
Puruṣottama-yoga (The Discipline of the Supreme Person) — Chapter 15 (Bhagavadgītā)
Upa-parva: Bhagavadgītā Parva (Gītā-upaparvan within Bhīṣma-parva)
This chapter presents a metaphysical model of conditioned existence through the image of an inverted aśvattha tree whose roots are above and branches below, with Vedic meters as its leaves and sense-objects as its shoots. The discourse emphasizes the difficulty of grasping its full form and prescribes detachment (asaṅga) as the instrument to sever entanglement, redirecting the seeker toward an imperishable state from which there is no return. It then describes the jīva as an eternal portion of the divine that, associated with mind and senses, engages prakṛti and migrates between bodies carrying faculties like wind carrying fragrance. The chapter distinguishes those who perceive this process through knowledge from those who do not. It further identifies divine immanence in cosmic luminosity, terrestrial support, plant nourishment, digestion, and memory/knowledge, asserting that the Vedas ultimately point to this reality. Finally, it differentiates the perishable (kṣara), imperishable (akṣara), and the supreme person (Puruṣottama) who transcends both; knowing this yields comprehensive understanding and wholehearted orientation to the divine.
Chapter Arc: अर्जुन, कृष्ण के ‘परम गोपनीय’ अध्यात्म-उपदेश से अपने अज्ञान के नाश की घोषणा करता है और सृष्टि-स्थिति-प्रलय के रहस्य को जानकर भी एक ही उत्कंठा में जल उठता है—अब वह प्रभु का ऐश्वर्य-रूप प्रत्यक्ष देखना चाहता है। → दर्शन की याचना के साथ ही दृश्य-कल्पना विराट होती जाती है: देवदेव के शरीर में ‘एक स्थान’ पर समस्त जगत का अनेक प्रकार से विभक्त रूप दिखने लगता है; यह अनुभूति विस्मय को भय के किनारे तक ले जाती है, क्योंकि वही रूप सबको अपने मुखों में खींचता हुआ भी दीखता है। → अर्जुन का साक्षात्कार चरम पर पहुँचता है—जैसे पतंगे प्रज्वलित अग्नि में नाश के लिए दौड़ते हैं, वैसे ही लोक प्रभु के मुखों में प्रविष्ट होते दिखते हैं; उसी क्षण अर्जुन स्वीकार करता है: ‘आप चराचर जगत के पिता, गुरु और पूज्य हैं; तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं।’ → भगवान् इस दर्शन की दुर्लभता और महिमा बताते हैं—यह रूप न वेदों से, न तप से, न दान से, न यज्ञ से इस प्रकार देखा जा सकता; और फिर उपाय का उद्घोष करते हैं: केवल ‘अनन्य भक्ति’ से ही भगवान् को देखना, जानना और प्राप्त करना संभव है। → अनन्य भक्ति का स्वरूप क्या है—जिससे दर्शन, ज्ञान और एकीभाव-प्राप्ति होती है—इस जिज्ञासा का द्वार खुलता है।
Verse 1
४) “हे राजन! वह ब्रह्माजीके कमण्डलुका जल, भगवानके चरणोंको धोनेसे पवित्रतम होकर स्वर्ग-गंगा हो गया। वह गंगा आकाशसे पृथ्वीपर गिरकर अबतक तीनों लोकोंको भगवान्की निर्मल कीर्तिके समान पवित्र कर रही है।' इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि एक बार भगवान् विष्णु स्वयं ही द्रवरूप होकर बहने लगे थे और ब्रह्माजीके कमण्डलुमें जाकर गंगारूप हो गये थे। इस प्रकार साक्षात् ब्रह्मद्रव होनेके कारण भी गंगाजीका अत्यन्त माहात्म्य है। इसीलिये भगवानने गंगाको अपना स्वरूप बतलाया है। ४. अध्यात्मविद्या या ब्रह्मविद्या उस विद्याको कहते हैं जिसका आत्मासे सम्बन्ध है, जो आत्मतत्त्वका प्रकाश करती है और जिसके प्रभावसे अनायास ही ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है। संसारमें ज्ञात या अज्ञात जितनी भी विद्याएँ हैं, सभी इस ब्रह्मविद्यासे निकृष्ट हैं; क्योंकि उनसे अज्ञानका बन्धन टूटता नहीं, बल्कि और भी दृढ़ होता है; परंतु इस ब्रह्मविद्यासे अज्ञानकी गाँठ सदाके लिये खुल जाती है और परमात्माके स्वरूपका यथार्थ साक्षात्कार हो जाता है। इसीसे यह सबसे श्रेष्ठ है और इसीलिये भगवान्ने इसको अपना स्वरूप बतलाया है। ५. शास्त्रार्थके तीन स्वरूप होते हैं--जल्प, वितण्डा और वाद। उचित-अनुचितका विचार छोड़कर अपने पक्षके मण्डन और दूसरेके पक्षका खण्डन करनेके लिये जो विवाद किया जाता है, उसे “जल्प' कहते हैं; केवल दूसरे पक्षका खण्डन करनेके लिये किये जानेवाले विवादको “वितण्डा” कहते हैं और जो तत्त्वनिर्णयके उद्देश्यसे शुद्ध नीयतसे किया जाता है, उसे “वाद” कहते हैं। “जल्प” और “वितण्डा' से द्वेष, क्रोध, हिंसा और अभिमानादि दोषोंकी उत्पत्ति होती है तथा “वाद' से सत्यके निर्णयमें और कल्याण- साधनमें सहायता प्राप्त होती है। 'जल्प” और “वितण्डा” त्याज्य हैं तथा “वाद” आवश्यकता होनेपर ग्राह्म है। इसी विशेषताके कारण भगवानने “वाद” को अपनी विभूति बतलाया है। ६. स्वर और व्यंजन आदि जितने भी अक्षर हैं, उन सबमें अकार सबका आदि है और वही सबमें व्याप्त है। इसीलिये भगवानने उसको अपना स्वरूप बतलाया है। ७. संस्कृत-व्याकरणके अनुसार समास चार हैं--१. अव्ययीभाव, २. तत्पुरुष, ३. बहुव्रीहि और ४. द्वन्। कर्मधारय और द्विगु--ये दोनों तत्पुरुषके ही अन्तर्गत हैं। द्वन्द्ध समासमें दोनों पदोंके अर्थकी प्रधानता होनेके कारण वह अन्य समासोंसे श्रेष्ठ है; इसलिये भगवानने उसको अपनी विभूतियोंमें गिना है। ८. कालके तीन भेद हैं-- १. “समय” वाचक काल। २. “प्रकृति” रूप काल। महाप्रलयके बाद जितने समयतक प्रकृतिकी साम्यावस्था रहती है, वही प्रकृतिरूपी काल है। ३. नित्य शाश्वत विज्ञानानन्दघन परमात्मा। समयवाचक स्थूल कालकी अपेक्षा तो बुद्धिकी समझमें न आनेवाला प्रकृतिरूप काल सूक्ष्म और पर है तथा इस प्रकृतिरूप कालसे भी परमात्मारूप काल अत्यन्त सूक्ष्म, परातिपर और परम श्रेष्ठ है। वस्तुतः परमात्मा देश-कालसे सर्वथा रहित हैं; परंतु जहाँ प्रकृति और उसके कार्यरूप संसारका वर्णन किया जाता है, वहाँ सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाले होनेके कारण उन सबके अधिष्ठानरूप विज्ञानानन्द्घन परमात्मा ही वास्तविक “काल' हैं। ये ही “अक्षय” काल हैं। $. जिस प्रकार मृत्युरूप होकर भगवान् सबका नाश करते हैं अर्थात् उनका शरीरसे वियोग कराते हैं, उसी प्रकार भगवान् ही उनका पुनः दूसरे शरीरोंसे सम्बन्ध कराके उन्हें उत्पन्न करते हैं--यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने अपनेको उत्पन्न होनेवालोंका उत्पत्तिहेतु बतलाया है। २. स्वायम्भुव मनुकी कन्या प्रसूति प्रजापति दक्षको ब्याही थीं, उनसे चौबीस कन्याएँ हुईं कीर्ति, मेधा, वृत्ति, स्मृति और क्षमा उन्हींमेंसे हैं। इनमें कीर्ति, मेधा और धृतिका विवाह धर्मसे हुआ; स्मृतिका अंगिरासे और क्षमा महर्षि पुलहको ब्याही गयीं। महर्षि भूगुकी कन्याका नाम श्री है, जो दक्षकन्या ख्यातिके गर्भसे उत्पन्न हुई थीं। इनका पाणिग्रहण भगवान् विष्णुने किया और वाक् ब्रह्माजीकी कन्या थीं। इन सातोंके नाम जिन गुणोंका निर्देश करते हैं--उन विभिन्न गुणोंकी ये सातों अधिष्ठातृदेवता हैं तथा संसारकी समस्त स्त्रियोंमें श्रेष्ठ मानी गयी हैं। इसीलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बतलाया है। 3. सामवेदमें “बृहत्साम' एक गीतिविशेष है। इसके द्वारा परमेश्वरकी इन्द्ररूपमें स्तुति की गयी है। “अतिगात्र' यागमें यही पृष्ठस्तोत्र है तथा सामवेदके “रथन्तर” आदि सामोंमें बृहत्साम (“बृहत्” नामक साम) प्रधान होनेके कारण सबमें श्रेष्ठ है, इसी कारण यहाँ भगवानने “बृहत्साम” को अपना स्वरूप बतलाया है। ४. वेदोंकी जितनी भी छन्दोबद्ध ऋचाएँ हैं, उन सबमें गायत्रीकी ही प्रधानता है। श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराण आदि शास्त्रोंमें जगह-जगह गायत्रीकी महिमा भरी है-- अभीष्ट लोकमाप्रोति प्राप्तुयात् काममीप्सितम् । गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी ।। गायत्र्या: परमं नास्ति दिवि चेह च पावनम् | हस्तत्राणप्रदा देवी पततां नरकार्णवे ।। (शंखस्मृति १२।२४-२५) “(गायत्रीकी उपासना करनेवाला द्विज) अपने अभीष्ट लोकको पा जाता है, मनोवांछित भोग प्राप्त कर लेता है। गायत्री समस्त वेदोंकी जननी और सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाली हैं। स्वर्गलोगमें तथा पृथ्वीपर गायत्रीसे बढ़कर पवित्र करनेवाली दूसरी कोई वस्तु नहीं है। गायत्री देवी नरकसमुद्रमें गिरनेवालोंको हाथका सहारा देकर बचा लेनेवाली हैं।' नास्ति गज़़ासमं तीर्थ न देव: केशवात् पर: । गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति ।। (बृहद्योगियाज्ञवल्क्य १०।१०) “गंगाजीके समान तीर्थ नहीं है, श्रीविष्णुभगवान्से बढ़कर देवता नहीं है और गायत्रीसे बढ़कर जपनेयोग्य मन्त्र न हुआ, न होगा।' गायत्रीकी इस श्रेष्ठताके कारण ही भगवान्ने उनको अपना स्वरूप बतलाया है। ५. महाभारतकालमें महीनोंकी गणना मार्गशीर्षसे ही आरम्भ होती थी (महा०, अनुशासन० १०६ और १०९)। अत: यह सब मासोंमें प्रथम मास है तथा इस मासमें किये हुए व्रत-उपवासोंका शास्त्रोंमें महान् फल बतलाया गया है। नये अन्नकी इष्टि (यज्ञ)-का भी इसी महीनेमें विधान है। वाल्मीकीय रामायणमें इसे संवत्सरका भूषण बतलाया गया है। इस प्रकार अन्यान्य मासोंकी अपेक्षा इसमें कई विशेषताएँ हैं, इसलिये भगवानने इसको अपना स्वरूप बतलाया है। ६. वसन्त सब ऋतुओंमें श्रेष्ठ और सबका राजा है। इसमें बिना ही जलके सब वनस्पतियाँ हरी-भरी और नवीन पत्रों तथा पुष्पोंसे समन्वित हो जाती हैं। इसमें न अधिक गरमी रहती है और न सरदी। इस ऋतुमें प्रायः सभी प्राणियोंको आनन्द होता है। इसीलिये भगवानने इसको अपना स्वरूप बतलाया है। $. संसारमें उत्तम, मध्यम और नीच जितने भी जीव और पदार्थ हैं, सभीमें भगवान् व्याप्त हैं और भगवानकी ही सत्ता-स्फूर्तिसे सब चेष्टा करते हैं। ऐसा एक भी पदार्थ नहीं है जो भगवान्की सत्ता और शक्तिसे रहित हो। ऐसे सब प्रकारके सात््विक, राजस और तामस जीवों एवं पदार्थोंमें जो विशेष गुण, विशेष प्रभाव और विशेष चमत्कारसे युक्त हैं, उसीमें भगवान्की सत्ता और शक्तिका विशेष विकास है। इस विशेषताके कारण जिस-जिस व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया या भावका मनसे चिन्तन होने लगे, उस- उसमें भगवान्का ही चिन्तन करना चाहिये। इसी अभिप्रायसे छल करनेवालोंमें जूएको भगवानने अपना स्वरूप बताया है। उसे उत्तम बतलाकर उसमें प्रवृत्त करनेके उद्देश्यसे नहीं; क्योंकि भगवानने तो महान् क्रूर और हिंसक सिंह और मगरको एवं सहज ही विनाश करनेवाले अग्निको तथा सर्वसंहारकारी मृत्युको भी अपना स्वरूप बतलाया है। उसका अभिप्राय यह थोड़े ही है कि कोई भी मनुष्य जाकर सिंह या मगरके साथ खेले, आगमें कूद पड़े अथवा जान-बूझकर मृत्युके मुँहमें घुस जाय। इनके करनेमें जो आपत्ति है, वही आपत्ति जूआ खेलनेमें है। २. ये चारों ही गुण भगवत्प्राप्तिमें सहायक हैं, इसलिये भगवान्ने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। इन चारोंको अपना स्वरूप बतलाकर भगवानने यह भाव भी दिखलाया है कि तेजस्वी प्राणियोंमें जो तेज या प्रभाव है, वह वास्तवमें मेरा ही है। जो मनुष्य उसे अपनी शक्ति समझकर अभिमान करता है, वह भूल करता है। इसी प्रकार विजय प्राप्त करनेवालोंका विजय, निश्चय करनेवालोंका निश्चय और सात्त्विक पुरुषोंका सात््विकभाव--ये सब गुण भी मेरे ही हैं। इनके निमित्तसे अभिमान करना भी बड़ी भारी मूर्खता है। इसके अतिरिक्त इस कथनमें यह भाव भी है कि जिन-जिनमें उपर्युक्त गुण हों, उनमें भगवान्के तेजकी अधिकता समझकर उनको श्रेष्ठ मानना चाहिये। 3. इस कथनसे भगवानने अवतार और अवतारीकी एकता दिखलायी है। कहनेका भाव यह है कि मैं अजन्मा-अविनाशी, सब भूतोंका महेश्वर, सर्वशक्तिमान् पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम ही यहाँ वसुदेवके पुत्रके रूपमें लीलासे प्रकट हुआ हूँ (गीता ४।६)। ४. अर्जुन ही सब पाण्डवोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। इसका कारण यह है कि नर-नारायण-अवतारमें अर्जुन नररूपसे भगवान्के साथ रह चुके हैं। इसके अतिरिक्त वे भगवानके परम प्रिय सखा और उनके अनन्य प्रेमी भक्त हैं। इसलिये अर्जुनको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। भगवानने स्वयं कहा है-- नरस्त्वमसि दुर्धर्ष हरिनारायणो हाहम् | काले लोकमिमं प्राप्तौ नरनारायणावृषी ।। अनन्य: पार्थ मत्तस्त्वं त्वत्तश्नाहंं तथैव च । (महा०, वन० १२।४६-४७) हहे दुर्धर्ष अर्जुन] तू भगवान् नर है और मैं स्वयं हरि नारायण हूँ। हम दोनों एक समय नर और नारायण ऋषि होकर इस लोकमें आये थे। इसलिये हे अर्जुन! तू मुझसे अलग नहीं है और उसी प्रकार मैं तुझसे अलग नहीं हूँ।” ५. भगवानके स्वरूपका और वेदादि शास्त्रोंका मनन करनेवालोंको “मुनि” कहते हैं। भगवान् वेदव्यास समस्त वेदोंका भलीभाँति चिन्तन करके उनका विभाग करनेवाले, महाभारत, पुराण आदि अनेक शास्त्रोंके रचयिता, भगवानके अंशावतार और सर्वसदगुणसम्पन्न हैं। अतएव मुनिमण्डलमें उनकी प्रधानता होनेके कारण भगवानने उन्हें अपना स्वरूप बतलाया है। ६. जो पण्डित और बुद्धिमान् हो, उसे “कवि” कहते हैं। शुक्राचार्यजी भार्गवोंके अधिपति, सब विद्याओंमें विशारद, नीतिके रचयिता, संजीवनी विद्याके जाननेवाले और कवियोंमें प्रधान हैं, इसलिये इनको भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है। ७. 'ज्ञानवताम्' पद परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका साक्षात् कर लेनेवाले यथार्थ ज्ञानियोंका वाचक है। उनका ज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है। इसलिये उसको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ८. दण्ड (दमन करनेकी शक्ति) धर्मका त्याग करके अधर्ममें प्रवृत्त उच्छृंखल मनुष्योंको पापाचारसे रोककर सत्कर्ममें प्रवृत्त करता है। मनुष्योंके मन और इन्द्रिय आदि भी इस दमनशक्तिके द्वारा ही वशमें होकर भगवानकी प्राप्तिमें सहायक बन सकते हैं। दमनशक्तिसे समस्त प्राणी अपने-अपने अधिकारका पालन करते हैं। इसलिये जो भी देवता, राजा और शासक आदि न्यायपूर्वक दमन करनेवाले हैं, उन सबकी उस दमनशक्तिको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ३. 'नीति' शब्द यहाँ न्न्यायका वाचक है। न्यायसे ही मनुष्यकी सच्ची विजय होती है। जिस राज्यमें नीति नहीं रहती, अनीतिका बर्ताव होने लगता है, वह राज्य भी शीघ्र नष्ट हो जाता है। अतएव नीति अर्थात् न्याय विजयका प्रधान उपाय है। इसलिये विजय चाहनेवालोंकी नीतिको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। २. जितने भी गुप्त रखनेयोग्य भाव हैं, वे मौनसे (न बोलनेसे) ही गुप्त रह सकते हैं। बोलना बंद किये बिना उनका गुप्त रखा जाना कठिन है। इस प्रकार गोपनीय भावोंके रक्षक मौनकी प्रधानता होनेसे मौनको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। 3. भगवान् ही समस्त चराचर भूतप्राणियोंके परम आधार हैं और उन्हींसे सबकी उत्पत्ति होती है। अतएव वे ही सबके बीज या महान् कारण हैं। इसीसे गीताके सातवें अध्यायके दसवें श्लोकमें उन्हें सब भूतोंका (सनातन बीज” और नवम अध्यायके अठारहवें श्लोकमें 'अविनाशी बीज” बतलाया गया है। इसीलिये भगवानने उसको यहाँ अपना स्वरूप बतलाया है। ४. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि चर या अचर जितने भी प्राणी हैं, उन सबमें मैं व्याप्त हूँ; कोई भी प्राणी मुझसे रहित नहीं है। अतएव समस्त प्राणियोंको मेरा स्वरूप समझकर और मुझे उनमें व्याप्त समझकर जहाँ भी तुम्हारा मन जाय, वहीं तुम मेरा चिन्तन करते रहो। इस प्रकार अर्जुनके “(आपको किन-किन भावोंमें चिन्तन करना चाहिये?” (गीता १०।१७) इस प्रश्नका भी इससे उत्तर हो जाता है। ५. जिस किसी भी प्राणी या जडव्स्तुमें उपर्युक्त ऐश्वर्य, शोभा, कान्ति, शक्ति, बल, तेज, पराक्रम या अन्य किसी प्रकारकी शक्ति आदि सब-के-सब या इनमेंसे कोई एक भी प्रतीत होता हो, उस प्रत्येक प्राणी और प्रत्येक वस्तुको भगवानके तेजका अंश समझना ही उसको भगवान्के तेजके अंशकी अभिव्यक्ति समझना है। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार बिजलीकी शक्तिसे कहीं रोशनी हो रही है, कहीं पंखे चल रहे हैं, कहीं जल निकल रहा है, कहीं रेडियोंमें दूर-दूरके गाने सुनायी पड़ रहे हैं--इस प्रकार भिन्न-भिन्न अनेकों स्थानोंमें और भी बहुत कार्य हो रहे हैं; परंतु यह निश्चय है कि जहाँ-जहाँ ये कार्य होते हैं, वहाँ-वहाँ बिजलीका ही प्रभाव कार्य कर रहा है, वस्तुतः वह बिजलीके ही अंशकी अभिव्यक्ति है। उसी प्रकार जिस प्राणी या वस्तुमें जो भी किसी तरहकी विशेषता दिखलायी पड़ती है, उसमें भगवान्के ही तेजके अंशकी अभिव्यक्ति समझनी चाहिये। १. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि तुम्हारे पूछनेपर मैंने प्रधान-प्रधान विभूतियोंका वर्णन तो कर दिया, किंतु इतना ही जानना यथेष्ट नहीं है। सार बात यह है जो मैं अब तुम्हें बतला रहा हूँ, इसको तुम अच्छी प्रकार समझ लो; फिर सब कुछ अपने-आप ही समझमें आ जायगा, उसके बाद तुम्हारे लिये कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा। २. मन, इन्द्रिय और शरीरसहित समस्त चराचर प्राणी तथा भोगसामग्री, भोगस्थान और समस्त लोकोंके सहित यह ब्रह्माण्ड भगवान्के किसी एक अंभमें उनन््हींकी योगशक्तिसे धारण किया हुआ है, यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने इस जगतके सम्पूर्ण विस्तारको अपनी योगशक्तिके एक अंशसे धारण किया हुआ बतलाया है। पज्चत्रिशो& ध्याय: (श्रीमद्भगवद्गीतायामेकादशो 5 ध्याय: ) विश्वरूपका दर्शन करानेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना, भगवान् और संजयद्दारा विश्वरूपका वर्णन, अर्जुनद्वारा भगवानके विश्वरूपका देखा जाना, भयभीत हुए अर्जुनद्वारा भगवानकी स्तुति-प्रार्थना, भगवान्द्वारा विश्वरूप और चतुर्भुजरूपके दर्शनकी महिमा और केवल अनन्यभक्तिसे ही भगवान्की प्राप्तिका कथन सम्बन्ध--गीताके दसवें अध्यायके सातवें *लोकतक भगवान्ने अपनी विभति तथा योगशक्तिका और उनके जाननेके माहात्म्यका संक्षेपर्में वर्णन करके ग्यारहवें *लोकतक भक्तियोग और उसके फलका निरूपण किया। इसपर बारहवेंये अठारहवें 4*लोकतक अर्जुनने भगवान्की स्तुति करके उनसे दिव्य विभूतियोंका और योगशक्तिका विस्तृत वर्णन करनेके लिये प्रार्थागा की। तब भगवान्ने चालीसवें श*्लोकतक अपनी विथूतियोंका वर्णन समाप्त करके अन्तमें योगशक्तिका प्रभाव बतलाते हुए समस्त ब्रह्माण्डको अपने एक अंशर्में धारण किया हुआ कहकर अध्यायका उपसंहार किया। इस प्रसंगको सुनकर अजुनिके मनमें उस महान् स्वरूपको, जिसके एक अंशर्में समस्त विश्व स्थित है; प्रत्यक्ष देखनेकी इच्छा उत्पन्न हो गयी। इसीलिये इस ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें पहले चार #लोकोर्में भगवान्की और उनके उपदेशकी प्रशंसा करते हुए अर्जुन उनसे विश्वरूपका दर्शन करानेके लिये प्रार्थना करते हैं-- अजुन उवाच मदनुग्रहायः परम गुह्मुमध्यात्मसंज्ञितम् । यत् त्वयोक्तं वचस्तेन मोहो5यं विगतो मम
Arjuna said: “For my sake, you have spoken the supreme secret teaching known as the knowledge of the Self. By that instruction of yours, this delusion of mine has been dispelled.”
Verse 2
अर्जुन बोले--मुझपर अनुग्रह करनेके लिये आपने जो परम गोपनीय अध्यात्मविषयक वचनः अर्थात् उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया हैः ।। भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुती विस्तरशो मया । त्वत्त: कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्,क्योंकि हे कमलनेत्र! मैंने आपसे भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी हैः
Arjuna said: Out of compassion for me, you have spoken the supreme and most secret teaching of the Self; by that, my ignorance has been dispelled. For, O lotus-eyed one, I have heard from you in detail the arising and dissolution of beings, and I have also heard of your imperishable greatness.
Verse 3
एवमेतद् यथा55त्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टमिेच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम
Arjuna said: “So it is indeed, just as You have declared Yourself, O Supreme Lord. O Highest Person, I now wish to behold Your sovereign, divine form.”
Verse 4
३ ।। मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्,हे प्रभोः! यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है--ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर! उस अविनाशी स्वरूपका मुझे दर्शन कराइये*
Arjuna said: “O Lord, if You deem it possible for me to behold that form, then, O Master of Yoga, reveal to me Your imperishable Self.”
Verse 5
सम्बन्ध-- परम श्रद्धालु और परम प्रेमी अर्जुनके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर तीन शलोकोंमें भगवान् अपने विश्वरूपका वर्णन करते हुए उसे देखनेके लिये अर्जुनको आज्ञा देते है-- श्रीभगवानुवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशो5थ सहस्त्रश: । नानाविधानिः दिव्यानिः नानावर्णाकृतीनि चः,श्रीभगवान् बोले--हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकारके और नाना वर्ण तथा नाना आकृति-वाले अलौकिक रूपोंको देख
The Blessed Lord said: “Behold, O Pārtha, My forms—by the hundreds and by the thousands—manifold, divine, and of many colors and many shapes.” In answer to Arjuna’s reverent longing to truly know what he worships, Kṛṣṇa turns devotion into direct vision, preparing him to bear the moral weight of war with a widened, God-centered understanding of reality.
Verse 6
पश्यादित्यान् वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहुन्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत
“Behold the Ādityas, the Vasus, the Rudras, the twin Aśvins, and the Maruts as well. O descendant of Bharata, behold many wonders never seen before.”
Verse 7
है भरतवंशी अर्जुन! मुझमें आदित्योंको अर्थात् अदितिके द्वादश पुत्रोंकी, आठ वसुओंको, एकादश रुद्रोंको, दोनों अश्विनीकुमारोंको और उनचास मरुद्गणोंको देख तथा और भी बहुत-से पहले न देखे हुए आश्वर्यमय रूपोंको देख ।। इहैकस्थं जगत् कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् | मम देहे गुडाकेश” यच्चान्यद् द्रष्टमिच्छसि,हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीरमें एक जगह स्थित चराचरसहित सम्पूर्ण जगत्को देख* तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख
“O Arjuna, descendant of Bharata! Behold within Me the Ādityas—the twelve sons of Aditi—the eight Vasus, the eleven Rudras, the twin Aśvin-kumāras, and the hosts of the Maruts; and behold many other wondrous forms never seen before. O Gudākeśa, now behold in this My body, in one single place, the entire universe with all that moves and all that does not; and whatever else you still desire to see—behold it.”
Verse 8
सम्बन्ध--इस प्रकार तीन श्लोकोंमें बार-बार अपना अद्भुत रूप देखनेके लिये आज्ञा देनेपर भी जब अर्जुन भगवान्के रूपको नहीं देख सके; तब उसके न देख सकनेके कारणको जाननेवाले अन्तयमी भगवान् अजुनिको दिव्य दृष्टि देनेकी इच्छा करके कहने लगे-- नतु मां शक््यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम्,परंतु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रोंद्वारा देखनेमें नि:संदेह समर्थ नहीं है; इसीसे मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक चक्षु देता हूँ, उससे तू मेरी ईश्वरीय योगशक्तिको देख
The Lord said: “Yet you cannot see Me with these ordinary eyes. Therefore I grant you divine sight—behold My sovereign power of yoga.”
Verse 9
सम्बन्ध-- अर्जुनको दिव्य दृष्टि देकर भ्रगवान्ने जिस प्रकारका अपना दिव्य विराट् स्वरूप दिखलाया था, अब पाँच श्लोकोंद्वार संजय उसका वर्णन करते हैं-- संजय उवाच एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरि: । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्,संजय बोले--हे राजन! महायोगेश्वर और सब पापोंके नाश करनेवाले भगवानने5 इस प्रकार कहकर उसके पश्चात् अर्जुनको परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य स्वरूप दिखलायाः
Sanjaya said: “O King, having spoken thus, Hari—the great Lord of Yoga—then revealed to Arjuna the supreme, sovereign form, radiant with divine majesty.” In the ethical setting of the war, this disclosure grounds Arjuna’s duty in a direct vision of the cosmic order that transcends personal fear and attachment.
Verse 10
अप कि मर वि का कमान | अनेकदिव्याभरणं धम्,अनेक मुख और नेत्रोंसे युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनोंवाले,5 बहुत-से दिव्य भूषणोंसे युक्त” और बहुत-से दिव्य शस्त्रोंको हाथोंमें उठाये हुए,*९ दिव्य माला और वस्त्रोंको धारण किये हुए*5 और दिव्य गन्धका सारे शरीरमें लेप किये हुए, सब प्रकारके आश्वर्योंसे युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किये हुए विराट्स्वरूप परमदेव परमेश्वरको अर्जुनने देखा
Sanjaya said: Arjuna beheld the Supreme Lord in His विराट (cosmic) form—adorned with countless divine ornaments, bearing many celestial weapons uplifted in His hands, wearing heavenly garlands and garments, and anointed all over with divine fragrance. He was a wonder beyond measure, limitless, and facing in every direction. Seeing this all-marvelous God, Arjuna stood overwhelmed, as the moral weight of the coming war met the direct vision of the Lord who contains all beings and all outcomes within Himself.
Verse 11
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं" देवमनन्तं* विश्वतोमुखम्,अनेक मुख और नेत्रोंसे युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनोंवाले,5 बहुत-से दिव्य भूषणोंसे युक्त” और बहुत-से दिव्य शस्त्रोंको हाथोंमें उठाये हुए,*९ दिव्य माला और वस्त्रोंको धारण किये हुए*5 और दिव्य गन्धका सारे शरीरमें लेप किये हुए, सब प्रकारके आश्वर्योंसे युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किये हुए विराट्स्वरूप परमदेव परमेश्वरको अर्जुनने देखा हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिये सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको करनेवाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्ति-रहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियोंमें वैरभावसे रहित है--वह अनन्य भक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है* ।। इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्धगवदगीतापर्वणि श्रीमद्भधगवद्गीतासूपनिषत्तसु ब्रह्मुविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशो<ध्याय:
Sañjaya said: Arjuna beheld the Supreme Lord in His विराट (cosmic) form—adorned with heavenly garlands and garments, anointed with divine fragrance, filled with every kind of wonder, limitless, and facing in all directions. The vision presents the Divine not as a private deity of one place or party, but as the boundless ground of all existence, before whom human conflict and duty must be re-understood in the light of dharma and reverent awe.
Verse 12
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद् युगपदुत्थिता । यदि भा: सदृशी सा स्याद् भासस्तस्य महात्मन:,आकाशकमें हजार सूर्योके एक साथ उदय होनेसे उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्वरूप परमात्माके प्रकाशके सदृश कदाचित् ही होः
Sañjaya said: If, in the sky, the radiance produced by a thousand suns were to rise all at once, even that might only faintly resemble the splendor of that great-souled Lord’s universal form. The verse underscores the moral awe and devotional reverence evoked by the divine revelation amid the crisis of war, where human judgment is humbled before a higher, cosmic order.
Verse 13
तत्रैकस्थं जगत् कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकथा । अपश्यद् देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा,पाण्डुपुत्र अर्जुनने उस समय अनेक प्रकारसे विभक्त अर्थात् पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण जगतको देवोंके देव श्रीकृष्ण भगवानके उस शरीरमें एक जगह स्थित देखाः
Sanjaya said: There, at that moment, the son of Pandu—Arjuna—beheld within the body of Krishna, the God of gods, the entire universe gathered in one place, though appearing in countless distinct divisions and forms. The vision reveals that behind the moral turmoil of war stands an all-encompassing divine order in which multiplicity is held within a single, sovereign reality.
Verse 14
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजय: । प्रणम्य शिरसा देवं कृताउज्जलिरभाषत
Sañjaya said: Then Dhanañjaya (Arjuna), overwhelmed with wonder and thrilled to the very hairs of his body, bowed his head to the Divine. With hands joined in reverence, he began to speak—his response shaped by awe, devotion, and the ethical gravity of what he had just beheld amid the war’s crisis.
Verse 15
उसके अनन्तर वह आश्वर्यसे चकित और पुलकित-शरीर अर्जुन: प्रकाशमय विश्वरूप परमात्माको श्रद्धा-भक्तिसहित सिरसे प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोला ।। अजुन उवाच पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वास्तथा भूतविशेषसंघान् | ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्व॒ सर्वानिरगांश्व दिव्यान्ू,अर्जुन बोले--हे देव! मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण देवोंको तथा अनेक भूतोंके समुदायोंको, कमलके आसनपर विराजित ब्रह्माको, महादेवको” और सम्पूर्ण ऋषियोंको तथा दिव्य सर्पोंको देखता हूँ
Arjuna said: O Divine One, within Your body I behold all the gods, and likewise the multitudes of diverse beings. I see Brahmā seated upon the lotus-throne, and also Īśa (Śiva), together with all the sages and the radiant, celestial serpents. In this vision, the whole moral and cosmic order appears gathered into You, revealing that the powers revered across the worlds are held within a single supreme reality.
Verse 16
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतो5नन्तरूपम् | नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप?,हे सम्पूर्ण विश्वके स्वामिन्! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रोंसे युक्त तथा सब ओरसे अनन्त रूपोंवाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्तको देखता हूँ, न मध्यको और न आदिको ही
Arjuna said: I behold You with countless arms, bellies, mouths, and eyes—an endless form extending in every direction. O Lord of the universe, O Universal Form, I cannot discern Your end, nor Your middle, nor even Your beginning. In the midst of war, Arjuna’s vision shifts from judging the battlefield by human limits to recognizing a divine reality that exceeds all measure, calling for humility and reverent surrender rather than control or certainty.
Verse 17
अर्जुनके प्रति भगवान्का विराट्रूप-प्रदर्शन किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि व्वां दुर्निरीक्ष्यं+ समन्ताद् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्ः,आपको मैं मुकुट्युक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओरसे प्रकाशमान तेजके पुंज, प्रजजलित अग्नि और सूर्यके सदृश ज्योतियुक्त, कठिनतासे देखे जानेयोग्य और सब ओरसे अप्रमेयस्वरूप देखता हूँ
Arjuna said: I behold You as a radiant mass of splendor—crowned, bearing the mace and the discus—shining in every direction. From all sides You are hard to gaze upon, blazing with the brilliance of fire and the sun, immeasurable in form. In this vision, Arjuna’s moral struggle on the battlefield turns into reverent awe: the war’s terrifying scale is framed within the boundless sovereignty of the Divine.
Verse 18
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंरे त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् | त्वमव्यय: शाश्वृतधर्मगोप्ताएं सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे,आप ही जाननेयोग्य परम अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हैं, आप ही इस जगत्के परम आश्रय हैं, आप ही अनादि धर्मके रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं। ऐसा मेरा मत है?
Arjuna said: You are the supreme Imperishable, the highest reality to be known. You are the ultimate resting-place and support of this entire universe. You are the unfailing guardian of the eternal order (dharma), and to me You are the everlasting, undecaying Person. This is my settled conviction.
Verse 19
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य+ ९- मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्र स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्,आपको आदि, अन्त और मध्यसे रहित, अनन्त सामर्थ्यसे युक्त, अनन्त भुजावाले,* चन्द्र-सूर्यरूप नेत्रोंवाले,/ प्रजवलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेजसे इस जगत्को संतप्त करते हुए देखता हूँ
Arjuna said: I behold You as without beginning, middle, or end—of limitless power, with countless arms, with the moon and the sun as Your eyes, with blazing fire as Your mouths—scorching this entire world by Your own radiance. In awe, Arjuna recognizes that the divine form transcends all temporal limits and that its overwhelming splendor bears an ethical gravity: the same cosmic power that sustains also consumes, placing human action in war under the shadow of a higher, all-encompassing order.
Verse 20
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्नव सर्वा: | दृष्टवाद्भुतं रूपमुग्र॑ तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्*?,हे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं एवं आपके इस अलौकिक और भयंकर रूपको देखकर तीनों लोक अति व्यथाको प्राप्त हो रहे हैं
Arjuna said: Truly, the whole space between heaven and earth is filled by You alone, and all the directions as well. Seeing this wondrous and terrifying form of Yours, O great-souled One, the three worlds are shaken with fear and distress.
Verse 21
१९-२०)। इसलिये वचको भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है। 3. कामधेनु समस्त गौओंमें श्रेष्ठ दिव्य गौ है, यह देवता तथा मनुष्य सभीकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाली है और इसकी उत्पत्ति भी समुद्रमन्थनसे हुई है; इसलिये भगवान्ने इसको अपना स्वरूप बतलाया है। ४. इन्द्रियाराम मनुष्योंके द्वारा विषयसुखके लिये उपभोगमें आनेवाला काम निकृष्ट है, वह धर्मानुकूल नहीं है; परंतु शास्त्रविधिके अनुसार संतानकी उत्पत्तिके लिये इन्द्रियजयी पुरुषोंके द्वारा प्रयुक्त होनेवाला काम ही धर्मानुकूल होनेसे श्रेष्ठ है। अत: उसको भगवान्की विभूतियोंमें गिना गया है। ५. वासुकि समस्त सर्पोके राजा और भगवानके भक्त होनेके कारण सर्पोमें श्रेष्ठ माने गये हैं, इसलिये उनको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ६. शेषनाग समस्त नागोंके राजा और हजार फणोंसे युक्त हैं तथा भगवान्की शय्या बनकर और नित्य उनकी सेवामें लगे रहकर उन्हें सुख पहुँचानेवाले, उनके परम अनन्यभक्त और बहुत बार भगवानके साथ- साथ अवतार लेकर उनकी लीलामें सम्मिलित रहनेवाले हैं तथा इनकी उत्पत्ति भी भगवानसे ही मानी गयी है। इसलिये भगवानने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। ७. वरुण समस्त जलचरोंके और जलदेवताओंके अधिपति, लोकपाल, देवता और भगवान्के भक्त होनेके कारण सबमें श्रेष्ठ माने गये हैं। इसलिये उनको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ८. कव्यवाह, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त और बहहिषदू--ये सात दिव्य पितृगण हैं। (शिवपुराण धर्म० ६३।२) इनमें अर्यमा नामक पितर समस्त पितरोंमें प्रधान होनेसे श्रेष्ठ माने गये हैं। इसलिये उनको भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है। ९, मर्त्य और देवजगत्में, जितने भी नियमन करनेवाले अधिकारी हैं, यमराज उन सबमें बढ़कर हैं। इनके सभी दण्ड न्याय और धर्मसे युक्त, हितपूर्ण और पापनाशक होते हैं। ये भगवानके ज्ञानी भक्त और लोकपाल भी हैं। इसीलिये भगवानने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। १३०. यहाँ 'काल' शब्द क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास आदि नामोंसे कहे जानेवाले समयका वाचक है। यह गणितविद्याके जाननेवालोंकी गणनाका आधार है। इसलिये कालको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ३३. दितिके वंशजोंको दैत्य कहते हैं। उन सबमें प्रह्नाद उत्तम माने गये हैं; क्योंकि वे सर्वसद्गुणसम्पन्न, परम धर्मात्मा और भगवानके परम श्रद्धालु, निष्काम, अनन्यप्रेमी भक्त हैं तथा दैत्योंके राजा हैं। इसलिये भगवानने उनको अपना स्वरूप बतलाया है। ३२. सिंह सब पशुओंका राजा माना गया है। वह सबसे बलवान, तेजस्वी, शूरवीर और साहसी होता है। इसलिये भगवानने सिंहको अपनी विभूतियोंमें गिना है। १३३. विनताके पुत्र गरुड़जी पक्षियोंक राजा और उन सबसे बड़े होनेके कारण पक्षियोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। साथ ही ये भगवान्के वाहन, उनके परम भक्त और अत्यन्त पराक्रमी हैं। इसलिये गरुड़को भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है। ३. राम” शब्द दशरथपुत्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका वाचक है। उनको अपना स्वरूप बतलाकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि भिन्न-भिन्न युगोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारकी लीला करनेके लिये मैं ही भिन्न-भिन्न रूप धारण करता हूँ। श्रीराममें और मुझमें कोई अन्तर नहीं है, स्वयं मैं ही श्रीरामरूपमें अवतीर्ण होता हूँ। २. जितने प्रकारकी मछलियाँ होती हैं, उन सबमें मगर बहुत बड़ा और बलवान होता है; इसी विशेषताके कारण मछलियोंमें मगरको भगवानने अपनी विभूति बतलाया है। 3. जाह्नवी अर्थात् श्रीभागीरथी गंगाजी समस्त नदियोंमें परम श्रेष्ठ हैं; ये श्रीभगवानके चरणोदकसे उत्पन्न, परम पवित्र हैं। पुराण और इतिहासोंमें इनका बड़ा भारी माहात्म्य बतलाया गया है। श्रीमद्भागवतमें कहा है-- धातु: कमण्डलुजलं तदुरुक्रमस्य पादावनेजनपवित्रतया नरेन्द्र । स्वर्धुन्यभून्नभसि सा पतती निमार्ष्टि लोकत्रयं भगवतो विशदेव कीर्ति: ।। (८,अमी5ः हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद् भीता: प्राज्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभि: पुष्कलाभि: वे ही देवताओंके समूह आपमें प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणोंका उच्चारण करते हैं: तथा महर्षि और सिद्धोंक समुदाय “कल्याण हो” ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रोंद्वारा आपकी स्तुति करते हैं?
Arjuna said: O Keśava, having heard your words, O Mādhava, I am filled with joy. Your teaching has clarified the divine presence behind all excellence and has steadied my mind amid the moral strain of impending war.
Verse 22
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेषश्चिनौ मरुतश्षोष्मपाश्षर । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा: वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्वैव सर्वे
Arjuna said: “Rudras and Ādityas, the Vasus and the Sādhyas; the Viśvedevas and the twin Aśvins; the Maruts and the hosts of the forefathers; and the multitudes of Gandharvas, Yakṣas, Asuras, and Siddhas—all of them gaze upon You, utterly astonished.”
Verse 23
जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुदगणर्& और पितरोंका समुदाय तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धोंके समुदाय हैं, वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं ।। रूप॑ महत् ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । बहूदरं बहुदंष्टाकरालं दृष्टवा लोका: प्रव्यथितास्तथाहम्,हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरोंवाले, बहुत उदरोंवाले और बहुत-सी दाढ़ोंके कारण अत्यन्त विकराल महान् रूपको देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ [
Arjuna said: The eleven Rudras, the twelve Ādityas, the eight Vasus, the Sādhyas, the Viśvedevas, the two Aśvins, the Maruts, the hosts of ancestors, and the multitudes of Gandharvas, Yakṣas, Rākṣasas, and Siddhas—all of them gaze upon You in astonishment. Seeing Your vast form, O mighty-armed one—endowed with many mouths and eyes, many arms, thighs, and feet, with many bellies, and made terrifying by countless fangs—the worlds are shaken with fear, and so am I.
Verse 24
नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्ण व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णोः
Seeing You—towering to the very sky, blazing, of many hues, with gaping mouths and vast, radiant eyes—my inmost self is shaken with dread. O Viṣṇu, I can find neither steadiness of mind nor peace.
Verse 25
क्योंकि हे विष्णो! आकाशको स्पर्श करनेवाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णोसे युक्त तथा फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रोंसे युक्त आपको देखकर भयभीत अन्त:करणवाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ ।। दंष्टाकरालानि च ते मुखानि दृष्टवैव कालानलसंनिभानि । दिशो न जाने न लभे न शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास,दाढ़ोंक कारण विकराल और प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित आपके मुखोंको देखकर मैं दिशाओंको नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ। इसलिये हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों;
Arjuna said: O Viṣṇu, seeing You—touching the sky, blazing, of many colors, with mouths gaping wide and with vast, radiant eyes—my inner self is shaken with fear; I find neither steadiness nor peace. And seeing Your mouths, terrible with fangs, like the fire of Time at the world’s end, I lose all sense of direction and find no refuge or comfort. Be gracious, O Lord of the gods, O Abode of the universe.
Verse 26
अमी च व्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्रा: सर्वे सहैवावनिपालसंघै: । भीष्मो द्रोण: सूतपुत्रस्तथासौ? सहास्मदीयैरपि योधमुख्यै:,वे सभी धृतराष्ट्रके पुत्र राजाओंके समुदाय-सहित आपमें प्रवेश कर रहे हैं* और भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य" तथा वह कर्ण और हमारे पक्षके भी प्रधान योद्धाओंके सहित सब-के-सब आपके दाढ़ोंके कारण विकराल भयानक मुखोंमें बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतोंके बीचमें लगे हुए दीख रहे हैं
Arjuna said: “And these sons of Dhṛtarāṣṭra—every one of them—together with the assembled hosts of kings, are rushing into You. Bhīṣma, Droṇa, and that son of a charioteer (Karṇa) as well, along with even the foremost warriors on our side, are all entering Your mouths—terrible with gaping jaws and fearsome fangs.”
Verse 27
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति देष्टाकरालानि भयानकानि । केचिद् विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाड़ै:,वे सभी धृतराष्ट्रके पुत्र राजाओंके समुदाय-सहित आपमें प्रवेश कर रहे हैं* और भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य" तथा वह कर्ण और हमारे पक्षके भी प्रधान योद्धाओंके सहित सब-के-सब आपके दाढ़ोंके कारण विकराल भयानक मुखोंमें बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतोंके बीचमें लगे हुए दीख रहे हैं
Arjuna said: “They rush headlong into Your mouths—terrifying, made dreadful by Your fearsome fangs. Some are seen caught between Your teeth, their heads crushed to fragments.”
Verse 28
यथा नदीनां बहवोअप्बुवेगा: समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति । तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक््त्राण्यभिविज्वलन्ति
Arjuna said: “Just as the many rushing currents of rivers run facing the ocean alone, so too these heroes of the world of men are entering Your mouths, blazing all around.”
Verse 29
२८ ।। यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतड्रा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगा: । तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगा:,जैसे पतंग मोहवश नष्ट होनेके लिये प्रज्वलित अग्निमें अतिवेगसे दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाशके लिये आपके मुखोंमें अतिवेगसे दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं?
Arjuna said: Just as moths, driven by delusion, rush at full speed into a blazing fire only to be destroyed, so too these multitudes are rushing headlong into Your mouths, hastening toward their own ruin. The vision makes plain that in war, beings propelled by fate, passion, and error can surge toward destruction even while the divine order remains unshaken.
Verse 30
लेलिहासे ग्रसमान: समन्ता- ल्लोकान् समग्रान् वदनैज्वलडद्धि:ः । तेजोभिरापूर्य जगत् समग्रं भासस्तवोग्रा: प्रतपन्ति विष्णो,आप उन सम्पूर्ण लोकोंको प्रज्वलित मुखोंद्वारा ग्रास करते हुए सब ओरसे बार-बार चाट रहे हैं। हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत्को तेजके द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है
O Viṣṇu! Your fierce radiance fills the whole universe with blazing power and scorches it. With flaming mouths You devour all the worlds, licking them again and again on every side, like fire consuming the entire creation.
Verse 31
सम्बन्ध-- अजुनने तीसरे और चौथे शलोकोमें भगवानूसे अपने ऐश्वर्यमय रूपका दर्शन करानेके लिये प्रार्थना की थी, उसीके अनुसार भरगवान्ने अपना विश्वरूप अर्जुनको दिखलाया; परंतु भगवान्के इस भयानक उग्ररूपको देखकर अर्जुन बहुत डर गये और उनके मनमें इस बातके जाननेकी इच्छा उत्पन्न हो गयी कि ये श्रीकृष्ण वस्चुतः कौन हैं तथा इस महान् उग्र स्वरूपके द्वारा अब ये क्या करना चाहते हैं। इसीलिये वे भगवान्से पूछ रहे हैं-- आखेयाहि मे को भवानुग्ररूपो नमोस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्,मुझे बतलाइये कि आप उग्ररूपवाले कौन हैं? हे देवोंमें श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइये। आदिपुरुष आपको मैं विशेषरूपसे जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्तिको नहीं जानताई
Arjuna said: “Tell me—who are You in this formidable, terrifying form? O best among the gods, I bow to You; be gracious. I wish to know You clearly as the primal source, for I do not understand the purpose and course of Your action.”
Verse 32
सम्बन्ध--इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर भगवान् अपने उमग्ररूप धारण करनेका कारण बतलाते हुए प्रश्नानुसार उत्तर देते हैं-- श्रीभगवानुवाच कालो<स्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्त: । ऋते<पि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे ये5वस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा:,श्रीभगवान् बोले--मैं लोकोंका नाश करनेवाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ।* इस समय इन लोकोंको नष्ट करनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ।ः इसलिये जो प्रतिपक्षियोंकी सेनामें स्थित योद्धालोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात् तेरे युद्ध न करनेपर भी इन सबका नाश हो जायगाः
The Blessed Lord said: “I am Time, grown mighty, the agent of the world’s destruction. Here and now I have set forth to gather up (i.e., annihilate) these worlds. Therefore, even without you, all those warriors who stand arrayed in the opposing ranks will not remain; their destruction is already ordained.”
Verse 33
सम्बन्ध--इस प्रकार जर्जुनके प्रश्नका उत्तर देकर अब भगवान् दो शलोकोंद्वारा युद्ध करनेगें सब प्रकारसे लाभ दिखलाकर अजुनिको युद्धके लिये उत्साहित करते हुए आज्ञा देते हैं-- तस्मात् त्वमुत्तिष्ठट यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुड्क्ष्व राज्यं समृद्धम् | मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्,अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओंको जीतकर धन-धान्यसे सम्पन्न राज्यको भोग।* ये सब शूरवीर पहलेहीसे मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन्! तू तो केवल निमित्तमात्र बन जाई
Therefore, rise up. Win glory; conquer the enemies and enjoy a prosperous kingdom. These warriors have already been slain by Me beforehand—O Savyasācin, be only the instrument.
Verse 34
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्ण तथान्यानपि योधवीरान् | मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्,द्रोणाचार्य और भीष्मपितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत- से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओंको तू मार।* भय मत कर।3 निस्संदेह तू युद्धमें वैरियोंको जीतेगा। इसलिये युद्ध कर
Slay Droṇa and Bhīṣma, Jayadratha and Karṇa, and the other heroic warriors as well—already struck down by Me. Do not waver or grieve. Fight on; you will surely conquer your foes in battle.
Verse 35
सम्बन्ध--इस प्रकार भगवान्के मुखसे सब बातें सुननेके बाद अर्जुनकी कैसी परिस्थिति हुई और उन्होंने क्या किया--इस जिज्ञासापर संजय कहते हैं संजय उवाच एतच्छुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिवेंपमान: किरीटीरें | नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगदगदं भीतभीत: प्रणम्य,संजय बोले--केशव भगवान्के इस वचनको सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपता हुआ* नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके* भगवान् श्रीकृष्णके प्रति गदूगद वाणीसे बोलाः
Sañjaya said: Having heard these words of Keśava, the diademed Arjuna, with palms joined and trembling, bowed in reverence. Then, bowing again—overwhelmed with fear and awe—he addressed Kṛṣṇa in a voice choked with emotion.
Verse 36
सम्बन्ध-- अब छत्तीसवेंसे छियालीसवें *लोकतक अर्जुन भगवान्के स्तवन, नमस्कार और क्षमायाचना-सहित प्रार्थना करते हैं-- अजुन उवाच स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत प्रह्ृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा:,अर्जुन बोले--हे अन्तर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभावके कीर्तनसे जगत् अति हर्षित हो रहा है और अनुरागको भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षसलोग दिशाओंमें भाग रहे हैं और सब सिद्धगणोंके समुदाय नमस्कार कर रहे हैं*
Arjuna said: “It is only fitting, O Hṛṣīkeśa, that when Your glory is proclaimed, the world rejoices and is drawn to You with love. Terrified, the hosts of rākṣasas flee in all directions, and all the assembled companies of siddhas bow down in reverence.”
Verse 37
कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणो<प्यादिकर्त्रें । अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्,हे महात्मन्! ब्रह्माके भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिये वे कैसे नमस्कार न करें; क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास!* जो सत्ू, असत् और उनसे परे अक्षर अर्थात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं+
Arjuna said: “O great-souled One, why should they not bow to You—You who are greater even than Brahmā, the primal creator? O Infinite Lord, Lord of the gods, refuge of the universe: You are that imperishable Reality which is spoken of as the existent and the non-existent, and also That which is beyond them.”
Verse 38
त्वमादिदेव: पुरुष: पुराण- स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् | वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया तत॑ विश्वमनन्तरूप,आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इस जगत्के परम आश्रय और जाननेवाले* तथा जाननेयोग्य* और परम धामः हैं। हे अनन्तरूप*! आपसे यह सब जगत् व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण हैः
“You are the primal God, the ancient Puruṣa; You are the supreme refuge of this universe. You are the knower and what is to be known, and the highest abode. O You of infinite forms, by You this whole world is pervaded and filled.”
Verse 39
वायुर्यमो डग्निर्वरुण: शशाड्कः: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्न । नमो नमस्ते<स्तु सहस्रकृत्व:* पुनश्चन भूयो5पि नमो नमस्ते,आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजाके स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्माके भी पिता हैं। आपके लिये हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! आपके लिये फिर भी बार-बार नमस्कार! नमस्कार!!!
“You are the Wind, Yama, Fire, Varuṇa, and the Moon; You are Prajāpati, Brahmā, and even the Father of Brahmā. Salutations to You a thousand times—salutations, salutations! And again, once more and yet again, salutations to You—salutations, salutations!”
Verse 40
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोउस्तु ते सर्वत एव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्व॑ सर्व समाप्रोषि ततो5सि सर्व:,है अनन्त सामर्थ्यवाले! आपके लिये आगेसे और पीछेसे भी नमस्कार! हे सर्वात्मन! आपके लिये सब ओरसे ही नमस्कार हो;” क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप सब संसारको व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं?
Arjuna said: Salutations to You from the front and from behind; salutations to You from every side, O All. You are of endless power and immeasurable prowess; You pervade the whole universe—therefore You are all that is.
Verse 41
सम्बन्ध-- इस प्रकार भगवान्की स्घुति और प्रणाम करके अब भगवान्के गुण, रहस्य और माहात्म्यको यथार्थ न जाननेके कारण वाणी और क्रियाद्वारा किये गये अपराधोंको क्षमा करनेके लिये भगवान्से अर्जुन प्रार्थना करते हैं-- सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमान तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि,आपके इस प्रभावको न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेमसे अथवा प्रमादसे भी मैंने 'हे कृष्ण!” “हे यादव!” 'हे सखे!” इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात् कहा हैः और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोदके लिये विहार, शय्या, आसन और भोजनादिमें अकेले अथवा उन सखाओंके सामने भी अपमानित किये गये हैं--वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाववाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ:
Arjuna said: Thinking of You merely as my friend, whatever I blurted out rashly—“O Krishna,” “O Yadava,” “O friend”—not knowing this true greatness of Yours, whether out of carelessness or out of affection, I ask You to forgive. And for whatever disrespect I showed You in jest—while walking, resting, sitting, or at meals—whether when we were alone or even in the presence of others, O Acyuta, I beg pardon of You, the immeasurable One.
Verse 42
यच्चावहासार्थमसत्कृतो 5सि८ विहारशय्यासनभोजनेषु । एको<थवाप्यच्युत” तत्समक्षं तत् क्षामये त्वामहमप्रमेयम्,आपके इस प्रभावको न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेमसे अथवा प्रमादसे भी मैंने 'हे कृष्ण!” “हे यादव!” 'हे सखे!” इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात् कहा हैः और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोदके लिये विहार, शय्या, आसन और भोजनादिमें अकेले अथवा उन सखाओंके सामने भी अपमानित किये गये हैं--वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाववाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ:
And for whatever reason I may have treated You with disrespect in jest—during play, while resting, sitting, or at meals—whether alone with You, O Acyuta, or in the presence of others, for all that I beg Your forgiveness, O immeasurable One.
Verse 43
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्यथ पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । न त्वत्समो<स्त्य भ्यधिक: कुतो<न्यो लोकत्रये5प्यप्रतिमप्रभाव,आप इस चराचर जगत्के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं,* है अनुपम प्रभाव-वाले! तीनों लोकोंमें आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है
Arjuna said: You are the Father of this whole world of moving and unmoving beings; you are its most venerable elder and the weightiest of teachers. O One of incomparable power, within the three worlds there is none equal to You—how then could there be anyone greater?
Verse 44
तस्मातउें प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्यु: प्रिय: प्रियायाहसि देव सोढुम्,अतएव हे प्रभो! मैं शरीरको भलीभाँति चरणोंमें निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने-योग्य आप ईश्वरको प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ।* हे देव! पिता जैसे पुत्रके, सखा जैसे सखाके और पति जैसे प्रियतमा पत्नीके अपराध सहन करते हैं--वैसे ही आप भी मेरे अपराधको सहन करनेयोग्य हैं;
Therefore I bow to You, laying my whole body down in surrender, and I seek to please You—the Lord worthy of praise. O God, just as a father endures a son’s fault, a friend a friend’s, and a beloved husband the offense of his dear wife, so too You are able to bear my offense.
Verse 45
सम्बन्ध-- इस प्रकार भगवान्से अपने अपराधोंके लिये क्षमा-याचना करके अब अर्जुन दो शलोकोमें भगवान्से चतुर्थुजरूपका दर्शन करानेके लिये प्रार्थना करते हैं-- अदृष्टपूर्व हृषितो5स्मि दृष्टवा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देवरूपं॑३ प्रसीद देवेश जगन्निवास,मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चवर्यमय रूपको देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भयसे अति व्याकुल भी हो रहा है,* इसलिये आप उस अपने चतुर्भुज विष्णुरूपको ही मुझे दिखलाइये। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइये
Arjuna said: “Seeing this wondrous form of Yours that I have never beheld before, I am filled with joy; yet my mind is also shaken with fear. Therefore, show me again that very divine form of Yours—the familiar four-armed form. Be gracious, O Lord of the gods, O Abode of the universe.”
Verse 46
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते४,मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चक्र हाथमें लिये हुए देखना चाहता हूँ," इसलिये हे विश्वस्वरूप! हे सहख्रबाहो! आप उसी चतुर्भुजरूपसे प्रकट होइये*
Arjuna said: “I wish to see You just as before—wearing the crown, holding the mace, and bearing the discus in Your hand. Therefore, O Universal Form, O thousand-armed Lord, appear again in that same four-armed form.”
Verse 47
सम्बन्ध-- अर्जुनकी प्रार्थनापर अब अगले दो श्लोकोर्में भगवान् अपने विश्वर्पकी महिमा और दुर्लभताका वर्णन करते हुए उनचासवें शलोकमें अर्जुनको आश्वासन देकर चतुर्थुजरूप देखनेके लिये कहते हैं-- श्रीभगवानुवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूप॑ परं दर्शितमात्मयोगात् | तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्य॑ यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्,श्रीभगवान् बोले--हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्तिके प्रभावसे5 यह मेरा परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट् रूप तुझको दिखलाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसीने पहले नहीं देखा था:
The Blessed Lord said: “Arjuna, being graciously disposed toward you, I have shown you—by the power of My own yoga—this supreme form of Mine: radiant with splendor, the universe itself, without end, the primal source. Before you, no one else had ever beheld this form of Mine.”
Verse 48
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै: एवंरूप: शक््य अहं नूलोके+ द्रष्ट त्ववन्येन कुरुप्रवीर,हे अर्जुन! मनुष्यलोकमें इस प्रकार विश्वरूपवाला मैं न वेद और यज्ञोंके अध्ययनसे, न दानसे, न क्रियाओंसे और न उग्र तपोंसे ही तेरे अतिरिक्त दूसरेके द्वारा देखा जा सकता हूँ:
“O hero of the Kurus, in the human world this universal form of Mine cannot be seen by anyone other than you—not through the study of the Vedas and sacrificial lore, not through gifts, not through ritual acts, and not even through severe austerities.”
Verse 49
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्टवा रूपं घोरमीदृड़ममेदम् । व्यपेतभी: प्रीतमना: पुनस्त्व॑ तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य,मेरे इस प्रकारके इस विकराल रूपको देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिये और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिये। तू भयरहित और प्रीतियुक्त मनवाला होकर उसी मेरे इस शंख-चक्र-गदा-पद्मयुक्त चतुर्भुज रूपको फिर देख
“Do not be distressed, and do not fall into bewilderment on seeing this terrible form of Mine. Become free from fear, regain a glad and steady mind, and behold again that very form of Mine—the familiar four-armed form bearing conch, discus, mace, and lotus.”
Verse 50
संजय उवाच इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूप॑* दर्शयामास भूय: । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुन: सौम्यवपुर्महात्मा,संजय बोले--वासुदेवः भगवानने अर्जुनके प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज-रूपको दिखलाया और फिर महात्मा श्रीकृष्णने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुनको धीरज दियाः
Sañjaya said: Having spoken thus to Arjuna, Vāsudeva once again revealed His own familiar form. Then the great-souled Lord, assuming a gentle and gracious appearance, reassured the frightened Arjuna—restoring his composure after the overwhelming vision.
Verse 51
सम्बन्ध-- इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने अपने विश्वरूपको संवरण करके चतुर्थुजरूपके दर्शन देनेके पश्चात् जब स्वाभाविक मानुषरूपसे युक्त होकर अर्जुनको आश्वासन दिया; तब अर्जुन सावधान होकर कहने लगे-- अजुन उवाच दृष्टवेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं* जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्त: सचेता: प्रकृति गत:,अर्जुन बोले--हे जनार्दन! आपके इस अति शान्त मनुष्यरूपको देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ;
Arjuna said: “O Janārdana, seeing again this gentle human form of Yours, I have now regained composure; my mind is steady, and I have returned to my natural state.”
Verse 52
सम्बन्ध-- इस प्रकार अ्जुनके वचन सुनकर अब भगवान् दो श*्लोकोद्वारा अपने च॒दुर्धुज देवरूपके दर्शनकी दुर्लभता और उसकी महिमाका वर्णन करते श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूप॑ दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाड्क्षिण:,श्रीभगवान् बोले--मेरा जो चतुर्भुजरूप तुमने देखा है, वह सुदुर्दर्श है अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। देवता भी सदा इस रूपके दर्शनकी आकांक्षा करते रहते हैं
The Blessed Lord said: “This form of Mine which you have seen is exceedingly difficult to behold. Even the gods continually long for the vision of this very form.”
Verse 53
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शकक््य एवंविधो द्रष्ठुं दृष्टटानसि मां यथा,जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है--इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैं न वेदोंसे, न तपसे, न दानसे और न यज्ञसे ही देखा जा सकता हूँ:
The Blessed Lord said: “Not by the Vedas, nor by austerity, nor by gifts, nor even by sacrificial worship can I be seen in this very form as you have seen Me.”
Verse 54
सम्बन्ध-- यदि उपर्युक्त उपायोसे आपके दर्शन नहीं हो सकते तो किस उपायसे हो सकते हैं; ऐसी जिज्ञासा होनेपर भगवान् कहते हैं-- भक््त्या त्वनन्यया शक््य अहमेवंविधोड्र्जुन । ज्ञातु द्रष्ट च तत्त्वेन प्रवेष्ट च परंतप,परंतु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्तिके द्वारा इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखनेके लिये, तत्त्वसे जाननेके लिये तथा प्रवेश करनेके लिये अर्थात् एकीभावसे प्राप्त होनेके लिये ही शकक््य हूँ
The Blessed Lord declares: “O Arjuna, scorcher of foes, only through exclusive, undivided devotion can I be truly known, directly seen in this very form, and entered into in reality.”
Verse 55
सम्बन्ध--अनन्य भक्तिके द्वार भ्रगवानको देखना, जानना और एकीभावसे प्राप्त करना युलभ बतलाया जानेके कारण अनन्य भक्तिका स्वरूप जाननेकी आकांक्षा ढोनेपर अब अनन्य भक्तके लक्षणोंका वर्णन किया जाता है मत्कर्मकृन्मत्परमोः २ मद्धक्त: सड़वर्जित:* | निर्वेर: सर्वभूतेषु४ य: स मामेति पाण्डव
“One who acts for My sake, who holds Me as the supreme goal, who is devoted to Me, free from attachment, and without hostility toward any being—such a person comes to Me, O son of Pāṇḍu.”
The dilemma is how to live and act within a world of sensory entanglement and karmic continuity while seeking an imperishable goal—i.e., how to reconcile embodied participation with liberation-oriented detachment and correct identification of the self.
Conditioned existence is a structured but elusive entanglement; severing attachment through disciplined detachment and discerning the supreme reality (Puruṣottama) enables stable orientation beyond cyclical return, without denying the operational reality of action and embodiment.
Yes. The closing verses characterize the teaching as highly confidential (guhyatama) and state that understanding Puruṣottama makes one truly wise and ‘accomplished’ (kṛtakṛtya), implying soteriological and cognitive completion through correct knowledge.