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Shloka 1

Puruṣottama-yoga

The Discipline of the Supreme Person) — Chapter 15 (Bhagavadgītā

४) “हे राजन! वह ब्रह्माजीके कमण्डलुका जल, भगवानके चरणोंको धोनेसे पवित्रतम होकर स्वर्ग-गंगा हो गया। वह गंगा आकाशसे पृथ्वीपर गिरकर अबतक तीनों लोकोंको भगवान्‌की निर्मल कीर्तिके समान पवित्र कर रही है।' इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि एक बार भगवान्‌ विष्णु स्वयं ही द्रवरूप होकर बहने लगे थे और ब्रह्माजीके कमण्डलुमें जाकर गंगारूप हो गये थे। इस प्रकार साक्षात्‌ ब्रह्मद्रव होनेके कारण भी गंगाजीका अत्यन्त माहात्म्य है। इसीलिये भगवानने गंगाको अपना स्वरूप बतलाया है। ४. अध्यात्मविद्या या ब्रह्मविद्या उस विद्याको कहते हैं जिसका आत्मासे सम्बन्ध है, जो आत्मतत्त्वका प्रकाश करती है और जिसके प्रभावसे अनायास ही ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है। संसारमें ज्ञात या अज्ञात जितनी भी विद्याएँ हैं, सभी इस ब्रह्मविद्यासे निकृष्ट हैं; क्योंकि उनसे अज्ञानका बन्धन टूटता नहीं, बल्कि और भी दृढ़ होता है; परंतु इस ब्रह्मविद्यासे अज्ञानकी गाँठ सदाके लिये खुल जाती है और परमात्माके स्वरूपका यथार्थ साक्षात्कार हो जाता है। इसीसे यह सबसे श्रेष्ठ है और इसीलिये भगवान्‌ने इसको अपना स्वरूप बतलाया है। ५. शास्त्रार्थके तीन स्वरूप होते हैं--जल्प, वितण्डा और वाद। उचित-अनुचितका विचार छोड़कर अपने पक्षके मण्डन और दूसरेके पक्षका खण्डन करनेके लिये जो विवाद किया जाता है, उसे “जल्प' कहते हैं; केवल दूसरे पक्षका खण्डन करनेके लिये किये जानेवाले विवादको “वितण्डा” कहते हैं और जो तत्त्वनिर्णयके उद्देश्यसे शुद्ध नीयतसे किया जाता है, उसे “वाद” कहते हैं। “जल्प” और “वितण्डा' से द्वेष, क्रोध, हिंसा और अभिमानादि दोषोंकी उत्पत्ति होती है तथा “वाद' से सत्यके निर्णयमें और कल्याण- साधनमें सहायता प्राप्त होती है। 'जल्प” और “वितण्डा” त्याज्य हैं तथा “वाद” आवश्यकता होनेपर ग्राह्म है। इसी विशेषताके कारण भगवानने “वाद” को अपनी विभूति बतलाया है। ६. स्वर और व्यंजन आदि जितने भी अक्षर हैं, उन सबमें अकार सबका आदि है और वही सबमें व्याप्त है। इसीलिये भगवानने उसको अपना स्वरूप बतलाया है। ७. संस्कृत-व्याकरणके अनुसार समास चार हैं--१. अव्ययीभाव, २. तत्पुरुष, ३. बहुव्रीहि और ४. द्वन्। कर्मधारय और द्विगु--ये दोनों तत्पुरुषके ही अन्तर्गत हैं। द्वन्द्ध समासमें दोनों पदोंके अर्थकी प्रधानता होनेके कारण वह अन्य समासोंसे श्रेष्ठ है; इसलिये भगवानने उसको अपनी विभूतियोंमें गिना है। ८. कालके तीन भेद हैं-- १. “समय” वाचक काल। २. “प्रकृति” रूप काल। महाप्रलयके बाद जितने समयतक प्रकृतिकी साम्यावस्था रहती है, वही प्रकृतिरूपी काल है। ३. नित्य शाश्वत विज्ञानानन्दघन परमात्मा। समयवाचक स्थूल कालकी अपेक्षा तो बुद्धिकी समझमें न आनेवाला प्रकृतिरूप काल सूक्ष्म और पर है तथा इस प्रकृतिरूप कालसे भी परमात्मारूप काल अत्यन्त सूक्ष्म, परातिपर और परम श्रेष्ठ है। वस्तुतः परमात्मा देश-कालसे सर्वथा रहित हैं; परंतु जहाँ प्रकृति और उसके कार्यरूप संसारका वर्णन किया जाता है, वहाँ सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाले होनेके कारण उन सबके अधिष्ठानरूप विज्ञानानन्द्घन परमात्मा ही वास्तविक “काल' हैं। ये ही “अक्षय” काल हैं। $. जिस प्रकार मृत्युरूप होकर भगवान्‌ सबका नाश करते हैं अर्थात्‌ उनका शरीरसे वियोग कराते हैं, उसी प्रकार भगवान्‌ ही उनका पुनः दूसरे शरीरोंसे सम्बन्ध कराके उन्हें उत्पन्न करते हैं--यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने अपनेको उत्पन्न होनेवालोंका उत्पत्तिहेतु बतलाया है। २. स्वायम्भुव मनुकी कन्या प्रसूति प्रजापति दक्षको ब्याही थीं, उनसे चौबीस कन्याएँ हुईं कीर्ति, मेधा, वृत्ति, स्मृति और क्षमा उन्हींमेंसे हैं। इनमें कीर्ति, मेधा और धृतिका विवाह धर्मसे हुआ; स्मृतिका अंगिरासे और क्षमा महर्षि पुलहको ब्याही गयीं। महर्षि भूगुकी कन्याका नाम श्री है, जो दक्षकन्या ख्यातिके गर्भसे उत्पन्न हुई थीं। इनका पाणिग्रहण भगवान्‌ विष्णुने किया और वाक्‌ ब्रह्माजीकी कन्या थीं। इन सातोंके नाम जिन गुणोंका निर्देश करते हैं--उन विभिन्न गुणोंकी ये सातों अधिष्ठातृदेवता हैं तथा संसारकी समस्त स्त्रियोंमें श्रेष्ठ मानी गयी हैं। इसीलिये भगवान्‌ने इनको अपनी विभूति बतलाया है। 3. सामवेदमें “बृहत्साम' एक गीतिविशेष है। इसके द्वारा परमेश्वरकी इन्द्ररूपमें स्तुति की गयी है। “अतिगात्र' यागमें यही पृष्ठस्तोत्र है तथा सामवेदके “रथन्तर” आदि सामोंमें बृहत्साम (“बृहत्‌” नामक साम) प्रधान होनेके कारण सबमें श्रेष्ठ है, इसी कारण यहाँ भगवानने “बृहत्साम” को अपना स्वरूप बतलाया है। ४. वेदोंकी जितनी भी छन्दोबद्ध ऋचाएँ हैं, उन सबमें गायत्रीकी ही प्रधानता है। श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराण आदि शास्त्रोंमें जगह-जगह गायत्रीकी महिमा भरी है-- अभीष्ट लोकमाप्रोति प्राप्तुयात्‌ काममीप्सितम्‌ । गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी ।। गायत्र्या: परमं नास्ति दिवि चेह च पावनम्‌ | हस्तत्राणप्रदा देवी पततां नरकार्णवे ।। (शंखस्मृति १२।२४-२५) “(गायत्रीकी उपासना करनेवाला द्विज) अपने अभीष्ट लोकको पा जाता है, मनोवांछित भोग प्राप्त कर लेता है। गायत्री समस्त वेदोंकी जननी और सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाली हैं। स्वर्गलोगमें तथा पृथ्वीपर गायत्रीसे बढ़कर पवित्र करनेवाली दूसरी कोई वस्तु नहीं है। गायत्री देवी नरकसमुद्रमें गिरनेवालोंको हाथका सहारा देकर बचा लेनेवाली हैं।' नास्ति गज़़ासमं तीर्थ न देव: केशवात्‌ पर: । गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति ।। (बृहद्योगियाज्ञवल्क्य १०।१०) “गंगाजीके समान तीर्थ नहीं है, श्रीविष्णुभगवान्से बढ़कर देवता नहीं है और गायत्रीसे बढ़कर जपनेयोग्य मन्त्र न हुआ, न होगा।' गायत्रीकी इस श्रेष्ठताके कारण ही भगवान्‌ने उनको अपना स्वरूप बतलाया है। ५. महाभारतकालमें महीनोंकी गणना मार्गशीर्षसे ही आरम्भ होती थी (महा०, अनुशासन० १०६ और १०९)। अत: यह सब मासोंमें प्रथम मास है तथा इस मासमें किये हुए व्रत-उपवासोंका शास्त्रोंमें महान्‌ फल बतलाया गया है। नये अन्नकी इष्टि (यज्ञ)-का भी इसी महीनेमें विधान है। वाल्मीकीय रामायणमें इसे संवत्सरका भूषण बतलाया गया है। इस प्रकार अन्यान्य मासोंकी अपेक्षा इसमें कई विशेषताएँ हैं, इसलिये भगवानने इसको अपना स्वरूप बतलाया है। ६. वसन्त सब ऋतुओंमें श्रेष्ठ और सबका राजा है। इसमें बिना ही जलके सब वनस्पतियाँ हरी-भरी और नवीन पत्रों तथा पुष्पोंसे समन्वित हो जाती हैं। इसमें न अधिक गरमी रहती है और न सरदी। इस ऋतुमें प्रायः सभी प्राणियोंको आनन्द होता है। इसीलिये भगवानने इसको अपना स्वरूप बतलाया है। $. संसारमें उत्तम, मध्यम और नीच जितने भी जीव और पदार्थ हैं, सभीमें भगवान्‌ व्याप्त हैं और भगवानकी ही सत्ता-स्फूर्तिसे सब चेष्टा करते हैं। ऐसा एक भी पदार्थ नहीं है जो भगवान्‌की सत्ता और शक्तिसे रहित हो। ऐसे सब प्रकारके सात््विक, राजस और तामस जीवों एवं पदार्थोंमें जो विशेष गुण, विशेष प्रभाव और विशेष चमत्कारसे युक्त हैं, उसीमें भगवान्‌की सत्ता और शक्तिका विशेष विकास है। इस विशेषताके कारण जिस-जिस व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया या भावका मनसे चिन्तन होने लगे, उस- उसमें भगवान्‌का ही चिन्तन करना चाहिये। इसी अभिप्रायसे छल करनेवालोंमें जूएको भगवानने अपना स्वरूप बताया है। उसे उत्तम बतलाकर उसमें प्रवृत्त करनेके उद्देश्यसे नहीं; क्योंकि भगवानने तो महान्‌ क्रूर और हिंसक सिंह और मगरको एवं सहज ही विनाश करनेवाले अग्निको तथा सर्वसंहारकारी मृत्युको भी अपना स्वरूप बतलाया है। उसका अभिप्राय यह थोड़े ही है कि कोई भी मनुष्य जाकर सिंह या मगरके साथ खेले, आगमें कूद पड़े अथवा जान-बूझकर मृत्युके मुँहमें घुस जाय। इनके करनेमें जो आपत्ति है, वही आपत्ति जूआ खेलनेमें है। २. ये चारों ही गुण भगवत्प्राप्तिमें सहायक हैं, इसलिये भगवान्‌ने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। इन चारोंको अपना स्वरूप बतलाकर भगवानने यह भाव भी दिखलाया है कि तेजस्वी प्राणियोंमें जो तेज या प्रभाव है, वह वास्तवमें मेरा ही है। जो मनुष्य उसे अपनी शक्ति समझकर अभिमान करता है, वह भूल करता है। इसी प्रकार विजय प्राप्त करनेवालोंका विजय, निश्चय करनेवालोंका निश्चय और सात्त्विक पुरुषोंका सात््विकभाव--ये सब गुण भी मेरे ही हैं। इनके निमित्तसे अभिमान करना भी बड़ी भारी मूर्खता है। इसके अतिरिक्त इस कथनमें यह भाव भी है कि जिन-जिनमें उपर्युक्त गुण हों, उनमें भगवान्‌के तेजकी अधिकता समझकर उनको श्रेष्ठ मानना चाहिये। 3. इस कथनसे भगवानने अवतार और अवतारीकी एकता दिखलायी है। कहनेका भाव यह है कि मैं अजन्मा-अविनाशी, सब भूतोंका महेश्वर, सर्वशक्तिमान्‌ पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम ही यहाँ वसुदेवके पुत्रके रूपमें लीलासे प्रकट हुआ हूँ (गीता ४।६)। ४. अर्जुन ही सब पाण्डवोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। इसका कारण यह है कि नर-नारायण-अवतारमें अर्जुन नररूपसे भगवान्‌के साथ रह चुके हैं। इसके अतिरिक्त वे भगवानके परम प्रिय सखा और उनके अनन्य प्रेमी भक्त हैं। इसलिये अर्जुनको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। भगवानने स्वयं कहा है-- नरस्त्वमसि दुर्धर्ष हरिनारायणो हाहम्‌ | काले लोकमिमं प्राप्तौ नरनारायणावृषी ।। अनन्य: पार्थ मत्तस्त्वं त्वत्तश्नाहंं तथैव च । (महा०, वन० १२।४६-४७) हहे दुर्धर्ष अर्जुन] तू भगवान्‌ नर है और मैं स्वयं हरि नारायण हूँ। हम दोनों एक समय नर और नारायण ऋषि होकर इस लोकमें आये थे। इसलिये हे अर्जुन! तू मुझसे अलग नहीं है और उसी प्रकार मैं तुझसे अलग नहीं हूँ।” ५. भगवानके स्वरूपका और वेदादि शास्त्रोंका मनन करनेवालोंको “मुनि” कहते हैं। भगवान्‌ वेदव्यास समस्त वेदोंका भलीभाँति चिन्तन करके उनका विभाग करनेवाले, महाभारत, पुराण आदि अनेक शास्त्रोंके रचयिता, भगवानके अंशावतार और सर्वसदगुणसम्पन्न हैं। अतएव मुनिमण्डलमें उनकी प्रधानता होनेके कारण भगवानने उन्हें अपना स्वरूप बतलाया है। ६. जो पण्डित और बुद्धिमान्‌ हो, उसे “कवि” कहते हैं। शुक्राचार्यजी भार्गवोंके अधिपति, सब विद्याओंमें विशारद, नीतिके रचयिता, संजीवनी विद्याके जाननेवाले और कवियोंमें प्रधान हैं, इसलिये इनको भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है। ७. 'ज्ञानवताम्‌' पद परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका साक्षात्‌ कर लेनेवाले यथार्थ ज्ञानियोंका वाचक है। उनका ज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है। इसलिये उसको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ८. दण्ड (दमन करनेकी शक्ति) धर्मका त्याग करके अधर्ममें प्रवृत्त उच्छृंखल मनुष्योंको पापाचारसे रोककर सत्कर्ममें प्रवृत्त करता है। मनुष्योंके मन और इन्द्रिय आदि भी इस दमनशक्तिके द्वारा ही वशमें होकर भगवानकी प्राप्तिमें सहायक बन सकते हैं। दमनशक्तिसे समस्त प्राणी अपने-अपने अधिकारका पालन करते हैं। इसलिये जो भी देवता, राजा और शासक आदि न्यायपूर्वक दमन करनेवाले हैं, उन सबकी उस दमनशक्तिको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ३. 'नीति' शब्द यहाँ न्‍न्यायका वाचक है। न्यायसे ही मनुष्यकी सच्ची विजय होती है। जिस राज्यमें नीति नहीं रहती, अनीतिका बर्ताव होने लगता है, वह राज्य भी शीघ्र नष्ट हो जाता है। अतएव नीति अर्थात्‌ न्याय विजयका प्रधान उपाय है। इसलिये विजय चाहनेवालोंकी नीतिको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। २. जितने भी गुप्त रखनेयोग्य भाव हैं, वे मौनसे (न बोलनेसे) ही गुप्त रह सकते हैं। बोलना बंद किये बिना उनका गुप्त रखा जाना कठिन है। इस प्रकार गोपनीय भावोंके रक्षक मौनकी प्रधानता होनेसे मौनको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। 3. भगवान्‌ ही समस्त चराचर भूतप्राणियोंके परम आधार हैं और उन्हींसे सबकी उत्पत्ति होती है। अतएव वे ही सबके बीज या महान्‌ कारण हैं। इसीसे गीताके सातवें अध्यायके दसवें श्लोकमें उन्हें सब भूतोंका (सनातन बीज” और नवम अध्यायके अठारहवें श्लोकमें 'अविनाशी बीज” बतलाया गया है। इसीलिये भगवानने उसको यहाँ अपना स्वरूप बतलाया है। ४. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि चर या अचर जितने भी प्राणी हैं, उन सबमें मैं व्याप्त हूँ; कोई भी प्राणी मुझसे रहित नहीं है। अतएव समस्त प्राणियोंको मेरा स्वरूप समझकर और मुझे उनमें व्याप्त समझकर जहाँ भी तुम्हारा मन जाय, वहीं तुम मेरा चिन्तन करते रहो। इस प्रकार अर्जुनके “(आपको किन-किन भावोंमें चिन्तन करना चाहिये?” (गीता १०।१७) इस प्रश्नका भी इससे उत्तर हो जाता है। ५. जिस किसी भी प्राणी या जडव्स्तुमें उपर्युक्त ऐश्वर्य, शोभा, कान्ति, शक्ति, बल, तेज, पराक्रम या अन्य किसी प्रकारकी शक्ति आदि सब-के-सब या इनमेंसे कोई एक भी प्रतीत होता हो, उस प्रत्येक प्राणी और प्रत्येक वस्तुको भगवानके तेजका अंश समझना ही उसको भगवान्‌के तेजके अंशकी अभिव्यक्ति समझना है। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार बिजलीकी शक्तिसे कहीं रोशनी हो रही है, कहीं पंखे चल रहे हैं, कहीं जल निकल रहा है, कहीं रेडियोंमें दूर-दूरके गाने सुनायी पड़ रहे हैं--इस प्रकार भिन्न-भिन्न अनेकों स्थानोंमें और भी बहुत कार्य हो रहे हैं; परंतु यह निश्चय है कि जहाँ-जहाँ ये कार्य होते हैं, वहाँ-वहाँ बिजलीका ही प्रभाव कार्य कर रहा है, वस्तुतः वह बिजलीके ही अंशकी अभिव्यक्ति है। उसी प्रकार जिस प्राणी या वस्तुमें जो भी किसी तरहकी विशेषता दिखलायी पड़ती है, उसमें भगवान्‌के ही तेजके अंशकी अभिव्यक्ति समझनी चाहिये। १. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि तुम्हारे पूछनेपर मैंने प्रधान-प्रधान विभूतियोंका वर्णन तो कर दिया, किंतु इतना ही जानना यथेष्ट नहीं है। सार बात यह है जो मैं अब तुम्हें बतला रहा हूँ, इसको तुम अच्छी प्रकार समझ लो; फिर सब कुछ अपने-आप ही समझमें आ जायगा, उसके बाद तुम्हारे लिये कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा। २. मन, इन्द्रिय और शरीरसहित समस्त चराचर प्राणी तथा भोगसामग्री, भोगस्थान और समस्त लोकोंके सहित यह ब्रह्माण्ड भगवान्‌के किसी एक अंभमें उनन्‍्हींकी योगशक्तिसे धारण किया हुआ है, यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने इस जगतके सम्पूर्ण विस्तारको अपनी योगशक्तिके एक अंशसे धारण किया हुआ बतलाया है। पज्चत्रिशो& ध्याय: (श्रीमद्भगवद्गीतायामेकादशो 5 ध्याय: ) विश्वरूपका दर्शन करानेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना, भगवान्‌ और संजयद्दारा विश्वरूपका वर्णन, अर्जुनद्वारा भगवानके विश्वरूपका देखा जाना, भयभीत हुए अर्जुनद्वारा भगवानकी स्तुति-प्रार्थना, भगवान्‌द्वारा विश्वरूप और चतुर्भुजरूपके दर्शनकी महिमा और केवल अनन्यभक्तिसे ही भगवान्‌की प्राप्तिका कथन सम्बन्ध--गीताके दसवें अध्यायके सातवें *लोकतक भगवान्‌ने अपनी विभति तथा योगशक्तिका और उनके जाननेके माहात्म्यका संक्षेपर्में वर्णन करके ग्यारहवें *लोकतक भक्तियोग और उसके फलका निरूपण किया। इसपर बारहवेंये अठारहवें 4*लोकतक अर्जुनने भगवान्‌की स्तुति करके उनसे दिव्य विभूतियोंका और योगशक्तिका विस्तृत वर्णन करनेके लिये प्रार्थागा की। तब भगवान्‌ने चालीसवें श*्लोकतक अपनी विथूतियोंका वर्णन समाप्त करके अन्तमें योगशक्तिका प्रभाव बतलाते हुए समस्त ब्रह्माण्डको अपने एक अंशर्में धारण किया हुआ कहकर अध्यायका उपसंहार किया। इस प्रसंगको सुनकर अजुनिके मनमें उस महान्‌ स्वरूपको, जिसके एक अंशर्में समस्त विश्व स्थित है; प्रत्यक्ष देखनेकी इच्छा उत्पन्न हो गयी। इसीलिये इस ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें पहले चार #लोकोर्में भगवान्‌की और उनके उपदेशकी प्रशंसा करते हुए अर्जुन उनसे विश्वरूपका दर्शन करानेके लिये प्रार्थना करते हैं-- अजुन उवाच मदनुग्रहायः परम गुह्मुमध्यात्मसंज्ञितम्‌ । यत्‌ त्वयोक्तं वचस्तेन मोहो5यं विगतो मम

arjuna uvāca

mad-anugrahāya paramaṁ guhyaṁ adhyātma-saṁjñitam |

yat tvayoktaṁ vacas tena moho 'yaṁ vigato mama ||

Arjuna said: “For my sake, you have spoken the supreme secret teaching known as the knowledge of the Self. By that instruction of yours, this delusion of mine has been dispelled.”

अर्जुनःArjuna
अर्जुनः:
Karta
TypeNoun
Rootअर्जुन
FormMasculine, Nominative, Singular
उवाचsaid
उवाच:
TypeVerb
Rootवच्
FormPerfect, Third, Singular, Parasmaipada
मत्from me
मत्:
Apadana
TypePronoun
Rootअस्मद्
FormMasculine/Neuter, Ablative, Singular
अनुग्रहायfor (your) grace/favor
अनुग्रहाय:
Sampradana
TypeNoun
Rootअनुग्रह
FormMasculine, Dative, Singular
परम्supreme
परम्:
Karma
TypeAdjective
Rootपरम
FormNeuter, Accusative, Singular
गुह्यम्secret, hidden (teaching)
गुह्यम्:
Karma
TypeAdjective
Rootगुह्य
FormNeuter, Accusative, Singular
अध्यात्म-संज्ञितम्called/termed 'adhyātma' (spiritual)
अध्यात्म-संज्ञितम्:
Karma
TypeAdjective
Rootअध्यात्म-संज्ञित
FormNeuter, Accusative, Singular
यत्which
यत्:
Karma
TypePronoun
Rootयद्
FormNeuter, Accusative, Singular
त्वयाby you
त्वया:
Karana
TypePronoun
Rootयुष्मद्
FormMasculine/Neuter, Instrumental, Singular
उक्तम्spoken, said
उक्तम्:
TypeVerb
Rootवच्
Formक्त (past passive participle), Neuter, Accusative, Singular
वचःword(s), statement
वचः:
Karma
TypeNoun
Rootवचस्
FormNeuter, Accusative, Singular
तेनby that, thereby
तेन:
Karana
TypePronoun
Rootतद्
FormNeuter, Instrumental, Singular
मोहःdelusion
मोहः:
Karta
TypeNoun
Rootमोह
FormMasculine, Nominative, Singular
अयम्this
अयम्:
TypePronoun
Rootइदम्
FormMasculine, Nominative, Singular
विगतःhas departed, is gone
विगतः:
TypeVerb
Rootवि-गम्
Formक्त (past participle; intransitive sense), Masculine, Nominative, Singular
ममof me, my
मम:
TypePronoun
Rootअस्मद्
FormMasculine/Neuter, Genitive, Singular

अजुन उवाच

A
Arjuna