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Shloka 22

द्रौपद्याः भीमसेन-प्रबोधनम्

Draupadī Awakens Bhīmasena

(द्रौपदु॒वाच प्रजारक्षणशीलानां राज्ञां हमिततेजसाम्‌ | कार्य हि पालन नित्यं धर्मे सत्ये च तिषठताम्‌ ।। स्वप्रजायां प्रजायां च विशेषं नाधिगच्छताम्‌ | द्रौपदीने कहा--जों स्वभावसे ही प्रजाजनोंकी रक्षामें लगे हुए हैं, सदा धर्म और सत्यके मार्ममें स्थित हैं तथा प्रजा और अपनी संतानमें कोई अन्तर नहीं समझते, उन अमिततेजस्वी राजाओंको चाहिये कि वे सदा आश्रितजनोंका पालन एवं संरक्षण करें। प्रियेष्वपि च द्वेष्येषु समत्वं ये समाश्रिता: ।। विवादेषु प्रवृत्तेषु समं कार्यानुदर्शिना । राज्ञा धर्मासनस्थेन जितौ लोकावुभावपि ।। जो प्रियजनों तथा द्वेषपात्रोंमें भी समानभाव रखते हैं, प्रजाजनोंमें विवाद आरम्भ होनेपर जो राजा धर्मासनपर बैठकर समानभावसे प्रत्येक कार्यपर विचार करते हैं, वे दोनों लोकोंको जीत लेते हैं। राजन्‌ धर्मासनस्थोडपि रक्ष मां त्वमनागसीम्‌ ।। अहं त्वनपराध्यन्ती कीचकेन दुरात्मना । पश्यतस्ते महाराज हता पादेन दासवत्‌ ।। राजन! आप धर्मके आसनपर बैठे हैं। मुझ निरपराध अबलाकी रक्षा कीजिये। महाराज! मैंने कोई अपराध नहीं किया है तो भी दुरात्मा कीचकने आपके देखते-देखते मुझको लात मारी है; मेरे साथ (खरीदे हुए) दासका-सा बर्ताव किया है। मत्स्याधिप प्रजा रक्ष पिता पुत्रानिवौरसान्‌ ।। यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात्मा कुरुते नृप: । अचिरात्‌ त॑ दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रव: ।। मत्स्यराज! जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार आप अपने प्रजाजनोंका संरक्षण कीजिये। जो मोहमें डूबा हुआ राजा अधर्मयुक्त कार्य करता है, उस दुरात्माको उसके शत्रु शीघ्र ही वशमें कर लेते हैं। मत्स्यानां कुलजत्त्वं हि तेषां सत्यं परायणम्‌ । त्वं किलैवंविधो जात: कुले धर्मपरायणे ।। आप मत्स्यकुलमें उत्पन्न हुए हैं। सत्य ही मत्स्यनरेशोंका महान्‌ आश्रय रहा है। आप भी इस धर्मपरायण कुलमें ऐसे ही धर्मात्मा पैदा हुए हैं। अततस्त्वाहमभिक्रन्दे शरणार्थ नराधिप । त्राहि मामद्य राजेन्द्र कीचकात्‌ पापपूरुषात्‌ ।। अतः नरेश्वर! मैं आपसे शरण देनेके लिये रुदन करती हूँ। राजेन्द्र! आज मुझे इस पापी कीचकसे बचाइये। अनाथामिह मां ज्ञात्वा कीचक: पुरुषाधम: । प्रहरत्येव नीचात्मा न तु धर्ममवेक्षते ।। पुरुषाधम कीचक यहाँ मुझे असहाय जानकर मार रहा है। यह नीच अपने धर्मकी ओर नहीं देखता है। अकार्याणामनारम्भात्‌ कार्याणामनुपालनात्‌ | प्रजासु ये सुवृत्तास्ते स्वर्गमायान्ति भूमिपा: ।। जो भूमिपाल न करनेयोग्य कार्योका आरम्भ नहीं करते, करनेयोग्य कर्तव्योंका निरन्तर पालन करते हैं और सदा प्रजाके साथ उत्तम बर्ताव करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं। कार्याकार्यविशेषज्ञा: कामकारेण पार्थिव । प्रजासु किल्बिषं कृत्वा नरकं यान्त्यधोमुखा: ।। परंतु राजन! जो राजा कर्तव्य और अकर्तव्यके अन्तरको जानते हुए भी स्वेच्छाचारितावश प्रजावर्गके साथ पापाचार करते हैं, वे अधोमुख हो नरकमें जाते हैं। नैव यज्ञैर्न वा दानैर्न गुरोरुपसेवया । प्राप्रुवन्ति तथा धर्म यथा कार्यानुपालनात्‌ ।। राजालोग यज्ञ, दान अथवा गुरुसेवनसे भी वैसा धर्म (पुण्य) नहीं पाते हैं, जैसा कि अपने कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करनेसे प्राप्त करते हैं। क्रियायामक्रियायां च प्रापणे पुण्यपापयो: ।। प्रजायां सृज्यमानायां पुरा होतदुदाह्मतम्‌ । एतद्‌ वो मानुषा: सम्यक्‌ कार्य द्वन्ड्धतया भुवि । अस्मिन्‌ सुनीते दुर्नीते लभते कर्मजं फलम्‌ ।। पूर्वकालमें सृष्टिकी रचनाके समय ब्रह्माजीने क्रिया करने और न करनेकी स्थितिमें पुण्य और पापकी प्राप्तिके विषयमें इस प्रकार कहा था--“मनुष्यो! तुमलोगोंको इस पृथ्वीलोकमें द्वन्धरूपमें प्राप्त धर्म और अधर्मके विषयमें भलीभाँति समझकर कर्म करना चाहिये; क्योंकि अच्छी या बुरी जैसी नीयतसे काम किया जाता है, वैसा ही कर्मजनित फल मिलता है। कल्याणकारी कल्याणं पापकारी च पापकम्‌ | तेन गच्छति संसर्ग स्वर्गाय नरकाय वा ।। “कल्याणकारी मनुष्य कल्याणका और पापाचारी पुरुष पापके फलस्वरूप दुःखका भागी होता है। जो इनके संसर्गमें आता है, वह भी (कर्मानुसार) स्वर्ग या नरकमें जाता है। सुकृतं दुष्कृतं वापि कृत्वा मोहेन मानव: । पश्चात्तापेन तप्येत स्वबुद्धया मरणं गत: ।। “मनुष्य मोहपूर्वक सत्कर्म या दुष्कर्म करके मृत्युके बाद भी मन-ही-मन पश्चात्ताप करता रहता है” ।। एवमुकक्‍्त्वा परं वाक्यं विससर्ज शतक्रतुम्‌ । शक्रो5प्यापृच्छ ब्रह्माणं देवराज्यमपालयत्‌ ।। इस प्रकार उत्तम वचन कहकर ब्रह्माजीने इन्द्रको विदा कर दिया। इन्द्र भी ब्रह्माजीसे पूछकर देवलोकमें आये और देवसाम्राज्यका पालन करने लगे। यथोक्तं देवदेवेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना । तथा त्वमपि राजेन्द्र कार्याकार्ये स्थिरो भव ।। राजेन्द्र! देवाधिदेव परमेष्ठी ब्रह्माजीने जैसा उपदेश दिया है, उसके अनुसार आप भी कर्तव्य और अकर्तव्यके निर्णयमें दृढ़तापूर्वक लगे रहिये। वैशम्पायन उवाच एवं विलपमानायां पाज्चाल्यां मत्स्यपुड्भव: | अशक्त: कीचकं तत्र शासितुं बलदर्पितम्‌ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! पांचाल-राजकुमारी द्रौपदीके इस प्रकार विलाप करनेपर भी मत्स्यराज विराट बलाभिमानी कीचकपर शासन करनेमें असमर्थ ही रहे। विराटराज: सूतं तु सान्त्वेनैव न्यवारयत्‌ । कीचकं मत्स्यराजेन कृतागसमनिन्दिता ।। नापराधानुरूपेण दण्डेन प्रतिपादितम्‌ । पाज्चालराजस्य सुता दृष्टवा सुरसुतोपमा ।। धर्मज्ञा व्यवहाराणां कीचकं कृतकिल्बिषम्‌ | पुन: प्रोवाच राजानं स्मरन्ती धर्ममुत्तमम्‌ ।। सम्प्रेक्ष्य च वरारोहा सर्वास्तत्र सभासद: । विराटं चाह पाज्चाली दु:खेनाविष्टचेतना ।।) उन्होंने शान्तिपूर्वक समझा-बुझाकर ही सूतको वैसा करनेसे मना किया। यद्यपि कीचकने भारी अपराध किया था, तो भी मत्स्यराजने उसे अपराधके अनुसार दण्ड नहीं दिया; यह देख देवकन्याके समान सुन्दरी एवं व्यवहार-धर्मको जाननेवाली साध्वी द्रौपदी उत्तम धर्मका स्मरण करती हुई राजा विराट तथा समस्त सभासदोंकी ओर देखकर दुःखी हृदयसे इस प्रकार बोली--। येषां वैरी न स्वपिति षछ्ठेडपि विषये वसन्‌ । तेषां मां मानिनीं भार्या सूतपुत्र: पदावधीत्‌,“जिन मेरे पतियोंके वैरीको पाँच देशोंको पार करके छठे देशमें रहनेपर भी भयके मारे नींद नहीं आती, आज उन्हींकी मानिनी पत्नी मुझ असहाय अबलाको एक सूतपुत्रने लातसे मारा है

vaiśampāyana uvāca |

evaṁ vilapamānāyāṁ pāñcālyāṁ matsyapuṅgavaḥ |

aśaktaḥ kīcakaṁ tatra śāsituṁ baladarpitam ||

Vaiśampāyana said: Even as Pāñcālī (Draupadī) lamented in this way, the bull among the Matsyas—King Virāṭa—was unable there to restrain or punish Kīcaka, who was swollen with pride in his own strength. The scene underscores a king’s ethical duty to protect the vulnerable, and the moral failure that occurs when power and fear override justice in the royal court.

द्रौपदीDraupadi
द्रौपदी:
Karta
TypeNoun
Rootद्रौपदी
FormF, Nominative, Singular
उवाचsaid/spoke
उवाच:
TypeVerb
Rootवच्
FormPerfect, 3, Singular, Parasmaipada
प्रजा-रक्षण-शीलानाम्of those whose nature is protecting subjects
प्रजा-रक्षण-शीलानाम्:
TypeAdjective
Rootशील
FormM, Genitive, Plural
राज्ञाम्of kings
राज्ञाम्:
TypeNoun
Rootराजन्
FormM, Genitive, Plural
अमित-तेजसाम्of immeasurable splendor/energy
अमित-तेजसाम्:
TypeAdjective
Rootतेजस्
FormM, Genitive, Plural
कार्यम्it is to be done / duty
कार्यम्:
TypeNoun
Rootकार्य
FormN, Nominative, Singular
हिindeed
हि:
TypeIndeclinable
Rootहि
पालनम्protection/maintenance
पालनम्:
Karma
TypeNoun
Rootपालन
FormN, Nominative, Singular
नित्यम्always
नित्यम्:
TypeIndeclinable
Rootनित्य
धर्मेin dharma
धर्मे:
Adhikarana
TypeNoun
Rootधर्म
FormM, Locative, Singular
सत्येin truth
सत्ये:
Adhikarana
TypeNoun
Rootसत्य
FormN, Locative, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
तिष्ठताम्of those who stand/abide
तिष्ठताम्:
TypeVerb
Rootस्था
FormPresent, Imperative, 3, Plural, Parasmaipada
स्व-प्रजायाम्in one's own subjects
स्व-प्रजायाम्:
Adhikarana
TypeNoun
Rootप्रजा
FormF, Locative, Singular
प्रजायाम्in the subjects (generally)
प्रजायाम्:
Adhikarana
TypeNoun
Rootप्रजा
FormF, Locative, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
विशेषम्distinction
विशेषम्:
Karma
TypeNoun
Rootविशेष
FormM, Accusative, Singular
not
:
TypeIndeclinable
Root
अधिगच्छताम्of those who do not perceive/recognize
अधिगच्छताम्:
TypeVerb
Rootअधि-गम्
FormPresent, Imperative, 3, Plural, Parasmaipada

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśampāyana
P
Pāñcālī (Draupadī)
M
Matsya kingdom
V
Virāṭa (Matsyapuṅgava)
K
Kīcaka

Educational Q&A

A ruler’s dharma is to restrain wrongdoing and protect those seeking refuge; when a king becomes ‘aśakta’ (unable) before a powerful offender, justice collapses and the court becomes complicit in adharma.

Draupadī (as Pāñcālī) pleads and laments after being abused by Kīcaka, but King Virāṭa, despite being the sovereign, cannot or will not discipline Kīcaka because Kīcaka is emboldened by power and influence.