Upanishads - Atma
vedic_generalAtharva31 Verses

Atma

vedic_generalAtharva

आत्म उपनिषद् (अथर्ववेद-परंपरा में प्रचलित) अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से आत्मस्वरूप का संक्षिप्त, परन्तु गहन प्रतिपादन करती है। यह उपनिषद् बार-बार इस बात पर बल देती है कि आत्मा देह, इन्द्रियाँ, मन और अहंकार नहीं है, बल्कि वह स्वयंपरकाश चैतन्य है जो सब अनुभवों का साक्षी है। ‘नेति-नेति’ और विवेक के माध्यम से दृश्य-जगत तथा मनोवृत्तियों से तादात्म्य का निषेध कर आत्म-चेतना में प्रतिष्ठा कराई जाती है। ऐतिहासिक रूप से यह ग्रंथ उस उत्तर-वैदिक/वेदान्तिक वातावरण को प्रतिबिंबित करता है जहाँ यज्ञ-कर्म की बाह्य प्रवृत्ति का आन्तरिकीकरण होकर मोक्ष का साधन ‘ज्ञान’ माना गया। इसमें जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओं से परे तुरीय आत्मा का संकेत, गुणातीतता, तथा कर्तृत्व-भोक्तृत्व के त्याग की शिक्षा प्रमुख है। उपनिषद् का निष्कर्ष यह है कि मुक्ति कोई उत्पन्न होने वाली वस्तु नहीं, बल्कि अज्ञान से उत्पन्न अध्यास का निवृत्त होना है—अर्थात् ‘मैं ब्रह्म हूँ’ का प्रत्यक्ष बोध। इस प्रकार आत्म उपनिषद् साधक को संन्यास-भाव (आन्तरिक वैराग्य) और आत्म-विचार द्वारा अद्वैत अनुभूति की ओर ले जाती है।

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Key Teachings

- Ātman is self-luminous consciousness (cit)

the witness (sākṣin) of all states.

- Discrimination (viveka): the Self is distinct from body

senses

mind

and ego.

- Neti-neti (negation): whatever is seen/known is not the seer/knower.

- Non-duality (advaita): ātman is brahman; multiplicity is nāma-rūpa dependent on avidyā.

- Transcendence of the three states (waking

dream

deep sleep) and the three guṇas.

- Freedom from doership/enjoyership (kartṛtva/bhoktṛtva) as a mark of realization.

- Renunciation (sannyāsa) as inner disidentification

culminating in jñāna-mokṣa.

- Liberation is immediate knowledge (aparokṣa-jñāna)

not a produced result of action.

Verses of the Atma

31 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.

Verse 1

ॐ अथाङ्गिरास्त्रिविधः पुरुषोऽजायत—आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा चेति। त्वक्-चर्म-मांस-रोम-अङ्गुष्ठ-अङ्गुल्यः, पृष्ठ-वंश-नख-गुल्फ-उदर-नाभि-मेढ्र-कटि-ऊरु-कपोल-श्रोत्र-भ्रू-ललाट-बाहु-पार्श्व-शिरः-अक्षीणि भ...

ॐ। तब आङ्गिरस ने कहा—पुरुष त्रिविध है: आत्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा। त्वचा, चर्म, मांस, रोम, अँगूठा-उँगलियाँ, पीठ, रीढ़, नाखून, टखने, उदर, नाभि, जननेंद्रिय, कटि, जाँघें, गाल, कान, भौंहें, ललाट, भुजाएँ, पार्श्व, शिर और नेत्र—ये सब बनते हैं; जो जन्म लेता और मरता है, वही देहाभिमानी ‘आत्मा’ है। ‘अन्तरात्मा’ पृथ्वी-जल-तेज-वायु-आकाश के रूप में, इच्छा-द्वेष, सुख-दुःख, काम, मोह, विकल्प और आदिस्मृति-चिह्नों के रूप में; ऊँचे-नीचे स्वर, ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत ध्वनियों के रूप में; तथा हकलाहट, गर्जना, फूटना, हर्ष, नृत्य, गीत, वाद्य, प्रलय, विस्तार आदि के रूप में—श्रोता, घ्राता, रसयिता, नेता, कर्ता, विज्ञानात्मा पुरुष है; वह श्रवण-घ्राण, आकर्षण और कर्म के विशेष कार्य करता है तथा पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र आदि में प्रवृत्त होता है—यही अन्तरात्मा है। ‘परमात्मा’ अक्षर रूप से उपास्य है; प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, योग, अनुमान और आत्मचिन्तन से—वटबीज या श्यामाक-धान्य के समान सूक्ष्म, या केशाग्र के लक्ष भागों की कल्पना से—वह उपलब्ध होता है, फिर भी पकड़ा नहीं जाता। वह न जन्मता है न मरता; न सूखता, न भीगता, न जलता; न काँपता, न टूटता, न कटता; निर्गुण, साक्षी, शुद्ध, निरवयव, केवल, सूक्ष्म, निर्मम, निरञ्जन, निर्विकार; शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध से रहित, निर्विकल्प, निराकांक्ष, सर्वव्यापी; अचिन्त्य और अवर्णनीय; अशुद्ध को भी पवित्र करने वाला। निष्क्रिय होने से उसके लिए संसार नहीं है। ‘आत्मा’ नाम से वही शिव, शुद्ध, एक, सदा अद्वैत है; ब्रह्म-रूप से ब्रह्म ही केवल प्रतीत होता है॥१॥

Threefold analysis of self (deha-jīva/antarātmā/paramātmā), nirguṇa Brahman as sākṣin; negation of saṃsāra for the actionless Self

Verse 2

जगद्रूपतयाप्येतद्ब्रह्मैव प्रतिभासते । विद्याविद्यादिभेदेन भावाभावादिभेदतः॥२॥

जगत् के रूप में भी यह ब्रह्म ही प्रतीत होता है—विद्या और अविद्या के भेद से, तथा भाव-अभाव आदि के भेद से॥२॥

Māyā/avidyā-based appearance (pratibhāsa) of jagat upon Brahman

Verse 3

गुरुशिष्यादिभेदेन ब्रह्मैव प्रतिभासते । ब्रह्मैव केवलं शुद्धं विद्यते तत्त्वदर्शने॥३॥

गुरु-शिष्य आदि के भेद से भी ब्रह्म ही प्रतीत होता है। तत्त्व-दर्शन में केवल शुद्ध ब्रह्म ही विद्यमान है॥३॥

Non-duality sublating relational dualities; pedagogical duality (guru–śiṣya) as provisional

Verse 4

न च विद्या न चाविद्या न जगच्च न चापरम् । सत्यत्वेन जगद्भानं संसारस्य प्रवर्तकम्॥४॥

न विद्या है, न अविद्या; न जगत् है, न कुछ ‘अन्य’। जगत् का सत्य मानकर भासना ही संसार को चलाती है॥४॥

Saṃsāra driven by satya-buddhi (taking appearance as absolute); ultimate negation (paramārtha) of dual categories

Verse 5

असत्यत्वेन भानं तु संसारस्य निवर्तकम् । घटोऽयमिति विज्ञातुं नियमः कोऽन्वपेक्षते॥५॥ विना प्रमाणसुष्ठुत्वं यस्मिन् सति पदार्थधीः । अयमात्मा नित्यसिद्धः प्रमाणे सति भासते॥६॥

परन्तु (जगत् का) असत्य रूप से भासना संसार का निवर्तक है। ‘यह घट है’—ऐसा जानने के लिए कौन-सा नियम अपेक्षित होता है? जिस में प्रमाण का सम्यक् प्रवर्तन न हो, वहाँ वस्तु-बुद्धि नहीं होती; यह आत्मा नित्यसिद्ध है—प्रमाण उपस्थित होने पर वह प्रकाशित होता है॥५-६॥

Pramāṇa and self-revelation; cessation of saṃsāra through asatya-darśana of appearances; nitya-siddha ātman

Verse 6

असत्यत्वेन भानं तु संसारस्य निवर्तकम् । घटोऽयमिति विज्ञातुं नियमः कोऽन्वपेक्षते ॥ विना प्रमाणसुष्ठुत्वं यस्मिन् सति पदार्थधीः । अयमात्मा नित्यसिद्धः प्रमाणे सति भासते ॥५–६॥

संसार का असत्य रूप में जो भान होता है, वही वास्तव में संसार-निवृत्ति का कारण है। “यह घट है” ऐसा जानने में कौन-सा नियम अपेक्षित है? प्रमाण के सम्यक् प्रवर्तन के बिना भी जब वस्तु-बुद्धि होती है, तब यह आत्मा नित्यसिद्ध ही है; पर प्रमाण उपस्थित होने पर वह स्पष्ट रूप से प्रकट होता है।

Māyā/Asat-khyāti and Atman as nitya-siddha (ever-established); pramāṇa and aparokṣa-jñāna

Verse 7

न देशं नापि कालं वा न शुद्धिं वाप्यपेक्षते । देवदत्तोऽहमित्येतद्विज्ञानं निरपेक्षकम् ॥७॥

यह न देश पर निर्भर है, न काल पर, न ही शुद्धि (आचार-शौच) पर। “मैं देवदत्त हूँ” यह ज्ञान सर्वथा निरपेक्ष है।

Immediate self-cognition (aparokṣa-anubhava) and independence from ritual conditions; jñāna over karma

Verse 8

तद्वद्ब्रह्मविदोऽप्यस्य ब्रह्माहमिति वेदनम् । भानुनेव जगत्सर्वं भास्यते यस्य तेजसा ॥८॥

उसी प्रकार ब्रह्मविद् के लिए भी “मैं ब्रह्म हूँ” यह वेदन निरपेक्ष और तत्क्षण सिद्ध है। जैसे सूर्य से जगत् प्रकाशित होता है, वैसे ही जिसके तेज से समस्त विश्व प्रकाशित है।

Aham Brahmāsmi; consciousness as self-luminous (svayaṃ-prakāśa) and illuminator of all experience

Verse 9

अनात्मकम् असत् तुच्छं किं नु तस्यावभासकम् । वेदशास्त्रपुराणानि भूतानि सकलान्यपि ॥ येनार्थवन्ति तं किं नु विज्ञातारं प्रकाशयेत् । क्षुधां देहव्यथां त्यक्त्वा बालः क्रीडति वस्तुनि ॥ तथैव विद्वान् रमते न...

जो अनात्मा है, असत् और तुच्छ है—उसे प्रकाशित करने वाला क्या हो सकता है? जिसके द्वारा वेद, शास्त्र, पुराण और समस्त प्राणी अर्थवान् होते हैं, उस ज्ञाता को कौन प्रकाशित करेगा? जैसे बालक भूख और देह-व्यथा को भूलकर वस्तु में खेलता है, वैसे ही विद्वान् निर्मम, निरहं, सुखी होकर रमण करता है। कामों के बीच विचरता हुआ भी स्वभाव से निष्काम, वह मुनि एकाकी विचरता है।

Svayaṃ-prakāśa Atman (self-luminous knower); anātman as dependent appearance; jīvanmukti traits (nirmama, nirahaṃ, niṣkāma)

Verse 10

अनात्मकम् असत् तुच्छं किं नु तस्यावभासकम् । वेदशास्त्रपुराणानि भूतानि सकलान्यपि ॥ येनार्थवन्ति तं किं नु विज्ञातारं प्रकाशयेत् । क्षुधां देहव्यथां त्यक्त्वा बालः क्रीडति वस्तुनि ॥ तथैव विद्वान् रमते न...

जो अनात्मा है, असत् और तुच्छ है—उसे प्रकाशित करने वाला क्या हो सकता है? जिसके द्वारा वेद, शास्त्र, पुराण और समस्त प्राणी अर्थवान् होते हैं, उस ज्ञाता को कौन प्रकाशित करेगा? जैसे बालक भूख और देह-व्यथा को भूलकर वस्तु में खेलता है, वैसे ही विद्वान् निर्मम, निरहं, सुखी होकर रमण करता है। कामों के बीच विचरता हुआ भी स्वभाव से निष्काम, वह मुनि एकाकी विचरता है।

Svayaṃ-prakāśa Atman; anātman as dependent; jīvanmukti and niṣkāmatā

Verse 11

अनात्मकम् असत् तुच्छं किं नु तस्यावभासकम् । वेदशास्त्रपुराणानि भूतानि सकलान्यपि ॥ येनार्थवन्ति तं किं नु विज्ञातारं प्रकाशयेत् । क्षुधां देहव्यथां त्यक्त्वा बालः क्रीडति वस्तुनि ॥ तथैव विद्वान् रमते न...

जो अनात्मा है, असत् और तुच्छ है—वह उस आत्मा को क्या प्रकाशित करेगा? वेद, शास्त्र, पुराण और समस्त प्राणी उसी के कारण अर्थवान् होते हैं; उस आत्मा के ज्ञाता को फिर कौन प्रकट कर सकता है? जैसे बालक भूख और देह-पीड़ा को छोड़कर वस्तु में खेलता है, वैसे ही विद्वान् निर्मम, निरहं, सुखी होकर रमण करता है। वह निष्काम-स्वरूप होकर विषयों में विचरता हुआ एकाकी मुनि है।

Ātman as self-luminous (svayaṃ-prakāśa); jīvanmukti; vairāgya

Verse 12

स्वात्मनैव सदा तुष्टः स्वयं सर्वात्मना स्थितः । निर्धनोऽपि सदा तुष्टोऽप्यसहायो महाबलः ॥

वह अपने आत्मा से ही सदा तुष्ट रहता है और स्वयं को सर्वात्मा रूप में स्थित जानता है। धनहीन होकर भी वह नित्य संतुष्ट है; सहायक के बिना भी वह महान् बलवान् है।

Ātma-tṛpti (self-sufficiency); sarvātma-bhāva; aparigraha

Verse 13

नित्यतृप्तोऽप्यभुञ्जानोऽप्यसमः समदर्शनः । कुर्वन्नपि न कुर्वाणश्चाभोक्ता फलभोग्यपि ॥

वह नित्य तृप्त होकर भी मानो भोग नहीं करता; अनुपम होकर भी समदर्शी है। कर्म करता हुआ भी कर्ता नहीं; अभोक्ता होकर भी मानो फल का अनुभव करता है।

Akartṛtva/abhoktṛtva; samadarśana; jīvanmukta-lakṣaṇa

Verse 14

शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः । अशरीरं सदा सन्तमिदं ब्रह्मविदं क्वचित् ॥ प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे । तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः ॥ ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्या ह्यज्...

यह ब्रह्मविद् देहधारी होकर भी देह-रहित है; सीमित प्रतीत होकर भी सर्वव्यापी है—सदा अशरीर रहते हुए कहीं (मानो) शरीर में स्थित दिखता है। प्रिय-अप्रिय उसे स्पर्श नहीं करते, न ही शुभ-अशुभ। अंधकार के कारण लोग सूर्य को ‘ग्रहणग्रस्त’ कहते हैं, जबकि वह ग्रस्त नहीं होता; वस्तु-स्वरूप न जानने से भ्रान्ति में उसे ग्रस्त कहा जाता है। वैसे ही देहादि बंधनों से मुक्त परम ब्रह्मवित् को, शरीर का आभास देखकर, मूढ़ लोग देही-सा मानते हैं। जैसे सर्प की उतरी हुई केंचुली, वैसे ही यह मुक्तदेह (केवल अवशेष-आभास सहित) स्थित रहता है।

Jīvanmukti; asaṅga (non-contact); adhyāsa (superimposition); prārabdha-body as appearance

Verse 15

शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः । अशरीरं सदा सन्तमिदं ब्रह्मविदं क्वचित् ॥ प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे । तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः ॥ ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्या ह्यज्...

यह ब्रह्मविद् देहधारी होकर भी देह-रहित है; सीमित प्रतीत होकर भी सर्वव्यापी है—सदा अशरीर रहते हुए कहीं (मानो) शरीर में स्थित दिखता है। प्रिय-अप्रिय उसे स्पर्श नहीं करते, न ही शुभ-अशुभ। अंधकार के कारण लोग सूर्य को ‘ग्रहणग्रस्त’ कहते हैं, जबकि वह ग्रस्त नहीं होता; वस्तु-स्वरूप न जानने से भ्रान्ति में उसे ग्रस्त कहा जाता है। वैसे ही देहादि बंधनों से मुक्त परम ब्रह्मवित् को, शरीर का आभास देखकर, मूढ़ लोग देही-सा मानते हैं। जैसे सर्प की उतरी हुई केंचुली, वैसे ही यह मुक्तदेह (केवल अवशेष-आभास सहित) स्थित रहता है।

Jīvanmukti; asaṅga; adhyāsa; prārabdha-body

Verse 16

शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः । अशरीरं सदा सन्तमिदं ब्रह्मविदं क्वचित्॥ प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे । तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः॥ ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्या ह्यज्ञा...

यह (ब्रह्मविद्) देहधारी-सा दिखते हुए भी वास्तव में अशरीरी है; सीमित-सा प्रतीत होकर भी सर्वव्यापी है। जो सदा देहरहित है, उस ब्रह्म-ज्ञानी को कुछ लोग देहवान्-सा देखते हैं। प्रिय-अप्रिय उसे स्पर्श नहीं करते; वैसे ही शुभ-अशुभ भी। जैसे सूर्य वास्तव में ग्रस्त नहीं होता, पर अन्धकार से ग्रस्त-सा दिखने पर लोग उसे ‘ग्रहणग्रस्त’ कहते हैं—वस्तु-लक्षण न जानने से उत्पन्न भ्रान्ति के कारण। उसी प्रकार देहादि बन्धनों से मुक्त परम ब्रह्मविद् को मूढ़ जन शरीर-आभास देखकर देहवान्-सा मान लेते हैं। वह सर्प की केंचुली की भाँति देह को त्यागा-सा करके मुक्त रूप में स्थित रहता है।

Jīvanmukti; Atman as aśarīra (bodiless) and asaṅga (untouched); avidyā and adhyāsa (superimposition)

Verse 17

शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः । अशरीरं सदा सन्तमिदं ब्रह्मविदं क्वचित्॥ प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे । तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः॥ ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्या ह्यज्ञा...

यह (ब्रह्मविद्) देहधारी-सा दिखते हुए भी वास्तव में अशरीरी है; सीमित-सा प्रतीत होकर भी सर्वव्यापी है। जो सदा देहरहित है, उस ब्रह्म-ज्ञानी को कुछ लोग देहवान्-सा देखते हैं। प्रिय-अप्रिय उसे स्पर्श नहीं करते; वैसे ही शुभ-अशुभ भी। जैसे सूर्य वास्तव में ग्रस्त नहीं होता, पर अन्धकार से ग्रस्त-सा दिखने पर लोग उसे ‘ग्रहणग्रस्त’ कहते हैं—वस्तु-लक्षण न जानने से उत्पन्न भ्रान्ति के कारण। उसी प्रकार देहादि बन्धनों से मुक्त परम ब्रह्मविद् को मूढ़ जन शरीर-आभास देखकर देहवान्-सा मान लेते हैं। वह सर्प की केंचुली की भाँति देह को त्यागा-सा करके मुक्त रूप में स्थित रहता है।

Asaṅga-ātman; adhyāsa; jñānī’s freedom amid appearance

Verse 18

इतस्ततश्चाल्यमानो यत्किञ्चित्प्राणवायुना । स्रोतसा नीयते दारु यथा निम्नोन्नतस्थलम्॥

प्राणवायु से इधर-उधर हिलाया जाता हुआ यह जो कुछ (देह-मन का संघात) है, वह धारा के वेग से बहा ले जाया जाता है—जैसे लकड़ी का टुकड़ा जलधारा में नीची-ऊँची भूमि पर (बहता) चला जाता है।

Prārabdha and the momentum of prāṇa; non-agency (akartṛtva) of the Self; body as instrument

Verse 19

दैवेन नीयते देहो यथा कालोपभुक्तिषु । लक्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत्केवलात्मना॥ शिव एव स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः । जीवन्नेव सदा मुक्तः कृतार्थो ब्रह्मवित्तमः॥

देह दैव के द्वारा वैसे ही चलाया जाता है, जैसे कालक्रम में भोग्य अनुभवों की ओर। जो लक्ष्य और अलक्ष्य—दोनों की ओर की गति को त्यागकर केवल आत्मा में स्थित रहता है, वही साक्षात् स्वयं शिव है; वही सर्वोच्च ब्रह्मविद् है। वह जीते-जी सदा मुक्त, कृतार्थ—परम ब्रह्मवित् है।

Jīvanmukti; prārabdha (kālopabhukti); tyāga of saṅkalpa; kevalātma-niṣṭhā; identification of realized Self with Śiva/Brahman

Verse 20

दैवेन नीयते देहो यथा कालोपभुक्तिषु । लक्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत्केवलात्मना॥ शिव एव स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः । जीवन्नेव सदा मुक्तः कृतार्थो ब्रह्मवित्तमः॥

देह दैव के द्वारा काल में होने वाले भोग-अनुभवों के लिए बहाया/चलाया जाता है। जो लक्ष्य और अलक्ष्य की ओर की दौड़ छोड़कर केवल आत्मा-स्वरूप में स्थित रहता है, वही साक्षात् स्वयं शिव है—वही सर्वोच्च ब्रह्मविद् है। वह जीते-जी सदा मुक्त, कृतार्थ—परम ब्रह्मवित् है।

Kevalātma-niṣṭhā; jīvanmukti; prārabdha exhaustion; non-dual Śiva/Brahman identity

Verse 21

उपाधिनाशाद् ब्रह्मैव सद् ब्रह्माप्येति निर्द्वयम् । शैलूषो वेषसद्भावाभावयोश्च यथा पुमान् ॥२१॥

उपाधियों के नाश से सत्य ब्रह्म ही रह जाता है; ज्ञानी अद्वैत ब्रह्म को प्राप्त होता है। जैसे अभिनेता वेश हो या न हो, वही पुरुष रहता है।

Upādhi-nāśa (negation of limiting adjuncts) and non-duality (advaita)

Verse 22

तथैव ब्रह्मविच्छ्रेष्ठः सदा ब्रह्मैव नापरः । घटे नष्टे यथा व्योम व्योमैव भवति स्वयम् ॥२२॥

उसी प्रकार ब्रह्म का श्रेष्ठ ज्ञाता सदा ब्रह्म ही है, अन्य नहीं। जैसे घट नष्ट होने पर भीतर का आकाश स्वयं महाकाश ही हो जाता है।

Jīva–Brahman identity; ghaṭākāśa–mahākāśa illustration; liberation as recognition

Verse 23

तथैवोपाधिविलये ब्रह्मैव ब्रह्मवित्स्वयम् । क्षीरं क्षीरे यथा क्षिप्तं तैलं तैले जलं जले ॥२३॥

उपाधियों के विलय पर ब्रह्मवित् स्वयं ब्रह्म ही होता है। जैसे दूध में दूध, तेल में तेल, जल में जल मिलकर एक हो जाते हैं।

Upādhi-vilaya; non-difference (abheda) of jñānī and Brahman

Verse 24

संयुक्तमेकतां याति तथात्मन्यात्मविन्मुनिः । एवं विदेहकैवल्यं सन्मात्रत्वमखण्डितम् ॥२४॥

जो संयुक्त है वह एकता को प्राप्त होता है; वैसे ही आत्मा में आत्मवित् मुनि एकरूप होकर स्थित होता है। यही विदेह-कैवल्य, अखण्ड सन्मात्रत्व है।

Videha-kaivalya; akhaṇḍa-sat (undivided Being)

Verse 25

ब्रह्मभावं प्रपद्यैष यतिर्नावर्तते पुनः । सदात्मकत्वविज्ञानदग्धा विद्यादिवर्ष्मणः ॥२५॥

ब्रह्मभाव को प्राप्त होकर यह यति फिर नहीं लौटता। ‘मैं सत्तात्मक हूँ’ इस ज्ञान से अविद्या आदि से बने देह-आवरण दग्ध हो जाते हैं।

Mokṣa as non-return (apunarāvṛtti); jñāna as destroyer of avidyā

Verse 26

अमुष्य ब्रह्मभूतत्त्वाद् ब्रह्मणः कुत उद्भवः । मायाक्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न स्तः स्वात्मनि वस्तुतः ॥ यथा रज्जौ निष्क्रियायां सर्पाभासविनिर्गमौ । अवृतेः सदसत्त्वाभ्यां वक्तव्ये बन्धमोक्षणे ॥ २६–२७ ॥

इस आत्मा के ब्रह्मस्वरूप होने से ब्रह्म का उत्पन्न होना कैसे संभव है? माया-कल्पित बंधन और मोक्ष अपने ही आत्मस्वरूप में वास्तव में नहीं हैं। जैसे निष्क्रिय रस्सी में आवरण (अविद्या) के होने-न होने से सर्प-आभास का प्रकट होना और मिटना कहा जाता है, वैसे ही बंधन और मोक्ष भी केवल व्यवहार में कहे जाते हैं।

Māyā/avidyā as the basis of bandha–mokṣa; ajāti (non-origination) of Brahman; rope–snake adhyāsa

Verse 27

अमुष्य ब्रह्मभूतत्त्वाद् ब्रह्मणः कुत उद्भवः । मायाक्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न स्तः स्वात्मनि वस्तुतः ॥ यथा रज्जौ निष्क्रियायां सर्पाभासविनिर्गमौ । अवृतेः सदसत्त्वाभ्यां वक्तव्ये बन्धमोक्षणे ॥ २६–२७ ॥

जैसे निष्क्रिय रस्सी में आवरण (अविद्या) के होने पर सर्प-आभास प्रकट होता है और उसके न होने पर निवृत्त हो जाता है—ऐसा कहा जाता है; वैसे ही बंधन और मोक्ष भी केवल आवरण के होने-न होने के कारण, व्यवहार में ही कहे जाते हैं।

Adhyāsa (superimposition) and nivṛtti (sublation) as the basis for speaking of bandha–mokṣa

Verse 28

नावृत्तिर्ब्रह्मणः क्वाचिदन्याभावादनावृतम् । अस्तीति प्रत्ययो यश्च यश्च नास्तीति वस्तुनि ॥ बुद्धेरेव गुणावेतौ न तु नित्यस्य वस्तुनः । अतस्तौ मायया क्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न चात्मनि ॥ २८–२९ ॥

ब्रह्म पर कहीं भी आवरण नहीं है; क्योंकि ब्रह्म से भिन्न किसी अन्य का अभाव है, इसलिए वह सदा अनावृत है। किसी वस्तु के विषय में ‘यह है’ और ‘यह नहीं है’—ये दोनों प्रत्यय बुद्धि के ही गुण हैं, न कि नित्य सत्य के।

Non-duality (absence of a second); epistemic status of existence/nonexistence judgments; māyā as cognitive construction

Verse 29

नावृत्तिर्ब्रह्मणः क्वाचिदन्याभावादनावृतम् । अस्तीति प्रत्ययो यश्च यश्च नास्तीति वस्तुनि ॥ बुद्धेरेव गुणावेतौ न तु नित्यस्य वस्तुनः । अतस्तौ मायया क्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न चात्मनि ॥ २८–२९ ॥

‘है’ और ‘नहीं है’—ये दोनों प्रत्यय केवल बुद्धि के गुण हैं, न कि नित्य परमार्थ-वस्तु के। इसलिए बंधन और मोक्ष माया-कल्पित हैं और आत्मा में नहीं हैं।

Buddhi-dharma vs. Ātma-svarūpa; nitya-śuddha-buddha-mukta nature of Self

Verse 30

निष्कले निष्क्रिये शान्ते निरवद्ये निरञ्जने । अद्वितीये परे तत्त्वे व्योमवत् कल्पना कुतः ॥ ३० ॥

जो निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निर्दोष, निरञ्जन, अद्वितीय परम तत्त्व है—आकाश के समान—उसमें कल्पना (मानसिक रचना) कहाँ से आ सकती है?

Nirvikalpatva of Brahman; nirguṇa/advitīya nature; ākāśa (space) analogy

Verse 31

न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥३१॥

न तो निरोध है, न ही उत्पत्ति; न कोई बंधा है, न कोई साधक। न कोई मुमुक्षु है, न ही कोई मुक्त—यही परमार्थ (परम सत्य) है।

Ajātivāda (non-origination) and paramārtha-sattā (ultimate reality) in Advaita Vedānta

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