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सोपान-प्रथम: ‘श्रद्धा का जन्म’ और ‘सम्बन्ध-स्थापन’ का द्वार। बालकाण्ड में भक्ति का अंकुर ‘सगुण-लीला’ के माध्यम से हृदय में उतरता है—गुरु, कुल, समाज, और विवाह-समारोह जैसे लोक-आधारों को ‘ईश्वर-सान्निध्य’ की सीढ़ी बनाकर। यहाँ जनक–दशरथ संवाद और अवध-प्रवेश का उत्सव साधक को यह सिखाता है कि विनय, प्रेम, मर्यादा और मंगल-आचार स्वयं मुक्ति-पथ के साधन हैं; ‘लोक’ (रीति) और ‘वेद’ (नीति) एक ही राम-तत्त्व में समाहित हैं।
في هذا المقطع المتناثر (حول الدوهة ٣٤٠-٣٤٩)، تهيمن النكهات الشعرية للحب الرومانسي والفرح، لكن أساسهما هو نكهة البكتي. تواضع جاناكا، ومحبة داشاراثا، والتحيات لجمع الحكماء، وزينة أيوديا الميمونة - كلها ليست مجرد احتفالات خارجية بل طقس منظم للتطهير الداخلي. يحوّل تولسيداس العادات الاجتماعية (الآراتي، وطقوس الترحيب، والهدايا، والزينة) إلى دارما في العمل: يصبح الفرح المشترك للمجتمع توسعاً للساتسانغا، حيث يُعلن أن رؤية راما هي "ثمرة العيون" و"أصل كل سرور". وحتى الجلال الصعب للبراهمان نيرغونا (نتي-نتي) يوضع في هذا السياق نفسه، ليفهم السالك أن حلاوة الصورة ساغونا هي التجلي الكامل للنيرغونا نفسه. وهكذا يجعل هذا المقطع من بالاكندا "التواضع المملوء بالحب" سادهانا، تُلين القلب وتحنيه وتركزه للمراحل القادمة.
Verse 716 (चौपाई)
नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे।। भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे।। बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी।। बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरै न चहहीं।। पुनि कह भूपति बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए।। राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े।। तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी।। करौ कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई।।
أظهر الملك التواضع وأعاد التجار الكبار، وبكل احترام استدعى جميع الطالبين ومنحهم الحلي والملابس والخيول والفيلة، وبمحبة أكرمهم وثبّتهم جميعاً. مراراً وتكراراً تكلّم بكلمات الثناء، وعادوا جميعاً وهم يحفظون راما في قلوبهم. مراراً قال سيد كوسالا: إن جاناكا تحت سلطان المحبة لا يرغب في العودة. حينئذ تكلّم الملك بكلمات حسنة: عودوا أيها السادة، فقد قطعتم مسافة بعيدة. ووقف الملك ثابتاً في ردّه، وازداد تيار المحبة من عينيه. حينئذ تكلّم فيديها بكفين مضمومتين، وكلماته مغموسة بالمحبة كأنها في رحيق: أي توسل أصنعه أيها الملك العظيم، فقد أظهرتم لي إكراماً عظيماً؟
Verse 717 (दोहा/सोरठा)
कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति। मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति।।340।।
أكرم سيد كوسالا قريبه وصهره بكل الطرق. عند لقائهما كان هناك توسل متبادل ومحبة عظيمة لا يسعها القلب.
Verse 718 (चौपाई)
मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा।। सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता।। जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए।। राम करौ केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा।। करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी।। ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी।। मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।। महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई।।
حنى جاناكا رأسه لجمع الحكماء ونال البركات منهم جميعاً. ثم بكل احترام لاقى أبناءه بالأصهار، وهم كنوز الجمال والخلق والفضيلة، وجميع الإخوة. بكفين مضمومتين بإشارة جميلة، تكلّم بكلمات بدت وكأنها المحبة ذاتها. كيف أمدح راما؟ إنه البجع في بحيرة قلوب الحكماء وشيفا. يمارس اليوغيون اليوغا للوصول إليه، وهو متحرر من الغضب والتعلق والتملك والكبرياء. إنه البراهما الساري في كل مكان، غير المدرك، غير الفاني، سعادة الوعي، بلا صفات وهو منبع كل الفضائل. من لا يستطيع العقل والكلام معرفته، ولا يستطيع كل الاستدلال إدراكه. الذي تمدح مجده الفيدات بقولها 'ليس هذا، ليس هذا'، والذي يبقى واحداً هو هو في جميع الأزمنة الثلاثة.
Verse 719 (दोहा/सोरठा)
नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल। सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकुल।।341।।
ما صار موضوع عينيّ صار أصل كل السعادة. حصل كل الربح للعالم وللأحياء، فقد صار الرب رحيقاً.
Verse 720 (चौपाई)
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई।। होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा।। मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा।। मै कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें।। बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें।। सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे।। करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने।। बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेमु पुनि आसिष दीन्ही।।
أكرموني بكل الطرق، وعرفوني من خاصتهم واتخذوني. لو كان هناك ألف وعشر من شارادا وشيشا، لاجتهدوا لعصور وما أكملوا الحساب. حظي هو قصة فضائلكم، لا أستطيع سردها بالكامل، فاسمعوني يا سيد راغو. ماذا أقول؟ قوتي الوحيدة هي أنكم ترضون بقليل من المحبة. مراراً أطلب بكفين مضمومتين: لا يصرف عقلي عن قدميكم لحظة. سمع هذه الكلمات المباركة فنمت المحبة فيه، ورضي راما متمم الرغبات. نال البركة وأكرم حماه، واعتبر الملك كوشيكا مساوياً لفاسيشتا. ثم تضرع مرة أخرى لبهارات، وانضم إليه بمحبة وباركه مرة أخرى.
Verse 721 (दोहा/सोरठा)
मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस। भए परस्पर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस।।342।।
لاقى لاكشمانا ومهلك أعدائه ومنحهما البركة. غمرتهم محبة متبادلة، يحنون رؤوسهم مراراً وتكراراً.
Verse 722 (चौपाई)
बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई।। जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई।। सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें।। जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं।। सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी।। कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई।। चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई।। रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी।।
مراراً وتكراراً قدّم التوسل والثناء، وانطلق سيد راغو مع جميع إخوته. ذهب جاناكا وأمسك قدمي كوشيكا، ووضع غبار قدميه على رأسه وعينيه. اسمع أيها الحكيم: رؤيتك بركة عظيمة، لا شك في قلبي أنك فوق كل منال. أي سعادة وشهرة حسنة يريدها سيد العالم، لا يتردد في تحقيق رغبة قلبه. تلك السعادة والشهرة الحسنة سهلة المنال لي يا سيدي، كل الكمالات تتبع رؤيتك. تضرع مراراً وتكراراً وهو يحني رأسه، وعاد الملك بعد نيل البركة. انطلق موكب الزفاف والطبول تدق، وفرح الصغار والكبار معاً. حدّق رجال ونساء القرى في راما، ونالوا ثمر رؤيتهم وامتلأوا سعادة.
Verse 723 (दोहा/सोरठा)
बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत। अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत।।343।।
توقفوا في الطريق في استراحات جميلة، ومنحوا السرورة للناس على الطريق. في يوم مقدس وصلوا قرب أيودhya، مدينة مولده.
Verse 724 (चौपाई)
हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे।। झाँझि बिरव डिंडमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।। पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता।। निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे।। गलीं सकल अरगजाँ सिंचाई। जहँ तहँ चौकें चारु पुराई।। बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना।। सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला।। लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी।।
دُقت الطبول وعُزفت الآلات الجميلة، وارتفع صوت الأصداف والطبول وصهيل الخيول. رنّت الصنوج والأجراس والطبول حلوة، وعُزفت ألحان جميلة على النايات. جاء أهل المدينة لمشاهدة موكب الزفاف، وكلهم فرحون وأجسادهم تقشعر من السعادة. زيّنوا بيوتهم الجميلة، وزُيّنت الأسواق والشوارع والميادين وأبواب المدينة. رشّوا ماء الزعفران في كل الأزقة، وفي كل مكان فُرشت الساحات بجمال. صارت الأسواق فخمة لا توصف، ونُصبت الأقواس والرايات والأعلام والمظلات. نُثرت جوزات البتن وجوز الهند والموز والمانجو، وغُرست أشجار الباكولا والكادامبا والتامالا. وقفت الأشجار جميلة تلامس الأرض، ورُصفت الأرض بالجواهر، عمل فني.
Verse 725 (दोहा/सोरठा)
बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि। सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि।।344।।
صُنعت أواني الكلاشا الميمونة ورُتبت في كل بيت بطرق متنوعة وجميلة. الآلهة بدءاً من براهما ينظرون بذهول إلى مدينة سيد راغو.
Verse 726 (चौपाई)
भूप भवन तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा।। मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई।। जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ दसरथ गृहँ छाए।। देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही।। जुथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासनि।। सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती।। भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई।। कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेम बिबस तन दसा बिसारीं।।
أشرق قصر الملك في تلك الساعة، وعندما رأى كماله، سُحر عقل إله الحب نفسه. كانت هناك علامات مباركة وجمال آسر، وزينت المدينة بالرخاء والقوى الخارقة والسعادة والثروة. بدا وكأن كل فرح العالم قد تجسد وزيّن نفسه بشكل طبيعي، واتخذ جسداً بعد جسد وانتشر في بيوت داشاراثا. لرؤية راما وابنة فيديها، قل لي، أي شوق لا يتحقق؟ خرجت النساء المتزوجات في جماعات، وبجمالهن الخاص أخجلت ملذات الحب. حملن كل شيء مبارك لمراسم الآراتي، وغنين وكأنهن بهاراتي نفسها بأشكال كثيرة. كان هناك ضجيج كبير في قصر الملك، لا يمكن وصف تلك السعادة. كوساليا وأمهات راما الأخريات، تغلب عليهن الحب ونسيْن حالة أجسادهن.
Verse 727 (दोहा/सोरठा)
दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी। प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि।।345।।
بعد عبادة غانيشا وشيفا، أعطين هدايا وفيرة للبراهمة. امتلأ الفقراء بفرح عظيم، وكأنهم نالوا الثمار الأربعة للحياة.
Verse 728 (चौपाई)
मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता।। राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं।। बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे।। हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला।। अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा।। छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए।। सगुन सुंगध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी।। रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना।।
كانت جميع الأمهات مستغرقات في الفرح والسرور، وأصبحت أجسادهن غير مستقرة بالكاد يستطعن المشي. ممتلئات بحب عميق لرؤية راما، انشغلن بجميع الاستعدادات. عُزفت آلات موسيقية من أنواع كثيرة، وسوميترا المباركة والفرحة استعدت. كان هناك كركم وعشب دوب ولبن وأوراق وزهور، وبيتن وجوز الفوفال وجذور مباركة. أبهجت البراعم النابتة العيون، وتألقت أغصان الريحان الجميلة. كانت أواني الذهب والنحاس جميلة بشكل طبيعي، وكأن الحظ والسعادة قد عششت هناك. لا يمكن وصف العلامات المباركة والعطور، وزينت جميع الملكات أنفسهن بكل شيء مبارك. حضرن قرابين آراتي بأنواع كثيرة، وغنين أغاني مباركة بفرح.
Verse 729 (दोहा/सोरठा)
कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात। चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात।।346।।
حاملات صواني ذهبية مملوءة بأشياء مباركة وزنابق في أيديهن، خرجت الأمهات بفرح، وأجسادهن تتفتح بالإثارة والسرور.
Verse 730 (चौपाई)
धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ।। सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं।। मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे।। प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि।। दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा।। सुर सुगन्ध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी।। समउ जानी गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा।। सुमिरि संभु गिरजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा।।
انتشرت سحب دخان البخور في السماء مثل كبرياء موسم الأمطار. أمطرت الآلهة أزهاراً وأكاليل من الأشجار السماوية، وكأن السحب تقترب لتعانق العروس. بأقواس وزينة مرصعة بالجواهر الجميلة، بدا وكأن مدينة أيوديا تزين قوسها. ظهرت النساء واختفين على الأسطح، جميلات وسريعات كومضات البرق. دقت الطبول، وزأرت السحب بشدة، وصرخت طيور التشاتاكا والضفادع والطواويس بفرح. أمطرت الآلهة ماءً عطرياً نقياً، وكان جميع رجال ونساء أيوديا سعداء. عرف المعلم الوقت المناسب وأمر، ودخل جوهرة عرق راغو المدينة. ذاكراً شامبهو وغيريجا وسيد الغانا، فرح الملك مع جمعه.
Verse 731 (दोहा/सोरठा)
होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ। बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ।।347।।
ظهرت علامات مباركة، وأمطرت الآلهة أزهاراً، ودقت الطبول الكبيرة. رقصت حوريات السماء بفرح، يغنين أغاني حلوة ومباركة.
Verse 732 (चौपाई)
मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर।। जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी।। बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे।। बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं।। पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे।। करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा।। आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुँअर बर चारी।। सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी।।
غنى الشعراء والمادحون والراقصون والمواطنون مجده، المشهور في العوالم الثلاثة. سُمع صوت النصر النقي، كلمات الفيدا الممتازة، في جميع الاتجاهات العشرة، جالباً الحظ الأسمى. بدأت آلات كثيرة تعزف، وامتلأت آلهة السماء وسكان المدينة بالحب. كان ضيوف الزفاف لا يُعدون، قلوبهم ممتلئة بفرح عظيم وسعادة لا حدود لها. حينها انحنى المواطنون للملك، وعند النظر إلى راما امتلأوا بالنعيم. نثروا الجواهر والملابس، وعيونهم تدمع، وأجسادهم تغطى بقشعريرة. قامت نساء المدينة بمراسم الآراتي بفرح، وابتهجن عند رؤية الأمراء الوسيمين. أُخرجت وعرضت محفات جميلة، وعند رؤيتها امتلأت العرائس بالسعادة.
Verse 733 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर। मुदित मातु परुछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार।।348।।
بهذه الطريقة، جالبين السعادة للجميع، وصلوا إلى القصر الملكي. قامت الأمهات الفرحات بمراسم الترحيب بالعرائس مع الأمراء.
Verse 734 (चौपाई)
करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा।। भूषन मनि पट नाना जाती। करही निछावरि अगनित भाँती।। बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी।। पुनि पुनि सीय राम छबि देखी। मुदित सफल जग जीवन लेखी।। सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही।। बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा।। देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं।। देत न बनहिं निपट लघु लागी। एकटक रहीं रूप अनुरागीं।।
أدين مراسم الآراتي مراراً وتكراراً، من يستطيع وصف عمق حبهن وفرحهن؟ نثرن الحلي والجواهر والملابس بأنواع كثيرة بطرق لا تحصى. عند رؤية أبنائهن الوسيمين مع العرائس، انغمرت الأمهات في النعيم الأسمى. مراراً وتكراراً تأملن جمال سيتا وراما، وامتلأت قلوبهن بالفرح، وبدا العالم مكتملًا. نظرت الرفيقات مراراً وتكراراً إلى وجه سيتا، وغنين أغاني تمتدح حظهن الجيد. أمطرت الآلهة أزهاراً لحظة بلحظة، ورقصن وغنين وقدمْن الخدمة. عند رؤية الجمال الرباعي الذي يأسر القلب، قصرت جميع المقارنات. لم يستطعن العطاء بما يكفي رغم أنهن أعطين بسخاء، وبقين ينظرن بثبات، مفتونات بذلك الجمال.
Verse 735 (दोहा/सोरठा)
निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत। बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत।।349।।
باتباع الفيدا والسلوك السليم وتقليد العائلة، قدمن هدايا ترحيب لوفد العريس عند الباب. ثم، بعد توديع أقاربهن رسمياً، انطلقت جميع العرائس مع أزواجهن إلى بيوتهن الجديدة.
परम्परा में इसे ‘राम-दर्शन-मंगल’ का पाठ माना जाता है: नगर-प्रवेश, आरती-परिछन और जनक-विनय के श्रवण/पाठ से गृहस्थ-धर्म में मंगल, दाम्पत्य-सौख्य, कुल-कीर्ति और ‘दर्शन-भक्ति’ की वृद्धि होती है; विशेषतः ‘नयन-फल’ (सत्संग में राम-रूप का भाव-दर्शन) को समस्त सुख-मूल कहा गया है।
सामान्यतः मंगल-समारोह/विवाह-प्रसंग में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘सीताराम’ नाम-संपुट प्रचलित है; आरती/परिछन के साथ ‘जय जय रघुवीर समर्थ’ भी कई परम्पराओं में जोड़ा जाता है।
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