Purva Bhaga21 Adhyayas2182 Shlokas

Second Quarter

Dvitiya Pada

Adhyayas in Second Quarter

Adhyaya 42

Sṛṣṭi-pralaya-kathana: Mahābhūta-guṇāḥ, Vṛkṣa-indriya-vādaḥ, Prāṇa-vāyu-vyavasthā

नारद जी सनन्दन से सृष्टि का कारण, प्रलय का आधार, जीवों की उत्पत्ति, वर्ण-विभाग, शुद्धि-अशुद्धि, धर्म-अधर्म, आत्मस्वरूप और मृत्यु के बाद की गति पूछते हैं। सनन्दन एक प्राचीन इतिहासनुसार बताते हैं—भरद्वाज ऋषि भृगु से संसार-मोक्ष का रहस्य और पूज्य भी तथा अन्तर्यामी पूजक भी ऐसे नारायण के ज्ञान का प्रश्न करते हैं। भृगु अव्यक्त प्रभु से महत् की उत्पत्ति, तत्त्वों का विकास, तेजोमय कमल, उससे ब्रह्मा का प्राकट्य और विश्व-देह का वर्णन करते हैं। आगे पृथ्वी, समुद्र, अन्धकार, जल, अग्नि, रसातल आदि की सीमाएँ पूछी जाती हैं; प्रभु के अपरिमेय होने से वे ‘अनन्त’ कहलाते हैं और तत्त्वदृष्टि में भूत-भेद लीन हो जाते हैं। मनोज सृष्टि, जल और प्राण की प्रधानता तथा क्रम—जल से वायु, फिर अग्नि, फिर संघनन से पृथ्वी—समझाया गया है। पंचमहाभूत-पंचेन्द्रिय का विवेचन और वृक्षों में भी चेतना का प्रतिपादन (वे सुनते हैं, स्पर्श/ताप से प्रतिक्रिया करते हैं, सुख-दुःख अनुभवते हैं) आता है। अंत में धातुओं में तत्त्व-न्यास, पाँच वायु (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान), नाड़ियाँ, जठराग्नि और योगमार्ग से मस्तक-शिखर तक की गति बताई गई है।

113 verses

Adhyaya 43

Jīva–Ātman Inquiry; Kṣetrajña Doctrine; Karma-based Varṇa; Four Āśramas and Sannyāsa Discipline

भरद्वाज शंका करते हैं—यदि प्राण-वायु और देह की ऊष्मा ही जीवन का कारण हैं तो अलग ‘जीव’ क्यों माना जाए। सनन्दन के प्रसंग के बाद भृगु बताते हैं कि प्राण आदि देह-क्रियाएँ आत्मा नहीं हैं; स्थूल देह पंचभूतों में विलीन हो जाती है, पर देही कर्मानुसार जन्म-मरण में चलता रहता है। भरद्वाज जीव का लक्षण पूछते हैं तो भृगु अंतःस्थ ज्ञाता, इन्द्रिय-विषयों का अनुभवकर्ता, सुख-दुःख का भोक्ता ‘क्षेत्रज्ञ’—अंतर्यामी हरि—को बताते हैं और गुणों से जीव की बंधी अवस्थाएँ समझाते हैं। फिर वर्ण-व्यवस्था पर कहा जाता है कि वर्ण जन्म से नहीं, कर्म और आचरण से सिद्ध है; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के लक्षण नैतिकता और संयम पर आधारित हैं। लोभ-क्रोध का निग्रह, सत्य, करुणा, वैराग्य मोक्ष-धर्म के सहायक हैं। अंत में चार आश्रमों—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—के कर्तव्य, अतिथि-सत्कार, अहिंसा तथा संन्यासी के अंतः-अग्निहोत्र से ब्रह्मलोक-प्राप्ति तक का विधान बताया गया है।

127 verses

Adhyaya 44

Uttaraloka (Northern Higher World), Dharma–Adharma Viveka, and Adhyatma-Prashna (Prelude)

भारद्वाज ने इन्द्रियों से अगोचर ‘परलोक’ के विषय में पूछा। मृगु/भृगु ने हिमालय के पार उत्तर दिशा में एक पवित्र प्रदेश बताया—निर्भय, कामनापूरक, निष्पाप-निर्लोभी जनों से युक्त, जहाँ रोग नहीं सताते और मृत्यु केवल नियत समय पर आती है। वहाँ धर्म के चिह्न—पतिव्रता-निष्ठा, अहिंसा और धन में अनासक्ति—विशेष रूप से बताए गए। फिर इस लोक की विषमता और दुःख (परिश्रम, भय, भूख, मोह) को कर्म-नियम से जोड़ा गया—यह जगत कर्म-क्षेत्र है; कर्म फल बनकर यथायोग्य गति देता है। कपट, चोरी, निंदा, द्रोह, हिंसा, असत्य आदि तप को घटाते हैं; मिश्रित धर्म-अधर्म से चिंता बढ़ती है। प्रजापति, देव और ऋषि शुद्ध तप से ब्रह्मलोक पाते हैं; गुरु-सेवा में स्थित संयमी ब्रह्मचारी लोकों के मार्ग को समझते हैं। अंत में धर्म-अधर्म का विवेक ही ज्ञान कहा गया और भारद्वाज ने अध्यात्म का नया प्रश्न उठाया—सृष्टि-प्रलय से संबद्ध, परम कल्याण और सुख देने वाला।

23 verses

Adhyaya 45

Janaka’s Quest for Liberation; Pañcaśikha’s Sāṅkhya on Renunciation, Elements, Guṇas, and the Deathless State

सूत कहते हैं—सनन्दन के मोक्षधर्म को सुनकर नारद फिर अध्यात्म-उपदेश पूछते हैं। सनन्दन प्राचीन कथा सुनाते हैं—मिथिला के राजा जनक अनेक मतों और श्राद्धादि कर्म-चर्चाओं से घिरे रहते हुए भी आत्मतत्त्व के सत्य में अडिग थे। कपिल-परम्परा में आसुरि के द्वारा जुड़े, पूर्ण वैराग्य से युक्त सांख्य-ऋषि पञ्चशिख मिथिला आते हैं। जनक अनेक आचार्यों को वाद में परास्त करते हैं, पर पञ्चशिख के प्रति आकृष्ट होकर ‘परम श्रेय’ रूप सांख्य-मोक्ष सुनते हैं—वर्णाभिमान से ऊपर उठकर, कर्मासक्ति छोड़कर, अंततः सर्ववैराग्य तक। उपदेश में अस्थिर फल-लालसा वाले कर्मों की आलोचना, प्रमाण (प्रत्यक्ष, श्रुति, सिद्धान्त) का विवेचन, नास्तिक/भौतिक मतों का खण्डन तथा आत्मा और पुनर्जन्म की भ्रान्ति का निवारण है। जनक शंका करते हैं कि यदि मृत्यु पर चेतना नष्ट हो जाए तो ज्ञान का क्या लाभ; पञ्चशिख पंचमहाभूत, ज्ञान-त्रय, इन्द्रियाँ, बुद्धि और गुणों का विश्लेषण कर बताते हैं कि विहित कर्म का सार संन्यास है और वही लक्षणरहित, शोकहीन ‘अमृत अवस्था’ तक ले जाता है। अंत में जनक स्थिर हो जाते हैं और नगर-दाह के समय कहते हैं—“मेरा कुछ भी नहीं जलता।”

87 verses

Adhyaya 46

Threefold Suffering, Twofold Knowledge, and the Definition of Bhagavān (Vāsudeva); Prelude to Keśidhvaja–Janaka Yoga

सूत बताते हैं कि मैथिल आत्मोपदेश के बाद नारद प्रेमपूर्वक सनन्दन से पूछते हैं—त्रिविध दुःखों से कैसे बचा जाए? सनन्दन कहते हैं कि देहधारी जीवन गर्भ से वृद्धावस्था तक आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक क्लेशों से युक्त है; इसका परम उपचार भगवद्-प्राप्ति है—जो शुद्ध आनन्द और अचल शान्ति है। साधन दो हैं—ज्ञान और अभ्यास; ज्ञान भी दो प्रकार का है—आगम से प्राप्त शब्द-ब्रह्म और विवेक से प्राप्त पर-ब्रह्म, जिसे अथर्वण श्रुति की परा-अपरा विद्या की व्यवस्था सहारा देती है। अध्याय में ‘भगवान्’ शब्द का अर्थ अक्षर परम पुरुष बताया गया है; ‘भग’ के छह ऐश्वर्य—ऐश्वर्य, बल, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य—और ‘भगवान्’ का यथार्थ निर्देश वासुदेव पर ही ठहराया गया है। योग को क्लेश-नाशक एकमात्र उपाय कहा गया है। अंत में केशिध्वज–खाण्डिक्य (जनक) प्रसंग का आरम्भ होता है—राज्य-विवाद से प्रायश्चित्त, गुरु-दक्षिणा और ‘अहं-मम’ रूप अविद्या का उपदेश, और फिर योग व आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्ति।

103 verses

Adhyaya 47

योगस्वरूप-धारणा-समाधि-वर्णनम् (केशिध्वजोपदेशः)

सनन्दन बताते हैं कि निमि-वंश में योग-प्रामाण्य से प्रसिद्ध राजा केशिध्वज ने राजा खाण्डिक्य को योग का स्वरूप समझाया। योग मन का ब्रह्म में जान-बूझकर संयोग है; विषयों में आसक्ति बन्धन देती है और विषय-निवृत्ति मोक्ष देती है। क्रम से यम-नियम (पाँच-पाँच), फिर प्राणायाम (सबीज/अबीज) और प्रत्याहार, उसके बाद शुभ आलम्बन पर धारणा। आलम्बन ऊँचे-नीचे, साकार-निराकार होते हैं; भावना भी तीन—ब्रह्ममुखी, कर्ममुखी और मिश्र। निराकार का ग्रहण बिना योग-साधना कठिन है, इसलिए योगी हरि के साकार रूप और विश्वरूप का ध्यान करे जिसमें समस्त लोक-क्रम और प्राणी समाहित हैं। धारणा परिपक्व होकर समाधि बनती है और भेद-ज्ञान मिटने पर परमात्मा से अभेद होता है। खाण्डिक्य पुत्र को राज्य देकर विरक्त होकर विष्णु में लीन हुआ; केशिध्वज निष्काम कर्म से कर्म-दाह कर त्रितापों से मुक्त हुआ।

83 verses

Adhyaya 48

Bharata’s Attachment and the Palanquin Teaching on ‘I’ and ‘Mine’

नारद कहते हैं कि त्रिताप-निवारण के उपाय सुनकर भी मन चंचल है; दुष्टों की निन्दा और क्रूरता को कैसे सहें? सूत सनन्दन का प्रसंग लाते हैं। सनन्दन राजा भरत (ऋषभदेव के वंशज) की कथा सुनाते हैं—भरत धर्मपूर्वक राज्य कर अधोक्षज वासुदेव की भक्ति करते हैं और शालग्राम में संन्यास लेकर नित्य पूजा-व्रत-नियम से रहते हैं। भय से गर्भिणी हरिणी का गर्भपात होता है; भरत शावक को बचाकर उससे आसक्त हो जाते हैं और अंत में उसी का स्मरण होने से मृग-योनि में जन्म लेते हैं। पूर्वजन्म-स्मृति से शालग्राम लौटकर प्रायश्चित्त करते हैं और ज्ञानयुक्त ब्राह्मण बनते हैं। वे जड़-सा आचरण कर लोक-अपमान सहते हैं और सौवीर-राजा द्वारा पालकी ढोने में लगाए जाते हैं। राजा के ‘विषम ढोने’ के आरोप पर वे कर्तृत्व और देहाभिमान पर तीखा उपदेश देते हैं—भार देह के अंगों और पृथ्वी पर है; बल-दुर्बलता गौण है; सब कर्मानुसार गुण-प्रवाह में चलते हैं; आत्मा शुद्ध, अविकार, प्रकृति से परे है; ‘राजा’ और ‘वाहक’ जैसे नाम केवल कल्पना हैं; इसलिए ‘मैं’ और ‘मेरा’ का अभिमान तत्त्व-विचार से मिट जाता है।

95 verses

Adhyaya 49

Śreyas and Paramārtha: The Ribhu–Nidāgha Teaching on Non-Dual Self (Advaita)

सनन्दन बताते हैं कि विवेक-उपदेश सुनकर राजा फिर ‘परम श्रेय’ पूछता है। उसे समझाया जाता है कि कर्तापन कर्म से प्रेरित गुणों का है, आत्मा का नहीं। ब्राह्मण-गुरु श्रेय का अर्थ बदलकर कहते हैं—धन, पुत्र, राज्य आदि गौण हैं; परमात्मा से एकात्मता और स्थिर आत्म-ध्यान ही सच्चा श्रेय है। मिट्टी-घड़े के दृष्टान्त से बताया कि ईंधन, घी, कुश आदि नश्वर पदार्थों पर टिके यज्ञ-कर्म नश्वर फल देते हैं; परमार्थ अक्षय है, बनाया हुआ फल नहीं—आत्मज्ञान ही साधन और साध्य है। फिर रिभु–निदाघ प्रसंग आता है: अतिथि-सत्कार और भोजन के प्रश्न से भूख-प्यास से तादात्म्य का निषेध होता है; निवास-यात्रा के प्रश्न सर्वव्यापी पुरुष पर लागू नहीं। दूसरी भेंट में राजा–हाथी की ऊँच-नीच से ‘ऊपर-नीचे’ का भेद कल्पित सिद्ध होता है। निदाघ रिभु को गुरु मानता है; निष्कर्ष—जगत अखण्ड है, वासुदेव का ही स्वभाव। भेद-बुद्धि छोड़ राजा जाग्रत स्मृति और अद्वैत-दृष्टि से जीवन्मुक्ति पाता है।

94 verses

Adhyaya 50

Anūcāna (True Learning), the Vedāṅgas, and Śikṣā: Svara, Sāmavedic Chant, and Gandharva Theory

सूत बताते हैं कि सनन्दन का उपदेश सुनकर भी नारद जी का असंतोष बना रहा। वे शुकदेव के बाल-सदृश अद्भुत वैराग्य और ज्ञान की सिद्धि के विषय में पूछते हैं, जो मानो बड़ों की सेवा के बिना ही प्राप्त हुई। सनन्दन ‘महत्त्व’ को आयु या सामाजिक चिह्न नहीं, बल्कि सच्ची विद्या (अनूचान) बताते हैं और समझाते हैं कि वास्तविक पाण्डित्य गुरु के सान्निध्य में नियमपूर्वक अध्ययन से होता है, असंख्य ग्रंथ पढ़ लेने से नहीं। वे छह वेदाङ्ग और चार वेदों का उल्लेख करते हैं। फिर अध्याय ‘शिक्षा’ पर केंद्रित होकर स्वर (उच्चारण-स्वर) की प्रधानता, गान-प्रकार, स्वर-परिवर्तन, तथा गलत स्वर/वर्ण-विभाग से होने वाले अनर्थ को इन्द्र-शत्रु प्रसंग से दिखाता है। आगे सामवेद-गान और गान्धर्व-संगीत के स्वर, ग्राम, मूर्च्छना, राग, कंठ-गुण-दोष, रुचि, स्वरों के रंग-संबंध, तथा सामस्वरों और संगीत-संज्ञाओं की संगति बताकर अंत में स्वरों का पशु-पक्षियों की ध्वनियों से प्राकृतिक साम्य निरूपित करता है।

68 verses

Adhyaya 51

Kalpa-Lakṣaṇa and Gṛhya-Kalpa: Classifications, Purifications, Implements, and Spatial Rite-Design

नारद ऋषियों को कल्प को वेद का “विधि-ग्रंथ” बताकर उसके भेद समझाते हैं—नक्षत्र-कल्प (नक्षत्र देवता), आङ्गिरस-कल्प (षट्कर्म/अभिचार), और शान्ति-कल्प (दैवी, भौम व आकाशीय अपशकुनों का शमन)। फिर गृह्य-कल्प में गृह-यज्ञ की विधि आती है: ओंकार व शुभ शब्दों की प्रधानता, कुश-दर्भ का सही संग्रह-प्रयोग, अहिंसा-रक्षा (परिसमूहण), गोबर-लेपन व जल-छिड़काव से शुद्धि, अग्नि का लाना व प्रतिष्ठा, स्थान-विन्यास (दक्षिण दिशा में संकट, ब्रह्मा-स्थापन, पात्र उत्तर/पश्चिम में, यजमान पूर्वमुख), कर्म हेतु पात्र-चयन (अपनी शाखा के दो ब्रह्मचारी; पुरोहित उपलब्धतानुसार), तथा अँगुल-मान से अंगूठी, स्रुव, कटोरी, दूरी और “पूर्ण पात्र” के मानक। अंत में उपकरणों का दैवी अर्थ (स्रुव में छह देवता) और आहुतियों के देह-संबंध बताकर कर्म-विधान को ब्रह्माण्डीय अर्थ से जोड़ा गया है।

47 verses

Adhyaya 52

Vyākaraṇa-saṅgraha: Pada–Vibhakti–Kāraka–Lakāra–Samāsa

सनन्दन नारद को वेद-व्याख्या के ‘मुख’ रूप व्याकरण का संक्षिप्त पाठ्यक्रम सुनाते हैं। वे सुप्/तिङ्-प्रत्ययान्त को ‘पद’ और ‘प्रातिपदिक’ की परिभाषा बताते हैं तथा सात विभक्तियों का कारकों से संबंध (कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध/षष्ठी, अधिकरण) समझाते हैं, साथ ही रक्षण आदि प्रसंगों में अपादान के विशेष प्रयोग और अव्ययों से द्वितीया/पञ्चमी के नियमन जैसे अपवाद भी बताते हैं। ‘उप’ आदि उपसर्गों के अर्थ और नमः, स्वस्ति, स्वाहा आदि के साथ चतुर्थी-प्रयोग का निर्देश आता है। फिर क्रिया-प्रणाली में पुरुष, परस्मैपद/आत्मनेपद, दस लकारों का उपयोग (मा स्म + लुङ्, आशीर्वाद में लोट्/लिङ्, परोक्ष भूत में लिट्, भविष्य में लृट्/लृङ्), गण, तथा णिज्, सन्नन्त, यङ्-लुक आदि धातु-प्रक्रियाएँ और कर्तृत्व व सकर्मक-अकर्मक भाव का विवेचन होता है। अंत में समास (अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, बहुव्रीहि), तद्धित-प्रत्यय, शब्द-सूचियाँ दी जाती हैं और संयुक्त दिव्य नामों (राम–कृष्ण) में एक ही ब्रह्म की एक ही भक्ति-पूजा का निष्कर्ष बताया जाता है।

96 verses

Adhyaya 53

Nirukta, Phonetic Variants, and Vedic Dhātu–Svara Taxonomy

इस अध्याय में सनन्दन जी नारद को निरुक्त-वेदाङ्ग का उपदेश देते हैं, जो धातुओं और शब्द-निर्माण पर आधारित है। वे बताते हैं कि अतिरिक्त अक्षर, वर्ण-विपर्यय, विकृति और लोप जैसी प्रतीत होने वाली त्रुटियाँ मान्य व्याकरण-क्रियाओं से समझी जाती हैं; हंस/सिंह जैसे उदाहरण भी आते हैं। संयोग, प्लुत स्वर, नासिक्य/अनुस्वार और छन्द-प्रमाण के साथ पाठ-परम्परा का वर्णन है; बाहुलक (प्रचलित प्रयोग) तथा वाजसनेयी आदि शाखाओं के विशेष रूप भी प्रमाणित किए गए हैं। आगे परस्मैपद-आत्मनेपद का विभाग, गण-निर्देश, उदात्त-अनुदात्त-स्वरित के नियम, धातुओं की सूचियाँ और इत्, किट्, णि, टोङ आदि चिह्नों का तकनीकी विवेचन है। अंत में कहा है कि प्रकृति-प्रत्यय, आदेश, लोप, आगम और शुद्ध पाठ के आधार पर ही शब्द-रूप और कोश-निर्णय होता है, यद्यपि विषय व्यवहार में अनन्त-सा है।

88 verses

Adhyaya 54

Jyotiṣa-śāstra Saṅgraha: Threefold Division, Gaṇita Methods, Muhūrta, and Planetary Reckoning

सनन्दन नारद से कहते हैं कि ज्योतिष ब्रह्मा-प्रदत्त विद्या है, जो धर्म में सफलता दिलाती है। वे इसके तीन विभाग—गणित, जातक, संहिता—बताकर गणित में क्रियाएँ, ग्रहों की यथार्थ स्थिति, ग्रहण, मूल-भिन्न-त्रैराशिक, क्षेत्र-वृत्त-रेखागणित, ज्या-त्रिज्या, तथा शङ्कु से दिग्निर्णय का वर्णन करते हैं। युग-मन्वंतर, मास-वार, अधिकमास, तिथि-क्षय/आयाम और योग-गणना द्वारा पंचांग-निर्माण समझाते हैं। संहिता-मुहूर्त में शकुन, गर्भाधान से उपनयन तक संस्कार, यात्रा/गृह-निमित्त, संक्रांति, गोचर, चंद्रबल और राहु आदि चुनाव-तत्त्व आते हैं। अंत में ज्या, क्रांति, पात, युति-काल और ग्रहण-माप की विधियाँ कहकर आगे राशि-संज्ञा और विस्तृत जातक की ओर संकेत करते हैं।

187 verses

Adhyaya 55

Jyotiṣa-saṅgraha: Varga-vibhāga, Bala-nirṇaya, Garbha-phala, Āyuḥ-gaṇanā

इस अध्याय में सनन्दन मुनि नारद को ज्योतिष का सघन संकलन सुनाते हैं। वे काल के ‘अंगों’ का विश्वात्मक मानचित्र देकर राशि-स्वामित्व और होरा, द्रेष्काण, पंचांश, त्रिंशांश, नवांश, द्वादशांश आदि विभागों का वर्णन करते हुए षड्वर्ग को फल-विचार का आधार बताते हैं। राशियों का दिन/रात्रि उदय, लिंग, चर-स्थिर-उभय, दिशा-स्थिति तथा भावों का केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम; त्रिक और रिह्फ आदि वर्गीकरण करके स्थान से बल, पराधीनता या हानि का संकेत समझाते हैं। ग्रहों के रंग, स्वभाव, वर्णाधिपत्य और राजसभा के पद (राजा/मंत्री/सेनापति) तथा स्थान, दिग्, चेष्टा, काल-बल का निरूपण है। आगे गर्भाधान व गर्भ-लक्षण, संतान-लिंग, जुड़वाँ, भ्रूण-दोष और माता के संकट-योग बताए गए हैं। अंत में आयु-निर्णय में योगज, पैण्ड और निसर्ग भेद सहित वर्ष-मास-दिन की गणना-प्रक्रिया और आयु-भंग पर शान्ति-संस्कार जैसे धर्ममय उपायों का निर्देश मिलता है।

366 verses

Adhyaya 56

Graha–Ketu–Utpāta Lakṣaṇas: Solar/Lunar Omens, Comets, Eclipses, and Calendar Rules

इस अध्याय में सनन्दन ऋषि/राजा को सूर्य, चन्द्र, ग्रह और केतु के द्वारा काल-ज्ञान तथा शुभाशुभ संकेतों का विवेचन कराते हैं। चैत्र से संक्रान्ति-क्रम, चैत्र-शुक्ल-प्रतिपदा के वार की प्रधानता और ग्रहों की शुभता-क्रमबद्धता बताई गई है। सूर्य के लक्षणों में बिम्ब-रूप, धूम-राशि, परिधि/हेलो, ऋतु के अनुसार असामान्य वर्ण, और उनसे युद्ध, राजा की मृत्यु, अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी आदि फल जोड़े गए हैं। चन्द्र के लक्षणों में ‘शृंग’ की स्थिति, उल्टा उदय, दक्षिणगामी नक्षत्रों के दोष, तथा ‘घटोष्ण’ आदि चिह्नों का राशि-शस्त्रों से संबंध बताया गया है। मंगल-बुध के वक्री/उदय के नक्षत्रानुसार वर्षा, फसल, व्यवसाय और जन-सुरक्षा पर प्रभाव, तथा गुरु का वक्री रंग और दिन में दिखना संकट-सूचक कहा गया है। शुक्र की वीथिकाओं में गति व संयोग-नियम, और शनि का कुछ नक्षत्रों में गोचर कल्याणकारी बताया गया है। आगे केतु के प्रकार—पुच्छ-लम्बाई, रंग, आकार, दिशा—और उनके फल व्यवस्थित हैं। अंत में नौ काल-मान, यात्रा-विवाह-व्रतादि के चयन-नियम, 60 वर्षीय बृहस्पति-चक्र व युग-स्वामी, उत्तरायण/दक्षिणायन की कर्म-योग्यता, मास-नाम, तिथि-वर्ग (नन्दा/भद्रा/जया/रिक्ता/पूर्णा), द्विपुष्करादि दोष-शान्ति तथा संस्कार और कृषि हेतु नक्षत्र-वर्गीकरण दिया गया है।

204 verses

Adhyaya 57

Chandas: Varṇa-gaṇas, Guru-Laghu, Vṛtta-bheda, and Prastāra Procedures

इस अध्याय में सनन्दन नारद को छन्दःशास्त्र का उपदेश देते हैं। वे छन्दों को वैदिक और लौकिक बताकर मात्रा-आधारित तथा वर्ण-आधारित विश्लेषण का भेद समझाते हैं। म, य, र, स, त, ज, भ, न—गण-चिह्न, तथा गुरु-लघु के नियम बताए जाते हैं; संयुक्त व्यंजन, विसर्ग और अनुस्वार से अक्षर-गुरुत्व कैसे बदलता है, यह भी स्पष्ट होता है। पाद और यति का निरूपण कर पाद-समता के अनुसार सम, अर्धसम और विषम वृत्तों का भेद कहा गया है। 1 से 26 अक्षरों तक पाद-गणना, दण्डक के प्रकार, तथा गायत्री से अतिजगती तक प्रमुख वैदिक छन्दों का उल्लेख है। अंत में प्रस्तार, नष्टाङ्क-उद्धार, उद्दिष्ट-विधि और संख्या/अध्वन की गणना बताकर इन्हें वैदिक छन्दों के लक्षण कहा गया है और आगे नाम-भेदों का वचन दिया गया है।

21 verses

Adhyaya 58

Śuka’s Origin, Mastery of Śāstra, and Testing at Janaka’s Court

नारद ने सनन्दन से शुक के जन्म का रहस्य पूछा। सनन्दन ने बताया कि मेरु पर्वत के कर्णिकार वन में व्यास ने कठोर तप किया, जहाँ महादेव दिव्य गणों सहित प्रकट हुए और शुद्धि व ब्रह्मतेज का वर दिया। अरणियों से अग्नि मथते समय घृताची अप्सरा तोते के रूप में क्षणभर व्यास के चित्त को विचलित करती है, और अरणि-संबंध से तेजस्वी शुक का जन्म होता है—जो जन्म से ही वेदज्ञान से युक्त था। देवताओं ने उत्सव किया; शुक को दीक्षा और दिव्य दर्शन मिला। उसने वेद, वेदाङ्ग, इतिहास, योग और सांख्य का अध्ययन किया। मोक्ष के अंतिम निश्चय हेतु व्यास ने उसे राजा जनक के पास भेजा और मार्ग में शक्ति-प्रदर्शन व अहंकार से बचने की शिक्षा दी। मिथिला में राजभोग और गणिकाओं द्वारा परीक्षा होने पर भी शुक ध्यानस्थ रहा, संध्या करता रहा और समत्व बनाए रखा।

72 verses

Adhyaya 59

Janaka Instructs Śuka: Āśrama-Sequence, Guru-Dependence, and Marks of Liberation

सनन्दन एक राजोपदेश का प्रसंग कहते हैं। राजा जनक शुकदेव का अर्घ्य‑पाद्य, आसन‑दान, गो‑प्रदान और मंत्र‑पूजा से आदर कर उद्देश्य पूछते हैं। शुक व्यास की आज्ञा से आए हैं—प्रवृत्ति‑निवृत्ति, ब्राह्मण‑धर्म, मोक्ष का स्वरूप और क्या मुक्ति ज्ञान/तप से होती है, यह जानने। जनक क्रम से बताते हैं: उपनयन के बाद ब्रह्मचर्य में वेदाध्ययन, तप और नियम; गुरु‑अनुज्ञा से समावर्तन कर गृहस्थाश्रम में यज्ञाग्नि‑धारण; फिर वानप्रस्थ; अंत में अग्नियों को भीतर समेटकर ब्रह्माश्रम/संन्यास में आसक्ति‑द्वंद्व से रहित स्थित होना। गुरु‑संग की अनिवार्यता पर जनक कहते हैं—ज्ञान नौका है, गुरु पार कराने वाले; सिद्धि पर साधन छोड़ दिए जाते हैं। बहुजन्म‑पुण्य से शीघ्र मोक्ष की संभावना और ययाति के मोक्ष‑श्लोक—अंतरज्योति, निर्भयता, अहिंसा, समता, इंद्रिय‑संयम, शुद्ध बुद्धि—आते हैं। जनक शुक की दृढ़ वैराग्य‑स्थिति पहचानते हैं; शुक आत्मदर्शन में स्थिर होकर उत्तर दिशा में व्यास के पास लौटते हैं, संवाद सुनाते हैं, और वैदिक शिष्य परंपरा व कर्मसेवा निभाते रहते हैं।

55 verses

Adhyaya 60

Anadhyaya and the Winds: From Vedic Recitation Protocol to Sanatkumara’s Moksha-Upadesha

सनन्दन कहते हैं—व्यास शुक के साथ ध्यान में बैठे; एक अशरीरी वाणी ने ब्रह्म-शब्द की पुनर्स्थापना हेतु वेद-स्वाध्याय का आग्रह किया। दीर्घ पाठ के बीच प्रचण्ड वायु उठी, तब व्यास ने अनध्याय (पाठ-स्थगन) घोषित किया। शुक के प्रश्न पर व्यास देव-पथ और पितृ-पथ की प्रवृत्तियाँ तथा विविध वायु/प्राणों के लोककार्य (मेघ बनना, वर्षा का वहन, ग्रह-नक्षत्रों का उदय, प्राण-शासन, और परिवह द्वारा मृत्यु-प्रेरणा) बताते हैं। वे समझाते हैं कि तीव्र वायु में वेद-पाठ वर्जित है, और दिव्य गंगा को जाकर शुक को स्वाध्याय में लगाते हैं। शुक स्वाध्याय करता रहता है; तभी सनत्कुमार एकान्त में आकर मोक्ष-धर्म का उपदेश देते हैं—ज्ञान सर्वोच्च है, आसक्ति से वैराग्य श्रेष्ठ, अहिंसा-दया-क्षमा, काम-क्रोध का संयम, और बन्धन के दृष्टान्त (रेशम-कीट का कोष, विवेक की नौका)। अंत में कर्म-संसार का विवेचन और संयम व निवृत्ति से मुक्ति बताई गई है।

94 verses

Adhyaya 61

Śokanivāraṇa: Non-brooding, Impermanence, Contentment, and Śuka’s Renunciation

सनत्कुमार शोक-निवारण का व्यावहारिक मोक्षधर्म बताते हैं—दैनिक सुख-दुःख मोहग्रस्त को पकड़ लेते हैं, पर ज्ञानी अचल रहता है। शोक का मूल आसक्ति है: बीती वस्तुओं का बार-बार चिंतन, जहाँ लगाव हो वहाँ दोष-खोज, और हानि व मृत्यु पर पुनः विलाप। उपाय है जान-बूझकर अनचिंतन, मानसिक शोक (ज्ञान से हटाने योग्य) और शारीरिक रोग (औषधि से उपचार्य) का भेद, तथा जीवन, यौवन, धन, स्वास्थ्य, संग-साथ की अनित्यता का स्पष्ट मनन। फिर कर्म-सत्य कहा गया—फल असमान हैं, प्रयत्न की सीमा है, और काल, रोग, मृत्यु सबको बहा ले जाते हैं; इसलिए सन्तोष ही सच्चा धन है। इन्द्रिय-संयम, व्यसन-त्याग, स्तुति-निन्दा में समता, और स्वभावानुसार स्थिर पुरुषार्थ का विधान है। अंत में सनत्कुमार प्रस्थान करते हैं; शुक समझकर व्यास के पास जाते हैं और कैलास को निकल पड़ते हैं; व्यास का शोक उपदेश को उजागर करता है और शुक की स्वतंत्रता मुक्ति का आदर्श बनती है।

79 verses

Adhyaya 62

Śuka’s Yoga-ascent, the Echo of ‘Bhoḥ’, and the Vaikuṇṭha Vision

सूत बताते हैं कि तृप्त होकर भी जिज्ञासु नारद शुक-सदृश ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण ऋषि से पूछते हैं कि मोक्ष-परायण मुक्त जन कहाँ निवास करते हैं। ऋषि शुकदेव की मुक्ति का आदर्श प्रसंग कहते हैं—शास्त्र-विधि से स्थिर होकर शुक क्रम-योग द्वारा अंतःचेतना का क्रमशः न्यास करते हैं, परम निश्चल आसन में बैठकर आसक्ति त्यागते हैं और योगबल से ऊपर उठते हैं। देव-गण उनका सम्मान करते हैं; व्यास ‘शुक’ पुकारते हैं, और शुक सर्वव्यापी भाव से केवल ‘भोः’ अक्षर से उत्तर देते हैं, जिससे पर्वत-गुहाओं में दीर्घ प्रतिध्वनि होती है। वे रज-तम को त्यागकर, फिर सत्त्व को भी पार कर निर्गुण अवस्था पाते हैं; श्वेतद्वीप और वैकुण्ठ पहुँचकर चतुर्भुज नारायण के दर्शन करते हैं और अवतार-व्यूह-समन्वित स्तुति करते हैं। भगवान उनकी सिद्धि की पुष्टि करते, दुर्लभ भक्ति की प्रशंसा करते और व्यास को सांत्वना देने हेतु लौटने का आदेश देते हैं, साथ ही नरा-नारायण के उपदेश को व्यास के भागवत-लेखन से जोड़ते हैं। अंत में कहा गया है कि इस प्रसंग का श्रवण-कीर्तन हरि-भक्ति बढ़ाता है।

80 verses