
Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana (Śaraṇāgata-Atithi-Dharma Episode)
Bhīṣma narrates a forest exemplum in which a bird (host) laments the absence of his spouse and extols the wife as the principal support of household life—emotionally, ethically, and pragmatically—especially in adversity. The spouse returns having been seized by a hunter; hearing her husband’s distress, she counsels him toward śreyas: to become a protector of one who has sought refuge, even if the seeker is the hunter himself. The host then welcomes the hunter as a guest, offers warmth by arranging fuel and lighting a fire, and speaks the language of non-fear and belonging within the host’s dwelling. When asked for food, the host confesses scarcity and the absence of stored provisions typical of forest life. Resolving the dharmic tension between inability and obligation, the host affirms a firm intention toward atithi-pūjā and, after circumambulating the fire, enters it—an act presented as the extreme completion of hospitality. The hunter, witnessing this, collapses into remorse, recognizing the ethical gravity of harming such a host and anticipating the consequences of adharma.
Chapter Arc: युधिष्ठिर, युद्धोत्तर ध्वंस और लोक-व्यवस्था के टूटने का चित्र खींचते हुए पूछते हैं—जब मर्यादाएँ नष्ट हों, धर्म-निश्चय डगमगा जाए, और भय-भूख से जन-जीवन उजड़ जाए, तब मनुष्य किस धर्म का आश्रय ले? → भीषण आपत्ति-काल का दृश्य उभरता है—कहीं चोरों का आतंक, कहीं शस्त्रों का भय, कहीं राजाओं का उत्पीड़न; ब्राह्मण और रक्षक-वृन्द नष्ट, औषधि-अन्न के संचय मिटे, पृथ्वी मानो करुण-ध्वनियों से भर उठी। इसी पृष्ठभूमि में विश्वामित्र–चाण्डाल संवाद का प्रसंग आता है, जहाँ महर्षि भूख से विवश होकर निषिद्ध कर्म की ओर झुकते हैं। → विश्वामित्र जानते हुए भी कहते हैं कि यह अधर्म है, फिर भी वे कुत्ते की जाँघ (श्वजाघनी) उठा ले जाने का निश्चय करते हैं—यहीं आपद्धर्म की सीमा और आत्म-धर्म का संकट चरम पर पहुँचता है। चाण्डाल घबराकर उठता है और रोकता है: किसी असाधु के अनुचित कर्म को सनातन धर्म नहीं कहा जा सकता; आप बहाने से भी अकरणीय कर्म न करें—धर्म न हीयते, ऐसा आचरण करें। → चाण्डाल का उपदेश कथा को एक नैतिक कसौटी पर टिकाता है—आपत्ति में भी ‘धर्म-हानि’ का भय वास्तविक है; अतः निर्णय ऐसा हो जो जीवन-रक्षा और धर्म-रक्षा—दोनों के बीच न्यूनतम पतन का मार्ग चुने। अध्याय का निष्कर्ष संवादात्मक है: आपद्धर्म का प्रश्न नियमों की सूची नहीं, विवेक और मर्यादा की परीक्षा है। → विश्वामित्र की विवशता और चाण्डाल की रोक—इन दोनों के बीच अंतिम निर्णय किस ओर झुकेगा, और ‘धर्म न हीयते’ की शर्त कैसे पूरी होगी—यह तनाव आगे के संवाद के लिए छोड़ दिया जाता है।
Verse 1
- कोयलका श्रेष्ठ गुण है कण्ठकी मधुरता, सूअरके आक्रमणको रोकना कठिन है, यही उसकी विशेषता है; मेरुका गुण है सबसे अधिक उन्नत होना, सूने घरकी विशेषता है अनेकको आश्रय देना, नटका गुण है दूसरोंको अपने क्रिया- कौशलद्दारा संतुष्ट करना तथा अनुरक्त सुहृदकी विशेषता है हितपरायणता। ये सारे गुण राजाको अपनाने चाहिये। एकचत्वारिंशर्दाधिकशततमो< ध्याय: 'ब्राह्ण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे” इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद युधिछिर उवाच हीने परमके धर्मे सर्वतोकाभिलड्घिते । अधर्मे धर्मतां नीते धर्मे चाधर्मतां गते,युधिष्ठिरने पूछा--प्रजानाथ! भरतनन्दन! भूपाल-शिरोमणे! जब सब लोगोंके द्वारा धर्मका उल्लंघन होनेके कारण श्रेष्ठ धर्म क्षीण हो चले, अधर्मको धर्म मान लिया जाय और धर्मको अधर्म समझा जाने लगे, सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जाया, धर्मका निश्चय डावाँडोल हो जाय, राजा अथवा शत्रु प्रजाको पीड़ा देने लगें, सभी आश्रम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायूँ, धर्म-कर्म नष्ट हो जायूँ, काम, लोभ तथा मोहके कारण सबको सर्वत्र भय दिखायी देने लगे, किसीका किसीपर विश्वास न रह जाय, सभी सदा डरते रहें, लोग धोखेसे एक-दूसरेको मारने लगें, सभी आपसमें ठगी करने लगें, देशमें सब ओर आग लगायी जाने लगे, ब्राह्मण अत्यन्त पीड़ित हो जाय, वृष्टि न हो, परस्पर वैर-विरोध और फूट बढ़ जाय और पृथ्वीपर जीविकाके सारे साधन लुटेरोंके अधीन हो जाय, तब ऐसा अधम समय उपस्थित होनेपर ब्राह्मण किस उपायसे जीवन-निर्वाह करे?
ယုဓိဋ္ဌိရက မေးသည်– အမြင့်မြတ်ဆုံးသော ဓမ္မသည် ကျဆင်း၍ အရပ်ရပ်တွင် ချိုးဖောက်ခံရသောအခါ၊ အဓမ္မကို ဓမ္မဟု သတ်မှတ်ကြပြီး ဓမ္မကိုပင် အဓမ္မဟု စီရင်ကြသည့်အခါ—ဤကဲ့သို့ ကြောက်မက်ဖွယ် သီလစည်းကမ်း ပျက်စီးယိုယွင်းသည့်ကာလ၌ ဗြာဟ္မဏသည် မည်သည့်နည်းဖြင့် အသက်မွေးဝမ်းကျောင်း ပြုသင့်သနည်း။
Verse 2
मर्यादासु विनष्टास क्षुभिते धर्मनिश्चये । राजशि: पीडिते लोके परैर्वापि विशाम्पते,युधिष्ठिरने पूछा--प्रजानाथ! भरतनन्दन! भूपाल-शिरोमणे! जब सब लोगोंके द्वारा धर्मका उल्लंघन होनेके कारण श्रेष्ठ धर्म क्षीण हो चले, अधर्मको धर्म मान लिया जाय और धर्मको अधर्म समझा जाने लगे, सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जाया, धर्मका निश्चय डावाँडोल हो जाय, राजा अथवा शत्रु प्रजाको पीड़ा देने लगें, सभी आश्रम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायूँ, धर्म-कर्म नष्ट हो जायूँ, काम, लोभ तथा मोहके कारण सबको सर्वत्र भय दिखायी देने लगे, किसीका किसीपर विश्वास न रह जाय, सभी सदा डरते रहें, लोग धोखेसे एक-दूसरेको मारने लगें, सभी आपसमें ठगी करने लगें, देशमें सब ओर आग लगायी जाने लगे, ब्राह्मण अत्यन्त पीड़ित हो जाय, वृष्टि न हो, परस्पर वैर-विरोध और फूट बढ़ जाय और पृथ्वीपर जीविकाके सारे साधन लुटेरोंके अधीन हो जाय, तब ऐसा अधम समय उपस्थित होनेपर ब्राह्मण किस उपायसे जीवन-निर्वाह करे?
ယုဓိဋ္ဌိရက မေးသည်– အကျင့်စည်းကမ်း၏ နယ်နိမိတ်များ ပျက်စီးသွား၍ ဓမ္မအပေါ် ယုံကြည်ချက်နှင့် ဆုံးဖြတ်ချက်တို့ ရောထွေးလှုပ်ရှားသည့်အခါ၊ လူထုသည် ဖိနှိပ်ခံရသည့်အခါ—ဓမ္မဘုရင်တော်ကိုယ်တိုင်ဖြစ်စေ၊ ရန်သူအင်အားများဖြစ်စေ—အို ပြည်သူတို့၏ အရှင်၊ ဤကဲ့သို့ နိမ့်ကျသောကာလ၌ ဗြာဟ္မဏသည် မည်သည့် အသက်မွေးဝမ်းကျောင်းနည်းကို လက်ခံသင့်သနည်း။
Verse 3
सर्वाश्रमेषु मूढेषु कर्मसूपहतेषु च । कामाल्लोभाच्च मोहाच्च भयं पश्यत्सु भारत,युधिष्ठिरने पूछा--प्रजानाथ! भरतनन्दन! भूपाल-शिरोमणे! जब सब लोगोंके द्वारा धर्मका उल्लंघन होनेके कारण श्रेष्ठ धर्म क्षीण हो चले, अधर्मको धर्म मान लिया जाय और धर्मको अधर्म समझा जाने लगे, सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जाया, धर्मका निश्चय डावाँडोल हो जाय, राजा अथवा शत्रु प्रजाको पीड़ा देने लगें, सभी आश्रम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायूँ, धर्म-कर्म नष्ट हो जायूँ, काम, लोभ तथा मोहके कारण सबको सर्वत्र भय दिखायी देने लगे, किसीका किसीपर विश्वास न रह जाय, सभी सदा डरते रहें, लोग धोखेसे एक-दूसरेको मारने लगें, सभी आपसमें ठगी करने लगें, देशमें सब ओर आग लगायी जाने लगे, ब्राह्मण अत्यन्त पीड़ित हो जाय, वृष्टि न हो, परस्पर वैर-विरोध और फूट बढ़ जाय और पृथ्वीपर जीविकाके सारे साधन लुटेरोंके अधीन हो जाय, तब ऐसा अधम समय उपस्थित होनेपर ब्राह्मण किस उपायसे जीवन-निर्वाह करे?
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်– «အို ဘာရတ၊ လူတို့သည် အာရှရမ်အဆင့်တိုင်း၌ မောဟဖြစ်၍ မိမိတို့၏ သင့်တော်သော တာဝန်ကံများ ပျက်စီးသွားသောအခါ၊ ကာမ၊ လောဘ၊ မောဟတို့ကြောင့် နေရာတိုင်းတွင် ကြောက်ရွံ့မှုကိုသာ မြင်နေရသောအခါ—ထိုကဲ့သို့သောကာလ၌ မည်သို့ ပြုရမည်နည်း?»
Verse 4
अविश्वस्तेषु सर्वेषु नित्यं भीतेषु पार्थिव । निकृत्या हन्यमानेषु वज्चयत्सु परस्परम्,युधिष्ठिरने पूछा--प्रजानाथ! भरतनन्दन! भूपाल-शिरोमणे! जब सब लोगोंके द्वारा धर्मका उल्लंघन होनेके कारण श्रेष्ठ धर्म क्षीण हो चले, अधर्मको धर्म मान लिया जाय और धर्मको अधर्म समझा जाने लगे, सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जाया, धर्मका निश्चय डावाँडोल हो जाय, राजा अथवा शत्रु प्रजाको पीड़ा देने लगें, सभी आश्रम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायूँ, धर्म-कर्म नष्ट हो जायूँ, काम, लोभ तथा मोहके कारण सबको सर्वत्र भय दिखायी देने लगे, किसीका किसीपर विश्वास न रह जाय, सभी सदा डरते रहें, लोग धोखेसे एक-दूसरेको मारने लगें, सभी आपसमें ठगी करने लगें, देशमें सब ओर आग लगायी जाने लगे, ब्राह्मण अत्यन्त पीड़ित हो जाय, वृष्टि न हो, परस्पर वैर-विरोध और फूट बढ़ जाय और पृथ्वीपर जीविकाके सारे साधन लुटेरोंके अधीन हो जाय, तब ऐसा अधम समय उपस्थित होनेपर ब्राह्मण किस उपायसे जीवन-निर्वाह करे?
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်– «အို မင်းကြီး၊ လူအားလုံး ယုံကြည်မှုကင်းမဲ့၍ အမြဲတမ်း ကြောက်ရွံ့နေကြသောအခါ၊ လှည့်ကွက်သစ္စာဖောက်မှုကြောင့် သတ်ဖြတ်ခံရကြသောအခါ၊ အချင်းချင်း လိမ်လည်လှည့်ဖြားကြသောအခါ—ဤကဲ့သို့သော ယုတ်ညံ့သောကာလ၌ သင့်တော်သော အကျင့်စံနှုန်းများပင် ပြိုလဲသွားလျှင်—ဗြာဟ္မဏသည် မည်သည့်နည်းဖြင့် အသက်မွေးဝမ်းကျောင်းရမည်နည်း?»
Verse 5
सम्प्रदीप्तेषु देशेषु ब्राह्मणे चातिपीडिते । अवर्षति च पर्जन्ये मिथो भेदे समुत्थिते,युधिष्ठिरने पूछा--प्रजानाथ! भरतनन्दन! भूपाल-शिरोमणे! जब सब लोगोंके द्वारा धर्मका उल्लंघन होनेके कारण श्रेष्ठ धर्म क्षीण हो चले, अधर्मको धर्म मान लिया जाय और धर्मको अधर्म समझा जाने लगे, सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जाया, धर्मका निश्चय डावाँडोल हो जाय, राजा अथवा शत्रु प्रजाको पीड़ा देने लगें, सभी आश्रम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायूँ, धर्म-कर्म नष्ट हो जायूँ, काम, लोभ तथा मोहके कारण सबको सर्वत्र भय दिखायी देने लगे, किसीका किसीपर विश्वास न रह जाय, सभी सदा डरते रहें, लोग धोखेसे एक-दूसरेको मारने लगें, सभी आपसमें ठगी करने लगें, देशमें सब ओर आग लगायी जाने लगे, ब्राह्मण अत्यन्त पीड़ित हो जाय, वृष्टि न हो, परस्पर वैर-विरोध और फूट बढ़ जाय और पृथ्वीपर जीविकाके सारे साधन लुटेरोंके अधीन हो जाय, तब ऐसा अधम समय उपस्थित होनेपर ब्राह्मण किस उपायसे जीवन-निर्वाह करे?
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်– «အို ပြည်သူတို့၏ အရှင်၊ ဒေသများ မီးလောင်သကဲ့သို့ အနှောင့်အယှက်များဖြင့် လောင်ကျွမ်းနေသောအခါ၊ ဗြာဟ္မဏသည် ပြင်းထန်စွာ ဖိနှိပ်ခံရသောအခါ၊ မိုးနတ်သည် မိုးရွာခြင်းကို တားဆီးထားသောအခါ၊ အချင်းချင်း ကွဲပြားမှုနှင့် ရန်ငြိုးများ ပေါ်ပေါက်လာသောအခါ—ဤကဲ့သို့သော ယုတ်ညံ့သောကာလ၌—ဗြာဟ္မဏသည် မည်သည့်နည်းဖြင့် အသက်မွေးဝမ်းကျောင်းရမည်နည်း?»
Verse 6
सर्वस्मिन् दस्युसाद् भूते पृथिव्यामुपजीवने । केनस्विद् ब्राह्म॒णो जीवेज्जघन्ये काल आगते,युधिष्ठिरने पूछा--प्रजानाथ! भरतनन्दन! भूपाल-शिरोमणे! जब सब लोगोंके द्वारा धर्मका उल्लंघन होनेके कारण श्रेष्ठ धर्म क्षीण हो चले, अधर्मको धर्म मान लिया जाय और धर्मको अधर्म समझा जाने लगे, सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जाया, धर्मका निश्चय डावाँडोल हो जाय, राजा अथवा शत्रु प्रजाको पीड़ा देने लगें, सभी आश्रम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायूँ, धर्म-कर्म नष्ट हो जायूँ, काम, लोभ तथा मोहके कारण सबको सर्वत्र भय दिखायी देने लगे, किसीका किसीपर विश्वास न रह जाय, सभी सदा डरते रहें, लोग धोखेसे एक-दूसरेको मारने लगें, सभी आपसमें ठगी करने लगें, देशमें सब ओर आग लगायी जाने लगे, ब्राह्मण अत्यन्त पीड़ित हो जाय, वृष्टि न हो, परस्पर वैर-विरोध और फूट बढ़ जाय और पृथ्वीपर जीविकाके सारे साधन लुटेरोंके अधीन हो जाय, तब ऐसा अधम समय उपस्थित होनेपर ब्राह्मण किस उपायसे जीवन-निर्वाह करे?
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်– «ဤမြေပြင်ပေါ်၌ အသက်မွေးဝမ်းကျောင်းရန် နည်းလမ်းများအားလုံး နေရာတိုင်းတွင် ဒုစရိုက်သူခိုး၊ လုယက်သူတို့၏ အာဏာအောက်သို့ ကျရောက်သွားသောအခါ—အလွန်ယုတ်ညံ့သောကာလ ရောက်လာသောအခါ—ဗြာဟ္မဏသည် မည်သည့်နည်းဖြင့် အသက်ရှင်ရမည်နည်း?»
Verse 7
अतित्तिक्षु: पुत्रपौत्राननुक्रोशान् नराधिप । कथमापत्सु वर्तेत तन्मे ब्रूहि पितामह,नरेश्वर! पितामह! यदि ब्राह्मण ऐसी आपत्तिके समय दयावश अपने पुत्र-पौत्रोंका परित्याग करना न चाहे तो वह कैसे जीविका चलावे, यह मुझे बतानेकी कृपा करें
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်– «အို လူတို့၏ အရှင်၊ လူတစ်ဦးသည် ကရုဏာကြောင့် မိမိ၏ သားနှင့် မြေးတို့ကို စွန့်ပစ်ရန် မတတ်နိုင်လျှင်၊ အပတ်အတန့်ကာလများ၌ မည်သို့ ပြုမူနေထိုင်သင့်သနည်း။ အို ပိတామဟ၊ မင်းတို့အနက် အရှင်ကြီး၊ ကျွန်ုပ်အား ပြောပြပါ»
Verse 8
कथं च राजा वर्तेत लोके कलुषतां गते । कथमर्थाच्च धर्माच्च न हीयेत परंतप,परंतप! जब लोग पापपरायण हो जाये, उस अवस्थामें राजा कैसा बर्ताव करे, जिससे वह धर्म और अर्थसे भी भ्रष्ट न हो?
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်– «လောကသည် သီလအကျင့်ပျက်စီး၍ လူတို့သည် အပြစ်သို့ လှည့်ယိုင်သွားသောအခါ၊ ဘုရင်သည် မည်သို့ အုပ်ချုပ်ပြုမူသင့်သနည်း။ ထိုကဲ့သို့သောကာလတွင်ပင် ဓမ္မ (တရားသောတာဝန်) နှင့် အဓ္ဓ (ကောင်းမွန်သောအုပ်ချုပ်ရေးနှင့် ပစ္စည်းရေးရာကောင်းကျိုး) နှစ်ပါးမှ မကျဆင်းစေရန် မည်သို့ ထိန်းသိမ်းနိုင်မည်နည်း၊ အို ပရန္တပ?»
Verse 9
भीष्म उवाच राजमूला महाबाहो योगक्षेमसुवृष्टय: । प्रजासु व्याधयश्वचैव मरणं च भयानि च,भीष्मजीने कहा--महाबाहो! प्रजाके योग, क्षेम, उत्तम वृष्टि, व्याधि, मृत्यु और भय --इन सबका मूल कारण राजा ही है
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «အို မဟာဗာဟို၊ ပြည်သူတို့၏ ချမ်းသာရေးနှင့် လုံခြုံရေး၊ အချိန်မှန်၍ ကောင်းမွန်သော မိုးရွာသွန်းမှုတို့အပြင်၊ ပြည်သူအတွင်းရှိ ရောဂါ၊ သေဆုံးမှုနှင့် ကြောက်ရွံ့မှုတို့—ဤအရာအားလုံး၏ အမြစ်မှာ ဘုရင်ပင် ဖြစ်သည်။ အုပ်စိုးသူ၏ အကျင့်နှင့် အုပ်ချုပ်မှုသည် ပြည်သူတို့၏ ရွှင်လန်းဖွံ့ဖြိုးမှုနှင့် ဆင်းရဲဒုက္ခတို့ကို ဆုံးဖြတ်ပေးသော အကြောင်းရင်းဖြစ်သည်။»
Verse 10
कृतंत्रेतां द्वापरं च कलिश्न भरतर्षभ । राजमूला इति मतिर्मम नास्त्यत्र संशय:,भरतश्रेष्ठ! सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग--इन सबका मूल कारण राजा ही है, ऐसा मेरा विचार है। इसकी सत्यतामें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «အို ဘာရတတို့အနက် အထွတ်အမြတ်၊ ကృత၊ တ్రేతာ၊ ဒ్వာပရ၊ ကလိ ဟူသော ယုဂ်လေးပါးသည် ဘုရင်၌ အမြစ်တည်သည်။ ဤသည်မှာ ငါ၏ တည်ငြိမ်သော ယုံကြည်ချက်ဖြစ်၍၊ ဤအမှု၌ သံသယ တစ်စက်မျှ မရှိ။»
Verse 11
तम्मिंस्त्वभ्यागते काले प्रजानां दोषकारके । विज्ञानबलमास्थाय जीवितव्यं भवेत् तदा,प्रजाओंके लिये दोष उत्पन्न करनेवाले ऐसे भयानक समयके आनेपर ब्राह्मणको विज्ञानबलका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करना चाहिये
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «ပြည်သူတို့အတွက် အပြစ်အနာအဆာများကို မွေးဖွားစေသော ထိုကြောက်မက်ဖွယ်ကာလ ရောက်လာသောအခါ၊ ဗြာဟ္မဏသည် ဉာဏ်ပညာနှင့် ခွဲခြားသိမြင်မှု၏ အားကို အားထားကာ အသက်မွေးဝမ်းကျောင်းကို ဆက်လက်ထိန်းသိမ်းရမည်—ပျက်စီးစေသော စိတ်လှုပ်ရှားမှုများမဟုတ်ဘဲ ပညာဖြင့် ဦးဆောင်သော လမ်းကို ရွေးချယ်ရမည်။»
Verse 12
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । विश्वामित्रस्य संवाद चाण्डालस्य च पक्कणे,इस विषयमें चाण्डालके घरमें चाण्डाल और विश्वामित्रका जो संवाद हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण लोग दिया करते हैं
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «ဤအကြောင်း၌လည်း လူတို့သည် ရှေးဟောင်းအထောက်အထားတစ်ရပ်ကို ညွှန်းဆိုကြသည်။ ပက္ကဏ၌ (ချဏ္ဍာလ၏ အိမ်တွင်) ဖြစ်ပွားခဲ့သော ဝိශ්ဝာမိတ္တရနှင့် ချဏ္ဍာလ တို့၏ ဆွေးနွေးပြောဆိုမှုအကြောင်း ရှေးပုံပြင်ပင် ဖြစ်သည်။»
Verse 13
त्रेताद्वापरयो: संधौ तदा दैवविधिक्रमात् । अनावृष्टिरभूद् घोरा लोके द्वादशवार्षिकी,त्रेता और द्वापरके संधिकी बात है, दैववश संसारमें बारह वर्षोतक भयंकर अनावृष्टि हो गयी (वर्षा हुई ही नहीं)
ဘီရှ္မက မိန့်ကြားသည်– တ్రေတားယုဂနှင့် ဒွာပရယုဂတို့ ဆုံရာကာလ၌၊ နတ်ဘုရားတို့၏ အမိန့်အတိုင်း အလှည့်အပြောင်းဖြစ်၍ လောကတွင် ကြောက်မက်ဖွယ် မိုးခေါင်ရေရှားမှုကြီး ပေါ်ပေါက်လာကာ တစ်ဆယ့်နှစ်နှစ်တိုင်တိုင် ဆက်လက်ဖြစ်ပွား하였다။
Verse 14
प्रजानामतिवृद्धानां युगान्ते समुपस्थिते । त्रेताविमोक्षसमये द्वापरप्रतिपादने,त्रेतायुग प्रायः बीत गया था, द्वापरका आरम्भ हो रहा था, प्रजाएँ बहुत बढ़ गयी थीं, जिनके लिये वर्षा बंद हो जानेसे प्रलयकाल-सा उपस्थित हो गया
ဘီရှ္မက မိန့်ကြားသည်– ယုဂတစ်ခု၏ အဆုံးကာလ ရောက်လာပြီး လူထုသည် အလွန်အမင်း တိုးပွားနေစဉ်၊ တ్రေတားယုဂ ပျောက်ကွယ်သွားမည့်အချိန်နှင့် ဒွာပရယုဂ စတင်တည်ထောင်မည့်အခါ၌၊ လောကပျက်ကွက်သကဲ့သို့ ခံစားရစေသော အခြေအနေများ ပေါ်ပေါက်လာ하였다။
Verse 15
न ववर्ष सहस्राक्ष: प्रतिलोमो5भवद् गुरु: । जगाम दक्षिण मार्ग सोमो व्यावृत्तलक्षण:,इन्द्रने वर्षा बंद कर दी थी, बृहस्पति प्रतिलोम (वक्री) हो गया था, चन्द्रमा विकृत हो गया था और वह दक्षिण मार्गपर चला गया था
ဘီရှ္မက မိန့်ကြားသည်– သဟသ္ရာက္ṣ (အိန္ဒြ) သည် မိုးမရွာစေခဲ့၊ ဂုရု (ဗြဟ္စပတိ) သည် ဆန့်ကျင်သည့် လမ်းကြောင်းဖြင့် လှည့်ပြောင်းသွားခဲ့၊ လက္ခဏာများ ပျက်ယွင်းသွားသော လသည်လည်း ပြန်လှည့်ကာ တောင်ဘက်လမ်းကြောင်းသို့ သွားလေ၏။
Verse 16
नावश्यायो5पि तत्रा भूत् कुत एवाभ्रजातय: । नद्य: संक्षिप्ततोयौघा: किंचिदन्तर्गतास्तत:,उन दिनों कुहासा भी नहीं होता था, फिर बादल कहाँसे उत्पन्न होते। नदियोंका जलप्रवाह अत्यन्त क्षीण हो गया और कितनी ही नदियाँ अदृश्य हो गयीं
ဘီရှ္မက မိန့်ကြားသည်– ထိုနေ့ရက်များတွင် မိုးမြူတောင် မပေါ်လာခဲ့၊ ထိုသို့ဖြစ်လျှင် မိုးတိမ်တို့ ဘယ်က မွေးဖွားနိုင်မည်နည်း။ မြစ်များ၏ ရေစီးကြောင်းသည် အလွန်ပင် လျော့နည်း၍ သေးငယ်သွားကာ၊ ထိုအချိန်မှစ၍ မြစ်အချို့သည် မျက်စိမြင်ရာမှပင် ပျောက်ကွယ်သွား하였다။
Verse 17
सरांसि सरितश्लैव कूपा: प्रस्रवणानि च । हतत्विषो न लक्ष्यन्ते निसर्गाद् दैवकारितात्,बड़े-बड़े सरोवर, सरिताएँ, कूप और झरने भी उस दैवविहित अथवा स्वाभाविक अनावृष्टिसे श्रीहीन होकर दिखायी ही नहीं देते थे
ဘီရှ္မက မိန့်ကြားသည်– ကြီးမားသော ရေကန်များ၊ မြစ်များ၊ ရေတွင်းများနှင့် တောင်ရေစိမ့်များပင် ယခင်ကဲ့သို့ မမြင်ရတော့ဘဲ၊ သဘာဝလမ်းစဉ်အရ ဖြစ်စေ၊ ကံကြမ္မာက ချမှတ်စေသောအတိုင်း ဖြစ်စေ၊ ထိုမိုးခေါင်မှုကြောင့် ၎င်းတို့၏ တောက်ပမှုနှင့် ပြည့်ဝမှုသည် ချိုးဖျက်ခံခဲ့ရသည်။
Verse 18
उपशुष्कजलस्थाया विनिवृत्तसभाप्रपा । निवृत्तयज्ञस्वाध्याया निर्वषट्कारमज्ला,छोटे-छोटे जलाशय सर्वथा सूख गये। जलाभावके कारण पौंसले बंद हो गये। भूतलपर यज्ञ और स्वाध्यायका लोप हो गया। वषट्कार और मांगलिक उत्सवोंका कहीं नाम भी नहीं रह गया। खेती और गोरक्षा चौपट हो गयी, बाजार-हाट बंद हो गये। यूप और यज्ञोंका आयोजन समाप्त हो गया तथा बड़े-बड़े उत्सव नष्ट हो गये
ဘိဿမက မိန့်တော်မူသည်— «မြေပြင်၏ ရေများ ခြောက်သွေ့ကုန်၍ လူထုခန်းမများနှင့် လမ်းဘေးရေသောက်စခန်းများလည်း အသုံးမပြုတော့ကြ။ ယဇ္ဉပူဇော်မှုနှင့် ဝေဒသင်ယူခြင်းတို့ ရပ်တန့်ကာ အဟုတိပူဇော်ရာ၌ ‘ဝသတ်’ ဟူသော အော်ဟစ်သံ မကြားရတော့။ မင်္ဂလာကိစ္စများနှင့် ပွဲတော်ကြီးများလည်း ပျောက်ကွယ်သွားသည်။ ရေမရှိသဖြင့် လယ်ယာလုပ်ငန်းနှင့် နွားကာကွယ်စောင့်ရှောက်မှု ပျက်စီးကာ စျေးကွက်နှင့် ပွဲဈေးများ ပိတ်သိမ်းကြ။ ယူပ (ယဇ္ဉတိုင်) များလည်း မသုံးတော့ဘဲ မဟာပွဲတော်ကြီးများ ပျက်သုဉ်းသွားသည်»။
Verse 19
उच्छिन्नकृषिगोरक्षा निवृत्तविपणापणा । निवृत्तयूपसम्भारा विप्रणष्टमहोत्सवा,छोटे-छोटे जलाशय सर्वथा सूख गये। जलाभावके कारण पौंसले बंद हो गये। भूतलपर यज्ञ और स्वाध्यायका लोप हो गया। वषट्कार और मांगलिक उत्सवोंका कहीं नाम भी नहीं रह गया। खेती और गोरक्षा चौपट हो गयी, बाजार-हाट बंद हो गये। यूप और यज्ञोंका आयोजन समाप्त हो गया तथा बड़े-बड़े उत्सव नष्ट हो गये
ဘိဿမက မိန့်တော်မူသည်— «ကျဆင်းသည့်ကာလ၌ လယ်ယာလုပ်ငန်းနှင့် နွားကာကွယ်စောင့်ရှောက်မှု ပျက်စီး၍ စျေးကွက်နှင့် ကုန်သွယ်ရေး ရပ်တန့်သွားသည်။ ယဇ္ဉတိုင် (ယူပ) များဖြင့် အမှတ်အသားပြုသည့် ယဇ္ဉပွဲအတွက် ပြင်ဆင်မှုများလည်း ရပ်ကာ မင်္ဂလာပွဲတော်ကြီးများ ပျောက်ကွယ်သွားသည်။ ဤသည်မှာ ဓမ္မ၏ လူထုအထောက်အကူများ—အသက်မွေးဝမ်းကျောင်း၊ လဲလှယ်ကုန်သွယ်မှု၊ ယဇ္ဉပူဇော်မှု၊ နှင့် အစုလိုက်အပြုံလိုက် ပွဲတော်—တို့ ပြိုကွဲသွားသည့် လူ့လောက၏ ပျက်စီးခြင်းကို ပြသသည်»။
Verse 20
अस्थिसंचयसंकीर्णा महाभूतरवाकुला । शून्यभूयिष्तनगरा दग्धग्रामनिवेशना,सब ओर हड्ियोंके ढेर लग गये। प्राणियोंके महान् आर्तनाद सब ओर व्याप्त हो रहे थे। नगरके अधिकांश भाग उजाड़ हो गये थे तथा गाँव और घर जल गये थे
ဘိဿမက မိန့်တော်မူသည်— «နေရာတိုင်းတွင် အရိုးစုများ စုပုံထားသကဲ့သို့ ပြန့်ကျဲနေပြီး၊ အသက်ရှိသတ္တဝါတို့၏ ကြီးမားသော အော်ဟစ်ငိုကြွေးသံက ဒေသတစ်လျှောက် လှုပ်ခတ်စေ하였다။ မြို့၏ အများစုမှာ လူကင်းမဲ့သွားကာ ရွာများနှင့် အိမ်ယာများလည်း မီးလောင်ပြာကျခဲ့သည်»။
Verse 21
क्वचिच्चोरै: क्वचिच्छस्त्रै: क्वचिद् राजभिरातुरै: । परस्परभयाच्चैव शून्यभूयिष्ठनिर्जना,कहीं चोरोंसे, कहीं अस्त्र-शस्त्रोंसे, कहीं राजाओंसे और कहीं श्षुधातुर मनुष्योंद्वारा उपद्रव खड़ा होनेके कारण तथा पारस्परिक भयसे भी वसुधाका बहुत बड़ा भाग उजाड़ होकर निर्जन बन गया था
ဘိဿမက မိန့်တော်မူသည်— «တချို့နေရာများတွင် သူခိုးဓားပြများက ကြောက်လန့်စေ၍၊ တချို့နေရာများတွင် လက်နက်နှင့် အကြမ်းဖက်မှုက ထိတ်လန့်စေ၏။ အခြားနေရာများတွင် ဒုက္ခရောက်နေသော မင်းများကပင် ဖိနှိပ်မှု၏ အရင်းအမြစ် ဖြစ်လာကြသည်။ ထို့ပြင် လူအချင်းချင်း အပြန်အလှန်ကြောက်ရွံ့မှုကြောင့်လည်း မြေပြင်၏ အစိတ်အပိုင်းကြီးတစ်ခုလုံးသည် လူကင်းမဲ့သကဲ့သို့—အိုက်အိုက်မိုက်မိုက်၊ သဲသဲလွန်လွန်—ဖြစ်သွားသည်»။
Verse 22
गतदैवतसंस्थाना वृद्धबालविनाकृता । गोजाविमहिषीहीना परस्परपराहता,देवालय तथा मठ-मन्दिर आदि संस्थाएँ उठ गयी थीं, बालक और बूढ़े मर गये थे, गाय, भेड़, बकरी और भैंसें प्रायः समाप्त हो गयी थीं, क्षुधातुर प्राणी एक-दूसरेपर आघात करते थे
ဘိဿမက မိန့်တော်မူသည်— «မြေပြင်သည် သာသနာရေးအဖွဲ့အစည်းများနှင့် ဘုရားကျောင်း၊ ဘုန်းတော်ကြီးကျောင်းတို့ကဲ့သို့သော ပူဇော်ရာနေရာများကို ဆုံးရှုံးခဲ့သည်။ အိုသူငယ်သူတို့လည်း ပျက်စီးသေဆုံးကုန်၏။ နွား၊ သိုး၊ ဆိတ်၊ ကျွဲတို့သည် အများအားဖြင့် မကျန်တော့။ ဆာလောင်မှုကြောင့် အသက်ရှိသတ္တဝါတို့သည် တစ်ဦးနှင့်တစ်ဦး ထိုးနှက်တိုက်ခိုက်ကြ၏—ဓမ္မနှင့် အာဟာရပျက်စီးသည့်အခါ လူ့လောက ပြိုကွဲသွားခြင်း၏ ပုံရိပ်တစ်ခုပင်»။
Verse 23
हतविप्रा हतारक्षा प्रणष्टौषधिसंचया । सर्वभूतरुतप्राया बभूव वसुधा तदा,ब्राह्मण नष्ट हो गये थे। रक्षकवृन्दका भी विनाश हो गया था, ओषधियोंके समूह (अनाज और फल आदि) भी नष्ट हो गये थे, वसुधापर सब ओर समस्त प्राणियोंका हाहाकार व्याप्त हो रहा था
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «ထိုအခါ ဗြာဟ္မဏများ သတ်ဖြတ်ခံရပြီး ကာကွယ်စောင့်ရှောက်သူတို့လည်း ပျက်စီးသွားကာ ဆေးဖက်ဝင်အပင်များနှင့် စားနပ်ရိက္ခာသိုလှောင်မှုတို့ပါ ကုန်ခမ်းပျောက်ကွယ်သွား하였다။ ထိုအခါ မြေကြီးတစ်ပြင်လုံးသည် သက်ရှိအပေါင်းတို့၏ ငိုကြွေးညည်းတွားသံများဖြင့် အရပ်ရပ်ပြည့်နှက်သွား하였다»။
Verse 24
तस्मिन् प्रतिभये काले क्षते धर्मे युधिष्ठिर । बभूवु: क्षुधिता मर्त्या: खादमाना: परस्परम्,युधिष्ठिर! ऐसे भयंकर समयमें धर्मका नाश हो जानेके कारण भूखसे पीड़ित हुए मनुष्य एक-दूसरेको खाने लगे
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «ယုဓိဋ္ဌိရရေ၊ ထိုကြောက်မက်ဖွယ်ကာလ ရောက်လာ၍ ဓမ္မ ပျက်စီးသွားသောအခါ အစာငတ်ဒဏ်ကြောင့် နာကျင်နေသော လူသားတို့သည် တစ်ယောက်ကိုတစ်ယောက် စားသောက်ရန်တိုင်အောင် ရောက်သွားကြသည်»။
Verse 25
ऋषयो नियमांस्त्यक्त्वा परित्यज्याग्निदेवता: । आश्रमान् सम्परित्यज्य पर्यधावन्नितस्तत:,अग्निके उपासक ऋषिगण नियम और अमन्निहोत्र त्यागकर अपने आश्रमोंको भी छोड़कर भोजनके लिये इधर-उधर दौड़ रहे थे
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «ရိရှီတို့သည် မိမိတို့၏ စည်းကမ်းသတ်မှတ်ချက်များကို စွန့်လွှတ်ကာ အဂ္နိဟိုတြာ မီးပူဇော်ပွဲနှင့် မီး၏ဒေဝတာတို့ကိုပါ လက်လွှတ်ပြီး အာရှရမ်များကို စွန့်ခွာကာ အစာအတွက် ဒီဘက်ဟိုဘက် အရပ်ရပ်သို့ ပြေးလွှားကြသည်»။
Verse 26
विश्वामित्रो5थ भगवान् महर्षिरनिकेतन: । क्षुधापरिगतो धीमान् समन्तात् पर्यधावत,इन्हीं दिनों बुद्धिमान् महर्षि भगवान् विश्वामित्र भूखसे पीड़ित हो घर छोड़कर चारों ओर दौड़ लगा रहे थे
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «ထို့နောက် အိမ်အတည်မရှိသော မြတ်စွာသော မဟာရိရှီ ဗိශ්ဝာမိတ္တရသည် ဆာလောင်မှုကြောင့် ဒုက္ခရောက်ခဲ့သည်။ ဉာဏ်ပညာရှိသော ထိုရိရှီသည် အိမ်ကိုစွန့်ကာ အစာရှာရန် အရပ်ရပ်သို့ ပြေးလွှားခဲ့သည်»။
Verse 27
त्यक्त्वा दारांश्व पुत्रांश्व कस्मिंश्व॒ जनसंसदि । भक्ष्याभक्ष्यसमो भूत्वा निरग्निरनिकेतन:,उन्होंने अपनी पत्नी और पुत्रोंकोी किसी जन-समुदायमें छोड़ दिया और स्वयं अनग्निहोत्र तथा आश्रम त्यागकर भक्ष्य और अभक्ष्यमें समान भाव रखते हुए विचरने लगे
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «သူသည် ဇနီးနှင့် သားတို့ကို လူထုစုဝေးရာ တစ်နေရာ၌ ထားခဲ့ပြီး၊ ထို့နောက် အိမ်မီးပူဇော်သော သန့်ရှင်းသည့် မီးများကို စွန့်လွှတ်ကာ အိမ်အတည်မရှိဘဲ လှည့်လည်သွားလာ하였다။ စားသင့်သည်နှင့် မစားသင့်သည်တို့ကို တန်းတူသဘောထားဖြင့် ရှိနေခဲ့သည်»။
Verse 28
स कदाचित्् परिपतन् श्वपचानां निवेशनम् | हिंस्राणां प्राणिघातानामाससाद वने क्वचित्,एक दिन वे किसी वनके भीतर प्राणियोंका वध करनेवाले हिंसक चाण्डालोंकी बस्तीमें गिरते-पड़ते जा पहुँचे
ဘိဿမက ပြောသည်– တစ်ခါတစ်ရံ သူသည် လဲလျားတုန်လှုပ်ကာ လမ်းလျှောက်မတည်မငြိမ်ဖြစ်နေစဉ်၊ တောအတွင်း တစ်နေရာရာတွင် မတော်တဆ ခွေးချက်သူများ (အပြင်တန်းလူမျိုး) ၏ နေရာချထားရာသို့ ရောက်သွားခဲ့သည်။ ထိုသူတို့သည် သက်ရှိသတ္တဝါများကို သတ်ဖြတ်ခြင်းဖြင့် အသက်မွေးဝမ်းကျောင်းလုပ်သော ရက်စက်ကြမ်းကြုတ်သည့် အဖွဲ့အစည်းဖြစ်သည်။
Verse 29
विभिन्नकलशाकीर्ण श्वरचर्मच्छेदनायुतम् । वराहखरभग्नास्थिकपालघटसंकुलम्,वहाँ चारों ओर टूटे-फूटे घरोंके खपरे और ठीकरे बिखरे पड़े थे, कुत्तोंके चमड़े छेदनेवाले हथियार रखे हुए थे, सूअरों और गदहोंकी टूटी हड्डियाँ, खपड़े और घड़े वहाँ सब ओर भरे दिखायी दे रहे थे
အဲဒီနေရာမှာ အိုးခွက်ကွဲစများ၊ အိမ်အပျက်အစီးအုတ်ချပ်အပိုင်းအစများက နေရာအနှံ့ ပြန့်ကျဲနေပြီး၊ ခွေးအရေကို ခွဲဖြတ်ဖောက်ထွင်းရန် အသုံးပြုသည့် ကိရိယာများလည်း ထားရှိထားသည်။ ဝက်နှင့် မြည်းတို့၏ ကျိုးပဲ့အရိုးများ၊ ခေါင်းခွံအပိုင်းအစများနှင့် အိုးခွက်အပိုင်းအစများကလည်း အနှံ့အပြား တွေ့မြင်ရသည်။
Verse 30
मृतचैलपरिस्तीर्ण निर्माल्यकृत भूषणम् । सर्पनिर्मोकमालाभि: कृतचिह्लकुटीमठम्,मुर्दोके ऊपरसे उतारे गये कपड़े चारों ओर फैलाये गये थे और वहींसे उतारे हुए फ़ूलकी मालाओंसे उन चाण्डालोंके घर सजे हुए थे। चाण्डालोंकी कुटियों और मठोंको सर्पकी केंचुलोंकी मालाओंसे विभूषित एवं चिह्नित किया गया था
ဘိဿမက ပြောသည်– «သေသူတို့၏ ကိုယ်ပေါ်မှ ချွတ်ယူထားသော အဝတ်အစားများကို နေရာအနှံ့ ခင်းကျင်းထားပြီး၊ စွန့်ပစ်ထားသော ပန်းကုံးများမှ အလှဆင်ပစ္စည်းများကို ပြုလုပ်ထားသည်။ ထိုချန်ဒာလတို့၏ တဲအိမ်များနှင့် သေးငယ်သော ဘုရားကျောင်းတဲများကိုလည်း မြွေအရေခွံချွတ်ကျန် (မြွေကင်းခြံ) များဖြင့် ပြုလုပ်ထားသော ကုံးများဖြင့် အမှတ်အသားတင်ကာ အလှဆင်ထားသည်»။
Verse 31
कुक्कुटारावबहुल॑ गर्दभध्वनिनादितम् । उदघोषद्धिः खरैरवाकक््ये: कलहद्धिः परस्परम्,उस फललीमें सब ओर मुर्गोकी “कुकुहकू” की आवाज गूँज रही थी। गदहोंके रेंकनेकी ध्वनि भी प्रतिध्वनित हो रही थी। वे चाण्डाल आपसमें झगड़ा-फसाद करके कठोर वचनोंद्वारा एक-दूसरेको कोसते हुए कोलाहल मचा रहे थे
ဘိဿမက ပြောသည်– «အဲဒီနေရာမှာ ကြက်တို့၏ အော်သံများ မကြာခဏ ကြားရပြီး၊ မြည်းတို့၏ အော်မြည်သံလည်း ပြန်လည်တုံ့ပြန်လျက် ရှိသည်။ ကြမ်းတမ်းသောအသံရှိသူတို့က အချင်းချင်း ရန်ဖြစ်ကာ ဆူညံသောင်းကျန်းပြီး၊ ခါးသီးသောစကားများနှင့် ကျိန်စာများကို တစ်ယောက်တစ်ယောက် ပစ်ပေါက်နေကြသည်»။
Verse 32
उलूकपक्षिध्वनिभिद्देवतायतनैर्व॒॑तम् । लोहघण्टापरिष्कारं श्वयूथपरिवारितम्,वहाँ कई देवालय थे, जिनके भीतर उल्लू पक्षीकी आवाज गूँजती रहती थी। वहाँके घरोंको लोहेकी घंटियोंसे सजाया गया था और झुंड-के-झुंड कुत्ते उन घरोंको घेरे हुए थे
ဘိဿမက ပြောသည်– «အဲဒီနေရာကို ဘုရားနတ်များ၏ ဘုရားကျောင်းများက ဝန်းရံထားပြီး၊ အတွင်းတွင် ငှက်အူလူးတို့နှင့် အခြားငှက်များ၏ အော်သံများက အမြဲတမ်း ပြန်လည်ပဲ့တင်နေသည်။ အိမ်များကို သံခေါင်းလောင်းများဖြင့် အလှဆင်ထားပြီး၊ ခွေးအုပ်စုများက အိမ်များပတ်လည်တွင် ဝိုင်းရံနေကြသည်»။
Verse 33
तत् प्रविश्य क्षुधाविष्टो विश्वामित्रो महानृषि: । आहारान्वेषणे युक्त: पर यत्नं समास्थित:,उस बस्तीमें घुसकर भूखसे पीड़ित हुए महर्षि विश्वामित्र आहारकी खोजमें लगकर उसके लिये महान् प्रयत्न करने लगे
ဘီရှ္မက ပြောသည်—ထိုရွာထဲသို့ ဝင်ရောက်သွားသော မဟာရိရှီ ဝိශ්ဝာမိတ္တရသည် ဆာလောင်မှုကြောင့် ဖိစီးခံရ၍ အစာကို ရှာဖွေရန် စိတ်တည်ကာ အသက်ရှင်ရေးအတွက် အလွန်အမင်း ကြိုးပမ်းလေ၏။
Verse 34
न च क्वचिदविन्दत् स भिक्षमाणो5पि कौशिक: । मांसमन्नं फलं मूलमन्यद् वा तत्र किउ्चन,विश्वामित्र वहाँ घर-घर घूम-घूमकर भीख माँगते फिरे, परंतु कहीं भी उन्हें मांस, अन्न, फल, मूल या दूसरी कोई वस्तु प्राप्त न हो सकी
ဘီရှ္မက ပြောသည်—ကောသိက (ဝိශ්ဝာမိတ္တရ) သည် အလှူတောင်းလှည့်လည်သော်လည်း မည်သည့်နေရာတွင်မျှ အလှူမရခဲ့။ ထိုအရပ်၌ သူသည် မည်သည့်အစာမျှ မရ—အသားမဟုတ်၊ စပါးမဟုတ်၊ သစ်သီးမဟုတ်၊ အမြစ်မဟုတ်၊ အခြားအစာတစ်စုံတစ်ရာမျှ မရခဲ့။
Verse 35
अहो कृच्छूं मया प्राप्तमिति निश्चित्य कौशिक: । पपात भूमौ दौर्बल्यात् तस्मिंश्ञाण्डालपक्कणे,“अहो! यह तो मुझपर बड़ा भारी संकट आ गया।” ऐसा सोचते-सोचते विश्वामित्र अत्यन्त दुर्बलताके कारण वहीं एक चाण्डालके घरमें पृथ्वीपर गिर पड़े
ဘီရှ္မက ပြောသည်—“အို! ငါ့အပေါ် ကြီးမားသော ဘေးဒုက္ခ ကျရောက်လာပြီ” ဟု ဆုံးဖြတ်ကာ ကောသိက (ဝိශ්ဝာမိတ္တရ) သည် အလွန်အမင်း အားနည်းသဖြင့် ထိုနေရာ၌ပင် ချဏ္ဍာလ၏ အိမ်အတွင်း မြေပေါ်သို့ လဲကျသွားလေ၏။
Verse 36
स चिन्तयामास मुनि: कि नु मे सुकृतं भवेत् । कथं वृथा न मृत्यु: स्यादिति पार्थिवसत्तम,नृपश्रेष्ठ अब वे मुनि यह विचार करने लगे कि किस तरह मेरा भला होगा? क्या उपाय किया जाय, जिससे अन्नके बिना मेरी व्यर्थ मृत्यु न हो सके?
ဘီရှ္မက ပြောသည်—ထိုမုနိသည် စဉ်းစားလေ၏—“ငါ့အတွက် ကုသိုလ်ကောင်းတစ်စုံတစ်ရာ မည်သို့ ဖြစ်လာနိုင်မည်နည်း။ အစာမရှိဘဲ ငါ့သေခြင်းသည် အလဟသ မဖြစ်စေရန် မည်သို့ ပြုရမည်နည်း” ဟု—အို မင်းမြတ်အကြီးအကဲ၊ ထိုသို့ စဉ်းစားလေ၏။
Verse 37
स ददर्श श्वमांसस्य कुतन्त्रीं विततां मुनि: । चाण्डालस्य गृहे राजन् सद्यः शस्त्रहतस्य वै,राजन! इतने हीमें उन्होंने देखा कि चाण्डालके घरमें तुरंतके शस्त्रद्वारा मारे हुए कुत्तेकी जाँघके मांसका एक बड़ा-सा टुकड़ा पड़ा है
ဘီရှ္မက ပြောသည်—အို မင်းကြီး၊ ထိုမုနိသည် ချဏ္ဍာလ၏ အိမ်၌ လက်နက်ဖြင့် မကြာသေးမီက သတ်ခံထားရသော ခွေး၏ အသားတစ်စိတ်ကို ဖြန့်ထားသည်ကို မြင်လေ၏။
Verse 38
स चिन्तयामास तदा स्तैन्यं कार्यमितो मया । न हीदानीमुपायो मे विद्यते प्राणधारणे,तब मुनिने सोचा कि “मुझे यहाँसे इस मांसकी चोरी करनी चाहिये; क्योंकि इस समय मेरे लिये अपने प्राणोंकी रक्षाका दूसरा कोई उपाय नहीं है
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «ထိုအခါ သူသည် ‘ဒီနေရာမှာ ခိုးယူရမည်။ ယခုအချိန်တွင် ငါ့အသက်ကို ထိန်းသိမ်းရန် အခြားနည်းလမ်း မရှိတော့’ ဟု စဉ်းစားလေ၏»။
Verse 39
आपपत्सु विहितं स्तैन्यं विशिष्टसममहीनतः । विप्रेण प्राणरक्षार्थ कर्तव्यमिति निश्चय:,“आपत्तिकालमें प्राणरक्षाके लिये ब्राह्मणको श्रेष्ठ, समान तथा हीन मनुष्यके घरसे चोरी कर लेना उचित है, यह शास्त्रका निश्चित विधान है
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «ဘေးအန္တရာယ်ကာလ၌ သာသနာကျမ်းများသည် အရေးပေါ်အဖြစ် ခိုးယူခြင်းကို ခွင့်ပြုထားသည်။ ဗြာဟ္မဏသည် အသက်ကာကွယ်ရန်အတွက် အထက်တန်း၊ တန်းတူ၊ သို့မဟုတ် အောက်တန်းသူ၏ အိမ်မှပင် လျှို့ဝှက်ယူနိုင်သည်—ဤသည်မှာ အကျပ်အတည်းအတွက် သတ်မှတ်ထားသော ဓမ္မ၏ စည်းမျဉ်းဖြစ်သည်»။
Verse 40
हीनादादेयमादौ स्यात् समानात् तदनन्तरम् । असम्भवे वा55ददीत विशिष्टादपि धार्मिकात्,“पहले हीन पुरुषके घरसे उसे भक्ष्य पदार्थकी चोरी करनी चाहिये। वहाँ काम न चले तो अपने समान व्यक्तिके घरसे खानेकी वस्तु लेनी चाहिये, यदि वहाँ भी अभीष्टसिद्धि न हो सके तो अपनेसे विशिष्ट धर्मात्मा पुरुषके यहाँसे वह खाद्य वस्तुका अपहरण कर ले
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «အစဦးတွင် အောက်တန်းသူထံမှ (အစားအစာကို) ယူရမည်။ ထို့နောက် တန်းတူထံမှ ယူရမည်။ မဖြစ်နိုင်လျှင် သာသနာတရားကိုလိုက်နာသူ အထက်တန်းသူထံမှပင် ယူနိုင်သည်»။
Verse 41
सो5हमन्त्यावसायानां हराम्येनां प्रतिग्रहात् । न स्तैन्यदोषं पश्यामि हरिष्यामि श्वजाघनीम्,“अतः इन चाण्डालोंके घरसे मैं यह कुत्तेकी जाँघ चुराये लेता हूँ। किसीके यहाँ दान लेनेसे अधिक दोष मुझे इस चोरीमें नहीं दिखायी देता है; अतः अवश्य ही इसका अपहरण करूँगा!”
«ထို့ကြောင့် လူအောက်ဆုံးဖြစ်သော ချဏ္ဍာလတို့၏ အိမ်မှ ဤခွေးပေါင်သားကို ငါ ခိုးယူမည်။ အခြားသူထံမှ လက်ခံယူခြင်းထက် ဤခိုးယူခြင်း၌ ပိုမိုသော အပြစ်ကို ငါ မမြင်။ ထို့ကြောင့် ငါ မဖြစ်မနေ ယူသွားမည်!»
Verse 42
एतां बुद्धि समास्थाय विश्वामित्रो महामुनि: । तस्मिन् देशे स सुष्वाप श्वपचो यत्र भारत,भरतनन्दन! ऐसा निश्चय करके महामुनि विश्वामित्र उसी स्थानपर सो गये, जहाँ चाण्डाल रहा करते थे
ဘီရှ္မက ပြောသည်– «ဤဆုံးဖြတ်ချက်ကို ခိုင်မြဲစွာ ခံယူပြီးနောက် မဟာမုနိ ဝိශ්ဝာမိတ္တရသည်၊ အို ဘာရတ၊ ဆွပစ (śvapaca) နေထိုင်ရာ ထိုနေရာတည်းမှာပင် အိပ်စက်လေ၏»။
Verse 43
स विगाढां निशां दृष्टवा सुप्ते चाण्डालपक्कणे । शनैरुत्थाय भगवान् प्रविवेश कुटीमठम्,जब प्रगाढ़ अन्धकारसे युक्त आधी रात हो गयी और चाण्डालके घरके सभी लोग सो गये, तब भगवान् विश्वामित्र धीरेसे उठकर उस चाण्डालकी कुटियामें घुस गये
ဘီရှ္မက ပြောသည်– ညသည် အလွန်နက်ရှိုင်းလာပြီး ချဏ္ဍာလအိမ်သူအိမ်သားတို့ အားလုံး အိပ်ပျော်နေကြသည်ကို မြင်သော်၊ အလေးအနက်ဂုဏ်ရည်ရှိသော ရှင်ဗိශ්ဝာမိတ္တရသည် တိတ်တဆိတ် ထ၍ ချဏ္ဍာလ၏ တဲအိမ်ထဲသို့ ဝင်ရောက်하였다။ ဤဖြစ်ရပ်သည် လျှို့ဝှက်စွာ ဆောင်ရွက်သည့် ရည်ရွယ်ချက်ရှိပြီး သီလဓမ္မအလေးချိန်ပါသော လုပ်ရပ်တစ်ရပ်ကို ထင်ဟပ်စေကာ၊ အကျပ်အတည်းအောက်ရှိ ဓမ္မနှင့် လူမှုအကန့်အသတ်တို့နှင့် မြင့်မြတ်သော ရည်မှန်းချက်တို့ကြား တင်းမာမှုကို ဆင်ခြင်စေသည်။
Verse 44
स सुप्त इव चाण्डाल: श्लेष्मापिहितलोचन: । परिभिजन्नस्वरो रूक्ष: प्रोवाचाप्रियदर्शन:,वह चाण्डाल सोया हुआ जान पड़ता था। उसकी आँखें कीचड़से बंद-सी हो गयी थीं; परंतु वह जागता था। वह देखनेमें बड़ा भयानक था। स्वभावका रूखा भी प्रतीत होता था। मुनिको आया देख वह फटे हुए स्वरमें बोल उठा
ဘီရှ္မက ပြောသည်– ချဏ္ဍာလသည် အိပ်နေသကဲ့သို့ ထင်ရပြီး မျက်လုံးများသည် ချွဲဖြင့် ပိတ်ကပ်နေသလို ဖြစ်သည်။ သို့သော် သူသည် နိုးနေ၏။ မြင်ရသည်မှာ ကြောက်မက်ဖွယ်ကောင်းပြီး စိတ်သဘောကလည်း ကြမ်းတမ်းသကဲ့သို့ ထင်ရသည်။ မုနိကို မြင်သော် ပျက်ပြားကြမ်းရှသော အသံဖြင့် ပြောလေ၏။ ဤပုံရိပ်သည် အပြင်ပန်းကိုသာကြည့်၍ စီရင်ခြင်းနှင့် အတွင်းစိတ်၏ သတိနှင့် ရည်ရွယ်ချက်ကို ခွဲခြားသိမြင်ခြင်းတို့ကြား သီလတင်းမာမှုကို ဖော်ပြသည်။
Verse 45
घपच उवाच कः कुतन्त्रीं घटयति सुप्ते चाण्डालपक्कणे । जागर्मि नात्र सुप्तोडस्मि हतो5सीति च दारुण:,चाण्डालने कहा--अरे! चाण्डालोंके घरोंमें तो सब लोग सो गये हैं, फिर कौन यहाँ आकर कुत्तेकी जाँघ लेनेकी चेष्टा कर रहा है? मैं जागता हूँ, सोया नहीं हूँ। मैं देखता हूँ, तू मारा गया। उस क्रूर स्वभाववाले चाण्डालने जब ऐसी बात कही, तब विश्वामित्र उससे डर गये। उनके मुखपर लज्जा घिर आयी। वे उस नीच कर्मसे उद्विग्न हो सहसा बोल उठे --
ဃပချာက ပြောသည်– “ချဏ္ဍာလအိမ်စုတစ်ရွာလုံး အိပ်ပျော်နေချိန်မှာ ဒီနေရာမှာ ဒီလို အညစ်အကြေးလုပ်ရပ်ကို ဘယ်သူက ကြံစည်နေတာလဲ။ ငါ နိုးနေတယ်—ငါ မအိပ်ဘူး။ ငါ မြင်တယ်—မင်းက သတ်ပြီးသားနဲ့ တူတယ်!” ထိုကြမ်းတမ်းသဘောရှိသော ချဏ္ဍာလက ဤသို့ပြောသော်၊ ဗိශ්ဝာမိတ္တရသည် ကြောက်ရွံ့သွားပြီး မျက်နှာပေါ်တွင် အရှက်ရိပ်မိလာသည်။ ထိုနိမ့်ကျသော လုပ်ရပ်ကြောင့် စိတ်မချမ်းသာဘဲ သူသည် ချက်ချင်း ပြောထွက်လာ၏။
Verse 46
विश्वामित्रस्ततो भीतः सहसा तमुवाच ह | तत्र व्रीडाकुलमुख: सोद्वेगस्तेन कर्मणा,चाण्डालने कहा--अरे! चाण्डालोंके घरोंमें तो सब लोग सो गये हैं, फिर कौन यहाँ आकर कुत्तेकी जाँघ लेनेकी चेष्टा कर रहा है? मैं जागता हूँ, सोया नहीं हूँ। मैं देखता हूँ, तू मारा गया। उस क्रूर स्वभाववाले चाण्डालने जब ऐसी बात कही, तब विश्वामित्र उससे डर गये। उनके मुखपर लज्जा घिर आयी। वे उस नीच कर्मसे उद्विग्न हो सहसा बोल उठे --
ထို့နောက် ကြောက်ရွံ့သွားသော ဗိශ්ဝာမိတ္တရသည် သူ့ထံသို့ ချက်ချင်း ပြောလိုက်သည်။ သူ၏ မျက်နှာသည် အရှက်ဖြင့် မိုးကာသကဲ့သို့ ဖုံးလွှမ်းနေပြီး၊ သူကြံစည်ခဲ့သော အနိမ့်ကျသည့် လုပ်ရပ်ကြောင့် စိတ်ပူပန်မှုက သူ့ကို လှုပ်ခတ်စေ하였다။ ဤမြင်ကွင်းသည် အစာငတ်ခြင်းကြောင့် ရှင်သန်ရန် အကျပ်အတည်းနှင့် တားမြစ်ထားသော အပြုအမူထဲသို့ ကျရောက်ရာမှ လေးစားမှုဆုံးရှုံးခြင်းတို့ကြား ဓမ္မတင်းမာမှုကို ထင်ဟပ်စေသည်။
Verse 47
विश्वामित्रो5हमायुष्मन्नागतो<हं बुभुक्षित: | मा वधीर्मम सदबुद्धे यदि सम्यक् प्रपश्यसि,'आयुष्मन्! मैं विश्वामित्र हूँ। भूखसे पीड़ित होकर यहाँ आया हूँ। उत्तम बुद्धिवाले चाण्डाल! यदि तू ठीक-ठीक देखता और समझता है तो मेरा वध न कर”
“အသက်ရှည်ပါစေ၊ ကျွန်ုပ်သည် ဗိශ්ဝာမိတ္တရ ဖြစ်သည်။ ဆာလောင်မှုကြောင့် ညှဉ်းပန်းလျက် ဒီကို လာခဲ့သည်။ ဉာဏ်ကောင်းသော ချဏ္ဍာလရေ၊ သင် အမှန်တကယ် မြင်၍ မှန်ကန်စွာ နားလည်နိုင်လျှင် ကျွန်ုပ်ကို မသတ်ပါနှင့်” ဟု ဆို၏။
Verse 48
चाण्डालस्तद् वच: श्रुत्वा महर्षेर्भावितात्मन: । शयनादुपसम्भ्रान्त उद्ययौ प्रति तं ततः,पवित्र अन्तःकरणवाले उस महर्षिका वह वचन सुनकर चाण्डाल घबराकर अपनी शय्यासे उठा और उनके पास चला गया
အတွင်းစိတ်သန့်ရှင်း၍ စည်းကမ်းတကျ ပြုစုပျိုးထောင်ထားသော မဟာရသီ၏ စကားကို ကြားသော် ချဏ္ဍာလသည် ထိတ်လန့်ကာ အိပ်ရာမှ အလျင်အမြန် ထ၍ ထိုရသီထံသို့ သွားလေ၏။
Verse 49
स विसृज्याश्रु नेत्रा भ्यां बहुमानात् कृताञ्जलि: । उवाच कौशिक रात्रौ ब्रह्मन् कि ते चिकीर्षितम्
မျက်လုံးနှစ်ဖက်မှ မျက်ရည်ကျလာကာ အလွန်လေးစားသဖြင့် လက်အုပ်ချီ၍ ကောသိကကို ပြောလေ၏—“အို ဘြာဟ္မဏ၊ ယနေ့ညမှာ သင် ဘာကို လုပ်လိုသနည်း?”
Verse 50
उसने बड़े आदरके साथ हाथ जोड़कर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए वहाँ विश्वामित्रसे कहा --“ब्रह्मन! इस रातके समय आपकी यह कैसी चेष्टा है?--आप क्या करना चाहते हैं?” ।। ४९ || विश्वामित्रस्तु मातज्रमुवाच परिसान्त्वयन् । क्षुधितो5हं गतप्राणो हरिष्यामि श्वजाघनीम्,विश्वामित्रने चाण्डालको सान्त्वना देते हुए कहा--'भाई! मैं बहुत भूखा हूँ। मेरे प्राण जा रहे हैं; अतः मैं यह कुत्तेकी जाँघ ले जाऊँगा
အပြင်လူသည် လက်အုပ်ချီ၍ မျက်ရည်စီးလျက် ဗိශ්ဝာမိတ္တရကို ပြောလေ၏—“အို ဘြာဟ္မဏ၊ ညဉ့်အချိန်တွင် ဤသို့ ထူးဆန်းသော အပြုအမူသည် အဘယ်နည်း။ သင် ဘာကို လုပ်လိုသနည်း?” ဗိශ්ဝာမိတ္တရက သူ့ကို နှစ်သိမ့်ကာ ပြန်ဆိုသည်—“ညီအစ်ကိုရေ၊ ငါ အလွန်ဆာလောင်နေပြီ၊ အသက်တောင် မတည်တော့ဘူး။ ထို့ကြောင့် ငါ ဒီခွေးပေါင်ကို ယူသွားမယ်” ဟု။
Verse 51
क्षुधित: कलुषं यातो नास्ति हीरशनार्थिन: । क्षुच्च मां दूषयत्यत्र हरिष्यामि श्वजाघनीम्,“भूखके मारे यह पापकर्म करनेपर उतर आया हूँ। भोजनकी इच्छावाले भूखे मनुष्यको कुछ भी करनेमें लज्जा नहीं आती। भूख ही मुझे कलंकित कर रही है, अतः मैं यह कुत्तेकी जाँघ ले जाऊँगा
ဆာလောင်ခြင်းကြောင့် ငါသည် အညစ်အကြေးသော လမ်းကြောင်းသို့ ကျရောက်လာပြီ။ အစာကို လိုလားသော ဆာလောင်သူအတွက် အရှက်က မတားဆီးနိုင်။ “ဒီမှာ ငါ့ကို အညစ်အကြေးဖြစ်စေသည့်အရာက ဆာလောင်ခြင်းပင် ဖြစ်သည်; ထို့ကြောင့် ငါ ဒီခွေးပေါင်ကို ယူသွားမည်” ဟု ဆို၏။
Verse 52
अवसीद-न्ति मे प्राणा: श्रुतिर्मे नश्यति क्षुधा । दुर्बलो नष्ट्ंज्ञश्न भक्ष्याभक्ष्यविवर्जित:,मेरे प्राण शिथिल हो रहे हैं। क्षुधासे मेरी श्रवणशक्ति नष्ट होती जा रही है। मैं दुबला हो गया हूँ। मेरी चेतना लुप्त-सी हो रही है; अत: अब मुझमें भक्ष्य और अभक्ष्यका विचार नहीं रह गया है
ငါ့အသက်အားများ ကုန်ခမ်းလာပြီ; ဆာလောင်ခြင်းက ငါ့နားကြားနိုင်စွမ်းကို ဖျက်ဆီးနေသည်။ ငါ ပိန်နွမ်းအားနည်းလာပြီး သတိလည်း လျော့ပါးနေပြီ; ထို့ကြောင့် စားသင့်/မစားသင့်ကို ခွဲခြားသိမြင်နိုင်ခြင်း မကျန်တော့။
Verse 53
सो<धर्म बुद्धयमानो<पि हरिष्यामि श्वजाघनीम् । अटगन् भैक्ष्यं न विन्दामि यदा युष्माकमालये
ဓမ္မက ဘာကို တောင်းဆိုသလဲကို သိနေသော်လည်း၊ ငါသည် ‘ခွေးပေါင်သား’ (śvajāghanī) ကို ယူသွားမည်။ ငါသည် ဆွမ်းခံ၍ လှည့်လည်သော်လည်း မည်သည့်အလှူမျှ မရ—အထူးသဖြင့် သင်တို့၏ အိမ်သို့ ရောက်လာသောအခါ။
Verse 54
अन्निर्मुखं पुरोधाश्व देवानां शुचिषाड् विभुः
အဂ္နိသည် အလုံးစုံကို လွှမ်းမိုးသော အရှင်ဖြစ်၍၊ သန့်ရှင်းမှုအတွင်း နတ်တို့အကြား ထိုင်နေသော အဓိက ပုရောဟိတ်တော် ဖြစ်သည်။ သူ၏ မျက်နှာသည် အစာပူဇော်သက္ကာသို့ မျက်နှာမူထား၏။
Verse 55
यथावत् सर्वभूग ब्रह्मा तथा मां विद्धि धर्मत: । “अग्निदेव देवताओंके मुख हैं, पुरोहित हैं, पवित्र द्रव्य ही ग्रहण करते हैं और महान् प्रभावशाली हैं तथापि वे जैसे अवस्थाके अनुसार सर्वभक्षी हो गये हैं, उसी प्रकार मैं ब्राह्मण होकर भी सर्वभक्षी बनूँगा; अतः तुम धर्मतः मुझे ब्राह्मण ही समझो” ।। ५४ ई ।। तमुवाच स चाण्डालो महर्षे शूणु मे वच:
ဓမ္မအရ ငါ့ကို ဗြဟ္မာကဲ့သို့ဟု သိမှတ်လော့—သူသည် သတ္တဝါအားလုံးကို စားသုံးတတ်သူဟု ဆိုကြ၏။ အဂ္နိသည် နတ်တို့၏ ပါးစပ်၊ ပုရောဟိတ်တော်၊ သန့်ရှင်းသော ပူဇော်သက္ကာကိုသာ လက်ခံသူ၊ အာနုဘော်ကြီးမားသူ ဖြစ်သော်လည်း အခြေအနေအလိုက် အရာအားလုံးကို စားသုံးသူ ဖြစ်လာတတ်၏။ ထိုနည်းတူ ငါသည် ဗြာဟ္မဏဖြစ်သော်လည်း အရာအားလုံးကို စားသုံးသူ ဖြစ်လာမည်။ ထို့ကြောင့် ဓမ္မအရ သင်တို့သည် ငါ့ကို ဗြာဟ္မဏဟူ၍ပင် မှတ်ယူကြလော့။ ထိုအခါ စဏ္ဍာလက ပြန်ဆိုသည်—“အို မဟာရ္ရှိ၊ ငါ့စကားကို နားထောင်ပါ” ဟု။
Verse 56
धर्म तवापि विप्रर्षे शुणु यत् ते ब्रवीम्पहम्,“ब्रह्मर्ष! मैं आपके लिये भी जो धर्मकी ही बात बता रहा हूँ, उसे सुनिये। मनीषी पुरुष कहते हैं कि कुत्ता सियारसे भी अधम होता है। कुत्तेके शरीरमें भी उसकी जाँघचका भाग सबसे अधम होता है
ဃပာကာ (Ghapaca) က ပြောသည်—“အို ဗြာဟ္မဏ ရ္ရှိ၊ ငါပြောမည့်အရာကို နားထောင်ပါ။ ဤသည်လည်း သင်အတွက် ဓမ္မသင်ခန်းစာပင် ဖြစ်သည်။ ပညာရှိတို့က ခွေးသည် မြေခွေး (စျာလ) ထက်တောင် နိမ့်ကျသည်ဟု ဆိုကြ၏။ ထို့ပြင် ခွေး၏ ကိုယ်ခန္ဓာအတွင်း၌ပင် ၎င်း၏ ပေါင်ပိုင်းကို အနိမ့်ဆုံးဟု သတ်မှတ်ကြ၏။”
Verse 57
शृगालादथमं श्वानं प्रवदन्ति मनीषिण: । तस्याप्यधम उद्देश: शरीरस्य श्वजाघनी,“ब्रह्मर्ष! मैं आपके लिये भी जो धर्मकी ही बात बता रहा हूँ, उसे सुनिये। मनीषी पुरुष कहते हैं कि कुत्ता सियारसे भी अधम होता है। कुत्तेके शरीरमें भी उसकी जाँघचका भाग सबसे अधम होता है
“အို ဗြဟ္မရ္ရှိ၊ သင်အတွက်လည်း ငါဆိုသော ဓမ္မသင်ခန်းစာကို နားထောင်ပါ။ ပညာရှိတို့က ခွေးသည် မြေခွေး (စျာလ) ထက်တောင် နိမ့်ကျသည်ဟု ဆိုကြ၏။ ထို့ပြင် ခွေး၏ ကိုယ်ခန္ဓာအတွင်း၌ပင် ၎င်း၏ ပေါင်ပိုင်းကို အနိမ့်ဆုံးဟု ဆိုကြ၏။”
Verse 58
नेदं सम्यग् व्यवसितं महर्षे धर्मगर्हितम् । चाण्डालस्वस्य हरणमभक्ष्यस्य विशेषत:,“महर्ष) आपने जो निश्चय किया है, यह ठीक नहीं है, चाण्डालके धनका, उसमें भी विशेषरूपसे अभक्ष्य पदार्थका अपहरण धर्मकी दृष्टिसे अत्यन्त निन्दित है
«အို မဟာရသီ၊ သင်၏ဤဆုံးဖြတ်ချက်သည် မမှန်ကန်ပါ။ ဓမ္မအရ အပြစ်တင်ရမည့်အရာဖြစ်သည်။ စဏ္ဍာလ၏ ပစ္စည်းကို လုယူခြင်း—အထူးသဖြင့် စားသောက်ရန် မသင့်သောအရာဖြစ်လျှင်—ဓမ္မက ပို၍ပြင်းထန်စွာ ရှုတ်ချသော လုပ်ရပ်ဖြစ်သည်»။
Verse 59
साध्वन्यमनुपश्य त्वमुपायं प्राणधारणे । न मांसलोभात् तपसो नाशस्ते स्यान्महामुने,“महामुने! अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये कोई दूसरा अच्छा-सा उपाय सोचिये। मांसके लोभसे आपकी तपस्याका नाश नहीं होना चाहिये
«အို မဟာမုနိ၊ အသက်ရှင်တည်တံ့ရန် အခြားသင့်လျော်သောနည်းလမ်းတစ်ခုကို စဉ်းစားပါ။ အသားကို လိုချင်တပ်မက်ခြင်းကြောင့် သင်၏တပဿာ မပျက်စီးသင့်ပါ»။
Verse 60
जानता विद्िितं धर्म न कार्यो धर्मसंकर: । मा सम धर्म परित्याक्षीस्त्वं हि धर्मभूतां वर:,“आप शास्त्रविहित धर्मको जानते हैं, अतः आपके द्वारा धर्मसंकरताका प्रचार नहीं होना चाहिये। धर्मका त्याग न कीजिये; क्योंकि आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ समझे जाते हैं!
«သင်သည် သာသ္တရများက သတ်မှတ်ထားသော ဓမ္မကို သိရှိသူဖြစ်သည်။ ထို့ကြောင့် ဓမ္မကို ရောနှောရှုပ်ထွေးစေမည့်အရာကို မပြုသင့်။ ဓမ္မကို မစွန့်လွှတ်ပါနှင့်; အကြောင်းမူကား သင်သည် ဓမ္မတရားရှိသူတို့အနက် အမြင့်မြတ်ဆုံးဟု မှတ်ယူခံရသူဖြစ်သည်»။
Verse 61
विश्वामित्रस्ततो राजन्नित्युक्तो भरतर्षभ । क्षुधार्त: प्रत्युवाचेदं पुनरेव महामुनि:,भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! चाण्डालके ऐसा कहनेपर क्षुधासे पीड़ित हुए महामुनि विश्वामित्रने उसे इस प्रकार उत्तर दिया--
အို မင်းကြီး၊ ဘာရတဝంశ၏ အထွဋ်အမြတ်သူရဲကောင်း၊ ထိုသို့ ပြောဆိုခံရသောအခါ ဆာလောင်မှုကြောင့် နာကျင်နေသည့် မဟာရသီ ဝိශ්ဝာမိတ္တရသည် ထပ်မံ၍ ဤသို့ ပြန်လည်ဖြေကြား하였다။
Verse 62
निराहारस्य सुमहान् मम कालोडभिधावत: । न विद्यते5प्युपायश्व कश्रनिन्मे प्राणधारणे,“मैं भोजन न मिलनेके कारण उसकी प्राप्तिके लिये इधर-उधर दौड़ रहा हूँ। इसी प्रयत्नमें एक लंबा समय व्यतीत हो गया, किंतु मेरे प्राणोंकी रक्षाके लिये अबतक कोई उपाय हाथ नहीं आया
«အစာမရသဖြင့် ထိုအစာကို ရှာဖွေရန် ငါသည် ဒီဘက်ဟိုဘက် ပြေးလွှားနေ၏။ ဤကြိုးပမ်းမှုအတွင်း အချိန်အတော်ကြာ ကုန်လွန်သွားပြီ၊ သို့သော် ငါ့အသက်ကို ထိန်းသိမ်းရန် ယခုထိ မည်သည့်နည်းလမ်းမျှ မတွေ့ရသေး»။
Verse 63
येन येन विशेषण कर्मणा येन केनचित् | अभ्युज्जीवेत् साद्यमान: समर्थों धर्ममाचरेत्,“जो भूखों मर रहा हो, वह जिस-जिस उपायसे अथवा जिस किसी भी कर्मसे सम्भव हो, अपने जीवनकी रक्षा करे, फिर समर्थ होनेपर वह धर्मका आचरण कर सकता है
သူက ပြောသည်– «ဆာလောင်မှုကြောင့် သေမင်းနားသို့ တွန်းပို့ခံနေရသောသူသည် မည်သည့်နည်းလမ်းဖြင့်ဖြစ်စေ၊ မည်သည့်အလုပ်ဖြင့်ဖြစ်စေ ဖြစ်နိုင်သမျှနည်းဖြင့် မိမိအသက်ကို ကာကွယ်ရမည်။ ထို့နောက် အသက်ရှင်နိုင်ရန် စွမ်းအားနှင့် တည်ငြိမ်မှု ပြန်လည်ရရှိလာသော် ထိုအခါမှ ဓမ္မကို ကျင့်သုံးနိုင်သည်»။
Verse 64
ऐन्द्रो धर्म: क्षत्रियाणां ब्राह्मणानामथाग्निक: । ब्रह्मवह्निर्मम बल॑ भक्ष्यामि शमयन् क्षुधाम्
ဃပာစက ပြောသည်– «က்ஷတ္တရိယတို့၏ ဓမ္မသည် အိန္ဒြသဘော—သူရဲကောင်းစွာ အုပ်ချုပ်ခြင်းနှင့် အာဏာတော်၏ အင်အား ဖြစ်၏။ ဗြာဟ္မဏတို့၏ ဓမ္မသည် အဂ္နိကရိယာ—သန့်ရှင်းသော မီး၏ စည်းကမ်း ဖြစ်၏။ ငါသည် ‘ဗြဟ္မာမီး’ ဖြစ်၍ ငါ၏ အင်အားမှာ စားသုံးခြင်းပင်။ ငါသည် စားသုံး၍ ဆာလောင်မှုကို ငြိမ်းစေမည်»။
Verse 65
“इन्द्रदेवताका जो पालनरूप धर्म है, वही क्षत्रियोंका भी है और अग्निदेवका जो सर्वभक्षित्व नामक गुण है, वह ब्राह्मणोंका है। मेरा बल वेदरूपी अग्नि है; अतः मैं क्षुधाकी शान्तिके लिये सब कुछ भक्षण करूँगा ।। यथा यथैव जीवेद्धि तत् कर्तव्यमहेलया । जीवितं मरणाच्छेयो जीवन् धर्ममवाप्लुयात्
သူက ပြောသည်– «အိန္ဒြ၏ ကာကွယ်စောင့်ရှောက်ခြင်းဟူသော တာဝန်ဓမ္မသည် က္ෂတ္တရိယတို့၏ ဓမ္မလည်း ဖြစ်၏။ အဂ္နိ၏ သဘာဝ—အရာအားလုံးကို စားသုံးနိုင်ခြင်း—သည် ဗြာဟ္မဏတို့၏ သဘာဝဖြစ်၏။ ငါ၏ အင်အားသည် ဝေဒမီး ဖြစ်သည်။ ထို့ကြောင့် ဆာလောင်မှုကို ငြိမ်းစေရန် ရှိသမျှကို ငါစားမည်။ မည်သို့ပင် အသက်ရှင်နိုင်သလဲဆိုသလို ထိုအတိုင်း မဆိုင်းမတွ လုပ်ရမည်။ သေခြင်းထက် အသက်ရှင်ခြင်းက ပိုကောင်းသည်၊ အသက်ရှင်လျှင် ဓမ္မကို ရရှိနိုင်သေးသောကြောင့်»။
Verse 66
“जैसे-जैसे ही जीवन सुरक्षित रहे, उसे बिना अवहेलनाके करना चाहिये। मरनेसे जीवित रहना श्रेष्ठ है, क्योंकि जीवित पुरुष पुन: धर्मका आचरण कर सकता है ।। सो<5हं जीवितमाकाडुक्षन्नभक्ष्यस्यापि भक्षणम् | व्यवस्ये बुद्धिपूर्व वै तद् भवाननुमन्यताम्,“इसलिये मैंने जीवनकी आकांक्षा रखकर इस अभक्ष्य पदार्थका भी भक्षण कर लेनेका बुद्धिपूर्वक निश्चय किया है। इसका तुम अनुमोदन करो
«အသက်ကို လုံခြုံစွာ ထိန်းသိမ်းနိုင်သမျှကာလပတ်လုံး မထီမဲ့မြင်မပြုဘဲ ထိန်းသိမ်းရမည်။ သေခြင်းထက် အသက်ရှင်ခြင်းက ပိုကောင်းသည်၊ အသက်ရှင်နေသူသည် ဓမ္မကို ပြန်လည်ကျင့်သုံးနိုင်သေးသောကြောင့်။ ထို့ကြောင့် အသက်ရှင်လိုသော ဆန္ဒဖြင့် ပုံမှန်အားဖြင့် မစားသင့်သောအရာကိုပါ စားမည်ဟု ငါသည် သတိပညာဖြင့် ဆုံးဖြတ်ပြီးပြီ။ ဤအမှုကို သင် အတည်ပြုပါ»။
Verse 67
बलवन्तं करिष्यामि प्रणोत्स्याम्पशुभानि तु । तपोभिर्विद्यया चैव ज्योतींषीव महत्तम:,'जैसे सूर्य आदि ज्योतिर्मय ग्रह महान् अन्धकारका नाश कर देते है, उसी प्रकार मैं पुनः तप और विद्याद्वारा जब अपने-आपको सबल कर लूँगा, तब सारे अशुभ कर्मोंका नाश कर डालूँगा'
«ငါသည် ကိုယ်ကို ပြန်လည်ခိုင်မာစေမည်၊ မကောင်းသဖြင့် အမင်္ဂလာတို့ကိုလည်း နှင်ထုတ်မည်။ တပသ်နှင့် ဗိဒ္ယာဖြင့် ငါသည် မကောင်းသော ကర్మတို့ကို ဖျက်ဆီးမည်—နေမင်းနှင့် အလင်းရောင်ရှိသော ကောင်းကင်ဂြိုဟ်ကြယ်တို့က အမှောင်ကို ပျောက်ကင်းစေသကဲ့သို့»။
Verse 68
घपच उवाच नैतत् खादन प्राप्तुते दीर्घमायु- नैंव प्राणान्नामृतस्थेव तृप्ति: । भिक्षामन्यां भिक्ष मा ते मनोस्तु श्वभक्षणे श्वा हाभक्ष्यो द्विजानाम्,चाण्डालने कहा--मुने! इसे खाकर कोई बहुत बड़ी आयु नहीं प्राप्त कर सकता। न तो इससे प्राणशक्ति प्राप्त होती है और न अमृतके समान तृप्ति ही होती है; अत: आप कोई दूसरी भिक्षा माँगिये। कुत्तेका मांस खानेकी ओर आपका मन नहीं जाना चाहिये। कुत्ता द्विजोंके लिये अभक्ष्य है
ဃပစက ပြောသည်– «ဤအရာကို စားသော်လည်း အသက်ရှည်ခြင်း မရနိုင်။ အသက်ဓာတ်အားလည်း မပေးနိုင်၊ အမృతကဲ့သို့ ပြည့်ဝတင်းတိမ်မှုလည်း မပေးနိုင်။ ထို့ကြောင့် အခြားသော ဆွမ်းတောင်းပါ; ခွေးသားစားရန် စိတ်မလှည့်ပါနှင့်။ ခွေးသည် ဒွိဇ (နှစ်ကြိမ်မွေး) တို့အတွက် မစားသင့်သော အစာဖြစ်သည်»။
Verse 69
विश्वामित्र उवाच नदुर्भिक्षे सुलभं मांसमन्यत् श्रुपाक मन्ये नच मे<स्ति वित्तम् क्षुधार्तक्षाहमगतिर्निराश: श्वमांसे चास्मिन् षपड़सान् साधु मन्ये,विश्वामित्र बोले--श्वपाक! सारे देशमें अकाल पड़ा है; अतः दूसरा कोई मांस सुलभ नहीं होगा, यह मेरी दृढ़ मान्यता है। मेरे पास धन नहीं है कि मैं भोज्य पदार्थ खरीद सकूँ, इधर भूखसे मेरा बुरा हाल है। मैं निराश्रय तथा निराश हूँ। मैं समझता हूँ कि मुझे इस कुत्तेके मांसमें ही षबड्रस भोजनका आनन्द भलीभाँति प्राप्त होगा
ဝိශ්ဝာမိတ္တရက ပြောသည်– «အို သွပ်ပာက (ခွေးချက်သူ) ရေ၊ ဤအငတ်ဘေးကာလ၌ အခြားအသားကို လွယ်ကူစွာ ရနိုင်မည်မဟုတ်ဟု ငါ အခိုင်အမာ ယုံကြည်သည်။ ထို့ပြင် အစာဝယ်ရန် ငါ့တွင် ငွေကြေးလည်း မရှိ။ ဆာလောင်မှုကြောင့် ပင်ပန်းနွမ်းနယ်၍ ဒုက္ခရောက်နေကာ အားကိုးရာမရှိ၊ လမ်းမရှိ၊ မျှော်လင့်ချက်ကင်းလျက်—ဤခွေးသားထဲ၌ပင် ‘ခြောက်ရသာ’ အစာ၏ ကျေနပ်မှုကို သင့်တော်စွာ ရနိုင်မည်ဟု ငါ ထင်သည်»။
Verse 70
श्षपच उवाच पज्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रद्मक्षत्रस्य वै विश: । यथा शास्त्र प्रमाणं ते माभक्ष्ये मानसं कृथा:,चाण्डालने कहा--्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके लिये पाँच नखोंवाले पाँच प्रकारके प्राणी आपत्कालमें भक्ष्य बताये गये हैं। यदि आप शास्त्रको प्रमाण मानते हैं तो अभक्ष्य पदार्थकी ओर मन न ले जाइये
သွပ်ပာကက ပြောသည်– «ဗြာဟ္မဏ၊ က္ଷတ္တရိယ၊ ဝိုင်ရှျတို့အတွက် အရေးပေါ်ကာလ၌ စားခွင့်ရှိသည်ဟု ‘ငါးလက်သည်းရှိသော သတ္တဝါ’ ငါးမျိုးကို သာသနာကျမ်းအာဏာအတိုင်း ကြေညာထားသည်။ သင်သည် ကျမ်းကို စံနှုန်းအဖြစ် လက်ခံလျှင် မစားသင့်သော အရာသို့ စိတ်မလှည့်ပါနှင့်»။
Verse 71
विश्वामित्र उवाच अगस्त्येनासुरो जग्धो वातापि: क्षुधितेन वै । अहमापदगत: क्षुत्तो भक्षयिष्ये श्वजाघनीम्,विश्वामित्र बोले--भूखे हुए महर्षि अगस्त्येने वातापि नामक असुरको खा लिया था। मैं तो क्षुधाके कारण भारी आपत्तिमें पड़ गया हूँ; अतः यह कुत्तेकी जाँच अवश्य खाऊँगा
ဝိශ්ဝာမိတ္တရက ပြောသည်– «ဆာလောင်နေသော မဟာရိသိ အဂஸ္တျက အဆုရ ဝါတာပိကိုတောင် စားခဲ့သည်။ ငါလည်း ဆာလောင်မှုကြောင့် အလွန်ကြီးမားသော အကျပ်အတည်းထဲ ကျရောက်နေပြီ။ ထို့ကြောင့် ဤခွေးပေါင်ကို ငါ စားမည်»။
Verse 72
श्षपच उवाच भिक्षामन्यामाहरेति न च कर्तुमिहाहसि । न नूनं कार्यमेतद् वै हर काम॑ श्वजाघनीम्,चाण्डालने कहा--मुने! आप दूसरी भिक्षा ले आइये। इसे ग्रहण करना आपके लिये उचित नहीं है। आपकी इच्छा हो तो यह कुत्तेकी जाँघ ले जाइये; परंतु मैं निश्चितरूपसे कहता हूँ कि आपको इसका भक्षण नहीं करना चाहिये
အပြင်လူ (သွပ်ပာက) က ပြောသည်– «မုနိရေ၊ အခြားသော ဆွမ်းကို သွားယူပါ။ ဤအရာကို ဒီမှာ လက်ခံခြင်းသည် သင့်အတွက် မသင့်တော်ပါ။ အမှန်တကယ် ဤကိစ္စကို မလုပ်သင့်ပါ။ သင်လိုလျှင် ဤခွေးပေါင်ကို ယူသွားပါ—သို့သော် သင်သည် ၎င်းကို မစားသင့်ကြောင်း ငါ အတိအကျ ပြောသည်»။
Verse 73
विश्वामित्र उवाच शिष्टा वै कारणं धर्मे तद्वृत्तमनुवर्तये । परां मेध्याशनामेनां भक्ष्यां मन्ये श्वजाघनीम्,विश्वामित्र बोले-शिष्टपुरुष ही धर्मकी प्रवृत्तिके कारण हैं। मैं उन्हींके आचारका अनुसरण करता हूँ; अतः इस कुत्तेकी जाँघको मैं पवित्र भोजनके समान ही भक्षणीय मानता हूँ
ဝိශ්ဝာမိတ္တရက ပြောသည်– «ယဉ်ကျေးသိက္ခာရှိသူတို့၏ အကျင့်အကြံသည် ဓမ္မ၏ အရင်းအမြစ်နှင့် လမ်းညွှန်ပင် ဖြစ်သည်။ ငါသည် ထိုသူတို့၏ နည်းလမ်းကို လိုက်နာ၏။ ထို့ကြောင့် ဤခွေး၏ ပေါင်သားကို သန့်ရှင်း၍ ပူဇော်သကာရပြုထားသော အစာကဲ့သို့ပင် စားသင့်သော အစာဟု ငါယူဆ၏»။
Verse 74
श्षपच उवाच असता यत् समाचीर्ण न च धर्म: सनातन: । नाकार्यमिह कार्य वै मा छलेनाशुभं कृथा:
အောက်တန်းသားက ပြောသည်– «မတရားသူတို့ လုပ်ဆောင်ခဲ့သမျှသည် ထာဝရဓမ္မ မဟုတ်။ ဤနေရာတွင် မလုပ်သင့်သောအရာကို လုပ်သင့်သကဲ့သို့ မပြုလော့။ လှည့်ကွက်ဖြင့် အပြစ်ကို မကျူးလွန်လော့»။
Verse 75
चाण्डालने कहा--किसी असाधु पुरुषने यदि कोई अनुचित कार्य किया हो तो वह सनातन धर्म नहीं माना जायगा; अत: आप यहाँ न करनेयोग्य कर्म न कीजिये। कोई बहाना लेकर पाप करनेपर उतारू न हो जाइये ।। विश्वामित्र उवाच न पातकं नावमतमृषि: सन् कर्तुमर्हति । समौ च श्वमृगौ मन्ये तस्माद् भोक्ष्ये श्वजाघनीम्,विश्वामित्र बोले--कोई श्रेष्ठ ऋषि ऐसा कर्म नहीं कर सकता, जो पातक हो अथवा जिसकी निन्दा की गयी हो। कुत्ते और मृग दोनों ही पशु होनेके कारण मेरे मतमें समान हैं, अतः मैं यह कुत्तेकी जाँच अवश्य खाऊँगा
ချဏ္ဍာလက ပြောသည်– «မကောင်းသူတစ်ဦးက မသင့်လျော်သောအလုပ်ကို လုပ်ခဲ့လျှင် ထိုအရာကို ထာဝရဓမ္မဟု မယူဆရ။ ထို့ကြောင့် ဤနေရာတွင် မလုပ်သင့်သောအလုပ်ကို မလုပ်ပါနှင့်။ အကြောင်းပြချက်တစ်ခုခုယူ၍ အပြစ်ကို မလုပ်မိအောင် သတိပြုပါ။» ဝိශ්ဝာမိတ္တရက ပြောသည်– «ရိရှီတစ်ဦးသည် အပြစ်ဖြစ်သော သို့မဟုတ် ကန့်ကွက်ရှုတ်ချခံရသော အလုပ်ကို မလုပ်သင့်။ သို့သော် ငါ့အမြင်တွင် ခွေးနှင့် သမင်တို့သည် တိရစ္ဆာန်ဖြစ်ခြင်းအရ တူညီကြသည်။ ထို့ကြောင့် ငါသည် ဤခွေး၏ ပေါင်သားကို မလွဲမသွေ စားမည်»။
Verse 76
श्षपच उवाच यद् ब्राह्मणार्थे कृतमर्थितेन तेनर्षिणा तदवस्थाधिकारे | स वै धर्मो यत्र न पापमस्ति सर्वैरुपायैर्गुरवो हि रक्ष्या:,चाण्डालने कहा--महर्षि अगस्त्यने ब्राह्म॒णोंकी रक्षाके लिये प्रार्थना की जानेपर वैसी अवस्थामें वातापिका भक्षणरूप कार्य किया था (उनके वैसा करनेसे बहुतसे ब्राह्मणोंकी रक्षा हो गयी; अन्यथा वह राक्षस उन सबको खा जाता; अतः महर्षिका वह कार्य धर्म ही था)। धर्म वही है, जिसमें लेशमात्र भी पाप न हो। ब्राह्मण गुरुजन हैं; अतः सभी उपायोंसे उनकी एवं उनके धर्मकी रक्षा करनी चाहिये
Śvapaca က ပြောသည်– «ဗြာဟ္မဏတို့ကို ကာကွယ်ရန်အတွက် တောင်းပန်ခံရသောအခါ ရိရှီက ထိုအရေးပေါ်အခြေအနေ၌ ပြုခဲ့သော လုပ်ရပ်သည် တရားသင့်လျော်သော လုပ်ရပ်ပင် ဖြစ်သည်။ ဓမ္မဆိုသည်မှာ အပြစ်အနာအဆာ အနည်းငယ်မျှ မရှိသည့်အရာဖြစ်၏။ ဗြာဟ္မဏတို့သည် ဂုရုအဖြစ် လေးစားထိုက်သူများဖြစ်သဖြင့် သူတို့နှင့် သူတို့၏ ဓမ္မကို နည်းလမ်းအားလုံးဖြင့် ကာကွယ်ရမည်»။
Verse 77
विश्वामित्र उवाच मित्र च मे ब्राह्मणस्यथायमात्मा प्रियश्न मे पूज्यतमश्न लोके । त॑ धर्तुकामो5हमिमां जिहीर्षे नृशंसानामीदृशानां न बिभ्ये,विश्वामित्र बोले--(यदि अगस्त्यने ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये वह कार्य किया था तो मैं भी मित्रकी रक्षाके लिये उसे करूँगा) यह ब्राह्मणका शरीर मेरा मित्र ही है। यही जगत्में मेरे लिये परम प्रिय और आदरणीय है। इसीको जीवित रखनेके लिये मैं यह कुत्तेकी जाँघ ले जाना चाहता हूँ, अतः ऐसे नृशंस कर्मोंसे मुझे तनिक भी भय नहीं होता है
ဝိශ්ဝာမိတ္တရက ပြောသည်– «ဤဗြာဟ္မဏ၏ ကိုယ်ခန္ဓာသည် ငါ့အတွက် မိတ်ဆွေတည်းဟူ၏။ ဤလောက၌ ငါ့အတွက် အချစ်ဆုံး၊ အလေးအမြတ်ဆုံးလည်း ဖြစ်၏။ ၎င်းကို အသက်ရှင်စေလို၍ ငါသည် ဤခွေး၏ ပေါင်သားကို ယူသွားမည်။ ဤရည်ရွယ်ချက်အတွက် လုပ်ဆောင်ရသည့် ကြမ်းတမ်း၍ အပြစ်တင်ခံရနိုင်သော အလုပ်များကို ငါ မကြောက်»။
Verse 78
श्षपच उवाच काम नरा जीवितं संत्यजन्ति न चाभक्ष्ये क्वचित् कुर्वन्ति बुद्धिम् । सर्वान् कामानू प्राप्तुवन्तीह विद्वन् प्रियस्व काम॑ सहित: क्षुधैव,चाण्डालने कहा--विद्वन्! अच्छे पुरुष अपने प्राणोंका परित्याग भले ही कर दें, परंतु वे कभी अभक्ष्य-भक्षणका विचार नहीं करते हैं। इसीसे वे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं; अत: आप भी भूखके साथ ही--उपवासद्दवारा ही अपनी मन:ःकामनाकी पूर्ति कीजिये
Śvapaca က ပြောသည်– «လိုအင်ကြောင့် လူတို့သည် အသက်ကိုတောင် စွန့်လွှတ်နိုင်သော်လည်း၊ မစားသင့်သောအရာကို စားရန် စိတ်မထားကြ။ ထိုကဲ့သို့ ထိန်းချုပ်ခြင်းကြောင့်ပင် ဤလောက၌ မိမိရည်မှန်းချက်အားလုံးကို ရရှိကြသည်။ ထို့ကြောင့် ပညာရှိရေ၊ မသန့်ရှင်းသောအစာကို မရွေးဘဲ ငတ်မွတ်ခြင်းကို ခံယူ၍—အစာရှောင်ခြင်းဖြင့်—မိမိဆန္ဒကို ပြည့်စုံစေပါ»။
Verse 79
विश्वामित्र उवाच स्थाने भवेत् संशय: प्रेत्यभावे नि:संशय: कर्मणां वै विनाश: । अहं पुनर्व॒तनित्य: शमात्मा मूलं रक्ष्यं भक्षयिष्याम्यभक्ष्यम्,विश्वामित्र बोले--यदि उपवास करके प्राण दे दिया जाय तो मरनेके बाद क्या होगा? यह संशययुक्त बात है; परंतु ऐसा करनेसे पुण्यकर्मोका विनाश होगा, इसमें संशय नहीं है, (क्योंकि शरीर ही धर्माचरणका मूल है) अतः मैं जीवनरक्षाके पश्चात् फिर प्रतिदिन व्रत एवं शम, दम आदिमें तत्पर रहकर पापकर्मोंका प्रायश्चित्त कर लूँगा। इस समय तो धर्मके मूलभूत शरीरकी ही रक्षा करना आवश्यक है; अतः मैं इस अभक्ष्य पदार्थका भक्षण करूँगा
Viśvāmitra က ပြောသည်– «သေပြီးနောက် ဘာဖြစ်မလဲဟု သံသယရှိခြင်းသည် သင့်တော်၏။ သို့သော် အစာရှောင်၍ သေသွားလျှင် ကုသိုလ်ကံများ ပျက်စီးသွားမည်မှာ သံသယမရှိ။ ကိုယ်ခန္ဓာသည် ဓမ္မကျင့်သုံးခြင်းကို ထောက်ပံ့သော အမြစ်ဖြစ်သဖြင့် ထိုအမြစ်ကို ဦးစွာ ကာကွယ်မည်။ ထို့နောက် နေ့စဉ် ဝတ်ပြုကတိများနှင့် ထိန်းချုပ်မှု၊ ငြိမ်းချမ်းမှုတို့၌ စိတ်တည်ကာ အပြစ်ရှိသမျှကို ပြန်လည်ဖြေရှင်းမည်။ ထို့ကြောင့် ဓမ္မ၏ အခြေခံကို ထိန်းသိမ်းရန် မစားသင့်ဟု သတ်မှတ်ထားသောအရာကို ငါစားမည်»။
Verse 80
बुद्धयात्मके व्यक्तमस्तीति पुण्यं मोहात्मके यत्र यथा श्वृभक्ष्ये । यद्यप्येतत् संशयात्मा चरामि नाहं भविष्यामि यथा त्वमेव,यह कुत्तेका मांस-भक्षण दो प्रकारसे हो सकता है--एक बुद्धि और विचारपूर्वक तथा दूसरा अज्ञान एवं आमसत्तिपूर्वक। बुद्धि एवं विचारद्वारा सोचकर धर्मके मूल तथा ज्ञानप्राप्तिके साधनभूत शरीरकी रक्षामें पुण्य है, यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है। इसी तरह मोह एवं आसक्तिपूर्वक उस कार्यमें प्रवृत्त होनेसे दोषका होना भी स्पष्ट ही है। यद्यपि मैं मनमें संशय लेकर यह कार्य करने जा रहा हूँ तथापि मेरा विश्वास है कि मैं इस मांसको खाकर तुम्हारे-जैसा चाण्डाल नहीं बन जाऊँगा। (तपस्याद्वारा इसके दोषका मार्जन कर लूँगा)
Viśvāmitra က ပြောသည်– «အသိဉာဏ်နိုးကြား၍ ပြုလုပ်သော အမှု၌ ကုသိုလ်ရှိသည်ဟု ထင်ရှား၏။ သို့သော် မောဟကြောင့်—ဤခွေးသားစားခြင်းကဲ့သို့—ပြုလုပ်လျှင် အပြစ်သည် လုပ်ပုံလုပ်နည်းနှင့် ရည်ရွယ်ချက်အလိုက် ပေါ်ပေါက်သည်။ ဉာဏ်ဖြင့် စဉ်းစားလျှင် ဓမ္မ၏ အခြေခံဖြစ်၍ ဗဟုသုတရရန်လည်း အထောက်အကူဖြစ်သော ကိုယ်ခန္ဓာကို ကာကွယ်ခြင်း၌ ကုသိုလ်ရှိသည်ဟု ကိုယ်တိုင်ပင် ထင်ရှားလာသည်။ ထိုနည်းတူ မောဟနှင့် အလွန်တွယ်တာမှုကြောင့် ထိုအမှုကို လုပ်လျှင် အပြစ်တင်ခြင်းလည်း ထင်ရှားသည်။ သံသယကို စိတ်ထဲတွင် ထမ်းထားလျက် ငါဤအမှုကို လုပ်သော်လည်း၊ ဤအသားကို စားခြင်းကြောင့် သင်ကဲ့သို့ စဏ္ဍာလ မဖြစ်မည်ဟု ယုံကြည်သည်။ တပဿ (austerity) ဖြင့် အညစ်အကြေးကို သန့်စင်မည်»။
Verse 81
श्षपच उवाच गोपनीयमिदं दुःखमिति मे निश्चिता मतिः । दुष्कृतो5ब्राह्मण: सत्र यस्त्वामहमुपालभे,चाण्डालने कहा--यह कुत्तेका मांस खाना आपके लिये अत्यन्त दुःखदायक पाप है। इससे आपको बचना चाहिये। यह मेरा निश्चित विचार है, इसीलिये मैं महान् पापी और ब्राह्मणेतर होनेपर भी आपको बारंबार उलाहना दे रहा हूँ। अवश्य ही यह धर्मका उपदेश करना मेरे लिये धूर्ततापूर्ण चेष्टा ही है
Śvapaca က ပြောသည်– «ဤဝမ်းနည်းဖွယ်ကိစ္စကို ဖုံးကွယ်ထားသင့်သည်ဟု ငါ့အမြင်မှာ တည်ငြိမ်ပြီးသား။ သို့သော် ငါသည် အပြစ်သား၊ ဗြာဟ္မဏ မဟုတ်သော်လည်း ဤနေရာတွင် သင့်ကို ထပ်တလဲလဲ ပြစ်တင်နေဆဲ။ အမှန်တကယ်တော့ ငါကဲ့သို့သူက ဓမ္မကို သင်ကြားမည်ဆိုခြင်းပင် လိမ္မာလှည့်စားသလို အတင့်ရဲခြင်းတစ်ရပ်ပင်»။
Verse 82
विश्वामित्र उवाच पिबन्त्येवोदकं गावो मण्ड्रकेषु रुवत्स्वपि । न ते5थिकारो धर्मे5स्ति मा भूरात्मप्रशंसक:,विश्वामित्र बोले--मेढकोंके टर्र-टर्र करते रहनेपर भी गौएँ जलाशयोंमें जल पीती ही हैं। (वैसे ही तुम्हारे मना करनेपर भी मैं तो यह अभक्ष्य-भक्षण करूँगा ही)। तुम्हें धर्मोपदेश देनेका कोई अधिकार नहीं है; अतः तुम अपनी प्रशंसा करनेवाले न बनो
Viśvāmitra က ပြောသည်– «ရေကန်ထဲမှာ ဖားတွေ တော်တော်အော်နေသော်လည်း နွားတွေက ရေကို သောက်နေဆဲပဲ။ ထိုနည်းတူ သင်က တားမြစ်ကန့်ကွက်သော်လည်း ငါက ငါဆုံးဖြတ်ထားသလို ဆက်လုပ်မည်။ သင်မှာ ဓမ္မအကြောင်း ငါ့ကို သင်ကြားရန် အခွင့်အာဏာ မရှိ။ ထို့ကြောင့် ကိုယ့်ကိုယ်ကို ချီးမွမ်းသူ မဖြစ်ပါနှင့်»။
Verse 83
श्षपच उवाच सुहृद् भूत्वानुशासे त्वां कृपा हि त्वयि मे द्विज । यदिदं श्रेय आधत्स्व मा लोभात् पातकं कृथा:
စွပစ (အောက်တန်းသား) က ပြောသည်– «သင်၏ အကျိုးကိုလိုလားသော မိတ်ဆွေကောင်းအဖြစ် ငါသည် သင့်ကို သွန်သင်အကြံပေး၏၊ အို ဗြာဟ္မဏ၊ သင့်အပေါ် ငါ၌ ကရုဏာရှိသဖြင့်ပင်။ ဤနေရာ၌ အမှန်တကယ် အကျိုးရှိသော အရာကို လက်ခံယူလော့; လောဘကြောင့် အပြစ်ကမ္မကို မပြုလော့»။
Verse 84
चाण्डालने कहा--ब्रह्मन! मैं तो आपका हितैषी सुहृद् बनकर ही यह धर्माचरणकी सलाह दे रहा हूँ; क्योंकि आपपर मुझे दया आ रही है। यह जो कल्याणकी बात बता रहा हूँ, इसे आप ग्रहण करें। लोभवश पाप न करें ।। विश्वामित्र उवाच सुहन्मे त्वं सुखेप्सुश्वेदापदो मां समुद्धर । जाने5हं धर्मतो55त्मानं शौनीमुत्सूज जाघनीम्,विश्वामित्र बोले--भैया! यदि तुम मेरे हितैषी सूह॒द् हो और मुझे सुख देना चाहते हो तो इस विपत्तिसे मेरा उद्धार करो। मैं अपने धर्मको जानता हूँ। तुम तो यह कुत्तेकी जाँघ मुझे दे दो
ဝိශ්ဝာမိတ္တရ က ပြောသည်– «သင်သည် အမှန်တကယ် ငါ့အကျိုးကိုလိုလားသော မိတ်ဆွေဖြစ်ပြီး ငါ့ကောင်းကျိုးကို လိုချင်လျှင် ဤဒုက္ခမှ ငါ့ကို ကယ်တင်လော့။ ငါသည် ငါ့၏ ဓမ္မနှင့် ငါ့အတွက် မှန်ကန်သည့်အရာကို သိ၏။ ထို့ကြောင့် ခွေး၏ ပေါင်သားကို စွန့်၍ ငါ့ထံ ပေးလော့»။
Verse 85
श्षपच उवाच नैवोत्सहे भवतो दातुमेतां नोपेक्षितुं हियमाणं स्वमन्नम् । उभौ स्याव: पापलोकावलि प्तौ दाता चाहं ब्राह्मणस्त्वं प्रतीच्छन्,चाण्डालने कहा--ब्रह्मन! मैं यह अभक्ष्य वस्तु आपको नहीं दे सकता और मेरे इस अन्नका आपके द्वारा अपहरण हो, इसकी उपेक्षा भी नहीं कर सकता। इसे देनेवाला मैं और लेनेवाले आप ब्राह्मण दोनों ही पापलिप्त होकर नरकमें पड़ेंगे
အောက်တန်းသားက ပြောသည်– «အို ဗြာဟ္မဏ၊ ငါသည် ဤမသန့်ရှင်းသော အရာကို သင့်အား ပေးရန် မစွမ်းနိုင်၊ ထို့ပြင် ငါ့အစာကို ယူသွားနေသည်ကိုလည်း လက်ပိုက်ကြည့်မနေနိုင်။ ဤသို့ဖြစ်လျှင် ငါတို့နှစ်ဦးစလုံး အပြစ်ကပ်လိမ်းကာ အပြစ်လောကသို့ ကျရောက်မည်—ပေးသူအဖြစ် ငါ၊ လက်ခံသူအဖြစ် သင် ဗြာဟ္မဏ»။
Verse 86
विश्वामित्र उवाच अद्याहमेतद् वृजिनं कर्म कृत्वा जीवंश्नरिष्यामि महापवित्रम् | स पूतात्मा धर्ममेवाभिपत्स्ये यदेतयोर्गुरु तद् वै ब्रवीहि,विश्वामित्र बोले--आज यह पापकर्म करके भी यदि मैं जीवित रहा तो परम पवित्र धर्मका अनुष्ठान करूँगा। इससे मेरे तन, मन पवित्र हो जायूँगे और मैं धर्मका ही फल प्राप्त करूँगा। जीवित रहकर धर्माचरण करना और उपवास करके प्राण देना--इन दोनोंमें कौन बड़ा है, यह मुझे बताओ
ဝိශ්ဝာမိတ္တရ က ပြောသည်– «ယနေ့ ငါသည် ဤအပြစ်ကမ္မကို ပြုလုပ်သော်လည်း အသက်ရှင်ကျန်ရစ်နိုင်ပါက၊ ထို့နောက် အလွန်သန့်ရှင်းစေသော ဓမ္မလမ်းကို ကျင့်သုံးမည်။ ထိုကြောင့် ငါ့အတွင်းစိတ် သန့်စင်ကာ ဓမ္မကိုသာ ရှာဖွေ၍ ၎င်း၏ အကျိုးကို ရယူမည်။ အမှန်တကယ် ပြောပြလော့—အသက်ရှင်၍ ဓမ္မကို ကျင့်ခြင်းနှင့် အစာရှောင်ကာ အသက်စွန့်ခြင်းတို့တွင် မည်သည်က ပိုမြတ်သနည်း»။
Verse 87
श्षपच उवाच आत्मैव साक्षी कुलधर्मकृत्ये त्वमेव जानासि यदत्र दुष्कृतम् । यो ह्ाद्रियाद् भक्ष्यमिति श्वमांसं मन्ये न तस्यास्ति विवर्जनीयम्,चाण्डालने कहा--किस कुलके लिये कौन-सा कार्य धर्म है, इस विषयमें यह आत्मा ही साक्षी है। इस अभक्ष्य-भक्षणमें जो पाप है, उसे आप भी जानते हैं। मेरी समझमें जो कुत्तेके मांसको भक्षणीय बताकर उसका आदर करे, उसके लिये इस संसारमें कुछ भी त्याज्य नहीं है
အောက်တန်းသားက ပြောသည်– «မိမိအမျိုးအနွယ်အတွက် မည်သည့်အရာသည် ဓမ္မကိစ္စဖြစ်သနည်းဟူသော အမှုတွင် ကိုယ်တိုင်၏ အတ္တပင် သက်သေဖြစ်၏။ မစားသင့်သောအရာကို စားခြင်း၌ ပါဝင်သော အပြစ်ကို သင်လည်း သိ၏။ ငါ့အမြင်အရ ခွေးသားကို ‘စားသင့်သည်’ ဟု ဆိုကာ ဂုဏ်ပြုသူအတွက် ဤလောက၌ ရှောင်ကြဉ်စရာဟူ၍ မည်သည့်အရာမျှ မကျန်တော့»။
Verse 88
विश्वामित्र उवाच उपादाने खादने चास्ति दोष: कार्यात्यये नित्यमत्रापवाद: । यस्मिन् हिंसा नानृतं वाच्यलेशो- $भक्ष्यक्रिया यत्र न तदगरीय:,विश्वामित्र बोले--चाण्डाल! मैं इसे मानता हूँ कि तुमसे दान लेने और इस अभक्ष्य वस्तुको खानेमें दोष है फिर भी जहाँ न खानेसे प्राण जानेकी सम्भावना हो, वहाँके लिये शास्त्रोंमें सदा ही अपवाद वचन मिलते हैं। जिसमें हिंसा और असत्यका तो दोष है ही नहीं, लेशमात्र निन्दारूप दोष है। प्राण जानेके अवसरोंपर भी जो अभक्ष्य-भक्षणका निषेध ही करनेवाले वचन हैं, वे गुरुतर अथवा आदरणीय नहीं हैं
ဝိශ්ဝာမိတ္တရက ပြောသည်– «ဤသို့သော အလှူကို လက်ခံခြင်းနှင့် မစားသင့်သောအရာကို စားခြင်းတွင် အပြစ်ရှိသည်မှာ အမှန်ပင်။ သို့သော် အသက်ရှင်ရေးအရေးပေါ်—အသက်ကို ကယ်ရမည့်အခါ—သမ္မာကျမ်းနှင့် ဓမ္မသတ်များတွင် အမြဲတမ်း ခြွင်းချက်ကို ခွင့်ပြုထားသည်။ အကြမ်းဖက်မှုမရှိ၊ မုသာမရှိသောကိစ္စတွင် အပြစ်ဟူသည် အနည်းငယ်သော ရှုတ်ချမှုအရိပ်သာ ဖြစ်သည်။ ထို့ကြောင့် အသက်အန္တရာယ်ရှိသော်လည်း မစားသင့်သောအရာကို လုံးဝမစားရဟု တင်းကျပ်စွာ တားမြစ်သော အမိန့်များသည် ပိုမိုအာဏာရှိသည့် သို့မဟုတ် ပိုမိုလေးနက်သည့် အမိန့်များ မဟုတ်»။
Verse 89
चपच उवाच यद्येष हेतुस्तव खादने स्या- न्न ते वेद: कारण नार्यधर्म: | तस्माद् भक्ष्येडभक्षणे वा द्विजेन्द्र दोषं न पश्यामि यथेदमत्र,चाण्डालने कहा-द्विजेन्द्र! यदि इस अभक्ष्य वस्तु-को खानेमें आपके लिये यह प्राणरक्षारूपी हेतु ही प्रधान है तब तो आपके मतमें न वेद प्रमाण है और न श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार-धर्म ही। अतः मैं आपके लिये भक्ष्य वस्तुके अभक्षणमें अथवा अभक्ष्य वस्तुके भक्षणमें कोई दोष नहीं देख रहा हूँ, जैसा कि यहाँ आपका इस मांसके लिये यह महान् आग्रह देखा जाता है
စပစက ပြောသည်– «ဗြဟ္မဏအထွဋ်အမြတ်ရေ၊ သင် စားလိုခြင်း၏ ဆုံးဖြတ်ချက်အကြောင်းရင်းက အသက်ကယ်ရန်သာ ဖြစ်နေပါက သင်၏အမြင်တွင် ဝေဒသည် အာဏာမဖြစ်တော့သကဲ့သို့ မြတ်သောသူတို့၏ အကျင့်ဓမ္မလည်း အကြောင်းပြချက်မဖြစ်တော့ပေ။ ထို့ကြောင့် ဗြဟ္မဏအထွဋ်အမြတ်ရေ၊ စားသင့်သောအရာကို မစားခြင်း၌ဖြစ်စေ၊ မစားသင့်သောအရာကို စားခြင်း၌ဖြစ်စေ သင့်အတွက် အပြစ်မမြင်ရ—ဤနေရာတွင် သင်သည် ဤအသားကို အလွန်အမင်း တောင်းဆိုနေသကဲ့သို့ပင်»။
Verse 90
विश्वामित्र उवाच नैवातिपापं भक्ष्यमाणस्य दुष्ट सुरां तु पीत्वा पततीति शब्द: । अन्योन्यकार्याणि यथा तथैव न पापमात्रेण कृतं हिनस्ति,विश्वामित्र बोले--अखाद्य वस्तु खानेवालेको ब्रह्महत्या आदिके समान महान् पातक लगता हो, ऐसा कोई शास्त्रीय वचन देखनेमें नहीं आता। हाँ, शराब पीकर ब्राह्मण पतित हो जाता है, ऐसा शास्त्रवाक्य स्पष्टरूपसे उपलब्ध होता है; अतः वह सुरापान अवश्य त्याज्य है। जैसे दूसरे-दूसरे कर्म निषिद्ध हैं, वैसा ही अभक्ष्य-भक्षण भी है। आपत्तिके समय एक बार किये हुए किसी सामान्य पापसे किसीके आजीवन किये हुए पुण्यकर्मका नाश नहीं होता
ဝိශ්ဝာမိတ္တရက ပြောသည်– «မစားသင့်သောအရာကို စားခြင်းသာဖြင့် ဗြဟ္မဏသတ်ခြင်းကဲ့သို့ အလွန်ကြီးမားသော ပာတက ဖြစ်သွားသည်ဟု ဆိုသော သာသနာစာတမ်းကို မမြင်ရ။ သို့သော် ဗြဟ္မဏသည် အရက် (surā) သောက်လျှင် အဆင့်ကျ၍ ပျက်စီးသွားသည်ဟု ရှင်းလင်းသော သာသနာဝါကျ ရှိသည်။ ထို့ကြောင့် surā သောက်ခြင်းကို မဖြစ်မနေ စွန့်ပစ်ရမည်။ အခြားအခြားသော ကံများကဲ့သို့ပင် အမစားသင့်ကို စားခြင်းလည်း တားမြစ်ထားသည်။ သို့ရာတွင် အရေးပေါ်အခါ တစ်ကြိမ်သာ ပြုမိသော သာမန်အပြစ်တစ်ခုကြောင့် တစ်ဘဝလုံး စုဆောင်းထားသော ကုသိုလ်ကို မဖျက်ဆီးနိုင်»။
Verse 91
श्षपच उवाच अस्थानतो हीनत: कुत्सिताद् वा तद् विद्वांसं बाधते साधुवृत्तम् । श्वानं पुनर्यो लभते5भिषज्भात् तेनापि दण्ड: सहितव्य एव,चाण्डालने कहा--जो अयोग्य स्थानसे, अनुचित कर्मसे तथा निन्दित पुरुषसे कोई निषिद्ध वस्तु लेना चाहता है, उस विद्वानको उसका सदाचार ही वैसा करनेसे रोकता है (अत: आपको तो ज्ञानी और धर्मात्मा होनेके कारण स्वयं ही ऐसे निन्द्य कर्मसे दूर रहना चाहिये); परंतु जो बारंबार अत्यन्त आग्रह करके कुत्तेका मांस ग्रहण कर रहा है, उसीको इसका दण्ड भी सहन करना चाहिये (मेरा इसमें कोई दोष नहीं है)
ရှွပစက ပြောသည်– «မသင့်လျော်သောနေရာမှဖြစ်စေ၊ အနိမ့်ကျသောနည်းလမ်းမှဖြစ်စေ၊ အထင်အမြင်ချသောသူထံမှဖြစ်စေ တားမြစ်ထားသောအရာကို လိုချင်လျှင် ပညာရှိ၏ သဒ္ဓါကျင့်ဝတ်က ထိုသူကို တားဆီးတတ်သည်။ သို့သော် ဆရာဝန်ထံမှပင်ဖြစ်စေ ခွေးအသားကို ထပ်ခါထပ်ခါ အလွန်အမင်း အတင်းအကျပ်ယူနေသူကသာ ထိုအပြစ်ဒဏ်ကို ခံရမည်။ ဤအမှု၌ ငါ့မှာ အပြစ်မရှိ»။
Verse 92
भीष्म उवाच एवमुक््त्वा निववृते मातड्र: कौशिकं तदा । विश्वामित्रो जहारैव कृतबुद्धि: श्वजाघनीम्,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि!! ऐसा कहकर चाण्डाल मुनिको मना करनेके कार्यसे निवृत्त हो गया। विश्वामित्र तो उसे लेनेका निश्चय कर चुके थे; अतः कुत्तेकी जाँघ ले ही गये
ဘိဿမက ပြောသည်– «ဤသို့ ပြောပြီးနောက် မာတင်္ဂ (ချဏ္ဍာလ) သည် ထိုအခါ ကောသိက (ဝိශ්ဝာမိတ္တရ) ကို တားဆီးခြင်းမှ ရပ်တန့်သွား하였다။ သို့သော် ဝိශ්ဝာမိတ္တရသည် ဆုံးဖြတ်ပြီးသားဖြစ်သဖြင့် ခွေးပေါင်ကို ယူသွားလေ၏»။
Verse 93
ततो जग्राह स श्वाड़ं जीवितार्थी महामुनि: । सदारस्तामुपाह्त्य वने भोक्तुमियेष सः,जीवित रहनेकी इच्छावाले उन महामुनिने कुत्तेके शरीरके उस एक भागको ग्रहण कर लिया और उसे वनमें ले जाकर पत्नीसहित खानेका विचार किया
ထို့နောက် အသက်ရှင်လိုသော စိတ်ကြောင့် မဟာမုနိသည် ခွေးအသား၏ အစိတ်အပိုင်းတစ်စကို ယူလိုက်၏။ ထိုအသားကို မယားနှင့်အတူ သယ်ဆောင်ကာ တောအတွင်း၌ စားသုံးရန် ရည်ရွယ်하였다—ဤဖြစ်ရပ်သည် အသက်ရှင်ရေး၏ အရေးတကြီးမှုနှင့် ဓမ္မ၏ တားမြစ်ကန့်သတ်ချက်တို့ကြားရှိ သဘောတရားဆိုင်ရာ တင်းမာမှုကို ထင်ရှားစေသည်။
Verse 94
अथास्य बुद्धिरभवद् विधिनाहं श्वजाघनीम् । भक्षयामि यथाकामं पूर्व संतर्प्प देवता:,इतनेहीमें उनके मनमें यह विचार उठा कि मैं कुत्तेकी जाँघके इस मांसको विधिपूर्वक पहले देवताओंको अर्पण करूँगा और उन्हें संतुष्ट करके फिर अपनी इच्छानुसार उसे खाऊँगा
ထိုအခါ သူ၏စိတ်၌ အကြံတစ်ခု ပေါ်လာ၏—“ဤခွေးပေါင်အသားကို ဓမ္မနည်းလမ်းအတိုင်း အရင်ဆုံး ဒေဝတားတို့အား ပူဇော်၍ သူတို့ကို စိတ်ကျေနပ်စေပြီးမှ၊ ထို့နောက် မိမိအလိုအတိုင်း စားသုံးမည်” ဟူ၍။
Verse 95
ततोडग्निमुपसंहृत्य ब्राह्ेण विधिना मुनि: । ऐन्द्राग्नेयेन विधिना चरुं श्रपयत स्वयम्,ऐसा सोचकर मुनिने वेदोक्त विधिसे अग्निकी स्थापना करके इन्द्र और अग्निदेवताके उद्देश्यसे स्वयं ही चरु पकाकर तैयार किया
ထို့သို့ စဉ်းစားပြီးနောက် မုနိသည် ဝေဒသင်ကြားသည့် ဗြာဟ္မဏနည်းလမ်းအတိုင်း မီးပူဇော်ပွဲကို စီစဉ်တည်ဆောက်ကာ ပြီးမြောက်စေ하였다။ ထို့နောက် အိန္ဒြနှင့် အဂ္နိတို့အတွက် သတ်မှတ်ထားသော ရိတုနည်းအတိုင်း ကိုယ်တိုင်ပင် စက္ကရိယာဆန်ပြုတ် (caru) ကို ချက်ပြုတ်ပြင်ဆင်하였다။
Verse 96
ततः समारभत् कर्म दैवं पित्रयं च भारत । आहूय देवानिन्द्रादीन् भागं भागं विधिक्रमात्,भरतनन्दन! फिर उन्होंने देवकर्म और पितृकर्म आरम्भ किया। इन्द्र आदि देवताओंका आवाहन करके उनके लिये क्रमश: विधिपूर्वक पृथक्-पृथक् भाग अर्पित किया
ဘီရှ္မက ပြော၏—“အို ဘာရတ၊ ထို့နောက် သူသည် ဒေဝတို့အတွက် သတ်မှတ်ထားသော ကర్మနှင့် ပိတೃ (ဘိုးဘွား) တို့အတွက် ကర్మတို့ကို စတင်하였다။ အိန္ဒြကို အစပြု၍ ဒေဝတားတို့ကို ဖိတ်ခေါ်ပြီး၊ ရိတုစည်းကမ်းအတိုင်း တစ်ပါးချင်းစီအတွက် သီးခြားအပိုင်းကို အစဉ်လိုက် ပူဇော်အပ်နှံ하였다။”
Verse 97
एतस्मिन्नेव काले तु प्रववर्ष स वासव: । संजीवयन् प्रजा: सर्वा जनयामास चौषधी:,इसी समय इन्द्रने समस्त प्रजाको जीवनदान देते हुए बड़ी भारी वर्षा की और अन्न आदि ओषधियोंको उत्पन्न किया
ထိုအချိန်တည်းမှာပင် ဝါသဝ (အိန္ဒြ) သည် မိုးကြီးရွာချလိုက်၏။ သတ္တဝါအားလုံးကို အသက်ပြန်လည်ပေးကာ ဆေးပင်နှင့် အစာအပင်တို့ကို ပေါက်ဖွားစေ၍ အချိန်မီ အာဟာရဖြင့် အသက်ရှင်မှုကို ထောက်ပံ့하였다။
Verse 98
विश्वामित्रो5पि भगवांस्तपसा दग्धकिल्बिष: । कालेन महता सिद्धिमवाप परमाद्भुताम्,भगवान् विश्वामित्र भी दीर्घकालतक निराहार व्रत एवं तपस्या करके अपने सारे पाप दग्ध कर चुके थे; अतः उन्हें अत्यन्त अद्भुत सिद्धि प्राप्त हुई
ဘီရှ္မက ပြော၏— «အလွန်ဂုဏ်သိက္ခာမြင့်သော ဝိශ්ဝာမိတ္တရိရှီသည်ပင် တပဿာဖြင့် အပြစ်အနာအဆာတို့ကို လောင်ကျွမ်းစေပြီး၊ အလွန်ရှည်လျားသောကာလအပြီးတွင် အံ့ဩဖွယ်ရာ အထွတ်အထိပ်သော သာဓနာတော်အောင်မြင်မှုကို ရရှိ하였다»။
Verse 99
स संहृत्य च तत् कर्म अनास्वाद्य च तद्धवि: । तोषयामास देवांश्व पितृश्च द्विजसत्तम:,उन द्विजश्रेष्ठ मुनिने वह कर्म समाप्त करके उस हविष्यका आस्वादन किये बिना ही देवताओं और पितरोंको संतुष्ट कर दिया और उन्हींकी कृपासे पवित्र भोजन प्राप्त करके उसके द्वारा जीवनकी रक्षा की
ထိုအမြတ်ဆုံးသော ဗြာဟ္မဏရိရှီသည် ထိုကర్మကို အဆုံးသတ်ပြီး၊ ထိုဟဝိဿကို မစားသုံးဘဲပင်၊ ဒေဝတော်တို့နှင့် ပိတೃတို့ကို ကျေနပ်စေ하였다။ ထို့နောက် သူတို့၏ကရုဏာကြောင့် သန့်ရှင်းသော အစာကို ရရှိကာ ထိုအစာဖြင့် အသက်ကို ထိန်းသိမ်း하였다။
Verse 100
एवं विद्वानदीनात्मा व्यसनस्थो जिजीविषु: । सर्वोपायैरुपायज्ञो दीनमात्मानमुद्धरेत्,राजन! इस प्रकार संकटमें पड़कर जीवनकी रक्षा चाहनेवाले विद्वान् पुरुषको दीनचित्त न होकर कोई उपाय दढूँढ़ निकालना चाहिये और सभी उपायोंसे अपने आपका आपत्कालमें परिस्थितिसे उद्धार करना चाहिये
အရှင်မင်းကြီး၊ ထို့ကြောင့် အကျပ်အတည်းထဲ ကျရောက်သော်လည်း အသက်ရှင်လိုသော ပညာရှိသည် စိတ်ပျက်အားလျော့မနေသင့်။ နည်းလမ်းကို သိသူဖြစ်၍ နည်းလမ်းအမျိုးမျိုးဖြင့် အလုပ်ဖြစ်မည့် အကြံကို ရှာဖွေကာ အရေးပေါ်ကာလ၌ မိမိကိုယ်ကို ထိုအခြေအနေမှ ကယ်တင်ရမည်။
Verse 101
एतां बुद्धिं समास्थाय जीवितव्यं सदा भवेत् | जीवन पुण्यमवाप्रोति पुरुषो भद्रमश्लुते,इस बुद्धिका सहारा लेकर सदा जीवित रहनेका प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि जीवित रहनेवाला पुरुष पुण्य करनेका अवसर पाता और कल्याणका भागी होता है
ဤဉာဏ်ကို အားထားကာ အမြဲအသက်ရှင်ရန် ကြိုးပမ်းသင့်သည်။ အကြောင်းမူကား အသက်ရှင်နေသူသည် ကုသိုလ်ကောင်းမှု ပြုလုပ်ရန် အခွင့်အလမ်းကို ရရှိပြီး ကောင်းကျိုးမင်္ဂလာကိုလည်း ခံစားရသူ ဖြစ်လာသည်။
Verse 102
तस्मात् कौन्तेय विदुषा धर्माधर्मविनिश्चये | बुद्धिमास्थाय लोके5स्मिन् वर्तितव्यं कृतात्मना,अतः कुन्तीनन्दन! अपने मनको वशमें रखनेवाले विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह इस जगत्में धर्म और अधर्मका निर्णय करनेके लिये अपनी ही विशुद्ध बुद्धिका आश्रय लेकर यथायोग्य बर्ताव करे
ထို့ကြောင့် ကုန္တီ၏သားတော်၊ ဓမ္မနှင့် အဓမ္မကို ခွဲခြားဆုံးဖြတ်ရသောအခါ စိတ်ကို ထိန်းချုပ်နိုင်သော ပညာရှိသည် မိမိ၏ သန့်စင်သော ဉာဏ်မြင်ကို အားထားကာ ဤလောက၌ သင့်လျော်သကဲ့သို့ ပြုမူနေထိုင်ရမည်။
Verse 141
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि विश्वामित्रश्नपचसंवादे एकचत्वारिंशदधिकशततमो<ध्याय:
ဤသို့ဖြင့် «သီရိ မဟာဘာရတ» ၏ «ရှာန္တိ ပရဝ» အတွင်း၊ အထူးသဖြင့် အကျပ်အတည်းကာလ၌ လိုက်နာရမည့် ဓမ္မ (Āpaddharma) အခန်းတွင်၊ ဝိශ්ဝာမိတ္တရနှင့် အောက်တန်းသား (śvapaca) တို့၏ ဆွေးနွေးပွဲသည် အဆုံးသတ်လေ၏—ဤသည်မှာ အခန်း ၁၄၁ ဖြစ်သည်။ ဤအဆုံးသတ်ကော်လိုဖွန်သည် အလွန်အရေးပေါ်လိုအပ်မှုအောက်၌ ဓမ္မကို မည်သို့ညှိနှိုင်းဆုံးဖြတ်ရမည်ကို သင်ကြားထားပြီး၊ အခြေအနေကို သေချာစဉ်းစားကာ အသက်ရှင်ရေးကို ထိန်းသိမ်းသော်လည်း တရားမျှတမှု၏ စိတ်ဓာတ်ကို မစွန့်လွှတ်ရန်ဟု ဖော်ပြသည်။
Verse 533
तदा बुद्धि: कृता पापे हरिष्यामि श्वजाघनीम् । “मैं जानता हूँ कि यह अधर्म है तो भी यह कुत्तेकी जाँघ ले जाऊँगा। मैं तुमलोगोंके घरोंपर घूम-घूमकर माँगनेपर भी जब भीख नहीं पा सका हूँ, तब मैंने यह पापकर्म करनेका विचार किया है; अतः कुत्तेकी जाँघ ले जाऊँगा
ထိုအခါ သူသည် အပြစ်ရှိသော အလုပ်ကို ဆုံးဖြတ်ကာ—“ခွေး၏ ပေါင်ကို ယူမည်” ဟု ဆို၏။ ၎င်းသည် အဓမ္မဖြစ်ကြောင်း သိလျက်နှင့်ပင်၊ ဆာလောင်မှုနှင့် အိမ်အိမ်လှည့်၍ ဆွမ်းတောင်းသော်လည်း မရနိုင်ခဲ့ခြင်းတို့က သူ့ကို ဤဆုံးဖြတ်ချက်သို့ တွန်းပို့သည်။ ထို့ကြောင့် သူသည် ခွေးပေါင်ကို ယူဆောင်သွားရန် အတည်ပြုလေ၏။
Verse 556
श्रुत्वा तत् त्वं तथा55तिष्ठ यथा धर्मो न हीयते । तब चाण्डालने उनसे कहा--“महर्षे! मेरी बात सुनिये और उसे सुनकर ऐसा काम कीजिये, जिससे आपका धर्म नष्ट न हो
“ဤအရာကို ကြားပြီးနောက်၊ သင်၏ ဓမ္မ မလျော့ပါးစေရန် သင့်အနေအထားနှင့် အပြုအမူကို ထိုသို့ပင် ထိန်းသိမ်း၍ ဆောင်ရွက်ပါ။” ဟု ချဏ္ဍာလက မဟာရိရှီအား ပြောကြားကာ၊ တရားမျှတမှုကို ထိန်းသိမ်းပြီး ကိုယ်ကျင့်တရားကျဆင်းမှုကို ရှောင်ရှားစေမည့် လမ်းကို ရွေးချယ်ရန် တိုက်တွန်းလေ၏။
A host must honor and protect a śaraṇāgata guest who is also a hunter, while lacking resources to provide food—forcing a choice between self-preservation, capacity limits, and the binding nature of hospitality.
Hospitality and refuge-protection are portrayed as decisive tests of dharma: the ethical identity of a householder is measured by disciplined generosity and non-betrayal of refuge even when circumstances are adverse.
No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the meta-logic is implicit—actions aligned with atithi-dharma and śaraṇāgata principles are treated as spiritually weighty, while remorse signals recognition of adharma’s consequences.