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सोपान-आरम्भ: ‘भक्ति का जन्म’—जहाँ रामकथा को गृह-आनन्द, मंगलाचार, गुरु-आज्ञा और लोक-रीति के माध्यम से साधक के मन में ‘श्रद्धा’ का स्थिर आसन मिलता है। इस खण्ड में विवाहोत्तर गृह-प्रवेश, पूजन, दान, आशीष, और रात्रि-विश्राम जैसे दृश्य ‘धर्म-समाज’ की स्थापना करते हैं: भक्ति केवल अंतःभाव नहीं, बल्कि संस्कार-रूप जीवन-यज्ञ है।
يصور هذا المقطع بكثافة "البهجة الميمونة لأيوديا" بعد الزفاف في بالاكاندا. ويعتمد الجوهر الشعري على رابط الزوجية ومحبة قلب الأم، لكن نغمته الباطنة هي التسليم والسلام، إذ يصبح كل فعل كغسل القدمين والآراتي والعطايا وعبادة الغورو والقرابين للآلهة والأجداد شكلاً راقياً من الممارسة الروحية. ولا يحتقر تولسيداس العادات الدنيوية، بل يقدسها من خلال الارتباط براما. وتحوّل التشبيهات هذا المهرجان المنزلي إلى رمز للتحرر الروحي: فثمرة البهكتي ليست فقط في العالم الآخر، بل هي فرح يُذاق هنا والآن. ويشكل وصول الغورو فاسيشتا وكاوشيكا وإنشاد مجد القصة في البلاط الملكي جسراً بين الكتاب المقدس وليلا الإلهي.
Verse 736 (चौपाई)
चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए।। तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनित पखारे।। धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि।। बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं।। बस्तु अनेक निछावर होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं।। पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृत लहेउ जनु संतत रोगीं।। जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा।। मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई।।
أربعة عروش، جميلة المنظر، كانت قائمة هناك، وكأن كاماديفا نفسه قد صاغها بيديه. جلس الأمراء والأميرات عليها، وبخشوع غُسلت أقدامهم وطُهرت. بالبخور والمصابيح والقرابين والطقوس الفيدية، عُبد العرسان والعروسات، وهم كنوز البركة. اثنتي عشرة مرة أقاموا مراسم الآراتي، ولوحت المراوح الجميلة وذيول الياك فوق رؤوسهم. وُهبت هدايا لا تُعد ولا تُحصى، والأمهات المملوءات فرحاً نظرن بسرور. كان الأمر كأن يوغي قد نال الحقيقة العليا، أو كأن مريضاً أبدياً قد نال رحيق الخلود. كان الأمر كأن فقيراً منذ مولده قد عثر على حجر الفلاسفة، أو كأن أعمى قد نال نعمة البصر. كان الأمر كأن الأخرس قد نال موهبة البيان من ساراسواتي، أو كأن محارباً قد انتصر في المعركة.
Verse 737 (दोहा/सोरठा)
एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।। भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु।।350(क)।। लोक रीत जननी करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं। मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसकाहिं।।350(ख)।।
من هذه الفرحة نالت الأمهات سعادة أعظم بمئة مليون ضعف. مع إخوتهم، عاد قمر سلالة راغو إلى منزله مع عروسه. حسب العادة الدنيوية، سخرت الأمهات من العروسات الجدد اللواتي شعرن بالخجل. عند رؤية راما العظيم، احتفلوا وابتهجوا، بينما ابتسم راما في قلبه.
Verse 738 (चौपाई)
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की।। सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना।। अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेंहीं।। भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे।। आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि।। पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए।। जाचक जन जाचहि जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई।। सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना।।
عبدوا الآلهة والأسلاف بالطقوس اللائقة، وحققوا كل رغبات قلوبهم. بعد السجود للجميع، طلبوا البركات: ليت راما وإخوته يزدهرون إلى الأبد. الآلهة، وإن كانوا غير مرئيين، منحوا بركاتهم، والأمهات الفرحات تقبلنها بأيادٍ مطوية. استدعى الملك ضيوف الزفاف واستقبلهم، وعالجاً حاجاتهم، منحهم الملابس والجواهر والحلي. بعد تلقي الأمر وإبقاء راما في قلوبهم، عاد الجميع بفرح إلى بيوتهم. رجال المدينة ونساؤها ارتدوا جميعاً ملابس فاخرة، وفي كل بيت بدأت آلات الاحتفال تعزف. مهما طلب المتوسلون، فإن الملك الفرح أعطاهم ذلك بالضبط. تلقى جميع الخدم هدايا متنوعة، وأكمل الملك عطاياه وأظهر لهم التكريم.
Verse 739 (दोहा/सोरठा)
देंहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ। तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ।।351।।
قدم الجميع البركات والتحيات، وغنوا أغاني فضائل لا تُعد. ثم سيد البشر، مع معلمه والبراهمة، ودع المنزل.
Verse 740 (चौपाई)
जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही।। भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी।। पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाँए।। आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे।। बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा।। कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी।। भीतर भवन दीन्ह बर बासु। मन जोगवत रह नृप रनिवासू।। पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी।।
مهما كانت التعليمات التي قدمها فاشيشثا، نفذها الملك بخشوع، وفقاً للفيدا والنظام السليم. عند رؤية جميع الملكات مملوءات بالفرح، نهض البراهمة باحترام، عالمين بحظهم العظيم. غسلوا أقدامهم وأزالوا كل تعب، وأكرموهم جيداً وأطعمهم الملك. بالتكريم والهدايا والرعاية المحبة، قدموا البركات وغادروا وقلوبهم راضية. بطرق كثيرة عبد ابن غادهي، وقال: يا رب، لا أحد مبارك مثلي. امتدح الملك كثيراً، ومع الملكات، أخذ غبار قدميه. منحهم مساكن فاخرة داخل القصر، وبقي الملك مخلصاً بقلبه لوجود الحكيم. مرة أخرى عبد قدمي المعلم اللوتس وتضرع، بمحبة كبيرة في قلبه.
Verse 741 (दोहा/सोरठा)
बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु। पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु।।352।।
مع العروسات، جميع الأمراء، والملكات، يسجد الملك مراراً وتكراراً عند قدمي المعلم، بينما سيد الحكماء يمنح البركات.
Verse 742 (चौपाई)
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें।। नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा।। उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता।। बिप्रबधू सब भूप बोलाई। चैल चारु भूषन पहिराई।। बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं।। नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरुप भूपमनि देहीं।। प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने।। देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू।।
تضرع بمحبة كبيرة في قلبه، واضعاً أبناءه وثروته أمامه. طلب هدية الزفاف وقبلها من سيد الحكماء، وتلقى البركات بطرق كثيرة. حاملاً راما وسيتا في قلبه، ابتهج وودع معلمه للعودة إلى المنزل. استدعى جميع سيدات البراهمة وألبسهن ملابس فاخرة وحلي جميلة. مرة أخرى استدعى النساء المتزوجات وقبلهن، وبالنظر لما يسرهن، أعطاهن ملابس ليرتدينها. تلقى ضيوف الزفاف جميع الهدايا المناسبة، وأعطى الملك ما يناسب أذواقهم. الذين عرفوا الضيوف الأعزاء يستحقون التكريم، أكرمهم الملك حسناً. عند رؤية زواج سيد راغو، أمطرت الآلهة الزهور وأثنت عليه بابتهاج.
Verse 743 (दोहा/सोरठा)
चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ। कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ।।353।।
غادرت الآلهة، عازفة آلاتها، وعاد كل واحد إلى مدينته بفرح. تحدثوا فيما بينهم عن شهرة راما، وقلوبهم لا تستطيع احتواء حبهم.
Verse 744 (चौपाई)
सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू।। जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे।। लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता।। बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं।। देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू।। कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि हरषु होत सब काहू।। जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई।। बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी।।
بكل طريقة أظهر سيد البشر التكريم للجميع، وظل قلبه ممتلئاً فيضاً بالفرح. أينما كانت أجنحة النساء، هناك وضع قدميه، ومع العروسات تأمل الأمراء. حملهما في أحضانه بسرور، ومن يستطيع وصف مقدار السعادة؟ العروسات بحنان أجلسنهم في أحضانهن، ومراراً وتكراراً ضمموهن إلى قلوبهن بفرح. عند رؤية التجمع، ابتهجت نساء القصر، وجعل الفرح مسكنه في قلب الجميع. أخبر الملك كيف تم الزفاف، وعند سماعه، نشأ الفرح في الجميع. فضائل الملك جاناكا وشخصيته وعظمته، حبه وتقاليده وثروته كانت جميعها جميلة. بطرق كثيرة وصف الملك الأمر كما قد يغني الشعراء، وسمعت جميع الملكات وابتهجن بالرواية.
Verse 745 (दोहा/सोरठा)
सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति। भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति।।354।।
اغتسل الملك مع أبنائه، وبعد استدعاء البراهمة والمعلمين والأقارب، أطعمهم بطرق كثيرة، ومرت الليلة في خمس ساعات.
Verse 746 (चौपाई)
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि।। अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए।। रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई।। प्रेम प्रमोद बिनोदु बढ़ाई। समउ समाजु मनोहरताई।। कहि न सकहि सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू।। सो मै कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी।। नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाई रानी।। बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाई।।
غنّت النساء البراهمة الجميلات أغاني مباركة، وأصبحت الليلة البهيجة أصل كل سرور. وزُعّت أوراق البيتل على الجميع، وامتلأ المكان كله بعطر فائق، وازدان بجمال باهر. ولما رأوا راما، شبع الجميع رضاً، فانحنوا برؤوسهم ومضوا إلى بيوتهم. وتزايد الحب والسرور والمرح، وصار الوقت والجمع أشد سحراً. وشيشا ذو الألف غطاء، وبراهما وشيفا وغانشا، والفيدا وإلهة العلم، لا يقدرون على وصفه بالتمام. فكيف أصفه أنا؟ هل يحمل ثعبان الأرض العالم على رأسه، أم تحمله الأرض؟ وأكرم الملك الجميع بكل وجه، ونادى الملكات بكلمات لطيفة. وجاءت العرائس كفتيات إلى بيت جديد، فصانهن كحدقة عينيه.
Verse 747 (दोहा/सोरठा)
लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ। अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ।।355।।
قال: "الأطفال متعبون نعسون، فاذهبوا وأضجعوهم." ثم مضى إلى مخدع راحته، وعقله متمسك بقدمي راما.
Verse 748 (चौपाई)
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए।। सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना।। उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं।। रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा।। सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए।। अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही।। देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता।। मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी।।
ولما سمعوا كلام الملك سُرّوا طبعاً، وبُسطت أسرة ذهبية مرصعة بالجواهر. وكانت جميلة عطرة، بيضاء كزبد اللبن، ناعمة الصنع على أنواع شتى. وكانت أغطيتها من أجود نوع لا يُوصف، وامتلأت الغرف المزينة بالجواهر بالعطر. وكانت هناك مصابيح من الجواهر ومظلات جميلة، لا يُحكى عنها لأن من يقدر على معرفتها كلها؟ ورُفع راما وأُضجع على سرير بهي، وبحب وُضع على الفراش. وأُذن للإخوة مراراً، فمضوا إلى مضاجعهم. ولما رأت الأمهات جسم راما الأسمر الناعم الجميل، تكلمن بكلمات مملوءة حباً. قلن: "كان الطريق مخيفاً جداً، فبأي وسيلة يا بني قتلت تاداكا؟"
Verse 749 (दोहा/सोरठा)
घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।। मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु।।356।।
كانت وحوش الليل هائلة والغابة موحشة، والجموع في الحرب لا يواجهها أحد. فكيف قتلت الأشرار ماريشا وسوباهو مع أعوانهم؟
Verse 750 (चौपाई)
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।। मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई।। मुनितय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी।। कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा।। बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई।। सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे।। आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा।। जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।
بنعمة الحكيم يا بني قهرت آلهة كثيرين وصرعتهم. وحفظت الذبيحة أنت وأخوك، وبنعمة الغرو حصلتما على كل علم. وتمسكتم أبداً بغبار قدمي الحكيم، وانتشر ذكركم في العالم كله. وكسرتم قوس شيفا العظيم في جمع الملوك كما يُكسر القصب أو القشرة الصلبة. ونلتم شهرة عالمية، وجئتم إلى البيت، وتزوج جميع الإخوة. كل أفعالكم فوق طاقة البشر، ولم تتم إلا برحمة كوشيكا. واليوم تم ميلادنا في هذا العالم، حين رأينا وجهك كالقمر يا بني. أما الأيام التي مرت بلا رؤيتك، فليحسبها براهما دهوراً.
Verse 751 (दोहा/सोरठा)
राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन। सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन।।357।।
أرضى راما أمهات جميعاً بكلمات متواضعة جميلة، وانحنى عند قدمي شيفا وغرويه والبراهمة، ثم أغمض عينيه ونام.
Verse 752 (चौपाई)
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना।। घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं।। पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी।। सुंदर बधुन्ह सासु लै सोई। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोई।। प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे।। बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए।। बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता।। जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे।।
وكان وجهه في النوم يلمع جمالاً، كاللوتس عند المساء يطوي أوراقه. وفي كل بيت سهرت النساء، يغنين لبعضهن أغاني مباركة. وكانت المدينة تتألق في الليل، وقالت الملكات: "انظرن يا صديقات إلى العريس الجميل." وضمّت الحماة العريس الجميل إلى صدرها، كما يطوي ثعبان شيشا الجوهرة على رأسه. وفي ساعة الفجر المقدسة استيقظ الرب، وبدأت الببغاوات ذات العرف الجميل تتكلم. وغنى المغنون مديحه، وجاء أهل المدينة إلى الباب للتحية. وانحنى للبراهمة والآلهة والغرو والأب والأم، ونال البركة فسرّ جميع الإخوة. ونظرت الأمهات إلى وجهه بمحبة، ووقف مع الملك عند الباب.
Verse 753 (दोहा/सोरठा)
कीन्ह सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ। प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ।।358।।
تطهر بطهارة طبيعية، واغتسل في النهر المقدس، وبعد أن أتم طقوس الصباح جاء الإخوة الأربعة أمام أبيهم.
Verse 754 (चौपाई)
भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई।। देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी।। पुनि बसिष्टु मुनि कौसिक आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए।। सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे।। कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा।। मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी।। बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची।। सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू।।
ولما رآهم الملك ضمّهم إلى صدره، وجلس مسروراً بنيل ما في قلبه. ولما رأوا راما امتلأت الجماعة كلها سروراً، وحسبوا رؤيته ربحاً لا حد له. ثم جاء فاشيشتا الحكيم وكوشيكا، فأجلس الحكماء على مقاعد جميلة. وعبّر هم وأبناؤهم عند أقدام الحكماء، ونظر الغروان إلى راما بمحبة. وروى فاشيشتا تاريخ البر، واستمع الملك والملكات. وكانت أفعال ابن غادهي فوق فكر الحكماء، فوصفها فاشيشتا المسرور طويلاً. وقال فاماديفا: "هذا كله حق، وانتشر ذكره في العوالم الثلاثة." فلما سمعوا هذا سرّ الجميع، وفي قلب راما ولاكشمانا بالغ السرور.
Verse 755 (दोहा/सोरठा)
मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति। उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति।।359।।
ومرت الأيام يوماً بعد يوم في سرور وبهجة ومرح على هذا النحو. وامتلأت أيوديا بالسعادة، وتزايد الفرح أكثر فأكثر.
परम्परा में यह खण्ड ‘गृह-मंगल’ और ‘दाम्पत्य-संस्कार’ को राम-सम्बन्ध से पवित्र करने वाला माना जाता है—श्रवण/पाठ से घर में सौहार्द, दान-प्रवृत्ति, गुरु-भक्ति और ‘वात्सल्य-रस’ की वृद्धि होती है; विशेषतः विवाह, गृह-प्रवेश, या कुल-देवता पूजन के अवसर पर मंगल-पाठ के रूप में फलदायक कहा जाता है।
मंगल-सम्पुट के रूप में अनेक परम्पराएँ ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘सियाराममय सब जग जानी’ का जप-सम्पुट जोड़ती हैं; गृह-मंगल प्रसंगों में ‘राम’ नाम-सम्पुट (प्रत्येक दोहा/चौपाई के बाद ‘राम राम’) भी लोक-प्रचलित है।
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