धेन विजयेनेतरेण वा,“धर्मराज! क्षत्रिय तपस्याके द्वारा वैसे पुण्य-लोकोंको नहीं प्राप्त होता, जिन्हें वह अपने लिये विहित युद्धके द्वारा विजय अथवा मृत्युको अंगीकार करनेसे प्राप्त करता है

Wahai Dharmaraja, seorang ksatria tidak meraih alam-alam mulia itu melalui tapa, sebagaimana ia meraihnya melalui perang yang ditetapkan baginya—entah dengan kemenangan, atau (bila tidak) dengan menerima kematian.

Verse 74

अपेयात्‌ किल भा: सूर्याल्लक्ष्मीश्वन्द्रमसस्तथा । इति लोको व्यवसितो दृष्टवेमां भवतो व्यथाम्‌,“आपपर जो यह संकट आया है, इस असम्भव-सी घटनाको देखकर लोग यह निश्चयपूर्वक मानने लगे हैं कि सूर्यसे उसकी प्रभा और चन्द्रमासे उसकी चाँदनी भी दूर हो सकती है

Melihat derita yang menimpa dirimu, orang-orang pun sampai pada keyakinan teguh: seakan-akan cahaya dapat meninggalkan matahari, dan keelokan serta sinar pun dapat terpisah dari bulan.

Verse 75

भवतत्ष प्रशंसाभिनििन्दाभिरितरस्य च । कथायुक्ता: परिषद: पृथग्‌ राजन्‌ समागता:,“राजन्‌! साधारण लोग भिन्न-भिन्न सभाओंमें सम्मिलित होकर अथवा अलग-अलग समूह-के-समूह इकट्ठे होकर आपकी प्रशंसा और दुर्योधनकी निन्दासे ही सम्बन्ध रखनेवाली बातें करते हैं

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, di berbagai tempat telah berkumpul majelis-majelis yang terpisah; pembicaraan mereka dipenuhi pujian untukmu dan celaan bagi yang lain (seterumu).”

Verse 76

इदमभ्यधिकं राजन ब्राह्मणा: कुरवश्च ते । समेता: कथयन्तीह मुदिता: सत्यसंधताम्‌,“महाराज! इसके सिवा, यह भी सुननेमें आया है कि ब्राह्मण और कुरुवंशी एकत्र होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ आपकी सत्यप्रतिज्ञताका वर्णन करते हैं

Waiśampāyana berkata: “Lagi pula, wahai Raja, juga terdengar di sini bahwa para Brahmana dan keturunan wangsa Kuru berkumpul dan dengan gembira menuturkan keteguhanmu pada kebenaran serta pada janji yang kau ikrarkan.”

Verse 77

यन्न मोहान्न कार्पण्यान्न लोभान्न भयादपि । अनृतं किंचिदुक्त ते न कामान्नार्थकारणात्‌,“उनका कहना है कि आपने कभी न तो मोहसे, न दीनतासे, न लोभसे, न भयसे, न कामनासे और न धनके ही कारणसे किंचिन्मात्र भी असत्य भाषण किया है

Mereka menyatakan bahwa engkau tak pernah mengucapkan sedikit pun ketidakbenaran—bukan karena delusi, bukan karena kelemahan hati, bukan karena ketamakan, bahkan bukan karena takut; bukan pula demi hasrat, ataupun demi keuntungan harta.

Verse 78

यदेन: कुरुते किंचिद्‌ राजा भूमिमवाप्रुवन्‌ । सर्व तन्नुदते पश्चाद्‌ यज्जैरविपुलदक्षिणै:,“राजा पृथ्वीको अपने अधिकारमें करते समय युद्धजनित हिंसा आदिके द्वारा जो कुछ पाप करता है, वह सब राज्यप्राप्तिके पश्चात्‌ भारी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा नष्ट कर देता है

Seorang raja, ketika menaklukkan bumi, apa pun dosa yang ia perbuat melalui kekerasan perang dan semacamnya, semuanya ia hapuskan kemudian—setelah kerajaan diraih—dengan yajña yang disertai dakṣiṇā yang melimpah.

Verse 79

ब्राह्मणेभ्यो ददद्‌ ग्रामान्‌ गाश्न॒ राजन्‌ सहस्रश: । मुच्यते सर्वपापेभ्यस्तमोभ्य इव चन्द्रमा:,'जनेश्वर! ब्राह्मणोंको बहुत-से गाँव और सहस्रों गौएँ दानमें देकर राजा अपने समस्त पापोंसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा अन्धकारसे

Wahai penguasa manusia, dengan menganugerahkan desa-desa kepada para Brahmana dan mendermakan sapi hingga ribuan, seorang raja terbebas dari segala dosa—laksana bulan yang lepas dari kegelapan.

Verse 80

पौरजानपदा: सर्वे प्रायश: कुरुनन्दन । सवृद्धबालसहिता: शंसन्ति त्वां युधिष्ठिर,“कुरुनन्दन युधिष्ठिर! प्रायः नगर और जनपदमें निवास करनेवाले आबालवृद्ध सब लोग आपकी प्रशंसा करते हैं

Waiśampāyana berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, kebanggaan wangsa Kuru—hampir semua warga kota dan rakyat pedesaan, bersama para tua dan anak-anak, menuturkan pujian tentangmu.”

Verse 81

श्वदृती क्षीरमासक्तं ब्रह्म वा वृषले यथा । सत्यं स्तेने बल॑ नार्या राज्यं दुर्योधने तथा,'कुत्तेके चमड़ेकी कुप्पीमें रखा हुआ दूध, शूद्रमें स्थित वेद, चोरमें सत्य और नारीमें स्थित बल जैसे अनुचित है, उसी प्रकार दुर्योधनमें स्थित राजत्व भी संगत नहीं है

Waiśampāyana berkata: “Seperti susu yang disimpan dalam kantong kulit anjing tak layak; atau pengetahuan Weda yang bersemayam pada seorang śūdra dianggap tak patut; seperti kebenaran pada pencuri dan kekuatan yang dipercayakan kepada perempuan yang tak teguh dianggap salah tempat—demikian pula, kerajaan yang bertakhta pada Duryodhana tidaklah pantas.”

Verse 82

इति लोके निर्वचनं पुरश्चरति भारत । अपि चैता: स्त्रियो बाला: स्वाध्यायमधिकुर्वते,“भारत! लोकमें यह उपर्युक्त सत्य प्रवाद पहलेसे चला आ रहा है । स्त्रियाँ और बच्चेतक इसे नित्य किये जानेवाले पाठकी तरह दुहराते रहते हैं

Waiśampāyana berkata: “Wahai Bhārata, demikianlah ungkapan yang telah lama beredar di dunia. Bahkan perempuan dan anak-anak pun mengulanginya, laksana pelajaran harian.”

Verse 83

इमामवस्थां च गते सहास्माभिररिंदम । हन्त नष्टा: सम सर्वे वै भवतोपद्रवे सति,'शत्रुदमन! बड़े दुःखकी बात है कि हमारे साथ ही आज आप इस दुरवस्थामें पहुँच गये हैं और आपहीके कारण ऐसा उपद्रव आया कि हम सब लोग नष्ट हो गये

Waiśampāyana berkata: “Wahai penakluk musuh, engkau pun telah jatuh ke dalam keadaan sengsara yang sama bersama kami. Celaka—karena malapetaka timbul atas sebabmu, kami semua binasa.”

Verse 84

स भवान्‌ रथमास्थाय सर्वोपकरणान्वितम्‌ | त्वरमाणो$भिनिर्यातु विप्रेभ्यो5र्थविभावक:,“महाराज! आप विजयमें प्राप्त हुए धनका ब्राह्मणोंको दान करनेके लिये अस्त्र-शस्त्र आदि सभी आवश्यक सामग्रियोंसे सुसज्जित रथपर बैठकर शीघ्र यहाँसे युद्धके लिये निकलिये

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, naikilah keretamu yang lengkap dengan segala perlengkapan—senjata dan seluruh bekal—lalu berangkatlah segera dengan tergesa. Dengan maksud membagikan harta yang diperoleh lewat kemenangan kepada para Brahmana, majulah ke depan.”

Verse 85

वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठानद्यव गजसाह्दयम्‌ । अस्त्रविद्धि: परिवृतो भ्रातृभिर्दृढ्धन्विभि:,“जैसे सर्पोके समान भयंकर शूरवीर देवताओंसे घिरे हुए वृत्रनाशक इन्द्र असुरोंपर आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार अस्त्र-विद्याके ज्ञाता और सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले हम सब भाइयोंसे घिरे हुए आप श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर आज ही हस्तिनापुरपर चढ़ाई कीजिये। महाबली कुन्तीकुमार! जैसे इन्द्र अपने तेजसे दैत्योंको मिट्टीमें मिला देते हैं, उसी प्रकार आप अपने प्रभावसे शत्रुओंको मिट्टीमें मिलाकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे अपनी राजलक्ष्मीको ले लीजिये

Waiśampāyana berkata: “Setelah para brāhmana utama melantunkan swasti-vācana (berkat pertanda baik), berangkatlah hari ini juga menyerbu Hastināpura. Kami semua saudaramu—mahir dalam ilmu senjata dan pemegang busur yang kokoh—akan mengiringimu; sebagaimana Indra, pembunuh Vṛtra, dikelilingi para dewa, menerjang pasukan Asura dengan dahsyat. Wahai putra Kuntī yang perkasa, seperti Indra menghancurkan para Daitya menjadi debu oleh sinar keagungannya, demikian pula engkau, dengan wibawamu sendiri, remukkan musuh-musuhmu dan rebut kembali śrī kerajaanmu dari Duryodhana, putra Dhṛtarāṣṭra.”

Verse 86

आशीविषसमैरवरिर्मरुद्धिरिव वृत्रहा । अमित्रांस्तेजसा मृद्नन्नसुरानिव वृत्रहा । श्रियमादत्स्व कौन्तेय धार्तराष्ट्रानू महाबल,“जैसे सर्पोके समान भयंकर शूरवीर देवताओंसे घिरे हुए वृत्रनाशक इन्द्र असुरोंपर आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार अस्त्र-विद्याके ज्ञाता और सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले हम सब भाइयोंसे घिरे हुए आप श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर आज ही हस्तिनापुरपर चढ़ाई कीजिये। महाबली कुन्तीकुमार! जैसे इन्द्र अपने तेजसे दैत्योंको मिट्टीमें मिला देते हैं, उसी प्रकार आप अपने प्रभावसे शत्रुओंको मिट्टीमें मिलाकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे अपनी राजलक्ष्मीको ले लीजिये

Waiśampāyana berkata: “Wahai putra Kuntī yang mahaperkasa, rebut kembali śrī kerajaanmu dari putra-putra Dhṛtarāṣṭra. Seperti Indra pembunuh Vṛtra, dikelilingi para Marut, menghancurkan para Asura—demikian pula engkau, mengerikan laksana ular berbisa, hendaknya melumat musuh-musuhmu dengan sinar kewibawaanmu.”

Verse 87

न हि गाण्डीवमुक्तानां शराणां गार्ध्रवाससाम्‌ । स्पर्शमाशीविषाभानां मर्त्य: कश्नन संसहेत्‌,“मनुष्योंमें कोई ऐसा नहीं है, जो गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए विषैले सर्पोके समान भयंकर गृध्रपंखयुक्त बाणोंका स्पर्श सह सके

Tak seorang pun manusia fana sanggup menahan sentuhan anak panah yang dilepaskan dari Gāṇḍīva—berbulu sayap burung nasar dan mengerikan laksana ular berbisa.

Verse 88

नस वीरो न मातड़ोी न च सो5श्वो5स्ति भारत । य:ः सहेत गदावेगं मम क्रुद्धस्य संयुगे,“भारत! इसी प्रकार जगतमें ऐसा कोई अश्व या गजराज या कोई वीर पुरुष भी नहीं है, जो रणभूमिमें क्रोधपूर्वक विचरनेवाले मुझ भीमसेनकी गदाका वेग सह सके

“Wahai Bhārata, di dunia ini tidak ada seorang kesatria, tidak pula seekor gajah, bahkan seekor kuda pun, yang sanggup menahan dahsyatnya hantaman gada milikku ketika aku bergerak di medan laga dalam amarah.”

Verse 89

सृञ्जयै: सह कैकेयैर्वष्णीनां वृषभेण च । कथंस्विद्‌ युधि कौन्तेय न राज्यं प्राप्तुयामहे,“कुन्तीनन्दन! सूंजय और कैकयवंशी वीरों तथा वृष्णिवंशावतंस भगवान्‌ श्रीकृष्णके साथ होकर हम संग्राममें अपना राज्य कैसे नहीं प्राप्त कर लेंगे?

Wahai putra Kuntī, bersama para Sṛñjaya dan Kaikeya, serta dengan sang banteng di antara kaum Vṛṣṇi—Śrī Kṛṣṇa—sebagai sekutu, bagaimana mungkin kita tidak merebut kembali kerajaan kita dalam peperangan?

Verse 90

शत्रुहस्तगतां राजन्‌ कथंस्विन्नाहरेरमहीम्‌ । इह यत्नमुपाहृत्य बलेन महतान्वित:,“राजन! आप विशाल सेनासे सम्पन्न हो यहाँ प्रयत्नपूर्वक युद्ध ठानकर शत्रुओंके हाथमें गयी हुई पृथ्वीको उनसे छीन क्यों नहीं लेते?”

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, mengapa engkau tidak, di sini dan saat ini juga, mengerahkan upaya yang semestinya dan, bersandar pada kekuatanmu yang besar, merebut kembali bumi yang telah jatuh ke tangan musuh?”

Verse 373

स काम इति मे बुद्धि: कर्मणां फलमुत्तमम्‌ | 'पाँचों ज्ञानेन्द्रियों, मन और बुद्धिकी अपने विषयोंमें प्रवृत्त होनेके समय जो प्रीति होती है, वही मेरी समझमें काम है। वह कर्मोका उत्तम फल है

Menurut pemahamanku, kenikmatan yang timbul ketika kelima indra pengetahuan, bersama pikiran dan budi, bergerak menuju objek-objeknya masing-masing—itulah yang disebut kāma; dan itulah buah tindakan yang paling utama.

Frequently Asked Questions

Whether misfortune justifies passivity: Draupadī argues that even when outcomes are uncertain or shaped by prior causes, abandoning effort collapses livelihood, duty, and self-respect.

Adopt karmabuddhi—act with discernment and persistence, avoid the extremes of fatalistic inertia and unreasoned force, and accept that results arise from multiple conditions while effort remains necessary.

No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the chapter’s ‘meta’ function is instructional, embedding a pragmatic doctrine of agency and accountability within the exile narrative rather than offering a formal recitational reward.