Adhyaya 58
Purva BhagaSecond QuarterAdhyaya 5872 Verses

Śuka’s Origin, Mastery of Śāstra, and Testing at Janaka’s Court

नारद ने सनन्दन से शुक के जन्म का रहस्य पूछा। सनन्दन ने बताया कि मेरु पर्वत के कर्णिकार वन में व्यास ने कठोर तप किया, जहाँ महादेव दिव्य गणों सहित प्रकट हुए और शुद्धि व ब्रह्मतेज का वर दिया। अरणियों से अग्नि मथते समय घृताची अप्सरा तोते के रूप में क्षणभर व्यास के चित्त को विचलित करती है, और अरणि-संबंध से तेजस्वी शुक का जन्म होता है—जो जन्म से ही वेदज्ञान से युक्त था। देवताओं ने उत्सव किया; शुक को दीक्षा और दिव्य दर्शन मिला। उसने वेद, वेदाङ्ग, इतिहास, योग और सांख्य का अध्ययन किया। मोक्ष के अंतिम निश्चय हेतु व्यास ने उसे राजा जनक के पास भेजा और मार्ग में शक्ति-प्रदर्शन व अहंकार से बचने की शिक्षा दी। मिथिला में राजभोग और गणिकाओं द्वारा परीक्षा होने पर भी शुक ध्यानस्थ रहा, संध्या करता रहा और समत्व बनाए रखा।

Shlokas

Verse 1

नारद उवाच । अनूचानप्रसंगेन वेदांगान्यखिलानि च । श्रुतानि त्वन्मुखांभोजात्समासव्यासयोगतः ॥ १ ॥

नारद बोले—नियमित अध्ययन के प्रसंग में आपके कमल-मुख से मैंने समस्त वेदाङ्गों को सुना है—संक्षेप और विस्तार, दोनों प्रकार से।

Verse 2

शुकोत्पत्तिं समाचक्ष्व विस्तरेण महामते । सनंदन उवाच । मेरुश्रृङ्गे किल पुरा कर्णिकारवनायते ॥ २ ॥

“हे महामते, शुक की उत्पत्ति मुझे विस्तार से बताइए।” सनन्दन बोले—“प्राचीन काल में मेरु-शिखर पर कर्णिकार वृक्षों का एक वन था।”

Verse 3

विजहार महोदेवो भौमैभूतगणैवृतः । शैलराजसुता चैव देवी तत्राभवत्पुरा ॥ ३ ॥

वहाँ महादेव पृथ्वीगत भूतगणों से घिरे हुए क्रीड़ा करते थे; और पूर्वकाल में पर्वतराज की पुत्री देवी भी वहाँ विद्यमान थीं।

Verse 4

तत्र दिव्यं तपस्तेपे कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । योगेनात्मानमाविश्य योगधर्मपरायणः ॥ ४ ॥

वहीं प्रभु कृष्णद्वैपायन (व्यास) ने दिव्य तप किया; योग द्वारा अपने आत्मस्वरूप में प्रविष्ट होकर वे योगधर्म में पूर्णतः परायण रहे।

Verse 5

धारयन्स तपस्तेपे पुत्रार्थं सुनिसंत्तमः । अग्नेर्भूमेस्तथा वायोरंतरिक्षस्य चाभितः ॥ ५ ॥

व्रत को धारण करते हुए उस परम उत्तम पुरुष ने पुत्र-प्राप्ति हेतु तप किया—अग्नि, भूमि, वायु तथा अंतरिक्ष-प्रदेश को चारों ओर से प्रसन्न करते हुए।

Verse 6

वीर्येण संमतः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह । संकल्पेनाथ सोऽनेन दुष्प्रापमकगृतात्मभिः ॥ ६ ॥

“वीर्य से अनुमोदित पुत्र मुझे प्राप्त हो”—ऐसा उसने कहा। इसी संकल्प के बल से उसने वह दुर्लभ फल पा लिया, जो असंयमी जनों को नहीं मिलता।

Verse 7

वरयामास देवेशमास्थितस्तप उत्तमम् । अतिष्टन्मारुताहारः शतं किल समाः प्रभुः ॥ ७ ॥

उसने उत्तम तप का आश्रय लेकर देवेश्वर का वरण किया। वायु को ही आहार मानकर वह प्रभु कहा जाता है कि पूरे सौ वर्षों तक स्थित रहा।

Verse 8

आराधयन्महादेवं बहुरूपमुमापतिम् । तत्र ब्रह्मर्षयश्चैव सर्वे देवर्षयस्तथा ॥ ८ ॥

वे बहुरूपधारी, उमा-पति महादेव की आराधना करते रहे। वहाँ समस्त ब्रह्मर्षि तथा सभी देवर्षि भी उपस्थित थे।

Verse 9

लोकपालाश्च साध्याश्च वसुभिश्चाष्टभिः सह । आदित्याश्चैव रुद्राश्च दिवाकरनिशाकरौ ॥ ९ ॥

लोकपाल, साध्यगण, आठों वसु; तथा आदित्य और रुद्रगण—और सूर्य व चन्द्रमा भी—वहाँ उपस्थित थे।

Verse 10

विश्वा वसुश्च गंधर्वः सिद्धाश्चाप्सरासांगणाः । तत्र रुद्रो महादेवः कर्णिकारमयीं शुभाम् ॥ १० ॥

विश्वदेव, वसु, गन्धर्व, सिद्ध तथा अप्सराओं के गण वहाँ थे। वहाँ रुद्र महादेव कर्णिकार-पुष्पमयी शुभ शोभा/मूर्ति से विराजमान थे।

Verse 11

धारयानः स्रजं भाति शारदीव निशाकरः । तस्निन् दिव्ये वने रम्ये देवदेवर्षिसंकुले ॥ ११ ॥

गले में स्रग् धारण किए वह शरद्-चन्द्रमा के समान दीप्तिमान् दिखाई पड़ा। उस दिव्य, रमणीय वन में, जहाँ देव और देवर्षि भरे थे, वह अत्यन्त शोभायमान था।

Verse 12

आस्थितः परमं योगं व्यासः पुत्रार्थमुद्यतः । न चास्य हीयते वर्णो न ग्लानिरुपजायते ॥ १२ ॥

पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा से उद्यत व्यास ने परम योग का आश्रय लिया। उनके शरीर की कान्ति न घटती थी, न ही उन्हें किसी प्रकार की ग्लानि होती थी।

Verse 13

त्रयाणामपिलोकानां तदद्भुतमिवाभवत् । जटाश्च तेजसा तस्य वैश्वानरशिखोपमाः ॥ १३ ॥

तीनों लोकों को वह दृश्य मानो अद्भुत प्रतीत हुआ। उनकी जटाएँ अपने तेज के कारण वैश्वानर-अग्नि की ज्वालाओं के समान लगती थीं।

Verse 14

प्रज्वलंत्यः स्म दृश्यंते युक्तस्यामिततेजसः । एवं विधेन तपसा तस्य भक्त्या च नारद ॥ १४ ॥

उस अमित-तेजस्वी, योगयुक्त साधक के चारों ओर ज्वलन्त तेज दिखाई देता है। हे नारद! ऐसे ही तप और भगवान्-भक्ति से यह दिव्य प्रभा उत्पन्न होती है।

Verse 15

महेश्वरः प्रसन्नात्मा चकार मनसा मतिम् । उवाच चैनं भगवांस्त्र्यंबकः प्रहसन्निव ॥ १५ ॥

महेश्वर प्रसन्नचित्त होकर मन में एक निश्चय करने लगे। तब भगवान् त्र्यम्बक ने मानो मुस्कराते हुए उनसे कहा।

Verse 16

यथा ह्यग्नियथा वायुर्यथा भूमिर्यथा जलम् । यथा खे च तथा शुद्धो भविष्यति सुतस्तंव ॥ १६ ॥

जैसे अग्नि शुद्ध है, जैसे वायु, जैसे पृथ्वी, जैसे जल—और जैसे आकाश भी—वैसे ही तुम्हारा पुत्र भी शुद्ध हो जाएगा।

Verse 17

तद्भावभागी तद्बुद्धिस्तदात्मा तदुपाश्रयः । तेजसा तस्य लोकांस्त्रीन्यशः प्राप्स्यति केवलम् ॥ १७ ॥

उसके भाव में सहभागी, बुद्धि उसी में स्थित, आत्मा उसी से एकीकृत, और केवल उसी का आश्रय लेने वाला—उस प्रभु के तेज से वह तीनों लोकों को और अखण्ड यश को प्राप्त करेगा।

Verse 18

एवं लब्ध्वा वरं देवो व्यासः सत्यवतीसुतः । अरणिं त्वथ संगृह्य ममंथाग्निचिकीर्षया ॥ १८ ॥

इस प्रकार वर पाकर, सत्यवती-पुत्र दिव्य व्यास ने तब अरणियाँ एकत्र कीं और पवित्र अग्नि प्रज्वलित करने की इच्छा से मंथन किया।

Verse 19

अथ रूपं परं विप्र बिभ्रतीं स्वेन तेजसा । घृताचीं नामाप्सरसं ददर्श भगवान्नृषिः ॥ १९ ॥

तब, हे विप्र, भगवान् ऋषि ने घृताची नाम की अप्सरा को देखा, जो परम रूप धारण किए हुए और अपने ही तेज से दीप्त थी।

Verse 20

स तामप्सरसं दृष्ट्वा सहसा काममोहितः । अभवद्भगवान्व्यासो वने तस्मिन्मुनीश्वर ॥ २० ॥

उस अप्सरा को देखकर, हे मुनीश्वर, उस वन में भगवान् व्यास सहसा काम से मोहित और भ्रमित हो गए।

Verse 21

सा तु कृत्वा तदा व्यासं कामसंविग्नमानसम् । शुकीभूया महारम्या घृताची समुपागमत् ॥ २१ ॥

तब उसने व्यास के मन को काम से व्याकुल कर दिया; फिर वह अत्यन्त रमणीया घृताची शुकी (मादा तोता) का रूप धारण करके उसके पास आई।

Verse 22

स तामप्सरसं दृष्ट्वा रूपेणान्येनसंवृताम् । स्मरराजेनानुगतः सर्वगात्रातिगेन ह ॥ २२ ॥

उस अप्सरा को, जो अन्य रूप से छिपी हुई थी, देखकर वह स्मरराज (कामदेव) के वश में हो गया; जो उसके समस्त अंगों में शीघ्रता से व्याप्त हो गया।

Verse 23

स तु महता निगृह्णन् हृच्छयं मुनिः । न शशाक नियंतुं तं व्यासः प्रविसृतं मनः ॥ २३ ॥

वह मुनि हृदय के वेग को बहुत दबाते हुए भी उसे नियंत्रित न कर सका; व्यास उस बाहर की ओर दौड़ पड़े मन को वश में न कर पाए।

Verse 24

भावित्वाञ्चैव भाव्यस्य घृताच्या वपुषा । हृतम् यत्नान्नियच्छतश्चापि मुने एतञ्चिकीर्षया ॥ २४ ॥

हे मुनि, साधना करने की इच्छा से कोई मन को यत्नपूर्वक रोकना चाहे, तो भी वह भविष्य की कल्पनाएँ रचकर घृताची के मोहक रूप-सुख से हर लिया जाता है।

Verse 25

अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमवापतत् । शुक्रे निर्मथ्यमानेऽस्यां शुको जज्ञे महातपाः ॥ २५ ॥

उसी वन में सहसा उसका शुक्र गिर पड़ा; और उसी शुक्र के मथित होने पर वहीं महातपस्वी शुक का जन्म हुआ।

Verse 26

परमर्षिर्महायोगी अरणीगर्भसंभवः । यथैव हि समिद्धोऽग्निर्भाति हव्यमुपात्तवान् ॥ २६ ॥

वह परम ऋषि, महायोगी, अरणि के गर्भ से उत्पन्न होकर वैसे ही दीप्त हुआ, जैसे समिधा से प्रज्वलित अग्नि हवि पाकर तेज से चमक उठती है।

Verse 27

तथा रूपः शुको जज्ञे प्रज्वलन्निव तेजसा । बिभ्रञ्चित्रं च विप्रेंद्र रूपवर्णमनुत्तमम् ॥ २७ ॥

उसी रूप में शुक का जन्म हुआ, मानो तेज से प्रज्वलित हो; और हे विप्रश्रेष्ठ, उसने अद्भुत, अनुपम रूप और वर्ण धारण किया।

Verse 28

तं गंगां सरितां श्रेष्ठां मेरुपृष्ठे स्वरूपिणीम् । अभ्येत्य स्नापयामास वारिणा स्वेन नारद ॥ २८ ॥

मेरुपर्वत की पीठ पर अपने स्वरूप में प्रकट हुई, नदियों में श्रेष्ठ गंगा के पास जाकर नारद ने अपने ही जल से उसे स्नान कराया।

Verse 29

कृष्णाजिनं चांतरिक्षाच्छुकार्थे भुव्यवापतत् । जगीयंत च गंधर्वा ननृतुञ्चाप्सरोगणाः ॥ २९ ॥

और शुक के लिए आकाश से कृष्णाजिन (काले मृगचर्म) पृथ्वी पर आ गिरा। गंधर्व गाने लगे और अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे।

Verse 30

देवदुन्दुभयश्चैव प्रावाद्यंत महास्वनाः । विश्वावसुश्च गंधर्वस्तथा तुंबुरुनारदौ ॥ ३० ॥

तब देवदुन्दुभियाँ भी महान् नाद से बज उठीं। गंधर्व विश्वावसु तथा तुंबुरु और नारद भी (दिव्य संगीत-स्तुति में) प्रवृत्त हुए।

Verse 31

हाहाहूहूश्च गंधर्वौ तुष्टुवुः शुकसंभवम् । तत्र शक्रपुरोगाश्च लोकपालाः समागताः ॥ ३१ ॥

गन्धर्व हाहा और हूहू ने व्यासपुत्र शुक की स्तुति की। वहीं शक्र (इन्द्र) के अग्रणी होकर लोकपाल भी एकत्र हुए॥

Verse 32

देवा देवर्षथयश्चटैव तथा ब्रह्मर्षयोऽपि च । दिव्यानि सर्वपुष्पाणि प्रववर्ष च मारुतः ॥ ३२ ॥

देव, देवर्षि तथा ब्रह्मर्षि भी वहाँ उपस्थित हुए। तब मारुत (वायु-देव) ने सब प्रकार के दिव्य पुष्पों की वर्षा की॥

Verse 33

जंगमं स्थावरं चैव प्रहृष्टमभवज्जगत् । तं महात्मा स्वयं प्रीत्या देव्या सह महाद्युतिः ॥ ३३ ॥

चर-अचर सहित समस्त जगत् हर्षित हो उठा। वह महात्मा, महाद्युति, स्वयं प्रेमवश देवी के साथ आकर उसे सम्मानित करने लगा॥

Verse 34

जातमात्रं मुनेः पुत्रं विधिनोपानयत्तदा । तस्य देवेश्वरः शक्तो दिव्यमद्भुतदर्शनम् ॥ ३४ ॥

तभी मुनि के नवजात पुत्र का विधिपूर्वक उपनयन संस्कार हुआ। और देवेश्वर ने समर्थ होकर उसे दिव्य, अद्भुत दर्शन प्रदान किया॥

Verse 35

ददौ कमंडलुं प्रीत्या देवा वासांसि चाभितः । हंसाश्च शतपत्राश्च सारसाश्च सहस्रशः ॥ ३५ ॥

प्रीत होकर उसने प्रेम से कमण्डलु प्रदान किया, और चारों ओर देवताओं ने वस्त्र अर्पित किए। सहस्रों हंस, शतपत्र-पक्षी और सारस भी आ पहुँचे॥

Verse 36

प्रदक्षिणमवर्तंत शुकाश्चाषाश्च नारद । आरणे यस्तदा दिव्यं प्राप्य जन्म महामुनिः ॥ ३६ ॥

हे नारद, तोते और मैना श्रद्धापूर्वक दाहिने ओर प्रदक्षिणा करने लगे; और उस समय महामुनि ने वन में दिव्य जन्म पाकर वहीं प्रकट हुए।

Verse 37

तत्रैवोवास मेधावी व्रतचारी समाहितः । उत्पन्नमात्रं तं वेदाः सरहस्याः ससंग्रहाः ॥ ३७ ॥

वहीं वह मेधावी, व्रतपालक और पूर्णतः एकाग्रचित्त होकर निवास करता रहा; और उसके उत्पन्न होते ही रहस्यों तथा संग्रहों सहित वेद उसे प्रकट हो गए।

Verse 38

उपतस्थुर्मुनिश्रेष्टं यथास्य पितरं तथा । बृहस्पतिं स वव्रे च वेदवेदांगभाष्यवित् ॥ ३८ ॥

वे उस मुनिश्रेष्ठ की सेवा वैसे ही करने लगे जैसे अपने पिता की; और वेद-वेदाṅगों के भाष्य का ज्ञाता होकर उसने बृहस्पति को गुरु रूप में वरण किया।

Verse 39

उपाध्यायं द्विजश्रेष्ट धर्ममेवानुचिंतयन् । सोऽधीत्य वेदानखिलान्सरहस्यान्ससंग्रहान् ॥ ३९ ॥

हे द्विजश्रेष्ठ, गुरु का आदर करते हुए और केवल धर्म का चिंतन करते हुए उसने रहस्यों और संग्रहों सहित समस्त वेदों का अध्ययन किया।

Verse 40

इतिहासं च कार्त्स्न्येन वेदशास्त्राणि चाभितः । गुरवे दक्षिणां दत्त्वा समावृत्तो महामुनिः ॥ ४० ॥

इतिहास को पूर्णतः तथा वेदशास्त्रों को सर्वतोमुखी रूप से सीखकर, गुरु को दक्षिणा देकर महामुनि समावर्तन करके लौट आए।

Verse 41

उग्रं तपः समारेभे ब्रह्मचारी समाहिताः । देवतानामृषीणां च बाल्येऽपि सुमहातपाः ॥ ४१ ॥

समाहित ब्रह्मचारी होकर उसने उग्र तप का आरम्भ किया; और बाल्यावस्था में भी वह देवताओं और ऋषियों में पूज्य महान् तपस्वी बन गया।

Verse 42

संमत्रणीयो जन्यश्च ज्ञानेन तपसा तथा । न त्वस्य रमते बुद्धिराश्रमेषु मुनीश्वर ॥ ४२ ॥

वह परामर्श के योग्य और कुलीन है, ज्ञान और तप से भी सम्पन्न है; परन्तु, हे मुनीश्वर, उसकी बुद्धि आश्रम-धर्मों में रमता नहीं।

Verse 43

त्रिषु गार्हस्थ्यमूलेषु मोक्षधर्मानुदर्शिनः । स मोक्षमनुचिंत्यैव शुकः पितरमभ्यगात् ॥ ४३ ॥

गृहस्थ-जीवन की तीन आधार-व्यवस्थाओं में निहित मोक्ष-धर्मों का अवलोकन करके, शुक केवल मोक्ष का चिन्तन करते हुए अपने पिता के पास गया।

Verse 44

प्राहाभिवाद्य च तदा श्रेयोऽर्थी विनयान्वितः । मोक्षधर्मेषु कुशलो भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥ ४४ ॥

तब विनययुक्त, परम श्रेय का अभिलाषी होकर उसने प्रणाम किया और कहा—“हे भगवान्, मोक्ष-धर्मों में निपुण आप मुझे उपदेश दें।”

Verse 45

यथैव मनसः शांतिः परमा संभवेन्मुने । श्रृत्वा पुत्रस्य वचनं परमर्षिरुवाच तम् ॥ ४५ ॥

“हे मुने, जैसे मन की परम शान्ति उत्पन्न हो”—पुत्र के वचन सुनकर परमर्षि ने उससे कहा।

Verse 46

अधीष्व मोक्षशास्त्रं वै धर्मांश्च विविधानपि । पितुर्निदेशाज्जग्राह शुको ब्रह्मविदां वरः ॥ ४६ ॥

“मोक्ष-शास्त्र का अध्ययन करो और धर्म के विविध रूपों को भी जानो”—पिता की आज्ञा से ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ शुक ने उस उपदेश को ग्रहण किया।

Verse 47

योगशास्त्रं च निखिलं कापिलं चैव नारद । शतं ब्राह्म्या श्रिया युक्तं ब्रह्मतुल्यपराक्रमम् ॥ ४७ ॥

हे नारद, (उसने) सम्पूर्ण योग-शास्त्र तथा कापिल (सांख्य) मत भी—ब्राह्मी श्री से युक्त, ब्रह्मतुल्य पराक्रम वाले—सौ (उपदेश/ग्रन्थ) रूप में (प्रदान किए)।

Verse 48

मेने पुत्रं यथा व्यासो मोक्षशास्त्रविशारदम् । उवाच गच्छेति तदा जनकं मिथिलेश्वरम् ॥ ४८ ॥

व्यास ने उसे पुत्रवत् माना; और उसे मोक्ष-शास्त्र में निपुण जानकर तब कहा—“मिथिला के स्वामी जनक के पास जाओ।”

Verse 49

स ते वक्ष्यति मोक्षार्थं निखिलेन नराधिपः । पितुर्नियोगादगमज्जनकं मेथखिलं नृपम् ॥ ४९ ॥

वह नराधिपति तुम्हें मोक्ष के हेतु को पूर्ण रूप से बताएगा। पिता की आज्ञा से वह मिथिला-नरेश जनक के पास गया।

Verse 50

प्रष्टुं धर्मस्य निष्टां वै मोक्षस्य च परायणम् । उक्तश्च मानुषेण त्वं तथा गच्छेत्यविस्मितः ॥ ५० ॥

धर्म की निष्ठा और मोक्ष-रूप परम आश्रय को पूछने की इच्छा से, तुम्हें एक मनुष्य ने “वैसे ही जाओ” कहा; और तुम विस्मित हुए बिना “एवमस्तु—चलें” कहकर चल पड़े।

Verse 51

न प्रभावेण गंतव्यमंतरिक्षचरेण वै । आर्जवेनैव गंतव्यं न सुखाय क्षणात्त्वया ॥ ५१ ॥

केवल प्रभाव दिखाकर, मानो आकाश में चल रहे हों, आगे न बढ़ो। सरलता और आर्जव से ही चलो; क्षणिक सुख के लिए धर्मनिष्ठा मत छोड़ो।

Verse 52

न द्रष्टव्या विशेषा हि विशेषा हि प्रसंगिनः । अहंकारो न कर्तव्यो याज्ये तस्मिन्नराधिपे ॥ ५२ ॥

विशेष अधिकारों की चाह न करो, क्योंकि ऐसे भेद ही बंधन बढ़ाते हैं। जब वही नरेश यजमान होकर सेवा-योग्य हो, तब अहंकार न करना।

Verse 53

स्थातव्यं वसथे तस्य स ते छेत्स्यति संशयम् । स धर्मकुशलो राजा मोक्षशास्त्रविशारदः ॥ ५३ ॥

उसके निवास में ठहरना चाहिए; वह निस्संदेह तुम्हारा संशय काट देगा। वह राजा धर्म में निपुण और मोक्ष-शास्त्र में पारंगत है।

Verse 54

यथा यथा च ते ब्रूयात्तत्कार्यमविशंकया । एवमुक्तः स धर्मात्मा जगाम मिथिलां मुनिः ॥ ५४ ॥

वह जैसा-जैसा कहे, वैसा ही बिना शंका के करना। ऐसा कहे जाने पर वह धर्मात्मा मुनि मिथिला को चला गया।

Verse 55

पभ्द्यां शक्तोंतरिक्षेण क्रांतुं भूमिं ससागराम् । सगिरीं श्चाप्यतिक्रम्य भारतं वर्षमासदत् ॥ ५५ ॥

आकाशमार्ग से पृथ्वी—समुद्रों से घिरी और पर्वतों सहित—को लाँघने में समर्थ होकर वह भारतवर्ष में पहुँचा।

Verse 56

स देशान्विविधान्स्फीतानतिक्रम्य महामुनिः । विदेहान्वै समासाद्य जनकेन समागमत् ॥ ५६ ॥

वह महामुनि अनेक समृद्ध और विविध देशों को पार करके विदेह देश पहुँचे और वहाँ राजा जनक से मिले।

Verse 57

राजद्वारं समासाद्य द्वारपालैर्निवारितः । तस्थौ तत्र महायोगी क्षुत्पिपासादिवर्जितः ॥ ५७ ॥

राजद्वार पर पहुँचकर द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया; पर वह महायोगी वहीं खड़े रहे, भूख-प्यास आदि से रहित।

Verse 58

आतपे ग्लानिरहितो ध्यानयुक्तश्च नारद । तेषां तु द्वारपालानामेकस्तत्र व्यवस्थितः ॥ ५८ ॥

हे नारद, धूप में भी वह थकान से रहित और ध्यान में स्थित रहे; और उन द्वारपालों में से एक वहाँ तैनात खड़ा था।

Verse 59

मध्यंगतमिवादित्यं दृष्ट्वा शुकमवस्थितम् । जूजयित्वा यथान्यायमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ ५९ ॥

मध्याह्न के सूर्य-सा स्थित शुक को देखकर उसने विधिपूर्वक उनका पूजन किया, प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ा रहा।

Verse 60

प्रावेशयत्ततः कक्षां द्वितीयां राजवेश्मनः । तत्रांतःपुरसंबद्धं महच्चैत्रग्थोपमम् ॥ ६० ॥

तब उसने उन्हें राजमहल के दूसरे कक्ष में प्रवेश कराया; वहाँ अंतःपुर से जुड़ा एक विशाल सभागृह था, जो चैत्ररथ के समान शोभायमान था।

Verse 61

सुविभक्तजलाक्रीडं रम्यं पुष्पितपादपम् । दर्शयित्वासने स्थाप्य राजानं च व्यजिज्ञपत् ॥ ६१ ॥

भली-भाँति सुसज्जित जल-क्रीड़ा और पुष्पित वृक्षों से शोभित रमणीय स्थान दिखाकर, उसने राजा को सिंहासन पर बैठाया और फिर आदरपूर्वक निवेदन किया।

Verse 62

श्रुत्वा राजा शुकं प्राप्तं वारस्त्रीः स न्ययुंक्त च । सेवायै तस्य भावस्य ज्ञानाय मुनिसतम ॥ ६२ ॥

शुक के आगमन का समाचार सुनकर राजा ने वार-स्त्रियों को भी नियुक्त किया—उसकी सेवा के लिए, उसके अंतःभाव को जानने के लिए और उस मुनिश्रेष्ठ के मन को समझने के लिए।

Verse 63

तं चारुकेश्यः शुश्रेण्यस्तरुण्यः प्रियदर्शनाः । सूक्ष्मरक्तांबरधरास्तप्तकांचनभूषणाः ॥ ६३ ॥

सुंदर केशों वाली, कुलीन, तरुण और मनोहर दर्शन वाली स्त्रियाँ—सूक्ष्म रक्तवस्त्र धारण किए और दमकते स्वर्णाभूषणों से विभूषित—उसकी सेवा-शुश्रूषा करने लगीं।

Verse 64

संलापालापकुशाला भावज्ञाः सर्वकोविदाः । परं पंचाशतस्तस्य पाद्यादीनि व्यकल्पयन् ॥ ६४ ॥

वे परिष्कृत संवाद और मधुर वाणी में निपुण, भाव को जानने वाली और समस्त कलाओं में कुशल थीं; उन्होंने उसके लिए पाद्य आदि अतिथि-सत्कार की पचास से अधिक विधियाँ सजाईं।

Verse 65

देश कालोपपन्नेन साध्वन्नेनाप्यतर्पयन् । तस्य भुक्तवतस्तात तास्ततः पुरकाननम् ॥ ६५ ॥

देश-काल के अनुरूप उत्तम अन्न से भी वह तृप्त न हुआ। और, प्रिय तात, उसके भोजन कर चुकने पर वे स्त्रियाँ वहाँ से नगर-उपवन की ओर चली गईं।

Verse 66

सुरम्यं दर्शयामासुरेकैकत्वेन नारद । क्रीडंत्यश्च हसंत्यश्च गायंत्यश्चैव ताः शुकम् ॥ ६६ ॥

हे नारद, उन कन्याओं ने तोते को एक-एक करके अत्यन्त रमणीय दृश्य दिखाया—वे खेलतीं, हँसतीं और गातीं रहीं।

Verse 67

उदारसत्वं सत्वज्ञास्सर्वाः पर्य्यचरंस्तदा । आरणेयस्तु शुद्धात्मा जितक्रोधो जितेंद्रियः ॥ ६७ ॥

तब सत्त्व के मर्म को जानने वाली वे सब उस उदार-चित्त पुरुष की सेवा में लगीं। और आरणेय शुद्धात्मा, क्रोध-विजयी तथा इन्द्रिय-निग्रही था।

Verse 68

ध्यानस्थ एव सततं न हृष्यति न कुप्यति । पादशौचं तु कृत्वा वै शुकः संध्यामुपास्य च ॥ ६८ ॥

वह सदा ध्यान में स्थित रहता; न हर्षित होता, न क्रुद्ध। पाद-प्रक्षालन करके शुक ने संध्या-उपासना भी की।

Verse 69

निषसादासने पुण्ये तमेवार्थं व्यचिंतयत् । पूर्वरात्रे तु तत्रासौ भूत्वा ध्यानपरायणः ॥ ६९ ॥

वह पवित्र आसन पर बैठ गया और उसी उद्देश्य का चिंतन करता रहा। रात्रि के प्रथम प्रहर में वहीं रहकर वह ध्यान-परायण हो गया।

Verse 70

मध्यरात्रे यथान्याय्यं निद्रामाहारयत्प्रभुः । ततः प्रातः समुत्थाय कृत्वा शौचमनंतरम् ॥ ७० ॥

मध्यरात्रि में प्रभु ने विधिपूर्वक विश्राम किया। फिर प्रातः उठकर उन्होंने तत्क्षण शौच-शुद्धि की।

Verse 71

स्त्रीभिः परिवृत्तो धीमान्ध्यानमेवान्वपद्यत । अनेन विधिना तत्र तदहःशेषमप्युत ॥ ७१ ॥

स्त्रियों से घिरा होने पर भी वह बुद्धिमान केवल ध्यान में ही प्रवृत्त रहा; और इसी विधि से उसने वहाँ उस दिन का शेष भाग भी बिताया।

Verse 72

तां च रात्रिं नृपकुले वर्तयामास नारद ॥ ७२ ॥

और नारद ने वह रात राजकुल में बिताई।

Frequently Asked Questions

The araṇi motif sacralizes Śuka’s emergence by aligning it with Vedic fire-generation symbolism: spiritual knowledge and purity are portrayed as ‘kindled’ through tapas and ritual power, making Śuka’s birth a doctrinal emblem of yogic and Vedic potency rather than ordinary procreation.

It functions as a didactic contrast: even a great ascetic experiences a momentary disturbance of mind, underscoring the Purāṇic teaching on the mind’s volatility, while simultaneously framing Śuka as the purified outcome—one whose life trajectory is oriented toward mokṣa and unwavering meditation.

Janaka represents the ideal of jñāna integrated with kingship and worldly responsibility; sending Śuka to Janaka reinforces the mokṣa-dharma principle that liberation-knowledge must be stabilized through testing, humility, and instruction from a proven knower beyond one’s immediate lineage.

His steadiness in meditation (dhyāna), mastery over senses (indriya-jaya), and equanimity (samatva) amid refined pleasures—demonstrating that authentic vairāgya is internal and does not depend on external austerity alone.