Adhyaya 43
Purva BhagaSecond QuarterAdhyaya 43127 Verses

Jīva–Ātman Inquiry; Kṣetrajña Doctrine; Karma-based Varṇa; Four Āśramas and Sannyāsa Discipline

भरद्वाज शंका करते हैं—यदि प्राण-वायु और देह की ऊष्मा ही जीवन का कारण हैं तो अलग ‘जीव’ क्यों माना जाए। सनन्दन के प्रसंग के बाद भृगु बताते हैं कि प्राण आदि देह-क्रियाएँ आत्मा नहीं हैं; स्थूल देह पंचभूतों में विलीन हो जाती है, पर देही कर्मानुसार जन्म-मरण में चलता रहता है। भरद्वाज जीव का लक्षण पूछते हैं तो भृगु अंतःस्थ ज्ञाता, इन्द्रिय-विषयों का अनुभवकर्ता, सुख-दुःख का भोक्ता ‘क्षेत्रज्ञ’—अंतर्यामी हरि—को बताते हैं और गुणों से जीव की बंधी अवस्थाएँ समझाते हैं। फिर वर्ण-व्यवस्था पर कहा जाता है कि वर्ण जन्म से नहीं, कर्म और आचरण से सिद्ध है; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के लक्षण नैतिकता और संयम पर आधारित हैं। लोभ-क्रोध का निग्रह, सत्य, करुणा, वैराग्य मोक्ष-धर्म के सहायक हैं। अंत में चार आश्रमों—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—के कर्तव्य, अतिथि-सत्कार, अहिंसा तथा संन्यासी के अंतः-अग्निहोत्र से ब्रह्मलोक-प्राप्ति तक का विधान बताया गया है।

Shlokas

Verse 1

भरद्वाज उवाच । यदि प्राणपतिर्वायुर्वायुरेव विचेष्टते । श्वसित्याभाषते चैव ततो जीवो निरर्थकः ॥ १ ॥

भरद्वाज बोले—यदि प्राणों का स्वामी वायु है और वही सब क्रिया करता है—श्वास भी लेता है और वाणी भी बोलता है—तो फिर जीव का स्वतंत्र तत्त्व निरर्थक ठहरेगा।

Verse 2

य ऊष्मभाव आग्नेयो वह्निनैवोपलभ्यते । अग्निर्जरयते चैतत्तदा जीवो निरर्थकः ॥ २ ॥

जो ऊष्मा-भाव अग्निमय है, वह अग्नि से ही जाना जाता है; और वही अग्नि इस देह को जरा (क्षय) में ले जाती है। तब यदि जीव केवल ऊष्मा-रूप माना जाए, तो वह निरर्थक ठहरेगा।

Verse 3

जंतोः प्रम्नियमाणस्य जीवो नैवोपलभ्यते । वायुरेव जहात्येनमूष्मभावश्च नश्यति ॥ ३ ॥

जब प्राणी को मृत्यु हर ले जाती है, तब ‘जीव’ कहीं प्रत्यक्ष नहीं होता; केवल वायु ही उसे छोड़कर चली जाती है और देह की ऊष्मा भी नष्ट हो जाती है।

Verse 4

यदि वाथुमयो जीवः संश्लेषो यदि वायुना । वायुमंजलवत्पश्येद्गच्छेत्सह मरुद्गुणैः ॥ ४ ॥

यदि जीव वास्तव में वायुमय हो, या वायु के संयोग से बना मात्र समूह हो, तो वह वायु-गुच्छ की तरह दिखाई दे और वायु के गुणों के साथ ही चलता-फिरता।

Verse 5

संश्लेषो यदि वा तेन यदि तस्मात्प्रणश्यति । महार्णवविमुक्तत्वादन्यत्सलिलभाजनम् ॥ ५ ॥

उससे संयोग रहे या उसके कारण विनाश हो—महासागर से मुक्त होने पर वह अन्य ही हो जाता है; केवल जल का पात्र रह जाता है।

Verse 6

कृपे वा सलिलं दद्यात्प्रदीपं वा हुताशने । क्षिप्रं प्रविश्य नश्येत यथा नश्यत्यसौ तथा ॥ ६ ॥

यदि कोई कुएँ में जल डाले या अग्नि में दीपक रख दे, तो वह शीघ्र भीतर जाकर नष्ट हो जाता है; उसी प्रकार वह (वस्तु) भी नष्ट होती है।

Verse 7

पंचधारणके ह्यस्मिञ्छरीरे जीवितं कृतम् । येषामन्यतराभावाञ्चतुर्णां नास्ति संशयः ॥ ७ ॥

इस पंच-आधारयुक्त शरीर में जीवन स्थापित है; इनमें से चार में किसी एक के अभाव से, निःसंदेह जीवन नहीं टिकता।

Verse 8

नश्यंत्यापो ह्यनाहाराद्वायुरुच्छ्वासनिग्रहात् । नश्यते कोष्टभेदार्थमग्रिर्नश्यत्यभोजनात् ॥ ८ ॥

उपवास से जल-तत्त्व क्षीण होता है, श्वास-निग्रह से वायु रुकती है; शुद्धि हेतु कोष्ठ-भेदन होता है, और न खाने से जठराग्नि बुझ जाती है।

Verse 9

व्याधित्रणपरिक्लेशैर्मेदिनी चैव शीर्यते । पीडितेऽन्यतरे ह्येषां संघातो याति पंचताम् ॥ ९ ॥

रोग, आघात और क्लेश के ताप से यह देह क्षीण होती है; इनमें से किसी एक के अत्यन्त पीड़ित होने पर यह संघात पंचत्व को—विलय को—प्राप्त हो जाता है।

Verse 10

तस्मिन्पंचत्वमापन्ने जीवः किमनुधावति । किं खेदयति वा जीवः किं श्रृणोति ब्रवीति च ॥ १० ॥

जब यह देह पंचतत्त्व में लीन हो जाती है, तब जीव किसके पीछे दौड़े? वह किस बात का शोक करे? वह क्या सुनता है और क्या बोल सकता है?

Verse 11

एषा गौः परलोकस्थं तारयिष्यतिमामिति । यो दत्त्वा म्रियते जंतुः सा गौः कं तारयिष्यति ॥ ११ ॥

यह सोचकर कि “यह गौ परलोक में मेरा उद्धार करेगी,” जो प्राणी उसे दान देकर तुरंत मर जाता है—वह गौ फिर किसका उद्धार करेगी?

Verse 12

गौश्चप्रतिग्रहीता च दाता चैव समं यदा । इहैव विलयं यांति कुतस्तेषां समागमः ॥ १२ ॥

जब गौ, उसका ग्रहणकर्ता और दाता—तीनों एक साथ ही यहाँ नष्ट हो जाएँ, तब उनके लिए कोई शुभ ‘समागम’ (फल) कहाँ से होगा?

Verse 13

विहगैरुपभुक्तस्य शैलाग्रात्पतितस्य च । अग्निना चोपयुक्तस्य कुतः संजीवनं पुनः ॥ १३ ॥

जो पक्षियों द्वारा खा लिया गया हो, जो पर्वत-शिखर से गिर पड़ा हो, और जो अग्नि में भस्म हो गया हो—उसका फिर जीवित होना कैसे संभव है?

Verse 14

छिन्नस्य यदि वृक्षस्य न मूलं प्रतिरोहति । जीवन्यस्य प्रवर्तंते मृतः क्व पुनरेष्यति ॥ १४ ॥

यदि कटे हुए वृक्ष की जड़ फिर नहीं उगती, तो जीवित रहते ही कर्म-प्रवृत्ति चलती है; मर जाने पर वह फिर कहाँ से लौट आएगा?

Verse 15

जीवमात्रं पुरा सृष्टं यदेतत्परिवर्तते । मृताः प्रणश्यंति बीजाद्बीजं प्रणश्यति ॥ १५ ॥

आदि में केवल जीवमात्र की ही सृष्टि हुई; यह जगत-चक्र निरन्तर घूमता रहता है। मृत देह नष्ट हो जाती है, और बीज भी बीज उत्पन्न करके अंततः नष्ट हो जाता है॥१५॥

Verse 16

इति मे संशयो ब्रह्मन्हृदये परिधावति । त निवर्तय सर्वज्ञ यतस्त्वामाश्रितो ह्यहम् ॥ १६ ॥

हे ब्रह्मन्! ऐसा यह संशय मेरे हृदय में दौड़ रहा है। हे सर्वज्ञ! इसे दूर कीजिए, क्योंकि मैं निश्चय ही आपकी शरण में आया हूँ॥१६॥

Verse 17

सनंदन उवाच । एवं पृष्टस्तदानेन स भृगर्ब्रह्मणः सुतः । पुनराहु मुनिश्रेष्ट तत्संदेहनिवृत्तये ॥ १७ ॥

सनन्दन बोले—उस समय उसके द्वारा ऐसे पूछे जाने पर, भृगु—जो ब्रह्मा के पुत्र थे—हे मुनिश्रेष्ठ! उस संदेह की निवृत्ति के लिए फिर बोले॥१७॥

Verse 18

भृगुरुवाच । न प्राणाः सन्ति जीवस्य दत्तस्य च कृतस्य च । याति देहांतरं प्राणी शरीरं तु विशीर्यते ॥ १८ ॥

भृगु बोले—प्राण ही जीव का स्वरूप नहीं हैं; न ‘दत्त’ (दान) और न ‘कृत’ (कर्म) ही (आत्मा) हैं। प्राणी देहांतर को जाता है, पर यह शरीर तो टूट-फूटकर नष्ट हो जाता है॥१८॥

Verse 19

न शरीराश्रितो जीवस्तस्मिन्नष्टे प्रणश्यति । समिधामग्निदग्धानां यथाग्रिर्द्दश्यते तथा ॥ १९ ॥

जीव शरीर पर आश्रित नहीं है; शरीर के नष्ट होने पर वह नष्ट नहीं होता। जैसे अग्नि से जली हुई समिधाओं में भी अग्नि (तत्त्व) का दर्शन होता है, वैसे ही (आत्मा का अस्तित्व) समझना चाहिए॥१९॥

Verse 20

भरद्वाज उवाच । अग्नेर्यथा तस्य नाशात्तद्विनाशो न विद्यते । इन्धनस्योपयोगांते स वाग्निर्नोपलभ्यते ॥ २० ॥

भरद्वाज बोले—जैसे प्रकट ज्वाला शांत हो जाने पर भी अग्नि-तत्त्व नष्ट नहीं होता; और ईंधन के पूर्ण उपभोग के बाद वही अग्नि दिखाई नहीं देती—वैसे ही सत्य रहता है, केवल उसकी प्रतीति मिटती है।

Verse 21

नश्यतीत्येव जानामि शांतमग्निमनिन्धनम् । गतिर्यस्य प्रमाणं वा संस्थानं वा न विद्यते ॥ २१ ॥

मैं बस इतना जानता हूँ कि वह ‘शांत हो जाता है’—जैसे ईंधन-रहित शांत अग्नि। क्योंकि उसका न कोई गमन है, न माप-प्रमाण, न कोई निश्चित आकार।

Verse 22

भृगुरुवाच । समिधामुपयोगांते स चाग्निर्नोपलभ्यते । नश्यतीत्येव जानामि शांतमग्निमनिंधनम् ॥ २२ ॥

भृगु बोले—समिधाओं के पूर्ण उपभोग के बाद वह अग्नि नहीं मिलती। मैं यही समझता हूँ कि वह नष्ट हो गई—ईंधन-रहित होकर शांत हो गई।

Verse 23

गतिर्यस्य प्रमाणं वा संस्थानं वा न विद्यते । समिधामुपयोगांते यथाग्निर्नोपलभ्यते ॥ २३ ॥

उसका न कोई गमन है, न माप-प्रमाण, न निश्चित आकार; जैसे समिधाओं के पूर्ण उपभोग के बाद अग्नि नहीं मिलती—वैसे ही वह परम तत्त्व भी लक्ष्य नहीं होता।

Verse 24

आकाशानुगतत्वाद्धि दुर्ग्राह्यो हि निराश्रयः । तथा शरीरसंत्यागे जीवो ह्याकाशवत्स्थितः ॥ २४ ॥

आकाश-स्वभाव के अनुरूप होने से वह पकड़ में नहीं आता और निराधार है। वैसे ही देह-त्याग के समय जीव आकाश की भाँति स्थित रहता है—और नारायण-स्मृति से शांति पाता है।

Verse 25

न नश्यते सुसूक्ष्मत्वाद्यथा ज्योतिर्न संशयः । प्राणान्धारयते ह्यग्निः स जीव उपधार्यताम् ॥ २५ ॥

अत्यन्त सूक्ष्म होने से वह नष्ट नहीं होता—जैसे ज्योति नष्ट नहीं होती; इसमें संशय नहीं। अग्नि ही प्राणों को धारण करती है; अतः उसी को जीव-तत्त्व समझो॥२५॥

Verse 26

वायुसंधारणो ह्यग्निर्नश्यत्युच्छ्वासनिग्रहात् । तस्मिन्नष्टे शरीराग्नौ ततो देहमचेतनम् ॥ २६ ॥

वायु से ही अग्नि धारण रहती है; उच्छ्वास को रोकने से वह नष्ट हो जाती है। जब शरीर की अग्नि बुझ जाती है, तब देह अचेतन हो जाता है॥२६॥

Verse 27

पतितं याति भूमित्वमयनं तस्य हि क्षितिः । जगमानां हि सर्वेषां स्थावराणां तथैव च ॥ २७ ॥

जो गिरता है वह ‘भूमि’ हो जाता है, क्योंकि क्षिति ही उसका आश्रय-स्थान है। यह सब चलने-फिरने वाले प्राणियों के लिए तथा स्थावरों के लिए भी समान है॥२७॥

Verse 28

आकाशं पवनोऽन्वेति ज्योतिस्तमनुगच्छति । तेषां त्रयाणामेकत्वाद्वयं भूमौ प्रतिष्टितम् ॥ २८ ॥

पवन आकाश का अनुसरण करता है और ज्योति (अग्नि) उसी का अनुसरण करती है। इन तीनों की एकात्मता से शेष दो (जल और पृथ्वी) भूमि पर स्थिर आधार रूप से प्रतिष्ठित होते हैं॥२८॥

Verse 29

यत्र खं तत्र पवनस्तत्राग्निर्यत्र मारुतः । अमूर्तयस्ते विज्ञेया मूर्तिमंतः शरीरिणः ॥ २९ ॥

जहाँ आकाश है वहाँ पवन है, और जहाँ मारुत (वायु) है वहाँ अग्नि है। ये (सूक्ष्म तत्त्व) अमूर्त जानने योग्य हैं, और शरीरधारी मूर्तिमान होते हैं॥२९॥

Verse 30

भरद्वाज उवाच । यद्यग्निमारुतौ भूमिः खमापश्च शरीरिषु । जीवः किंलक्षणस्तत्रेत्येतदाचक्ष्व मेऽनघ ॥ ३० ॥

भरद्वाज बोले—यदि देहधारियों में पृथ्वी, जल, आकाश तथा अग्नि और वायु विद्यमान हैं, तो वहाँ जीव का लक्षण क्या है? हे निष्पाप, यह मुझे बताइए।

Verse 31

पंचात्मके पञ्चरतौ पञ्चविज्ञानसंज्ञके । शरीरे प्राणिनां जीवं वेत्तुभिच्छामि यादृशम् ॥ ३१ ॥

पाँच तत्त्वों से बने, पाँच विषयों में रत, और पंच-विज्ञान कहलाने वाले प्राणियों के इस शरीर में जीव कैसा है—यह मैं जानना चाहता हूँ।

Verse 32

मांसशोणितसंघाते मेदःस्नाय्वस्थिसंचये । भिद्यमाने शरीरे तु जीवो नैवोपलभ्यते ॥ ३२ ॥

मांस-रक्त के समूह, मेद, स्नायु और अस्थियों के ढेर रूप इस शरीर को चीरकर देखने पर भी जीव कहीं नहीं मिलता।

Verse 33

यद्यजीवशरीरं तु पञ्चभूतसमन्वितम् । शरीरे मानसे दुःख कस्तां वेदयते रुजम् ॥ ३३ ॥

यदि शरीर जड़ है और पंचमहाभूतों से बना है, तो शरीर और मन में दुःख होने पर उस पीड़ा को वास्तव में कौन अनुभव करता है?

Verse 34

श्रृणोति कथितं जीवः कर्णाभ्यांन श्रृणोति तत् । महर्षे मनसि व्यग्रे तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥ ३४ ॥

जीव कहा हुआ सुनता है, पर वास्तव में कानों से ही नहीं सुनता; हे महर्षि, जब मन व्यग्र हो जाता है तब जीव निष्फल-सा हो जाता है।

Verse 35

सर्वे पश्यंति यदृश्यं मनोयुक्तेन चक्षुषा । मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ३५ ॥

सब लोग मन से जुड़े हुए नेत्रों से ही दृश्य को देखते हैं। मन व्याकुल हो तो आँख देखते हुए भी वास्तव में नहीं देखती।

Verse 36

न पश्यति न चाघ्राति न श्रृणोति न भाषते । न च स्मर्शमसौ वेत्ति निद्रावशगतः पुनः ॥ ३६ ॥

निद्रा के वश में होने पर वह न देखता है, न सूँघता है; न सुनता है, न बोलता है। स्पर्श भी नहीं जानता—फिर से निद्रा के अधीन होकर।

Verse 37

हृष्यति क्रुद्ध्यते कोऽत्र शोचत्युद्विजते च कः । इच्छति ध्यायति द्वेष्टि वाक्यं वाचयते च कः ॥ ३७ ॥

यहाँ कौन सच में हर्षित होता है या क्रोधित होता है? कौन शोक करता है, कौन उद्विग्न होता है? कौन इच्छा करता है, कौन ध्यान करता है, कौन द्वेष करता है—और कौन वाणी बोलता या बुलवाता है?

Verse 38

भृगुरुवाच । तं पंचसाधारणमत्र किंचिच्छरीरमेको वहतेंऽतरात्मा । स वेत्ति गंधांश्च रसाञ्छुतीश्च स्पर्शं च रूपं च गुणांश्च येऽल्ये ॥ ३८ ॥

भृगु बोले—यहाँ पंचेन्द्रियों के लिए समान इस शरीर को एक ही अन्तरात्मा धारण करता है। वही गन्ध, रस, शब्द, स्पर्श, रूप और अन्य गुणों को जानता है।

Verse 39

पंचात्मके पंचगुणप्रदर्शी स सर्वगात्रानुगतोंऽतरात्मा । सवेति दुःखानि सुखानि चात्र तद्विप्रयोगात्तु न वेत्ति देहम् ॥ ३९ ॥

पंचभूतात्मक देह में पंचविषय-गुणों को प्रकट करने वाला अन्तरात्मा सब अंगों में व्याप्त है। वही यहाँ सुख-दुःख को जानता है; उससे वियोग होने पर देह कुछ भी नहीं जानता।

Verse 40

यदा न रूपं न स्पर्शो नोष्यभवश्च पावके । तदा शांते शरीराग्नौ देहत्यागेन नश्यति ॥ ४० ॥

जब अग्नि में न रूप रहता है, न स्पर्श, न उष्णता का भाव, तब शरीर की अग्नि शांत होने पर देह-त्याग से वह नष्ट हो जाता है।

Verse 41

आपोमयमिदं सर्वमापोमूर्तिः शरीरिणाम् । तत्रात्मा मानसो ब्रह्मा सर्वभूतेषु लोककृत् ॥ ४१ ॥

यह समस्त जगत् जलमय है; देहधारियों के शरीर भी जल-स्वरूप हैं। उसी में आत्मा मनोज ब्रह्मा है, जो सब प्राणियों में लोक-व्यवस्था का कर्ता होकर स्थित है।

Verse 42

आत्मानं तं विजानीहि सर्वलोकहितात्मकम् । तस्मिन्यः संश्रितो देहे ह्यब्बिंदुरिव पुष्करे ॥ ४२ ॥

उस आत्मा को जानो जो समस्त लोकों के हित का स्वरूप है। जो देह में रहते हुए उसी का आश्रय लेता है, वह कमल-पत्र पर स्थित जल-बिंदु की भाँति अलिप्त रहता है।

Verse 43

क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं लोकहितात्मकम् । तमोरजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणानिमाम् ॥ ४३ ॥

उसे क्षेत्रज्ञ जानो—जो नित्य और लोक-हितस्वरूप है। और तम, रज, सत्त्व—इनको जीव के गुण समझो।

Verse 44

अचेतनं जीवगुणं वदंति स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् । अतः परं क्षेत्रविदो वदंति प्रावर्तयद्यो भुवनानि सप्त ॥ ४४ ॥

वे कहते हैं कि जीव का गुण (प्राण-शक्ति) अचेतन है; फिर भी वह स्वयं चलता है और सबको चलाता है। इसलिए क्षेत्र के ज्ञाता उससे परे उस क्षेत्रज्ञ को बताते हैं, जो सातों भुवनों को प्रवृत्त करता है।

Verse 45

न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे मिथ्यैतदाहुर्मुन इत्यबुद्धाः । जीवस्तु देहांतरितः प्रयाति दशार्द्धतस्तस्य शरीरभेदः ॥ ४५ ॥

देह के बदलने पर जीव का नाश नहीं होता; जो ऐसा कहते हैं वे मिथ्या बोलते हैं—मुनि कहलाकर भी अबुद्ध हैं। जीव देहान्तर को प्राप्त होता है और अपनी दशाओं के अनुसार शरीर-भेद धारण करता है।

Verse 46

एवं भूतेषु सर्वेषु गूढश्चरति सर्वदा । दृश्यते त्वग्र्या बुध्यासूक्ष्मया तत्त्वदर्शिभिः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार वह सब प्राणियों में गूढ़ होकर सदा विचरता है (अन्तर्यामी रूप से); परन्तु तत्त्वदर्शी जन सूक्ष्म और श्रेष्ठ बुद्धि से उसे देखते हैं।

Verse 47

तं पूर्वापररात्रेषु युंजानः सततं बुधः । लब्धाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ ४७ ॥

जो बुद्धिमान पूर्वरात्रि और अपररात्रि में निरन्तर उसी (ध्यान) में युक्त रहता है, जो केवल प्राप्त आहार को (संयम से) ग्रहण करता है और जिसका मन शुद्ध है—वह आत्मा में आत्मा का दर्शन करता है।

Verse 48

चित्तस्य हि प्रसादेन हित्वा कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमानंत्यमश्नुते ॥ ४८ ॥

चित्त की प्रसन्नता से मनुष्य शुभ-अशुभ कर्म का त्याग कर देता है; प्रसन्न अन्तःकरण से आत्मा में स्थित होकर वह अनन्त सुख का आस्वादन करता है।

Verse 49

मानसोऽग्निः शरीरेषु जीव इत्यभिधीयते । सृष्टिः प्रजापतेरेषा भूताध्यात्मविनिश्चये ॥ ४९ ॥

देहधारियों में जो ‘मानस-अग्नि’ है, वही ‘जीव’ कहलाता है। भूत और अध्यात्म के विचार में यह प्रजापति की सृष्टि है—ऐसा निश्चय किया गया है।

Verse 50

असृजद्ब्राह्मणानेव पूर्वं ब्रह्मा प्रजापतिः । आत्मतेजोऽभिनि र्वृत्तान्भास्कराग्निसमप्रभान् ॥ ५० ॥

आदि में प्रजापति ब्रह्मा ने सबसे पहले ब्राह्मणों की सृष्टि की; वे अपने ही तेज से उत्पन्न, सूर्य और अग्नि के समान दीप्तिमान थे।

Verse 51

ततः सत्यं च धर्मं च तथा ब्रह्म च शाश्वतम् । आचारं चैव शौचं च स्वर्गाय विदधे प्रभुः ॥ ५१ ॥

तत्पश्चात् प्रभु ने सत्य और धर्म, तथा शाश्वत ब्रह्म का विधान किया; और स्वर्ग-प्राप्ति के लिए सदाचार और शौच की स्थापना की।

Verse 52

देवदानवगंधर्वा दैत्यासुरमहोरगाः । यक्षराक्षसनागाश्च पिशाचा मनुजास्तथा ॥ ५२ ॥

देव, दानव, गन्धर्व, दैत्य, असुर और महोरग; यक्ष, राक्षस, नाग, पिशाच तथा मनुष्य—ये सभी (इसमें) सम्मिलित हैं।

Verse 53

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राणामसितस्तथा । भरद्वाज उवाच । चातुर्वर्ण्यस्य वर्णेन यदि वर्णो विभिद्यते ॥ ५३ ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा असित (श्यामवर्ण) भी। भरद्वाज बोले—यदि चातुर्वर्ण्य में ‘वर्ण’ के आधार पर भेद किया जाता है…

Verse 54

स्वेदमूत्रपुरीषाणि श्लेष्मा पित्त सशोणितम् । त्वन्तः क्षरति सर्वेषां कस्माद्वर्णो विभज्यते ॥ ५४ ॥

पसीना, मूत्र, मल; कफ, पित्त और रक्त भी—ये सब तो सबके शरीर में त्वचा के भीतर से निकलते हैं। फिर ‘वर्ण’ का भेद किस आधार पर?

Verse 55

जंगमानामसंख्येयाः स्थावराणां च जातयः । तेषां विविधवर्णानां कुतो वर्णविनिश्चयः ॥ ५५ ॥

चल प्राणियों की जातियाँ असंख्य हैं और स्थावरों की भी अनेक प्रकार की हैं। जब उनके रंग-रूप इतने विविध हों, तब ‘वर्ण’ का निश्चित निर्णय कैसे हो सकता है?

Verse 56

भृगुरुवाच । न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं ब्रह्ममयं जगत् । ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मणा वर्णतां गतम् ॥ ५६ ॥

भृगु बोले—वर्णों में कोई स्वाभाविक भेद नहीं है, क्योंकि यह समस्त जगत् ब्रह्ममय है। जो सृष्टि पहले ब्रह्मा ने रची, वह कर्म के कारण ही ‘वर्ण’ कहलाती है।

Verse 57

कामभोगाः प्रियास्तीक्ष्णाः क्रोधताप्रियसाहसाः । त्यक्तस्वकर्मरक्तांगास्ते द्विजाः क्षत्रतां गताः ॥ ५७ ॥

जो द्विज काम-भोगों में आसक्त हुए, कठोर बने, क्रोध और उग्र साहस में आनंद लेने लगे, और अपने स्वकर्म को त्याग बैठे—वे ब्राह्मण क्षत्रियत्व को प्राप्त हो गए।

Verse 58

गोभ्यो वृत्तिं समास्थाय पीताः कृष्युपजीविनः । स्वधर्म्मन्नानुतिष्टंति ते द्विजा वैश्यतां गताः ॥ ५८ ॥

जो द्विज गौ-पालन से जीविका अपनाकर और कृषि से उपजीविका चलाकर भी अपने स्वधर्म का अनुष्ठान नहीं करते, वे वैश्यत्व को प्राप्त होते हैं।

Verse 59

र्हिसानृतपरा लुब्धाः सर्वकर्मोपजीविनः । कृष्णाः शौचपारिभ्राष्टास्ते द्विजाः शूद्रतां गताः ॥ ५९ ॥

जो हिंसा और असत्य में प्रवृत्त, लोभी, हर प्रकार के काम से जीविका चलाने वाले, आचरण से कलुषित और शौच से भ्रष्ट हो गए—वे द्विज शूद्रत्व को प्राप्त होते हैं।

Verse 60

इत्येतैः कर्मभिर्व्याप्ता द्विजा वर्णान्तरं गताः । ब्राह्मणा धर्मतन्त्रस्थास्तपस्तेषां न नश्यति ॥ ६० ॥

इस प्रकार ऐसे कर्मों में लिप्त द्विज अन्य वर्ण में गिर जाते हैं; पर जो ब्राह्मण धर्म-तंत्र में स्थित रहते हैं, उनका तप नष्ट नहीं होता।

Verse 61

ब्रह्म धारयतां नित्यं व्रतानि नियमांस्तथा । ब्रह्म चैव पुरा सृष्टं येन जानंति तद्विदः ॥ ६१ ॥

जो नित्य ब्रह्म को धारण करते हैं, उनके लिए व्रत और नियम सदा पालनीय हैं; क्योंकि आदौ ब्रह्म ही प्रकट हुआ, जिससे तत्त्ववेत्ता जान पाते हैं।

Verse 62

तेषां बहुविधास्त्वन्यास्तत्र तत्र द्विजातयः । पिशाचा राक्षसाः प्रेता विविधा म्लेच्छजातयः । सा सृष्टिर्मानसी नाम धर्मतंत्रपरायणा ॥ ६२ ॥

उनमें अनेक प्रकार की अन्य जातियाँ भी स्थान-स्थान पर होती हैं—द्विज समुदाय, पिशाच, राक्षस, प्रेत और विविध म्लेच्छ कुल। यह सृष्टि ‘मानसी’ कहलाती है, जो धर्म-तंत्र की व्यवस्था की ओर प्रवृत्त है।

Verse 63

भरद्वाज उवाच । ब्राह्मणः केन भवति क्षत्रियो वा द्विजोत्तम । वैश्यः शूद्रश्च विप्रर्षे तद्ब्रूहि वदतां वर ॥ ६३ ॥

भरद्वाज बोले—हे द्विजोत्तम! मनुष्य किससे ब्राह्मण या क्षत्रिय होता है? और हे विप्रर्षि! किससे वैश्य या शूद्र होता है? हे वाक्पति, वह मुझे बताइए।

Verse 64

भृगुरुवाच । जातकर्मादिभिर्यस्तु संस्कारैः संस्कृतः शुचिः । वेदाध्ययनसंपन्नो ब्रह्मकर्मस्ववस्थितः ॥ ६४ ॥

भृगु बोले—जो जातकर्म आदि संस्कारों से संस्कृत होकर शुद्ध हो, वेदाध्ययन में निपुण हो, और ब्राह्मणोचित कर्मों में दृढ़तापूर्वक स्थित रहे—

Verse 65

शौचाचारस्थितः सम्यग्विद्याभ्यासी गुरुप्रियः । नित्यव्रती सत्यपरः स वै ब्राह्मण उच्यते ॥ ६५ ॥

जो शौच और सदाचार में दृढ़ हो, शास्त्र-अध्ययन का निरन्तर अभ्यास करे, गुरु को प्रिय हो, नित्य व्रतों का पालन करे और सत्य में स्थित रहे—वही वास्तव में ब्राह्मण कहलाता है।

Verse 66

सत्यं दानमथोऽद्रोह आनृशंस्यं कृपा घृणा । तपस्यां दृश्यते यत्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥ ६६ ॥

जिसमें सत्य, दान, अद्रोह (अहिंसा), दयालुता, करुणा, पाप से घृणा तथा तप में निष्ठा दिखाई दे—वह स्मृति में ब्राह्मण कहा गया है।

Verse 67

क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंगतः । दानादानरतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्यते ॥ ६७ ॥

जो क्षात्रधर्म से उत्पन्न कर्तव्यों का पालन करे, वेदाध्ययन में तत्पर रहे, और दान तथा प्रतिग्रह (धर्मयुक्त ग्रहण) में रत हो—वही क्षत्रिय कहलाता है।

Verse 68

विशत्याशु पशुभ्यश्च कृष्यादानरतिः शुचिः । वेदाध्ययनसंपन्नः स वैश्य इति संज्ञितः ॥ ६८ ॥

जो शीघ्र ही पशु-पालन आदि में प्रवृत्त हो, कृषि और दान में रत रहे, आचरण से शुद्ध हो, तथा वेदाध्ययन से संपन्न हो—वह वैश्य कहलाता है।

Verse 69

सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोऽशुचिः । त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ॥ ६९ ॥

जो नित्य हर प्रकार का भोजन करने में आसक्त हो, हर तरह का काम कर ले, अशुद्ध हो, वेद को त्याग दे और सदाचार से रहित हो—वह परम्परा में शूद्र स्मृत है।

Verse 70

शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते । न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो ब्राह्मणो न च ॥ ७० ॥

हे लक्ष्मी! यह सच्चा लक्षण शूद्र में भी पाया जा सकता है, पर द्विज में नहीं भी होता। वास्तव में शूद्र केवल जन्म से शूद्र नहीं, और ब्राह्मण भी केवल जन्म से ब्राह्मण नहीं।

Verse 71

सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । एतत्पवित्रं ज्ञानानां तथा चैवात्मसंयमः ॥ ७१ ॥

सब उपायों से लोभ और क्रोध का निग्रह करना चाहिए। यही समस्त ज्ञान का पावन करने वाला है, और इसी प्रकार अंतःकरण का आत्मसंयम भी।

Verse 72

वर्ज्यौ सर्वात्मना तौ हि श्रेयोघातार्थमुद्यतौ । नित्यक्रोधाच्छ्रियं रक्षेत्तपो रक्षेत्तु मत्सरात् ॥ ७२ ॥

इसलिए उन दोनों को सर्वथा त्याग देना चाहिए, क्योंकि वे परम कल्याण का नाश करने को तत्पर हैं। निरंतर क्रोध से श्री की रक्षा करे, और मत्सर से तप की रक्षा करे।

Verse 73

विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥ ७३ ॥

प्रमादवश मनुष्य मान और अपमान के कारण अपनी विद्या और अपने आत्मस्वरूप को भी डगमगा देता है।

Verse 74

यस्य सर्वे समारंभा निराशीर्बंधना द्विज । त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान् ॥ ७४ ॥

हे द्विज! जिसके सब आरंभ निराशा (निष्कामता) और बंधन-रहित हों—जिसका सब कुछ मानो त्याग की अग्नि में आहुति हो गया हो—वही सच्चा त्यागी है और वही बुद्धिमान है।

Verse 75

अहिंस्त्रः सर्वभूतानां मैत्रायण गतश्चरेत् । परिग्रहात्परित्यज्य भवेद्बद्ध्या जितेंद्रियः ॥ ७५ ॥

सब प्राणियों के प्रति अहिंसक होकर मैत्रीभाव से विचरे। परिग्रह और आसक्ति त्यागकर, सम्यक् बुद्धि से इन्द्रियों को जीतकर संयमी बने॥

Verse 76

अशोकस्थानमाति वेदिह चामुत्र चाभयम् । तपोनित्येन दांतेन मुनिना संयतात्ममना ॥ ७६ ॥

तप में नित्य रत, दान्त और संयतात्मा मुनि शोक-रहित पद को प्राप्त करता है, और इस लोक तथा परलोक—दोनों में अभय को जानता है॥

Verse 77

अजितं जेतुकामेन व्यासंगेषु ह्यसंगिना । इन्द्रियैर्गृह्यते यद्यत्तत्तद्व्यक्तमिति स्थितिः ॥ ७७ ॥

अजित (आत्मतत्त्व) को जीतने की इच्छा रखने वाला साधक, सब संगों के बीच भी असंग रहे। इन्द्रियों से जो कुछ ग्रहण होता है, वही ‘व्यक्त’ है—यह निश्चय है॥

Verse 78

अव्यक्तमिति विज्ञेयं लिंगग्राह्यमतींद्रियम् । अविश्रंभेण मंतव्यं विश्रंभे धारयेन्मनः ॥ ७८ ॥

उस तत्त्व को ‘अव्यक्त’ जानो—जो इन्द्रियों से परे है और केवल सूक्ष्म लक्षणों से ग्रहण होता है। उसे सावधान जागरूकता से चिन्तन करो; और जब दृढ़ विश्वास हो, तब मन को वहीं स्थिर धरो॥

Verse 79

मनः प्राणेन गृह्णीयात्प्राणं ब्रह्मणि धारयेत् । निवेदादेव निर्वाणं न च किंचिद्विच्चितयेत् ॥ ७९ ॥

प्राण के द्वारा मन को रोको, और प्राण को ब्रह्म में स्थिर करो। पूर्ण निवेदन (समर्पण) से ही निर्वाण होता है; इसलिए और किसी वस्तु का किंचित् भी विचार न करो॥

Verse 80

सुखं वै ब्रह्मणो ब्रह्मन्निर्वेदेनाधिगच्छति । शौचे तु सततं युक्तः सदाचारसमन्वितः ॥ ८० ॥

हे ब्राह्मण! वैराग्य से ही ब्रह्म का सुख निश्चयपूर्वक प्राप्त होता है। जो सदा शौच में स्थित और सदाचार से युक्त रहता है, वह उसी मार्ग पर आगे बढ़ता है।

Verse 81

स्वनुक्रोशश्च भूतेषु तद्द्विजातिषु लक्षणम् । सत्यंव्रतं तपः शौचं सत्यं विसृजते प्रजा ॥ ८१ ॥

समस्त प्राणियों के प्रति करुणा—यही द्विज का लक्षण कहा गया है। परंतु प्रजा सत्य को छोड़ देती है; सत्यव्रत, तप, शौच और सत्य—सब समाज में त्याग दिए जाते हैं।

Verse 82

सत्येन धार्यते लोकः स्वः सत्येनैव गच्छति । अनृतं तमसो रूपं तमसा नीयते ह्यधः ॥ ८२ ॥

सत्य से ही लोक धारण होता है और सत्य से ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है। असत्य तम का रूप है; उसी अंधकार से मनुष्य निश्चय ही अधोगति को जाता है।

Verse 83

तमोग्रस्तान पश्यंति प्रकाशंतमसावृताः । सुदुष्प्रकाश इत्याहुर्नरकं तम एव च ॥ ८३ ॥

तम से ग्रस्त लोग प्रकाशमान वस्तु को भी मानो अंधकार से ढका हुआ देखते हैं। वे उसे ‘अत्यंत कठिन प्रकाश’ कहते हैं; वही तम ही नरक के समान है।

Verse 84

सत्यानृतं तदुभयं प्राप्यते जगतीचरैः । तत्राप्येवंविधा लोके वृत्तिः सत्यानृते भवेत् ॥ ८४ ॥

संसार में रहने वाले प्राणी सत्य, असत्य और दोनों के मिश्रण को भी पाते हैं। इसलिए लोक में भी व्यवहार की वृत्ति अवसरानुसार सत्य-असत्य के संबंध में बनती जाती है।

Verse 85

धर्माधर्मौ प्रकाशश्च तमो दुःखसुखं तथा । शारीरैर्मानसैर्दुःखैः सुखैश्चाप्यसुखोदयैः ॥ ८५ ॥

धर्म-अधर्म, प्रकाश-तम और दुःख-सुख—ये सब देह और मन के दुःखों तथा सुखों के द्वारा ही अनुभव होते हैं; और वे सुख भी आगे चलकर असुख के उदय का कारण बन जाते हैं।

Verse 86

लोकसृष्टं प्रपश्यन्तो न मुह्यंति विचक्षणाः । तत्र दुःखविमोक्षार्थं प्रयतेत विचक्षणः ॥ ८६ ॥

जो विवेकी इस लोक को सृष्ट (संस्कारबद्ध) रूप में देखते हैं, वे मोह में नहीं पड़ते। इसलिए बुद्धिमान को इसी जीवन में दुःख-निवृत्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

Verse 87

सुखं ह्यनित्यं भूतानामिह लोके परत्र च । राहुग्रस्तस्य सोमस्य यथा ज्योत्स्ना न भासते ॥ ८७ ॥

जीवों के लिए सुख निश्चय ही अनित्य है—इस लोक में भी और परलोक में भी; जैसे राहु से ग्रस्त चन्द्रमा की चाँदनी नहीं चमकती।

Verse 88

तथा तमोभिभूतानां भूतानां नश्यते सुखम् ॥ ८८ ॥

उसी प्रकार तम (अज्ञान) से अभिभूत प्राणियों का सुख नष्ट हो जाता है।

Verse 89

तत्खलु द्विविधं सुखमुच्यचते शरीरं मानसं च । इह खल्वमुष्मिंश्च लोके वस्तुप्रवृत्तयः सुखार्थमभिधीयन्ते नहीतः परत्रापर्वगफलाद्विशिष्टतरमस्ति । स एव काम्यो गुणविशेषो धर्मार्थगुणारंभगस्तद्धेतुरस्योत्पत्तिः सुखप्रयोजनार्थमारंभाः । भरद्वाज उवाच । वदैतद्भवताभिहितं सुखानां परमा स्थितिरिति ॥ ८९ ॥

सुख दो प्रकार का कहा गया है—शारीरिक और मानसिक। इस लोक और परलोक में सभी प्रवृत्तियाँ सुख के लिए ही कही जाती हैं; क्योंकि मोक्ष-फल से बढ़कर कुछ भी श्रेष्ठ नहीं। वही गुणों की वांछनीय उत्कृष्टता है—धर्म और अर्थ के गुणों का आरम्भ; उसी से उसका हेतु उत्पन्न होता है, और सब प्रयत्न सुख को ही लक्ष्य बनाकर किए जाते हैं। भरद्वाज बोले: आपने जैसा कहा है, सुख की परम अवस्था क्या है—यह बताइए।

Verse 90

न तदुपगृह्णीमो न ह्येषामृषीणां महति स्थितानाम् ॥ ९० ॥

हम इस मत को स्वीकार नहीं करते; यह उन महान ऋषियों के लिए उचित नहीं है जो उच्च आध्यात्मिक स्थिति में स्थित हैं।

Verse 91

अप्राप्य एष काम्य गुणविशेषो न चैनमभिशीलयंति । तपसि श्रूयते त्रिलोककृद्ब्रह्मा प्रभुरेकाकी तिष्टति ब्रह्मचारी न कामसुखोष्वात्मानमवदधाति ॥ ९१ ॥

इच्छा-प्रेरित प्रयोजनों से चाहा जाने वाला यह विशिष्ट गुण प्राप्त नहीं होता, और लोग इसका सच्चा अभ्यास भी नहीं करते। तपस्या-परंपरा में सुना जाता है कि त्रिलोक-कर्ता प्रभु ब्रह्मा एकाकी ब्रह्मचारी होकर स्थित रहते हैं और कामजन्य सुखों में मन नहीं लगाते।

Verse 92

अपि च भगवान्विश्वेश्वर उमापतिः काममभिवर्तमानमनंगत्वेन सममनयत् ॥ ९२ ॥

और फिर, भगवान विश्वेश्वर—उमा-पति—ने आक्रमण को बढ़ते हुए काम को अनंग (देह-रहित) अवस्था में पहुँचा दिया।

Verse 93

तस्माद्भूमौ न तु महात्मभिरंजयति गृहीतो न त्वेष तावद्विशिष्टो गुणविशेष इति ॥ ९३ ॥

इसलिए, केवल भूमि प्राप्त कर लेने से महात्मा लोग उसे सम्मान-तिलक नहीं करते; क्योंकि यह अपने-आप में कोई विशेष गुण-वैशिष्ट्य नहीं है।

Verse 94

नैतद्भगवतः प्रत्येमि भवता तूक्तं सुखानां परमाः स्त्रिय इति लोकप्रवादो हि द्विविधः । फलोदयः सुकृतात्सुखमवाप्यतेऽन्यथा दुःखमिति ॥ ९४ ॥

हे भगवन्, मैं यह नहीं मानता कि जैसा आपने कहा—‘सुखों की परम कारण स्त्रियाँ हैं’। लोक-प्रवाद दो प्रकार का है: पुण्यकर्म के फल के उदय से सुख मिलता है, अन्यथा दुःख।

Verse 95

भृगुरुवाच । अत्रोच्यते अनृतात्खलु तमः प्रादुर्भूतं ततस्तमोग्रस्ता अधर्ममेवानुवर्तंते न धर्मं । क्रोधलोभमोहहिंसानृतादिभिखच्छन्नाः खल्वस्मिंल्लोके नामुत्र सुखमाप्नुवंति । विविधव्याधिरुजोपतापैरवकीर्यन्ते वधबन्धनपरिक्लेशादिभिश्च क्षुत्पिपासाश्रमकृतैरुपतापैरुपतप्यंते । वर्षवातात्युष्णातिशीतकृतैश्च प्रतिभयैः शारीरैर्दुःखैरुपतप्यंते बंधुधनविनाशविप्रयोगकृतैश्च मानसैः शौकैरभिभूयंते जरामृत्युकृतैश्चान्यैरिति यस्त्वेतैः ॥ ९५ ॥

भृगु बोले—यहाँ कहा गया है कि असत्य से ही तम (अंधकार) उत्पन्न होता है; और उस तम से ग्रस्त लोग धर्म का नहीं, केवल अधर्म का ही अनुसरण करते हैं। क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा, असत्य आदि से ढँके हुए वे न इस लोक में सुख पाते हैं, न परलोक में। अनेक रोगों और पीड़ाओं से वे व्याकुल रहते हैं; वध, बंधन, कारावास आदि क्लेशों से, तथा भूख-प्यास और श्रमजन्य तापों से तपते हैं। वर्षा, वायु, अत्यधिक उष्णता और तीव्र शीत से उत्पन्न शारीरिक दुःख और भय उन्हें सताते हैं; बंधु-धन के नाश और वियोग से उत्पन्न मानसिक शोक उन्हें दबा देता है; और जरा-मृत्यु से उठने वाले अन्य दुःख भी उन्हें घेर लेते हैं।

Verse 96

शारीरं मानसं नास्ति न जरा न च पातकम् । नित्यमेव सुखं स्वर्गे सुखं दुःखमिहोभयम् ॥ ९६ ॥

स्वर्ग में न शारीरिक कष्ट है, न मानसिक पीड़ा; वहाँ न जरा है, न पाप। स्वर्ग में सुख सदा रहता है; पर इस मर्त्यलोक में सुख और दुःख दोनों का मिश्रण है।

Verse 97

नरके दुःखमेवाहुः सुखं तत्परमं पदम् । पृथिवी सर्वभूतानां जनित्री तद्विधाः स्त्रियः ॥ ९७ ॥

वे कहते हैं कि नरक में केवल दुःख ही है; और सुख तो वह परम पद (उत्तम लोक) है। पृथ्वी समस्त प्राणियों की जननी है; और स्त्रियाँ भी उसी स्वभाव की—मातृत्व और जीवन-प्रदायिनी।

Verse 98

पुमान्प्रजापतिस्तत्रशुक्रं तेजोमयं विदुः । इत्येतल्लोकनिर्माता धर्मस्य चरितस्य च ॥ ९८ ॥

वहाँ उस पुरुष को प्रजापति कहते हैं—वह ‘शुक्र’ है, शुद्ध तेजोमय। वही लोकों का निर्माता है और धर्म तथा उसके आचरण-मार्ग का प्रवर्तक भी।

Verse 99

तपसश्च सुतप्तस्य स्वाध्यायस्य हुतस्य च । हुतेन शाम्यते पापं स्वाध्याये शांतिरुत्तमा ॥ ९९ ॥

सुतप्त तप, स्वाध्याय और अग्निहोत्र-हवन—इनसे (मनुष्य का) कल्याण होता है। हवन से पाप शांत होता है, और स्वाध्याय से उत्तम शांति प्राप्त होती है।

Verse 100

दानेन भोगानित्याहुस्त पसा स्वर्गमाप्नुयात् । दानं तु द्विविधं प्राहुः परत्रार्थमिहैव च ॥ १०० ॥

दान से भोग-सम्पदा मिलती है और तप से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। पर दान दो प्रकार का कहा गया है—एक परलोक के लिए, और एक जो इसी लोक में फल देता है।

Verse 101

सद्भ्यो यद्दीयते किंचित्तत्परत्रोपतिष्टते । असद्भ्यो दीयते यत्तु तद्दानमिह भुज्यते । यादृशं दीयते दानं तादृशं फलमश्नुते ॥ १०१ ॥

सज्जनों को जो थोड़ा भी दिया जाता है, वह परलोक में सहायक होता है। पर जो दुष्ट/अयोग्य को दिया जाता है, उसका फल यहीं भोग लिया जाता है। जैसा दान, वैसा ही फल मिलता है।

Verse 102

भरद्वाज उवाच । किं कस्य धर्मचरणं किं वा धर्मस्य लक्षणम् । धर्मः कतिविधो वापि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥ १०२ ॥

भरद्वाज बोले—धर्म का आचरण क्या है और किसके लिए है? धर्म का लक्षण क्या है? तथा धर्म कितने प्रकार का है? कृपा करके आप मुझे बताइए।

Verse 103

भृगुरुवाच । स्वधर्माचरणे युक्ता ये भवंति मनीषिणः । तेषां स्वर्गपलावाप्तिर्योऽन्यथा स विमुह्यते ॥ १०३ ॥

भृगु बोले—जो बुद्धिमान अपने स्वधर्म के आचरण में लगे रहते हैं, वे स्वर्ग-फल को प्राप्त होते हैं; जो इसके विपरीत चलता है, वह मोह में पड़ जाता है।

Verse 104

भरद्वाज उवाच । यदेतञ्चातुराश्रम्यं ब्रह्मर्षिविहितं पुरा । तेषां स्वे स्वे समाचारास्तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥ १०४ ॥

भरद्वाज बोले—यह चातुराश्रम-व्यवस्था जो प्राचीन काल में ब्रह्मर्षियों द्वारा स्थापित की गई, उन चारों के अपने-अपने आचार और कर्तव्य कृपा करके मुझे यहाँ बताइए।

Verse 105

भृगुरुवाच । पूर्वमेव भगवता ब्रह्मणा लोकहितमनुतिष्टता धर्मसंरक्षणार्थमाश्रमाश्चत्वारोऽभिनिर्द्दिष्टाः । १ ॥ ०५ ॥

भृगु बोले—प्राचीन काल में लोक-कल्याण में प्रवृत्त भगवान् ब्रह्मा ने धर्म की रक्षा हेतु चार आश्रमों का विधान किया।

Verse 106

तत्र गुरुकुलवासमेव प्रथममाश्रममाहरंति सम्यगत्र शौचसस्कारनियमव्रतविनियतात्मा उभे संध्ये भास्कराग्निदैवतान्युपस्थाय विहाय तद्ध्यालस्यं गुरोरभिवादनवेदाब्यासश्रवणपवित्रघीकृतांतरात्मा त्रिषवणमुपस्पृश्य ब्रह्मचर्याग्निपरिचरणगुरुशुश्रूषा । नित्यभिक्षाभैक्ष्यादिसर्वनिवेदितांतरात्मा गुरुवचननिदेशानुष्टानाप्रतिकूलो गुरुप्रसादलब्धस्वाध्यायतत्परः स्यात् ॥ १०६ ॥

यहाँ कहते हैं कि गुरु-कुल में निवास ही प्रथम आश्रम है। इसमें शौच, संस्कार, नियम और व्रतों से संयमित विद्यार्थी प्रातः-सायं सूर्य और अग्नि-देव का विधिपूर्वक उपासन करे, ध्यान में आलस्य त्यागे। गुरु को प्रणाम कर, वेद-श्रवण और अभ्यास से अंतःकरण को पवित्र बनाकर, त्रिकाल आचमन/उपस्पर्शन करे; ब्रह्मचर्य का पालन करे, अग्नि की सेवा और गुरु-शुश्रूषा करे। नित्य भिक्षा आदि सब कुछ समर्पित भाव से करे, गुरु-आज्ञा के अनुष्ठान में प्रतिकूल न हो, और गुरु-कृपा से प्राप्त स्वाध्याय में तत्पर रहे।

Verse 107

भवति चात्र श्लोकः । गुरुं यस्तु समाराध्य द्विजो वेदमावान्पुयात् । तस्य स्वर्गफलावाप्तिः सिद्ध्यते चास्य मानसम् । इति गार्हस्थ्यं खलु द्वितीयमाश्रमं वदंति ॥ १०७ ॥

यहाँ यह श्लोक कहा गया है—जो द्विज गुरु की सम्यक् आराधना करके वेद को प्राप्त करता है और पवित्र होता है, उसे स्वर्ग-फल की प्राप्ति होती है और उसका मन भी सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार गृहस्थाश्रम को ही दूसरा आश्रम कहते हैं।

Verse 108

तस्य सदा चारलक्षणं सर्वमनुव्याख्यास्यामः । समावृतानां सदाचाराणां सहधर्मचर्यफलार्थिनां गृहाश्रमो विधीयते ॥ १०८ ॥

अब हम सदाचार के समस्त लक्षणों का विस्तार से वर्णन करेंगे। जो ब्रह्मचर्य पूर्ण कर चुके हैं और धर्म के साथ संगत जीवन के फल चाहते हैं, उनके लिए गृहाश्रम का विधान है।

Verse 109

धर्मार्थकामावाप्तिर्ह्य. त्र त्रिवर्गसाधनमपेक्ष्यागर्हितकर्मणा धनान्यादाय स्वाध्यायोपलब्धप्रकर्षेण वा । ब्रह्मर्षिनिर्मितेन वा अद्भिः सागरगतेन वा द्रव्यनियमाभ्यासदैवतप्रसादोपलब्धेन वा धनेन गृहस्थो गार्हस्थ्यं वर्तयेत् ॥ १०९ ॥

यहाँ धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति त्रिवर्ग-साधन पर निर्भर है। इसलिए गृहस्थ को चाहिए कि वह निंदारहित कर्म से अर्जित धन से, या स्वाध्याय से प्राप्त उत्कर्ष के बल से, या ब्रह्मर्षियों द्वारा स्थापित धन से, या समुद्र में जल द्वारा प्राप्त धन से, अथवा द्रव्य-नियम के अभ्यास और देवता की कृपा से प्राप्त धन से गृहस्थाश्रम का निर्वाह करे।

Verse 110

तद्धि सर्वाश्रमणां मूलमुदाहरंति गुरुकुलनिवासिनः परिव्राजका येऽन्ये । संकल्पितव्रतनियमधर्मानुष्टानिनस्तेषामप्यंतरा च भिक्षाबलिसंविभागाः प्रवर्तंते ॥ ११० ॥

यह सभी आश्रमों का मूल कहा गया है—गुरुकुल में रहने वाले और अन्य परिव्राजक भी इसे मानते हैं। संकल्पपूर्वक व्रत, नियम और धर्माचरण करने वालों के लिए भी भिक्षा तथा बलि-भोजन का संविभाग (वितरण) अंतःकरणीय कर्तव्य बना रहता है।

Verse 111

वानप्रस्थानां च द्रव्योपस्कार इति प्रायशः खल्वेते साधवः साधुपथ्योदनाः । स्वाध्यायप्रसंगिनस्तीर्थाभिगमनदेशदर्शनार्थं पृथिवीं पर्यटंति ॥ १११ ॥

वानप्रस्थों का उपस्कार प्रायः अल्प ही होता है; वे साधुजन धर्म्य-हितकर अन्न पर निर्वाह करते हैं। स्वाध्याय में लगे हुए वे तीर्थ-गमन और देश-दर्शन के लिए पृथ्वी पर विचरते हैं।

Verse 112

तेषां प्रत्युत्थानाभिगमनमनसूयावाक्यदानसुखसत्कारासनसुखशयनाभ्यवहारसत्क्रिया चेति ॥ ११२ ॥

उनके लिए—आदर से उठ खड़े होना, आगे बढ़कर स्वागत करना, ईर्ष्या-रहित वचन बोलना, दान देना, सुखद आतिथ्य-सत्कार करना, आसन देना, विश्राम हेतु सुखशय्या देना, भोजन-पान कराना और यथोचित सेवा-कार्य करना—यह सब करना चाहिए।

Verse 113

भवति चात्र श्लोकः । अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥ ११३ ॥

यहाँ श्लोक है—जिसके घर से अतिथि आशा-भंग होकर लौट जाता है, वह अतिथि अपना पाप उस गृहस्थ को देकर और उसका पुण्य लेकर चला जाता है।

Verse 114

अपि चात्र यज्ञक्रियाभिर्देवताः प्रीयंते निवापेन पितरो । विद्याभ्यासश्रवणधारणेन ऋषयः अपत्योत्पादनेन प्रजापतिरिति ॥ ११४ ॥

और यहाँ यह भी है—यज्ञ-क्रियाओं से देवता प्रसन्न होते हैं, निवाप (पिण्ड-आदि अन्न-आहुति) से पितर तृप्त होते हैं; विद्या का अभ्यास, श्रवण और धारण करने से ऋषि प्रसन्न होते हैं; और संतानोत्पादन से प्रजापति प्रसन्न होते हैं।

Verse 115

लोकौ चात्र भवतः । वात्सल्याः सर्वभूतेभ्यो वायोः श्रोत्रस्तथा गिरा । परितापोदपघातश्च पारुष्यं चात्र गर्हितम् ॥ ११५ ॥

यहाँ दो मार्ग बताए गए हैं। सब प्राणियों के प्रति वात्सल्य-भाव रखो, और कान तथा वाणी को संयमित करो। किसी को दुःख देना, मारना-पीटना या हानि पहुँचाना तथा कठोर वचन—यहाँ निंदित हैं।

Verse 116

अवज्ञानमहंकारो दंभश्चैव विगर्हितः । अहिंसा सत्यमक्रोदं सर्वाश्रमगतं तपः ॥ ११६ ॥

अवज्ञा, अहंकार और दंभ—ये निंदित हैं। अहिंसा, सत्य और अक्रोध—यही तप है जो सभी आश्रमों में मान्य है।

Verse 117

अपि चात्र माल्याभरणवस्त्राभ्यंगनित्योपभोगनृत्यगीतवादित्रश्रुतिसुखनयनस्नेहरामादर्शनानां । प्राप्तिर्भक्ष्यभोज्यलेह्यपेयचोष्याणामभ्यवहार्य्याणां विविधानामुपभोगः ॥ ११७ ॥

और यहाँ (भोग-स्थिति में) माला, आभूषण, वस्त्र, अभ्यंग तथा नित्य के भोग—नृत्य, गीत, वाद्य, मधुर श्रवण, मनोहर दर्शन, स्नेह और रमणियों का दर्शन—ये सब प्राप्त होते हैं। तथा भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, पेय और चोष्य—अनेक प्रकार के खाद्य-भोगों का उपभोग होता है।

Verse 118

स्वविहारसंतोषः कामसुखावाप्तिरिति । त्रिवर्गगुणनिर्वृत्तिर्यस्य नित्यं गृहाश्रमे । स सुखान्यनुभूयेह शिष्टानां गतिमाप्नुयात् ॥ ११८ ॥

जो अपने उचित विहार में संतुष्ट है, और काम-सुख को प्राप्त करके भी, गृहाश्रम में धर्म-अर्थ-काम—इन त्रिवर्ग के गुणों को नित्य पूर्ण करता है; वह यहाँ सुख भोगकर शिष्टों की गति को प्राप्त होता है।

Verse 119

उंछवृत्तिर्गृहस्थो यः स्वधर्म चरणे रतः । त्यक्तकामसुखारंभः स्वर्गस्तस्य न दुर्लभः ॥ ११९ ॥

जो गृहस्थ उञ्छवृत्ति से जीवन यापन करता है, अपने स्वधर्म के आचरण में रत है, और काम-सुख के हेतु आरंभों को त्याग चुका है—उसके लिए स्वर्ग दुर्लभ नहीं।

Verse 120

वानप्रस्थाः खल्वपि धर्ममनुसरंतः पुण्यानि तीर्थानि नदीप्रस्रवणानि स्वभक्तेष्वरण्येषु । मृगवराहमहिष शार्दूलवनगजाकीर्णेषु तपस्यंते अनुसंचरंति ॥ १२० ॥

वानप्रस्थ भी धर्म का अनुसरण करते हुए पुण्य तीर्थों और नदियों के पवित्र स्रोतों में विचरते हैं, अपनी भक्ति को प्रिय वनों में निवास करते हैं। मृग, वराह, महिष, व्याघ्र और वन-गजों से भरे अरण्यों में वे तप करते हुए नियमपूर्वक भ्रमण करते हैं॥१२०॥

Verse 121

त्यक्तग्राम्यवस्त्राभ्यवहारोपभोगा वन्यौषधिफलमूलपर्णपरिमितविचित्रनियताहाराः । स्थानासनिनोभूपाषाणसिकताशर्करावालुकाभस्मशायिनः काशुकुशचर्मवल्कलसंवृतांगाः । केशश्यश्रुनखरोमधारिणो नियतकालोपस्पर्शनाःशुष्कबलिहोमकालानुष्टायिनः । समित्कुशकुसुमापहारसंमार्जनलब्धविश्रामाः शीतोष्णपवनविष्टं भविभिन्नसर्वत्वचो । विविधनियमयोगचर्यानुष्टानविहितपरिशुष्कमांसशोणितत्वगस्थिभूता धृतिपराः सत्त्वयोगाच्छरीराण्युद्वहंते ॥ १२१ ॥

वे ग्राम्य वस्त्र, व्यवहार और भोग त्यागकर वन की औषधि, फल, मूल और पत्तों से परिमित व नियत आहार करते हैं। एक ही स्थान-आसन में स्थित रहकर भूमि, पत्थर, रेत, कंकड़, धूल या भस्म पर शयन करते हैं; काश, कुश, मृगचर्म या वल्कल से ही अंग ढँकते हैं। केश-दाढ़ी-नख-रोम न काटते, नियत समय पर ही स्नान करते, और शुष्क बलि तथा होम के नियत काल का अनुष्ठान करते हैं। समिधा, कुश और पुष्प लाकर तथा सफाई-झाड़ू करके ही विश्राम पाते हैं। शीत-उष्ण और पवन सहकर उनकी त्वचा फटती-रूखी हो जाती है; विविध नियम और योगचर्या से मांस-रक्त-त्वचा-अस्थि तक क्षीण हो जाते हैं, फिर भी धैर्य में स्थित होकर सत्त्व-बल से शरीर धारण करते हैं॥१२१॥

Verse 122

यस्त्वेतां नियतचर्यां ब्रह्मर्षिविहितां चरेत् । स दहेदग्निवद्दोषाञ्जयेल्लोकांश्च दुर्जयान् ॥ १२२ ॥

जो इस ब्रह्मर्षियों द्वारा विहित नियतचर्या का आचरण करता है, वह अग्नि के समान दोषों को दग्ध कर देता है और दुर्जेय लोकों को भी जीत लेता है॥१२२॥

Verse 123

परिव्राजकानां पुनराचारः तद्यथा । विमुच्याग्निं धनकलत्रपरिबर्हसंगेष्वात्मानं स्नेहपाशानवधूय परिव्रजंति । समलोष्टाश्मकांचनास्त्रिवर्गप्रवृत्तेष्वसक्तबुद्धयः ॥ १२३ ॥

परिव्राजक संन्यासियों का आचार यह है—वे अग्नि (गृह्याग्नि) को त्यागकर, धन-कलत्र और परिग्रह के संग से अपने को छुड़ाकर, स्नेह के पाशों को झटककर भ्रमण करते हैं। उनके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और स्वर्ण समान हैं; और त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) से जुड़े प्रवृत्तियों में भी उनकी बुद्धि आसक्त नहीं होती॥१२३॥

Verse 124

अरिमित्रोदासीनां तुल्यदर्शनाः स्थावरजरायुजांडजस्वेदजानां भूतानां वाङ्मनृःकर्मभिरनभिरनभिद्रोहिणोऽनिकेताः । पर्वतपुलिनवृक्षमूलदेवायतनान्यनुसंचरंतो वा सार्थमुपेयुर्नगरं ग्रामं वा न क्रोधदर्पलोभमोहकार्पण्यदंभपरिवादाभिमाननिर्वृत्तहिंसा इति ॥ १२४ ॥

वे शत्रु, मित्र और उदासीन—सबके प्रति समान दृष्टि रखते हैं। स्थावर हों या जरायुज, अण्डज, स्वेदज अथवा अंकुरज—किसी भी प्राणी के प्रति वाणी, मन और कर्म से द्रोह नहीं करते; और वे अनिकेत (निवास-रहित) रहते हैं। पर्वत, नदी-तट, वृक्ष-मूल और देवालयों में विचरते हुए, या किसी कारवाँ के साथ नगर या ग्राम में भी जा सकते हैं; क्रोध, दर्प, लोभ, मोह, कार्पण्य, दंभ, परिवाद और अभिमान से उत्पन्न हिंसा से सर्वथा मुक्त रहते हैं॥१२४॥

Verse 125

भवंति चात्र श्लोकाः । अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः । न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्वचित् ॥ १२५ ॥

यहाँ यह श्लोक कहा गया है—जो मुनि समस्त प्राणियों को अभयदान देकर विचरता है, उसके लिए किसी भी प्राणी से कभी भय उत्पन्न नहीं होता।

Verse 126

कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं शरीरमग्निं स्वमुखे जुहोति । विप्रस्तु भैक्षोपगतैर्हविर्भिश्चिताग्निना संव्रजते हि सोकान् ॥ १२६ ॥

अपने ही शरीर में स्थित अग्निहोत्र को करके, वह अपने शरीररूपी अग्नि को अपने ही मुख में आहुति देता है। वह ब्राह्मण भिक्षा से प्राप्त हवि के साथ प्रस्थान करता है, क्योंकि चिताग्नि ही शोकों को भस्म कर देती है।

Verse 127

मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं शुचिः स्वसंकल्पितयुक्तबुद्धिः । अनिंधनं ज्योतिरिव प्रशांतं स ब्रह्मलोकं श्रयते द्विजातिः ॥ १२७ ॥

जो द्विज मोक्षाश्रम का यथोक्त पालन करता है—शुद्ध, और सम्यक् संकल्प से संयमित बुद्धि वाला—वह ईंधनरहित ज्योति की भाँति शांत होकर ब्रह्मलोक का आश्रय प्राप्त करता है।

Frequently Asked Questions

Because if breathing, speech, and all activity are fully explained by vāyu/prāṇa and bodily heat, then there is no need to posit an additional, independent conscious principle; the chapter treats this as a serious challenge to be answered by Ātman/Kṣetrajña doctrine.

Bhṛgu presents the Inner Self as the indweller who knows sound, touch, form, taste, and smell, pervading the limbs; the senses function meaningfully only when connected to mind and illuminated by the Self—hence sleep, distraction, and agitation disrupt cognition.

It explicitly denies inherent substance-based difference and explains varṇa classification through karma and conduct: deviation from one’s discipline leads to ‘falling’ into other social functions, while ethical qualities and saṃskāra-supported study and conduct define the brāhmaṇa ideal.

The endpoint is mokṣa-oriented renunciation (sannyāsa): relinquishing external fires and attachments, practicing non-violence and equanimity, and internalizing sacrifice as ‘Agnihotra in the body,’ culminating in serenity and refuge in Brahmaloka.