Adhyaya 56
Purva BhagaSecond QuarterAdhyaya 56204 Verses

Graha–Ketu–Utpāta Lakṣaṇas: Solar/Lunar Omens, Comets, Eclipses, and Calendar Rules

इस अध्याय में सनन्दन ऋषि/राजा को सूर्य, चन्द्र, ग्रह और केतु के द्वारा काल-ज्ञान तथा शुभाशुभ संकेतों का विवेचन कराते हैं। चैत्र से संक्रान्ति-क्रम, चैत्र-शुक्ल-प्रतिपदा के वार की प्रधानता और ग्रहों की शुभता-क्रमबद्धता बताई गई है। सूर्य के लक्षणों में बिम्ब-रूप, धूम-राशि, परिधि/हेलो, ऋतु के अनुसार असामान्य वर्ण, और उनसे युद्ध, राजा की मृत्यु, अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी आदि फल जोड़े गए हैं। चन्द्र के लक्षणों में ‘शृंग’ की स्थिति, उल्टा उदय, दक्षिणगामी नक्षत्रों के दोष, तथा ‘घटोष्ण’ आदि चिह्नों का राशि-शस्त्रों से संबंध बताया गया है। मंगल-बुध के वक्री/उदय के नक्षत्रानुसार वर्षा, फसल, व्यवसाय और जन-सुरक्षा पर प्रभाव, तथा गुरु का वक्री रंग और दिन में दिखना संकट-सूचक कहा गया है। शुक्र की वीथिकाओं में गति व संयोग-नियम, और शनि का कुछ नक्षत्रों में गोचर कल्याणकारी बताया गया है। आगे केतु के प्रकार—पुच्छ-लम्बाई, रंग, आकार, दिशा—और उनके फल व्यवस्थित हैं। अंत में नौ काल-मान, यात्रा-विवाह-व्रतादि के चयन-नियम, 60 वर्षीय बृहस्पति-चक्र व युग-स्वामी, उत्तरायण/दक्षिणायन की कर्म-योग्यता, मास-नाम, तिथि-वर्ग (नन्दा/भद्रा/जया/रिक्ता/पूर्णा), द्विपुष्करादि दोष-शान्ति तथा संस्कार और कृषि हेतु नक्षत्र-वर्गीकरण दिया गया है।

Shlokas

Verse 1

सनंदन उवाच । क्रमाच्चैत्रादिमासेषु मेषाद्याः संक्रमा मताः । चैत्रशुक्लप्रतिपदि यो वारः स नृपः स्मृतः 1. ॥ १ ॥

सनन्दन बोले—क्रम से चैत्र आदि महीनों में मेष आदि संक्रांतियाँ मानी गई हैं। और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को जो वार पड़े, वही दिनों में ‘नृप’ अर्थात् प्रधान माना जाता है।

Verse 2

मेषप्रवेशे सेनानीः कर्कटे सस्यपो भवेत् । समोद्यधीश्वरः सूर्यो मध्यमश्चोत्तमो विधुः ॥ २ ॥

मेष में सूर्य-प्रवेश होने पर सेनापति का योग होता है; कर्क में (प्रवेश पर) सस्यपति अर्थात् कृषि-समृद्धि का स्वामी होता है। सूर्य समुद्र का अधीश्वर बनता है, और चन्द्रमा पहले मध्यम, फिर उत्तम फलदायक होता है।

Verse 3

नेष्टः कुजो बुधो जीवो भृगुस्त्वतिशुभङ्करः । अधमो रविजो वाच्यो ज्ञात्वा चैषां बलाबलम् ॥ ३ ॥

कुज (मंगल) अनिष्ट कहा गया है; बुध और जीव (बृहस्पति) शुभ हैं; और भृगु (शुक्र) तो अत्यन्त शुभकारक है। परन्तु इन ग्रहों के बलाबल को जानकर रवि (सूर्य) को अधम (अल्प-शुभ) कहना चाहिए।

Verse 4

दण्डाकारे कबंधेवा ध्वांक्षाकारेऽथ कीलके । दृष्टेऽकमण्डले व्याधिर्भ्रांतिश्चोरार्थनाशनम् ॥ ४ ॥

यदि कीलक दण्डाकार, कबंध-सा (धड़-सा), या कौए के आकार का दिखे, तो ऐसे कमण्डलु के दर्शन से रोग, भ्रम, और चोरों द्वारा धन-नाश का संकेत होता है।

Verse 5

छत्रध्वजपताकाद्यसन्निभस्तिमितैर्ध्वनैः । रविमण्डलगैर्धूम्रैः सस्फुलिंगैर्जगत् क्षयः ॥ ५ ॥

छत्र, ध्वज, पताका आदि के समान दबे-घुटे शब्द हों, और सूर्य-मण्डल में स्फुलिंगयुक्त धूम्र-राशियाँ विचरें—तो जगत्-क्षय का संकेत होता है।

Verse 6

सितरक्तैः पीतकृष्णैर्वर्णैर्विप्रादिपीडनम् । घ्नंति द्वित्रिचतुर्वर्णैर्भुवि राजजनान्मुने ॥ ६ ॥

हे मुने, पृथ्वी पर राजवर्ग श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण वर्णों से चिह्नित दलों द्वारा—दो, तीन और चार विभागों में बँटकर—ब्राह्मणों आदि को दबाता, पीड़ित करता और नष्ट करता है।

Verse 7

ऊर्द्ध्वैर्भानुकरैस्ताम्रैर्नाशं याति चमूपतिः । पीतैर्नृपसुतः श्वेतैः पुरोधश्चित्रितैर्जनाः ॥ ७ ॥

जब सूर्य की किरणें ऊपर उठकर ताम्र-रक्त सी दिखें, तब सेनापति का नाश होता है। वे पीली हों तो राजपुत्र पीड़ित होता है; श्वेत हों तो पुरोहित; और विचित्र (बहुरंगी) हों तो प्रजा कष्ट पाती है।

Verse 8

धूम्रैर्नृपपिशंगैस्तु जलदाधोमुखैर्जगत् । शुभोर्कः शिशिरे ताम्रः कुंकुमाभा वसन्तिके ॥ ८ ॥

धूम्रवर्ण, पिशंग (ताम्र-पीत) बादल जब नीचे झुके रहें, तब जगत् आच्छन्न-सा हो जाता है। शुभ सूर्य शिशिर में ताम्रवर्ण और वसन्त में कुंकुम-प्रभा से दीप्त होता है।

Verse 9

ग्रीष्मश्चापांडुरश्चैव विचित्रो जलदागमे । पद्मोदराभः शरदि हेमंते लोहितच्छविः ॥ ९ ॥

ग्रीष्म में सूर्य अपाण्डुर (फीका) हो जाता है; वर्षाकाल के आगमन पर वह विचित्र (बहुरंगी) दिखता है; शरद् में कमल के भीतर-सा आभायुक्त होता है; और हेमन्त में लोहित छवि धारण करता है।

Verse 10

पीतः शीते सिते वृष्टौ ग्रीष्मे लोहितभा रविः । रोगानावृष्टिभयकृत् क्रमादुक्तो मुनीश्वर ॥ १० ॥

हे मुनीश्वर, क्रम से कहा गया है कि शिशिर में सूर्य पीला, वर्षाकाल में श्वेत-फीका, और ग्रीष्म में लोहित-प्रभा हो तो वह भय उत्पन्न करता है—रोगों को बढ़ाता और अनावृष्टि का डर देता है।

Verse 11

इन्द्र चापार्द्धमूर्तिस्तु भानुर्भूपविरोधकृत् । शशरक्तनिभे भानौ संग्रामो न चिराद्भुवि ॥ ११ ॥

यदि सूर्य इन्द्रधनुष के अर्ध-रूप सा दिखाई दे, तो राजाओं में परस्पर वैर उत्पन्न होता है। और जब सूर्य शशक-रक्त के समान गाढ़ा लाल हो, तब पृथ्वी पर शीघ्र ही संग्राम होता है।

Verse 12

मयूरपत्रसङ्काशो द्वादशाब्दं न वर्षति । चन्द्रमासदृशो भानुः कुर्याद्भूपांतरं क्षितौ ॥ १२ ॥

यदि मेघ मयूर-पंख के समान दिखाई दें, तो बारह वर्षों तक वर्षा नहीं होती। और यदि सूर्य चन्द्रमा के समान प्रतीत हो, तो पृथ्वी पर राजसत्ता का परिवर्तन सूचित होता है।

Verse 13

अर्के श्यामे कीटभयं भस्माभे राष्ट्रजं तथा । छिद्रे ऽर्कमण्डले दृष्टं महाराजविनाशनम् ॥ १३ ॥

यदि सूर्य श्याम (काला) दिखाई दे, तो कीट-भय (कीटों का प्रकोप) समझना चाहिए; और यदि वह भस्म-वर्ण हो, तो राज्य के भीतर से उत्पन्न आपदा का संकेत है। सूर्य-मण्डल में छिद्र दिखे तो महान् राजा का विनाश होता है।

Verse 14

घटाकृतिः क्षुद्भयकृत्पुरहा तोरणाकृतिः । छत्राकृते देशहतिः खंडभानुनृपांतकृत् ॥ १४ ॥

घट (घड़े) के आकार का निमित्त क्षुधा-भय (अकाल) लाता है; और नगर के ऊपर दिखाई देने वाला निमित्त नगर-नाश करता है। तोरण (द्वार-मेहराब) के आकार का निमित्त विनाशकारी है; छत्र के आकार का निमित्त देश-हानि करता है। सूर्य खण्डित दिखे तो राजा का अंत होता है।

Verse 15

उदयास्तमये काले विद्युदुल्काशनिर्यदि । तदा नृपवधो ज्ञेयस्त्वथवा राजविग्रहः ॥ १५ ॥

उदय या अस्त के समय यदि बिजली, उल्का या वज्रपात दिखाई दे, तो उसे राजा के वध का संकेत समझना चाहिए—अथवा राजाओं में परस्पर कलह और वैर का।

Verse 16

पक्षं पक्षार्धमर्केन्दु परिविष्टावहर्निशम् । राजानमन्यं कुरुतो लोहिताम्बुदयास्तगौ ॥ १६ ॥

सूर्य और चन्द्रमा अपने-अपने नियत पथ पर चलते हुए पक्ष, पक्षार्ध तथा दिन-रात के रूप में काल-मान उत्पन्न करते हैं। और अपने लालिमा-युक्त उदय-अस्त से वे राजाओं की परम्परा, अर्थात् राज्य-परिवर्तन की क्रमिक धारा भी प्रकट करते हैं।

Verse 17

उदयास्तमये भानुराच्छिन्नः शस्त्रसन्निभैः । घनैर्युद्धं खरोष्ष्ट्राद्यैः पापरूपैर्भयप्रदम् ॥ १७ ॥

उदय और अस्त के समय सूर्य शस्त्र-सदृश मेघों से मानो छिन्न-भिन्न सा ढका हुआ दिखाई देता है। तब वह दृश्य पापरूप गधे-ऊँट आदि भयावह आकृतियों द्वारा किए गए युद्ध के समान डर उत्पन्न करता है।

Verse 18

याम्य शृङ्गोन्नतश्चन्द्रः शुभदो मीनमेषयोः । सौम्य शृङ्गोन्नतः श्रेष्ठो नृयुङ्मकरयोस्तथा ॥ १८ ॥

जब चन्द्रमा ‘दक्षिण शृंग’ पर उन्नत होता है, तब वह मीन और मेष के लिए शुभदायक होता है। और जब वह ‘उत्तर शृंग’ पर उन्नत होता है, तब कुम्भ और मकर के लिए भी श्रेष्ठ फलदायक माना जाता है।

Verse 19

घटोक्ष्णस्तु समः कर्कचापयोः शरसन्निभः । चापवत्कौर्महर्योश्च शूलवत्तुलकर्कयोः ॥ १९ ॥

‘घटोक्ष्ण’ नामक चिह्न कर्क और धनु के लिए समान है और बाण के समान प्रतीत होता है। मकर और सिंह के लिए वह धनुष के समान, तथा तुला और कर्क के लिए शूल के समान कहा गया है।

Verse 20

विपरीतोदितश्चन्द्रो दुर्भिक्षकलहप्रदः । आषाढद्वयमूलेन्द्र धिष्ण्यानां याम्यगः शशी ॥ २० ॥

जब चन्द्रमा विपरीत (अशुभ) प्रकार से उदित होता है, तब वह दुर्भिक्ष और कलह का कारण बनता है। और नक्षत्रों में—विशेषतः पूर्वाषाढ़ा-उत्तराषाढ़ा, मूल और ज्येष्ठा में—जब शशि दक्षिण मार्ग में होता है, तब भी वह प्रतिकूल फल देता है।

Verse 21

अग्निप्रदस्तेयचरवनसर्पविनाशकृत् । विशाखा मित्रयोर्याम्यपार्श्वगः पापगः शशी ॥ २१ ॥

विशाखा नक्षत्र में स्थित चन्द्रमा अग्निदाह, चोरी, चलने वाले जीव, वन तथा सर्पों के विनाश का कारण कहा गया है। तब वह दोनों मित्रों के दक्षिण पार्श्व में होकर पापकारी और अशुभ माना जाता है।

Verse 22

मध्यमः पितृदैवत्ये द्विदैवे सौम्यगः शशी । अप्राप्यपौष्णभाद्रौद्रामदुक्षाविशशी शुभः ॥ २२ ॥

मध्यम बल वाला चन्द्रमा यदि पितृ-दैवत्य नक्षत्र में और द्विदैव (द्विस्वभाव) राशि में स्थित हो, तो वह सौम्य और शुभ होता है। पौष्ण, भद्र या रौद्र गणों तक न पहुँचकर वह पीड़ा से रहित होकर अनुकूल रहता है।

Verse 23

मध्यगो द्वारदक्षाणि अतीत्य नववासवात् । यमेंद्रा हीशनोयेशमरुतश्चार्द्धतारकाः ॥ २३ ॥

मध्य मार्ग से चलने वाला (चन्द्र) दक्षिण द्वारों को पार करके नव वासवों से आगे निकल जाता है। वहाँ यम और इन्द्र, ईशान और यश, मरुतगण तथा अर्ध-तारकाएँ (अर्धनक्षत्र) मिलते हैं।

Verse 24

ध्रुवादिति द्विदैवाः स्युरध्यर्द्धांश्चापराः समाः । याम्यशृंगोन्नतो नेष्टः शुभः शुक्ले पिपीलिका ॥ २४ ॥

ध्रुव से आगे कुछ (लक्षण) ‘द्विदैव’ कहे गए हैं और कुछ का फल डेढ़ भाग के समान काल में मिलता है। जिसका दाहिना सींग उठा हो वह वांछनीय नहीं; पर शुक्ल पक्ष में दिखाई देने वाली चींटी शुभ है।

Verse 25

कार्यहानिः कार्यवृद्धिर्हानिर्वृद्धिर्यथाक्रमम् । सुभिक्षकृद्विशालेंदुरविशालोघनाशनः ॥ २५ ॥

क्रमानुसार यह कार्यों की हानि और कार्यों की वृद्धि करता है; वैसे ही घटाव और बढ़ाव भी देता है। यह सुभिक्ष (अन्न-समृद्धि) कराता है, चन्द्र को विशाल दिखाता है, विशाल को अविशाल कर देता है और घने समूहों (जैसे मेघ) का नाश करता है।

Verse 26

अधोमुखे शस्त्रभयं कलहो दंडसन्निभे । कुजाद्यैर्निहते शृंगे मंडले वा यथाक्रमम् ॥ २६ ॥

चिह्न यदि अधोमुख हो तो शस्त्रों का भय सूचित होता है; और यदि वह दंड के समान हो तो कलह होता है। यदि शृंग या मंडल पर कुज आदि ग्रह क्रम से प्रहार करें, तो उसी क्रम से फल प्रकट होते हैं।

Verse 27

क्षेमाद्यं वृष्टिभूपालजननाशः प्रजायते । सत्याष्टनवमर्क्षेषु सोदयाद्वक्रिमे कुजे ॥ २७ ॥

सत्यादि नक्षत्रों में, आठवें-नवें (भाग) में, जब कुज वक्र होकर उदय होता है, तब क्षेम-कल्याण, वर्षा, तथा राजाओं और जनों का नाश भी होता है।

Verse 28

तद्वक्रमुष्णं संज्ञं स्यात्प्रजापीडाग्निसंभवः । दशमैकादशे ऋक्षे द्वादशर्वाग्रतीपयः ॥ २८ ॥

वह योग ‘वक्रमुष्ण’ नाम से प्रसिद्ध है, जो प्रजाओं को पीड़ित करने वाली अग्नि से उत्पन्न होता है। यह दशम और एकादश ऋक्ष में जाना जाता है; और द्वादश (राशियाँ) अग्राभिमुख बिंदुओं वाली कही गई हैं।

Verse 29

कूक्रं वक्रमुखं ज्ञेयं सस्यवृष्टिविनाशकृत् । कुजे त्रयोदशे ऋक्षे वक्रिते वा चतुर्दशे ॥ २९ ॥

‘कूक्र’ नामक अपशकुन को ‘वक्रमुख’ जानना चाहिए; यह सस्य और वर्षा का विनाश करता है। यह तब होता है जब मंगलवार को चंद्रमा त्रयोदश ऋक्ष में हो, या वक्रिता दशा में चतुर्दश ऋक्ष में हो।

Verse 30

बालस्यचक्रं तत्तस्मिन्सस्यवृष्टिविनाशनम् । पंचदशे षोडशर्क्षे वक्रे स्याद्रुधिराननम् ॥ ३० ॥

‘बालस्यचक्र’ नामक शकुन—उसके प्रकट होने पर सस्य और वर्षा का विनाश होता है। पंद्रहवें या सोलहवें ऋक्ष में ग्रह वक्र हो तो उसे ‘रुधिरानन’ कहा जाता है, जो अशुभ है।

Verse 31

दुर्भिक्षं क्षुद्भयं रोगान्करोति क्षितिनंदनः । अष्टादशे सप्तदशे तद्वक्रं मुशलाह्वयम् ॥ ३१ ॥

हे क्षितिनन्दन (राजन्), यह दुर्भिक्ष, भूख का भय और रोग उत्पन्न करता है। अठारहवें में, सत्रहवें स्थान पर, इसका वक्र अशुभ योग ‘मुशल’ कहलाता है॥

Verse 32

दुर्भिक्षं धनधान्यादिनाशने भयकृत् सदा । फाल्गुन्योरुदितो भौमो वैश्वदेवे प्रतीपगः ॥ ३२ ॥

जब भौम (मंगल) दोनों फाल्गुनियों में उदित होकर वैश्वदेव में प्रतिकूल गति करता है, तब वह सदा भय उत्पन्न करता है—दुर्भिक्ष तथा धन-धान्य आदि का नाश करता है॥

Verse 33

अस्तगश्चतुरास्यार्क्षे लोकत्रयविनाशकृत् । उदितः श्रवणे पुष्ये वक्तृगोश्वनहानिदः ॥ ३३ ॥

यदि (ग्रह) चतुरास्य नक्षत्र में अस्त हो, तो वह त्रिलोकी के विनाश का कारण बनता है। और यदि श्रवण या पुष्य में उदित हो, तो वक्ता को हानि तथा गौ, अश्व और मनुष्यों को पीड़ा देता है॥

Verse 34

यद्दिग्गोऽभ्युदितो भौमस्तद्दिग्भूपभयप्रदः । मघामध्यगतो भौमस्तत्र चैव प्रतीपगः ॥ ३४ ॥

जिस दिशा में भौम (मंगल) उदित होता है, उसी दिशा के राजा को भय देता है। और जब भौम मघा नक्षत्र के मध्य में पहुँचता है, तब वहाँ भी प्रतिकूल (अशुभ) हो जाता है॥

Verse 35

अवृष्टिशस्त्रभयदः पीड्यं देवा नृपांतकृत् । पितृद्विदैवधातॄणां भिद्यन्ते गंडतारकाः ॥ ३५ ॥

देवगण पीड़ित होने पर अनावृष्टि और शस्त्रों का भय देते हैं तथा राजाओं का अंत कराते हैं। और पितृ-विरोधियों तथा दैव-धर्म के द्वेषियों के लिए गण्ड-तारक (अशुभ) लक्षण फूट पड़ते हैं॥

Verse 36

दुर्भिक्षं मरणं रोगं करोति क्षितिजस्तदा । त्रिषूत्तरासु रोहिण्यां नैरृते श्रवणे मृगे ॥ ३६ ॥

तब भूमिपुत्र भौम (मंगल) दुर्भिक्ष, मरण और रोग उत्पन्न करता है—जब वह तीनों उत्तराओं में, रोहिणी में, नैऋत्य दिशा में तथा श्रवण और मृगशीर्ष नक्षत्रों में स्थित हो।

Verse 37

अवृष्टिदश्चरन्भौमो दक्षिणे रोहिणीस्थितः । भूमिजः सर्वधिष्ण्यानामुदगामी शुभप्रदः ॥ ३७ ॥

रोहिणी में स्थित होकर यदि भौम (मंगल) दक्षिण मार्ग से विचरे, तो वह अनावृष्टि का सूचक होता है; परन्तु वही भूमिज जब अपने सब धिष्ण्यों में उत्तरगामी हो, तब शुभ फल देता है।

Verse 38

याम्यगोऽनिष्टफलदो भवेद्भेदकरो नृणाम् । विनोत्पातेन शशिनः कदाचिन्नोदयं व्रजेत् ॥ ३८ ॥

जब चन्द्रमा दक्षिणगामी होता है, तब वह अनिष्ट फल देता और लोगों में फूट-कलह कराता है; और किसी उत्पात (अपशकुन) के बिना चन्द्रमा का उदय कभी होता ही नहीं।

Verse 39

अनावृष्टाग्निभयकृदनर्थनृपविग्रहः । वसुवैष्णवविश्वेन्दुधातृभेषु चरन्बुधः ॥ ३९ ॥

बुध जब वसु, वैष्णव, विश्वे, इन्दु, धातृ और भ नक्षत्र-गणों में विचरता है, तब वह अनावृष्टि, अग्निभय आदि आपदाएँ तथा राजाओं में अनर्थ और विग्रह उत्पन्न करता है।

Verse 40

भिनत्ति यदि तत्तारां बाधावृष्टिभयंकरः । आद्रा र्दिपितृभांतेषु दृश्यते यदि चन्द्र जः ॥ ४० ॥

यदि बाधा और विनाशकारी वृष्टि का भय देने वाला वह ग्रह उसी तारा को भेद दे, और यदि चन्द्रज (बुध) आर्द्रा, ऋतु-नक्षत्रों या पितृ-नक्षत्रों में दिखाई दे, तो यह योग क्लेशकारी दशा और वर्षा-जन्य उपद्रव का संकेत है।

Verse 41

तदा दुर्भिक्षकलहरोगानावृष्टिभीतिकृत् । हस्तादिषट्सु तारासु विचरन्निन्दुनंदनः ॥ ४१ ॥

तब इन्दुनन्दन (बुध) जब हस्त आदि छह नक्षत्रों में विचरता है, तो दुर्भिक्ष, कलह, रोग और अनावृष्टि से उत्पन्न भय का कारण बनता है।

Verse 42

क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं कुरुते रोगनाशनम् । अहिर्बुध्न्यार्यमाग्नेययाम्यभेषु चरन्बुधः ॥ ४२ ॥

बुध जब अहिर्बुध्न्य, आर्यमा, आग्नेय और याम्य नक्षत्रों में चलता है, तब वह क्षेम, सुभिक्ष और आरोग्य देता है तथा रोगों का नाश करता है।

Verse 43

भिषक्तरंगवाणिज्यवृत्तीनां नाशकृत्तदा । पूर्वात्रयेचरन्सौम्यो योगतारां भिनत्ति चेत् ॥ ४३ ॥

उस समय वैद्यक, समुद्र-यात्रा और वाणिज्य की वृत्तियों का नाशक होता है—यदि सौम्य (बुध) पूर्व त्रय नक्षत्रों में चलते हुए योग-तारा को भेद दे।

Verse 44

क्षुच्छस्त्रानलचौरेभ्यो भयदः प्राणिनां तदा । याम्याग्निधातृवायव्यधिष्ण्येषु प्राकृता गतिः ॥ ४४ ॥

तब बुध प्राणियों को भूख, शस्त्र, अग्नि और चोरों से भय देने वाला होता है; और सामान्य (प्राकृत) गति यम, अग्नि, धातृ और वायु के अधिष्ठानों की ओर जाती है।

Verse 45

रौद्रे न्दुसार्पपित्र् येषु ज्ञेया मिश्राह्वया गतिः । भाग्यार्यमेज्यादितिषु संक्षिप्ता गतिरुच्यते ॥ ४५ ॥

रौद्र, इन्दु, सार्प और पितृय नामक विभागों में ‘मिश्र’ कहलाने वाली गति जाननी चाहिए; और भाग्य, आर्यमा, एज्य तथा अदिति में ‘संक्षिप्ता’ गति कही गई है।

Verse 46

गतिस्तीक्ष्णाजचरणाहिर्बुघ्न्यभाश्रिभेषुया । योमातिकातिविश्वांबुमूलमत्स्यैन्यजस्य च ॥ ४६ ॥

‘गति’, ‘तीक्ष्णा’, ‘अज’, ‘चरण’, ‘अहिर’, ‘बुघ्न्या’, ‘भा’, ‘श्री’ और ‘भेषुया’; तथा ‘यो’, ‘मातिका’, ‘अति’, ‘विश्वाम्बु’, ‘मूल’, ‘मत्स्य’ और ‘एन्यज’—ये सब परमात्मा के ध्यान करने योग्य गूढ़ नाम हैं।

Verse 47

घोरा गतिर्हरित्वाष्ट्रवसुवारुणभेषु च । इंद्रा ग्निमित्रमार्तंडभेषु पापाह्वयागतिः ॥ ४७ ॥

हरित, त्वाष्ट्र, वसु और वारुण—इन रूप-नामों में गति भयानक कही गई है; और इन्द्राग्नि, मित्र तथा मार्तण्ड के रूपों में वह ‘पापाह्वया’ अर्थात् पाप-नाम वाली अशुभ गति कहलाती है।

Verse 48

प्राकृताद्यासु गतिषु ह्युदितोऽस्तमियोपिवा । यावंत्येव दिनान्येष दृश्यस्तावत्यदृश्यगः ॥ ४८ ॥

प्राकृत आदि अनेक गतियों में यह जीव—उदयमान हो या अस्तमान कहा जाए—जितने दिनों तक दृश्य रहता है, उतने ही समय तक वह अदृश्य अवस्था में भी गमन करता है।

Verse 49

चत्वारिंशत्क्रमात्र्त्रिशद्र वींदू भूसुतो नव । पंचदशैकादशभिर्दिवसैः शशिनंदनः ॥ ४९ ॥

क्रम से (सूर्य-चन्द्र की) गति तीस और चालीस दिनों में होती है; भूसुत मंगल नौ दिनों में; और शशिनन्दन बुध पंद्रह तथा ग्यारह दिनों में अपनी गति पूर्ण करता है।

Verse 50

प्राकृतायां गतः सौम्यः क्षेमारोग्यसुभिक्षकृत् । मिश्रसक्षिप्तयोर्मध्ये फलदोऽन्यासु वृष्टिदः 1. ॥ ५० ॥

जब सौम्य ग्रह (बुध) प्राकृत/सामान्य गति में होता है, तब वह क्षेम, आरोग्य और सुभिक्ष (अन्न-समृद्धि) देता है। मिश्र या पीड़ित अवस्था में वह मध्यम फल देता है; और अन्य शुभ अवस्थाओं में वह वर्षा का दाता बनता है।

Verse 51

वैशाखे श्रावणे पौषे आषाढेऽभ्युदितो बुधः । जगतां पापफलदस्त्वितरेषु शुभप्रदः ॥ ५१ ॥

वैशाख, श्रावण, पौष और आषाढ़ में बुध का उदय जगत् को पापफल देने वाला कहा गया है; अन्य महीनों में उसका उदय शुभफल प्रदान करता है।

Verse 52

इषोर्जमासयोः शस्त्रदुर्भिक्षाग्निभयप्रदः । उदितश्चंद्र जः श्रेष्ठो रजतस्फटिकोपमः ॥ ५२ ॥

इष और ऊर्ज (आश्विन-कार्तिक) के महीनों में यह शस्त्र, दुर्भिक्ष और अग्नि का भय उत्पन्न करता है। पर चन्द्रज का उदय परम शुभ है—रजत और स्फटिक के समान दीप्त।

Verse 53

द्विभाटजोदिमास्तस्य पंचमैकादशास्त्रिभात् । यन्नक्षत्रोदितो जीवस्तन्नक्षत्राख्यवत्सरः ॥ ५३ ॥

उस चक्र के मास नक्षत्र-भागों के अनुसार—दो, पाँच, ग्यारह और तीन—गिने जाते हैं। जिस नक्षत्र में बृहस्पति (जीव) उदित होता है, वर्ष उसी नक्षत्र के नाम से प्रसिद्ध होता है।

Verse 54

कार्तिको मार्गशीर्षश्च नृणां दुष्टफलप्रदः । शुभप्रदौ पौषमाघौ मध्यमौ फाल्गुनो मधुः ॥ ५४ ॥

मनुष्यों के लिए कार्तिक और मार्गशीर्ष दुष्टफल देने वाले कहे गए हैं। पौष और माघ शुभफलदायक हैं; तथा फाल्गुन और मधु (चैत्र) मध्यम फल देने वाले हैं।

Verse 55

माधवः शुभदो ज्येष्ठो नृणां मध्यफलप्रदः । शुचिर्मध्यो नभः श्रेष्ठो भाद्र ः श्रेष्ठः क्वचिन्नरः ॥ ५५ ॥

माधव मास शुभदायक है; ज्येष्ठ भी कल्याणकारी है; और मनुष्यों के लिए ‘मध्य’ काल मध्यम फल देता है। शुचि ‘मध्य’ है, नभः श्रेष्ठ है; और भाद्र कुछ लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है।

Verse 56

अतिश्रेष्ठ इषः प्रोक्तो मासानां फलमीदृशम् । सौम्ये भागे चरन्भानां क्षेमारोग्यसुभिक्षकृत् ॥ ५६ ॥

इष नामक मास को अत्यन्त श्रेष्ठ कहा गया है; महीनों में व्रत-उपवास आदि का ऐसा ही फल बताया गया है। जब सूर्य सौम्य भाग में चलता है, तब वह कल्याण, निरोगता और सुभिक्ष प्रदान करता है।

Verse 57

विपरीतो गुरुर्याम्ये मध्ये चरति मध्यमम् । पीताग्निश्यामहरितरक्तवणेगिराः क्रमात् ॥ ५७ ॥

गुरु (बृहस्पति) जब वक्री होता है, तब दक्षिण दिशा के क्षेत्र में मध्यम गति से चलता है। क्रमशः उसका वर्ण और तेज पीला, अग्निवत्, श्याम, हरित और रक्त दिखाई देता है।

Verse 58

व्याध्यग्निचौरशस्त्रास्त्रभयदः प्राणिनां भवेत् । अनावृष्टिं भूम्ननिभः करोति सुरपूजितः ॥ ५८ ॥

वह प्राणियों के लिए रोग, अग्नि, चोर, शस्त्र और अस्त्र के द्वारा भय का कारण बनता है। देवताओं से पूजित होते हुए भी वह महान् पृथ्वी पर अनावृष्टि (वर्षा-अभाव) कर देता है।

Verse 59

दिवादृष्टो नृपवध्यामयंवाराष्ट्रनाशनम् । संवत्सरशरीरं स्यात्कृत्तिका रोहिणी तथा ॥ ५९ ॥

यदि वह दिन में दिखाई दे, तो राजा का वध, भयंकर महामारी अथवा राज्य का नाश सूचित होता है। और उस (लक्षण) को संवत्सर-शरीर वाला समझना चाहिए; तथा वह कृत्तिका और रोहिणी नक्षत्रों से भी सम्बद्ध है।

Verse 60

नाभिस्त्वापाठयुगलमाद्री हृत्कुसुमं मघा । दुर्भिक्षाग्निमरुद्भीतिः शरीरं क्रूरपीडिते ॥ ६० ॥

क्रूर पीड़ा से ग्रस्त व्यक्ति के लिए—नाभि ‘आपाठ’ नामक युगल से, हृदय ‘आद्री’ से, और ‘कुसुम’ (प्राण-केंद्र) ‘मघा’ से सम्बद्ध कहा गया है। ऐसे में शरीर दुर्भिक्ष, अग्नि और प्रचण्ड पवन के भय से संतप्त रहता है।

Verse 61

नाभ्यां क्षुत्तृड्भयं पुष्ये सम्यङ्मूलफलक्षयः । हृदयेशस्य निधनं शुभं स्यात्संयुतैः शुभैः ॥ ६१ ॥

नाभि से उठे निमित्त में भूख‑प्यास से भय होता है; पुष्य नक्षत्र में यह मूल‑फल के उचित क्षय का संकेत है। हृदय‑प्रदेश का निमित्त गृहस्वामी के निधन का सूचक है; पर शुभ लक्षणों के साथ हो तो फल शुभ भी हो सकता है।

Verse 62

शस्यवृद्धिः प्रजारोग्यं युद्धं जीवात्यवर्षणम् । इति द्विजातिमध्यां तु गोनृपस्त्रीसुखं महत् ॥ ६२ ॥

फसलों की वृद्धि होगी, प्रजा निरोग रहेगी, युद्ध भी होगा और प्राणियों के लिए पर्याप्त वर्षा होगी। इस प्रकार द्विज समुदाय में गौ‑सम्पदा, राजा की रक्षा और गृहिणी‑सुख से महान् आनंद होगा।

Verse 63

निःस्वनावृष्टिफणिभिर्वृष्टिः स्वास्थ्यं महोत्सवः । महार्घमपि संपत्तिर्देशनाशोऽतिवर्षणम् ॥ ६३ ॥

अशुभ संकेतों—असामान्य निस्तब्धता और सर्पों के प्रकट होने—के साथ वर्षा हो, तब भी स्वास्थ्य और बड़े उत्सव हो सकते हैं; महँगी‑बहुमूल्य समृद्धि भी मिलती है। पर अतिवृष्टि से देश का विनाश होता है।

Verse 64

अवैरं रोगमभयं रोगभीः सस्यवर्षणे । रोगो धान्यं नभोऽदृष्टिमघाद्यृक्षगते गुरौ ॥ ६४ ॥

जब गुरु (बृहस्पति) मघा आदि नक्षत्रों में स्थित हो, तब वैर शान्त होता है, रोग मिटते हैं और भय नहीं रहता। फसलों हेतु वर्षा होती है, धान्य उत्पन्न होता है; पर मेघाच्छादन से आकाश का दर्शन मंद पड़ता है।

Verse 65

सौम्यमध्यमयाम्येषु मार्गेषु वीथिकात्रयम् । शुक्रस्य दस्रभाज्ज्ञेयं पर्यायैश्च त्रिभिस्त्रिभिः ॥ ६५ ॥

उत्तर, मध्य और दक्षिण—इन तीन आकाशीय मार्गों में वीथिकाओं का त्रय है। यह समूह शुक्र से सम्बद्ध समझना चाहिए, और प्रत्येक के तीन‑तीन पर्याय नाम भी प्रसिद्ध हैं।

Verse 66

नागेभैरावताश्चैव वृषभोष्ट्र्रखराह्वयाः । मृगांजदहनाख्याः स्युर्याम्यांता वीथयो नव ॥ ६६ ॥

दक्षिण दिशा में समाप्त होने वाली नौ वीथियाँ हैं—नाग और भैरवत; वृषभ, ऊँट और गधे के नाम वाली; तथा मृग, अञ्ज और दहन नामक।

Verse 67

सौम्यमार्गे च तिसृषु चरन्वीथिषु भार्गवः । धान्यार्थवृष्टिसस्यानां परिपूर्तिं करोति हि ॥ ६७ ॥

सौम्य मार्ग में और तीन चरन-वीथियों में भ्रमण करता हुआ भार्गव (शुक्र) निश्चय ही धान्य, अर्थ, वर्षा और सस्यों की परिपूर्ति करता है।

Verse 68

मध्मार्गे च तिसृषु सर्वमप्यधमं फलम् । पूर्वस्यां दिशि मेघस्तु शुभदः पितृपंचके ॥ ६८ ॥

मध्यमार्ग में और तीन स्थितियों में (लक्षण होने पर) फल सर्वथा अधम होता है; परन्तु पितृ-पंचक में पूर्व दिशा का मेघ शुभफलदायक होता है।

Verse 69

स्वातित्रये पश्चिमायां तस्यां शुक्रस्तथाविधः । विपरीते त्वनावृष्टिर्वृष्टिकृद्बुधसंयुतः ॥ ६९ ॥

स्वाती-त्रय के समय यदि वह पश्चिम दिशा में हो, तो शुक्र भी वैसी ही अवस्था वाला माना जाता है; विपरीत होने पर अनावृष्टि होती है, पर बुध के संयोग से वह वर्षा कराने वाला बनता है।

Verse 70

कृष्णाष्टम्यां चतुर्दश्याममायां च यदा सितः । उदयास्तमनं याति तदा जलमयी मही ॥ ७० ॥

कृष्णाष्टमी, चतुर्दशी और अमावस्या-रात्रि में जब ‘सित’ उदय और अस्त को प्राप्त होता है, तब पृथ्वी मानो जलमयी हो जाती है।

Verse 71

मिथः सप्तमराशिस्थौ पश्चात्प्राग्वीथिसंस्थितौ । गुरुशुक्रावनावृष्टिदुर्भिक्षसमरप्रदौ ॥ ७१ ॥

जब गुरु और शुक्र परस्पर सप्तम राशि में हों और पश्चिम तथा पूर्व मार्ग में स्थित हों, तब वे अनावृष्टि, दुर्भिक्ष और युद्ध के कारण बनते हैं।

Verse 72

कुजज्ञजीवरविजाः शुक्रस्याग्रेसरा यदि । युद्धातिवायुर्दुर्भिक्षजलनाशकरामताः ॥ ७२ ॥

यदि मंगल, बुध, गुरु और सूर्य शुक्र से आगे चलें, तो वे युद्ध, प्रचण्ड वायु, दुर्भिक्ष तथा जल-नाश का संकेत देते हैं और महान पीड़ा पहुँचाते हैं।

Verse 73

जलमित्रार्यमाहींद्र नक्षत्रेषु सुभिक्षकृत् । सच्छस्त्रावृष्टिदो मूलेऽहिर्बुध्न्यांत्यभयोर्भयम् ॥ ७३ ॥

जल, मित्र, आर्यमा और महीन्द्र नक्षत्रों में यह सुभिक्ष और समृद्धि करता है। मूल में उत्तम शस्त्र और वर्षा देता है; पर आहिर्बुध्न्य तथा अंतिम दो नक्षत्रों में भय उत्पन्न करता है।

Verse 74

श्रवणानिलहस्ताद्रा र्भरणीभाग्यभेषु च । चरञ्छनैश्चरो नॄणां सुभिक्षारोग्यसस्यकृत् ॥ ७४ ॥

जब शनैश्चर श्रवण, अनिल, हस्त, आर्द्रा, भरणी, भाग्य और भेषु नक्षत्रों में विचरता है, तब वह मनुष्यों के लिए सुभिक्ष, आरोग्य और सस्य-समृद्धि का कर्ता होता है।

Verse 75

मुखे चैकं गुदे द्वे च त्रीणि के नयने द्वयम् । हृदये पञ्च ऋक्षाणि वामहस्ते चतुष्टयम् ॥ ७५ ॥

मुख में एक, गुदा में दो, कानों में तीन, नेत्रों में दो (पवित्र अंश) स्थापित किए जाते हैं। हृदय में पाँच ऋक्ष और बाएँ हाथ में चार का समूह रखा जाता है।

Verse 76

वामपादे तथा त्रीणि दक्षिणे त्रीणि भानि च । चत्वारि दक्षिणे हस्ते जन्मभाद्र विजस्थितिः ॥ ७६ ॥

बाएँ पाँव में तीन और दाएँ में भी तीन शुभ-चिह्न हैं; तथा दाएँ हाथ में चार। यह योग उत्तम जन्म और श्रेष्ठ, ब्राह्मण-सदृश पद का सूचक है।

Verse 77

रोगो लाभस्तथा हानिर्लाभः सौख्यं च बंधनम् । आयासः श्रेष्ठयात्रा च धनलाभः क्रमात्फलम् ॥ ७७ ॥

क्रमशः फल ये हैं—रोग, लाभ, फिर हानि; पुनः लाभ, सुख, बंधन; परिश्रम, श्रेष्ठ यात्रा, और अंत में धन-लाभ।

Verse 78

बहुधारविजस्त्वेतद्वक्रगः फलमीदृशम् । करोत्येव समः साम्यं शीघ्रगेषूत्क्रमात् फलम् ॥ ७८ ॥

जो अनेक धाराओं से उत्पन्न होकर वक्र गति से चलता है, वह ऐसा ही फल देता है। पर जो सम और स्थिर है, वह समता उत्पन्न करता है; और जो शीघ्रगामी हैं, उनमें फल उनकी तीव्र गति से शीघ्र पकता है।

Verse 79

विष्णुचक्रोत्कृत्तशिराः पङ्गुः पीयूषपानतः । अमृत्युतां गतस्तत्र खेटत्वे परिकल्पितः ॥ ७९ ॥

वहाँ विष्णु के चक्र से जिसका शिर कट गया था, वह पंगु अमृत-पान से अमृतत्व को प्राप्त हुआ; और फिर उसे खेट—आकाशीय ग्रह-रूप—पद में नियोजित किया गया।

Verse 80

वरणधातुरर्केन्दू तुदते सर्वपर्वणि । विक्षेपावनतेर्वंगाद्रा हुर्दूरगतस्तयोः ॥ ८० ॥

‘वरण’ धातु ‘अर्क’ और ‘इन्दु’—इन समासों को प्रत्येक संधि-स्थान पर आघात करती है; और ‘विक्षेप’ तथा ‘अवनति’ के कारण कहा गया है कि ‘वङ्गा’ और ‘अद्रा’ उनसे दूर हो जाते हैं।

Verse 81

षण्मासवृद्ध्या ग्रहणं शोधयेद्र विचंद्र योः । पर्वेशास्तु तथा सत्यदेवा रव्यादितः क्रमात् ॥ ८१ ॥

छह मास की वृद्धि (संशोधन) जोड़कर सूर्य और चन्द्र ग्रहण की गणना कर उनकी शुद्धि करनी चाहिए। इसी प्रकार पर्व-दिवसों के अधिपति सत्यदेवों सहित, सूर्य से आरम्भ कर क्रम से निश्चित किए जाएँ।

Verse 82

ब्रह्मेन्द्विन्द्र धनाधीशवरुणाग्नियमाह्वयाः । पशुसस्यद्विजातीनां वृद्धिर्ब्राह्मे तु पर्वणि ॥ ८२ ॥

ब्रह्मा, चन्द्र, इन्द्र, धनाधीश (कुबेर), वरुण और अग्नि का आवाहन करना चाहिए। ब्राह्म-पर्व के अवसर पर पशु, सस्य (अन्न-फसल) और द्विजों की वृद्धि होती है।

Verse 83

तद्वदेव फलं सौम्ये श्लेष्मपीडा च पर्वणि । विरोधो भूभुजां दुःखमैंद्रे सस्यविनाशनम् ॥ ८३ ॥

हे सौम्य! सौम्य-प्रभाव में भी वैसा ही फल होता है; और पर्व के समय कफ-पीड़ा होती है। ऐन्द्र-प्रभाव में राजाओं का विरोध, दुःख तथा फसलों का नाश होता है।

Verse 84

धनिनां धनहानिः स्यात्कौबेरं धान्यवर्धनम् । नृपाणामशिवं क्षेममितरेषां च वारुणे ॥ ८४ ॥

कौबेर-भाग में धनवानों की धन-हानि हो सकती है, पर धान्य की वृद्धि होती है। वारुण-भाग में राजाओं को अशुभ फल मिलता है, किंतु अन्य लोगों के लिए क्षेम और कल्याण होता है।

Verse 85

प्रवर्षणं सस्यवृद्धिः क्षेमं हौताशपर्वणि । अनावृष्टिः सस्यहानिर्दुर्भिक्षं याम्यपर्वणि ॥ ८५ ॥

हौताश (अग्नि) पर्व में प्रचुर वर्षा, फसलों की वृद्धि और सर्वत्र क्षेम होता है। पर याम्य (यम) पर्व में अनावृष्टि, फसल-हानि और दुर्भिक्ष (अकाल) होता है।

Verse 86

वेलाहीने सस्यहानिर्नृपाणां दारुणं रणम् । अतिवेले पुष्पहानिर्भयं सस्यविनाशनम् ॥ ८६ ॥

ऋतु के विलम्ब से फसल की हानि होती है और राजाओं के लिए भयंकर युद्ध-प्रकोप उठता है। और ऋतु के अत्यन्त शीघ्र आने पर पुष्प नष्ट होते हैं तथा फसल-विनाश का भय उत्पन्न होता है।

Verse 87

एकस्मिन्नेव मासे तु चंद्रा र्कग्रहणं यदा । विरोधो धरणीशानामर्थवृष्टिविनाशनम् ॥ ८७ ॥

जब एक ही मास में चन्द्र और सूर्य—दोनों के ग्रहण हों, तब पृथ्वी के शासकों में परस्पर विरोध होता है और धन-समृद्धि तथा वर्षा का नाश होता है।

Verse 88

ग्रस्तोदितावस्तमितौ नृपधान्यविनाशदौ । सर्वग्रस्ताविनेंदू तु क्षुद्व्याध्यग्निभयप्रदौ ॥ ८८ ॥

यदि सूर्य या चन्द्र ग्रहणग्रस्त होकर उदय या अस्त हों, तो वे राजा और धान्य का नाश करने वाले होते हैं। और यदि चन्द्र पूर्णतः ग्रस्त हो, तो वह क्षुधा, व्याधि और अग्नि का भय देता है।

Verse 89

सौम्यायने क्षत्रविप्रानितरां हन्ति दक्षिणे । द्विजातीं श्चक्रमाद्धंति राहुदृष्टोरगादितः ॥ ८९ ॥

उत्तरायण में (ग्रहण का) दोष क्षत्रियों और ब्राह्मणों को अधिक मारता है; दक्षिणायन में वह विशेषतः द्विजों को पीड़ित करता है। राहु-दृष्टि से प्रेरित सर्पादि शत्रु चक्रवत् उन्हें आघात करते हैं।

Verse 90

तथैव ग्रामभेदाः स्युर्मोक्षभेदास्तथा दश । नो शक्ता लक्षितुं देवाः किं पुनः प्राकृता जनाः ॥ ९० ॥

इसी प्रकार ग्रामों के भेद कहे गए हैं, और मोक्ष के भी दस भेद माने गए हैं। उन्हें देवता भी भलीभाँति नहीं जान पाते—फिर साधारण मनुष्य कैसे जान सकेंगे?

Verse 91

आनीय खेटान्गणितांस्तेषां वारं विचिंतयेत् । शुभाशुभान्यैः कालस्य ग्राहयामो हि लक्षणम् ॥ ९१ ॥

ग्रहों की गणितानुसार गति को देखकर उनके वार-प्रभाव का विचार करे; क्योंकि शुभ-अशुभ संकेतों से ही हम काल का लक्षण निश्चित करते हैं।

Verse 92

तस्मादन्वेषणीयं तत्कालज्ञानाय धीमता । उत्पातरूपाः केतूनामुदयास्तमया नृणाम् ॥ ९२ ॥

इसलिए बुद्धिमान को वर्तमान काल का स्वरूप जानने हेतु इनका अन्वेषण करना चाहिए—केतुओं के उत्पात-रूप, अर्थात् मनुष्यों पर प्रभाव डालने वाले उनके उदय और अस्त।

Verse 93

दिव्यांतरिक्षा भौमास्ते शुभाशुभफलप्रदाः । यज्ञध्वजास्त्रभवनरक्षवृद्धिंगजोपमाः ॥ ९३ ॥

ये संकेत दिव्य, आंतरिक्ष या भौम हो सकते हैं; वे शुभ या अशुभ फल देते हैं। वे गज के समान सामर्थ्यवान होकर यज्ञ, ध्वज, अस्त्र और भवनों की रक्षा व वृद्धि करते हैं।

Verse 94

स्तम्भशूलांकुशाकारा आंतरिक्षाः प्रकीर्तिताः । नक्षत्रसंस्थिता दिव्या भौमा ये भूमिसंस्थिताः ॥ ९४ ॥

आंतरिक्ष के (केतु-लक्षण) स्तम्भ, शूल और अंकुश के आकार वाले कहे गए हैं। जो नक्षत्रों में स्थित हों वे दिव्य हैं, और जो भूमि पर स्थित हों वे भौम कहलाते हैं।

Verse 95

एकोऽपि भिन्नरूपः स्याज्जंतुर्नाम शुभाय वै । यावन्तो दिवसान्केतुर्दृश्यते विविधात्मकः ॥ ९५ ॥

यदि कोई एक भी जीव विचित्र (भिन्न) रूप में दिखाई दे, तो वह भी शुभ-लक्षण माना जाता है। और जितने दिनों तक विविध रूप वाला केतु दिखाई दे, उतने ही दिनों तक उसका प्रभाव समझा जाता है।

Verse 96

तावान्मासैः फलं यच्छत्यष्टौ सारव्यवत्सरैः । ये दिव्याः केतवस्तेपि शश्वज्जीवफलप्रदाः ॥ ९६ ॥

उतने ही महीनों में वही फल मिलता है, जो अन्यथा आठ वर्षों में प्राप्त होता। वे दिव्य केतु भी जीवों को निरंतर फल प्रदान करते हैं।

Verse 97

ह्रस्वः स्निग्धः सुप्रसन्नः श्वेतकेतुः सुवृष्टिकृत् । क्षिप्रादस्तमयं याति दीर्घकेतुरवृष्टिकृत् ॥ ९७ ॥

छोटी, स्निग्ध, अत्यंत प्रसन्न व श्वेत पूँछ वाला केतु उत्तम वर्षा कराता है और शीघ्र अस्त हो जाता है; पर दीर्घ-केतु अनावृष्टि का कारण होता है।

Verse 98

अनिष्टदो धूमकेतुः शक्रचापसमप्रभः । द्वित्रिचतुःशूलरूपः स च राज्यांतकृन्मतः ॥ ९८ ॥

अनिष्ट देने वाला धूमकेतु, शक्र के धनुष (इंद्रधनुष) के समान प्रभा वाला, और दो-तीन-चार शूलों के रूप में दिखाई दे—वह राज्य के अंत का सूचक माना गया है।

Verse 99

मणिहारस्तु वर्णाभा दीप्तिमंतोऽकसूनवः । केतवश्चोदिताः पूर्वापरयोर्नृपहानिदाः ॥ ९९ ॥

मणि-हार के समान वर्ण-आभा वाले, दीप्तिमान सूर्य-पुत्र केतु जब उदित होकर पूर्व या पश्चिम दिशा में दिखाई दें, तब वे राजाओं की हानि के सूचक होते हैं।

Verse 100

वंसुकबिंबक्षितजच्छुकतुंडादिसन्निभाः । हुताशनोदितास्तेऽपि केतवः फलदाः स्मृताः 1. ॥ १०० ॥

बाँस के अंकुर, कुम्हड़े, मिट्टी के ढेले, तोते की चोंच आदि के समान प्रतीत होने वाले—अग्नि-दिशा से उदित होने पर भी—वे केतु फल देने वाले माने गए हैं।

Verse 101

भूसुता जलतैलाभा वर्तुलाः क्षुद्भयप्रदाः । सुभिक्षक्षेमदाः श्वेतकेतवः सोमसूनवः ॥ १०१ ॥

भूसुता जल या तेल-से दीखने वाले, गोलाकार होकर अकाल का भय उत्पन्न करते हैं; पर श्वेत-ध्वजधारी सोम-पुत्र सुभिक्ष और क्षेम प्रदान करते हैं।

Verse 102

पितामहात्मजः केतुस्त्रिवर्णस्त्रिदशान्वितः । ब्रह्मदंडाद्धूमकेतुः प्रजानामंतकृन्मतः ॥ १०२ ॥

पितामह (ब्रह्मा) का पुत्र केतु त्रिवर्ण और देवगणों से युक्त कहा गया है; ब्रह्मदण्ड से उत्पन्न वह ‘धूमकेतु’ प्रजाओं के अंत का कारण माना जाता है।

Verse 103

एशान्यां भार्गवसुताः श्वेतरूपास्त्वनिष्टदाः । अनिष्टदाः पंगुसुता विशिखाः कमकाह्वयाः ॥ १०३ ॥

ईशान कोण में भार्गव-पुत्र श्वेतरूप होकर अनिष्ट देते हैं; तथा पंगु-पुत्र ‘विशिख’—‘कमका’ नाम से प्रसिद्ध—वे भी अशुभ फल प्रदान करते हैं।

Verse 104

विकचाख्या गुरुसुता वेष्टा याम्ये स्थिता अपि । सूक्ष्माः शुक्ला बुधसुताश्चौररोगभयप्रदाः ॥ १०४ ॥

‘विकचा’ नामक—गुरु की पुत्री कही गई—और ‘वेष्टा’, यद्यपि दक्षिण दिशा में स्थित हैं, फिर भी सूक्ष्म और उज्ज्वल हैं; ये ‘बुध-पुत्र’ चोर और रोग का भय उत्पन्न करते हैं।

Verse 105

कुजात्मजाः कुंकुमाख्या रक्ताः शूलास्त्वनिष्टदाः । अग्निजा विश्वरूपाख्या अग्निवर्णाः सुखप्रदाः ॥ १०५ ॥

कुज (मंगल) के पुत्र ‘कुंकुम’ कहलाते हैं; वे रक्तवर्ण, शूल-सदृश और अनिष्टदायक हैं। अग्नि के पुत्र ‘विश्व रूप’ नामक, अग्निवर्ण होकर सुख प्रदान करते हैं।

Verse 106

अरुणाः श्यामलाकारा अर्कपुत्राश्च पापदाः । शुक्रजा ऋक्षसदृशाः केतवः शुभदायकाः ॥ १०६ ॥

अरुण श्याम वर्ण के हैं और सूर्य-पुत्र होने से पापफल देने वाले हैं। शुक्र से उत्पन्न केतु भालू-सदृश हैं और शुभ फल प्रदान करते हैं।

Verse 107

कृत्तिकासु भवो धूमकेतुर्नूनं प्रजाक्षयः । प्रासादवृक्षशैलेषु जातो राज्ञां विनाशकृत् ॥ १०७ ॥

कृत्तिका नक्षत्र में उत्पन्न धूमकेतु निश्चय ही प्रजा-क्षय का सूचक है। और यदि वह प्रासाद, वृक्ष या पर्वतों पर उदित हो, तो राजाओं के विनाश का कारण बनता है।

Verse 108

सुभिक्षकृत्कौमुदाख्यः केतुः कुमुदसन्निभः । आवर्तकेतुसंध्यायां शशिरो नेष्टदायकः ॥ १०८ ॥

कौमुद नामक केतु सुभिक्ष करने वाला है और कुमुद के समान श्वेत दीखता है। परंतु आवर्त-केतु से युक्त संध्या में चंद्रमा अनिष्ट फल देने वाला हो जाता है।

Verse 109

ब्रह्मदेवमनोर्मानं पित्र्यं सौरं च सावनम् । चांद्रमार्क्षं गुरोर्मानमिति मानानि वै नव ॥ १०९ ॥

ब्रह्मा का मान, देवों का मान, मनु का मान, पितृ-मान, सौर मान, सावन मान, चांद्र मान, आर्क्ष (नक्षत्र) मान और गुरु का मान—ये नौ प्रकार के मान हैं।

Verse 110

एतेषां नवमानानां व्यवहारोऽत्र पञ्चभिः । तेषां पृथक्पृथक्कार्यं वक्ष्यते व्यवहारतः ॥ ११० ॥

इन नौ मानों का व्यवहार यहाँ पाँच प्रकार से किया जाता है। उनके पृथक्-पृथक् कार्य व्यवहार के अनुसार अलग-अलग बताए जाएंगे।

Verse 111

ग्रहाणां निखिलश्चारो गृह्यते सौरमानतः । वृष्टेर्विधानं स्त्रीगर्भः सावनेनैव गृह्यते ॥ १११ ॥

ग्रहों की सम्पूर्ण गति का निर्धारण सौर-मान से होता है; परन्तु वर्षा का विधान और स्त्री-गर्भ की गणना केवल सावन (दैनिक) मान से ही निश्चित होती है।

Verse 112

प्रवर्षणां समे गर्भो नाक्षत्रेण प्रगृह्यते । यात्रोद्वाहव्रतक्षौरे तिथिवर्षेशनिर्णयः ॥ ११२ ॥

वर्षा-ऋतु के अनुसार वर्ष की गणना होने पर गर्भ (और उसकी गणना) नक्षत्र से निश्चित नहीं की जाती। यात्रा, विवाह, व्रत और चूड़ाकर्म में निर्णय तिथि तथा वर्षेश (वर्ष के अधिपति) से किया जाता है।

Verse 113

पर्ववास्तूपवासादि कृत्स्नं चांद्रे ण गृह्यते । गृह्यते गुरुमानेन प्रभवाद्यब्दलक्षणम् ॥ ११३ ॥

पर्व, वास्तु-संबंधी कर्म, उपवास आदि समस्त आचार चान्द्र-मान से ग्रहण किए जाते हैं। प्रभव आदि वर्षों के लक्षण गुरु-मान (बृहस्पति के मान) से निश्चित होते हैं।

Verse 114

तत्तन्मासैर्द्वादशभिस्तत्तदष्टौ भवेत्ततः । गुरुमध्यमचारेण षष्ट्यब्दाः प्रभवादयः ॥ ११४ ॥

उन-उन मासों के बारह होने से एक वर्ष होता है; और फिर उसी गणना से आगे आठ (वर्ष) बनते हैं। गुरु के मध्यम-गमन के अनुसार प्रभव आदि साठ वर्ष माने गए हैं।

Verse 115

प्रभवो विभवः शुक्लः प्रमोदोऽथ प्रजापतिः । अंगिराः श्रीमुखो भावो युवा धाता तथैव च ॥ ११५ ॥

प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद और प्रजापति; तथा अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा और धाता—ये (वर्ष-नाम) हैं।

Verse 116

ईश्वरो बहुधान्यश्च प्रमाथी विक्रमो वृषः । चित्रभानुस्सुभानुश्च तारणः पार्थिवोऽव्ययः ॥ ११६ ॥

वह परमेश्वर है; अन्न-समृद्धि का दाता; दुष्टों का दमनकर्ता; पराक्रम-स्वरूप; धर्म का वृषभ। वह चित्र-प्रभा और शुभ-तेज से दीप्त है; तारने वाला; पृथ्वी-लोक का अधिपति होकर भी अविनाशी है।

Verse 117

सर्वजित्सर्वधारी च विरोधी विकृतः खरः । नंदनो विजयश्चैव जयो मन्मथदुर्मुखौ ॥ ११७ ॥

वह सर्वजित्—सबको जीतने वाला; सर्वधारी—सबका धारक; अधर्म का विरोधी; अविकृत—अपरिवर्तित; खर—अडिग। वह नन्दन—आनन्द देने वाला; विजय; जय; मन्मथ का दमनकर्ता; और दुर्मुख—भयङ्कर मुख वाला है।

Verse 118

हेमलंबो विलंबश्च विकारी शार्वरी लवः । शुभकृच्छोभनः क्रोधी विश्वावसुपराभवौ ॥ ११८ ॥

वे नाम हैं—हेमलम्ब, विलम्ब, विकारी, शार्वरी, लव; शुभकृत्, शोभन, क्रोधी; विश्वावसु और पराभव—ये सब प्रभु के पावन नाम हैं।

Verse 119

प्लवंगः कीलकः सौम्यः सामाप्तश्च विरोधकृत् । र्प्भावी प्रमादी च आनन्दो राक्षसोऽनलः ॥ ११९ ॥

वे नाम हैं—प्लवंग, कीलक, सौम्य, सामाप्त और विरोधकृत्; तथा ऋभावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस और अनल—ये भी प्रभु के नाम कहे गए हैं।

Verse 120

पिंगलः कालयुक्तश्च सिद्धार्थो रौद्र दुर्मतीः । दुंदुभी रुधिरोद्गारी रक्ताक्षः क्रोधनः क्षयः ॥ १२० ॥

वह पिंगल, काल-युक्त, सिद्धार्थ; रौद्र और दुर्मति कहलाता है। वह दुंदुभी-नाद समान गर्जने वाला; रुधिरोद्गारी; रक्ताक्ष; क्रोधन; और क्षय—संहार-स्वरूप भी है।

Verse 121

नामतुल्यफलाः सर्वे विज्ञेयाः षष्टिवत्सराः । युगं स्थात्पंचभिर्वर्षैर्युगान्येवं तु द्वादश ॥ १२१ ॥

साठों संवत्सर अपने-अपने नाम के अनुरूप फल देने वाले जानने चाहिए। पाँच वर्षों का एक युग होता है; इस प्रकार साठ वर्षों में बारह युग होते हैं।

Verse 122

तेषामीशाः क्रमाज्ज्ञेया विष्णुर्देवपुरोहितः । पुरंदरो लोहितश्च त्वष्टाहिर्बुध्न्यसंज्ञकः ॥ १२२ ॥

उनके अधिपति क्रम से जानने चाहिए—विष्णु, देवताओं के पुरोहित; पुरंदर (इन्द्र); लोहित; त्वष्टा; तथा अहिर्बुध्न्य नामक देव।

Verse 123

पितरश्च ततो विश्वे शशींद्रा ग्न्यश्विनो भगः । तथा युगस्य वर्षेशास्त्वग्निनेंदुविधीश्वराः ॥ १२३ ॥

फिर पितर और विश्वेदेव; (तथा) सोम और इन्द्र, अग्नि, अश्विनीकुमार और भग आते हैं। इसी प्रकार युगों और वर्षों के अधिपति अग्नि, चन्द्रमा और विधीश्वर हैं।

Verse 124

अथाद्वेशचमूनाथसस्यपानां बलाबलम् । तत्कालं ग्रहचारं च सम्यग् ज्ञात्वा फलं वदेत् ॥ १२४ ॥

फिर अद्वेष, चमूनाथ आदि, फसलों और पेय-जल की शक्ति-अशक्ति तथा उस समय के ग्रह-चार को भलीभाँति जानकर फल कहना चाहिए।

Verse 125

सौम्यायनं मासषट्कं मृगाद्यं भानुभुक्तितः । अहः सुराणां तद्रा त्रिः कर्काद्यं दक्षिणायनम् ॥ १२५ ॥

सूर्य के राशि-भोग के अनुसार मकर आदि से आरम्भ होने वाला छह मास का काल ‘सौम्यायन’ (उत्तरायण) कहलाता है। वही देवताओं का दिन है; उसकी रात्रि कर्क आदि से आरम्भ होने वाला छह मास का ‘दक्षिणायन’ है।

Verse 126

गृहप्रवेशवैवाहप्रतिष्ठामौंजिबन्धनम् । मघादौ मंगलं कर्म विधेयं चोत्तरायणे ॥ १२६ ॥

गृह-प्रवेश, विवाह, प्रतिष्ठा तथा मौंजी-बन्धन (उपनयन) आदि मंगलकर्म मघा नक्षत्र से आरम्भ करके और सूर्य के उत्तरायण में अवश्य करने चाहिए।

Verse 127

याम्यायने गर्हितं च कर्म यत्नात्प्रशस्यते । माघादिमासौ द्वौ द्वौ च ऋतवः शिशिरादयः ॥ १२७ ॥

दक्षिणायन में यत्नपूर्वक किया गया कर्म, जो अन्यथा निन्दित भी हो, प्रशंसनीय माना जाता है। माघ से मास दो-दो करके गिने जाते हैं और शिशिर आदि ऋतु भी दो-दो मास की होती हैं।

Verse 128

मृगाच्छिशिरवसंतश्च ग्रीष्माः स्युश्चोत्तरायणे । वर्षा शरच्च हेमंतः कर्काद्वै दक्षिणायने ॥ १२८ ॥

मृगशीर्ष से आगे शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म—ये ऋतुएँ उत्तरायण में आती हैं। कर्क से आगे वर्षा, शरद् और हेमन्त—ये ऋतुएँ दक्षिणायन में आती हैं।

Verse 129

चांद्रो दर्शावधिः सौरः संक्रात्या सावनो दिनैः । त्रिंशद्भिश्चंद्र भगणो मासो नाक्षत्रसंज्ञकः ॥ १२९ ॥

चन्द्रमास अमावस्या की सीमा तक माना जाता है; सौरमास संक्रान्ति से निश्चित होता है। सावन मास दिनों की गणना से होता है; और चन्द्र-भगण के तीस तिथियों वाले मास को ‘नाक्षत्र मास’ कहते हैं।

Verse 130

मधुश्च माधवः शुक्रः शुचिश्चाथ नभस्ततः । नभस्य इषःऊर्जश्च सहाश्चैव सहस्यकः ॥ १३० ॥

मधु, माधव, शुक्र, शुचि; फिर नभ; उसके बाद नभस्य; फिर इष और ऊर्ज; तथा सहा और सहस्यक—ये क्रमशः मासों के नाम हैं।

Verse 131

तपास्तपस्य क्रमशश्चैत्रादीनां समाह्वयाः । यस्मिन्मासे पौर्णमासी येन धिष्ण्येन संयुता ॥ १३१ ॥

तप और तपस्या—ये क्रम से चैत्र आदि महीनों के भी नाम कहे गए हैं। जिस महीने में जो पूर्णिमा पड़ती है और वह जिस नक्षत्र (धिष्ण्य) से युक्त होती है, उसी से उस मास की पहचान होती है।

Verse 132

तन्नक्षत्राह्वयो मासः पौर्णमासी तदाह्वया । तत्पक्षौ दैव पित्राख्यौ शुक्लकृष्णौ तथापरे ॥ १३२ ॥

उस (अधिष्ठाता) नक्षत्र के नाम से मास की संज्ञा होती है और पूर्णिमा भी उसी नाम से जानी जाती है। उसके दो पक्ष ‘दैव’ और ‘पित्र्य’ कहलाते हैं—अर्थात् शुक्ल और कृष्ण पक्ष।

Verse 133

शुभाशुभे कर्मणि च प्रशस्तौ भवतः सदा । क्रमात्तिथीनां ब्रह्माग्नी विरिंचिविष्णुशैलजाः ॥ १३३ ॥

शुभ और अशुभ—दोनों प्रकार के कर्मों में तुम दोनों सदा प्रशंसनीय कहे गए हो। तिथियों के क्रम में ब्रह्मा और अग्नि, तथा विरिञ्चि, विष्णु और शैलजा (पार्वती) अधिष्ठाता माने गए हैं।

Verse 134

विनायकयमौ नागचंद्रौ स्कंदोऽकवासवौ । महेन्द्र वासवौ नागदुर्गादंडधराह्वयः ॥ १३४ ॥

विनायक और यम; नाग और चन्द्र; स्कन्द और (दो) वसु; महेन्द्र और वासव; तथा नाग, दुर्गा और दण्डधर—ये इस प्रसंग में उच्चरित होने वाले दिव्य नाम हैं।

Verse 135

शिवविष्णू हरिरवीकामः सर्वः कलीततः । चन्द्र विश्वेदर्शसंज्ञतिथीशाः पितरः स्मृताः ॥ १३५ ॥

शिव और विष्णु, हरि, रवि (सूर्य) और काम—ये सभी ‘कलीतत’ से संबद्ध कहे गए हैं। चन्द्र, विश्वेदेव तथा जो देवता ‘तिथीश’ कहलाते हैं, वे पितृ रूप में स्मरण किए गए हैं।

Verse 136

नंदाभद्रा जयारिक्तापूर्णाः स्युस्तिथयः पुनः । त्रिरावृत्त्या क्रमाज्ज्ञेया नेष्टमध्येष्टदाः सिते ॥ १३६ ॥

फिर तिथियाँ नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा कही गई हैं। इस क्रम को तीन बार क्रमशः दोहराने से पूरे पक्ष में उनकी पहचान होती है। शुक्ल पक्ष में ये क्रम से अनिष्ट, मध्यम और इष्ट फल देने वाली मानी जाती हैं।

Verse 137

कृष्णपक्षे त्विष्टमध्यानिष्टदाः क्रमशस्तदा । अष्टमी द्वादशी षष्ठी चतुर्थी च चतुर्दशी ॥ १३७ ॥

कृष्ण पक्ष में ये तिथियाँ क्रमशः इष्ट से मध्यम और अनिष्ट फल देने वाली मानी जाती हैं—अष्टमी, द्वादशी, षष्ठी, चतुर्थी और चतुर्दशी।

Verse 138

तिथयः पक्षरंध्राख्या ह्यतिरूक्षा प्रकीर्तिताः । समुद्र मनुरंध्रांकतत्त्वसंख्यास्तुनाडिकाः ॥ १३८ ॥

तिथियाँ अत्यन्त सूक्ष्म कही गई हैं और ‘पक्ष के रन्ध्र’ नाम से प्रसिद्ध हैं। तथा नाड़िकाएँ संख्या-परिभाषा के अनुसार—‘समुद्र’, ‘मनु’, ‘रन्ध्र’, ‘अंक’ और ‘तत्त्व’ आदि संकेतों से—गिनी जाती हैं।

Verse 139

त्याज्याः स्युस्तासु तिथिषु क्रमात्पंच च सर्वदा । अमावास्या च नवमी हित्वा विषमसज्ञिका ॥ १३९ ॥

उन तिथियों में क्रम से पाँच तिथियाँ सदा त्याज्य मानी गई हैं। और अमावस्या तथा नवमी को छोड़कर शेष तिथियाँ ‘विषम’ (अशुभ) संज्ञा से जानी जाती हैं।

Verse 140

तिथयस्तुप्रशस्तास्युर्मध्यमा प्रतिपत्सिता । षष्ठ्यां तैलं तथाष्टम्यां मासं क्षौरं कलेस्तिथौ ॥ १४० ॥

तिथियों में मध्य की तिथियाँ प्रशस्त मानी जाती हैं; प्रतिपदा भी स्वीकृत है। षष्ठी को तेल लगाना, अष्टमी को मासिक व्रत करना, और काल-तिथि में क्षौर (मुंडन) करना कहा गया है।

Verse 141

पूर्णिमादर्शयोर्नारीसेवनं परिवर्जयेत् । दर्शे षष्ठ्यां प्रतिपदि द्वादश्यां प्रतिपर्वसु ॥ १४१ ॥

पूर्णिमा और अमावस्या के दिन स्त्री-संग से विरत रहे। अमावस्या, षष्ठी, प्रतिपदा, द्वादशी तथा सभी पर्व-कालों में भी त्याग करे।

Verse 142

नवम्यां च न कुर्वीत कदाचिद्दंतधावनम् । व्यतीपाते च संक्रांतावेकादश्यां च पर्वसु ॥ १४२ ॥

नवमी को कभी दंतधावन न करे। व्यतीपात, संक्रांति, एकादशी तथा पर्व-दिनों में भी दाँत साफ़ करना वर्जित है।

Verse 143

अर्कभौमदिने षष्ठ्यां नाभ्यंगो वैधृतौ तथा । यः करोति दशम्यां च स्नानमामलकैर्नरः ॥ १४३ ॥

रविवार या मंगलवार को पड़ने वाली षष्ठी तथा वैधृति-योग में अभ्यंग (तेल-मालिश) न करे। पर जो पुरुष दशमी को आँवले से स्नान करता है, वह शुद्धि-फल पाता है।

Verse 144

पुत्रहानिर्भवेत्तस्य त्रयोदश्यां धनक्षयः । अर्थपुत्रक्षयस्तस्य द्वितीयायां न संशयः ॥ १४४ ॥

त्रयोदशी को उसके लिए पुत्र-हानि होती है और द्वितीया को धन-क्षय। द्वितीया के दिन अर्थ और पुत्र—दोनों का क्षय होता है, इसमें संदेह नहीं।

Verse 145

अमायां च नवम्यां च सप्तम्यां च कुलक्षयः । या पौर्णिमा दिवा चंद्र मती सानुमती स्मृता ॥ १४५ ॥

अमावस्या, नवमी और सप्तमी को कुल-क्षय कहा गया है। जो पौर्णिमा दिन में चंद्र-युक्त हो, वह ‘चंद्रमती’ तथा ‘सानुमती’ नाम से स्मरण की जाती है।

Verse 146

रात्रौ चन्द्र वती राकाप्यमावास्या तथा द्विधा । सिनीवाली चेंदुमती कुहूर्नेंदुमती मता ॥ १४६ ॥

रात्रि में चन्द्रयुक्त तिथि ‘राका’ कहलाती है। अमावस्या भी दो प्रकार की मानी गई है—सिनीवाली ‘इन्दुमती’ (चन्द्रयुक्त) और कुहू ‘अनिन्दुमती’ (चन्द्ररहित) कही गई है।

Verse 147

कार्तिके शुक्लनवमी त्वादिः कृतयुगस्य च । त्रेतादिर्माधवे शुक्ले तृतीया पुण्यसंज्ञिता ॥ १४७ ॥

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को कृत (सत्य) युग का आरम्भ कहा गया है। और माधव (वैशाख) में शुक्ल पक्ष की तृतीया त्रेता युग का पुण्य आरम्भ प्रसिद्ध है।

Verse 148

कृष्णापंचदशी माघे द्वापरादिरुदीरिता । कल्पादिः स्यात्कृष्णपक्षे नभस्यस्य त्रयोदशी ॥ १४८ ॥

माघ मास की कृष्ण पक्ष की पञ्चदशी (अमावस्या) को द्वापर युग का आरम्भ कहा गया है। और नभस्य (भाद्रपद) में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को कल्प का आरम्भ बताया गया है।

Verse 149

द्वादश्यूर्जे शुक्लपक्षे नवम्यच्छेश्वयुज्यपि । चेत्रे भाद्र पदे चैव तृतीया शुक्लसंज्ञिता ॥ १४९ ॥

ऊर्ज (कार्तिक) के शुक्ल पक्ष की द्वादशी शुभ मानी गई है; और अश्वयुज (आश्विन) की नवमी भी। चैत्र तथा भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की तृतीया भी ‘शुक्ला’ नाम से शुभ कही गई है।

Verse 150

एकादशी सिता पौषे ह्याषाढेर्देशमीसिता । माघे च सप्तमी शुक्ला नभस्ये त्वसिताष्टमी 1. ॥ १५० ॥

पौष मास में शुक्ल एकादशी होती है; आषाढ़ में शुक्ल दशमी; माघ में शुक्ल सप्तमी; और नभस्य (भाद्रपद) में कृष्ण (असिता) अष्टमी कही गई है।

Verse 151

श्रावणे मास्यमावास्या फाल्गुने मासि पौर्णिमा । आषाढें कार्तिके मासि ज्यष्ठे चैत्रे च पौर्णिमा ॥ १५१ ॥

श्रावण मास में अमावस्या का व्रत-पालन करना चाहिए; फाल्गुन मास में पूर्णिमा। आषाढ़ और कार्तिक में, तथा ज्येष्ठ और चैत्र में भी पूर्णिमा का ही अनुष्ठान विहित है।

Verse 152

मन्वादयो मानवानां श्राद्धेष्वत्यंतपुण्यदा । भाद्रे कृष्णत्रयोदश्यां मघामिंदुः करे रविः ॥ १५२ ॥

मन्वादि आदि श्राद्ध-संबंधी अनुष्ठान मनुष्यों के लिए अत्यन्त पुण्यदायक हैं—विशेषतः भाद्रपद कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को, जब चन्द्रमा मघा में और सूर्य हस्त नक्षत्र में हो।

Verse 153

गजच्छाया तदा ज्ञेया श्राद्धे ह्यत्यंतपुण्यदा । एकस्मिन्वासरे तिस्रस्तिथयः स्यात्तिथिक्षयः ॥ १५३ ॥

उस समय ‘गजच्छाया’ नामक शुभ काल को जानना चाहिए; श्राद्ध में वह अत्यन्त पुण्यदायक है। जब एक ही दिन में तीन तिथियाँ पड़ें, तो उसे ‘तिथि-क्षय’ कहा जाता है।

Verse 154

तिथिर्वारत्रये त्वेका ह्यधिका द्वे च निंदिते । सूर्यास्तमनपर्यंतं यस्मिन्वारे तु या तिथिः ॥ १५४ ॥

तीन वारों के भीतर एक तिथि ‘अधिक’ हो सकती है और दो ‘निन्दित’ मानी जाती हैं। जिस वार में जो तिथि सूर्यास्त तक (या उससे आगे) रहती है, वही तिथि उसी वार में ग्रहण करनी चाहिए।

Verse 155

विद्यते सा त्वखंडा स्यान्न्यूना चेत्खंडसंज्ञिता । तिथेः पंचदशो भागः क्रमात्प्रतिपदादयः ॥ १५५ ॥

यदि तिथि पूर्ण रूप से विद्यमान हो तो वह ‘अखण्डा’ कहलाती है; और यदि न्यून हो तो ‘खण्ड’ संज्ञा पाती है। तिथि चन्द्रमास का पंद्रहवाँ भाग है, जो प्रतिपदा आदि क्रम से चलती है।

Verse 156

क्षणसंज्ञास्तदर्द्धानि तासामर्द्धप्रमाणतः । रविः स्थिश्चरश्चन्द्र ः क्रूरोवक्रोखिलो बुधः ॥ १५६ ॥

उन (काल-विभागों) के आधे ‘क्षण’ कहलाते हैं; उनके आधे के प्रमाण से कहा गया है—सूर्य स्थिर है, चन्द्रमा चलायमान है; और बुध क्रूर, वक्री तथा अनियमित गति वाला है।

Verse 157

लघुरीज्यो मृदुः शुक्रस्तीक्ष्णो दिनकरात्मजः । अभ्यक्तो भानुवारे यः स नरः क्लेशवान्भवेत् ॥ १५७ ॥

गुरु का प्रभाव हल्का, शुक्र का कोमल, और दिनकर-पुत्र शनि का तीक्ष्ण है। जो मनुष्य रविवार को शरीर में तेल लगाता है, वह क्लेशों से युक्त हो जाता है।

Verse 158

ऋक्षेशे कांतिभाग्भौमे व्याधिसौभाग्यमिंदुजे । जीवे नैवं सिते हानिर्मन्दे सर्वसमृद्धयः ॥ १५८ ॥

जब नक्षत्र का स्वामी मंगल हो तो कांति और आकर्षण मिलता है; जब बुध हो तो रोग और सौभाग्य दोनों होते हैं। गुरु के साथ ऐसा फल नहीं; शुक्र के साथ हानि, और शनि के साथ सर्वसमृद्धि होती है।

Verse 159

लंकोदयात्स्याद्वारादिस्तस्मादूर्ध्वमधोऽपिवा । देशांतरस्वचरार्द्धनाडीभिरपरे भवेत् ॥ १५९ ॥

लंका के सूर्योदय से द्वारका आदि स्थानों का समय जाना जाता है—कहीं आगे (अधिक) तो कहीं पीछे (कम)। अन्य देशों में देशांतर के स्वचर के अनुसार अर्ध-नाड़ी से अंतर की गणना होती है।

Verse 160

बलप्रदस्य खेटस्य कर्म सिद्ध्य्ति यत्कृतम् । तत्कर्म बलहीनस्य दुःखेनापि न सिद्ध्य्ति ॥ १६० ॥

बल देने वाले ताबीज (खेट) के साथ किया गया कार्य सिद्ध होता है; पर वही कार्य बलहीन मनुष्य का, दुःख से जूझने पर भी, सिद्ध नहीं होता।

Verse 161

इंदुज्ञजीवशुक्राणां वासराः सर्वकर्मसु । फलदास्त्वितरे क्रूरे कर्मस्वभिमतप्रदाः ॥ १६१ ॥

चन्द्र, बुध, बृहस्पति और शुक्र के वार सभी कार्यों में शुभ फल देने वाले हैं। अन्य वार क्रूर माने गए हैं; वे केवल कठोर या बलपूर्वक कर्मों में ही इच्छित फल देते हैं।

Verse 162

रक्तवर्णो रविश्चंद्रो गौरो भौमस्तु लोहितः । दूर्वावर्णो बुधो जीवः पीतः श्वेतस्तु भार्गवः ॥ १६२ ॥

सूर्य और चन्द्रमा रक्तवर्ण हैं; मंगल गौर होकर भी लोहिताभ कहा गया है। बुध दूर्वा-हरित वर्ण का है; बृहस्पति पीत है और शुक्र श्वेत वर्ण का है।

Verse 163

कृष्णः सौरिः स्ववारेषु स्वस्ववर्णक्रिया हिताः । अद्रि बाणाश्च यस्तर्कपातालवसुधाधाः ॥ १६३ ॥

कृष्ण और सौरि (शनि) अपने-अपने वार में पूजित होने पर कल्याणकारी माने गए हैं। उस समय अपने-अपने वर्ण के अनुसार विहित कर्म भी हितकारी होते हैं; ‘अद्रि’, ‘बाण’ आदि संज्ञाएँ परम्परा से स्मरण की जाती हैं।

Verse 164

बाणाग्निलोचनानिह्यवेदवाहुशिलीमुखाः । त्र् येकाहयो नेत्रगोत्ररामाश्चंद्र रसर्तवः ॥ १६४ ॥

बाण, अग्नि, नेत्र, पवित्र उच्चारण, वेद, भुजाएँ और तीक्ष्ण शिलीमुख; त्रय, एकाह, अश्व; नेत्र, गोत्र, राम; चन्द्र, रस और ऋतु—ये सब परस्पर सम्बद्ध पावन अनुरूपताएँ स्मरण की जाती हैं।

Verse 165

कुलिकाश्चोपकुलिका वारवेलास्तथा क्रमात् । प्रहरार्द्धप्रमाणास्ते विज्ञेयाः सूर्यवासरात् ॥ १६५ ॥

क्रम से कुलिका, उपकुलिका और वारवेला—ये समय-भाग सूर्यवासर (सूर्योदय-आधारित दिन) से गिने जाएँ तो प्रत्येक आधे प्रहर के प्रमाण के जानने चाहिए।

Verse 166

यस्मिन्वारे क्षणो वारदृष्टस्तद्वासराधिपः । आद्यः षष्ठो द्वितीयोऽस्मात्तत्षष्ठस्तु तृतीयकः ॥ १६६ ॥

जिस क्षण जिस वार का दर्शन हो, उसी दिन का स्वामी उस दिन का अधिपति माना जाता है। उस वाराधिप से पहला छठा गिना जाता है, दूसरा उससे छठा, और तीसरा उससे छठा माना जाता है।

Verse 167

षष्ठः षष्ठश्चेतरेषां कालहोराधिपाः स्मृताः । सार्द्धनाडीद्वयेनैव दिवा रात्रौ यथाक्रमात् ॥ १६७ ॥

शेष ग्रहों में जो छठा और फिर छठा पड़ता है, वही काल-होरा का अधिपति कहा गया है। प्रत्येक होरा ढाई नाड़ी (दो नाड़ी और आधी) की होती है और दिन-रात क्रम से चलती है।

Verse 168

वारप्रोक्ते कर्मकार्ये तद्ग्रहस्य क्षणेऽपि सन् । नक्षत्रेशाः क्रमाद्दस्रयमवह्निपितामहाः ॥ १६८ ॥

जिस कर्म का विधान किसी विशेष वार में हो, उस वार-ग्रह का क्षणमात्र भी योग हो तो नक्षत्रों के अधिपति क्रम से दसर (अश्विनौ), यम, अग्नि और पितामह (ब्रह्मा) माने जाते हैं।

Verse 169

चंद्रे शादितिजीवाहिपितरो भगसंज्ञकः । अर्यमार्कत्वष्टृमरुच्छक्राग्निमित्रवासवः ॥ १६९ ॥

चन्द्रमण्डल में शा (शनि), आदित्य, जीव (बृहस्पति), अहि (नाग) और पितर हैं; तथा ‘भग’ नामक देवता भी है। वहाँ अर्यमा, अर्क (सूर्य), त्वष्टा, मरुत, चक्र, अग्निमित्र और वासव (इन्द्र) भी कहे गए हैं।

Verse 170

नैरृत्युदकविश्वेजगोविंदवसुतोयपाः । अजैकपादहिर्बुध्न्या पूषा चेति प्रकीर्तिताः ॥ १७० ॥

नैरृत्य, उदक, विश्वेज, गोविंद, वसु, तोयपा, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य और पूषा—ये नाम यहाँ जप के लिए घोषित किए गए हैं।

Verse 171

पूर्वात्रयं मघाह्यग्निविशाखायममूलभम् । अधोमुखं तु नवकं भानौ तत्रविधीयते ॥ १७१ ॥

पूर्वा-त्रय, मघा, (कृत्तिका) अग्नितारा, विशाखा, आयम और मूल—ये ‘अमूल’ (आरम्भ के लिए अनुपयुक्त) कहे गए हैं। तथा सूर्य-विचार में ‘अधोमुख’ नवक का भी वहाँ विधान है।

Verse 172

बिलप्रवेशगणितभूतसाधनलेखनम् । शिल्पकर्मकलाकूपनिक्षेपोद्धरणादि यत् ॥ १७२ ॥

इसमें बिल-प्रवेश का ज्ञान, गणित, भूत-साधन से जुड़े विधि-उपाय, लेखन-कला, शिल्प और कारीगरी; तथा कुएँ आदि में छिपाए गए निक्षेपों को निकालने जैसे कार्य भी सम्मिलित हैं।

Verse 173

मित्रेन्दुत्वाष्ट्रहस्तेन्द्रा दितिभांत्याश्विवायुभम् । तिर्यङ्मुखाख्यं नवकं भानौ तत्र विधीयते ॥ १७३ ॥

मित्र, इन्दु (चन्द्र), त्वाष्ट्र, हस्त, इन्द्र, दिति, भान्ति, अश्विनौ और वायु—यह नौ का समूह ‘तिर्यङ्मुख’ नवक कहलाता है; और सूर्य-विचार में इसका वहाँ विधान है।

Verse 174

हलप्रवाहगमन गंत्रीपत्रगजोष्ट्रकम् । खरगोरथनौयानालुलायहयकर्म च ॥ १७४ ॥

हल चलाना और जल-प्रवाह का संचालन; गाड़ी तथा पत्र-उपकरणों का कार्य; हाथी-ऊँटों का प्रबंधन; तथा गधे और गौ-कार्य, रथ और नौका-व्यवहार, झूला/दोलन तथा अश्व-संबंधी कर्म—ये सब बताए गए हैं।

Verse 175

ब्रह्मविष्णुमहेशार्यशततारावसूत्तराः । ऊद्ध्वास्यं नवकं भानां प्रोक्तमत्र विधीयते ॥ १७५ ॥

यहाँ भानों (नक्षत्र-देवताओं) का ‘ऊर्ध्वास्य’ नवक कहा गया है—ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आर्य, शततारा, वसु और उत्तराएँ; इसी का यहाँ विधान किया गया है।

Verse 176

नृपाभिषेकमांगल्यवारणध्वजकर्म च । प्रासादतोरणारामप्राकाराद्यं च सिद्ध्य्ति ॥ १७६ ॥

राज्याभिषेक के मंगलकर्म, हाथियों और ध्वजों से जुड़े विधि-कर्म, तथा प्रासाद, तोरण, उद्यान, प्राकार आदि कार्यों की सिद्धि होती है।

Verse 177

स्थिरं रोहिण्युत्तराख्यं क्षिप्रं सूर्याश्विपुष्यभम् । साधारणं द्विदैवत्यं वह्निभं च प्रकीर्तितम् ॥ १७७ ॥

रोहिणी और तीनों उत्तर-नक्षत्र ‘स्थिर’ कहे गए हैं; सूर्य, अश्विनी और पुष्य ‘क्षिप्र’ माने गए। ‘द्विदैवत्य’ ‘साधारण’ तथा ‘वह्निभ’ भी अलग वर्ग के रूप में बताए गए हैं।

Verse 178

वस्वदित्यंवुपुष्याणि विष्णुभं चरसंज्ञितम् । मृद्विंदुमित्रचित्रांत्यमुग्रं पूर्वामघात्रिकम् ॥ १७८ ॥

वसु, आदित्य और पुष्य-समूह; ‘विष्णुभ’ को ‘चर’ कहा गया है। फिर मृद्, बिन्दु, मित्र और चित्रा-पर्यन्त समूह; ‘उग्र’; तथा पूर्वा और मघा से आरम्भ होने वाला त्रिक—ये वर्ग बताए गए हैं।

Verse 179

मूलाद्रा र्हींद्र भं तीक्ष्णं स्वनामसदृशं फलम् । चित्रादित्यंबुविष्ण्वंबांत्याधिमित्रवसूडुषु ॥ १७९ ॥

मूला और आर्द्रा, तथा र्हीन्द्र, भं और तीक्ष्ण—इनमें फल उनके नामार्थ के अनुरूप कहा गया है। इसी प्रकार चित्रा, आदित्य, अम्बु, विष्णु, अम्बा, अन्त्य, आधि, मित्र और वसूड़ु में भी नामानुसार फल मिलता है।

Verse 180

समृगेज्येषु बालानां कर्णवेधक्रिया हिता । दस्रेन्द्वदितितिष्येषु करादित्रितये तथा ॥ १८० ॥

बालकों के लिए कर्णवेध-संस्कार मृगशीर्ष और ज्येष्ठा में हितकर है; धनिष्ठा, श्रवण, अदिति (पुनर्वसु) और तिष्य (पुष्य) में भी, तथा हस्त से आरम्भ होने वाले तीन तिथियों में भी उत्तम कहा गया है।

Verse 181

गजकर्माखिलं यत्तद्विधेयं स्थिरभेषु च । वाजिकर्माखिलं कार्यं सूर्यवारे विशेषतः ॥ १८१ ॥

हाथियों से सम्बन्धित समस्त कार्य स्थिर राशियों में करने योग्य हैं; और घोड़ों से सम्बन्धित समस्त कार्य विशेषतः रविवार को करना चाहिए।

Verse 182

चित्रावरुणवैरिंचत्र् युत्तरासु गमागमम् । दर्शाष्टम्यां चतुर्दश्यां पशूनां न कदाचन ॥ १८२ ॥

चित्रा, वरुण और वैरिञ्च नामक योग/नक्षत्रों में तथा उत्तरायण में गमन-आगमन से बचना चाहिए; और अमावस्या, अष्टमी तथा चतुर्दशी को पशुओं का चलाना/हांकना कभी नहीं करना चाहिए।

Verse 183

मृदुध्रुवक्षिप्रचरविशाखापितृभेषु च । हलप्रवाहं प्रथमं विदध्यान्मूलभे वृषैः ॥ १८३ ॥

मृदु, ध्रुव, क्षिप्र और चर नक्षत्रों में, तथा विशाखा और पितृ-नक्षत्रों में पहले ‘हल-प्रवाह’ (जुताई/रेखांकन) करना चाहिए; और मूल नक्षत्र में यह बैलों के साथ करना चाहिए।

Verse 184

हलादौ वृषनाशाय भत्रयं सूर्यमुक्तभात् । अग्रे वृद्ध्यै त्रयं लक्ष्म्यै सौम्यपार्श्वे च पंचकम् ॥ १८४ ॥

‘ह’ अक्षर से आरम्भ करके तीन (विन्यास) वृष-नाश हेतु कहे गए हैं; और सूर्य की मुक्त-प्रभा के विधान में—अग्रभाग में वृद्धि के लिए तीन, लक्ष्मी के लिए (विन्यास), तथा सौम्य पार्श्व में पाँच (विन्यास) बताए गए हैं।

Verse 185

शूलत्रयेपि नवकं मरणाय च पंचकम् । श्रियै पुष्ट्यै त्रयं श्रेष्ठं स्याच्चक्रे लांगलाह्वये ॥ १८५ ॥

त्रिशूल के तीन प्रकारों में भी मरण हेतु नवक (नौ का विन्यास) और पंचक (पाँच का विन्यास) कहा गया है; परन्तु श्री और पुष्टि के लिए त्रय (तीन का विन्यास) श्रेष्ठ है—विशेषतः ‘लाङ्गल’ नामक चक्र में।

Verse 186

मृदुध्रुवक्षिप्रभेषु पितृवायुवसूडुषु । समूलभेषु बीजोप्तिरत्युत्कृष्टफलप्रदा ॥ १८६ ॥

मृदु, ध्रुव और क्षिप्र तथा भेष नक्षत्रों में, और पितृ, वायु तथा वसु-सम्बन्धी नक्षत्रों में—विशेषकर ‘समूल’ नक्षत्र होने पर—बीज बोना अत्यन्त उत्तम फल देने वाला होता है।

Verse 187

भवेद्भत्रितयं मूर्ध्नि धान्यनाशाय राहुभात् । गले त्रयं कज्जलाय वृद्ध्यै च द्वादशोदरे ॥ १८७ ॥

राहु की पीड़ा से यदि सिर पर तीन चिह्न हों तो धान्य-नाश होता है। गले पर तीन हों तो काजल-सी कालिमा का संकेत है; और पेट पर बारह हों तो वृद्धि और समृद्धि का सूचक है।

Verse 188

निस्तंडुलत्वं लांगूले भवतु ष्टयभीतिदम् । नाभौ वह्निः पचकं यद्बजोप्ताविति चिंतयेत् ॥ १८८ ॥

ऐसा मन में विचार करे—“पूँछ में दाने न रहें, यह दुष्टों के लिए भय का कारण बने; और नाभि में पाचक अग्नि स्थित है”—बीज बोते समय ऐसा चिंतन करे।

Verse 189

स्थिरेष्वदितिसार्पांत्यपितृमारुतभेषु च । न कुर्याद्रो गमुक्तस्य स्नानमाहींदुशुक्रयोः ॥ १८९ ॥

स्थिर तिथियों में, तथा अदिति, सर्प, अन्त्य, पितृ, मारुत (वायु) और भेष-सम्बन्धी तिथियों में रोगमुक्त व्यक्ति का विधिस्नान न करे; इसी प्रकार चन्द्र और शुक्र के दिनों में भी न करे।

Verse 190

उत्तरात्रयमैतेन्द्र वसुवारुणभेषु च । पुष्यार्कपौष्णधिष्ण्येषु नृत्यारंभः प्रशस्यते ॥ १९० ॥

उत्तरात्रय में, तथा ऐतेन्द्र, वसु, वारुण और भेष नक्षत्रों में, और पुष्य, अर्क तथा पौष्ण नक्षत्रों में नृत्य का आरम्भ अत्यन्त प्रशंसनीय और शुभ माना गया है।

Verse 191

पूर्वार्द्धयुंजि षड्भानि पौष्णभादुदभात्ततः । मध्ययुंजि द्वादशर्क्षाणीन्द्र भान्नवभानि च ॥ १९१ ॥

पुष्य से आरम्भ करके पूर्वार्ध-विभाग में छह नक्षत्र नियोजित हैं। मध्य-विभाग में बारह नक्षत्र, और इन्द्र-विभाग में भी नौ तारक-समूह नियत किए गए हैं॥

Verse 192

परार्द्धयुंजि क्रमशः संप्रीतिर्दम्पतेर्मिथः । जघन्यास्तोयपाद्रा र्हिपवनांतकनाकपाः ॥ १९२ ॥

क्रम से ‘परार्ध’ नामक मान का प्रयोग होता है; और पति-पत्नी की परस्पर प्रीति भी उसी क्रम के अनुसार बढ़ती है। न्यूनतम मान ये हैं—जल, पाद (चरण), ‘द्रा’, ‘अर्हि’, वायु, अन्तक (मृत्यु), स्वर्ण और ‘काप’॥

Verse 193

क्रमादितिद्विदैवत्या बृहत्ताराः पराः समाः । तासां प्रमाणघटिकास्त्रिंशन्नवतिद्यष्टयः ॥ १९३ ॥

क्रम से तिथि के द्विदैवत्य-गणन के अनुसार ‘बृहत्तारा’ वर्ष श्रेष्ठ (पर) वर्ष कहे जाते हैं। उनका मान-घटिका-प्रमाण तीस, नब्बे और आठ है॥

Verse 194

क्रमादभ्युदिते चंद्रे नयत्यर्घसमानि च । अश्वग्रींद्वीज्यनैरृत्यत्वाष्ट्रजत्त्युराभवाः ॥ १९४ ॥

चन्द्रमा के क्रम से उदय होने पर उसी क्रम में अर्घ्य-समर्पण भी करना चाहिए। इस अनुक्रम में अश्वग्री, द्वीज्य, नैरृत्य, त्वाष्ट्र, जत्त्यु और राभव आदि विभाग गिने जाते हैं॥

Verse 195

पितृद्विदैववस्वाख्यास्ताराः स्युः कुलसंज्ञिकाः । धातृज्येष्ठादितिस्वातीपौष्णार्कहरिदेवताः ॥ १९५ ॥

पितृ, द्विदैव और वसु नाम से प्रसिद्ध ताराएँ ‘कुल-संज्ञा’ वाली समझी जानी चाहिए। उनकी अधिष्ठात्री देवताएँ—ज्येष्ठा की धाता, स्वाती की अदिति, पौष्ण की पूषा, आर्क की अर्क (सूर्य), और हरिदेवता की हरि हैं॥

Verse 196

अजाह्यंत्यकभौजंगताराश्चैवाकुलाह्वयाः । शेषाः कुलाकुलास्तारास्तासां मध्ये कुलोडुषु ॥ १९६ ॥

अजाह्यन्ती और अकभौजंग नामक ताराएँ ‘आकुला’ कही जाती हैं। शेष ताराएँ ‘कुल’ और ‘अकुल’ दोनों नामों से जानी जाती हैं; उन्हीं के बीच ‘कुल’ कहलाने वाले नक्षत्र-समूह प्रसिद्ध हैं।

Verse 197

प्रयाति यदि भूपालस्तदाप्नोति पराजयम् । भेषूपकुलसंज्ञेषु जयमाप्नोति निश्चितम् ॥ १९७ ॥

यदि राजा ‘भूपाल’ नामक शकुन-चिह्न में प्रस्थान करे, तो उसे पराजय मिलती है। परंतु ‘भेषूपकुल’ कहलाने वाले शकुनों में प्रस्थान करने पर वह निश्चय ही विजय पाता है।

Verse 198

संधिर्वापि तयोः साम्यं कुलाकुलगणोडुषु । अर्कार्किभौमवारे चेद्भद्रा या विषमांघ्रिभम् ॥ १९८ ॥

कुल और अकुल गण-नक्षत्रों में यदि दोनों का संधि या समानता हो, तो जब वह रविवार, शनिवार या मंगलवार को पड़े, तब उस भद्रा को ‘विषमाङ्घ्री’ (असम पाद वाली) समझना चाहिए—जो कुछ कार्यों में अशुभ मानी जाती है।

Verse 199

त्रिपुष्करं त्रिगुणदं द्विगुणं यमलाहिभम् । दद्यात्तद्दोषनाशाय गोत्रयं मूल्यमेव वा ॥ १९९ ॥

उस दोष के नाश हेतु त्रिपुष्कर, त्रिगुणद, द्विगुण और यमलाहिभ—इनका दान करना चाहिए। अथवा तीन गायें, या उनके मूल्य के बराबर दान देना चाहिए।

Verse 200

द्विपुष्करे द्वयं दद्यान्न दोषस्त्वृक्षभोऽपि वा । क्रूरविद्धो युतो वापि पुष्यो यदि बलान्विर्तः 1. ॥ २०० ॥

द्विपुष्कर में दुगुना दान देना चाहिए—उसमें दोष नहीं होता। चाहे नक्षत्र वृषभ हो, या क्रूर ग्रह से विद्ध/युक्त भी हो; यदि पुष्य बलवान हो, तो दान-कर्म दोषरहित हो जाता है।

Frequently Asked Questions

Because nimitta-śāstra is framed as a governance tool: abnormal solar appearances are mapped to royal stability (king’s death, hostility among rulers), military outcomes, and agrarian welfare (rainfall, famine), making celestial observation a dharma-linked instrument for forecasting collective risk.

It provides operational calendrics—tithi-to-weekday assignment, parvan deities by quarters, eclipse verification, month/season pairing, and the Jovian year-cycle—used to time samskāras, vows, and state actions, rather than describing tīrthas or their salvific narratives (typical of Book 2).

The tithi is assigned to the weekday on which it remains present up to (or beyond) sunset; if fully present it is ‘akhaṇḍā’ (unbroken), and if deficient it is ‘khaṇḍa’ (broken).