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The Ātma Upaniṣad, associated in later tradition with the Atharvaveda and counted among the Sannyāsa/“renunciation” Upaniṣads, is a compact Advaita Vedānta manual that turns the Upaniṣadic inquiry inward: What is the Self (ātman), and how is it to be realized? In a small compass it reiterates the classical Upaniṣadic thesis that the innermost Self is not an object among objects but the very light of awareness by which all objects are known. Its philosophical significance lies in its disciplined use of negation (neti-neti) and discrimination (viveka) to separate the Self from body, senses, mind, and ego, culminating in the recognition of non-duality (advaita) between ātman and brahman. Historically, the text reflects a mature Vedāntic milieu in which the older Vedic sacrificial worldview has been interiorized into a contemplative soteriology. Like other late Upaniṣads, it presupposes the authority of the major Upaniṣadic mahāvākyas (e.g., “tat tvam asi,” “ahaṃ brahmāsmi”) and frames liberation (mokṣa) primarily as knowledge (jñāna) rather than ritual action. Its affiliation with the Atharvan corpus is typical of many minor Upaniṣads transmitted under Atharvavedic headings, and its renunciant tone aligns it with monastic pedagogy: concise definitions, repeated contrasts between the real and the unreal, and an emphasis on direct realization. The key themes are (1) the Self as self-luminous consciousness (svayaṃ-prakāśa), (2) the unreality or dependent reality of the body–mind complex, and (3) the method of inward inquiry that dissolves superimposition (adhyāsa). The Upaniṣad characteristically describes the Self as untouched by waking, dream, and deep sleep, and as free from the guṇas and doership/enjoyership. The world of names and forms is treated as appearance (nāma-rūpa) dependent on ignorance (avidyā), while the Self is presented as the unchanging witness (sākṣin). Soteriologically, the text’s practical burden is to stabilize the seeker in renunciation of identification: one does not “become” brahman but recognizes that one has never been other than brahman. This recognition is not mere conceptual assent; it is a transformative seeing that loosens fear, grief, and craving by exposing their root in misidentification. Thus the Ātma Upaniṣad functions as a bridge between Upaniṣadic metaphysics and contemplative praxis, offering a succinct Advaitic map from self-analysis to liberation.
Start ReadingĀtman is self-luminous consciousness (cit), the witness (sākṣin) of all states.
Discrimination (viveka): the Self is distinct from body, senses, mind, and ego.
Neti-neti (negation): whatever is seen/known is not the seer/knower.
Non-duality (advaita): ātman is brahman; multiplicity is nāma-rūpa dependent on avidyā.
Transcendence of the three states (waking, dream, deep sleep) and the three guṇas.
Freedom from doership/enjoyership (kartṛtva/bhoktṛtva) as a mark of realization.
Renunciation (sannyāsa) as inner disidentification, culminating in jñāna-mokṣa.
Liberation is immediate knowledge (aparokṣa-jñāna), not a produced result of action.
31 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.
Verse 1
ॐ अथाङ्गिरास्त्रिविधः पुरुषोऽजायत—आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा चेति। त्वक्-चर्म-मांस-रोम-अङ्गुष्ठ-अङ्गुल्यः, पृष्ठ-वंश-नख-गुल्फ-उदर-नाभि-मेढ्र-कटि-ऊरु-कपोल-श्रोत्र-भ्रू-ललाट-बाहु-पार्श्व-शिरः-अक्षीणि भ...
ॐ। अंगिरस ने बताया कि इंसान के तीन रूप हैं। पहला है आत्मा, दूसरा है अंतरात्मा, तीसरा है परमात्मा। यह शरीर जो देखो, त्वचा, चमड़ी, मांस, बाल, अंगूठा, उंगलियां, पीठ, रीढ़, नाखून, पैर का घुटना, पेट, नाभि, गुप्तांग, कमर, जांघ, गाल, कान, भौहें, माथा, बाजू, कमर के पास, सिर और आंखें। यह पैदा होता है और मर जाता है। यह है आत्मा। अब अंतरात्मा का नाम सुनो। यह है धरती, पानी, आग, हवा, आकाश। यह है इच्छा, नफरत, खुशी, दुख, वासना, भ्रम, सोच-विचार, पुरानी यादें। यह है आवाज़, ऊंची और नीची, छोटी और लंबी। यह है हकलाना, गरजना, फटना, खुशी, नाच, गाना, बजाना, खत्म होना, फैलना। यह सब सुनता है, सूंघता है, चखता है, चलाता है, करता है, समझता है। यह पुराण, न्याय, मीमांसा और धरम शास्त्र पढ़ता है। यह है अंतरात्मा। अब परमात्मा का नाम सुनो। यह ॐ रूप है, इसकी पूजा करनी चाहिए। यह प्राणायाम, ध्यान, समाधि, योग से मिलता है। यह इतना छोटा है जैसे बरगद का बीज या धान का दाना। बाल की नोक को एक लाख हिस्सों में बांटो, उतना भी छोटा है। यह मिलता है, लेकिन पकड़ा नहीं जाता। यह पैदा नहीं होता, मरता नहीं है। यह सूखता नहीं, गीला नहीं होता, जलता नहीं है। यह कांपता नहीं, टूटता नहीं, कटता नहीं है। इसमें कोई गुण नहीं, यह गवाह है, साफ है, बिना हिस्सों वाला है, अकेला है, सूक्ष्म है, अपना नहीं है, दाग नहीं है, बदलता नहीं है। इसमें आवाज़, स्पर्श, रूप, स्वाद, खुशबू नहीं है। यह सोच से परे है, इच्छा नहीं है, सब जगह है। यह सोचा नहीं जा सकता, बताया नहीं जा सकता। यह गंदे को भी साफ कर देता है। इसमें कोई कर्म नहीं, इसलिए इसका कोई जनम-मरण नहीं। इसका नाम है आत्मा, यह शिव है, साफ है, एक है, हमेशा एक है। यही ब्रह्मा है, यही ब्रह्मा दिखता है।
Threefold analysis of self (deha-jīva/antarātmā/paramātmā), nirguṇa Brahman as sākṣin; negation of saṃsāra for the actionless SelfVerse 2
जगद्रूपतयाप्येतद्ब्रह्मैव प्रतिभासते । विद्याविद्यादिभेदेन भावाभावादिभेदतः॥२॥
यह सारी दुनिया भी ब्रह्मा ही है, अलग कुछ नहीं है। ज्ञान का भेद है, अज्ञान का भेद है, होने का भेद है, न होने का भेद है। इन सब भेदों के बावजूद भी ब्रह्मा ही दिखता है।
Māyā/avidyā-based appearance (pratibhāsa) of jagat upon BrahmanVerse 3
गुरुशिष्यादिभेदेन ब्रह्मैव प्रतिभासते । ब्रह्मैव केवलं शुद्धं विद्यते तत्त्वदर्शने॥३॥
गुरु भी ब्रह्मा है, शिष्य भी ब्रह्मा है। दोनों में भेद है, लेकिन असल में ब्रह्मा ही है। सच्चाई को जब देखो, तब ब्रह्मा ही मिलता है। वो भी साफ और अकेला।
Non-duality sublating relational dualities; pedagogical duality (guru–śiṣya) as provisionalVerse 4
न च विद्या न चाविद्या न जगच्च न चापरम् । सत्यत्वेन जगद्भानं संसारस्य प्रवर्तकम्॥४॥
न कोई ज्ञान है, न कोई अज्ञान है। न यह दुनिया है, न कुछ और है। दुनिया को सच मान लेना, यही जनम-मरण शुरू करता है।
Saṃsāra driven by satya-buddhi (taking appearance as absolute); ultimate negation (paramārtha) of dual categoriesVerse 5
असत्यत्वेन भानं तु संसारस्य निवर्तकम् । घटोऽयमिति विज्ञातुं नियमः कोऽन्वपेक्षते॥५॥ विना प्रमाणसुष्ठुत्वं यस्मिन् सति पदार्थधीः । अयमात्मा नित्यसिद्धः प्रमाणे सति भासते॥६॥
दुनिया को झूठ मान लेना, यही जनम-मरण खत्म करता है। हांडी है, यह जानने के लिए कोई नियम की ज़रूरत नहीं है। हाथ से छू के देख लो, पता चल जाता है। बिना किसी प्रूफ के भी चीज़ों का ज्ञान हो जाता है। यह आत्मा हमेशा से है, जब प्रूफ मिलता है तब दिखता है।
Pramāṇa and self-revelation; cessation of saṃsāra through asatya-darśana of appearances; nitya-siddha ātmanVerse 6
असत्यत्वेन भानं तु संसारस्य निवर्तकम् । घटोऽयमिति विज्ञातुं नियमः कोऽन्वपेक्षते ॥ विना प्रमाणसुष्ठुत्वं यस्मिन् सति पदार्थधीः । अयमात्मा नित्यसिद्धः प्रमाणे सति भासते ॥५–६॥
जब तुम समझ जाओगे कि यह दुनिया असली नहीं है, तब जनम मरण का चक्कर टूट जाता है। देखो, यह हांडी है, यह जानने के लिए कोई रूल की ज़रूरत है क्या? बिना किसी प्रूफ के भी चीज़ें समझ में आती हैं। आत्मा तो हमेशा से है, कभी खत्म नहीं होती। जब तक सही तरह से देखते हो, तब तक वो साफ साफ नज़र आता है।
Māyā/Asat-khyāti and Atman as nitya-siddha (ever-established); pramāṇa and aparokṣa-jñānaVerse 7
न देशं नापि कालं वा न शुद्धिं वाप्यपेक्षते । देवदत्तोऽहमित्येतद्विज्ञानं निरपेक्षकम् ॥७॥
इसके लिए न कोई जगह चाहिए, न कोई टाइम चाहिए, न कोई पूजा का शुद्ध होना ज़रूरी है। जैसे तुम जानते हो मैं देवदत्त हूं, इसके लिए किसी प्रूफ की ज़रूरत नहीं। यह जानना भी ऐसे ही है, किसी शर्त पे डिपेंड नहीं करता।
Immediate self-cognition (aparokṣa-anubhava) and independence from ritual conditions; jñāna over karmaVerse 8
तद्वद्ब्रह्मविदोऽप्यस्य ब्रह्माहमिति वेदनम् । भानुनेव जगत्सर्वं भास्यते यस्य तेजसा ॥८॥
वैसे ही जो ब्रह्मन को जानता है, उसको भी यह पता है, मैं ब्रह्मन हूं। इसके लिए किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं। जैसे सूरज की रोशनी से पूरा जगत दिखता है, वैसे ही उसकी चमक से सब कुछ चमकता है। उसकी रोशनी से ही सब दिखता है।
Aham Brahmāsmi; consciousness as self-luminous (svayaṃ-prakāśa) and illuminator of all experienceVerse 9
अनात्मकम् असत् तुच्छं किं नु तस्यावभासकम् । वेदशास्त्रपुराणानि भूतानि सकलान्यपि ॥ येनार्थवन्ति तं किं नु विज्ञातारं प्रकाशयेत् । क्षुधां देहव्यथां त्यक्त्वा बालः क्रीडति वस्तुनि ॥ तथैव विद्वान् रमते न...
जो आत्मा नहीं है, वो असली नहीं है, कुछ भी नहीं है, उसको कैसे रोशन कर सकते हो? वेद, शास्त्र, पुराण, सब जीव, सब इसकी वजह से मतलब रखते हैं। पर यह जो सबको जानता है, उसको कौन रोशन करेगा? जैसे बच्चे को भूख और दर्द हो, पर वो खिलौने के साथ खेलता रहता है, वैसे ही ज्ञानी भी खुश रहता है। उसका कुछ अपना नहीं, कोई मैं नहीं, बस खुशी। वो इच्छाओं में रहता है पर कोई इच्छा नहीं रखता, अकेले चलता है।
Svayaṃ-prakāśa Atman (self-luminous knower); anātman as dependent appearance; jīvanmukti traits (nirmama, nirahaṃ, niṣkāma)Verse 10
अनात्मकम् असत् तुच्छं किं नु तस्यावभासकम् । वेदशास्त्रपुराणानि भूतानि सकलान्यपि ॥ येनार्थवन्ति तं किं नु विज्ञातारं प्रकाशयेत् । क्षुधां देहव्यथां त्यक्त्वा बालः क्रीडति वस्तुनि ॥ तथैव विद्वान् रमते न...
जो आत्मा नहीं है, वो असली नहीं है, कुछ भी नहीं है, उसको कैसे रोशन कर सकते हो? वेद, शास्त्र, पुराण, सब जीव, सब इसकी वजह से मतलब रखते हैं। पर यह जो सबको जानता है, उसको कौन रोशन करेगा? जैसे बच्चे को भूख और दर्द हो, पर वो खिलौने के साथ खेलता रहता है, वैसे ही ज्ञानी भी खुश रहता है। उसका कुछ अपना नहीं, कोई मैं नहीं, बस खुशी। वो इच्छाओं में रहता है पर कोई इच्छा नहीं रखता, अकेले चलता है।
Svayaṃ-prakāśa Atman; anātman as dependent; jīvanmukti and niṣkāmatāVerse 11
अनात्मकम् असत् तुच्छं किं नु तस्यावभासकम् । वेदशास्त्रपुराणानि भूतानि सकलान्यपि ॥ येनार्थवन्ति तं किं नु विज्ञातारं प्रकाशयेत् । क्षुधां देहव्यथां त्यक्त्वा बालः क्रीडति वस्तुनि ॥ तथैव विद्वान् रमते न...
जो चीज़ खुद नहीं है, झूठी है, कोई कीमत नहीं उसकी, वो कैसे आत्मा को दिखला सकेगी? वेद, शास्त्र, पुराण, और सारी दुनिया इस आत्मा से ही मतलब रखती है। फिर उस आत्मा को कौन समझ सकता है? देखो, बच्चा भूखा होता है, दर्द में होता है, फिर भी खिलौने के साथ खेलता रहता है। वैसे ही ज्ञानी इंसान खुश रहता है। उसका कुछ अपना नहीं, मैं मैं नहीं, बस सुखी। वो लोगों के बीच घूमेगा, पर किसी चीज़ का शौक नहीं। अकेला रहो, मस्त रहो।
Ātman as self-luminous (svayaṃ-prakāśa); jīvanmukti; vairāgyaVerse 12
स्वात्मनैव सदा तुष्टः स्वयं सर्वात्मना स्थितः । निर्धनोऽपि सदा तुष्टोऽप्यसहायो महाबलः ॥
यह इंसान अपने आप में ही खुश रहता है। खुद को सब जगह पाता है। उसके पास पैसे नहीं, फिर भी शांत है। कोई सहारे की ज़रूरत नहीं, फिर भी बहुत ताकत है उसमें।
Ātma-tṛpti (self-sufficiency); sarvātma-bhāva; aparigrahaVerse 13
नित्यतृप्तोऽप्यभुञ्जानोऽप्यसमः समदर्शनः । कुर्वन्नपि न कुर्वाणश्चाभोक्ता फलभोग्यपि ॥
वो हमेशा खुश है, पर ऐसा लगता है जैसे कुछ ले रहा नहीं। कोई उसके बराबर नहीं, पर सबको एक जैसा देखता है। काम करता है, पर कर्ती उसकी नहीं। फल मिलता है, पर वो उसका मज़ा लेता है जैसे कोई और हो।
Akartṛtva/abhoktṛtva; samadarśana; jīvanmukta-lakṣaṇaVerse 14
शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः । अशरीरं सदा सन्तमिदं ब्रह्मविदं क्वचित् ॥ प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे । तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः ॥ ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्या ह्यज्...
शरीर में है, पर शरीर उसका नहीं। सीमा में है, पर सब जगह फैला है। शरीर से मुक्त, फिर भी लोग उसे देख के सोचते हैं कि शरीर है। अच्छा बुरा उसको छू नहीं सकता। सूरज ग्रहण में नहीं होता, पर अंधेरे में लोग बोलते हैं ग्रहण है। गलत समझ के लोग ऐसे बोलते हैं। वैसे ही ब्रह्मा को जानने वाला शरीर के बंधन से आज़ाद है। मूर्ख लोग उसका शरीर देख के समझते हैं वो शरीर में बंद है। बिल्कुल साँप की पुरानी खाल जैसा, वो आज़ाद खड़ा है।
Jīvanmukti; asaṅga (non-contact); adhyāsa (superimposition); prārabdha-body as appearanceVerse 15
शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः । अशरीरं सदा सन्तमिदं ब्रह्मविदं क्वचित् ॥ प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे । तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः ॥ ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्या ह्यज्...
शरीर में है, पर शरीर उसका नहीं। सीमा में है, पर सब जगह फैला है। शरीर से मुक्त, फिर भी लोग उसे देख के सोचते हैं कि शरीर है। अच्छा बुरा उसको छू नहीं सकता। सूरज ग्रहण में नहीं होता, पर अंधेरे में लोग बोलते हैं ग्रहण है। गलत समझ के लोग ऐसे बोलते हैं। वैसे ही ब्रह्मा को जानने वाला शरीर के बंधन से आज़ाद है। मूर्ख लोग उसका शरीर देख के समझते हैं वो शरीर में बंद है। बिल्कुल साँप की पुरानी खाल जैसा, वो आज़ाद खड़ा है।
Jīvanmukti; asaṅga; adhyāsa; prārabdha-bodyVerse 16
शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः । अशरीरं सदा सन्तमिदं ब्रह्मविदं क्वचित्॥ प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे । तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः॥ ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्या ह्यज्ञा...
देखो, यह जो ब्रह्मन को जानता है, वो शरीर में है लेकिन असल में शरीर से अलग है। थोड़ा सा दिखाई देता है, पर वो हर जगह है। वो हमेशा बिना शरीर के है, पर कुछ लोग उसे ऐसा देखते है जैसे शरीर में हो। अच्छा बुरा, प्रिय अप्रिय, कुछ भी उसको छूता नहीं। जैसे सूर्य ग्रहण में लोग कहते हैं सूर्य अंधेरे में फंस गया, पर असल में सूर्य तो वही है। लोग अंधेरे को देख के बोलते हैं ग्रहण है, असल चीज को जानते नहीं। वैसे ही ब्रह्मन जानने वाला बड़ा आदमी, वो शरीर के बंधन से आज़ाद है। पर मूर्ख लोग उसे देख के कहते हैं शरीर में है, क्योंकि वो सिर्फ बाहर का दिखावा देखते हैं। जैसे साँप की पुरानी खाल छोड़ के साँप निकल जाता है, वैसे ही वो आज़ाद रहता है, शरीर जैसे छोड़ दिया हो।
Jīvanmukti; Atman as aśarīra (bodiless) and asaṅga (untouched); avidyā and adhyāsa (superimposition)Verse 17
शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः । अशरीरं सदा सन्तमिदं ब्रह्मविदं क्वचित्॥ प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे । तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः॥ ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्या ह्यज्ञा...
यह बात समझो, ब्रह्मन को जानने वाला आदमी शरीर में रहता है पर असल में शरीर उसका नहीं है। वो थोड़ा सा सीमित दिखता है, पर वो हर जगह फैला है। हमेशा बिना शरीर के है वो, पर कुछ लोगों को लगता है शरीर में है। अच्छा बुरा, प्रिय अप्रिय, कोई चीज उसको अफ़ेक्ट नहीं करती। जैसे लोग ग्रहण में कहते हैं सूर्य अंधेरे में गया, पर सूर्य तो अपनी जगह है। लोग गलत समझते हैं, असल चीज को पहचान नहीं पाते। वैसे ही वो बड़ा ब्रह्मन जानने वाला, शरीर के बंधन से मुक्त है। पर मूर्ख लोग उसे देख के कहते हैं शरीर में बंधा है। वो सिर्फ बाहर का दिखावा देखते हैं, अंदर की बात नहीं समझते। जैसे साँप की पुरानी खाल पेड़ पर लटकी रहती है, साँप चला जाता है, वैसे ही वो आज़ाद है, शरीर पीछे रह गया।
Asaṅga-ātman; adhyāsa; jñānī’s freedom amid appearanceVerse 18
इतस्ततश्चाल्यमानो यत्किञ्चित्प्राणवायुना । स्रोतसा नीयते दारु यथा निम्नोन्नतस्थलम्॥
देखो, प्राण वायु जो है वो हमें इधर उधर धकेलता है। जैसे नदी में लकड़ी तैरती है, कभी नीचे, कभी ऊपर, वैसे ही हम भी बहुत सी चीज़ों के साथ बहते हैं। यह शरीर भी वैसे ही चलता है, जैसे नदी की धार लकड़ी को ले चलती है।
Prārabdha and the momentum of prāṇa; non-agency (akartṛtva) of the Self; body as instrumentVerse 19
दैवेन नीयते देहो यथा कालोपभुक्तिषु । लक्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत्केवलात्मना॥ शिव एव स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः । जीवन्नेव सदा मुक्तः कृतार्थो ब्रह्मवित्तमः॥
शरीर अपनी किस्मत के हिसाब से चलता है। टाइम पे जो एक्सपीरियंस मिलना है वो मिलता है। पर जो आदमी अपनी आत्मा में स्थिर हो जाता है, न किसी चीज़ के पीछे भागता है, न किसी से भागता है, वो खुद शिव जैसा है। ब्रह्मन को जानने वाला बड़ा आदमी, वो ज़िंदा है पर मुक्त है। उसका काम हो गया, वो खुश है, किसी चीज़ की कमी नहीं।
Jīvanmukti; prārabdha (kālopabhukti); tyāga of saṅkalpa; kevalātma-niṣṭhā; identification of realized Self with Śiva/BrahmanVerse 20
दैवेन नीयते देहो यथा कालोपभुक्तिषु । लक्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत्केवलात्मना॥ शिव एव स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः । जीवन्नेव सदा मुक्तः कृतार्थो ब्रह्मवित्तमः॥
यह शरीर किस्मत के साथ चलता है। टाइम पे जो होना है वो होता है, एक्सपीरियंस मिलते रहते हैं। पर जो इंसान सब छोड़ के सिर्फ अपनी आत्मा में रहता है, न किसी चीज़ को पकड़ता है, न किसी को छोड़ता है, वो सीधा शिव है। ब्रह्मन जानने वाला सबसे बड़ा आदमी वो है। ज़िंदा है पर आज़ाद है, कुछ भी उसको बाँध नहीं सकता। उसका सब काम हो गया, वो शांत है।
Kevalātma-niṣṭhā; jīvanmukti; prārabdha exhaustion; non-dual Śiva/Brahman identityVerse 21
उपाधिनाशाद् ब्रह्मैव सद् ब्रह्माप्येति निर्द्वयम् । शैलूषो वेषसद्भावाभावयोश्च यथा पुमान् ॥२१॥
जब उपाधि, यानी जो चीज़ें हमे लिमिट करती हैं, वो सब टूट जाती हैं, तब सच में बस ब्रह्मा बचता है। ब्रह्मा को जाननेवाला ब्रह्मा में मिल जाता है, कोई दूसरा नहीं। जैसे ऐक्टर का कपड़ा पहना या उतारना, वो ऐक्टर वही रहता है। कपड़े से उसका काम बदल जाता है, लेकिन वो खुद नहीं बदलता।
Upādhi-nāśa (negation of limiting adjuncts) and non-duality (advaita)Verse 22
तथैव ब्रह्मविच्छ्रेष्ठः सदा ब्रह्मैव नापरः । घटे नष्टे यथा व्योम व्योमैव भवति स्वयम् ॥२२॥
वैसे ही ब्रह्मा को सबसे ज़्यादा जाननेवाला हमेशा ब्रह्मा ही रहता है, और कुछ नहीं। जैसे अगर मिट्टी का बर्तन टूट जाए, तो उसके अंदर का हवा पूरा हवा में मिल जाता है। वो अपने आप हवा बन जाता है, कोई अलग चीज़ नहीं।
Jīva–Brahman identity; ghaṭākāśa–mahākāśa illustration; liberation as recognitionVerse 23
तथैवोपाधिविलये ब्रह्मैव ब्रह्मवित्स्वयम् । क्षीरं क्षीरे यथा क्षिप्तं तैलं तैले जलं जले ॥२३॥
जब उपाधियाँ डिसॉल्व हो जाती हैं, तब ब्रह्मा को जाननेवाला खुद ब्रह्मा बन जाता है। जैसे दूध में दूध डाल दो, तो वो एक हो जाता है। तेल में तेल डाल दो, वो भी एक हो जाता है। पानी में पानी डाल दो, वो भी एक हो जाता है। सब मिल कर एक बन जाता है।
Upādhi-vilaya; non-difference (abheda) of jñānī and BrahmanVerse 24
संयुक्तमेकतां याति तथात्मन्यात्मविन्मुनिः । एवं विदेहकैवल्यं सन्मात्रत्वमखण्डितम् ॥२४॥
जो चीज़ जुड़ जाती है, वो एक हो जाती है। वैसे ही मुनि, जो अपने आप को जानता है, वो अपने आप में एक हो जाता है। यह स्टेट है जब शरीर की बंधन से आज़ादी मिलती है। बस सच है, कोई टुकड़ा नहीं, पूरा एक।
Videha-kaivalya; akhaṇḍa-sat (undivided Being)Verse 25
ब्रह्मभावं प्रपद्यैष यतिर्नावर्तते पुनः । सदात्मकत्वविज्ञानदग्धा विद्यादिवर्ष्मणः ॥२५॥
जब संन्यासी ब्रह्मा की स्टेट को पा लेता है, तो वो वापस नहीं आता। ज्ञान की आग से वो सब जला देता है जो अज्ञान से बना था, शरीर, मन, सब। उसको यह समझ आ जाती है कि उसका असली स्वभाव सत है, और वो इस दुनिया में वापस नहीं आता।
Mokṣa as non-return (apunarāvṛtti); jñāna as destroyer of avidyāVerse 26
अमुष्य ब्रह्मभूतत्त्वाद् ब्रह्मणः कुत उद्भवः । मायाक्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न स्तः स्वात्मनि वस्तुतः ॥ यथा रज्जौ निष्क्रियायां सर्पाभासविनिर्गमौ । अवृतेः सदसत्त्वाभ्यां वक्तव्ये बन्धमोक्षणे ॥ २६–२७ ॥
आत्मा तोह ब्रह्मा से बना है, तोह ब्रह्मा का जन्म कहाँ से होगा? पास और छुटना, दोनों माया का काम है। असली में अपने आप में यह दोनों चीज़ें हैं ही नहीं।
Māyā/avidyā as the basis of bandha–mokṣa; ajāti (non-origination) of Brahman; rope–snake adhyāsaVerse 27
अमुष्य ब्रह्मभूतत्त्वाद् ब्रह्मणः कुत उद्भवः । मायाक्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न स्तः स्वात्मनि वस्तुतः ॥ यथा रज्जौ निष्क्रियायां सर्पाभासविनिर्गमौ । अवृतेः सदसत्त्वाभ्यां वक्तव्ये बन्धमोक्षणे ॥ २६–२७ ॥
जैसे रस्सी पड़ी है, कुछ नहीं करती। अंधेरा है तोह लगता है साँप है। रोशनी आई तोह साँप गायब, सिर्फ रस्सी है। पास और छुटना भी ऐसे ही है, सिर्फ सोच का खेल है।
Adhyāsa (superimposition) and nivṛtti (sublation) as the basis for speaking of bandha–mokṣaVerse 28
नावृत्तिर्ब्रह्मणः क्वाचिदन्याभावादनावृतम् । अस्तीति प्रत्ययो यश्च यश्च नास्तीति वस्तुनि ॥ बुद्धेरेव गुणावेतौ न तु नित्यस्य वस्तुनः । अतस्तौ मायया क्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न चात्मनि ॥ २८–२९ ॥
ब्रह्मा को कोई ढाक नहीं सकता। क्योंकि ब्रह्मा के अलावा कुछ है ही नहीं। यह है या नहीं है, दोनों बातें दिमाग में होती हैं। सच्ची चीज़ में नहीं।
Non-duality (absence of a second); epistemic status of existence/nonexistence judgments; māyā as cognitive constructionVerse 29
नावृत्तिर्ब्रह्मणः क्वाचिदन्याभावादनावृतम् । अस्तीति प्रत्ययो यश्च यश्च नास्तीति वस्तुनि ॥ बुद्धेरेव गुणावेतौ न तु नित्यस्य वस्तुनः । अतस्तौ मायया क्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न चात्मनि ॥ २८–२९ ॥
यह दोनों बातें, है या नहीं, सिर्फ दिमाग की बातें हैं। हमेशा वाली चीज़ में यह नहीं होती। इसलिए पास और छुटना दोनों माया ने बनाए हैं। आत्मा में यह कुछ भी नहीं।
Buddhi-dharma vs. Ātma-svarūpa; nitya-śuddha-buddha-mukta nature of SelfVerse 30
निष्कले निष्क्रिये शान्ते निरवद्ये निरञ्जने । अद्वितीये परे तत्त्वे व्योमवत् कल्पना कुतः ॥ ३० ॥
जिसमें कोई टुकड़ा नहीं, कोई काम नहीं, बिल्कुल शांत, कोई दोष नहीं, कोई दाग नहीं, ऐसी चीज़ में कोई दूसरी चीज़ का ख़याल कहाँ से आएगा? जैसे आसमान में कुछ भी नहीं होता, वैसे ही।
Nirvikalpatva of Brahman; nirguṇa/advitīya nature; ākāśa (space) analogyVerse 31
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥३१॥
कोई चीज़ रुकती नही, और ना ही शुरू होती है। कोई बंदा नही जो बांधा हो, और ना ही कोई जो साधना कर रहा हो। कोई मुक्ति माँगने वाला नही, और ना ही कोई जो मुक्त हो गया हो। यही सच है, यही असली बात है।
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