Adhyaya 16
Virata ParvaAdhyaya 1652 Verses

Adhyaya 16

द्रौपद्याः भीमसेन-प्रबोधनम् (Draupadī Awakens Bhīmasena)

Upa-parva: Kīcaka-vadha Upākhyāna (Episode of Kīcaka’s Death)

Vaiśaṃpāyana narrates Draupadī’s immediate psychological and procedural response after being harmed by a charioteer-born court figure (Senāvāha/Kīcaka context). After performing the prescribed purification and washing her body and garments, she weeps and deliberates on remedy: what action is possible, where to go, and how her objective can be achieved under concealment. Concluding that no agent except Bhīma can effectively resolve the crisis, she rises at night, leaves her bed, and hastens to the royal kitchen where Bhīmasena is stationed in disguise. She approaches him with urgent intimacy—embracing and rousing him—using vivid similes that emphasize both her distress and his latent power. Draupadī reproaches Bhīma for sleeping while the offender lives, framing the situation as an ethical failure of protection. Bhīma awakens, questions her abrupt arrival, observes her altered complexion and emaciation, and invites full disclosure of the event. He assures her of trust and repeated rescue in adversity, urging her to state her intended course quickly and return before others notice, maintaining operational secrecy within ajñātavāsa.

Chapter Arc: विराट-नगर के अंतःपुर में सैरन्ध्री-वेषधारिणी द्रौपदी को देख कीचक कामातुर होकर उसे ‘सुकेशान्ते’ कहकर स्वागत करता है और उपहारों-आभूषणों का लोभ दिखाकर अपने वश में करना चाहता है। → कीचक दासियों को आदेश देता है कि स्वर्णमालाएँ, शंख-चूड़ियाँ, कुण्डल, मणिरत्न और उत्तम वस्त्र लाकर द्रौपदी को पहनाएँ; द्रौपदी भय और मर्यादा के बीच अपने पतियों (गन्धर्व-रूपक) का स्मरण कर प्रतिरोध करती है, पर कीचक का दर्प और अधिकार-बल बढ़ता जाता है। → राजसभा/राज-दृष्टि के निकट ही कीचक द्रौपदी का केश पकड़कर उसे भूमि पर गिराता है और लात मारकर अपमानित करता है—यह सार्वजनिक अत्याचार अध्याय का शिखर बनता है, जहाँ राजधर्म की परीक्षा भी खुलकर सामने आती है। → द्रौपदी राजधर्म का स्मरण कराती है कि प्रजा-रक्षणशील राजा को धर्म-सत्य में स्थित रहकर दण्ड-नीति चलानी चाहिए; सुदेष्णा भी कीचक-वध की बात कहती है, पर द्रौपदी संकेत देती है कि ‘दूसरे’ (उसके गन्धर्व-पति/पाण्डव) ही उसे दण्ड देंगे और वह शीघ्र यमलोकगामी होगा। → कीचक के उन्मत्त वचन—कि तुम्हारे सूर्य-तेजस्वी गन्धर्व-पति अभी क्यों नहीं आते—आगामी प्रतिशोध की आहट बनते हैं और पाठक को कीचक-वध की ओर खींचते हैं।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २५ श्लोक मिलाकर कुल ४६ “लोक हैं।) हि न [हुक हि 7 आम षोडशो< ध्याय: कीचकद्दारा द्रौपदीका अपमान कीचक उवाच स्वागतं ते सुकेशान्ते सुव्युष्टा रजनी मम । स्वामिनी त्वमनुप्राप्ता प्रकुरुष्व मम प्रियम्‌,कीचकने कहा--सुन्दर अलकोंवाली सैरन्ध्री! तुम्हारा स्वागत है। आजकी रातका प्रभात मेरे लिये बड़ा मंगलमय है। अब तुम मेरी स्वामिनी होकर मेरा प्रिय कार्य करो

Kīcaka said: “Welcome to you, O woman of lovely hair. For me, this night has passed into an auspicious dawn. Now that you have come here as my ‘mistress,’ do what is pleasing to me.”

Verse 2

सुवर्णमाला: कम्बूश्न कुण्डले परिहाटके । नानापत्तनजे शुभ्रे मणिरत्नं च शोभनम्‌

Kīcaka said: “(Bring) golden garlands, conch-shell ornaments, and earrings of fine gold; also bright and auspicious jewels and gems of excellent beauty, obtained from many trading towns.”

Verse 3

आहरन्तु च वस्त्राणि कौशिकान्यजिनानि च । मैं दासियोंको आज्ञा देता हूँ; वे तुम्हारे लिये सोनेके हार, शंखकी चूड़ियाँ, विभिन्न नगरोंमें बने हुए शुभ्र सुवर्णमय कर्णफूलके जोड़े, सुन्दर मणि-रत्नमय आभूषण, रेशमी साड़ियाँ तथा मृगचर्म आदि ले आवें |। अस्ति मे शयन दिव्यं त्वदर्थमुपकल्पितम्‌ । एहि तत्र मया सार्ध पिबस्व मधुमाधवीम्‌,मैंने तुम्हारे लिये पहलेसे ही यह दिव्य शय्या बिछा रखी है। आओ, यहाँ मेरे साथ बैठकर मधुर माध्वीरसका पान करो

Kīcaka orders his attendants to bring fine garments and animal-skins as gifts, and then boasts that a splendid bed has already been prepared for her. He urges her to come with him, sit close, and drink sweet, intoxicating liquor.

Verse 4

द्रौपहुुवाच (नाहं शक्‍्या त्वया <प्रष्ठुं निषादेनेव ब्राह्मणी । मा गमिष्यसि दुर्बुद्धे गतिं दुर्गान्तरान्तराम्‌ ।। द्रौपदी बोली--दुर्बुद्धे! जैसे निषाद ब्राह्मणीका स्पर्श नहीं कर सकता, उसी प्रकार तुम भी मुझे छू नहीं सकते। तुम मेरा तिरस्कार करके भारी-से-भारी दुर्गतिमें न पड़ो। यत्र गच्छन्ति बहव: परदाराभिमर्शका: । नरा: सम्भिन्नमर्यादा: कीटवच्च गुहाशया: ।।) उस दुरवस्थामें न जाओ, जहाँ धर्ममर्यादाका छेदन करनेवाले बहुत-से परस्त्रीगामी मनुष्य बिलमें सोनेवाले कीड़ोंकी भाँति जाया करते हैं। अप्रैषीद्‌ राजपुत्री मां सुराहारीं तवान्तिकम्‌ | पानमाहर मे क्षिप्रं पिपासा मे5ति चाब्रवीत्‌,राजकुमारी सुदेष्णाने मुझे मदिरा लानेके लिये तुम्हारे पास भेजा है। उनका कहना है --'मुझे बड़े जोरकी प्यास लगी है; अतः शीघ्र मेरे लिये पीने योग्य रस ले आओ'

Draupadī said: “O man of wicked mind! As a Niṣāda cannot touch a Brāhmaṇa woman, so you too cannot touch me. Do not scorn me and fall into the gravest ruin. Do not go to that state where many men—who break the bounds of dharma by laying hands on another’s wife—depart like insects that sleep in caves.” Then she said: “The princess Sudeshnā has sent me—her wine-bearer—to you. She said, ‘I am very thirsty; quickly bring me something to drink.’”

Verse 5

कीचक उवाच अन्या भद्रे नयिष्यन्ति राजपुत्र्या: प्रतिश्रुतम्‌ । इत्येतां दक्षिणे पाणौ सूतपुत्र: परामृशत्‌,कीचकने कहा--कल्याणी! राजपुत्री सुदेष्णाकी मँगायी हुई वस्तु दूसरी दासियाँ पहुँचा देंगी। ऐसा कहकर सूत॒पुत्रने द्रौपदीका दाहिना हाथ पकड़ लिया

Kīcaka said, “O auspicious lady, the other maidservants will deliver what has been promised to the princess.” Saying this, the charioteer’s son seized her by the right hand.

Verse 6

द्रौपहुवाच यथैवाहं नाभिचरे कदाचित्‌ पतीन्‌ मदाद्‌ वै मनसापि जातु । तेनैव सत्येन वशीकृतं त्वां द्रष्टास्मि पापं परिकृष्ममाणम्‌,द्रौपदी बोली--ओ पापी! यदि मैंने आजतक कभी मनसे भी अभिमानवश अपने पतियोंके विरुद्ध आचरण न किया हो तो इस सत्यके प्रभावसे मैं देखूँगी कि तू शत्रुके अधीन होकर पृथ्वीपर घसीटा जा रहा है

Draupadī said: “If it is true that I have never, even in my mind, acted against my husbands out of pride, then by the power of that very truth I shall see you, sinner, brought under another’s control and dragged along.”

Verse 7

वैशम्पायन उवाच स तामभिप्रेक्ष्य विशालनेत्रां जिधघृक्षमाण: परिभर्त्सयन्तीम्‌ जग्राह तामुत्तरवस्त्रदेशे स कीचकस्तां सहसा5$क्षिपन्तीम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! बड़े-बड़े नेत्रोंवाली द्रौपदीको इस प्रकार फटकारती देख कीचकने उसे पकड़ लेनेकी इच्छा की; किंतु वह सहसा झटका देकर पीछेकी ओर हटने लगी; इतनेमें ही झपटकर कीचकने उसके दुपट्टेका छोर पकड़ लिया

Vaiśampāyana said: Seeing Draupadī—wide-eyed—rebuking him, Kīcaka, driven by the urge to seize her, suddenly grabbed her by the edge of her upper garment. She tried at once to wrench herself free and pull back, but in that moment he lunged and caught hold of her scarf’s end.

Verse 8

प्रगृह्मामाणा तु महाजवेन मुहुर्विनि:श्वस्य च राजपुत्री । तया समाक्षिप्ततनु: स पाप: पपात शाखीव निकृत्तमूल:,अब वह बड़े वेगसे उसे काबूमें लानेका प्रयत्न करने लगा। इधर राजकुमारी द्रौपदी बारंबार लंबी साँसें भरती हुई उससे छूटनेका प्रयत्न करने लगी। उसने सँभलकर दोनों हाथोंसे कीचकको बड़े जोरका धक्का दिया; जिससे वह पापी जड़--मूलसे कटे वृक्षकी भाँति (धम्मसे) जमीनपर जा गिरा

As he seized her with great force, the princess repeatedly heaved deep breaths and struggled to break free. Regaining her composure, she thrust Kīcaka away with both hands; and that wicked man fell to the ground like a tree whose root has been cut—an image underscoring the moral collapse of one who violates dharma through lust and coercion.

Verse 9

सा गृहीता विधुन्वाना भूमावाक्षिप्प कीचकम्‌ | सभां शरणमागच्छद्‌ यत्र राजा युधिष्ठिर:

Seized by him, she shook herself free and hurled Kīcaka down to the ground. Then she fled for refuge to the royal assembly hall—where King Yudhiṣṭhira was—seeking protection.

Verse 10

इस प्रकार पकड़में आनेपर कीचकको धरतीपर गिराकर भयसे काँपती हुई द्रौपदीने भागकर उस राज-सभाकी शरण ली, जहाँ राजा युधिष्ठिर विद्यमान थे ।। तां कीचकः प्रधावन्तीं केशपाशे परामृशत्‌ । अथीनां पश्यतो राज्ञ: पातयित्वा पदावधीत्‌

As Draupadī fled in terror toward the royal assembly seeking refuge where King Yudhiṣṭhira sat, Kīcaka rushed after her, seized her by the braid of her hair, threw her down before the very eyes of the king and the gathered nobles, and kicked her.

Verse 11

भारत! इतनेमें ही भगवान्‌ सूर्यने जिस राक्षसको द्रौपदीकी रक्षाके लिये नियुक्त कर रखा था, उसने कीचकको पकड़कर आँधीके समान वेगसे दूर फेंक दिया

O descendant of Bharata, just then the blessed Sun—who had appointed a rākṣasa to guard Draupadī—caused that guardian to seize Kīcaka and hurl him far away with the speed of a storm. The episode underscores that when a woman under protection is threatened, providential guardianship and righteous force intervene to restrain the aggressor and uphold moral order.

Verse 12

स पपात तदा भूमौ रक्षोबलसमाहत: । विघूर्णमानो निश्रेष्टश्छिन्नममूल इव द्रुम:,राक्षसद्वारा बलपूर्वक आहत होकर कीचकके सारे शरीरमें चक्कर आ गया और वह जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा

Then, struck down with overpowering force by the rākṣasa’s might, he reeled as dizziness seized his whole body and fell to the earth, motionless—like a tree cut off at the root. The scene underscores how brute aggression, when met by a stronger and more resolute power, collapses in an instant, exposing the fragility of pride and violence.

Verse 13

(सभायां पश्यतो राज्ञो विराटस्य महात्मन: । ब्राह्मणानां च वृद्धानां क्षत्रियाणां च पश्यताम्‌ ।। तस्या: पादाभितप्ताया मुखाद्‌ रुधिरमास्रवत्‌ | तां दृष्टवा तत्र ते सभ्या हाहा भूता: समन्ततः ।। न युक्त सूतपुत्रेति कीचकेति च मानवा: । किमियं वध्यते बाला कृपणा चाप्यबान्धवा ।।) सभामें महामना राजा विराटके तथा वृद्ध ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके देखते-देखते कीचकके पादप्रहारसे पीड़ित हुई द्रौपदीके मुँहसे रक्त बहने लगा। उसे उस अवस्थामें देखकर समस्त सभासद्‌ सब ओरसे हाहाकार कर उठे और सब लोग कहने लगे--'“सूतपुत्र कीचक! तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं है। यह बेचारी अबला अपने बन्धु-बान्धवोंसे रहित है। इसे क्यों पीड़ा दे रहे हो?' तां चासीनौ ददृशतुर्भीमसेनयुधिष्ठिरौ । अमृष्यमाणौ कृष्णाया: कीचकेन पराभवम्‌,उस समय भीमसेन और युधिष्ठिर भी राजसभामें बैठे हुए थे। उन्होंने कीचकके द्वारा द्रौपदीका यह अपमान अपनी आँखों देखा; जिसे वे सहन न कर सके

While the great-souled King Virāṭa looked on in the assembly—along with aged brāhmaṇas and watching kṣatriyas—Draupadī, tormented by Kīcaka’s kicks, began to bleed from her mouth. Seeing her in that condition, the courtiers all around broke into cries of distress. People exclaimed, “O Kīcaka, son of a sūta, this is not right! Why are you harming this helpless young woman, pitiable and without protectors?” At that very time Bhīmasena and Yudhiṣṭhira too were seated in the royal hall; they witnessed Kīcaka’s humiliation of Kṛṣṇā (Draupadī) and could not endure it.

Verse 14

तस्य भीमो वध प्रेप्सु: कीचकस्य दुरात्मन: । वन्तैर्दन्तांस्तदा रोषान्निष्पिपेष महामना:,महामना भीमसेन दुरात्मा कीचकको मार डालनेकी इच्छासे उस समय रोषवश दाँतोंसे दाँत पीसने लगे

Vaiśampāyana said: Then Bhīma, intent on killing the wicked Kīcaka, ground his teeth against his teeth in wrath—his great mind fixed on ending that wrongdoing. The verse highlights righteous anger arising when a powerful oppressor violates moral bounds, and the resolve to restrain adharma through decisive action.

Verse 15

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीके द्वारा मदिरानयनसम्बन्धी पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ,धूमच्छाया हाुभजतां नेत्रे चोच्छितपक्ष्मणी । सस्वेदा भृकुटी चोग्रा ललाटे समवर्तत

Her eyes grew dim, as if veiled by a smoky shadow, and her eyelashes stood bristling. Beads of sweat appeared, and a fierce frown gathered upon her forehead—signs of intense inner agitation and restrained wrath, as dignity and resolve struggled against humiliation.

Verse 16

उनकी आँखोंकी पलकें ऊपरको उठकर तन गयीं। उनमें धूआँ-सा छा गया, ललाठमें पसीना निकल आया और भौहें टेढ़ी होकर भयंकर प्रतीत होने लगीं ।। हस्तेन ममृजे चैव ललाटं परवीरहा । भूयश्व त्वरित: क्रुद्ध: सहसोत्थातुमैच्छत,शत्रुहन्ता भीम हाथसे माथेका पसीना पोंछने लगे। फिर तुरंत ही प्रचण्ड कोपमें भर गये और सहसा उठनेकी इच्छा करने लगे (भ्रातु: प्रयच्छ त्वरिता जीवश्राद्धं त्वमद्य वै सुदृष्टं कुरु वै चैनं नासून्‌ मन्ये धरिष्यति ।। रानी! आज तुम अपने भाईके लिये शीघ्र ही जीवित श्राद्ध कर लो। उसके लिये आवश्यक दान दे लो। साथ ही उसे आँख भरकर अच्छी तरह देख लो। मेरा विश्वास है कि अब उसके प्राण नहीं रहेंगे। तेषां हि मम भर्तृणां पञ्चानां धर्मचारिणाम्‌ | एको दुर्धर्षणो<त्यर्थ बले चाप्रतिमो भुवि ।। निर्मनुष्यमिमं लोकं कुर्यात्‌ क्रुद्धों निशामिमाम्‌ । न च संक्रुध्यते तावद्‌ गन्धर्व: कामरूपधृक्‌ ।। मेरे पाँच धर्मात्मा पतियोंमेंसे एक अत्यन्त दुःसह एवं अमर्षशील वीर हैं। भूतलपर बलमें उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। वे कुपित होनेपर इस रातमें ही इस संसारको मनुष्योंसे शून्य कर सकते हैं। परंतु इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वे गन्धर्व न जाने क्‍यों अभीतक क्रोध नहीं कर रहे हैं। वैशम्पायन उवाच सुदेष्णामेवमुक्त्वा तु सैरन्ध्री दु:ःखमोहिता । कीचकस्य वधार्थाय व्रतदीक्षामुपागमत्‌ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! रानी सुदेष्णासे ऐसा कहकर दुःखसे मोहित हुई सैरन्ध्रीने कीचकके वधके लिये व्रतकी दीक्षा ग्रहण की। अभ्यर्थिता च नारीभिममानिता च सुदेष्णया | न च स्नाति न चाश्राति न पांसून्‌ परिमार्जति ।। दूसरी स्त्रियोंने उससे बहुत प्रार्थना की। रानी सुदेष्णाने भी उसे बहुत मनाया; तथापि न वह स्नान करती, न भोजन करती और न अपने शरीरकी धूल ही झाड़ती थी। रुधिरक्लिन्नवदना बभूव रुदितेक्षणा ।। तां तथा शोकसंततप्तां दृष्ट्‌्वा प्ररुदितां स्त्रिय: । कीचकस्य वध॑ सर्वा मनोभिक्ष शशंसिरे ।। उसका मुँह रक्तसे भींगा हुआ था, आँखोंमें रुलाईके आँसू भरे हुए थे। उसे इस प्रकार शोकसे संतप्त होकर रोती देख सब स्त्रियाँ मन-ही-मन कीचकके वधकी इच्छा करने लगीं। जनमेजय उवाच अहो दु:खतरं प्राप्ता कीचकेन पदा हता । प्रतिव्रता महा भागा द्रौपदी योषितां वरा ।। जनमेजय बोले--विप्रवर! संसारकी युवतियोंमें श्रेष्ठ एवं पतिव्रता महाभागा द्रौपदीको कीचकने लात मार दी; इससे वह महान्‌ दुःखमें डूब गयी। अहो! यह कितने कष्टकी बात है। दुःशलां मानयन्ती या भर्तृणां भगिनीं शुभाम्‌ । नाशपत्‌ सिन्धुराजं तं बलात्कारेण वाहिता ।। जिस समय सिन्धुराज जयद्रथने बलपूर्वक उसका अपहरण किया था, उस समय उसने अपने पतियोंकी बहिन दुःशलाका सम्मान करते हुए वह कष्ट सह लिया और शुभलक्षणा सिन्धुराजको शाप नहीं दिया। किमर्थ धर्षणं प्राप्ता कीचकेन दुरात्मना । नाशपत्‌ त॑ महाभागा कृष्णा पादेन ताडिता ।। परंतु जब दुरात्मा कीचकने उसका तिरस्कार किया और उसे लातसे मारा, उस समय महाभागा कृष्णाने उस दुष्टको शाप क्‍यों नहीं दे दिया?। तेजोराशिरियं देवी धर्मज्ञा सत्यवादिनी । केशपक्षे परामृष्टा मर्षयिष्यत्यशक्तवत्‌ ।। नैतत्‌ कारणमल्पं हि श्रोतुकामो5स्मि सत्तम | कृष्णायास्तु परिक्लेशान्मनो मे दूयते भूशम्‌ ।। देवी द्रौपदी तेजकी राशि थी। वह धर्मज्ञा और सत्यवादिनी थी। उसके-जैसी तेजस्विनी स्त्री अपने केश पकड़ लिये जानेपर असमर्थकी भाँति चुपचाप सह लेगी, यह सम्भव नहीं है। यदि उसने सह लिया तो इसका कोई छोटा कारण नहीं होगा। साधुशिरोमणे! मैं वह कारण सुनना चाहता हूँ। कृष्णाके क्लेशकी बात सुनकर मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है। कस्य वंशे समुद्भूत: स च दुर्ललितो मुने । बलोन्मत्त: कथं चासीच्छद्यालो मात्स्यस्य कीचक: ।। मुने! मत्स्यराजका साला दुष्ट कीचक किसके कुलमें उत्पन्न हुआ था? और वह बलसे उन्मत्त क्‍यों हो गया था? । वैशम्पायन उवाच त्ववुक्तोडयमनुप्रश्न: कुरूणां कीर्तिवर्धन । एतत्‌ सर्व तथा वक्ष्ये विस्तरेणैव पार्थिव ।। वैशम्पायनजीने कहा--कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले नरेश! तुम्हारा उठाया हुआ यह प्रश्न ठीक है। मैं यह सब विस्तारपूर्वक बताऊँगा। ब्राह्मुण्यां क्षत्रियाज्जात: सूतो भवति पार्थिव । प्रातिलोम्येन जातानां स होको द्विज एव तु ।। राजन! क्षत्रिय पिता और ब्राह्मणी मातासे उत्पन्न हुआ बालक 'सूत” कहलाता है। प्रतिलोमसंकर जातियोंमें अकेली यह सूत जाति ही द्विज कही गयी है। रथकारमितीमं हि क्रियायुक्तं द्विजन्मनाम्‌ । क्षत्रियादवरं वैश्याद्‌ विशिष्टमिति चक्षते ।। द्विजोचित कर्मोसे युक्त उस सूतको ही रथकार भी कहते हैं। इसे क्षत्रियसे हीन और वैश्यसे श्रेष्ठ बताते हैं। सह सूतेन सम्बन्ध: कृतपूर्वो नरेश्वरैः । तथापि तैर्महीपाल राजशब्दो न लभ्यते ।। राजन! पहलेके नरेशोंने सूतजातिके साथ भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया है, परंतु उन्हें राजाकी उपाधि नहीं प्राप्त होती थी। तेषां तु सूतविषय: सूतानां नामतः कृत: । उपजीव्य च यत्‌ क्षत्र॑ लब्धं सूतेन तत्‌ पुरा ।। उनके लिये सूतोंके नामसे सूतराज्य ही नियत कर दिया गया था। वह राज्य सूतजातिके एक पुरुषने किसी क्षत्रियकी सेवा करके ही प्राप्त किया था। सूतानामधिपो राजा केकयो नाम विश्रुत: ।। राजकन्यासमुद्भूत: सारथ्येडनुपमो5भवत्‌ | सुप्रसिद्ध केकय नामक राजा सूतोंके ही अधिपति थे। उनका जन्म किसी क्षत्रियकन्याके गर्भसे हुआ था। वे सारथिके कर्ममें अनुपम थे। पुत्रास्तस्य कुरुश्रेष्ठ मालव्यां जज्ञिरे तदा ।। तेषामतिबलो ज्येछ: कीचक: सर्वजित्‌ प्रभो । कुरुश्रेष्ठ! उनके मालवीके गर्भसे कई पुत्र उत्पन्न हुए। प्रभो! उन पुत्रोंमें कीचक ही सबसे बड़ा था। वह अत्यन्त बलवान्‌ और सर्वविजयी योद्धा था। द्वितीयायां तु मालव्यां चित्रा हवरजाभवत्‌ | तां सुदेष्णेति वै प्राहुर्विराटमहिषीं प्रियाम्‌ ।। राजा केकयकी दूसरी रानी भी मालवकन्या ही थी। उसके गर्भसे चित्रा नामवाली कन्या उत्पन्न हुई, जो समस्त कीचकबन्धुओंकी छोटी बहिन थी। उसीको सुदेष्णा भी कहते हैं। वही आगे चलकर महाराज विराटकी प्यारी पटरानी हुई। तां विराटस्य मात्स्यस्य केकय: प्रददौ मुदा । सुरथायां मृतायां तु कौसल्यां श्वेतमातरि ।। विराटकी बड़ी रानी कोसलदेशकी राजकुमारी सुरथा, जो श्वेतकी जननी थी, उसकी मृत्यु हो जानेपर केकय-नरेशने अपनी कन्या सुदेष्णाका विवाह मत्स्यराज विराटके साथ प्रसन्नतापूर्वक कर दिया। सुदेष्णां महिषीं लब्ध्वा राजा दुःखमपानुदत्‌ ।। उत्तरं चोत्तरां चैव विराटात्‌ पृथिवीपते । सुदेष्णा सुषुवे देवी कैकेयी कुलवृद्धये ।। सुदेष्णाको महारानीके रूपमें पाकर राजा विराटका दुःख दूर हो गया। जनमेजय! केकयकुमारी रानी सुदेष्णाने राजा विराटसे अपने कुलकी वृद्धिके लिये उत्तर और उत्तरा नामक दो संतानोंको उत्पन्न किया। मातृष्वसूसुतां राजन्‌ कीचकस्तामनिन्दिताम्‌ । सदा परिचरन प्रीत्या विराटे न्‍्यवसत्‌ सुखी ।। राजन! कीचक अपनी मौसीकी बेटी सती-साध्वी सुदेष्णाकी प्रेमपूर्वक परिचर्या करता हुआ विराटके यहाँ सुखपूर्वक रहने लगा। भ्रातरस्तस्य विक्रान्ता: सर्वे च तमनुव्रता: । विराटस्यैव संद्रष्टा बल॑ कोशं च वर्धयन्‌ ।। उसके सभी पराक्रमी भाई कीचकके ही प्रेमी भक्त थे; अतः वे भी विराटके ही बल और कोषको बढ़ाते हुए प्रसन्नतापूर्वक वहाँ रहने लगे। कालेया नाम दैतेया: प्रायशो भुवि विश्रुता: । जज्ञिरे कीचका राजन्‌ बाणो ज्येष्ठस्ततो5भवत्‌ ।। स हि सर्वास्त्रिसम्पन्नो बलवान्‌ भीमविक्रम: । कीचको नष्टमर्यादो बभूव भयदो नृणाम्‌ | राजन! कालेय नामक दैत्य ही, जो प्रायः इस भूमण्डलमें विख्यात थे, कीचकोंके रूपमें उत्पन्न हुए थे। कालेयोंमें बाण सबसे बड़ा था। वही सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न, भयंकर पराक्रमी और महाबली कीचक हुआ, जो धर्मकी मर्यादाको तोड़ने और मनुष्योंके भयको बढ़ानेवाला था। त॑ प्राप्प बलसम्मत्तं विराट: पृथिवीपति: ।। जिगाय सर्वाश्व रिपून्‌ यथेन्द्रो दानवानिव । उस बलोन्मत्त कीचककी सहायता पाकर जैसे इन्द्र दानवोंपर विजय पाते हैं, उसी प्रकार राजा विराटने भी समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्त की। मेखलांश्व त्रिगर्ताश्न दशार्णाश्व॒ कशेरुकान्‌ । मालवान्‌ यवनांश्चैव पुलिन्दानू काशिकोसलान्‌ | अड्डन्‌ वज्ान्‌ कलिड्रांश्न तड़णान्‌ परतड़णान्‌ | मलदान्‌ निषचधांश्वैव तुण्डिकेरांश्व कोड़कणान्‌ ।। करदांश्व निषिद्धांश्व शिवान्‌ दुश्छिल्लिकांस्तथा । अन्ये च बहव: शूरा: नानाजनपदेश्वरा: । कीचकेन रणे भग्ना व्यद्रवन्त दिशो दश ।। मेखल, त्रिगर्त, दशार्ण, कशेरुक, मालव, यवन, पुलिन्द, काशी, कोसल, अंग, वंग, कलिंग, तंगण, परतंगण, मलद, निषध, तुण्डिकेर, कोंकण, करद, निषिद्ध, शिव, दुश्छिल्लिक तथा अन्य नाना जनपदोंके स्वामी अनेक शूरवीर नरेश रणभूमिमें कीचकसे पराजित हो दसों दिशाओंमें भाग गये। तमेवं वीर्यसम्पन्नं नागायुतबलं रणे । विराटस्तत्र सेनायाक्षकार पतिमात्मन: ।। ऐसे पराक्रमसम्पन्न कीचकको, जो संग्राममें दस हजार हाथियोंका बल रखता था, राजा विराटने अपना सेनापति बना लिया। विराटभ्रातरश्चैव दश दाशरथोपमा: । ते चैनानन्ववर्तन्त कीचकान्‌ बलवत्तरान्‌ ।। विराटके दस भाई ऐसे थे, जो दशरथनन्दन श्रीरामके समान शक्तिशाली समझे जाते थे। वे भी इन प्रबलतर कीचकबन्धुओंका अनुसरण करने लगे। एवंविधबलोपेता: कीचकास्ते न तद्विधा: । राज्ञ: श्याला महात्मानो विराटस्थ हितैषिण: । ऐसे बलसम्पन्न कीचक, जो राजा विराटके साले लगते थे, शौर्यमें अपना सानी नहीं रखते थे। वे महामना विराटके बड़े हितैषी थे। एतत्‌ ते कथितं सर्व कीचकस्य पराक्रमम्‌ ।। द्रौपदी न शशापैनं यस्मात्‌ तद्‌ गदत: शृणु । जनमेजय! इस प्रकार मैंने तुमसे कीचकके पराक्रमकी सारे बातें बता दीं। अब यह भी सुन लो कि द्रौपदीने उसे शाप क्‍यों नहीं दिया?। क्षरतीति तप: क्रोधादूषयो न शपन्ति हि ।। जानन्ती तद्‌ यथातत्त्वं पाउ्चाली न शशाप तम्‌ | क्रोधसे तपस्या नष्ट होती है, इसीलिये ऋषि भी सहसा किसीको शाप नहीं देते हैं। द्रौपदी इस बातको अच्छी तरह जानती थी; इसीलिये उसने उसे शाप नहीं दिया। क्षमा धर्म: क्षमा दानं क्षमा यज्ञ: क्षमा यश: । क्षमा सत्यं क्षमा शीलं क्षमा कीर्ति: क्षमा परम्‌ ।। क्षमा पुण्यं क्षमा तीर्थ क्षमा सर्वमिति श्रुति: । क्षमावतामयं लोक: परश्रैव क्षमावताम्‌ | एततू्‌ सर्व विजानन्ती सा क्षमामन्वपद्यत ।। क्षमा धर्म है, क्षमा दान है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है, क्षमा सत्य है, क्षमा शील है, क्षमा कीर्ति है, क्षमा सबसे उत्कृष्ट तत्त्व है, क्षमा पुण्य है, क्षमा तीर्थ है और क्षमा सब कुछ है; ऐसा श्रुतिका कथन है। यह लोक क्षमावानोंका ही है। परलोक भी क्षमावानोंका ही है। द्रौपदी यह सब कुछ जानती थी, इसलिये उसने क्षमाका ही आश्रय लिया। भर्तृणां मतमाज्ञाय क्षमिणां धर्मचारिणाम्‌ | नाशपत्‌ तं विशालाक्षी सती शक्तापि भारत ।। भरतनन्दन! क्षमाशील एवं धर्मात्मा पतियोंका मत जानकर विशाल नेत्रोंवाली सती- साध्वी द्रौपदीने समर्थ होते हुए भी कीचकको शाप नहीं दिया। पाण्डवाश्चरापि ते सर्वे द्रौपदी प्रेक्ष्य दु:खिता: । क्रोधाग्निना व्यदहुन्त तदा कालव्यपेक्षया ।। समस्त पाण्डव भी द्रौपदीकी दुरवस्था देखकर दुःखी हो समयकी प्रतीक्षा करते हुए क्रोधाग्निमें जलते रहे। अथ भीमो महाबाहु: सूदयिष्यंस्तु कीचकम्‌ । वारितो धर्मपुत्रेण वेलयेव महोदधि: ।। महाबाहु भीमसेन तो कीचकको तत्काल मार डालनेके लिये उद्यत थे; परंतु जैसे वेला (तटकी सीमा) महासागरके वेगको रोके रहती है, उसी प्रकार धर्मपुत्र युधिष्ठिरने उन्हें रोक दिया। संधार्य मनसा रोषं दिवारात्र विनि:श्वसन्‌ । महानसे तदा कृच्छात्‌ सुष्वाप रजनीं च ताम्‌ ।।) वे मनमें क्रोधको रोककर दिन-रात लंबी साँसें खींचते रहते थे। उस दिन पाकशालामें जाकर वे रातमें बड़े कष्टसे सोये। इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीपरिभवे षोडशो<ध्याय: ।। १६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीतिरस्कारसम्बन्धी सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ

Vaiśampāyana said: Bhīma, the slayer of enemy-heroes, wiped the sweat from his brow with his hand. Then, once more, he was swiftly seized by fierce anger and wished to rise up at once. After speaking thus to Queen Sudeṣṇā, the maidservant (Draupadī in disguise), overwhelmed by grief and bewilderment, undertook a vow-discipline with the single aim of bringing about Kīcaka’s death. In ethical tone, the passage highlights restrained wrath: Bhīma’s impulse to immediate violence is palpable, yet the narrative frames the coming act not as uncontrolled rage but as a deliberate, vowed course aligned with timing and dharma.

Verse 17

अथावमृदनादड्गुष्ठमड्गुछ्ेन युधिष्ठिर: । प्रबोधनभयाद्‌ राजा भीम तं॑ प्रत्यषेधयत्‌,तब राजा युधिष्ठिरने रहस्य प्रकट हो जानेके डरसे अपने अँगूठेसे भीमका अँगूठा दबाया और इस प्रकार उन्हें उत्तेजित होनेसे रोका

Then, sensing the danger of an impulsive outburst, King Yudhiṣṭhira pressed Bhīma’s thumb with his own. Fearing that their concealed identity might be exposed, he restrained Bhīma and checked him from being provoked into action.

Verse 18

त॑ मत्तमिव मातडूं वीक्षमाणं वनस्पतिम्‌ । स तमावारयामास भीमसेनं युधिषछिर:

Seeing that tree as if it were a rut-maddened elephant, Yudhiṣṭhira restrained Bhīmasena. The moment underscores Yudhiṣṭhira’s ethic of measured action—checking impulsive force with discernment and self-control, even amid tension and danger.

Verse 19

भीमसेन मतवाले गजराजकी भाँति एक वृक्षकी ओर देख रहे थे। तब युधिष्ठिरने उन्हें रोकते हुए कहा-- ।। विराटकी राजसभामें कीचकद्दारा सैरन्ध्रीका अपमान आलोकयसि किं वृक्ष सूद दारुकृतेन वै यदि ते दारुभि: कृत्यं बहिर्वक्षात्रिगृह्यताम्‌,“बललव! क्‍या तुम ईंधनके लिये वृक्षकी ओर देखते हो? यदि रसोईके लिये सूखी लकड़ी चाहिये, तो बाहर जाकर वृक्षसे ले लो”

Vaiśampāyana said: In Virāṭa’s royal hall, seeing Kīcaka insult the maidservant (Draupadī in disguise), Bhīmasena stared toward a tree like an intoxicated lord of elephants—his mind already turning to violent retaliation. Then Yudhiṣṭhira restrained him and said, “Ballava, why are you looking at a tree—do you need firewood? If you require dry wood for the kitchen, go outside and take it from a tree.” By this guarded speech, Yudhiṣṭhira protects their concealment and checks Bhīma’s righteous anger from erupting at the wrong time, upholding prudence and dharma under constraint.

Verse 20

(यस्य चार्द्रस्य वृक्षस्य शीतच्छायां समाश्रयेत्‌ । न तस्य पर्ण द्रुह्मेत पूर्ववृत्तमनुस्मरन्‌ ।। “जिस हरे-भरे वृक्षकी शीतल छायाका आश्रय लेकर रहा जाय, उसके किसी एक पत्तेसे भी द्रोह नहीं करना चाहिये। उसके पहलेके उपकारोंको सदा याद रखकर उसकी रक्षा करनी चाहिये'। इज्धितज्ञः स तु भ्रातुस्तृष्णीमासीद्‌ वृकोदर: ।। भीमस्य तु समारम्भं दृष्टवा राज्ञश्न चेष्टितम्‌ । द्रौपद्यभ्यधिकं क्रुद्धा प्रारुवत्‌ सा पुन: पुनः ।। कीचकेनानुगमनात्‌ कृष्णा ताम्रायतेक्षणा ।) तब भाईके संकेतको समझनेवाले भीमसेन उस समय चुप हो गये। भीमके उस क्रोधको तथा राजा युधिष्ठिरकी शान्तिपूर्ण चेष्टाको देखकर द्रौपदी अधिक कुद्ध हो उठी। कीचकके पीछा करनेसे कृष्णाकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं। वह खीझके कारण बार- बार रोने लगी। सा सभाद्वारमासाद्य रुदती मत्स्यमब्रवीत्‌ । अवेक्षमाणा सुश्रोणी पतींस्तान्‌ दीनचेतस:,इधर सुन्दर कटियप्रान्तवाली द्रौपदी राजसभाके द्वारपर आकर अपने दीन हृदयवाले पतियोंकी ओर देखती हुई मत्स्यनरेशसे बोली

Vaiśampāyana said: “If one has taken refuge in the cool shade of a lush, living tree, one should not betray it—not even by harming a single leaf. Remembering its former kindness, one should protect it.” This maxim underscores the ethic of gratitude and non-betrayal toward a benefactor or protector, especially when one is dependent upon them.

Verse 21

आकारमभिरक्षन्ती प्रतिज्ञाधर्मसंहिता । दहामानेव रौद्रेण चक्षुषा द्रुपदात्मजा,उस समय वह प्रतिज्ञारूप धर्मसे आबद्ध होनेके कारण अपने स्वरूपको छिपा रही थी; किंतु उसके नेत्र मानो जला रहे हों, इस प्रकार भयंकर हो उठे थे

Bound by the dharma of her vow, Drupada’s daughter concealed her true identity; yet her eyes, fierce with wrath, seemed as though they were burning.

Verse 22

(द्रौपदु॒वाच प्रजारक्षणशीलानां राज्ञां हमिततेजसाम्‌ | कार्य हि पालन नित्यं धर्मे सत्ये च तिषठताम्‌ ।। स्वप्रजायां प्रजायां च विशेषं नाधिगच्छताम्‌ | द्रौपदीने कहा--जों स्वभावसे ही प्रजाजनोंकी रक्षामें लगे हुए हैं, सदा धर्म और सत्यके मार्ममें स्थित हैं तथा प्रजा और अपनी संतानमें कोई अन्तर नहीं समझते, उन अमिततेजस्वी राजाओंको चाहिये कि वे सदा आश्रितजनोंका पालन एवं संरक्षण करें। प्रियेष्वपि च द्वेष्येषु समत्वं ये समाश्रिता: ।। विवादेषु प्रवृत्तेषु समं कार्यानुदर्शिना । राज्ञा धर्मासनस्थेन जितौ लोकावुभावपि ।। जो प्रियजनों तथा द्वेषपात्रोंमें भी समानभाव रखते हैं, प्रजाजनोंमें विवाद आरम्भ होनेपर जो राजा धर्मासनपर बैठकर समानभावसे प्रत्येक कार्यपर विचार करते हैं, वे दोनों लोकोंको जीत लेते हैं। राजन्‌ धर्मासनस्थोडपि रक्ष मां त्वमनागसीम्‌ ।। अहं त्वनपराध्यन्ती कीचकेन दुरात्मना । पश्यतस्ते महाराज हता पादेन दासवत्‌ ।। राजन! आप धर्मके आसनपर बैठे हैं। मुझ निरपराध अबलाकी रक्षा कीजिये। महाराज! मैंने कोई अपराध नहीं किया है तो भी दुरात्मा कीचकने आपके देखते-देखते मुझको लात मारी है; मेरे साथ (खरीदे हुए) दासका-सा बर्ताव किया है। मत्स्याधिप प्रजा रक्ष पिता पुत्रानिवौरसान्‌ ।। यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात्मा कुरुते नृप: । अचिरात्‌ त॑ दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रव: ।। मत्स्यराज! जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार आप अपने प्रजाजनोंका संरक्षण कीजिये। जो मोहमें डूबा हुआ राजा अधर्मयुक्त कार्य करता है, उस दुरात्माको उसके शत्रु शीघ्र ही वशमें कर लेते हैं। मत्स्यानां कुलजत्त्वं हि तेषां सत्यं परायणम्‌ । त्वं किलैवंविधो जात: कुले धर्मपरायणे ।। आप मत्स्यकुलमें उत्पन्न हुए हैं। सत्य ही मत्स्यनरेशोंका महान्‌ आश्रय रहा है। आप भी इस धर्मपरायण कुलमें ऐसे ही धर्मात्मा पैदा हुए हैं। अततस्त्वाहमभिक्रन्दे शरणार्थ नराधिप । त्राहि मामद्य राजेन्द्र कीचकात्‌ पापपूरुषात्‌ ।। अतः नरेश्वर! मैं आपसे शरण देनेके लिये रुदन करती हूँ। राजेन्द्र! आज मुझे इस पापी कीचकसे बचाइये। अनाथामिह मां ज्ञात्वा कीचक: पुरुषाधम: । प्रहरत्येव नीचात्मा न तु धर्ममवेक्षते ।। पुरुषाधम कीचक यहाँ मुझे असहाय जानकर मार रहा है। यह नीच अपने धर्मकी ओर नहीं देखता है। अकार्याणामनारम्भात्‌ कार्याणामनुपालनात्‌ | प्रजासु ये सुवृत्तास्ते स्वर्गमायान्ति भूमिपा: ।। जो भूमिपाल न करनेयोग्य कार्योका आरम्भ नहीं करते, करनेयोग्य कर्तव्योंका निरन्तर पालन करते हैं और सदा प्रजाके साथ उत्तम बर्ताव करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं। कार्याकार्यविशेषज्ञा: कामकारेण पार्थिव । प्रजासु किल्बिषं कृत्वा नरकं यान्त्यधोमुखा: ।। परंतु राजन! जो राजा कर्तव्य और अकर्तव्यके अन्तरको जानते हुए भी स्वेच्छाचारितावश प्रजावर्गके साथ पापाचार करते हैं, वे अधोमुख हो नरकमें जाते हैं। नैव यज्ञैर्न वा दानैर्न गुरोरुपसेवया । प्राप्रुवन्ति तथा धर्म यथा कार्यानुपालनात्‌ ।। राजालोग यज्ञ, दान अथवा गुरुसेवनसे भी वैसा धर्म (पुण्य) नहीं पाते हैं, जैसा कि अपने कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करनेसे प्राप्त करते हैं। क्रियायामक्रियायां च प्रापणे पुण्यपापयो: ।। प्रजायां सृज्यमानायां पुरा होतदुदाह्मतम्‌ । एतद्‌ वो मानुषा: सम्यक्‌ कार्य द्वन्ड्धतया भुवि । अस्मिन्‌ सुनीते दुर्नीते लभते कर्मजं फलम्‌ ।। पूर्वकालमें सृष्टिकी रचनाके समय ब्रह्माजीने क्रिया करने और न करनेकी स्थितिमें पुण्य और पापकी प्राप्तिके विषयमें इस प्रकार कहा था--“मनुष्यो! तुमलोगोंको इस पृथ्वीलोकमें द्वन्धरूपमें प्राप्त धर्म और अधर्मके विषयमें भलीभाँति समझकर कर्म करना चाहिये; क्योंकि अच्छी या बुरी जैसी नीयतसे काम किया जाता है, वैसा ही कर्मजनित फल मिलता है। कल्याणकारी कल्याणं पापकारी च पापकम्‌ | तेन गच्छति संसर्ग स्वर्गाय नरकाय वा ।। “कल्याणकारी मनुष्य कल्याणका और पापाचारी पुरुष पापके फलस्वरूप दुःखका भागी होता है। जो इनके संसर्गमें आता है, वह भी (कर्मानुसार) स्वर्ग या नरकमें जाता है। सुकृतं दुष्कृतं वापि कृत्वा मोहेन मानव: । पश्चात्तापेन तप्येत स्वबुद्धया मरणं गत: ।। “मनुष्य मोहपूर्वक सत्कर्म या दुष्कर्म करके मृत्युके बाद भी मन-ही-मन पश्चात्ताप करता रहता है” ।। एवमुकक्‍्त्वा परं वाक्यं विससर्ज शतक्रतुम्‌ । शक्रो5प्यापृच्छ ब्रह्माणं देवराज्यमपालयत्‌ ।। इस प्रकार उत्तम वचन कहकर ब्रह्माजीने इन्द्रको विदा कर दिया। इन्द्र भी ब्रह्माजीसे पूछकर देवलोकमें आये और देवसाम्राज्यका पालन करने लगे। यथोक्तं देवदेवेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना । तथा त्वमपि राजेन्द्र कार्याकार्ये स्थिरो भव ।। राजेन्द्र! देवाधिदेव परमेष्ठी ब्रह्माजीने जैसा उपदेश दिया है, उसके अनुसार आप भी कर्तव्य और अकर्तव्यके निर्णयमें दृढ़तापूर्वक लगे रहिये। वैशम्पायन उवाच एवं विलपमानायां पाज्चाल्यां मत्स्यपुड्भव: | अशक्त: कीचकं तत्र शासितुं बलदर्पितम्‌ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! पांचाल-राजकुमारी द्रौपदीके इस प्रकार विलाप करनेपर भी मत्स्यराज विराट बलाभिमानी कीचकपर शासन करनेमें असमर्थ ही रहे। विराटराज: सूतं तु सान्त्वेनैव न्यवारयत्‌ । कीचकं मत्स्यराजेन कृतागसमनिन्दिता ।। नापराधानुरूपेण दण्डेन प्रतिपादितम्‌ । पाज्चालराजस्य सुता दृष्टवा सुरसुतोपमा ।। धर्मज्ञा व्यवहाराणां कीचकं कृतकिल्बिषम्‌ | पुन: प्रोवाच राजानं स्मरन्ती धर्ममुत्तमम्‌ ।। सम्प्रेक्ष्य च वरारोहा सर्वास्तत्र सभासद: । विराटं चाह पाज्चाली दु:खेनाविष्टचेतना ।।) उन्होंने शान्तिपूर्वक समझा-बुझाकर ही सूतको वैसा करनेसे मना किया। यद्यपि कीचकने भारी अपराध किया था, तो भी मत्स्यराजने उसे अपराधके अनुसार दण्ड नहीं दिया; यह देख देवकन्याके समान सुन्दरी एवं व्यवहार-धर्मको जाननेवाली साध्वी द्रौपदी उत्तम धर्मका स्मरण करती हुई राजा विराट तथा समस्त सभासदोंकी ओर देखकर दुःखी हृदयसे इस प्रकार बोली--। येषां वैरी न स्वपिति षछ्ठेडपि विषये वसन्‌ । तेषां मां मानिनीं भार्या सूतपुत्र: पदावधीत्‌,“जिन मेरे पतियोंके वैरीको पाँच देशोंको पार करके छठे देशमें रहनेपर भी भयके मारे नींद नहीं आती, आज उन्हींकी मानिनी पत्नी मुझ असहाय अबलाको एक सूतपुत्रने लातसे मारा है

Vaiśampāyana said: Even as Pāñcālī (Draupadī) lamented in this way, the bull among the Matsyas—King Virāṭa—was unable there to restrain or punish Kīcaka, who was swollen with pride in his own strength. The scene underscores a king’s ethical duty to protect the vulnerable, and the moral failure that occurs when power and fear override justice in the royal court.

Verse 23

ये दद्युर्न च याचेयुर्ब्रह्म॒ण्या: सत्यवादिन: । तेषां मां मानिनीं भार्या सूतपुत्र: पदावधीत्‌,“जो सदा दूसरोंको देते हैं, किंतु किसीसे याचना नहीं करते, जो ब्राह्मणभक्त तथा सत्यवादी हैं, उनन्‍्हींकी मुझ मानिनी पत्नीको सूतपुत्रने लात मारी है

“Those who are ever-giving yet never beg, who are devoted to the brāhmaṇas and steadfast in truth—of such a man, his dignified wife, me, has been struck with a kick by the son of a charioteer.”

Verse 24

येषां दुन्दुभिनिर्घोषो ज्याघोष: श्रूयतेडनिशम्‌ । तेषां मां मानिनीं भार्या सूतपुत्र: पदावधीत्‌,“जिनके धनुषकी टंकार सदा देव-दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनिके समान सुनायी पड़ती है, उन्हींकी मुझ मानिनी पत्नीको सूतपुत्रने लातसे मारा है

“Those whose bowstrings resound unceasingly like the deep thunder of divine kettledrums—of such men, I, their proud and honored wife, have been struck with a kick by a charioteer’s son.”

Verse 25

ये च तेजस्विनो दान्ता बलवन्तो5तिमानिन: । तेषां मां मानिनीं भार्या सूतपुत्र: पदावधीत्‌,“जो तेजस्वी, जितेन्द्रिय, बलवान्‌ और अत्यन्त मानी हैं, उन्हींकी मुझ मानिनी पत्नीपर सूतपुत्रने पैरसे आघात किया है

“Those men who are radiant in prowess, self-restrained, strong, and exceedingly proud—upon the wife of such a man, upon me who am held in honor, the son of a charioteer struck with his foot.”

Verse 26

सर्वलोकमिमं हन्युर्धर्मपाशसितास्तु ये । तेषां मां मानिनीं भार्या सूतपुत्र: पदावधीत्‌

Vaiśampāyana said: “Those who are bound by the fetters of dharma would rather strike down this whole world than commit a breach of righteousness. Yet for their sake, I—though a proud and honored wife—was kicked underfoot by the charioteer’s son.”

Verse 27

“मेरे पति इस सम्पूर्ण संसारको मार सकते हैं; किंतु वे धर्मके बन्धनमें बँधे हैं, इसीसे आज उनकी मुझ मानिनी पत्नीपर सूतपुत्रने पैरसे प्रहार किया है ।। शरणं ये प्रपन्नानां भवन्ति शरणार्थिनाम्‌ । चरन्ति लोके प्रच्छन्ना: क्व नु तेडद्य महारथा:,“जो शरण चाहनेवाले अथवा शरणमें आये हुए सब लोगोंको शरण देते हैं, वे मेरे महारथी पति अपने स्वरूपको छिपाकर आज जगतमें कहाँ विचर रहे हैं?

Vaiśampāyana said: “My husband has the power to destroy this entire world; yet he is bound by the restraints of dharma. That is why today a charioteer’s son dared to strike me—his honored wife—with his foot. Those great chariot-warriors who become a refuge to all who seek shelter or have surrendered—where are they now, moving through the world in disguise?”

Verse 28

कथं ते सूतपुत्रेण वध्यमानां प्रियां सतीम्‌ । मर्षयन्ति यथा क्लीबा बलवन्तोडमितौजस:,“जो अमिततेजस्वी और बलवान हैं, वे (मेरे पति) एक सूतपुत्रद्वारा मारी जाती हुई अपनी सती-साध्वी प्रिय पत्नीका अपमान कायरों और नपुंसकोंकी भाँति कैसे सहन कर रहे हैं?

Vaiśampāyana said: “How can those men—mighty and of unmeasured prowess—endure, like cowards and eunuchs, the humiliation of their beloved, chaste wife while she is being assaulted by a charioteer’s son?”

Verse 29

क्व नु तेषाममर्षश्न वीर्य तेजश्न वर्तते । न परीप्सन्ति ये भार्या वध्यमानां दुरात्मना,“आज उनका अमर्ष, पराक्रम और तेज कहाँ है? जो एक दुरात्माकी मार खाती हुई अपनी पत्नीकी रक्षा नहीं करते हैं

Vaiśampāyana said: “Where now are their indignation at injustice, their valor, and their splendor? For they do not even strive to protect their own wife while she is being assaulted by a wicked man.”

Verse 30

मयात्र शक्‍यं कि कर्तु विराटे धर्मदूषके । यः पश्यन्‌ मां मर्षयति वध्यमानामनागसम्‌,“यहाँका राजा विराट भी धर्मको कलंकित करनेवाला है; जो मुझ निरपराध अबलाको अपने सामने मार खाती देखकर भी सहन किये जाता है। भला, इसके रहते मैं इस अपमानका बदला चुकानेके लिये क्या कर सकती हूँ?

Vaiśampāyana said: “What, here, can I possibly do while Virāṭa—who stains dharma—remains in power? He watches and yet endures it as I, an innocent and helpless woman, am being struck before his very eyes. With such a king present, how can I repay this humiliation or set right this wrong?”

Verse 31

न राजा राजवत्‌ किंचित्‌ समाचरति कीचके । दस्यूनामिव धर्मस्ते न हि संसदि शोभते,“यह राजा होकर भी कीचकके प्रति कुछ भी राजोचित न्याय नहीं कर रहा है। मत्स्यराज! तुम्हारा यह लुटेरोंका-सा धर्म इस राजसभामें शोभा नहीं देता। तुम्हारे निकट इस कीचकढद्वारा मुझपर मार पड़ी, यह कदापि उचित नहीं कहा जा सकता। यहाँ जो सभासद्‌ बैठे हैं, वे भी कीचकका यह अत्याचार देखें

Vaiśaṃpāyana said: “This king does not act in any way as a king should toward Kīcaka. O Matsya-king, this ‘law’ of yours—like that of bandits—does not befit a royal assembly. That I should be struck here by Kīcaka in your very presence cannot be called proper; and the courtiers seated here are witnesses to this outrage.”

Verse 32

नाहमेतेन युक्त वै हन्तुं मत्स्य तवान्तिके । सभासदोऊत्र पश्यन्तु कीचकस्य व्यतिक्रमम्‌,“यह राजा होकर भी कीचकके प्रति कुछ भी राजोचित न्याय नहीं कर रहा है। मत्स्यराज! तुम्हारा यह लुटेरोंका-सा धर्म इस राजसभामें शोभा नहीं देता। तुम्हारे निकट इस कीचकढद्वारा मुझपर मार पड़ी, यह कदापि उचित नहीं कहा जा सकता। यहाँ जो सभासद्‌ बैठे हैं, वे भी कीचकका यह अत्याचार देखें

Vaiśaṃpāyana said: “I am not bound to endure this here in your presence, O Matsya. Let the members of the royal assembly witness this transgression of Kīcaka. A king who allows such violence and lawlessness in the court fails in royal justice; this outrage committed against me at your side cannot be called proper.”

Verse 33

कीचको न च धर्मज्ञो न च मत्स्य: कथंचन । सभासदोअ प्यधर्मज्ञा य एनं॑ पर्युपासते,“कीचकको धर्मका ज्ञान नहीं है और यह मत्स्यराज भी किसी प्रकार धर्मज्ञ नहीं है तथा जो इस अधर्मी राजाके पास बैठते हैं, वे सभासद्‌ भी धर्मके ज्ञाता नहीं हैं!

Vaiśaṃpāyana said: “Kīcaka is not a knower of dharma, and the king of Matsya is in no way a knower of dharma either. Even the courtiers who sit in attendance upon that unrighteous man are not knowers of dharma—by their complicity they share in the failure of ethical governance.”

Verse 34

वैशम्पायन उवाच एवंविधैर्वचोभि: सा तदा कृष्णाश्रुलोचना । उपालभत राजानं मत्स्यानां वरवर्णिनी,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! उत्तम वर्णवाली द्रौपदीने उस समय आँखोंमें आँसू भरकर ऐसे वचनोंद्वारा मत्स्ययाजको बहुत फटकारा और उलाहना दिया

Vaiśaṃpāyana said: Then Draupadī—her eyes brimming with tears—rebuked and reproached the king of the Matsyas with words of this kind.

Verse 35

विराट उवाच परोक्ष नाभिजानामि विग्रहं युवयोरहम्‌ । अर्थतत्त्वमविज्ञाय कि नु स्थात्‌ कौशलं मम,तब विराट बोले--सैरन्ध्री! हमारे परोक्षमें तुम दोनोंमें किस प्रकार कलह हुआ है; इसे मैं नहीं जानता और वास्तविक बातको जाने बिना न्याय करनेमें मेरा क्या कौशल प्रकट होगा?

Virāṭa said: “Sairandhrī, I do not know what quarrel arose between you two when it happened out of my sight. Without knowing the true facts of the matter, how could I show any skill in rendering justice?”

Verse 36

वैशग्पायन उवाच ततस्तु सभ्या विज्ञाय कृष्णां भूयो5भ्यपूजयन्‌ । साधु साध्विति चाप्याहु: कीचकं च व्यगर्हयन्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! तदनन्तर सभासदोंने सारा रहस्य जानकर द्रौपदीकी बार-बार सराहना की। उसे अनेक बार साधुवाद दिया और कीचककी निन्‍्दा करते हुए उसे बहुत धिक्‍कारा

Vaiśampāyana said: Then the members of the royal assembly, having understood the whole matter, honored Kṛṣṇā (Draupadī) again and again. They repeatedly cried, “Well done! Well done!” and, condemning Kīcaka, reproached him with harsh censure.

Verse 37

सभ्या ऊचु यस्येयं चारुसर्वाड्ी भार्या स्वादायतेक्षणा । परो लाभस्तु तस्य स्यान्न च शोचेत्‌ कथंचन,सभासद्‌ बोले--सम्पूर्ण मनोहर अंगोंसे सुशोभित यह बड़े-बड़े नेत्रोंवाली साध्वी जिसकी धर्मपत्नी है, उसे जीवनमें बहुत बड़ा लाभ मिला है। वह किसी प्रकार शोक नहीं कर सकता

The members of the assembly said: “He whose lawful wife is this virtuous woman—beautiful in all her limbs and with large, captivating eyes—has obtained a supreme gain in life. Such a man cannot grieve in any way.”

Verse 38

(यस्या गात्र शुभं पीन॑ मुखं जयति पड़कजम्‌ । गतिहसं स्मितं कुन्द सैषा नाहति पद्धधम्‌ ।। जिसका शरीर शुभ और हृष्ट-पुष्ट है, जिसका मुख अपने सौन्दर्यसे कमलको पराजित कर रहा है तथा जिसकी मन्द-मन्द गति हंसको और मुस्कान दुन्दपुष्पोंकी शोभाको तिरस्कृत कर रही है, वही यह नारी पदप्रहारके योग्य नहीं है। द्वात्रिंशद्‌ दशना यस्या: श्वेता मांसनिबन्धना: । स्निग्धाश्व मृदव: केशा: सैषा नाहति पद्धधम्‌ ।। जिसके बत्तीसों दाँत मसूड़ोंमें दृढ़तापूर्वक आबद्ध और उज्ज्वल हैं, जिसके केश चिकने और कोमल हैं, वैसी यह नारी लात मारने योग्य कदापि नहीं है। पद्म चक्रं ध्वजं शड्खं प्रासादो मकरस्तथा । यस्या: पाणितले सन्ति सैषा नाहति पद्धधम्‌ ।। जिसकी हथेलीमें कमल, चक्र, ध्वजा, शंख, मन्दिर और मगरके चिह्न हैं, वह शुभलक्षणा नारी पैरोंसे ठुकरायी जाय, यह कदापि उचित नहीं है। आवर्ताः खलु चत्वार: सर्वे चैव प्रदक्षिणा: । सम॑ गात्र शुभं स्निग्धं यस्य नाहति पद्धधम्‌ ।। जिसके शरीरमें चार आवर्त हैं और वे सबके सब प्रदक्षिणभावसे सुशोभित हैं, जिसके अड़ समान (सुडौल), शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और स्निग्ध हैं, वह लात मारनेयोग्य नहीं है। अच्छिद्रहस्तपादा च अच्छिद्रदशना च या । कन्या कमलपत्राक्षी कथम्ति पद्धधम ।। जिसके हाथों, पैरों और दाँतोंमें छिद्र नहीं दिखायी देते हैं, वह कमलदललोचना कन्या पैरोंसे ठोकर मारने योग्य कैसे हो सकती है?। सेयं लक्षणसम्पन्ना पूर्णचन्द्रनिभानना । सुरूपिणी सुवदना नेयं योग्या पदा वधम्‌ ।। यह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है। इसका मुख पूर्णचन्द्रके समान मनोहर है। यह सुन्दर रूपवाली सुमुखी नारी पैरोंसे ठुकराने योग्य नहीं है। देवदेवीव सुभगा शक्रदेवीव शो भना | अप्सरा इव सौरूप्यान्नेयं योग्या पदा वधम्‌ ।।) यह देवांगनाके समान सौभाग्यशालिनी, इन्द्राणीके समान शोभासम्पन्न तथा अप्सराके समान सुन्दर रूप धारण करनेवाली है। यह लात मारनेयोग्य कदापि नहीं है। न हीदृशी मनुष्येषु सुलभा वरवर्णिनी । नारी सर्वानिवद्याड्री देवीं मन्यामहे वयम्‌,मनुष्य-जातिमें तो ऐसी सती-साध्वी और सुन्दरी स्त्री सुलभ ही नहीं होती। इसके सम्पूर्ण अंग निर्दोष हैं। हम तो इसे मानवी नहीं; देवी मानते हैं

Vaiśaṃpāyana said: “She whose limbs are auspicious and full, whose face outshines the lotus; whose gentle gait surpasses the swan and whose smile eclipses the kunda-flower—such a woman is not fit to be struck with the foot. She whose thirty-two teeth are white and firmly set in the gums, whose hair is glossy and soft—she is not fit to be struck with the foot. She on whose palms are the marks of lotus, discus, banner, conch, a palace, and a makara—this woman of auspicious signs is not fit to be spurned with the foot. She who has four bodily whorls, all turning to the right; whose body is well-proportioned, auspicious, and lustrous—she is not fit to be struck with the foot. She whose hands and feet show no blemish, whose teeth are unbroken; that maiden with lotus-petal eyes—how could she be fit to be kicked? This one is endowed with auspicious marks; her face is like the full moon; she is beautiful and fair-spoken—she is not worthy of being harmed by a foot. Fortunate like a divine lady, splendid like Indra’s queen, lovely as an apsaras—she is not fit to be struck with the foot. Such a noble-complexioned woman is not easily found among humans; flawless in every limb, we regard her not as merely human, but as divine.”

Verse 39

वैशम्पायन उवाच एवं सम्पूजयन्तस्ते कृष्णां प्रेक्ष्य सभासद: । युधिछिरस्य कोपात्‌ तु ललाटे स्वेद आगमत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! जब इस प्रकार द्रौपदीको देखकर सभासद्‌ उसकी प्रशंसा कर रहे थे, उस समय कीचकके प्रति क्रोध होनेके कारण युधिष्ठिरके ललाटमें पसीना आ गया

Vaiśampāyana said: As the courtiers, looking upon Kṛṣṇā (Draupadī), were thus honoring and praising her, Yudhiṣṭhira—angered on account of Kīcaka—began to sweat upon his forehead.

Verse 40

(सा विनि:श्वस्य सुश्रोणी भूमावन्तर्मुखी स्थिता । तूष्णीमासीत्‌ तदा दृष्टवा विवक्षन्तं युधिष्ठिरम्‌ ।।) तदनन्तर सुन्दरी द्रौपदी लंबी साँस खींचकर नीचा मुख किये भूमिपर खड़ी हो गयी और राजा युधिष्ठिरको कुछ कहनेके लिये उद्यत देख वह स्वयं मौन रह गयी। अथाब्रवीदू राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रियाम्‌ । गच्छ सैरन्ध्रि मात्र स्था: सुदेष्णाया निवेशनम्‌,तब उन कुरुनन्दनने अपनी प्यारी रानीसे इस प्रकार कहा--'सैरन्ध्री! अब तू यहाँ न ठहर। रानी सुदेष्णाके महलमें चली जा

Then Draupadī, the fair-hipped lady, drew a deep sigh and stood on the ground with her face lowered. Seeing Yudhiṣṭhira about to speak, she herself remained silent—restraining her words amid danger and uncertainty.

Verse 41

भर्तारमनुरुन्धन्त्य: क्लिश्यन्ते वीरपत्नय: । शुश्रूषया क्लिश्यमाना: पतिलोकं॑ जयन्त्युत,“पतिका अनुसरण करनेवाली वीरपत्नियाँ सब क्लेश चुपचाप सहन कर लेती हैं। जो पतिसेवापूर्वक क्लेश उठाती हैं, वे साध्वी देवियाँ पतिलोकपर विजय पा लेती हैं

Vaiśampāyana said: “The wives of heroes, devotedly following their husbands, silently endure hardship. Those virtuous women who bear suffering through faithful service to their husbands attain victory in the realm of their husbands (i.e., the blessed state won through wifely devotion).”

Verse 42

मन्ये न काल क्रोधस्य पश्यन्ति पतयस्तव । तेन त्वां नाभिधावन्ति गन्धर्वा: सूर्यवर्चस:,“मैं समझता हूँ, तुम्हारे सूर्य के समान तेजस्वी पति गन्धर्वगण अभी क्रोध करनेका अवसर नहीं देखते; इसीलिये तुम्हारे पास दौड़कर नहीं आ रहे हैं

Vaiśaṃpāyana said: “I think your Gandharva husbands, radiant like the sun, do not yet see this as the proper moment for wrath; therefore they are not rushing here to you.”

Verse 43

(श्रूयन्तां ते सुकेशान्ते मोक्षधर्माश्रया: कथा: । यथा धर्म: कुलस्त्रीणां दृष्टो धर्मानुरोधनात्‌ ।। 'सुन्दर केशप्रान्तवाली सैरन्ध्री! तुम मोक्षधर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली बातें सुनो। धर्मशास्त्रके अनुसार कुलवती स्त्रियोंका धर्म इस प्रकार देखा गया है। नास्ति वक्षित्‌ स्त्रिया यज्ञो न श्राद्ध नाप्युपोषणम्‌ । या च भर्तरि शुश्रूषा सा स्वर्गायाभिजायते ।। 'स्त्रीके लिये न तो कोई यज्ञ है, न श्राद्ध है और न उपवासका ही विधान है। स्त्रियोंके द्वारा जो पतिकी सेवा होती है, वही उन्हें स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाली है। पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्रस्तु स्थविरे भावे न स्त्री स्वाततन्त्रयमहति ।। “कुमारावस्थामें पिता, युवावस्थामें पति और वृद्धावस्थामें पुत्र नारीकी रक्षा करता है। सत्रीको कभी स्वतन्त्र नहीं रहना चाहिये। भर्त्‌न्‌ प्रति तथा पत्न्यो न क्रुध्यन्ति कदाचन | बहुभिश्न परिक्लेशैरवज्ञाताश्न शत्रुभि: ।। 'पतिव्रता स्त्रियाँ नाना प्रकारके क्लेश सहकर तथा शत्रुओंद्वारा अपमानित होकर भी अपने पतियोंपर कभी क्रोध नहीं करतीं। अनन्यभावशुश्रूषा: पुण्यलोकं व्रजन्त्युत । नक्ुद्धान्‌ प्रति यायाद्‌ वै पतींस्ते वृत्रहा अपि ।। “इस प्रकार अनन्यभावसे पतिकी शुश्रूषा करनेवाली स्त्रियाँ पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेती हैं। सैरन्ध्री! तुम्हारे पतियोंके कुपित होनेपर तो वृत्रहन्ता इन्द्र भी युद्धमें उनका सामना नहीं कर सकते। यदि ते समय: कश्चित्‌ कृतो ह्यायतलोचने । तं॑ स्मरस्व क्षमाशीले क्षमा धर्मो हानुत्तम: ।। “विशाललोचने! यदि उनके साथ तेरी कोई शर्त हुई हो तो उसे याद कर ले। क्षमाशीले! क्षमा सबसे उत्तम धर्म है। क्षमा सत्यं क्षमा दान क्षमा धर्म: क्षमा तप: | क्षमावतामयं लोक: परलोक: क्षमावताम्‌ ।। द्वयंशिनो द्वादशाड्रस्य चतुर्विशतिपर्वण: । कः षष्टित्रिशतारस्य मासोनस्याक्षमी भवेत्‌ ।। 'क्षमा सत्य है, क्षमा दान है, क्षमा धर्म है और क्षमा ही तप है। क्षमाशील मनुष्योंके लिये ही यह लोक और परलोक है। जिसके दो (उत्तरायण एवं दक्षिणायन) अंश हैं, बारह (मास) अंग हैं, चौबीस (पक्ष) पर्व हैं और तीन सौ साठ (दिन) अरे हैं, उस कालचक्रके पूर्ण होनेमें यदि एक मासकी ही कमी रह गयी हो; तो कौन उसकी प्रतीक्षा न करके क्षमाका त्याग कर सकता है?'। वैशम्पायन उवाच इत्येवमुक्ते तिष्ठन्तीं पुनरेवाह धर्मराट्‌ ।) वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इतना कहनेपर भी जब द्रौपदी वहाँ खड़ी ही रह गयी, तब धर्मराजने पुन: उससे कहा--। अकालज्ञासि सैरन्ध्रि शैलूषीव विरोदिषि | विघ्नं करोषि मत्स्यानां दीव्यतां राजसंसदि

Vaiśampāyana said: “Listen, O fair-haired Sairandhrī, to accounts grounded in the dharma of liberation. In accordance with dharma, the duty of noble women has been understood in this way. For a woman, it is said, there is no separate injunction of sacrifice, no śrāddha, nor even a rule of fasting; the devoted service rendered to her husband is what leads her to heaven. In childhood the father protects her, in youth the husband protects her, and in old age the son protects her; a woman is not fit to live in complete independence. Wives devoted to their husbands do not become angry with their husbands at any time, even when they endure many hardships and are insulted by enemies. Those who serve with single-minded devotion attain meritorious worlds; and when their husbands are enraged, even Indra the slayer of Vṛtra would not dare confront them in battle. If there was any agreement made by you, O wide-eyed one, remember it. O patient one, forgiveness is the highest dharma. Forgiveness is truth; forgiveness is giving; forgiveness is dharma; forgiveness is austerity. This world and the next belong to the forgiving. Time is a wheel with two halves (the two solsticial courses), twelve limbs (months), twenty-four joints (fortnights), and three hundred and sixty spokes (days). If, in completing that cycle, only a single month remains, who would abandon patience and refuse to wait? Vaiśampāyana continued: Even after he had spoken thus, when Draupadī still stood there, Dharmarāja spoke to her again: ‘You do not know the proper time, O Sairandhrī; you oppose like an actress. You are creating an obstacle for the Matsyas while they are engaged in play in the royal hall.’

Verse 44

'सैरन्ध्री! तू अवसरको नहीं पहचानती; इसीलिये नटीकी भाँति राजसभामें रो रही है और द्यूतक्रीड़ामें लगे हुए मत्स्यराजकुमारोंके खेलमें विघ्न डालती है ।। गच्छ सैरन्ध्रि गन्धर्वा: करिष्यन्ति तव प्रियम्‌ । व्यपनेष्यन्ति ते दुःखं येन ते विप्रियं कृतम्‌,'सैरन्ध्री! जाओ, गन्धर्व तुम्हारा प्रिय करेंगे। जिसने तुम्हारा अपकार किया है, उसे मारकर तुम्हारा दुःख दूर कर देंगे”

Vaiśampāyana said: “Sairandhrī, you do not recognize the right moment; that is why you weep in the royal hall like an actress and disrupt the sport of the Matsya prince(s) absorbed in their gaming. Go, Sairandhrī—Gandharvas will do what is dear to you. They will remove your sorrow by slaying the one who has wronged you.”

Verse 45

सैरन्ध्युवाच अतीव तेषां घृणिनामर्थेडहं धर्मचारिणी । तस्य तस्यैव ते वध्या येषां ज्येष्ठो5क्षदेविता,सैरन्ध्री बोली--जिनके बड़े भाई सदा जूआ खेला करते हैं, उन दयालु गन्धर्वोंके लिये मैं अत्यन्त धर्मपरायणा रहूँगी। मेरा अपकार करनेवाले दुरात्मा उन सबके लिये वध्य हों

Sairandhrī said: “For the sake of those compassionate Gandharvas, I shall be steadfastly devoted to dharma. But those wicked men who have wronged me—each and every one of them—are fit to be slain, especially in those households where the eldest is addicted to the dice.”

Verse 46

वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा प्राद्रवत्‌ कृष्णा सुदेष्णाया निवेशनम्‌ | केशान्‌ मुक्त्वा च सुश्रोणी संरम्भाल्लोहितेक्षणा,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! यों कहकर सुन्दर कटियप्रान्तवाली द्रौपदी तीव्र गतिसे रानी सुदेष्णाके महलको चली गयी। उसके केश खुले हुए थे और क्रोधसे उसकी आँखें लाल हो रही थीं

Vaiśampāyana said: Having spoken thus, Kṛṣṇā (Draupadī)—the fair-hipped lady—ran swiftly to Queen Sudeṣṇā’s residence. Her hair was left unbound, and in the heat of indignation her eyes had turned red—signs of a grievous affront and a determined appeal for justice within the palace’s moral order.

Verse 47

शुशुभे वदनं तस्या रुदत्या: सुचिरं तदा । मेघलेखाविनिर्मुक्ते दिवीव शशिमण्डलम्‌,उस समय रोती हुई द्रौपदीका मुख इस प्रकार सुशोभित हो रहा था, मानो आकाशमें मेघमालाके आवरणसे मुक्त चन्द्रबिम्ब शोभा पा रहा हो

Vaiśampāyana said: At that time, even as Draupadī wept, her face shone for a long while—like the orb of the moon in the sky when it emerges freed from the veiling streaks of cloud. The image underscores her inner dignity and steadfastness amid humiliation and distress, suggesting that sorrow may cover virtue only temporarily, not extinguish its radiance.

Verse 48

(पांसुकुण्ठितसर्वाज्जी गजराजवधूरिव । प्रतस्थे नागनासोरूर्भतुराज्ञाय शासनम्‌ ।। समस्त अंगोंमें धूलिसे धूसरित गजराजवधूकी भाँति शोभा पानेवाली तथा हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली द्रौपदी स्वामीकी आज्ञा शिरोधार्य करके राजसभासे अन्तःपुरमें चली गयी। विमुक्ता मृगशावाक्षी निरन्तरपयोधरा । प्रभा नक्षत्रराजस्य कालमेघैरिवावृता ।। उसके स्तन एक-दूसरेसे सटे हुए थे, तथा नेत्र मृगशावकोंके समान चंचल हो रहे थे। वह कीचकके हाथसे छूटकर शोक और दु:खसे इस प्रकार मलिन हो रही थी, मानो चन्द्रमाकी प्रभा वर्षाकालके मेघोंसे आच्छादित हो गयी हो। यस्या हार्थ पाण्डवेयास्त्यजेयुरपि जीवितम्‌ । तां ते दृष्टवा तथा कृष्णां क्षमिणो धर्मचारिण: ।। समयं नातिवर्तन्ते वेलामिव महोदधि: ।।) जिसके लिये समस्त पाण्डव अपने प्राणतक दे सकते थे, उसी कृष्णाको उस दशामें देखकर भी धर्मात्मा पाण्डव क्षमा धारण किये बैठे थे। जैसे समुद्र अपने तटकी सीमाका उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार वे अज्ञातवासके लिये स्वीकृत समयका अतिक्रमण नहीं कर रहे थे। सुदेष्णोवाच कस्त्वावधीद्‌ वरारोहे कस्माद्‌ रोदिषि शोभने । कस्याद्य न सुखं भद्रे केन ते विप्रियं कृतम्‌

Vaiśampāyana said: Dust-covered in every limb, yet radiant like the queen-consort of a lordly elephant, Draupadī—whose thighs were like an elephant’s trunk—accepted her husband’s command as a sacred charge and departed from the royal hall toward the inner apartments. Released from Kīcaka’s grasp, the doe-eyed lady, her full breasts pressed close, grew dim with grief and anguish—like the moon’s light veiled by monsoon clouds. Though she was the very one for whose sake the sons of Pāṇḍu would surrender even their lives, seeing Kṛṣṇā in such a condition the patient, dharma-abiding Pāṇḍavas did not overstep the term they had accepted for living incognito—just as the great ocean does not transgress its shoreline. Then Sudeṣṇā said: “Who has harmed you, fair-hipped one? Why do you weep, lovely lady? Who today has lost happiness, dear one? By whom has something displeasing been done to you?”

Verse 49

सुदेष्णाने पूछा--वरारोहे! तुम्हें किसने मारा है? शोभने! तू क्यों रोती है? भद्रे! आज किसका सुख समाप्त हो गया? किसने तुम्हारा अपराध किया है? ४८ ।। (किमिदं पद्मसंकाशं सुदन्तोष्ठाक्षिनासिकम्‌ । रुदन्त्या अवमृष्टास्र॑ पूर्णेन्दुसमवर्चसम्‌ ।। कमलके समान कमनीय, सुन्दर दाँत, ओठ, नेत्र और नासिकासे सुशोभित तथा पूर्णचन्द्रके समान कान्तिमान्‌ तुम्हारा यह मनोहर मुख ऐसा (मलिन) क्‍यों हो रहा है? तुम रोती हुई अपने मुखपर बहे हुए आँसुओंको पोंछ रही हो। बिम्बोष्ठं कृष्णताराभ्यामत्यन्तरुचिरप्रभम्‌ | नयनाभ्यामजिद्दा भ्यां मुखं ते मुजचते जलम्‌ ।। काली पुतलीवाले सरल नेत्रोंसे सुशोभित, बिम्ब-फलके समान अरुण अधरोंसे उपलक्षित और अत्यन्त मनोहर प्रभासे प्रकाशित तुम्हारा मुख इस समय आँसू क्‍यों गिरा रहा है?। वैशम्पायन उवाच तीं नि:श्वस्याब्रवीत्‌ कृष्णा जानन्ती नाम पृच्छसि । भ्रात्रे त्वं मामनुप्रेष्य किमेवं त्वं विकत्थसे ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब कृष्णाने लंबी साँसे खींचकर कहा--“तुम सब कुछ जानती हुई भी मुझसे क्या पूछ रही हो? स्वयं ही मुझे अपने भाईके पास भेजकर अब इस प्रकारकी बातें क्‍यों बना रही हो?'। द्रौपहुुवाच कीचको मावधीत्‌ तत्र सुराहारीं गतां तव । सभायां पश्यतो राज्ञो यथैव विजने वने,द्रौपदी फिर बोली--मैं तुम्हारे लिये मदिरा लाने गयी थी। वहाँ कीचकने राजसभामें महाराजके देखते-देखते मुझपर प्रहार किया है; ठीक उसी तरह, जैसे कोई निर्जन वनमें किसी असहाय अबलापर आघात करता हो

Vaiśampāyana said: Then Kṛṣṇā (Draupadī), heaving a deep sigh, spoke: “Though you know it all, why do you ask me? After sending me yourself to your brother, why do you now speak as if to make light of it?” Draupadī said: “When I went to fetch liquor for you, Kīcaka struck me there—right in the royal hall, before the king’s very eyes—just as one would assault a helpless woman in a lonely forest.”

Verse 50

सुदेष्णोवाच घातयामि सुकेशान्ते कीचकं यदि मन्यसे । योडसौ त्वां कामसम्मत्तो दुर्लभामवमन्यते,सुदेष्णाने कहा--सुन्दर लटोंवाली सुन्दरी! यदि तुम्हारी सम्मति हो, तो मैं कीचकको मरवा डालूँ; जो कामसे उन्मत्त होकर तुझ-जैसी दुर्लभ देवीका अपमान कर रहा है

Sudeṣṇā said: “O lady of beautiful tresses, if you consent, I shall have Kīcaka slain—he who, maddened by lust, dares to insult you, a woman so rare and worthy of honor.”

Verse 51

सैरन्ध्युवाच अन्‍्ये चैनं वधिष्यन्ति येषामाग: करोति सः । मन्ये चैवाद्य सुव्यक्ते यमलोक॑ गमिष्यति,सैरन्ध्री बोली--महारानी! उसे दूसरे ही लोग मार डालेंगे, जिनका कि अपराध वह कर रहा है। मैं तो समझती हूँ, अब वह निश्चय ही यमलोककी यात्रा करेगा

Sairandhrī said, “O queen, others will surely kill him—those against whom he is committing wrongdoing. I believe that today itself, most certainly, he will go to Yama’s realm.”

Verse 131

कीचकने भी उठकर भागती हुई द्रौपदीका पीछा किया और उसका केशपाश पकड़ लिया। फिर उसने राजाके देखते-देखते उसे पृथ्वीपर गिराकर लात मारी ।। तस्य योडसौ तदार्केण राक्षस: संनियोजित: । स कीचकमपोवाह वातवेगेन भारत

Vaiśampāyana said: Then, at that very moment—impelled by a rākṣasa-force—he seized Kīcaka and hurled him away with the speed of the wind, O Bhārata. The episode shows that violent outrage against a vulnerable woman draws swift retribution, and that adharma, even when done in a king’s sight, becomes the cause of one’s downfall.

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to address an immediate personal violation and threat using effective force and protection while remaining bound by the exile condition of concealment, which limits open accusation and public retaliation.

The chapter models crisis ethics: purification and reflection precede action; the most capable protector is approached with clarity; and duty-driven intervention must be coordinated with situational constraints to prevent wider harm.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is narrative and ethical—positioning Bhīma as the reliable agent of protection while emphasizing secrecy as a governing constraint within the Virāṭa court.