
Nakula’s Declaration and the Uñchavṛtti Brāhmaṇa’s Superior Merit (Āśvamedhika Parva, Adhyāya 92)
Upa-parva: Aśvamedha-anuśaṅga (Nakula’s wonder and the uñchavṛtti-brāhmaṇa episode)
Janamejaya requests Vaiśaṃpāyana to recount a notable wonder connected to his ancestor Yudhiṣṭhira’s Aśvamedha. Vaiśaṃpāyana describes a moment when, after priests and relatives were satisfied, large gifts were proclaimed in all directions, and flowers rained upon Dharmarāja’s head, Nakula emerges from a burrow with golden flanks and emits a thunder-like roar. He then speaks in human language, asserting that the sacrifice is not equal to the merit of a Kurukṣetra-resident brāhmaṇa living by uñchavṛtti who gave away merely a prastha of saktu. The assembled brāhmaṇas, emphasizing that the rite was performed according to āgama and nyāya—honoring the worthy, offering mantra-purified oblations, giving without envy, and satisfying multiple social groups—question Nakula’s authority and ask for the factual account. Nakula denies arrogance or falsehood and announces he will narrate what he personally witnessed: how that brāhmaṇa attained heaven with his family, and how Nakula’s own body became partially golden—signaling a moral-empirical validation of the claim that austere, intention-filled giving can surpass imperial ritual magnitude.
Chapter Arc: जनमेजय जिज्ञासा करता है—यदि धर्मयुक्त त्याग से स्वर्ग मिलता है, तो अगस्त्य के यज्ञ में ‘उच्छवृत्ति’ और ‘सक्तुदान’ जैसे अल्प साधनों से भी इतना महान फल कैसे सिद्ध हुआ? → वक्ता (वैशम्पायन) उच्छवृत्ति-धर्म का प्रताप बताते हुए प्रश्न को तीखा करते हैं—सभी यज्ञों में यह ‘परम निश्चय’ कैसे टिके, और जब इन्द्र वर्षा रोक दे (द्वादश वर्षों तक) तब भी यज्ञ कैसे चले? अगस्त्य का संकल्प इन्द्र की शक्ति-राजनीति से टकराता है; ऋषि-समाज यज्ञ की सिद्धि और लोक-कल्याण के बीच संतुलन खोजता है। → अगस्त्य मुनियों को प्रणाम कर प्रसन्न करते हुए निर्भय घोषणा करते हैं—‘इन्द्र वर्षा करे या न करे, मुझे परवा नहीं; मेरा यज्ञ व्यर्थ नहीं होगा।’ वे उत्तरकुरु की समृद्धि, स्वर्गसदृश ऐश्वर्य, और दिव्य समुदाय (अप्सरा, गन्धर्व, किन्नर, विश्वावसु आदि) को स्वयं यज्ञ में उपस्थित होने का आह्वान करते हैं—यह संकल्प-शक्ति का शिखर है। → ऋषि-वृन्द धर्मशास्त्रीय विधि से सत्र-यज्ञ की समाप्ति और विसर्जन की बात करते हैं; अहिंसारहित बुद्धि और तपस्या-मार्ग की प्रशंसा होती है। अगस्त्य के तपोबल और यज्ञ-निष्ठा को देखकर इन्द्र का हठ टूटता है और वह निकामवर्षी होकर वर्षा आरम्भ कर देता है।
Verse 1
अपन का छा | अप---#क्र+ द्विनवतितमो< ध्याय: महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा जनमेजय उवाच धर्मागतेन त्यागेन भगवन् स्वर्गमस्ति चेत् । एतनमे सर्वमाचक्ष्व कुशलो हासि भाषितुम्,जनमेजयने कहा--भगवन्! धर्मके द्वारा प्राप्त हुए धनका दान करनेसे यदि स्वर्ग मिलता है तो यह सब विषय मुझे स्पष्टरूपसे बताइये; क्योंकि आप प्रवचन करनेमें कुशल हैं
Janamejaya said: “O venerable one, if heaven is attained by the righteous act of giving away wealth that has been acquired through dharma, then explain this entire matter to me clearly—for you are skilled in teaching and discourse.”
Verse 2
तस्योज्छवृत्तेयद् वृत्तं सक्तुदाने फलं महत् । कथितं तु मम ब्रह्मांस्तथ्यमेतदसंशयम्,ब्रह्मन! उज्छवृत्ति धारण करनेवाले ब्राह्मणको न्यायतः प्राप्त हुए सत्तूका दान करनेसे जिस महान् फलकी प्राप्ति हुई, उसका आपने मुझसे वर्णन किया। निस्संदेह यह सब ठीक है
“O Brahmin, you have described to me the great reward that was gained when a Brahmin, living by uccavṛtti, rightly gave in charity sattu (grain-flour) obtained by just means. This is true, without doubt.”
Verse 3
कथं हि सर्वयज्ञेषु निश्चय: परमो5भवत् | एतदर्हसि मे वक्तुं निखिलेन द्विजर्षभ,परंतु सभी यज्ञोंमें यह उत्तम निश्चय कैसे कार्यान्वित किया जा सकता है। द्विजश्रेष्ठ! इस विषयका मुझसे पूर्णतः प्रतिपादन कीजिये
Janamejaya said: “How did this supreme resolve come to be established among all sacrifices? O best of twice-born sages, you ought to tell me this fully.”
Verse 4
वैशम्पायन उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अगस्त्यस्य महायज्ञे पुरावृत्तमरिंदम,वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! इस विषयमें पहले अगस्त्य मुनिके महान् यज्ञमें जो घटना घटित हुई थी, उस प्राचीन इतिहासका जानकार मनुष्य उदाहरण दिया करते हैं
Vaiśaṃpāyana said: “O king, in this matter those who know the ancient lore cite an old account as an example—an event that occurred long ago at the great sacrifice of the sage Agastya.”
Verse 5
पुरागस्त्यो महातेजा दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् | प्रविवेश महाराज सर्वभूतहिते रत:,महाराज! पहलेकी बात है, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेवाले महातेजस्वी अगस्त्य मुनिने एक समय बारह वर्षों समाप्त होनेवाले यज्ञकी दीक्षा ली
Vaiśampāyana said: In former times, the great-splendored sage Agastya—ever devoted to the welfare of all living beings—undertook, O King, the dīkṣā, the consecratory vow for a sacrifice lasting twelve years.
Verse 6
तत्राग्निकल्पा होतार आसन सत्रे महात्मन: । मूलाहारा: फलाहारा: साश्मकुट्टा मरीचिपा:,उन महात्माके यज्ञमें अग्निके समान तेजस्वी होता थे। जिनमें फल, मूलका आहार करनेवाले, अभ्मकुट्ट*, मरीचिपः, परिपृष्टिकः, वैधसिकर्“ं और प्रसंख्याने* आदि अनेक प्रकारके यति एवं भिक्षु उपस्थित थे
Vaiśampāyana said: There, in that great-souled one’s sacrificial session, the officiating hotṛ priests shone with a brilliance like fire. Present too were many ascetics and mendicants of diverse disciplines—some living on roots, some on fruits, and others observing austere vows such as the “stone-pounded” and “ray-drinking” modes of subsistence—gathered to witness and uphold the sanctity of the rite.
Verse 7
परिपृष्टिका वैधसिका: प्रसंख्यानास्तथैव च । यतयो भिक्षवश्चात्र बभूवु: पर्यवस्थिता:,उन महात्माके यज्ञमें अग्निके समान तेजस्वी होता थे। जिनमें फल, मूलका आहार करनेवाले, अभ्मकुट्ट*, मरीचिपः, परिपृष्टिकः, वैधसिकर्“ं और प्रसंख्याने* आदि अनेक प्रकारके यति एवं भिक्षु उपस्थित थे
Vaiśampāyana said: There, many ascetics and mendicants were assembled and standing in attendance—those known as Paripṛṣṭikas, Vaidhāsikas, and Prasaṅkhyānas as well. The scene showed that the sacrificial ground was sanctified not only by ritual fire, but by the presence of disciplined renouncers whose lives embodied restraint, simplicity, and dharma.
Verse 8
सर्वे प्रत्यक्षर्माणो जितक्रोधा जितेन्द्रिया: । दमे स्थिताश्न सर्वे ते हिंसादम्भविवर्जिता:,वे सब-के-सब प्रत्यक्ष धर्मका पालन करनेवाले, क्रोध-विजयी, जितेन्द्रिय, मनोनिग्रहपरायण, हिंसा और दम्भसे रहित तथा सदा शुद्ध सदाचारमें स्थित रहनेवाले थे। उन्हें किसी भी इन्द्रियके द्वारा कभी बाधा नहीं पहुँचती थी। ऐसे-ऐसे महर्षि वह यज्ञ करानेके लिये वहाँ उपस्थित थे
Vaiśampāyana said: All of them were manifest practitioners of dharma—having conquered anger, mastered their senses, and established in self-restraint. Free from violence and hypocrisy, they stood ever firm in pure conduct. Such great seers were present there to officiate at the sacrifice.
Verse 9
वृत्ते शुद्धे स्थिता नित्यमिन्द्रियैश्वाप्पबाधिता: । उपातिष्ठ न्त तं यज्ञ यजन्तस्ते महर्षय:,वे सब-के-सब प्रत्यक्ष धर्मका पालन करनेवाले, क्रोध-विजयी, जितेन्द्रिय, मनोनिग्रहपरायण, हिंसा और दम्भसे रहित तथा सदा शुद्ध सदाचारमें स्थित रहनेवाले थे। उन्हें किसी भी इन्द्रियके द्वारा कभी बाधा नहीं पहुँचती थी। ऐसे-ऐसे महर्षि वह यज्ञ करानेके लिये वहाँ उपस्थित थे
Vaiśampāyana said: Ever established in pure conduct, and never disturbed by the senses, those great seers stood by that sacrifice, officiating and performing the rites. Their disciplined lives—free from inner agitation—made them fit to uphold the yajña as an embodiment of visible dharma.
Verse 10
यथाशक्त्या भगवता तदन्नं समुपार्जितम् | तस्मिन् सत्रे तु यद् वृत्तं यद् योग्यं च तदाभवत्,भगवान् अगस्त्य मुनिने उस यज्ञके लिये यथाशक्ति विशुद्ध अन्नका संग्रह किया था। उस समय उस यज्ञमें वही हुआ, जो उसके योग्य था
Vaiśampāyana said: The venerable sage gathered pure provisions for that sacrificial session to the best of his ability. And in that rite, what occurred was exactly what was fitting and proper—events unfolded in accordance with the rite’s own due order and merit.
Verse 11
उनके सिवा और भी अनेक मुनियोंने बड़े-बड़े यज्ञ किये थे। भरतश्रेष्ठ! महर्षि अगस्त्यका ऐसा यज्ञ जब चालू हो गया, तब देवराज इन्द्रने वहाँ वर्षा बंद कर दी
Vaiśampāyana said: “Besides those already mentioned, many other sages too performed great sacrifices. O best of the Bharatas, when the great sage Agastya’s sacrifice had begun, Indra, king of the gods, withheld the rains there.”
Verse 12
ततः कर्मान्तरे राजन्नगस्त्यस्य महात्मन: । कथेयमभिनिर्वत्ता मुनीनां भावितात्मनाम्,राजन! तब यज्ञकर्मके बीचमें अवकाश मिलनेपर जब विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुनि एक-दूसरेसे मिलकर एक स्थानपर बैठे, तब उनमें महात्मा अगस्त्यजीके सम्बन्धमें इस प्रकार चर्चा होने लगी--
Then, O king, during an interval amid the sacrificial rites, when there was a moment of respite, the sages of purified hearts met together and sat in one place. And among them, this discussion arose concerning the great-souled Agastya—
Verse 13
अगस्त्यो यजमानो5सौ ददात्यन्नं विमत्सर: । न च वर्षति पर्जन्य: कथमन्न॑ भविष्यति,“महर्षियो! सुप्रसिद्ध अगस्त्य मुनि हमारे यजमान हैं। वे ईर्ष्यारहित हो श्रद्धापूर्वक सबको अन्न देते हैं। परंतु इधर मेघ जलकी वर्षा नहीं कर रहा है। तब भविष्यमें अन्न कैसे पैदा होगा?
“That renowned sage Agastya is our yajamāna, the patron of this sacrifice. Free from envy, he faithfully gives food to all. Yet the rain-clouds do not pour. How, then, will there be food in times to come?”
Verse 14
सत्र चेद॑ महद् विप्रा मुनेर्द्धादिशवार्षिकम् । न वर्षिष्यति देवश्न वर्षाण्येतानि द्वादश,“ब्राह्मणो! मुनिका यह महान् सत्र बारह वर्षोतक चालू रहनेवाला है; परंतु इन्द्रदेव इन बारह वर्षोमें वर्षा नहीं करेंगे
Vaiśampāyana said: “O brāhmaṇas, if this great sacrificial session of the sage is to continue for twelve years, then the lord of the gods will not send rain during these very twelve years.”
Verse 15
एतद् भवन्त: संचिन्त्य महर्षेरस्य धीमत: । अगस्त्यस्यातितपस: कर्तुमर्हन्त्यनुग्रहम्,“यह सोचकर आपलोग इन अत्यन्त तपस्वी बुद्धिमान् महर्षि अगस्त्यपर अनुग्रह करें (जिससे इनका यज्ञ निर्विष्न पूर्ण हो जाय)'
Vaiśampāyana said: “Keeping this in mind, you all should resolve to show favor to this wise great seer Agastya, whose austerities are extraordinary—so that his sacred rite may be completed without obstruction.”
Verse 16
इत्येवमुक्ते वचने ततो5गस्त्य: प्रतापवान्
Vaiśampāyana said: When these words had thus been spoken, then the mighty sage Agastya—renowned for his spiritual power and heroic energy—(responded/acted accordingly).
Verse 18
यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षेष्यति वासव:
Vaiśaṃpāyana said: “If Vāsava (Indra) should not send rain for twelve years…”
Verse 19
यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षेष्यति वासव:
Vaiśaṃpāyana said: “If Vāsava (Indra) should not send rain for twelve years…”
Verse 20
बीजयज्ञो मयायं वै बहुवर्षममाचित:
Vaiśampāyana said: “This seed-offering (rite of sowing and consecration) has indeed been performed by me for many years, duly observed and maintained.”
Verse 21
नेदं शक्यं वृथा कर्तु मम सत्र॑ कथंचन
Vaiśampāyana said: “This sacrificial session of mine cannot, in any way, be rendered futile or allowed to come to nothing.”
Verse 22
अथवाभ्यर्थनामिन्द्रो न करिष्यति कामत:
Or else, Indra will not grant the requested boon merely out of personal whim. The statement underscores that even a powerful deity is not portrayed as acting capriciously; requests are weighed against propriety and the moral order (dharma), rather than being fulfilled simply because someone desires them.
Verse 23
स्वयमिन्द्रो भविष्यामि जीवयिष्यामि च प्रजा: । “अथवा यदि इन्द्र इच्छानुसार जल बरसानेके लिये की हुई मेरी प्रार्थना पूर्ण नहीं करेंगे तो मैं स्वयं इन्द्र हो जाऊँगा और समस्त प्रजाके जीवनकी रक्षा करूँगा ।। यो यदाहारजातश्न स तथैव भविष्यति
Vaiśampāyana said: “I myself will become Indra, and I will sustain the people. Or, if Indra does not fulfill my prayer—made so that rain may fall according to need—then I will myself become Indra and protect the life of all creatures. For a being becomes in accordance with the kind of food it consumes.”
Verse 24
अद्येह स्वर्णमभ्येतु यच्चान्यद् वसु किंचन
Vaiśampāyana said: “Let gold come here today, and whatever other wealth there may be as well.”
Verse 25
दिव्याक्षाप्सरसां संघा गन्धर्वाश्व॒ सकिन्नरा:
Vaiśaṃpāyana said: Companies of celestial Apsarases, along with Gandharvas and Kinnaras, were present—evoking the splendor of the divine realms and marking the event as one of extraordinary, heaven-sanctioned significance.
Verse 26
उत्तरेभ्य: कुरुभ्यश्न यत् किंचिद् वसु विद्यते,उत्तर कुरुवर्षमें जो कुछ धन है, वह सब स्वयं यहाँ मेरे यज्ञोंमें उपस्थित हो। स्वर्ग, स्वर्गवासी देवता और धर्म स्वयं यहाँ विराजमान हो जाये
Vaiśampāyana said: “Whatever wealth exists among the Northern Kurus—let all of it come here of its own accord and be present at my sacrifices. Let heaven, the gods who dwell in heaven, and Dharma himself take their seats here.”
Verse 27
सर्व तदिह यज्ञेषु स्वयमेवोपतिष्ठतु । स्वर्ग: स्वर्गसदश्वैव धर्मश्न॒ स्वयमेव तु,उत्तर कुरुवर्षमें जो कुछ धन है, वह सब स्वयं यहाँ मेरे यज्ञोंमें उपस्थित हो। स्वर्ग, स्वर्गवासी देवता और धर्म स्वयं यहाँ विराजमान हो जाये
Vaiśampāyana said: “Let all that wealth here present itself of its own accord at my sacrifices. Let heaven itself, the gods who dwell in heaven, and Dharma too come and abide here in person.”
Verse 28
इत्युक्ते सर्वमेवैतदभवत् तपसा मुने: । तस्य दीप्ताग्निमहसस्त्वगस्त्यस्यातितेजस:,प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, अतिशय कान्तिमान् महर्षि अगस्त्यके इतना कहते ही उनकी तपस्याके प्रभावसे ये सारी वस्तुएँ वहाँ प्रस्तुत हो गयीं
Vaiśampāyana said: “When this had been spoken, all of it came to pass through the ascetic power of the sage. For Agastya—of blazing, fire-like radiance and surpassing splendor—by the force of his tapas caused the desired things to manifest.”
Verse 29
ततस्ते मुन2यो हृष्टा ददुशुस्तपसो बलम् । विस्मिता वचन प्राहुरिदं सर्वे महार्थवत्,उन महर्षियोंने बड़े हर्षके साथ महर्षिके उस तपोबलको प्रत्यक्ष देखा। देखकर वे सब लोग आश्चर्यचकित हो गये और इस प्रकार महान् अर्थसे भरे हुए वचन बोले
Then those sages, filled with joy, directly beheld the power born of the great ascetic’s austerities. Astonished at what they had witnessed, they all spoke words laden with profound meaning.
Verse 30
ऋषय ऊचु: प्रीता: सम तव वाक्येन न त्विच्छामस्तपोव्ययम् । तैरेव यज्जैस्तुष्टा: सम न्यायेनेच्छामहे वयम्,ऋषि बोले--महर्षे! आपकी बातोंसे हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। हम आपकी तपस्याका व्यय होना नहीं चाहते हैं। हम आपके उन्हीं यज्ञोंसे संतुष्ट हैं और न््यायसे उपार्जित अन्नकी ही इच्छा रखते हैं
The sages said: “We are pleased by your words. We do not wish your austerities to be diminished or wasted. We are satisfied with those very sacrifices of yours, and we desire only food obtained by rightful means.”
Verse 31
यज्ञं दीक्षां तथा होमान् यच्चान्यन्मृगयामहे । न्यायेनोपार्जिताहारा: स्वकर्माभिरता वयम्,यज्ञ, दीक्षा, होम तथा और जो कुछ हम खोजा करते हैं, वह सब हमें यहाँ प्राप्त है। न्यायसे उपार्जित किया हुआ अन्न ही हमारा भोजन है और हम सदा अपने कर्मोमें लगे रहते हैं
Here we have obtained the yajña, the dīkṣā, the homa rites, and whatever else we have been seeking. Our food is only what is earned by justice, and we are ever devoted to our own duties and works.
Verse 32
वेदांक्ष ब्रह्मचर्येण न्न्यायतः प्रार्थयामहे । न्यायेनोत्तरकालं च गृहेभ्यो नि:सृता वयम्,हम ब्रह्मचर्यका पालन करके न्यायतः वेदोंको प्राप्त करना चाहते हैं और अन्तमें न्यायपूर्वक ही हम घर छोड़कर निकले हैं
By observing brahmacarya, we seek to obtain the Vedas in a rightful manner. And in due course, acting according to justice and propriety, we have also departed from our homes.
Verse 33
धर्मदृष्टविंधिद्वारैस्तपस्तप्स्यामहे वयम् । भवत: सम्यगिष्टा तु बुद्धिर्हिंसाविवर्जिता,विसर्जिता: समाप्तौ च सत्रादस्माद् व्रजामहे । धर्मशास्त्रमें देखे गये विधि-विधानसे ही हम तपस्या करेंगे। आपको हिंसारहित बुद्धि ही अधिक प्रिय है; अतः प्रभो! आप यज्ञोंमें सदा इस अहिंसाका ही प्रतिपादन करें। द्विजश्रेष्ठ! ऐसा करनेसे हम आपपर बहुत प्रसन्न होंगे। यज्ञकी समाप्ति होनेपर जब आप हमें विदा करेंगे, तब हम यहाँसे अपने घरको जायँगे
We shall undertake our austerities only through the procedures and disciplines sanctioned by dharma. What is truly dear to you is a mind free from violence; therefore, O lord, in your sacrifices always uphold and teach this principle of non-injury. When this sacrificial session is concluded and you grant us leave, we shall depart from here and return to our homes.
Verse 34
एतामहिंसां यज्ञेषु ब्रूयास्त्वं सततं प्रभो । प्रीतास्ततो भविष्यामो वयं तु द्विजसत्तम
O lord, you should always proclaim this principle of non-violence in connection with sacrifices. Then we shall be pleased—O best among the twice-born.
Verse 35
तथा कथयतां तेषां देवराज: पुरंदर:,निकामवर्षी पर्जन्यो बभूव जनमेजय । जनमेजय! जब ऋषि लोग ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महा तेजस्वी देवराज इन्द्रने महर्षिका तपोबल देखकर पानी बरसाना आरम्भ किया। जबतक उस यज्ञकी समाप्ति नहीं हुई, तबतक अमितपराक्रमी इन्द्रने वहाँ इच्छानुसार वर्षा की
Vaiśampāyana said: While those sages were speaking thus, O Janamejaya, Indra—the king of the gods, the slayer of fortresses—became like a rain-cloud that pours at will. Beholding the power of the sages’ austerities, the mighty lord began to send down rain; and until that sacrifice was brought to completion, Indra continued to shower there according to his desire, sustaining the rite and honoring the ascetics’ spiritual force.
Verse 36
ववर्ष सुमहातेजा दृष्टवा तस्य तपोबलम् | आसमाप्तेश्न यज्ञस्य तस्यामितपराक्रम:
Vaiśampāyana said: Beholding the power born of his austerities (tapas), the greatly radiant one caused rain to fall; and until that sacrifice was fully completed, that hero of immeasurable prowess ensured its uninterrupted progress.
Verse 37
प्रसादयामास च तमगस्त्य॑ त्रिदशेश्वर: । स्वयमभ्येत्य राजर्षे पुरस्कृत्य बृहस्पतिम्,राजर्षे! देवेश्वर इन्द्रने स्वयं आकर बृहस्पतिको आगे करके अगस्त्य ऋषिको मनाया
Vaiśampāyana said: The lord of the gods, Indra, personally approached the sage Agastya and, placing Bṛhaspati before him as an honored mediator, sought to appease and win over the royal seer.
Verse 38
ततो यज्ञसमाप्तौ तान् विससर्ज महामुनीन् | अगस्त्य: परमप्रीत: पूजयित्वा यथाविधि,तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर अत्यन्त प्रसन्न हुए अगस्त्यजीने उन महामुनियोंकी विधिवत् पूजा करके सबको विदा कर दिया
When the sacrifice had concluded, the great sage dismissed those eminent seers. Agastya, filled with deep satisfaction, honored them in the proper manner and then respectfully sent them on their way.
Verse 39
जनमेजय उवाच को5सौ नकुलरूपेण शिरसा काज्चनेन वै । प्राह मानुषवद् वाचमेतत् पृष्टो वदस्व मे,जनमेजयने पूछा--मुने! सोनेके मस्तकसे युक्त वह नेवला कौन था, जो मनुष्योंकी- सी बोली बोलता था? मेरे इस प्रश्नका मुझे उत्तर दीजिये
Janamejaya said: “Who was that creature, appearing in the form of a mongoose, with a golden head, who spoke in a human-like voice? Since you have been asked this, tell me the answer.”
Verse 40
वैशम्पायन उवाच एतत् पूर्व न पृष्टो5हं न चास्माभि: प्रभाषितम् | श्रूयतां नकुलो योडसौ यथा वाक् तस्य मानुषी,वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! यह बात न तो तुमने पहले पूछी थी और न मैंने बतायी थी। अब पूछते हो तो सुनो। वह नकुल कौन था और उसकी मनुष्योंकी-सी बोली कैसे हुई, यह सब बता रहा हूँ
Vaiśampāyana said: “O King, you did not ask this earlier, nor had I spoken of it. Now that you inquire, listen. I shall explain who that Nakula was, and how it came to be that his speech was like that of human beings.”
Verse 41
श्राद्ध संकल्पयामास जमदग्नि: पुरा किल | होमधेनुस्तमागाच्च स्वयमेव दुदोह ताम्,पूर्वकालकी बात है, एक दिन जमदग्नि ऋषिने श्राद्ध करनेका संकल्प किया। उस समय उनकी होमधेनु स्वयं ही उनके पास आयी और मुनिने स्वयं ही उसका दूध दुहा
Vaiśampāyana said: Long ago, it is told, the sage Jamadagni resolved to perform the śrāddha rites for the ancestors. Then his sacrificial cow, Homadhenu, came to him of her own accord, and the sage himself milked her—an omen that sacred resources stand ready to uphold ancestral rites when the intention is duly formed.
Verse 42
तत् पय: स्थापयामास नवे भाण्डे दृढे शुचौ । तच्च क्रोधस्वरूपेण पिठरं धर्म आविशत्,उस दूधको उन्होंने नये पात्रमें, जो सुदृढ़ और पवित्र था, रख दिया। उस पात्रमें धर्मने क्रोधका रूप धारण करके प्रवेश किया
Vaiśampāyana said: He set that milk in a new vessel—sturdy and ritually pure. Then Dharma entered that container, assuming the very form of wrath, implying that even what is outwardly pure may become the seat of moral testing when anger takes hold.
Verse 43
जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्ठ॑ कि कुर्याद् विप्रिये कृते । इति संचिन्त्य धर्म: स धर्षयामास तत् पय:,धर्म उन मुनिश्रेष्ठकी परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने सोचा, देखूँ तो ये अप्रिय करनेपर क्या करते हैं? इसीलिये उन्होंने उस दूधको क्रोधके स्पर्शसे दूषित कर दिया
Dharma, wishing to test that foremost of sages, reflected: “What will he do when something displeasing is done?” Thus he tainted that milk with the touch of wrath.
Verse 44
तमाज्ञाय मुनि: क्रोधं नैवास्य स चुकोप ह । स तु क्रोधस्ततो राजन ब्राह्मणीं मूर्तिमास्थित: । जिते तस्मिन् भगुश्रेष्ठम भ्यभाषदमर्षण:,राजन! मुनिने उस क्रोधको पहचान लिया; किंतु उसपर वे कुपित नहीं हुए। तब क्रोधने ब्राह्यणका रूप धारण किया। मुनिके द्वारा पराजित होनेपर उस अमर्षशील क्रोधने उन भुगुश्रेष्ठठे कहा--
Vaiśampāyana said: Recognizing that it was Wrath, the sage did not become angry with it. Then, O king, that Wrath assumed the form of a brāhmaṇa woman. When it had been overcome by the sage, the unforbearing Wrath addressed the foremost of the Bhṛgus—
Verse 45
जितो<स्मीति भृगुश्रेष्ठ भूगवो ह्ृतिरोषणा: । लोके मिथ्या प्रवादो<यं यतक्त्वयास्मि विनिर्जित:,'भगुश्रेष्ठ! मैं तो पराजित हो गया। मैंने सुना था कि भृगुवंशी ब्राह्मण बड़े क्रोधी होते हैं; परंतु लोकमें प्रचलित हुआ यह प्रवाद आज मिथ्या सिद्ध हो गया; क्योंकि आपने मुझे जीत लिया
“O best of the Bhṛgus, I am defeated. I had heard that Brahmins of the Bhṛgu lineage are fierce in anger; yet today that common saying has proved false before the world—for you have conquered me.”
Verse 46
वशे स्थितोऊहं त्वय्यद्य क्षमावति महात्मनि । बिभेमि तपस: साधो प्रसाद कुरु मे प्रभो,'प्रभो! आज मैं आपके वशमें हूँ। आपकी तपस्यासे डरता हूँ। साधो! आप क्षमाशील महात्मा हैं, मुझपर कृपा कीजिये'
Vaiśampāyana said: “Today I stand wholly under your control, O great-souled one, patient and forgiving by nature. I fear the power of your austerity, O holy man. Be gracious to me, O lord—show me your favor.”
Verse 47
जमदग्निर्वाच साक्षाद् दृष्टोड$सि मे क्रोध गच्छ त्वं विगतज्वर: । न त्वयापकृतं मेडद्य न च मे मन्युरस्ति वै,जमदग्नि बोले--क्रोध! मैंने तुम्हें प्रत्यक्ष देखा है। तुम निश्चिन्त होकर यहाँसे जाओ। तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है; अत: आज तुमपर मेरा रोष नहीं है
Jamadagni said: “O Wrath, I have seen you plainly with my own eyes. Go from here, your fever spent. You have done me no wrong; therefore today I bear no anger toward you.”
Verse 48
यान् समुद्दिश्य संकल्प: पयसो<स्य कृतो मया । पितरस्ते महाभागास्तेभ्यो बुद्धयस्व गम्यताम्,मैंने जिन पितरोंके उद्देश्यसे इस दूधका संकल्प किया था, वे महाभाग पितर ही उसके स्वामी हैं। जाओ, उन्हींसे इस विषयमें समझो
Vaiśampāyana said: “Those blessed Pitṛs for whose sake I made this solemn resolve concerning this milk—those venerable ancestors are its rightful recipients. Go; seek understanding about this matter from them.”
Verse 49
इत्युक्तो जातसंत्रासस्तत्रैवान्तरधीयत । पितृणामभिषड्जाच्च नकुलत्वमुपागत:,मुनिके ऐसा कहनेपर क्रोधरूपधारी धर्म भयभीत हो वहाँसे अदृश्य हो गये और पितरोंके शापसे उन्हें नेवला होना पड़ा
Vaiśampāyana said: Thus addressed, Dharma—assuming a wrathful form—became seized with fear and vanished on the very spot. And, due to the curse of the Pitṛs (the ancestral Fathers), he came to assume the state of a mongoose.
Verse 50
स तान् प्रसादयामास शापस्यान्तो भवेदिति | तैश्षाप्युक्त: क्षिपन् धर्म शापस्यान्तमवाप्स्यसि,इस शापका अन्त होनेके उद्देश्यसे उन्होंने पितरोंको प्रसन्न किया। तब पितरोंने कहा --तुम धर्मराज युधिष्ठिरपर आक्षेप करके इस शापसे छुटकारा पा जाओगे”
Vaiśaṃpāyana said: Seeking the end of the curse, he propitiated the Pitṛs (ancestral spirits). They, having been appeased, instructed him: “By casting blame upon Dharma—Yudhiṣṭhira, the king of righteousness—you will attain release from this curse.”
Verse 51
तैश्नोक्तो यज्ञियान् देशान् धर्मारण्यं तथैव च । जुगुप्समानो धावन् स तं यज्ञं समुपासदत्,उन्होंने ही उस नेवलेको यज्ञसम्बन्धी स्थान और धर्मारण्यका पता बताया था। वह धर्मराजकी निन्दाके उद्देश्यसे दौड़ता हुआ उस यज्ञमें जा पहुँचा था
Having been told of the sacrificial locales and likewise of Dharmāraṇya, the mongoose—driven by contempt and intent on censuring Dharmarāja’s rite—ran swiftly and arrived at that sacrifice.
Verse 52
धर्मपुत्रमथाक्षिप्य सक्तुप्रस्थेन तेन सः । मुक्त: शापात् ततः क्रोधो धर्मो ह्वासीदू युधिष्ठिर:,धर्मपुत्र युधिष्ठिरपर आक्षेप करते हुए सेरभर सत्तूके दानका माहात्म्य बताकर क्रोधरूपधारी धर्म शापसे मुक्त हो गया और वह धर्मराज युधिष्ठटिरमें स्थित हो गया
Then he reproached Dharmaputra (Yudhiṣṭhira), declaring the greatness of that gift of a measure of sattu; and Dharma—who had assumed the form of wrath—was freed from the curse and came to abide within Dharmarāja Yudhiṣṭhira.
Verse 53
एवमेतत् तदा वृत्ते यज्ञे तस्य महात्मन: । पश्यतां चापि नस्तत्र नकुलो<न्तर्हितस्तदा,इस प्रकार महात्मा युधिष्ठिरका यज्ञ समाप्त होनेपर यह घटना घटी थी और वह नेवला हमलोगोंके देखते-देखते वहाँसे गायब हो गया था
Vaiśampāyana said: “Thus it happened when the sacrifice of that great-souled king had concluded. Even as we were watching there, the mongoose suddenly vanished from that place.”
Verse 92
३. खाद्य पदार्थको पत्थरपर फोड़कर खानेवाले। २. सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले। ३. पूछकर दिये हुए अन्नको ही लेनेवाले। ४. यज्ञशिष्ट अन्नको ही भोजन करनेवाले। ५. तत्त्वका विचार करनेवाले। - संचित अन्नका व्यय किये बिना ही उसके स्पर्शमात्रसे देवताओंको तृप्त करनेकी जो भावना है, उसका नाम स्पर्शयज्ञ है। (वैष्णवधर्म-पर्व) [युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन] जनमेजय उवाच अश्वमेधे पुरा वृत्ते केशवं केशिसूदनम् । धर्मसंशयमुद्दिश्य किमपृच्छत् पितामह: ।। जनमेजयने पूछा--्रह्मन्! पूर्वकालमें जब मेरे पितामह महाराज युधिष्ठिरका अश्वमेध-यज्ञ पूर्ण हो गया, तब उन्होंने धर्मके विषयमें संदेह होनेपर भगवान् श्रीकृष्णसे कौन-सा प्रश्न किया? ।। वैशम्पायन उवाच पश्चिमेनाश्वमेधेन यदा स्नातो युधिष्ठिर: । तदा राजा नमस्कृत्य केशवं पुनरब्रवीत् ।। वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! अभश्वमेध-यज्ञके बाद जब धर्मराज युधिष्ठिरने अवभृथ-स्नान कर लिया, तब भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करके इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ।। वशिष्ठाद्यास्तपोयुक्ता मुनयस्तत्त्वदर्शिन: । श्रोतुकामा: परं गुह्ूं वैष्णवं धर्ममुत्तमम् । तथा भागवताश्रैव ततस्तं पर्यवारयन् ।। उस समय वसिष्ठ आदि तत्त्वदर्शी तपस्वी मुनिगण तथा अन्य भक्तगण उस परम गोपनीय उत्तम वैष्णव-धर्मको सुननेकी इच्छासे भगवान् श्रीकृष्णको घेरकर बैठ गये ।। युधिछिर उवाच तत्त्वतस्तव भावेन पादमूलमुपागतम् । यदि जानासि मां भक्त स्निग्धं वा भक्तवत्सल ।। धर्मगुह्मानि सर्वाणि वेत्तुमिच्छामि तत्त्वत: । धर्मान् कथय मे देव यद्यनुग्रह भागहम् ।। युधिष्ठिर बोले--भक्तवत्सल! मैं सच्चे भक्तिभावसे आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ। भगवन्! यदि आप मुझे अपना प्रेमी या भक्त समझते हैं और यदि मैं आपके अनुग्रहका अधिकारी होऊँ तो मुझसे वैष्णव-धर्मोंका वर्णन कीजिये। मैं उनके सम्पूर्ण रहस्योंको यथार्थ रूपसे जानना चाहता हूँ ।। श्रुता मे मानवा धर्मा वाशिष्ठा: काश्यपास्तथा | गार्गीया गौतमीयाक्ष॒ तथा गोपालकस्य च ।। पराशरकृताः: पूर्वा मैत्रेयस्य च धीमत: । औमा माहेश्वराश्नैव नन्दिधर्माश्ष पावना: ।। मैंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, गोपालक, पराशर, बुद्धिमान मैत्रेय, उमा, महेश्वर और नन्दिद्वारा कहे हुए पवित्र धर्मोंका श्रवण किया है ।। ब्रह्मणा कथिता ये च कौमाराश्च श्रुता मया । धूमायनकृता धर्मा: काण्डवैश्वानरा अपि ।। भार्गवा याज्ञवल्क्याश्व मार्कण्डेयकृता अपि | भारद्वाजकृता ये च बृहस्पतिकृताश्च ये ।। कुणेश्व कुणिबाहो श्व विश्वामित्रकृताश्च ये । सुमन्तुजैमिनिकृता: शाकुनेयास्तथैव च ।। पुलस्त्यपुलहोद्गीता: पावकीयास्तथैव च | अगस्त्यगीता मौद्गल्या: शाण्डिल्या: शलभायना: ।। बालखिल्यकृता ये च ये च सप्तर्षिभिस्तथा । आपफस्तम्बकृता धर्मा: शंखस्य लिखितस्य च ।। प्राजापत्यास्तथा याम्या माहेन्द्रा श्व श्रुता मया । वैयाप्रव्यासकीयाश्व विभाण्डककृताश्न ये ।। तथा जो ब्रह्मा, कार्तिकेय, धूमायन, काण्ड, वैश्वानर, भार्गव, याज्ञवल्क्यथ और मार्कण्डेयके द्वारा भी कहे गये हैं एवं जो भरद्वाज और बृहस्पतिके बनाये हुए हैं तथा जो कुणि, कुणिबाहु, विश्वामित्र, सुमन्तु, जैमिनि, शकुनि, पुलस्त्य, पुलह, अग्नि, अगस्त्य, मुद्गल, शाण्डिल्य, शलभ, बालखिल्यगण, सप्तर्षि, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, प्रजापति, यम, महेन्द्र, व्याप्र, व्यास और विभाण्डकके द्वारा कहे गये हैं, उनको भी मैंने सुना है ।। नारदीया: श्रुता धर्मा: कापोताश्च श्रुता मया । तथा विदुरवाक्यानि भृगोरज्धिरसस्तथा ।। क्रौज्चा मृदड़गीताश्न सौर्या हारीतकाश्न ये । ये पिशड्रकृताश्चापि कापोतीया: सुबालका: ।। उद्दालककृता धर्मा औशनस्यास्तथैव च । वैशम्पायनगीताश्ष ये चान्ये5प्येवमादित: ।। एवं जो नारद, कपोत, विदुर, भृगु, अंगिरा, क्रौंच, मृदंग, सूर्य, हारीत, पिशंग, कपोत, सुबालक, उद्दालक, शुक्राचार्य, वैशम्पायन तथा दूसरे-दूसरे महात्माओंके द्वारा बताये हुए हैं, उन धर्मोका भी मैंने आद्योपान्त श्रवण किया है ।। एतेभ्य: सर्वधर्मेभ्यो देव त्वन्मुखनि:सृता: । पावनत्वात् पवित्रत्वाद् विशिष्टा इति मे मतिः ।। परन्तु भगवन्! मुझे विश्वास है कि आपके मुखसे जो धर्म प्रकट हुए हैं, वे पवित्र और पावन होनेके कारण उपर्युक्त सभी धर्मोसे श्रेष्ठ हैं ।। तस्माद्धि त्वां प्रपन्नस्य त्वद्धक्तस्य च केशव । युष्मदीयान् वरान् धर्मान् पुण्यान् कथय मे<च्युत ।। इसलिये केशव! अच्युत! आपकी शरणमें आये हुए मुझ भक्तसे आप अपने पवित्र एवं श्रेष्ठ धर्मोका वर्णन कीजिये ।। वैशम्पायन उवाच एवं पृष्टस्तु धर्मज्ञो धर्मपुत्रेण केशव: । उवाच धर्मान् सूक्ष्मार्थान् धर्मपुत्रस्य हर्षित: ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! धर्मपुत्र युधिष्ठिरके इस प्रकार प्रश्न करनेपर सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे धर्मके सूक्ष्म विषयोंका वर्णन करने लगे-- ।। एवं ते यस्य कौन्तेय यत्नो धर्मेषु सुव्रत । तस्य ते दुर्लभो लोके न कश्चिदपि विद्यते ।। “उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुन्तीनन्दन! तुम धर्मके लिये इतना उद्योग करते हो, इसलिये तुम्हें संसारमें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ।। धर्म:श्रुतो वा दृष्टो वा कथितो वा कृतोडपि वा । अनुमोदितो वा राजेन्द्र नयतीन्द्रपदं नरम् ।। 'राजेन्द्र! सुना हुआ, देखा हुआ, कहा हुआ, पालन किया हुआ और अनुमोदन किया हुआ धर्म मनुष्यको इन्द्रपदपर पहुँचा देता है ।। धर्म: पिता च माता च धर्मो नाथ: सुहृत् तथा । धर्मो भ्राता सखा चैव धर्म: स्वामी परंतप ।। 'परंतप! धर्म ही जीवका माता-पिता, रक्षक, सुहृद, भ्राता, सखा और स्वामी है ।। धर्मादर्थश्ष॒ कामश्न धर्माद् भोगा: सुखानि च । धमदिद्वर्यमेवाग्र्यं धर्मात् स्वर्गगति: परा ।। “अर्थ, काम, भोग, सुख, उत्तम ऐश्वर्य और सर्वोत्तम स्वर्गकी प्राप्ति भी धर्मसे ही होती है।। धर्मोड्यं सेवित: शुद्धस्त्रायते महतो भयात् । धर्माद् द्विजत्वं देवत्वं धर्म: पावयते नरम् ।। “यदि इस विशुद्ध धर्मका सेवन किया जाय तो वह महान् भयसे रक्षा करता है। धर्मसे ही मनुष्यको ब्राह्मणत्व और देवत्वकी प्राप्ति होती है। धर्म ही मनुष्यको पवित्र करता है ।। यदा च क्षीयते पापं कालेन पुरुषस्य तु । तदा संजायते बुद्धिर्धर्म कर्तु युधिष्ठिर ।। 'युधिष्ठि!! जब काल-क्रमसे मनुष्यका पाप नष्ट हो जाता है, तभी उसकी बुद्धि धर्माचरणमें लगती है ।। जन्मान्तरसहसैस्तु मनुष्यत्वं हि दुर्लभम् । तद् गत्वापीह यो धर्म न करोति स्ववज्चित: ।। “हजारों योनियोंमें भटकनेके बाद भी मनुष्ययोनिका मिलना कठिन होता है। ऐसे दुर्लभ मनुष्य-जन्मको पाकर भी जो धर्मका अनुष्ठान नहीं करता, वह महान् लाभसे वंचित रह जाता है ।। कुत्सिता ये दरिद्राश्न विरूपा व्याधितास्तथा । परद्वेष्याश्व मूर्खाश्च न तैर्थर्म: कृत: पुरा ।। “आज जो लोग निन्दित, दरिद्र, कुरूप, रोगी, दूसरोंके द्वेषपात्र और मूर्ख देखे जाते हैं, उन्होंने पूर्वजन्ममें धर्मका अनुष्ठान नहीं किया है ।। ये च दीर्घायुष: शूरा: पण्डिता भोगिनस्तथा । नीरोगा रूपसम्पन्नास्तैर्थर्म: सुकृत: पुरा ।। 'किंतु जो दीर्घजीवी शूर-वीर, पण्डित, भोग-सामग्रीसे सम्पन्न, नीरोग और रूपवान हैं, उनके द्वारा पूर्वजन्ममें निश्चय ही धर्मका सम्पादन हुआ है ।। एवं धर्म: कृत: शुद्धों नयते गतिमुत्तमाम् | अधर्म सेवते यस्तु तिर्यग्योन्यां पतत्यसौ ।। “इस प्रकार शुद्धभावसे किया हुआ धर्मका अनुष्ठान उत्तम गतिकी प्राप्ति कराता है, परंतु जो अधर्मका सेवन करते हैं, उन्हें पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनियोंमें गिरना पड़ता है ।। इदं रहस्यं कौन्तेय शृणु धर्ममनुत्तमम् । कथयिष्ये परं धर्म तव भक्तस्य पाण्डव ।। “दुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! अब मैं तुम्हें एक रहस्यकी बात बताता हूँ, सुनो। पाण्डुनन्दन! मैं तुझ भक्तसे परम धर्मका वर्णन अवश्य करूँगा ।। इष्टस्त्वमसि मे>वत्यर्थ प्रपन्नश्चापि मां सदा । परमार्थमपि ब्रूयां कि पुनर्धर्मसंहिताम् ।। “तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो और सदा मेरी शरणमें स्थित रहते हो। तुम्हारे पूछनेपर मैं परम गोपनीय आत्मतत्त्वका भी वर्णन कर सकता हूँ, फिर धर्मसंहिताके लिये तो कहना ही क्या है? ।। इदं मे मानुषं जन्म कृतमात्मनि मायया । धर्मसंस्थापनार्थाय दुष्टानां नाशनाय च ।। “इस समय धर्मकी स्थापना और दुष्टोंका विनाश करनेके लिये मैंने अपनी मायासे मानव-शरीरमें अवतार धारण किया है ।। मानुष्यं भावमापन्न॑ ये मां गृह्नन्त्यवज्ञया । संसारान्तर्हि ते मूढास्तिर्यग्योनिष्वनेकश: ।। “जो लोग मुझे केवल मनुष्य-शरीरमें ही समझकर मेरी अवहेलना करते हैं, वे मूर्ख हैं और संसारके भीतर बारंबार तिर्यग्योनियोंमें भटकते रहते हैं ।। ये च मां सर्वभूतस्थं पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषा । मद्भधक्तांस्तान् सदा युक्तान् मत्समीपं नयाम्यहम् ।। “इसके विपरीत जो ज्ञानदृष्टिसे मुझे सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित देखते हैं, वे सदा मुझमें मन लगाये रहनेवाले मेरे भक्त हैं, ऐसे भक्तोंको मैं परम धाममें अपने पास बुला लेता हूँ ।। मद्धभक्ता न विनश्यन्ति मद्धक्ता वीतकल्मषा: । मद्भधक्तानां तु मानुष्ये सफलं जन्म पाण्डव ।। 'पाण्डुपुत्र! मेरे भक्तोंका नाश नहीं होता, वे निष्पाप होते हैं। मनुष्योंमें उन्हींका जन्म सफल है, जो मेरे भक्त हैं ।। अपि पापेष्वभिरता मद्धक्ता: पाण्डुनन्दन | मुच्यन्ते पातकै: सर्वे: पद्मपत्रमिवाम्भसा ।। 'पाण्डुनन्दन! पापोंमें अभिरत रहनेवाले मनुष्य भी यदि मेरे भक्त हो जायाँ तो वे सारे पापोंसे वैसे ही मुक्त हो जाते हैं, जैसे जलसे कमलका पत्ता निर्लिप्त रहता है ।। जन्मान्तरसहस्रेषु तपसा भावितात्मनाम् | भक्तिरुत्पद्यते तात मनुष्याणां न संशय: ।। “हजारों जन्मोंतक तपस्या करनेसे जब मनुष्योंका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब उसमें निःसंदेह भक्तिका उदय होता है ।। यच्च रूपं परं गुह्ां कूटस्थमचल ध्रुवम् | न दृश्यते तथा देवैर्मद्धक्तैर्दृश्यते यथा ।। “मेरा जो अत्यन्त गोपनीय कूटस्थ, अचल और अविनाशी परस्वरूप है, उसका मेरे भक्तोंको जैसा अनुभव होता है, वैसा देवताओंको भी नहीं होता ।। अपरं यच्च मे रूपं प्रादुर्भावेषु दृश्यते । तदर्चयन्ति सर्वार्थ: सर्वभूतानि पाण्डव ।। “पाण्डव! जो मेरा अपरस्वरूप है, वह अवतार लेनेपर दृष्टिगोचर होता है। संसारके समस्त जीव सब प्रकारके पदार्थोंसे उसकी पूजा करते हैं ।। कल्पकोटिसहसेरेषु व्यतीतेष्वागतेषु च | दर्शयामीह तद् रूप॑ यच्च पश्यन्ति मे सुरा: ।। “हजारों और करोड़ों कल्प आकर चले गये, पर जिस वैष्णवरूपको देवगण देखते हैं, उसी रूपसे मैं भक्तोंको दर्शन देता हूँ ।। स्थित्युत्पत्त्यव्ययकरं यो मां ज्ञात्वा प्रपद्यते । अनुगृलह्लाम्यहं तं वै संसारान्मोचयामि च ।। “जो मनुष्य मुझे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारका कारण समझकर मेरी शरण लेता है, उसके ऊपर कृपा करके मैं उसे संसार-बन्धनसे मुक्त कर देता हूँ ।। अहमादिर्िं देवानां सृष्टा ब्रह्मादयो मया । प्रकृतिं स्वामवष्ट भ्य जगत् सर्व सृजाम्यहम् ।। “मैं ही देवताओंका आदि हूँ। ब्रह्मा आदि देवताओंकी मैंने ही सृष्टि की है। मैं ही अपनी प्रकृतिका आश्रय लेकर सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि करता हूँ ।। तमोमूलो5हमव्यक्तो रजोमध्ये प्रतिष्ठित: । ऊर्ध्व॑ सत्त्वं विना लोभं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यत: ।। “मैं अव्यक्त परमेश्वर ही तमोगुणका आधार, रजोगुणके भीतर स्थित और उत्कृष्ट सत्त्वगुणमें भी व्याप्त हूँ। मुझे लोभ नहीं है। ब्रह्मासे लेकर छोटेसे कीड़ेतक सबमें मैं व्याप्त हो रहा हूँ ।। मूर्द्धानं मे विद्धि दिव॑ं चन्द्रादित्यौ च लोचने । गावोडन्निब्रद्ञगिणो वक्त्र॑ मारुत: श्वसन च मे ।। 'घुलोकको मेरा मस्तक समझो। सूर्य और चन्द्रमा मेरी आँखें हैं। गौ, अग्नि और ब्राह्मण मेरे मुख हैं और वायु मेरी साँस है ।। दिशो मे बाहवश्वाष्टौ नक्षत्राणि च भूषणम् | अन्तरिक्षमुरो विद्धि सर्वभूतावकाशकम् | मार्गों मेघानिलाभ्यां तु यन्ममोदरमव्ययम् ।। “आठ दिशाएँ मेरी बाँहें, नक्षत्र मेरे आभूषण और सम्पूर्ण भूतोंको अवकाश देनेवाला अन्तरिक्ष मेरा वक्ष:स्थल है। बादलों और हवाके चलनेका जो मार्ग है, उसे मेरा अविनाशी उदर समझो ।। पृथिवीमण्डलं यद् वै द्वीपार्णववनैर्युतम् । सर्वसंधारणोपेतं पादौ मम युधिष्ठिर ।। 'युधिष्ठिर! द्वीप, समुद्र और जंगलोंसे भरा हुआ यह सबको धारण करनेवाला भूमण्डल मेरे दोनों पैरोंके स्थानमें है ।। स्थितो होकगुण: खे5हं द्विगुणश्ास्मि मारुते । त्रिगुणोडग्नौ स्थितो5हं वै सलिले च चतुर्गुण: ।। शब्दाद्या ये गुणा: पठच महाभूतेषु पठचसु । तन्मात्रासंस्थित: सो<हं पृथिव्यां पज्चधा स्थित: ।। “आकाशमें मैं एक गुणवाला हूँ, वायुमें दो गुणवाला हूँ, अग्निमें तीन गुणवाला हूँ और जलनमें चार गुणवाला हूँ। पृथ्वीमें पाँच गुणोंसे स्थित हूँ। वही मैं तन्मात्रारूप पठचमहाभूतोंमें शब्दादि पाँच गुणोंसे स्थित हूँ ।। अहं सहस्रशीर्षस्तु सहस्रवदनेक्षण: । सहस्रबाहूृदरधृक्ू सहस्रोरु सहस्रपात् ।। “मेरे हजारों मस्तक, हजारों मुख, हजारों नेत्र, हजारों भुजाएँ, हजारों उदर, हजारों ऊरु और हजारों पैर हैं ।। धृत्वोर्वी सर्वतः सम्यगत्यतिष्ठं दशाड्गुलम् । सर्वभूतात्मभूतस्थ: सर्वव्यापी ततो<स्म्यहम् ।। “मैं पृथ्वीको सब ओरसे धारण करके नाभिसे दस अंगुल ऊँचे सबके हृदयमें विराजमान हूँ। सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मारूपसे स्थित हूँ, इसलिये सर्वव्यापी कहलाता हूँ ।। अचिन्त्यो5हमनन्तो5हमजरो5हमजो हाहम् | अनाद्योहडहमवध्यो5हमप्रमेयो5हमव्यय: ।। निर्गुणोहं निगूढात्मा निर्दधन्द्रों निर्ममो नृप । निष्कलो निर्विकारो5हं निदानममृतस्य तु ।। सुधा चाहं स्वथा चाहं स्वाहा चाहं नराधिप । “राजन! मैं अचिन्त्य, अनन्त, अजर, अजन्मा, अनादि, अवध्य, अप्रमेय, अव्यय, निर्गुण, गुह्मस्वरूप, निर्द्धन्द्, निर्मम, निष्कल, निर्विकार और मोक्षका आदि कारण हूँ। नरेश्वर! सुधा, स्वधा और स्वाहा भी मैं ही हूँ ।। तेजसा तपसा चाहं भूतग्रामं चतुर्विधम् ।। स्नेहपाशैर्गुणैर्बद्ध्वा धारयाम्यात्ममायया । “मैंने ही अपने तेज और तपसे चार प्रकारके प्राणिसमुदायको स्नेहपाशरूप रज्जुसे बाँधकर अपनी मायासे धारण कर रखा है ।। चातुराश्रमधर्मो5हं चातुहोत्रफलाशन: । चतुर्मूर्तिश्चतुर्यज्ञश्चतुराश्रम भावन: ।। “मैं चारों आश्रमोंका धर्म, चार प्रकारके होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका फल भोगनेवाला चतुर्व्यूह, चतुर्यज्ञ और चारों आश्रमोंको प्रकट करनेवाला हूँ ।। संहृत्याहं जगत् सर्व कृत्वा वै गर्भमात्मन: । शयामि दिव्ययोगेन प्रलयेषु युधिष्ठिर ।। 'युधिष्ठिर! प्रलयकालमें समस्त जगत्का संहार करके उसे अपने उदरमें स्थापित कर दिव्य योगका आश्रय ले मैं एकार्णवके जलमें शयन करता हूँ ।। सहस्रयुगपर्यन्तां ब्राद्मीं रात्रिं महार्णवे । स्थित्वा सृजामि भूतानि जड़मानि स्थिराणि च ।। “एक हजार युगोंतक रहनेवाली ब्रह्माकी रात पूर्ण होनेतक महार्णवमें शयन करनेके पश्चात् स्थावर-जंगम प्राणियोंकी सृष्टि करता हूँ ।। कल्पे कल्पे च भूतानि संहरामि सृजामि च । न च मां तानि जानन्ति मायया मोहितानि मे ।। 'प्रत्येक कल्पमें मेरे द्वारा जीवोंकी सृष्टि और संहारका कार्य होता है, किंतु मेरी मायासे मोहित होनेके कारण वे जीव मुझे नहीं जान पाते ।। मम चैवान्धकारस्य मार्गितव्यस्य नित्यश: । प्रशान्तस्येव दीपस्य गतिरनैवोपलभ्यते ।। 'प्रलयकालमें जब दीपकके शान्त होनेकी भाँति समस्त व्यक्त सृष्टि लुप्त हो जाती है, तब खोज करने योग्य मुझ अदृश्यरूपकी गतिका उनको पता नहीं लगता ।। न तदस्ति क्वचिद् राजन यत्राहं न प्रतिष्ठित: । न च तद् विद्यते भूतं मयि यन्न प्रतिष्ठितम् ।। “राजन्! कहीं कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसमें मेरा निवास न हो तथा कोई ऐसा जीव नहीं है, जो मुझमें स्थित न हो ।। यावन्मात्र॑ भवेद् भूत॑ स्थूल॑ सूक्ष्ममिदं जगत् । जीवभूतो हाहं तस्मिंस्तावन्मात्रं प्रतिष्ठित: ।। “जो कुछ भी स्थूल-सूक्ष्मरूप यह जगत् हो चुका है और होनेवाला है, उन सबमें उसी प्रकार मैं ही जीवरूपसे स्थित हूँ ।। किं चात्र बहुनोक्तेन सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । यद् भूतं यद् भविष्यच्च तत् सर्वमहमेव तु ।। “अधिक कहनेसे क्या लाभ, मैं तुमसे यह सच्ची बात बता रहा हूँ कि भूत और भविष्य जो कुछ है, वह सब मैं ही हूँ ।। मया सृष्टानि भूतानि मन्मयानि च भारत । मामेव न विजानन्ति मायया मोहितानि वै ।। “भरतनन्दन! सम्पूर्ण भूत मुझसे ही उत्पन्न होते हैं और मेरे ही स्वरूप हैं। फिर भी मेरी मायासे मोहित रहते हैं, इसलिये मुझे नहीं जान पाते ।। एवं सर्व जगदिदं सदेवासुरमानुषम् । मत्त: प्रभवते राजन् मय्येव प्रविलीयते ।। “राजन्! इस प्रकार देवता, असुर और मनुष्योंसहित समस्त संसारका मुझसे ही जन्म और मुझमें ही लय होता है” ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [चारों वर्णोंके कर्म और उनके फलोंका वर्णन तथा धर्मकी वृद्धि और पापके क्षय होनेका उपाय] वैशम्पायन उवाच एवमात्मोद्धवं सर्व जगदुद्वदिश्य केशव: । धर्मान् धर्मात्मजस्याथ पुण्यानकथयत् प्रभु: ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने सम्पूर्ण जगत्को अपनेसे उत्पन्न बतलाकर धर्मनन्दन युधिष्ठिरसे पवित्र धर्मोका इस प्रकार वर्णन आरम्भ किया-- |। शृणु पाण्डव तत्त्वेन पवित्रं पापनाशनम् | कथ्यमानं मया पुण्यं धर्मशास्त्रफलं महत् ।। 'पाण्डुनन्दन! मेरे द्वारा कहे हुए धर्मशास्त्रका पुण्यमय, पापनाशक, पवित्र और महान् फल यथार्थ-रूपसे सुनो ।। यः शृणोति शुचिर्भूत्वा एकचित्तस्तपोयुत: । स्वर्ग्य यशस्यमायुष्य॑ धर्म ज्ञेयं युधिष्ठिर ।। श्रद्धधानस्य तस्येह यत् पापं पूर्वसंचितम् । विनश्यत्याशु तत् सर्व मद्धभक्तस्य विशेषत: ।। 'युधिष्ठिर! जो मनुष्य पवित्र और एकाग्रचित्त होकर तपस्यामें संलग्न हो स्वर्ग, यश और आयु प्रदान करनेवाले जाननेयोग्य धर्मका श्रवण करता है, उस श्रद्धालु पुरुषके-- विशेषतः मेरे भक्तके पूर्वसंचित जितने पाप होते हैं, वे सब तत्काल नष्ट हो जाते हैं” ।। वैशम्पायन उवाच एवं श्र॒ुत्वा वच: पुण्यं सत्यं केशवभाषितम् | प्रहृष्मनसो भूत्वा चिन्तयन्तो5द्भुतं परम् ।। देवब्रद्मर्षय: सर्वे गन्धर्वाप्सरसस्तथा । भूता यक्षग्रहाश्वैव गुह्द का भुजगास्तथा ।। बालखिल्या महात्मानो योगिनस्तत्त्वदर्शिन: । तथा भागवताश्नचापि पञ्चकालमुपासका: ।। कौतूहलसमाविष्टा: प्रह्ृष्टेन्द्रियमानसा: । श्रोतुकामा: परं धर्म वैष्णवं धर्मशासनम् । ह्दि कर्तु च तद्वाक्यं प्रणेमु: शिरसा नता: ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! श्रीकृष्णका यह परम पवित्र और सत्य वचन सुनकर मन-ही-मन प्रसन्न हो धर्मके अद्भुत रहस्यका चिन्तन करते हुए सम्पूर्ण देवर्षि, ब्रह्मर्षि, गन्धर्व, अप्सराएँ, भूत, यक्ष, ग्रह, गुह्यक, सर्प, महात्मा बालखिल्यगण, तत्त्वदर्शी योगी तथा पाँचों उपासना करनेवाले भगवद्भक्त पुरुष उत्तम वैष्णव-धर्मका उपदेश सुनने तथा भगवानकी बात हृदयमें धारण करनेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित होकर वहाँ आये। उनके इन्द्रिय और मन अत्यन्त हर्षित हो रहे थे। आनेके बाद उन सबने मस्तक झुकाकर भगवान्को प्रणाम किया ।। ततस्तान् वासुदेवेन दृष्टान् दिव्येन चक्षुषा | विमुक्तपापानालोक्य प्रणम्य शिरसा हरिम् । पप्रच्छ केशवं धर्म धर्मपुत्र: प्रतापवान् ।। भगवानकी दिव्य दृष्टि पड़नेसे वे सब निष्पाप हो गये। उन्हें उपस्थित देखकर महाप्रतापी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने भगवानको प्रणाम करके इस प्रकार धर्मविषयक प्रश्न किया ।। युधिछिर उवाच कीदृशी ब्राह्मणस्याथ क्षत्रियस्यापि कीदृशी । वैश्यस्य कीदृशी देव गति: शूद्रस्य कीदृशी ।। युधिष्ठिरने पूछा--देवेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रकी पृथक्-पृथक् कैसी गति होती है? ।। श्रीभगवानुवाच शृणु वर्णक्रमेणैव धर्म धर्मभूतां वर । नास्ति किंचिन्नरश्रेष्ठ ब्राह्मणस्य तु दुष्कृतम् ।। श्रीभगवानने कहा--नरश्रेष्ठ धर्मराज! ब्राह्मणादि वर्णोंके क्रमसे धर्मका वर्णन सुनो। ब्राह्मणके लिये कुछ भी दुष्कर नहीं है ।। शिखायज्ञोपवीता ये संध्यां ये चाप्युपासते । यैश्व पूर्णाहुति: प्राप्ता विधिवज्जुद्नते च ये ।। वैश्वदेवं च ये चक्र: पूजयन्त्यतिथीं श्व॒ ये । नित्यं स्वाध्यायशीलाश्न जपयज्ञपराश्षु ये ।। सायं प्रातर्हुताशाश्व शूद्रभोजनवर्जिता: । दम्भानृतविमुक्ता श्व स्वदारनिरताश्च ये । पञ्चयज्ञपरा ये च येडग्निहोत्रमुपासते ।। दहन्ति दुष्कृतं येषां हूयमानास्त्रयोडग्नय: । नष्टदुष्कृतकर्माणो ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते ।। जो ब्राह्मण शिखा और यज्ञोपवीत धारण करते हैं, संध्योपासना करते हैं, पूर्णाहुति देते हैं, विधिवत् अग्निहोत्र करते हैं, बलिवैश्वदेव और अतिथियोंका पूजन करते हैं, नित्य स्वाध्यायमें लगे रहते हैं तथा जप-यज्ञके परायण हैं; जो प्रातःकाल और सायंकाल होम करनेके बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं, शूद्रका अन्न नहीं खाते हैं, दम्भ और मिथ्याभाषणसे दूर रहते हैं, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखते हैं तथा पठचयज्ञ और अग्निहोत्र करते रहते हैं, जिनके सब पापोंको हवन की जानेवाली तीनों अग्नियाँ भस्म कर देती हैं, वे ब्राह्मण पापरहित होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं ।। क्षत्रियो5पि स्थितो राज्ये स्वधर्मपरिपालक: । सम्यक् प्रजापालयिता षड्भागनिरत: सदा ।। यज्ञदानरतो धीर: स्वदारनिरत: सदा । शास्त्रानुसारी तत्त्वज्ञ: प्रजाकार्यपरायण: ।। विप्रेभ्य: कामदो नित्यं भृत्यानां भरणे रत: । सत्यसन्ध: शुचिर्नित्यं लोभदम्भविवर्जित: । क्षत्रियो<प्युत्तमां याति गतिं देवनिषेविताम् ।। क्षत्रियोंमें भी जो राज्यसिंहासनपर आसीन होनेके बाद अपने धर्मका पालन और प्रजाकी भलीभाँति रक्षा करता है, लगानके रूपमें प्रजाकी आमदनीका छठा भाग लेकर सदा उतनेसे ही संतोष करता है, यज्ञ और दान करता रहता है, धैर्य रखता है, अपनी स्त्रीसे संतुष्ट रहता है, शास्त्रके अनुसार चलता है, तत्त्वको जानता है और प्रजाकी भलाईके कार्यमें संलग्न रहता है तथा ब्राह्मणोंकी इच्छा पूर्ण करता है, पोष्यवर्गके पालनमें तत्पर रहता है, प्रतिज्ञाको सत्य करके दिखाता है, सदा पवित्र रहता है एवं लोभ और दम्भको त्याग देता है, उस क्षत्रियको भी देवताओंद्वारा सेवित उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है ।। कृषिगोपालनिरतो धर्मान्वेषणतत्पर: । दानधर्मेडपि निरतो विप्रशुश्रूषकस्तथा । सत्यसंध: शुचिर्नित्यं लोभदम्भविवर्जित: । ऋजु: स्वदारनिरतो हिंसाद्रोहविवर्जित: ।। वणिग्धर्मान्न मुज्चन् वै देवब्राह्मणपूजक: । वैश्य: स्वर्गतिमाप्रोति पूज्यमानो5प्सरोगणै: ।। जो वैश्य कृषि और गोपालनमें लगा रहता है, धर्मका अनुसंधान किया करता है, दान, धर्म और ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता है तथा सत्यप्रतिज्ञ, नित्य पवित्र, लोभ और दम्भसे रहित, सरल, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखनेवाला और हिंसा-द्रोहसे दूर रहनेवाला है, जो कभी भी वैश्यधर्मका त्याग नहीं करता और देवता तथा ब्राह्मणोंकी पूजामें लगा रहता है, वह अप्सराओंसे सम्मानित होकर स्वर्गलोकमें गमन करता है ।। त्रयाणामपि वर्णानां शुश्रूषानिरत: सदा | विशेषतस्तु विप्राणां दासवद् यस्तु तिष्ठति ।। अयाचितप्रदाता च सत्यशौचसमन्वित: । गुरुदेवार्चनरत: परदारविवर्जित: ।। परपीडामकृत्वैव भृत्यवर्ग बिभर्ति य: । शूद्रोडपि स्वर्गमाप्नोति जीवानामभयप्रद: ।। शूद्रोमेंसे जो सदा तीनों वर्णोकी सेवा करता और विशेषतः ब्राह्मणोंकी सेवामें दासकी भाँति खड़ा रहता है; जो बिना माँगे ही दान देता है, सत्य और शौचका पालन करता है, गुरु और देवताओंकी पूजामें प्रेम रखता है, परस्त्रीके संसर्गसे दूर रहता है, दूसरोंको कष्ट न पहुँचाकर अपने कुटुम्बका पालन-पोषण करता है और सब जीवोंको अभय-दान कर देता है, उस शूद्रको भी स्वर्गकी प्राप्ति होती है ।। एवं धर्मात् पर॑ं नास्ति महत्संसारमोक्षणम् | न च धर्मात्परं किंचित् पापकर्मव्यपोहनम् ।। इस प्रकार धर्मसे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। वही निष्कामभावसे आचरण करनेपर संसार-बन्धनसे मुक्ति दिलाता है। धर्मसे बढ़कर पाप-नाशका और कोई उपाय नहीं है ।। तस्माद् धर्म: सदा कार्यों मानुष्य॑ प्राप्य दुर्लभम् । न हि धर्मानुरक्तानां लोके किंचन दुर्लभम् ।। इसलिये इस दुर्लभ मनुष्य-जीवनको पाकर सदा धर्मका पालन करते रहना चाहिये। धर्मानुरागी पुरुषोंके लिये संसारमें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ।। स्वयम्भूविहितो धर्मो यो यस्येह नरेश्वर । स तेन क्षपयेत् पापं सम्यगाचरितेन च ।। नरेश्वर! ब्रह्माजीने इस जगत्में जिस वर्णके लिये जैसे धर्मका विधान किया है, वह वैसे ही धर्मका भलीभाँति आचरण करके अपने पापोंको नष्ट कर सकता है ।। सहजं यद् भवेत् कर्म न तत् त्याज्यं हि केनचित् । स एव तस्य धर्मो हि तेन सिद्धि स गच्छति ।। मनुष्यका जो जातिगत कर्म हो, उसका किसीको त्याग नहीं करना चाहिये। वही उसके लिये धर्म होता है और उसीका निष्काम भावसे आचरण करनेपर मनुष्यको सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त हो जाती है ।। विगुणो<पि स्वधर्मस्तु पापकर्म व्यपोहति । एवमेव तु धर्मो5पि क्षीयते पापवर्धनात् ।। अपना धर्म गुणरहित होनेपर भी पापको नष्ट करता है। इसी प्रकार यदि मनुष्यके पापकी वृद्धि होती है तो वह उसके धर्मको क्षीण कर डालता है ।। युधिछिर उवाच भगवन् देवदेवेश श्रोतुं कौतूहलं हि मे । शुभस्याप्यशुभस्यापि क्षयवृद्धी यथाक्रमम् ।। युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! देवदेवेश्वर! शुभ और अशुभकी वृद्धि और हास क्रमसे किस प्रकार होते हैं, इसे सुननेकी मेरी बड़ी उत्कण्ठा है ।। श्रीभगवानुवाच शृणु पार्थिव तत्सव॑ धर्मसूक्ष्मं सनातनम् । दुर्विज्ञेयतमं नित्यं यत्र मगना महाजना: ।। श्रीभगवान्ने कहा--राजन्! तुमने जो धर्मका तत्त्व पूछा है, वह सूक्ष्म, सनातन, अत्यन्त दुर्विज्ञेगय और नित्य है, बड़े-बड़े लोग भी उसमें मग्न हो जाते हैं, वह सब तुम सुनो ।। यथैव शीतमुदकमुष्णेन बहुना वृतम् । भवेनत्तु तत्क्षणादुष्णं शीतत्वं च विनश्यति ।। जिस प्रकार थोड़े-से ठंडे जलको बहुत गरम जलमें मिला दिया जाता है तो वह तत्क्षण गरम हो जाता है और उसका ठंडापन नष्ट हो जाता है ।। यथोष्णं वा भवेदल्पं शीतेन बहुना वृतम् । शीतलं च भवेत् सर्वमुष्णत्वं च विनश्यति ।। जब थोड़ा-सा गरम जल बहुत शीतल जलमें मिला दिया जाता है, तब वह सब-का- सब शीतल हो जाता है और उसकी उष्णता नष्ट हो जाती है ।। एवं च यद् भवेद् भूरि सुकृतं वापि दुष्कृतम् । तदल्पं क्षपयेच्छीघ्रं नाज कार्या विचारणा ।। इसी प्रकार जो पुण्य या पाप बहुत अधिक होता है, वह थोड़े पाप-पुण्यको शीघ्र ही नष्ट कर देता है, इसमें कोई संशय नहीं है ।। समत्वे सति राजेन्द्र तयो: सुकृतपापयो: । गूहितस्य भवेद् वृद्धि: कीर्तितस्य भवेत् क्षय: ।। राजेन्द्र! जब वे पुण्य-पाप दोनों समान होते हैं, तब जिसको गुप्त रखा जाता है, उसकी वृद्धि होती है और जिसका वर्णन कर दिया जाता है, उसका क्षय हो जाता है ।। ख्यापनेनानुतापेन प्राय: पापं विनश्यति । तथा कृतस्तु राजेन्द्र धर्मो नश्यति मानद ।। सम्मान देनेवाले नरेश्वर! पापको दूसरोंसे कहने और उसके लिये पश्चात्ताप करनेसे प्राय: उसका नाश हो जाता है। इसी प्रकार धर्म भी अपने मुँहसे दूसरोंके सम्मुख प्रकट करनेपर नष्ट होता है ।। तावुभौ गूहितौ सम्यग वृद्धि यातो न संशय: । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन न पाप॑ं गूहयेद् बुध: ।। तस्मादेतत् प्रयत्नेन कीर्तयेत् क्षयकारणात् ।। तस्मात् संकीर्तयेत् पाप॑ं नित्यं धर्म च गूहयेत् ।। छिपानेपर निःसंदेह ये दोनों ही अधिक बढ़ते हैं। इसलिये समझदार मनुष्यको चाहिये कि सर्वथा उद्योग करके अपने पापको प्रकट कर दे, उसे छिपानेकी कोशिश न करे। पापका कीर्तन पापके नाशका कारण होता है, इसलिये हमेशा पापको प्रकट करना और धर्मको गुप्त रखना चाहिये ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [व्यर्थ जन्म, दान और जीवनका वर्णन, सात्विक दानोंका लक्षण, दानका योग्य पात्र और ब्राह्णकी महिमा] वैशम्पायन उवाच एवं श्रुत्वा वचस्तस्य धर्मपुत्रो$च्युतस्य तु । पप्रच्छ पुनरप्यन्यं धर्म धर्मात्मजो हरिम् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर इस प्रकार भगवान् अच्युतके वचन सुनकर फिर भी श्रीहरिसे अन्य धर्म पूछने लगे-- ।। वृथा च कति जन्मानि वृथा दानानि कानि च | वृथा च जीवितं केषां नराणां पुरुषोत्तम ।। “पुरुषोत्तम! कितने जन्म व्यर्थ समझे जाते हैं? कितने प्रकारके दान निष्फल होते हैं? और किन-किन मनुष्योंका जीवन निरर्थक माना गया है? ।। कीदृशासु हावस्थासु दान॑ दत्तं जनार्दन । इह लोके5नुभवति पुरुष: पुरुषोत्तम ।। गर्भस्थ: कि समश्नाति कि बालये वापि केशव । यौवनस्थे<पि किं कृष्ण वार्धके वापि कि भवेत् ।। “पुरुषोत्तम! जनार्दन! मनुष्य किस अवस्थामें दिये हुए दानके फलका इस लोकमें अनुभव करता है। केशव! गर्भमें स्थित हुआ मनुष्य किस दानका फल भोगता है? श्रीकृष्ण! बाल, युवा और वृद्ध-अवस्थाओंमें मनुष्य किस-किस दानका फल भोगता है? ।। सात्त्विकं कीदृशं दानं राजसं कीदृशं भवेत् । तामसं कीदृशं देव तर्पयिष्यति कि प्रभो ।। “भगवन्! सात्त्विक, राजस और तामस दान कैसे होते हैं? प्रभो! उनसे किसकी तृप्ति होती है? ।। उत्तमं कीदृशं दानं॑ तेषां वा कि फलं भवेत् | किं दान॑ नयति हार्ध्व कि गतिं मध्यमां नयेत् । गतिं जघन्यामथ वा देवदेव वदस्व मे ।। “उत्तम दानका स्वरूप क्या है? और उससे मनुष्योंको किस फलकी प्राप्ति होती है? कौन-सा दान ऊर्ध्वगतिको ले जाता है? कौन-सा मध्यम गतिको और कौन-सा नीच गतिको ले जाता है? देवाधिदेव! यह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये ।। एतदिच्छामि विज्ञातुं परं कौतूहलं हि मे । त्वदीयं वचन सत्यं पुण्यं च मधुसूदन ।। “मधुसूदन! मैं इस विषयको जानना चाहता हूँ और इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है; क्योंकि आपके वचन सत्य और पुण्यमय हैं' ।। श्रीभगवानुवाच शृणु राजन् यथान्यायं वचन तथ्यमुत्तमम् | कथ्यमानं मया पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।। श्रीभगवानने कहा--राजन! मैं तुम्हें न््यायके अनुसार यथार्थ एवं उत्तम उपदेश सुनाता हूँ, ध्यान देकर सुनो। यह विषय परम पवित्र और सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला है ।। वृथा च दश जन्मानि चत्वारि च नराधिप । वृथा दानानि पञ्चाशत्पञ्चैव च यथाक्रमम् ।। वृथा च जीवितं येषां ते च षट् परिकीर्तिता: । अनुक्रमेण वक्ष्यामि तानि सर्वाणि पार्थिव ।॥। नरेश्वर! चौदह जन्म व्यर्थ समझे जाते हैं। क्रमश: पचपन प्रकारके दान निष्फल होते हैं और जिन-जिन मनुष्योंका जीवन निरर्थक होता है, उनकी संख्या छः बतलायी गयी है। भूपाल! इन सबका मैं क्रमश: वर्णन करूँगा ।। धर्मघ्नानां वृथा जन्म लुब्धानां पापिनां तथा । वृथा पाकं च ये5श्रन्ति परदाररताश्न ये । पाकभेदकरा ये च ये च स्यु: सत्यवर्जिता: ।। जो धर्मका नाश करनेवाले, लोभी, पापी, बलिवैश्वदेव किये बिना भोजन करनेवाले, परस्त्रीगामी, भोजनमें भेद करनेवाले और असत्यभाषी हैं, उनका जन्म वृथा है ।। मृष्टमश्नाति यश्चनैकः क्लिश्यमानैस्तु बान्धवै: । पितरं मातरं चैव उपाध्यायं गुरुं तथा । मातुलं मातुलानीं च यो निहन्याच्छपेत वा ।। ब्राह्मणश्वैव यो भूत्वा संध्योपासनवर्जित: । निःस्वाहो निःस्वधश्वैव शूद्राणामन्नभुग द्विज: ।। मम वा शंकरस्याथ ब्रह्मणो वा युधिष्ठिर । अथवा ब्राह्माणानां तु ये न भक्ता नराधमा: । वृथा जन्मान्यथैतेषां पापिनां विद्धि पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! जो बन्धु-बान्धवोंको क्लेश देकर अकेले ही मिठाई खानेवाले हैं, जो माता-पिता, अध्यापक, गुरु और मामा-मामीको मारते या गाली देते हैं, जो ब्राह्मण होकर भी संध्योपासनसे रहित हैं, जो अग्निहोत्रका त्याग करनेवाले हैं, जो श्राद्ध-तर्पणसे दूर रहनेवाले हैं, जो ब्राह्मण होकर शूद्रका अन्न खानेवाले हैं तथा जो मेरे, शंकरजीके, ब्रह्माजीके अथवा ब्राह्मणोंके भक्त नहीं हैं--ये चौदह प्रकारके मनुष्य अधम होते हैं। इन्हीं पापियोंके जन्मको व्यर्थ समझना चाहिये ।। अश्रद्धयापि यद् दत्तमवमानेन वापि यत् । दम्भार्थमपि यद् दत्तं यत् पाखण्डिहितं नृप ।। शूद्राचाराय यद् दत्तं यद् दत्त्वा चानुकीर्तितम् । रोषयुक्त च यद् दत्तं यद् दत्तमनुशोचितम् ।। दम्भार्जितं च यद् दत्तं यच्च वाप्यनृतार्जितम् | ब्राह्मणस्वं च यद् दत्तं चौर्येणाप्यर्जितं च यत् ।। अभिशस्तादहतं यत्तु यद् दत्त पतिते द्विजे । निर्ब्रह्माभिद्वतं यत्तु यद् दत्तं सर्वयाचकै: ।। व्रात्यैस्तु यदूधृतं दानमारूढपतितैश्न यत् । यद् दत्तं स्वैरिणीभर्त्तुः श्वशुराननुवर्त्तिने ।। यद् ग्रामयाचकद्तं यत् कृतघ्नहृतं तथा । उपपातकिने दत्तं वेदविक्रयिणे च यत् ।। स्त्रीजिताय च यद् दत्तं यद् दत्तं राजसेविने । गणकाय च यद् दत्तं यच्च कारणिकाय च ।। वृषलीपतये दत्तं यद् दत्तं शस्त्रजीविने । भृतकाय च यद् दत्तं व्यालग्राहिहतं च यत् ।। पुरोहिताय यद् दत्तं चिकित्सकह्तं च यत् । यद् वणिक्कर्मिणे दत्तं क्षुद्रमन्त्रोपजीविने ।। यच्छूद्रजीविने दत्तं यच्च देवलकाय च । देवद्रव्याशिने दत्तं यद् दत्तं चित्रकर्मिणे ।। रड्रोपजीविने दत्तं यच्च मांसोपजीविने । सेवकाय च यद् दत्तं यद् दत्तं ब्राह्मणब्रुवे ।। अद्देशिने च यद् दत्तं दत्त वार्धुशिकाय च | यदनाचारिणे दत्तं यत्तु दत्तमनग्नये ।। असंध्योपासिने दत्तं यच्छूद्रग्रामवासिने । यन्मिथ्यालिड्ञिने दत्तं दत्त सर्वाशिने च यत् ।। नास्तिकाय च यद् दत्तं धर्मविक्रयिणे च यत् । वराकाय च यद् दत्तं यद् दत्तं कूटसाक्षिणे ।। ग्रामकूटाय यद् दत्तं दान॑ पार्थिवपुड्भव । वृथा भवति तत्सर्व नात्र कार्या विचारणा ।। राजन! जो दान अश्रद्धा या अपमानके साथ दिया जाता है, जिसे दिखावेके लिये दिया जाता है, जो पाखण्डीको प्राप्त हुआ है, जो शूद्रके समान आचरणवाले पुरुषको दिया जाता है, जिसे देकर अपने ही मुहसे बारंबार बखान किया गया है, जिसे रोषपूर्वक दिया गया है तथा जिसको देकर पीछेसे उसके लिये शोक किया जाता है, जो दम्भसे उपार्जित अन्नका, झूठ बोलकर लाये हुए अन्नका, ब्राह्मणके धनका, चोरी करके लाये हुए द्रव्यका तथा कलंकी पुरुषके घरसे लाये हुए धनका दान किया गया है, जो पतित ब्राह्मणको दिया गया है, जो दान वेदविहीन पुरुषोंको और सबके यहाँ याचना करनेवालोंको दिया जाता है तथा जो संस्कारहीन पतितोंको तथा एक बार संन्यास लेकर फिर गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करनेवाले पुरुषोंको दिया जाता है, जो दान वेश्यागामीको और ससुरालमें रहकर गुजारा करनेवाले ब्राह्मणको दिया गया है, जिस दानको समूचे गाँवसे याचना करनेवाले और कृतघ्नने ग्रहण किया है एवं जो दान उपपातकीको, वेद बेचनेवालेको, स्त्रीके वशमें रहनेवालेको, राजसेवकको, ज्योतिषीको, तान्त्रिकको, शूद्रजातिकी स्त्रीके साथ सम्बन्ध रखनेवालेको, अस्त्र-शस्त्रसे जीविका चलानेवालेको, नौकरी करनेवालेको, साँप पकड़नेवालेको और पुरोहिती करनेवालेको दिया जाता है, जिस दानको वैद्यने ग्रहण किया है, राजश्रेष्ठीी जो दान बनियेका काम करनेवालेको, क्षुद्र मन्त्र जपकर जीविका चलानेवालेको, शूद्रके यहाँ गुजारा करनेवालेको, वेतन लेकर मन्दिरमें पूजा करनेवालेको, देवोत्तर सम्पत्तिको खा जानेवालेको, तस्वीर बनानेका काम करनेवालेको, रंगभूमिमें नाच- कूदकर जीविका चलानेवालेको, मांस बेचकर जीवन-निर्वाह करनेवालेको, सेवाका काम करनेवालेको, ब्राह्मणोचित आचारसे हीन होकर भी अपनेको ब्राह्मण बतलानेवालेको, उपदेश देनेकी शक्तिसे रहितको, व्याजखोरको, अनाचारीको, अग्निहोत्र न करनेवालेको, संध्योपासनासे अलग रहनेवालेको, शूद्रके गाँवमें निवास करनेवालेको, झूठे वेश धारण करनेवालेको, सबके साथ और सब कुछ खानेवालेको, नास्तिकको, धर्मविक्रेताको, नीच वृत्तिवालेको, झूठी गवाही देनेवालेको तथा कूटनीतिका आश्रय लेकर गाँवके लोगोंमें लड़ाई-झगड़ा करानेवाले ब्राह्मणको दिया जाता है, वह सब निष्फल होता है, इसमें कोई विचारणीय बात नहीं है ।। विप्रनामधरा एते लोलुपा ब्राह्म॒णाधमा: । नात्मानं तारयन्त्येते न दातारं युधिष्ठिर ।। युधिष्ठिर! ये सब विषयलोलुप, विप्रनामधारी ब्राह्मण अधम हैं, ये न तो अपना उद्धार कर सकते हैं और न दाताका ही ।। एतेभ्यो दत्तमात्राणि दानानि सुबहून्यपि । वृथा भवन्ति राजेन्द्र भस्मन्याज्याहुतिर्यथा ।। राजेन्द्र! उपर्युक्त ब्राह्मणोंको दिये हुए दान बहुत हों तो भी राखमें डाली हुई घीकी आहुतिके समान व्यर्थ हो जाते हैं ।। एतेषु यत् फलं किंचिद् भविष्यति कथंचन । राक्षसाश्न पिशाचाश्व तद् विलुम्पन्ति हर्षिता: ।। उन्हें दिये गये दानका जो कुछ फल होनेवाला होता है, उसे राक्षत और पिशाच प्रसन्नताके साथ लूट ले जाते हैं ।। वृथा होतानि दत्तानि कथितानि समासतः । जीवितं तु तथा होषां तच्छूणुष्व युधिषछिर ।। युधिष्ठिर! ये सब वृथा दान संक्षेपमें बताये गये। अब जिन-जिन मनुष्योंका जीवन व्यर्थ है, उनका परिचय दे रहा हूँ; सुनो ।। ये मां न प्रतिपद्यन्ते शड़ुकरं वा नराधमा: । ब्राह्मणान् वा महीदेवान् वृथा जीवन्ति ते नरा: ।। जो नराधम मेरी, भगवान् शंकरकी अथवा भूमण्डलके देवता ब्राह्मणोंकी शरण नहीं लेते, वे मनुष्य व्यर्थ ही जीते हैं ।। हेतुशास्त्रेषु ये सक्ता: कुदृष्टिपथमाश्रिता: । देवान् निन्दन्त्यनाचारा वृथा जीवन्ति ते नरा: ।। जिनकी कोरे तर्कशास्त्रमें ही आसक्ति है, जो नास्तिक-पथका अवलम्बन करते हैं, जिन्होंने आचार त्याग दिया है तथा जो देवताओंकी निन्दा करते हैं, वे मनुष्य व्यर्थ ही जी रहे हैं ।। कुशलै: कृतशास्त्राणि पठित्वा ये नराधमा: । विप्रान् निन्दन्ति यज्ञांश्व वृथा जीवन्ति ते नरा: ।। जो नराधम नास्तिकोंके शास्त्र पढ़कर ब्राह्मण और यज्ञोंकी निन््दा करते हैं, वे व्यर्थ ही जीवन धारण करते हैं ।। ये दुर्गा वा कुमारं वा वायुमग्निं जलं रविम् | पितरं मातरं चैव गुरुमिन्द्रं निशाकरम् । मूढा निन्दन्त्यनाचारा वृथा जीवन्ति ते नरा: ।। जो मूढ़ दुर्गा, स्वामी कार्तिकेय, वायु, अग्नि, जल, सूर्य, माता-पिता, गुरु, इन्द्र तथा चन्द्रमाकी निन्दा करते और आचारका पालन नहीं करते, वे मनुष्य भी निरर्थक ही जीवन व्यतीत करते हैं ।। विद्यमाने धने यस्तु दानधर्मविवर्जित: । मृष्टमश्नाति यश्चैको वृथा जीवति सोडपि च । वृथा जीवितमाख्यातं दानकाल ब्रवीमि ते ।। जो धन होनेपर भी दान और धर्म नहीं करता तथा दूसरोंको न देकर अकेले ही मिठाई खाया करता है, वह भी व्यर्थ ही जीता है। इस प्रकार व्यर्थ जीवनकी बात बतायी गयी। अब दानका समय बताता हूँ ।। तमोनिविष्ट चित्तेन दत्तं दानं तु यद् भवेत् | तदस्य फलमश्नाति नरो गर्भगतो नृप ।। राजन! तमोगुणमें आविष्ट हुए चित्तवाले मनुष्यके द्वारा जो दान दिया जाता है, उसका फल मनुष्य गर्भावस्थामें भोगता है ।। ईर्ष्यामत्सरसंयुक्तो दम्भार्थ चार्थकारणात् । ददाति दान यो मर्त्यों बालभावे तदश्षुते ।। ईर्ष्या और मत्सरतासे युक्त मनुष्य अर्थलोभसे और दम्भपूर्वक जिस दानको देता है, उसका फल वह बाल्यावस्थामें भोगता है ।। भोक्तुं भोगमशक्तस्तु व्याधिभि: पीडितो भृशम् । ददाति दान यो मर्त्यों वृद्धभावे तदश्षुते ।। भोगोंको भोगनेमें अशक्त, अत्यन्त व्याधिसे पीड़ित मनुष्य जिस दानको देता है, उसके फलका उपभोग वह वृद्धावस्थामें करता है ।। श्रद्धायुक्त: शुचि: स्नात: प्रसन्नेन्द्रियमानस: । ददाति दान यो मर्त्यों यौवने स तदश्षुते ।। जो मनुष्य स्नान करके पवित्र हो मन और इन्द्रियोंको प्रसन्न रखकर श्रद्धाके साथ दान करता है, उसके फलको वह यौवनावस्थामें भोगता है ।। स्वयं नीत्वा तु यद् दानं भकत्या पात्रे प्रदीयते । तत्सार्वकालिकं विद्धि दानमामरणान्तिकम् ।। जो स्वयं देने योग्य वस्तु ले जाकर भक्तिपूर्वक सत्पात्रकों दान करता है, उसको मरणपर्यन्त हर समय उस दानका फल प्राप्त होता है, ऐसा समझो ।। राजसं सात््विकं चापि तामसं च युधिष्छिर । दानं दानफलं चैव गतिं च त्रिविधां शृणु ।। युधिष्ठि!![ दान और उसका फल सात््विक, राजस और तामस भेदसे तीन-तीन प्रकारका होता है तथा उसकी गति भी तीन प्रकारकी होती है, इसे सुनो ।। दानं॑ दातव्यमित्येव मतिं कृत्वा द्विजाय वै । उपकारवियुक्ताय यद् दत्तं तद्धि साक््चिकम् ।। दान देना कर्तव्य है--ऐसा समझकर अपना उपकार न करनेवाले ब्राह्मणको जो दान दिया जाता है, वही सात्त्विक है ।। श्रोत्रियाय दरिद्राय बहुभृत्याय पाण्डव | दीयते यत् प्रह्ष्न तत् सात्त्विकमुदाह्तम् ।। पाण्डुनन्दन! जिसका कुटुम्ब बहुत बड़ा हो तथा जो दरिद्र और वेदका विद्वान् हो, ऐसे ब्राह्मणको प्रसन्नतापूर्वक जो कुछ दिया जाता है, वह भी सात््विक कहा जाता है ।। वेदाक्षरविहीनाय यन्तु पूर्वोपकारिणे | समृद्धाय च यद् दत्तं तद् दानं राजसं स्मृतम् ।। परंतु जो वेदका एक अक्षर भी नहीं जानता, जिसके घरमें काफी सम्पत्ति मौजूद है तथा जो पहले कभी अपना उपकार कर चुका है, ऐसे ब्राह्मणको दिया हुआ दान राजस माना गया है ।। सम्बन्धिने च यद् दत्तं प्रमत्ताय च पाण्डव | फलार्थिभिरपात्राय तद् दानं राजसं स्मृतम् ।। पाण्डव! अपने सम्बन्धी और प्रमादीको दिया हुआ, फलकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंके द्वारा दिया हुआ तथा अपात्रको दिया हुआ दान भी राजस ही है ।। वैश्वदेवविहीनाय दानमश्रोत्रियाय च । दीयते तस्करायापि तद् दानं तामसं स्मृतम् ।। जो ब्राह्मण बलिवैश्वदेव नहीं करता, वेदका ज्ञान नहीं रखता तथा चोरी किया करता है, उसको दिया हुआ दान तामस है ।। सरोषमवधूतं च क्लेशयुक्तमवज्ञया । सेवकाय च यद् दत्तं तत् तामसमुदाह्तम् ।। क्रोध, तिरस्कार, क्लेश और अवहेलनापूर्वक तथा सेवकको दिया हुआ दान भी तामस ही बतलाया गया है ।। देवा पितृगणाश्वैव मुनयश्लाग्नयस्तथा । सात्त्विकं दानमश्रन्ति तुष्यन्ति च नरेश्वर ।। नरेश्वर! सात््विक दानको देवता, पितर, मुनि और अग्नि ग्रहण करते हैं तथा उससे इन्हें बड़ा संतोष होता है ।। दानवा दैत्यसंघाश्ष ग्रहा यक्षा: सराक्षसा: । राजसं दानमश्रन्ति वर्जित पितृदैवतै: ।। राजस दानका दानव, दैत्य, ग्रह, यक्ष और राक्षस उपभोग करते हैं, पितर और देवता नहीं करते ।। पिशाचा: प्रेतसंघाश्ष॒ कश्मला ये मलीमसा: । तामसं दानमश्रन्ति गतिं च त्रिविधां शृणु ।। तामस दानका फल पापी और मलिन कर्म करनेवाले प्रेत एवं पिशाच भोगते हैं। अब त्रिविध गतिका वर्णन सुनो ।। साच्विकानां तु दानानामुत्तमं फलमश्चुते । मध्यमं राजसानां तु तामसानां तु पश्चिमम् ।। सात््विक दानोंका फल उत्तम, राजस दानोंका मध्यम और तामस दानोंका फल अधम होता है ।। अभिगम्योपनीतानां दानानां फलमुत्तमम् | मध्यमं तु समाहूय जघन्यं याचते फलम् ।। जो दान सामने जाकर दिया जाता है, उसका फल उत्तम होता है; जो दानपात्रको बुलाकर दिया जाता है, उसका फल मध्यम होता है और जो याचना करनेवालेको दिया जाता है, उसका फल जघन्य होता है ।। अयाचितप्रदाता य: स याति गतिमुन्तमाम् | समाहूय तु यो दद्यान्मध्यमां स गतिं व्रजेत् । याचितो यश्न वै दद्याज्जघन्यां स गति व्रजेत् ।। जो याचना न करनेवालेको देता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त करता है; जो बुलाकर देता है, वह मध्यम गतिको जाता है और जो याचना करनेवालेको देता है, वह नीची गति पाता है ।। उत्तमा दैविकी ज्ञेया मध्यमा मानुषी गति: । गतिर्जघन्या तिर्यक्षु गतिरेषा त्रिधा स्मृता ।। दैवी गतिको उत्तम समझना चाहिये। मानुषी गति मध्यम है और तिर्यग्योनियाँ नीच गति है--यह इनका तीन प्रकार माना गया है ।। पात्रभूतेषु विप्रेषु संस्थितेष्वाहिताग्निषु । यत्तु निक्षिप्यते दानमक्षय्यं सम्प्रकीर्तितम् ।। दानके उत्तम पात्र अग्निहोत्री ब्राह्मणको जो दान दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है ।। श्रोत्रियाणां दरिद्राणां भरणं कुरु पार्थिव । समृद्धानां द्विजातीनां कुर्यास्तिषां तु रक्षणम् ।। अतः भूपाल! जो वेदके विद्वान् होते हुए दरिद्र हों, उनके भरण-पोषणका तुम स्वयं प्रबन्ध करो और सम्पत्तिशाली द्विजोंकी रक्षा करते रहो ।। दरिद्रान् वित्तहीनांश्व प्रदानै: सुष्ठ पूजय । आतुरस्यौषधै: कार्य नीरुजस्य किमौषधै: ।। धनहीन दरिद्र ब्राह्मणोंको दान देकर उनकी भलीभाँति पूजा करो; क्योंकि रोगीको ही ओषधिकी आवश्यकता है, नीरोगको ओषधिसे क्या प्रयोजन? ।। पापं प्रतिगृहीतारं प्रदातुरुपगच्छति । प्रतिग्रहीतुर्यत् पुण्यं प्रदातारमुपैति तत् । तस्माद् दानं सदा कार्य परत्र हितमिच्छता ।। दाताका पाप दानके साथ ही दान लेनेवालेके पास चला जाता है और उसका पुण्य दाताको प्राप्त हो जाता है, अतः परलोकमें अपना हित चाहनेवाले पुरुषको सदा दान करते रहना चाहिये ।। वेदविद्यावदातेषु सदा शूद्रान्नवर्जिषु । प्रयत्नेन विधातव्यो महादानमयो निधि: ।। जो वेद-विद्या पढ़कर अत्यन्त शुद्ध आचार-विचारसे रहते हों और शूद्रोंका अन्न कभी नहीं ग्रहण करते हों, ऐसे विद्वानोंको प्रयत्नपूर्वक बड़े-बड़े दानोंका भाण्डार बनाना चाहिये ।। येषां दारा: प्रतीक्ष्यन्ते सहस्रस्येव लम्भनम् । भुक्तशेषस्य भक्तस्य तान् निमन्त्रय पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन! जिनकी स्त्रियाँ अपने पतिके भोजनसे बचे हुए अन्नको हजारों गुना लाभ समझकर उसके मिलनेकी प्रतीक्षा किया करती हैं, ऐसे ब्राह्मणोंको तुम भोजनके लिये निमन्त्रित करना ।। आमन्त्र्य तु निराशानि न कर्तव्यानि भारत । कुलानि सुदरिद्राणि तेषामाशा हता भवेत् ।। भारत! दरिद्रकुलके ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके उन्हें निराश न लौटाना, अन्यथा उनकी आशा मारी जायगी ।। मद्भक्ता ये नरश्रेष्ठ मद्गता मत्परायणा: । मद्याजिनो मन्नियमास्तान् प्रयत्नेन पूजयेत् ।। नरश्रेष्ठ! जो मेरे भक्त हों, मेरेमें मन लगानेवाले हों, मेरी शरणमें हों, मेरा पूजन करते हों और नियमपूर्वक मुझमें ही लगे रहते हों, उनका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये ।। तेषां तु पावनायाहं नित्यमेव युधिष्ठिर । उभे संध्येडधितिष्ठामि हाुस्कन्न॑ तद् ब्रतं मम ।। युधिष्ठि!! अपने उन भक्तोंको पवित्र करनेके लिये मैं प्रतिदिन दोनों समय संध्यामें व्याप्त रहता हूँ। मेरा यह नियम कभी खण्डित नहीं होता ।। तस्मादष्टाक्षरं मन्त्र मद्धक्तैवीतकल्मषै: । संध्याकाले तु जप्तव्यं सततं चात्मशुद्धये ।। इसलिये मेरे निष्पाप भक्तजनोंको चाहिये कि वे आत्मशुद्धिके लिये संध्याके समय निरन्तर अष्टाक्षर मन्त्र (3० नमो नारायणाय)-का जप करते रहें ।। अन्येषामपि विप्राणां किल्बिषं हि विनश्यति । उभे संध्येडप्युपासीत तस्माद् विप्रो विशुद्धये ।। संध्या और अष्टाक्षर-मन्त्रका जप करनेसे दूसरे ब्राह्मणोंके भी पाप नष्ट हो जाते हैं, अतः चित्तशुद्धिके लिये प्रत्येक ब्राह्मणको दोनों कालकी संध्या करनी चाहिये ।। दैवे श्राद्धेडपि विप्र: स नियोक्तव्योडजुगुप्सया । जुगुप्सितस्तु यः श्राद्ध दहत्यग्निरिवेन्धनम् ।। जो ब्राह्मण इस प्रकार संध्योपासन और जप करता हो, उसे देवकार्य और श्राद्धमें नियुक्त करना चाहिये। उसकी निन्दा कदापि नहीं करनी चाहिये; क्योंकि निन्दा करनेपर ब्राह्मण उस श्राद्धको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे आग ईंधनको जला डालती है ।। भारतं मानवो धर्मों वेदा: साड्राश्चिकित्सितम् । आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि हेतुभि: ।। महाभारत, मनुस्मृति, अंगोंसहित चारों वेद और आयुर्वेद शास्त्र--ये चारों सिद्ध उपदेश देनेवाले हैं, अत: तर्कद्वारा इनका खण्डन नहीं करना चाहिये ।। न ब्राह्मणान् परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् | महान् भवेत् परीवादो ब्राह्मणानां परीक्षणे ।। धर्मको जाननेवाले पुरुषको देवसम्बन्धी कार्यमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि ब्राह्मणोंकी परीक्षा करनेसे यजमानकी बड़ी निन्दा होती है ।। श्वत्वं प्राप्नोति निन्दित्वा परीवादात् खरो भवेत् । कृमिर्भवत्यभिभवात् कीटो भवति मत्सरात् ।। ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला मनुष्य कुत्तेकी योनिमें जन्म लेता है, उसपर दोषारोपण करनेसे गदहा होता है और उसका तिरस्कार करनेसे कृमि होता है तथा उसके साथ द्वेष करनेसे वह कीड़ेकी योनिमें जन्म पाता है ।। दुर्वृत्ता वा सुवृत्ता वा प्राकृता वा सुसंस्कृता: । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छज्ञा इवाग्नय: ।। ब्राह्मण चाहे दुराचारी हों या सदाचारी, संस्कारहीन हों या संस्कारोंसे सम्पन्न, उनका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे भस्मसे ढकी हुई आगके तुल्य हैं ।। क्षत्रियं चैव सर्प च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम् । नावमन्येत मेधावी कृशानपि कदाचन ।। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि क्षत्रिय, साँप और दिद्वान् ब्राह्मण यदि कमजोर हों तो भी कभी उनका अपमान न करे ।। एतत् त्रय॑ हि पुरुष निर्ददेदवरमानितम् । तस्मादेतत् प्रयत्नेन नावमन्येत बुद्धिमान् ।। क्योंकि वे तीनों अपमानित होनेपर मनुष्यको भस्म कर डालते हैं। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको प्रयत्नपूर्वक उनके अपमानसे बचना चाहिये ।। यथा सर्वास्ववस्थासु पावको दैवतं महत् | तथा सर्वास्ववस्थासु ब्राह्मणो देवतं महत् ।। जिस प्रकार सभी अवस्थाओंमें अग्नि महान् देवता हैं, उसी प्रकार सभी अवस्थाओंमें ब्राह्मण महान देवता हैं ।। व्यज्रा: काणाश्न कुब्जाश्न॒ वामनाज्ास्तथैव च | सर्वे दैवे नियोक्तव्या व्यामिश्रा वेदपारगै: ।। अंगहीन, काने, कुबड़े और बौने--इन सब ब्राह्मणोंको देवकार्यमें वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ नियुक्त करना चाहिये ।। मन्युं नोत्पादयेत् तेषां न चारिष्टं समाचरेत् । मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्रा: शस्त्रपाणय: ।। उनपर क्रोध न करे, न उनका अनिष्ट ही करे; क्योंकि ब्राह्मण क्रोधरूपी शस्त्रसे ही प्रहार करते हैं, वे शस्त्र हाथमें रखनेवाले नहीं हैं ।। मन्युना घ्नन्ति ते शत्रून् वजेणेन्द्र इवासुरान् । ब्राह्मणो हि महद् दैवं जातिमात्रेण जायते ।। जैसे इन्द्र असुरोंका वज़से नाश करते हैं, वैसे ही वे ब्राह्मण क्रोधसे शत्रुका नाश करते हैं; क्योंकि ब्राह्मण जातिमात्रसे ही महान् देवभावको प्राप्त हो जाता है ।। ब्राह्मणा: सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये । कि पुनर्ये च कौन्तेय संध्यां नित्यमुपासते ।। कुन्तीनन्दन! सारे प्राणियोंके धर्मरूपी खजानेकी रक्षा करनेके लिये साधारण ब्राह्मण भी समर्थ हैं, फिर जो नित्य संध्योपासन करते हैं, उनके विषयमें तो कहना ही क्या है? ।। यस्यास्येन समश्रन्ति हव्यानि त्रिदिवौकस: । कव्यानि चैव पितर: कि भूतमधिकं ततः ।। जिसके मुखसे स्वर्गवासी देवगण हविष्यका और पितर कव्यका भृक्षण करते हैं, उससे बढ़कर कौन प्राणी हो सकता है? ।। उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्थर्मस्य शाश्व॒ती । स हि धर्मार्थिमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ।। ब्राह्मण जन्मसे ही धर्मकी सनातन मूर्ति है। वह धर्मके ही लिये उत्पन्न हुआ है और वह ब्रह्मभावको प्राप्त होनेमें समर्थ है ।। स्वमेव ब्राह्मणो भुड्धक्ते स्वयं वस्ते ददाति च । आनुृशंस्याद् ब्राह्मणस्य भुञ्जते हीतरे जना: । तस्मात् ते नावमन्तव्या मद्धक्ता हि द्विजा: सदा ।। ब्राह्मण अपना ही खाता, अपना ही पहनता और अपना ही देता है। दूसरे मनुष्य ब्राह्मणगकी दयासे ही भोजन पाते हैं। अतः ब्राह्मणोंका कभी अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सदा ही मुझमें भक्ति रखनेवाले होते हैं ।। आरण्यकोपनिषदि ये तु पश्यन्ति मां द्विजा: । निगूढं निष्कलावस्थं तान् प्रयत्नेन पूजय ।। जो ब्राह्मण बृहदारण्यक-उपनिषदमें वर्णित मेरे गूढ़ और निष्कल स्वरूपका ज्ञान रखते हैं, उनका यत्नपूर्वक पूजन करना ।। स्वगृहे वा प्रवासे वा दिवारात्रमथापि वा । श्रद्धया ब्राह्मणा: पूज्या मद्धक्ता ये च पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन! घरपर या विदेशमें, दिनमें या रातमें मेरे भक्त ब्राह्मणोंकी निरन्तर श्रद्धाके साथ पूजा करते रहना चाहिये ।। नास्ति विप्रसमं दैवं नास्ति विप्रसमो गुरु: । नास्ति विप्रात् परो बन्धुर्नास्ति विप्रात् परो निधि: ।। ब्राह्मणके समान कोई देवता नहीं है, ब्राह्मणके समान कोई गुरु नहीं है, ब्राह्मणसे बढ़कर बन्धु नहीं है और ब्राह्मणसे बढ़कर कोई खजाना नहीं है ।। नास्ति विप्रात् परं तीर्थ न पुण्यं ब्राह्म॒णात् परम् न पवित्रं परं विप्रान्न द्विजात् पावन परम् । नास्ति विप्रात् परो धर्मो नास्ति विप्रात् परा गति: ।। कोई तीर्थ और पुण्य भी ब्राह्मणसे श्रेष्ठ नहीं है। ब्राह्मणसे बढ़कर पवित्र कोई नहीं है और ब्राह्मणसे बढ़कर पवित्र करनेवाला कोई नहीं है। ब्राह्मणसे श्रेष्ठ कोई धर्म नहीं और ब्राह्मणसे उत्तम कोई गति नहीं है ।। पापकर्मसमारक्षिप्तं पतन्तं नरके नरम् | त्रायते पात्रमप्येकं पात्रभूते तु तद् द्विजे ।। बालाहिताग्नयो ये च शान्ता: शूद्रान्नवर्जिता: । मामर्चयन्ति मद्धक्तास्तेभ्यो दत्तमिहाक्षयम् ।। पापकर्मके कारण नरकमें गिरते हुए मनुष्यका एक सुपात्र ब्राह्मण भी उद्धार कर सकता है। सुपात्र ब्राह्मणोंमें भी जो बाल्यकालसे ही अग्निहोत्र करनेवाले, शूद्रका अन्न त्याग देनेवाले तथा शान्त और मेरे भक्त हैं एवं सदा मेरी पूजा किया करते हैं, उनको दिया हुआ दान अक्षय होता है ।। प्रदानै: पूजितो विप्रो वन्दितो वापि संस्कृत: । सम्भावितो वा दृष्टो वा मद्धभधक्तो दिवमुन्नयेत् ।। मेरे भक्त ब्राह्मणको दान देकर उसकी पूजा करने, सिर झुकाने, सत्कार करने, बातचीत करने अथवा दर्शन करनेसे वह मनुष्यको दिव्यलोकमें पहुँचा देता है ।। ये पठन्ति नमस्यन्ति ध्यायन्ति पुरुषास्तु माम् स तान् दृष्टवा च स्पृष्टवा च नर: पापै: प्रमुच्यते ।। जो लोग मेरे गुण और लीलाओंका पाठ करते हैं तथा मुझे नमस्कार करते और मेरा ध्यान करते हैं, उनका दर्शन और स्पर्श करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। मद्धभधक्ता मदगतप्राणा मद्गीता मत्परायणा: । बीजयोनिविशाुद्धा ये श्रोत्रिया: संयतेन्द्रिया: । शूद्रान्नविरता नित्यं ते पुनन्तीह दर्शनात् ।। जो मेरे भक्त हैं, जिनके प्राण मुझमें ही लगे हुए हैं, जो मेरी महिमाका गान करते हैं और मेरी शरणमें पड़े रहते हैं, जिनकी उत्पत्ति शुद्ध रज और वीर्यसे हुई है, जो वेदके विद्वान, जितेन्द्रिय तथा सदा शुद्वान्नसे बचे रहनेवाले हैं, वे दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं ।। स्वयं नीत्वा विशेषेण दान तेषां गृहेष्वथ । निवापयेत्तु यद्भधक्त्या तद् दानं कोटिसम्मितम् ।। ऐसे लोगोंके घरपर स्वयं उपस्थित होकर भक्तिपूर्वक विशेषरूपसे दान देना चाहिये। वह दान साधारण दानकी अपेक्षा करोड़गुना फल देनेवाला माना गया है ।। जाग्रतः स्वपतो वापि प्रवासेषु गृहेष्वथ । हृदये न प्रणश्यामि यस्य विप्रस्य भावत: ।। स पूजितो वा दृष्टो वा स्पृष्टो वापि द्विजोत्तम: । सम्भाषितो वा राजेन्द्र पुनात्येवं नरं सदा ।। राजेन्द्र! जागते अथवा सोते समय, परदेशमें अथवा घर रहते समय जिस ब्राह्मणके हृदयसे उसकी भक्ति-भावनाके कारण मैं कभी दूर नहीं होता, ऐसा वह श्रेष्ठ ब्राह्मण पूजन, दर्शन, स्पर्श अथवा सम्भाषण करने मात्रसे मनुष्यको सदा पवित्र कर देता है ।। एवं सर्वास्ववस्थासु सर्वदानानि पाण्डव । मद्धक्ते भ्य: प्रदत्तानि स्वर्गमार्गप्रदानि वै ।। पाण्डव! इस प्रकार सब अवस्थाओंमें मेरे भक्तोंको दिये हुए सब प्रकारके दान स्वर्गमार्ग प्रदान करनेवाले होते हैं ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्म॒णोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन] वैशम्पायन उवाच श्र॒त्वैवं साक््विकं दानं राजसं तामसं तथा । पृथक्पृथक्त्वेन गतिं फलं चापि पृथक् पृथक् ।। अवितृप्त: प्रह्ृष्टात्मा पुण्यं धर्मामृतं पुनः । युधिष्ठिरो धर्मरत: केशवं पुनरब्रवीत् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार सात््विक, राजस और तामस दान, उसकी भिन्न-भिन्न गति और पृथक्-पृथक् फलका वर्णन सुनकर धर्मपरायण युधिष्ठिरका चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। इस परम पवित्र धर्मरूपी अमृतका पान करनेसे उन्हें तृप्ति नहीं हुई, अतः वे पुनः भगवान् श्रीकृष्णसे बोले-- ।। बीजयोनिविशुद्धानां लक्षणानि वदस्व मे | बीजदोषेण लोकेश जायन्ते च कथ्थं नरा: ।। “जगदीश्वर! मुझे यह बतलाइये कि बीज और योनि (वीर्य और रज)-से शुद्ध पुरुषोंके लक्षण कैसे होते हैं? बीज-दोषसे कैसे मनुष्य उत्पन्न होते हैं? ।। आचारदोषं देवेश वक्तुमर्हस्यशेषत: । ब्राह्मणानां विशेषं च गुणदोषौ च केशव ।। 'देवेश्वर श्रीकृष्ण! ब्राह्मणोंके उत्तम, मध्यम आदि विशेष भेदोंका, उनके आचारके दोषोंका तथा उनके गुण-दोषोंका भी सम्पूर्णतया वर्णन कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच शृणु राजन् यथावृत्तं बीजयोनिं शुभाशुभम् | येन तिष्ठति लोको<यं विनश्यति च पाण्डव ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! बीज और योनिकी शुद्धि-अशुद्धिका यथावत् वर्णन सुनो। पाण्डुनन्दन! उनकी शुद्धिसे ही यह संसार टिकता है और अशुद्धिसे उसका नाश हो जाता है ।। अविष्लुतब्रह्म॒चर्यो यस्तु विप्रो यथाविधि । स बीजं नाम विज्ञेयं तस्य बीजं शुभं भवेत् ।। जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यका विधिवत् पालन करता है, जिसका ब्रह्मचर्यव्रत कभी खण्डित नहीं होता, उसको बीज समझना चाहिये, उसीका बीज शुभ होता है ।। कन्या चाक्षतयोनि: स्यात् कुलीना पितृमातृतः । ब्राह्मादिषु विवाहेषु परिणीता यथाविधि ।। सा प्रशस्ता वरारोहा तस्या: योनि: प्रशस्यते । मनसा कर्मणा वाचा या गच्छेत् परपूरुषम् । योनिस्तस्या नरश्रेष्ठ गर्भाधानं न चाहति ।। इसी प्रकार जो कन्या पिता और माताकी दृष्टिसे उत्तम कुलमें उत्पन्न हो, जिसकी योनि दूषित न हुई हो तथा ब्राह्म आदि उत्तम विवाहोंकी विधिसे ब्याही गयी हो, वह उत्तम स्त्री मानी गयी है। उसीकी योनि श्रेष्ठ है। नरश्रेष्ठ! जो स्त्री मन, वाणी और क्रियासे परपुरुषके साथ समागम करती है, उसकी योनि गर्भाधानके योग्य नहीं होती ।। दैवे पित्रये तथा दाने भोजने सहभाषणे । शयने सह सम्बन्धे न योग्या दुष्टयोनिजा: ।। दूषित योनिसे उत्पन्न हुए मनुष्य यज्ञ, श्राद्ध, दान, भोजन, वार्तालाप, शयन तथा सम्बन्ध आदिमें सम्मिलित करने योग्य नहीं होते ।। कानीनश्चल सहोढश्न तथोभौ कुण्डगोलकौ । आरूढपतिताज्जात: पतितस्यापि य: सुतः । षडेते विप्रचाण्डाला निकृष्टा: श्वपचादपि ।। बिना ब्याही कन््यासे उत्पन्न, ब्याहके समय गर्भवती कन्यासे उत्पन्न, पतिकी जीवितावस्थामें व्यभिचारसे उत्पन्न, पतिके मर जानेपर पर-पुरुषसे उत्पन्न, संन्यासीके वीर्यसे उत्पन्न तथा पतित मनुष्यसे उत्पन्न--ये छ: प्रकारके चाण्डाल ब्राह्मण होते हैं, जो चाण्डालसे भी नीच हैं ।। यो यत्र तत्र वा रेत: सिक्त्वा शूद्रासु वा चरेत् कामचारी स पापात्मा बीजं तस्याशुभं भवेत् ।। जो जहाँ-तहाँ जिस किसी स्त्रीसे अथवा शूद्र जातिकी स्त्रीसे भी समागम कर लेता है, वह पापात्मा स्वेच्छाचारी कहलाता है। उसका बीज अशुभ होता है ।। अशुद्ध॑ तद् भवेद् बीजं शुद्धां योनिं न चाहति । दूषयत्यपि तां योनिं शुना लीढं हविर्यथा ।। वह अशुद्ध वीर्य किसी शुद्ध योनिवाली स्त्रीके योग्य नहीं होता, उसके सम्पर्कसे कुत्तेके चाटे हुए हविष्यकी तरह शुद्ध योनि भी दूषित हो जाती है ।। आत्मा हि शुक्रमुद्दिष्टं दैवतं परमं महत् । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन निरुन्ध्याच्छुक्रमात्मन: ।। वीर्यको आत्मा बताया गया है। वह सबसे श्रेष्ठ देवता है। इसलिये सब प्रकारका प्रयत्न करके अपने वीर्यकी रक्षा करनी चाहिये ।। आयुस्तेजो बल वीर्य प्रज्ञा श्रीश्ष महद् यश: । पुण्यं च मत्प्रियत्वं च लभते ब्रह्मचर्यया ।। मनुष्य ब्रह्मचर्यके पालनसे आयु, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, महान् यश, पुण्य और मेरे प्रेमको प्राप्त करता है ।। अविष्लुतब्रह्मचर्यर्गुहस्थाश्रममश्रितै: । पज्चयज्ञपरैर्धर्म: स्थाप्यते पृथिवीतले ।। जो गृहस्थ-आश्रममें स्थित होकर अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पञ्चयज्ञोंके अनुष्ठानमें तत्पर रहते हैं, वे पृथ्वीतलपर धर्मकी स्थापना करते हैं ।। सायं प्रातस्तु ये संध्यां सम्यग्नित्यमुपासते । नावं वेदमयीं कृत्वा तरन्ते तारयन्ति च ।। जो प्रतिदिन सबेरे और शामको विधिवत संध्योपासना करते हैं, वे वेदमयी नौकाका सहारा लेकर इस संसार-समुद्रसे स्वयं भी तर जाते हैं और दूसरोंको भी तार देते हैं ।। यो जपेत् पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम् । न सीदेत् प्रतिगृह्नान: पृथिवीं च ससागराम् ।। जो ब्राह्मण सबको पवित्र बनानेवाली वेदमाता गायत्रीदेवीका जप करता है, वह समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका दान लेनेपर भी प्रतिग्रहके दोषसे दुखी नहीं होता ।। ये चास्य दुःस्थिता: केचिद् ग्रहा: सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवा: शुभकरास्तथा ।। तथा सूर्य आदि ग्रहोंमेंसे जो उसके लिये अशुभ स्थानमें रहकर अनिष्टकारक होते हैं, वे भी गायत्री-जपके प्रभावसे शान्त, शुभ और कल्याणकारी फल देनेवाले हो जाते हैं ।। यत्र यत्र स्थिताश्षैव दारुणा: पिशिताशना: । घोररूपा महाकाया धर्षयन्ति न तं द्विजम् ।। जहाँ कहीं क्रूर कर्म करनेवाले भयंकर विशालकाय पिशाच रहते हैं, वहाँ जानेपर भी वे उस ब्राह्मणका अनिष्ट नहीं कर सकते ।। पुनन्तीह पृथिव्यां च चीर्णवेदव्रता नरा: । चतुर्णामपि वेदानां सा हि राजन् गरीयसी ।। वैदिक व्रतोंका आचरण करनेवाले पुरुष पृथ्वीपर दूसरोंको पवित्र करनेवाले होते हैं। राजन! चारों वेदोंमें वह गायत्री श्रेष्ठ है ।। अचीर्णव्रतवेदा ये विकर्मफलमाश्रिता: । ब्राह्मणा नाममात्रेण तेडपि पूज्या युधिष्ठिर । कि पुनर्यस्तु संध्ये द्वे नित्यमेवोपतिछते ।। युधिष्ठिर! जो ब्राह्मण न तो ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं और न वेदाध्ययन करते हैं, जो बुरे फलवाले कर्मोका आश्रय लेते हैं, वे नाममात्रके ब्राह्मण भी गायत्रीके जपसे पूज्य हो जाते हैं। फिर जो ब्राह्मण प्रात:-सायं दोनों समय संध्या-वन्दन करते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है? ।। शीलमध्ययन दानं शौचं मार्दवमार्जवम् | तस्माद् वेदाद् विशिष्टानि मनुराह प्रजापति: ।। प्रजापति मनुका कहना है कि--“शील, स्वाध्याय, दान, शौच, कोमलता और सरलता --ये सदगुण ब्राह्मणके लिये वेदसे भी बढ़कर हैं ।। ” भूर्भुव: स्वरिति ब्रह्म यो वेदनिरतो द्विज: । स्वदारनिरतो दान्त: स विद्वान् स च भूसुर: ।। जो ब्राह्मण “भूर्भुव: स्वः:” इन व्याहृतियोंके साथ गायत्रीका जप करता है, वेदके स्वाध्यायमें संलग्न रहता है और अपनी ही स्त्रीसे प्रेम करता है, वही जितेन्द्रिय, वही विद्वान् और वही इस भूमण्डलका देवता है ।। संध्यामुपासते ये वै नित्यमेव द्विजोत्तमा: | ते यान्ति नरशार्दूल ब्रद्मलोक॑ न संशय: ।। पुरुषसिंह! जो श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रतिदिन संध्योपासन करते हैं, वे नि:संदेह ब्रह्मतोकको प्राप्त होते हैं ।। सावित्रीमात्रसारो$पि वरो विप्र: सुयन्त्रित: | नायन्त्रितश्नतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी ।। केवल गायत्रीमात्र जाननेवाला ब्राह्मण भी यदि नियमसे रहता है तो वह श्रेष्ठ है; किंतु जो चारों वेदोंका विद्वान् होनेपर भी सबका अन्न खाता है, सब कुछ बेचता है और नियमोंका पालन नहीं करता है, वह उत्तम नहीं माना जाता ।। सावित्री चैव वेदांश्व॒ तुलयातोलयन् पुरा । सदेवर्षिगणाश्रैव सर्वे ब्रह्मपुर:सरा: । चतुर्णामपि वेदानां सा हि राजन् गरीयसी ।। राजन! पूर्वकालमें देवता और ऋषियोंने ब्रह्माजीके सामने गायत्री-मन्त्र और चारों वेदोंको तराजूपर रखकर तौला था। उस समय गायत्रीका पलड़ा ही चारों वेदोंसे भारी साबित हुआ ।। यथा विकसिते पुष्पे मधु गृह्नलन्ति षघट्पदा: । एवं गृहीता सावित्री सर्ववेदे च पाण्डव ।। पाण्डव! जैसे भ्रमर खिले हुए फूलोंसे उनके सारभूत मधुको ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण वेदोंसे उनके सारभूत गायत्रीका ग्रहण किया गया है ।। तस्मात् तु सर्ववेदानां सावित्री प्राण उच्यते । निर्जीवा हीतरे वेदा विना सावित्रिया नृप ।। इसलिये गायत्री सम्पूर्ण वेदोंका प्राण कहलाती है। नरेश्वर! गायत्रीके बिना सभी वेद निर्जीव हैं ।। नायन्त्रितश्नतुर्वेदी शील भ्रष्ट: स कुत्सित: । शीलवृत्तसमायुक्त: सावित्रीपाठको वर: ।। नियम और सदाचारसे भ्रष्ट ब्राह्मण चारों वेदोंका विद्वान हो तो भी वह निन्दाका ही पात्र है, किंतु शील और सदाचारसे युक्त ब्राह्मण यदि केवल गायत्रीका जप करता हो तो भी वह श्रेष्ठ माना जाता है ।। सहस््रपरमां देवीं शतमध्यां शतावराम् । सावित्रीं जप कौन्तेय सर्वपापप्रणाशिनीम् ।। प्रतिदिन एक हजार गायत्री-मन्त्रका जप करना उत्तम है, सौ मन्त्रका जप करना मध्यम और दस मन्त्रका जप करना कनिष्ठ माना गया है। कुन्तीनन्दन! गायत्री सब पापोंको नष्ट करनेवाली है, इसलिये तुम सदा उसका जप करते रहो ।। युधिछिर उवाच त्रैलोक्यनाथ हे कृष्ण सर्वभूतात्मको हासि । नानायोगपर श्रेष्ठ तुष्यसे केन कर्मणा ।। युधिष्ठिरने पूछा--त्रिलोकीनाथ! आप सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं। विभिन्न योगोंके द्वारा प्राप्तव्य सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्ण! बताइये, किस कर्मसे आप संतुष्ट होते हैं? ।। श्रीभगवानुवाच यदि भारसहसंत्र॑ तु गुग्गुल्वादि प्रधूपयेत् । करोति चेन्नमस्कारमुपहारं च कारयेत् ।। स्तौति यः स्तुतिभिर्मा च ऋग्यजुःसामभि: सदा । न तोषयति चेद् विप्रान् नाहं तुष्यामि भारत ।। श्रीभगवान्ने कहा--भारत! कोई एक हजार भार गुग्गुल आदि सुगन्धित पदार्थोंको जलाकर मुझे धूप दे, निरन्तर नमस्कार करे, खूब भेंट-पूजा चढ़ावे तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी स्तुतियोंसे सदा मेरा स्तवन करता रहे; किंतु यदि वह ब्राह्मणको संतुष्ट न कर सका तो मैं उसपर प्रसन्न नहीं होता ।। ब्राह्मणे पूजिते नित्यं पूजितो5स्मि न संशय: । आदक्रुष्टे चाहमाक़ुष्टो भवामि भरतर्षभ ।। भरतश्रेष्ठ! इसमें संदेह नहीं कि ब्राह्मणकी पूजासे सदा मेरी भी पूजा हो जाती है और ब्राह्मणको कटुवचन सुनानेसे मैं ही उस कटुवचनका लक्ष्य बनता हूँ ।। परा मयि गतिस्तेषां पूजयन्ति द्विजं हि ये । यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले ।। जो ब्राह्मणकी पूजा करते हैं, उनकी परमगति मुझमें ही होती है; क्योंकि पृथ्वीपर ब्राह्मणोंके रूपमें मैं ही निवास करता हूँ ।। यस्तान् पूजयति प्राज्ञो मद्गतेनान्तरात्मना । तमहं स्वेन रूपेण पश्यामि नरपुड्रव ।। पुरुषश्रेष्ठ! जो बुद्धिमान मनुष्य मुझमें मन लगाकर ब्राह्मणोंकी पूजा करता है, उसको मैं अपना स्वरूप ही समझता हूँ ।। कुब्जा: काणा वामनाश्च दरिद्रा व्याधितास्तथा । नावमान्या द्विजा: प्राज्जैर्मम रूपा हि ते द्विजा: ।। ब्राह्मण यदि कुबड़े, काने, बौने, दरिद्र और रोगी भी हों तो विद्वान् पुरुषोंको कभी उनका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सब मेरे ही स्वरूप हैं ।। ये केचित् सागरान्तायां पृथिव्यां द्विजसत्तमा: । मम रूपं हि तेष्वेवमर्चितिष्वर्चितो5स्म्पहम् ।। समुद्रपर्यन्त पृथ्वीके ऊपर जितने भी श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, वे सब मेरे स्वरूप हैं। उनका पूजन करनेसे मेरा भी पूजन हो जाता है ।। बहवस्तु न जानन्ति नरा ज्ञानबहिष्कृता: । यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले ।। बहुत-से अज्ञानी पुरुष इस बातको नहीं जानते कि मैं इस पृथ्वीपर ब्राह्मणोंके रूपमें निवास करता हूँ ।। आक्रोशपरिवादाभ भ्यां ये रमन्ते द्विजातिषु । तान् मृतान् यमलोकस्थान् निपात्य पृथिवीतले ।। आक्रम्योरसि पादेन क्रूर: संरक्तलोचन: । अग्निवर्णस्तु संदंशैर्यमो जिद्ठां समुद्धरेत् ।। जो ब्राह्मणोंको गाली देकर और उनकी निन्दा करके प्रसन्न होते हैं, वे जब यमलोकमें जाते हैं तब लाल-लाल आँखोंवाले क्रूर यमराज उन्हें पृथ्वीपर पटककर छातीपर सवार हो जाते हैं और आगमें तपाये हुए सँड़सोंसे उनकी जीभ उखाड़ लेते हैं ।। ये च विप्रान् निरीक्षन्ते पापा: पापेन चक्षुषा । अब्रद्वाण्या: श्रुतेर्बाह्या नित्यं ब्रह्मद्विषो नरा: ।। तेषां घोरा महाकाया वक्रतुण्डा महाबला: । उद्धरन्ति मुहूर्तेन खगाश्षक्षुर्यमाज्ञया ।। जो पापी ब्राह्मणोंकी ओर पापपूर्ण दृष्टिसे देखते हैं, ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति नहीं करते, वैदिक मर्यादाका उल्लंघन करते हैं और सदा ब्राह्मणोंके द्वेषी बने रहते हैं, वे जब यमलोकमें पहुँचते हैं तब वहाँ यमराजकी आज्ञासे टेढ़ी चोंचवाले बड़े-बड़े बलवान् पक्षी आकर क्षणभरमें उन पापियोंकी आँखें निकाल लेते हैं ।। यः प्रहारं द्विजेन्द्राय दद्यात् कुर्याच्च शोणितम्। अस्थिभज़ूं च यः कुर्यात् प्राणैर्वा विप्रयोजयेत् । सो<अ<नुपूर्व्यण यातीमान् नरकानेकविंशतिम् ।। जो मनुष्य ब्राह्मणको पीटता है, उसके शरीरसे खून निकाल देता है, उसकी हड्डी तोड़ डालता है अथवा उसके प्राण ले लेता है, वह क्रमश: इक्कीस नरकोंमें अपने पापका फल भोगता है ।। शूलमारोप्यते पश्चाज्ज्वलने परिपच्यते । बहुवर्षसहस्राणि पच्यमानस्त्ववाकूशिरा: । नावमुच्येत दुर्मेधा न तस्य क्षीयते गति: ।। पहले वह शूलपर चढ़ाया जाता है। फिर मस्तक नीचे करके उसे आगमें लटका दिया जाता है और वह हजारों वर्षोतक उसमें पकता रहता है। वह दुष्ट-बुद्धिवाला पुरुष उस दारुण यातनासे तबतक छुटकारा नहीं पाता, जबतक कि उसके पापका भोग समाप्त नहीं हो जाता ।। ब्राह्मणान् वा विचार्यव व्रजन् वै वधकाड्क्षया । शतवर्षसहस्राणि तामिस्रे परिपच्यते ।। ब्राह्यणोंका अपमान करनेके विचारसे अथवा उनको मारनेकी इच्छासे जो उनपर आक्रमण करते हैं, वे एक लाख वर्षतक तामिस्र नरकमें पकाये जाते हैं ।। तस्मान्नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गतिमीरयेत् । न ब्रूयात् परुषां वाणी न चैवैनानतिक्रमेत् ।। इसलिये ब्राह्मणोंके प्रति कभी अमंगलसूचक वचन न कहे, उनसे रूखी और कठोर बात न बोले तथा कभी उनका अपमान न करे ।। ये विप्रान् श्लक्ष्णया वाचा पूजयन्ति नरोत्तमा: । अर्चितश्न स्तुतश्वैव तैर्भवामि न संशय: ।। जो श्रेष्ठ मनुष्य ब्राह्मणोंकी मधुर वाणीसे पूजा करते हैं, उनके द्वारा नि:संदेह मेरी ही पूजा और स्तुति-क्रिया सम्पन्न हो जाती है ।। तर्जयन्ति च ये विप्रान् कोशयन्ति च भारत । आक्रुष्टस्तर्जितश्नाहं तैर्भवामि न संशय: ।। भारत! जो ब्राह्मणोंको फटकारते और गालियाँ सुनाते हैं, वे मुझे ही गाली देते और मुझे ही फटकारते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय] युधिछिर उवाच देवदेवेश दैत्यघ्न परं कौतूहलं हि मे । एतत् कथय सर्वज्ञ त्वद्धक्तस्य च केशव । मानुषस्यथ च लोकस्य धर्मलोकस्य चान्तरम् ।। युधिछिरने पूछा--दैत्योंका विनाश करनेवाले देवदेवेश्वर! मेरे मनमें सुननेकी बड़ी उत्कण्ठा है। मैं आपका भक्त हूँ। केशव! आप सर्वज्ञ हैं, इसलिये बतलाइये, मनुष्यलोकके और यमलोकके बीचकी दूरी कितनी है? ।। त्वगस्थिमांसनिर्मुक्ते पज्च भूतविवर्जिते । कथयस्व महादेव सुखदुःखमशेषत: ।। सर्वश्रेष्ठ देव! जब जीव पाञउ्चभौतिक शरीरसे अलग होकर त्वचा, हड्डी और मांससे रहित हो जाता है, उस समय उसे समस्त सुख-दुःखका अनुभव किस प्रकार होता है? ।। जीवस्य कर्मलोकेषु कर्मभिस्तु शुभाशुभै: । अनुबद्धस्य तै: पाशैर्नीयमानस्य दारुणै: ।। मृत्युदूतैर्दुरा धर्षैघोरिर्घोरिपराक्रमै: । वद्धस्याक्षिप्पयमाणस्य विद्रुतस्य यमाज्ञया ।। सुना जाता है कि मनुष्यलोकमें जीव अपने शुभाशुभ कर्मोसे बँधा हुआ है। उसे मरनेके बाद यमराजकी आज्ञासे भयंकर, दुर्धर्ष और घोर पराक्रमी यमदूत कठिन पाशोंसे बाँधकर मारते-पीटते हुए ले जाते हैं। वह इधर-उधर भागनेकी चेष्टा करता है ।। पुण्यपापकृतस्तिछ्ठेत् सुखदुःखमशेषत: । यमदूतैर्दुराधर्षनीयते वा कं पुनः ।। वहाँ पुण्य-पाप करनेवाले सब तरहके सुख-दुःख भोगते हैं; अत: बतलाइये, मरे हुए प्राणीको दुर्धर्ष यमदूत किस प्रकार ले जाते हैं? ।। कि रूपं कि प्रमाणं वा वर्ण: को वास्य केशव । जीवस्य गच्छतो नित्यं यमलोकं वदस्व मे ।। केशव! यमलोकमें जाते समय जीवका निश्चित रूप-रंग कैसा होता है? और उसका शरीर कितना बड़ा होता है? ये सब बातें बताइये ।। श्रीभगवानुवाच शृणु राजन् यथावृत्तं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । तत् ते5हं कथयिष्यामि मद्धक्तस्य नरेश्वर ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! नरेश्वर! तुम मेरे भक्त हो, इसलिये जो कुछ पूछते हो, वह सब बात यथार्थरूपसे बता रहा हूँ; सुनो ।। षडशीतिसहस्राणि योजनानां युधिष्ठिर । मानुषस्यथ च लोकस्यथ यमलोकस्य चान्तरम् ।। युधिष्ठिर! मनुष्यलोक और यमलोकमें छियासी हजार योजनका अन्तर है ।। न तत्र वृक्षच्छाया वा न तटाकं सरोडपि वा । न वाप्यो दीर्घिका वापि न कूपो वा युधिष्ठिर ।। युधिष्ठिर! इस बीचके मार्ममें न वृक्षकी छाया है, न तालाब है, न पोखरा है, न बावड़ी है और न कुआँ ही है ।। न मण्डपं सभा वापि न प्रपा न निकेतनम् | न पर्वतो नदी वापि न भूमेर्विंवरं क्वचित् ।। न ग्रामो नाश्रमो वापि नोद्यानं वा वनानि च | न किंचिदाश्रयस्थानं पथि तस्मिन् युधिष्ठिर ।। युधिष्ठिर! उस मार्गमें कहीं भी कोई मण्डप, बैठक, प्याऊ, घर, पर्वत, नदी, गुफा, गाँव, आश्रम, बगीचा, वन अथवा ठहरनेका दूसरा कोई स्थान भी नहीं है ।। जन्तोहिं प्राप्तकालस्य वेदनार्तस्य वै भृशम् | कारणैस्त्यक्तदेहस्य प्राणै:ः कण्ठगतै: पुनः ।। शरीराच्चाल्यते जीवो हाुवशो मातरिश्वना | निर्गतो वायुभूतस्तु षघट्कोशात् तु कलेवरात् ।। शरीरमन्यत् तद्गभूपं तद्गबर्ण तत्प्रमाणत: । अदृश्यं तत्प्रविष्टस्तु सो5प्यदृष्टो$थ केनचित् ।। जब जीवका मृत्युकाल उपस्थित होता है और वह वेदनासे अत्यन्त छटपटाने लगता है, उस समय कारण-तत्त्व शरीरका त्याग कर देते हैं, प्राण कण्ठतक आ जाते हैं और वायुके वशमें पड़े हुए जीवको बरबस इस शरीरसे निकल जाना पड़ता है। छ: कोशोंवाले शरीरसे निकलकर वायुरूपधारी जीव एक दूसरे अदृश्य शरीरमें प्रवेश करता है। उस शरीरके रूप, रंग और माप भी पहले शरीरके ही समान होते हैं। उसमें प्रविष्ट होनेपर जीवको कोई देख नहीं पाता ।। सो<न््तरात्मा देहवतामष्टाड्ो यस्तु संचरेत् । छेदनाद् भेदनाद् दाहात् ताडनाद् वा न नश्यति ।। देहधारियोंका अन्तरात्मा जीव आठ अंगोंसे युक्त होकर यमलोककी यात्रा करता है। वह शरीर काटने, टुकड़े-टुकड़े करने, जलाने अथवा मारनेसे नष्ट नहीं होता ।। नानारूपधरैघोरै: प्रचण्डैश्वण्डसाथधनै: । नीयमानो दुराधर्षर्यमदूतैर्यमाज्ञया ।। यमराजकी आज्ञासे नाना प्रकारके भयंकर रूपधारी अत्यन्त क्रोधी और दुर्धर्ष यमदूत प्रचण्ड हथियार लिये आते हैं और जीवको जबरदस्ती पकड़कर ले जाते हैं ।। पुत्रदारमयै: पाशै: संनिरुद्धोडवशो बलात् | स्वकर्मभिश्नानुगतः कृतैः सुकृतदुष्कृतैः ।। उस समय जीव स्त्री-पुत्रादिके स्नेह-बन्धनमें आबद्ध रहता है। जब विवश हुआ वह ले जाया जाता है, तब उसके किये हुए पाप-पुण्य उसके पीछे-पीछे जाते हैं ।। आक्रन्दमान: करुणं बन्धुभिवद्दु:खपीडितै: । त्यक्त्वा बन्धुजन सर्व निरपेक्षस्तु गच्छति ।। उस समय उसके बन्धु-बान्धव दुःखसे पीड़ित होकर करुणाजनक स्वरमें विलाप करने लगते हैं तो भी वह सबकी ओरसे निरपेक्ष हो समस्त बन्धु-बान्धवोंको छोड़कर चल देता है।। मातृभि: पितृभिश्रैव भ्रातृभिर्मातुलैस्तथा | दारै: पुत्रैर्वयस्यैश्व रुदद्धिस्त्यज्यते पुन: ।। माता, पिता, भाई, मामा, स्त्री, पुत्र और मित्र रोते रह जाते हैं, उनका साथ छूट जाता है।। अदृश्यमानस्तैदनिरश्रुपूर्णमुखेक्षणै: । स्वशरीरं परित्यज्य वायुभूतस्तु गच्छति ।। उनके नेत्र और मुख आँसुओंसे भीगे होते हैं। उनकी दशा बड़ी दयनीय हो जाती है, फिर भी वह जीव उन्हें दिखायी नहीं पड़ता। वह अपना शरीर छोड़कर वायुरूप हो चल देता है ।। अन्धकारमपारं तं महाघोरं तमोवृतम् । दुःखान्तं दुष्प्रतारं च दुर्गमं पापकर्मणाम् ।। वह पापकर्म करनेवालोंका मार्ग अन्धकारसे भरा है और उसका कहीं पार नहीं दिखायी देता। वह मार्ग बड़ा भयंकर, तमोमय, दुस्तर, दुर्गण और अन्ततक दुःख-ही-दुख देनेवाला है ।। देवासुरैर्मनुष्याद्यैरवैवस्वतवशानुगै: । स्त्रीपुंनपुंसकैश्वापि पृथिव्यां जीवसंज्ञितै: ।। मध्यमैर्युवभिर्वापि बालैरव॑द्वैस्तथैव च । जातमान्रैश्न गर्भस्थैर्गन्तव्य: स महापथ: ।। यमराजके अधीन रहनेवाले देवता, असुर और मनुष्य आदि जो भी जीव पृथ्वीपर हैं, वे स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक हों, बाल, वृद्ध, तरुण या जवान हों, तुरंतके पैदा हुए हों अथवा गर्भमें स्थित हों, उन सबको एक दिन उस महान् पथकी यात्रा करनी ही पड़ती है ।। पूर्वाह्नि वा पराह्ने वा संध्याकाले5थवा पुन: । प्रदोषे वार्धरात्रे वा प्रत्यूषे वाप्युपस्थिते ।। पूर्वाह्न हो या पराह्न, संध्याका समय हो या रात्रिका, आधी रात हो या सबेरा हो गया हो, वहाँकी यात्रा सदा खुली ही रहती है ।। मृत्युदूतैर्दुराधर्षै: प्रचण्डैश्वण्डशासनै: । आक्षिप्यमाणा हावशा: प्रयान्ति यमसादनम् ।। उपर्युक्त सभी प्राणी दुर्धर्ष, उग्र शासन करनेवाले प्रचण्ड यमदूतोंके द्वारा विवश होकर मार खाते हुए यमलोक जाते हैं ।। क्वचिद् भीतै: क्वचिन्मत्तै: प्रस्खलद्धिः क्वचित् क्वचित् । क्रन्दद्धिवेंदनार्तैस्तु गन्तव्यं यमसादनम् ।। यमलोकके पथपर कहीं डरकर, कहीं पागल होकर, कहीं ठोकर खाकर और कहीं वेदनासे आर्त होकर रोते-चिल्लाते हुए चलना पड़ता है ।। निर्भ्स्यमानैरुद्विग्नैवि धूतैर्भयविद्वलै: । तुद्यमानशरीरैश्व गन्तव्यं तर्जितैस्तथा ।। यमदूतोंकी डाँट सुनकर जीव उद्विग्न हो जाते हैं और भयसे विह्नल हो थर-थर काँपने लगते हैं। दूतोंकी मार खाकर शरीरमें बेतरह पीड़ा होती है तो भी उनकी फटकार सुनते हुए आगे बढ़ना पड़ता है ।। काष्ठोपलशिलाघातैर्दण्डोल्मुककशाड्-कुशै: । हन्यमान्यैर्यमपुरं गन्तव्यं धर्मवर्जिति: ।। धर्महीन पुरुषोंको काठ, पत्थर, शिला, डंडे, जलती लकड़ी, चाबुक और अंकुशकी मार खाते हुए यमपुरीको जाना पड़ता है ।। वेदनार्तैश्व कूजद्धिर्विक्रोशद्धिश्व विस्वरम् । वेदनार्तैं: पतद्धिश्न गन्तव्यं जीवधातकै: ।। जो दूसरे जीवोंकी हत्या करते हैं, उन्हें इतनी पीड़ा दी जाती है कि वे आर्त होकर छटपटाने, कराहने तथा जोर-जोरसे चिल्लाने लगते हैं और उसी स्थितिमें उन्हें गिरते-पड़ते चलना पड़ता है ।। शक्तिभिभ्भिन्दिपालैश्व शड्कुतोमरसायकै: । तुद्यमानस्तु शूलाग्रैरगन्तव्यं जीवघधातकै: ।। चलते समय उनके ऊपर शक्ति, भिन्दिपाल, शंकु, तोमर, बाण और त्रिशूलकी मार पड़ती रहती है ।। श्वभिवरव्या्रिर्व॒कै: कारकैर्भक्ष्यमाणा: समन्तत: । तुद्यमानाश्न गच्छन्ति राक्षसैर्मासघातिभि: ।। कुत्ते, बाघ, भेड़िये और कौवे उन्हें चारों ओरसे नोचते रहते हैं। मांस काटनेवाले राक्षस भी उन्हें पीड़ा पहुँचाते हैं ।। महिषैश्न मृगैश्नापि सूकरै: पृषतैस्तथा । भक्ष्यमाणैस्तदध्वानं गन्तव्यं मांसखादकै: ।। जो लोग मांस खाते हैं, उन्हें उस मार्गमें चलते समय भैंसे, मृग, सूअर और चितकबरे हरिन चोट पहुँचाते और उनके मांस काटकर खाया करते हैं ।। सूचीसुतीक्ष्णतुण्डाभिमक्षिकाभि: समन्ततः । तुद्यमानैश्न गन्तव्यं पापिष्ठैर्बालघातकै: ।। जो पापी बालकोंकी हत्या करते हैं, उन्हें चलते समय सूईके समान तीखे डंकवाली मक्खियाँ चारों ओरसे काटती रहती हैं ।। विस्नरब्धं स्वामिन मित्र स्त्रियं वा घ्नन्ति ये नरा: । शस्त्रै्निर्भि्यमानैश्न गन्तव्यं यमसादनम् ।। जो लोग अपने ऊपर विश्वास करनेवाले स्वामी, मित्र अथवा स्त्रीकी हत्या करते हैं, उन्हें यमपुरके मार्गपर चलते समय यमदूत हथियारोंसे छेदते रहते हैं ।। खादयन्ति च ये जीवान् दुःखमापादयन्ति ते । राक्षसैश्ष श्वभिश्वैव भक्ष्यमाणा व्रजन्ति ते ।। जो दूसरे जीवोंको भक्षण करते या उन्हें दुःख पहुँचाते हैं, उनको चलते समय राक्षस और कुत्ते काट खाते हैं ।। ये हरन्ति च वस्त्राणि शय्या: प्रावरणानि च । ते यान्ति विद्रुता नग्ना: पिशाचा इव तत्पथम् ।। जो दूसरोंके कपड़े, पलंग और बिछौने चुराते हैं, वे उस मार्गमें पिशाचोंकी तरह नंगे होकर भागते हुए चलते हैं ।। गाश्च धान्यं हिरण्यं वा बलात क्षेत्र गृहं तथा । ये हरन्ति दुरात्मान: परस्वं पापकारिण: ।। पाषाणैरुल्मुकैर्दण्डै: काष्ठघातैश्न झर्झरै: । हन्यमानै: क्षताकीर्णैर्गन्तव्यं तैर्यमालयम् ।। जो दुरात्मा और पापाचारी मनुष्य बलपूर्वक दूसरोंकी गौ, अनाज, सोना, खेत और गृह आदिको हड़प लेते हैं, वे यमलोकमें जाते समय यमदूतोंके हाथसे पत्थर, जलती हुई लकड़ी, डंडे, काठ और बेंतकी छड़ियोंकी मार खाते हैं तथा उनके समस्त अंगोंमें घाव हो जाता है ।। ब्रह्मास्वं ये हरन्तीह नरा नरकनिर्भया: ।। आक्रोशन्तीह ये नित्यं प्रहरन्ति च ये द्विजान् ।। शुष्ककण्ठा निबद्धास्ते छिन्नजिद्वाक्षिनासिका । पूयशोणिततदुर्गन्धा भक्ष्यमाणाश्व जम्बुकै: ।। चण्डालैर्भीषणैश्वण्डैस्तुद्यमाना: समन्तत:ः । क्रोशन्त: करुणं घोरं गच्छन्ति यमसादनम् ।। जो मनुष्य यहाँ नरकका भय न मानकर ब्राह्मणोंका धन छीन लेते हैं, उन्हें गालियाँ सुनाते हैं और सदा मारते रहते हैं, वे जब यमपुरके मार्गमें जाते हैं, उस समय यमदूत इस तरह जकड़कर बाँधते हैं कि उनका गला सूख जाता है; उनकी जीभ, आँख और नाक काट ली जाती है, उनके शरीरपर दुर्गन्धित पीब और रक्त डाला जाता है, गीदड़ उनके मांस नोच-नोचकर खाते हैं और क्रोधमें भरे हुए भयानक चाण्डाल उन्हें चारों ओरसे पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। इससे वे करुणायुक्त भीषण स्वरसे चिल्लाते रहते हैं ।। तत्र चापि गता: पापा विष्ठाकूपेष्वनेकश: । जीवन्तो वर्षकोटीस्तु क्लिश्यन्ते वेदनात् ततः ।। यमलोकमें पहुँचनेपर भी उन पापियोंको जीते-जी विष्ठाके कुएँमें डाल दिया जाता है और वहाँ वे करोड़ों वर्षोतक अनेक प्रकारसे पीड़ा सहते हुए कष्ट भोगते रहते हैं ।। ततश्न मुक्ता: कालेन लोके चास्मिन् नराधमा: । विष्ठाकृमित्वं गच्छन्ति जन्मकोटिशतं नृप ।। राजन! तदनन्तर समयानुसार नरकयातनासे छुटकारा पानेपर वे इस लोकमें सौ करोड़ जन्मोंतक विष्ठाके कीड़े होते हैं ।। अदत्तदाना गच्छन्ति शुष्ककण्ठास्यतालुका: । अन्न पानीयसहितं प्रार्थयन्त: पुन: पुनः ।। दान न करनेवाले जीवोंके कण्ठ, मुँह और तालु भूख-प्यासके मारे सूखे रहते हैं तथा वे चलते समय यमदूतोंसे बारंबार अन्न और जल माँगा करते हैं ।। स्वामिन् बुभुक्षातृष्णार्ता गन्तुं नैवाद्य शकनुम: । ममाजन्नं दीयतां स्वामिन् पानीयं दीयतां मम । इति ब्रुवन्तस्तैर्दूतै: प्राप्पन्ते वै यमालयम् ।। वे कहते हैं--'मालिक! हम भूख और प्याससे बहुत कष्ट पा रहे हैं, अब चला नहीं जाता; कृपा करके हमें अन्न और पानी दे दीजिये।” इस प्रकार याचना करते ही रह जाते हैं, किंतु कुछ भी नहीं मिलता। यमदूत उन्हें उसी अवस्थामें यमराजके घर पहुँचा देते हैं ।। ब्राह्मणेभ्य: प्रदानानि नानारूपाणि पाण्डव | ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्ते सुखं यान्ति तत्फलम् ।। पाण्डुपुत्र! जो ब्राह्मणोंको नाना प्रकारकी वस्तुएँ दान देते हैं, वे सुखपूर्वक उनके फलको प्राप्त करते हैं ।। अन्न ये च प्रयच्छन्ति ब्राह्मणेभ्य: सुसंस्कृतम् । श्रोत्रियेभ्यो विशेषेण प्रीत्या परमया युता: ।। तैविमानैर्महात्मानो यान्ति चित्रैर्यमालयम् । सेव्यमाना वरस्त्रीभिरप्सतेभि्महापथम् ।। जो लोग ब्राह्मणोंको, उनमें भी विशेषतः श्रोत्रियोंको अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अच्छी प्रकारसे बनाये हुए उत्तम अन्नका भोजन कराते हैं, वे महात्मा पुरुष विचित्र विमानोंपर बैठकर यमलोककी यात्रा करते हैं। उस महान् पथमें सुन्दर स्त्रियाँ और अप्सराएँ उनकी सेवा करती रहती हैं ।। ये च नित्यं प्रभाषन्ते सत्यं निष्कल्मषं वच: । ते च यान्त्यमलाभ्राभैविंमानैर्वृुषयोजितै: ।। जो प्रतिदिन निष्कपटभावसे सत्यभाषण करते हैं, वे निर्मल बादलोंके समान बैल जुते हुए विमानोंद्वारा यमलोकमें जाते हैं ।। कपिलाद्यानि पुण्यानि गोप्रदानानि ये नरा: । ब्राह्मणेभ्य: प्रयच्छन्ति श्रोत्रियेभ्यो विशेषत: ।। ते यान्त्यमलवर्णभैरविमानैर्वृषयोजितै: । वैवस्वतपुरं प्राप्य हप्सरोभिरनिषिविता: ।। जो ब्राह्मणोंको और उनमें भी विशेषत: श्रोत्रियोंकोी कपिला आदि गौओंका पवित्र दान देते रहते हैं, वे निर्मल कान्तिवाले बैल जुते हुए विमानोंमें बैठकर यमलोकको जाते हैं। वहाँ अप्सराएँ उनकी सेवा करती हैं ।। उपानहौ च छत्र॑ च शयनान्यासनानि च । विप्रेभ्यो ये प्रयच्छन्ति वस्त्राण्याभरणानि च ।। ते यान्त्यश्वेर्वषैर्वापि कुञ्जरैरप्पलंकृता: । धर्मराजपुरं रम्यं सौवर्णच्छत्रशोभिता: ।। जो ब्राह्मणोंको छाता, जूता, शय्या, आसन, वस्त्र और आभूषण दान करते हैं, वे सोनेके छत्र लगाये उत्तम गहनोंसे सज-धजकर घोड़े, बैल अथवा हाथीकी सवारीसे धर्मराजके सुन्दर नगरमें प्रवेश करते हैं ।। ये फलानि प्रयच्छन्ति पुष्पाणि सुरभीणि च । हंसयुक्तैविमानैस्तु यान्ति धर्मपुरं नरा: ।। जो सुगन्धित फूल और फलका दान करते हैं, वे मनुष्य हंसयुक्त विमानोंके द्वारा धर्मराजके नगरमें जाते हैं ।। ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो विचित्रान्नं घृताप्लुतम् । ते व्रजन्त्यमलाभ्राभैरविमानैर्वायुवेगिभि: । पुरं तत् प्रेतनाथस्य नानाजनसमाकुलम् ।। जो ब्राह्मणोंको घीमें तैयार किये हुए भाँति-भाँतिके पकवान दान करते हैं, वे वायुके समान वेगवाले सफेद विमानोंपर बैठकर नाना प्राणियोंसे भरे हुए यमपुरकी यात्रा करते हैं ।। पानीयं ये प्रयच्छन्ति सर्वभूतप्रजीवनम् | ते सुतृप्ता: सुखं यान्ति भवनै्हसचोदितै: ।। जो समस्त प्राणियोंको जीवन देनेवाले जलका दान करते हैं, वे अत्यन्त तृप्त होकर हंस जुते हुए विमानोंद्वारा सुखपूर्वक धर्मराजके नगरमें जाते हैं ।। ये तिलं तिलधेनुं वा घृतथेनुमथापि वा । श्रोत्रियेभ्य: प्रयच्छन्ति सौम्यभावसमन्विता: ।। सूर्यमण्डलसंकाशैयनिस्ते यान्ति निर्मलै: । गीयमानैस्तु गन्धर्वर्वैवस्चतपुरं नूप ।। राजन! जो लोग शान्तभावसे युक्त होकर श्रोत्रिय ब्राह्यणको तिल अथवा तिलकी गौ या घृतकी गौका दान करते हैं, वे सूर्यममण्डलके समान तेजस्वी निर्मल विमानोंद्वारा गन्धर्वोंके गीत सुनते हुए यमराजके नगरमें जाते हैं ।। तेषां वाप्यक्ष कूपाश्च॒ तटाकानि सरांसि च | दीर्घिका: पुष्करिण्यश्ष सजलाश्न जलाशया: ।। यानैस्ते यान्ति चन्द्राभैर्दिव्यघण्टानिनादितै: । चामरैस्तालवृन्तैश्व वीज्यमाना: महाप्रभा: । नित्यतृप्ता महात्मानो गच्छन्ति यमसादनम् ।। जिन्होंने इस लोकमें बावड़ी, कुएँ, तालाब, पोखरे, पोखरियाँ और जलसे भरे हुए जलाशय बनवाये हैं, वे चन्द्रमाके समान उज्ज्वल और दिव्य घण्टानादसे निनादित विमानोंपर बैठकर यमलोकमें जाते हैं; उस समय वे महात्मा नित्यतृप्त और महान् कान्तिमान् दिखायी देते हैं तथा दिव्यलोकके पुरुष उन्हें ताड़के पंखे और चँवर डुलाया करते हैं ।। येषां देवगृहाणीह चित्राण्यायतनानि च । मनोहराणि कान्तानि दर्शनीयानि भान्ति च ।। ते व्रजन्त्यमलाभ्राभैविमानैर्वायुवेगिभि: । तत्पुरं प्रेतनाथस्य नानाजनपदाकुलम् ।। जिनके बनवाये हुए देवमन्दिर यहाँ अत्यन्त चित्र-विचित्र, विस्तृत, मनोहर, सुन्दर और दर्शनीय रूपमें शोभा पाते हैं, वे सफेद बादलोंके समान कान्तिमान् एवं हवाके समान वेगवाले विमानोंद्वारा नाना जनपदोंसे युक्त यमलोककी यात्रा करते हैं ।। वैवस्वतं च पश्यन्ति सुखचित्तं सुखस्थितम् | यमेन पूजिता यान्ति देवसालोक्यतां ततः ।। वहाँ जानेपर वे यमराजको प्रसन्नचित्त और सुखपूर्वक बैठे हुए देखते हैं तथा उनके द्वारा सम्मानित होकर देवलोकके निवासी होते हैं ।। काष्ठपादुकदा यान्ति तदध्वानं सुखं नरा: । सौवर्णमणिपीठे तु पादं कृत्वा रथोत्तमे ।। खड़ाऊँ और जल-दान करनेवाले मनुष्योंको उस मार्गमें सुख मिलता है। वे उत्तम रथपर बैठकर सोनेके पीढ़ेपर पैर रखे हुए यात्रा करते हैं ।। आरामान् वृक्षषण्डांक्ष रोपयन्ति च ये नरा: । संवर्धयन्ति चाव्यग्रं फलपुष्पोपशोभितम् ।। वृक्षच्छायासु रम्यासु शीतलासु स्वलंकृता: । यान्ति ते वाहनैर्दिव्यै: पूज्यमाना मुहुर्मुहु: ।। जो लोग बड़े-बड़े बगीचे बनवाते और उसमें वृक्षोंके पौधे रोपते हैं तथा शान्तिपूर्वक जलसे सींचकर उन्हें फल-फूलोंसे सुशोभित करके बढ़ाया करते हैं, वे दिव्य वाहनोंपर सवार हो आभूषणोंसे सज-धजकर वृक्षोंकी अत्यन्त रमणीय एवं शीतल छायामें होकर दिव्य पुरुषोंद्वारा बारंबार सम्मान पाते हुए यमलोकमें जाते हैं ।। अश्वयानं तु गोयानं हस्तियानमथापि वा | ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो विमानैः कनकोपमै: ।। जो ब्राह्मणोंको घोड़े, बैल अथवा हाथीकी सवारी दान करते हैं, वे सोनेके समान विमानोंद्वारा यमलोकमें जाते हैं |। भूमिदा यान्ति तं लोकं॑ सर्वकामै: सुतर्पिता: । उदितादित्यसंकाशैरविंमानैर्वृषयोजितै: ।। भूमिदान करनेवाले लोग समस्त कामनाओंसे तृप्त होकर बैल जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंके द्वारा उस लोककी यात्रा करते हैं ।। सुगन्धागन्धसंयोगान् पुष्पाणि सुरभीणि च । प्रयच्छन्ति द्विजाग्रयेभ्यो भक्त्या परमया युता: ।। सुगन्धा: सुष्ठुवेषाश्न सुप्रभा: स्रग्विभूषणा: । यान्ति धर्मपुरं यानैर्विचित्रैरप्पलंकृता: ।। जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अत्यन्त भक्तिपूर्वक सुगन्धित पदार्थ तथा पुष्प प्रदान करते हैं, वे सुगन्धपूर्ण सुन्दर वेश धारणकर उत्तम कान्तिसे देदीप्यमान हो सुन्दर हार पहने हुए विचित्र विमानोंपर बैठकर धर्मराजके नगरमें जाते हैं ।। दीपदा यान्ति यानैश्व द्योतयन्तो दिशो दश । आदित्यसदृशाकारैदीप्यमाना इवाग्नय: ।। दीप-दान करनेवाले पुरुष सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंसे दसों दिशाओंको देदीप्यमान करते हुए साक्षात् अग्निके समान कान्तिमान् स्वरूपसे यात्रा करते हैं ।। गृहावसथदातारो गृहै: काज्चनवेदिकै: । व्रजन्ति बालसूर्याभैर्थर्मराजपुरं नरा: ।। जो घर एवं आश्रयस्थानका दान करनेवाले हैं, वे सोनेके चबूतरोंसे युक्त और प्रातःकालीन सूर्यके समान कान्तिवाले गृहोंके साथ धर्मराजके नगरमें प्रवेश करते हैं ।। पादाभ्यडूं शिरो5भ्यडूं पानं पादोदकं॑ तथा । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्ते यान्त्यैश्वैर्यमालयम् ।। जो ब्राह्मणोंको पैरोंमें लगानेके लिये उबटन, सिरपर मलनेके लिये तेल, पैर धोनेके लिये जल और पीनेके लिये शर्बत देते हैं, वे घोड़ेपर सवार होकर यमलोककी यात्रा करते हैं।। विश्रामयन्ति ये विप्रान् श्रान्तान ध्वनि कर्शितान् | चक्रवाकप्रयुक्तेन यान्ति यानेन तेडपि च ।। जो रास्तेके थके-माँदे दुर्बल ब्राह्मणोंको ठहरनेकी जगह देकर उन्हें आराम पहुँचाते हैं, वे चक्रवाकसे जुते हुए विमानपर बैठकर यात्रा करते हैं ।। स्वागतेन च यो विप्रान् पूजयेदासनेन च । स गच्छति तदध्वानं सुखं परमनिर्वृतः ।। जो घरपर आये हुए ब्राह्मणोंको स्वागतपूर्वक आसन देकर उनकी विधिवत् पूजा करते हैं, वे उस मार्गपर बड़े आनन्दके साथ जाते हैं ।। नम: सर्वसहाभ्यश्रेत्यभिख्याय दिने दिने । नमस्करोति नित्यं गां स सुखं याति तत्पथम् ।। जो प्रतिदिन “नमः सर्वसहाभ्यक्ष” ऐसा कहकर गौको नमस्कार करता है, वह यमपुरके मार्गपर सुखपूर्वक यात्रा करता है ।। नमोस्तु विप्रदत्तायेत्येवंवादी दिने दिने । भूमिमाक्रमते प्रात: शयनादुत्थितश्न यः ।। सर्वकामै: स तृप्तात्मा सर्वभूषणभूषित: । याति यानेन दिव्येन सुखं वैवस्वतालयम् ।। प्रतिदिन प्रातःकाल बिछौनेसे उठकर जो “नमोस्तु विप्रदत्तायै” कहते हुए पृथ्वीपर पैर रखता है, वह सब कामनाओंसे तृप्त और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित होकर दिव्य विमानके द्वारा सुखपूर्वक यमलोकको जाता है ।। अनन्तराशिनो ये तु दम्भानृतविवर्जिता: । तेडपि सारसयुक्तेन यान्ति यानेन वै सुखम् ।। जो सबेरे और शामको भोजन करनेके सिवा बीचमें कुछ नहीं खाते तथा दम्भ और अस॒त्यसे बचे रहते हैं, वे भी सारसयुक्त विमानके द्वारा सुखपूर्वक यात्रा करते हैं ।। ये चाप्येकेन भुक्तेन दम्भानृतविवर्जिता: । हंसयुक्तैविमानैस्तु सुखं यान्ति यमालयम् ।। जो दिन-रातमें केवल एक बार भोजन करते हैं और दम्भ तथा असत्यसे दूर रहते हैं, वे हंसयुक्त विमानोंके द्वारा बड़े आरामके साथ यमलोकको जाते हैं ।। चतुर्थेन च भुक्तेन वर्तन्ते ये जितेन्द्रिया: । यान्ति ते धर्मनगरं यानैर्बहिणयोजितै: ।। जो जितेन्द्रिय होकर केवल चौथे वक्त अन्न ग्रहण करते हैं अर्थात् एक दिन उपवास करके दूसरे दिन शामको भोजन करते हैं, वे मयूरयुक्त विमानोंके द्वारा धर्मराजके नगरमें जाते हैं ।। तृतीयदिवसेनेह भुज्जते ये जितेन्द्रिया: । ते5पि हस्तिरथैर्यान्ति तत्पथं कनकोज्ज्वलै: ।। जो जितेन्द्रिय पुरुष यहाँ तीसरे दिन भोजन करते हैं, वे भी सोनेके समान उज्ज्वल हाथीके रथपर सवार हो यमलोक जाते हैं ।। षष्ठान्नकालिको यस्तू वर्षमेकं तु वर्तते । कामक्रोधविनिर्मुक्त: शुचिर्नित्यं जितेन्द्रिय: । स याति कुण्जरस्थैस्तु जयशब्दरवैर्युत: ।। जो एक वर्षतक छ: दिनोंके बाद भोजन करता है और काम-क्रोधसे रहित, पवित्र तथा सदा जितेन्द्रिय रहता है, वह हाथीके रथपर बैठकर जाता है, रास्तेमें उसके लिये जय- जयकारके शब्द होते रहते हैं ।। पक्षोपवासिनो यान्ति यानै: शार्टूलयोजितै: । धर्मराजपुरं रम्यं दिव्यस्त्रीगणसेवितम् ।। एक पक्ष उपवास करनेवाले मनुष्य सिंह-जुते हुए विमानके द्वारा धर्मराजके उस रमणीय नगरको जाते हैं, जो दिव्य स्त्रीसमुदायसे सेवित है ।। ये च मासोपवासं वै कुर्वते संयतेन्द्रिया: । ते5पि सूर्योदयप्रख्यैर्यान्ति यानैर्यमालयम् ।। जो इन्द्रियोंको वशमें रखकर एक मासतक उपवास करते हैं, वे भी सूर्योदयकी भाँति प्रकाशित विमानोंके द्वारा यमलोकमें जाते हैं ।। गोकृते स्त्रीकृते चैव हत्वा विप्रकृतेडपि च । ते यान्त्यमरकन्याभि: सेव्यमाना रविप्रभा: ।। जो गौओंके लिये, स्त्रीके लिये और ब्राह्मणके लिये अपने प्राण दे देते हैं, वे सूर्यके समान कान्तिमान् और देवकन्याओंसे सेवित हो यमलोककी यात्रा करते हैं ।। ये यजन्ति द्विजश्रेष्ठा: क्रतुभिर्भूरिदक्षिणै: । हंससारससंयुक्तैयनिस्ते यान्ति तत्पथम् ।। जो श्रेष्ठ द्विज अधिक दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, वे हंस और सारसोंसे युक्त विमानोंके द्वारा उस मार्गपर जाते हैं ।। परपीडामकृत्वैव भृत्यान् बिशभ्रति ये नरा: । तत्पथं ससुखं यान्ति विमानै: काउ्चनोज्ज्वलै: ।। जो दूसरोंको कष्ट पहुँचाये बिना ही अपने कुटुम्बका पालन करते हैं, वे सुवर्णमय विमानोंके द्वारा सुखपूर्वक यात्रा करते हैं ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [जल-दान, अन्न-दान और अतिथि-सत्कारका माहात्म्य] वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा यमपुराध्वानं जीवानां गमनं तथा । धर्मपुत्र: प्रह्ष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यमपुरके मार्गका वर्णन तथा वहाँ जीवोंके (सुखपूर्वक) जानेका उपाय सुनकर राजा युधिष्ठछिर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और भगवान् श्रीकृष्णसे फिर बोले-- ।। देवदेवेश दैत्यघध्न ऋषिसंघैरभिष्ट्त । भगवन् भवहन् श्रीमन् सहस््रादित्यसंनिभ ।। *देवदेवेश्वर! आप सम्पूर्ण दैत्योंका वध करनेवाले हैं, ऋषियोंके समुदाय सदा आपकी ही स्तुति करते हैं, आप षडैश्वर्यसे युक्त, भवबन्धनसे मुक्ति देनेवाले, श्रीसम्पन्न और हजारों सूर्योके समान तेजस्वी हैं ।। सर्वसम्भव धर्मज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक । सर्वदानफलं सौम्य कथयस्व ममाच्युत ।। “धर्मज्ञ! आपहीसे सबकी उत्पत्ति हुई है और आप ही सम्पूर्ण धर्मोके प्रवर्तक हैं। शान्तस्वरूप अच्युत! मुझे सब प्रकारके दानोंका फल बतलाइये ।। एवमुक्तो हृषीकेशो धर्मपुत्रेण धीमता । उवाच धर्मपुत्राय पुण्यान् धर्मान् महोदयान् ।। बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिरके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्ण धर्मपुत्रके प्रति महान् उन्नति करनेवाले पुण्यमय धर्मोौंका वर्णन करने लगे-- ।। पानीयं परमं लोके जीवानां जीवन स्मृतम् । पानीयस्य प्रदानेन तृप्तिर्भवति पाण्डव । पानीयस्य गुणा दिव्या: परलोके गुणावहा: ।। 'पाण्डुनन्दन! संसारमें जलको प्राणियोंका परम जीवन माना गया है, उसके दानसे जीवोंकी तृप्ति होती है। जलके गुण दिव्य हैं और वे परलोकमें भी लाभ पहुँचानेवाले हैं ।। तत्र पुष्पोदकी नाम नदी परमपावनी । कामान् ददाति राजेन्द्र तोयदानां यमालये ।। राजेन्द्र! यमलोकमें पुष्पोदकी नामवाली परम पवित्र नदी है। वह जल-दान करनेवाले पुरुषोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करती है ।। शीतल सलिल द्वात्र ह्मक्षय्यममृतोपमम् | शीतूतोयप्रदातृणां भवेन्नित्यं सुखावहम् ।। “उसका जल ठण्डा, अक्षय और अमृतके समान मधुर है तथा वह ठंडे जलका दान करनेवाले लोगोंको सदा सुख पहुँचाता है ।। प्रणश्यत्यम्बुपानेन बुभुक्षा च युधिष्ठिर । तृषितस्य न चान्नेन पिपासाभिप्रणश्यति । तस्मात् तोयं सदा देयं तृषितेभ्यो विजानता ।। 'युधिष्ठिर! जल पीनेसे भूख भी शान्त हो जाती है; किंतु प्यासे मनुष्यकी प्यास अन्नसे नहीं बुझती, इसलिये समझदार मनुष्यको चाहिये कि वह प्यासेको सदा पानी पिलाया करे ।। अननेर्मूर्ति: क्षितेयोनिरमृतस्य च सम्भव: । अतो<म्भ: सर्वभूतानां मूलमित्युच्यते बुधैः ।। “जल अग्निकी मूर्ति है, पृथ्वीकी योनि (कारण) है और अमृतका उत्पत्ति स्थान है। इसलिये समस्त प्राणियोंका मूल जल है--ऐसा बुद्धिमान् पुरुषोंने कहा है ।। अद्वि: सर्वाणि भूतानि जीवन्ति प्रभवन्ति च । तस्मात् सर्वेषु दानेषु तोयदानं विशिष्यते ।। “सब प्राणी जलसे पैदा होते हैं और जलसे ही जीवन धारण करते हैं। इसलिये जलदान सब दानोंसे बढ़कर माना गया है ।। ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्त्वन्नदानं सुसंस्कृतम् । तैस्तु दत्ता: स्वयं प्राणा भवन्ति भरतर्षभ ।। “भरतश्रेष्ठ! जो लोग ब्राह्मणोंको सुपक्व अन्नदान करते हैं, वे मानो साक्षात् प्राण-दान करते हैं ।। अन्नाद् रक्त च शुक्रे च अन्ने जीव: प्रतिष्ठित: । इन्द्रियाणि च बुद्धिश्न पुष्णन्त्यन्नेन नित्यश: । अन्नहीनानि सीदन्ति सर्वभूतानि पाण्डव ।। 'पाण्डुनन्दन! अन्नसे रक्त और वीर्य उत्पन्न होता है। अन्नमें ही जीव प्रतिष्ठित है। अन्नसे ही इन्द्रियोंका और बुद्धिका सदा पोषण होता है। बिना अन्नके समस्त प्राणी दुःखित हो जाते हैं ।। तेजो बल॑ च रूप॑ च सच्त्वं वीर्य धृतिद्युति: । ज्ञानं मेधा तथा<<युश्न सर्वमन्ने प्रतेष्ठितम् ।। “तेज, बल, रूप, सत्त्व, वीर्य, धृति, द्युति, ज्ञाना मेधा और आयु--इन सबका आधार अन्न ही है ।। देवमानवतिर्यक्षु सर्वलोकेषु सर्वदा । सर्वकालं हि सर्वेषां अन्ने प्राणा: प्रतिष्ठिता: ।। “समस्त लोकोंमें सदा रहनेवाले देवता, मनुष्य और तिर्यक् योनिके प्राणियोंमें सब समय सबके प्राण अन्नमें ही प्रतिष्ठित हैं ।। अन्न प्रजापते रूपमन्नं प्रजननं स्मृतम् । सर्वभूतमयं चान्न॑ जीवश्चान्नमय: स्मृत: ।। “अन्न प्रजापतिका रूप है। अन्न ही उत्पत्तिका कारण है। इसलिये अन्न सर्वभूतमय है और समस्त जीव अन्नमय माने गये हैं ।। अन्नेनाधिष्ठित: प्राण अपानो व्यान एव च । उदानश्न समानश्न धारयन्ति शरीरिणम् ।। “प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान--ये पाँचों प्राण अन्नके ही आधारपर रहकर देहधारियोंको धारण करते हैं ।। शयनोत्थानगमनग्रहणाकर्षणानि च । सर्वसत्त्वकृतं कर्म चान्नादेव प्रवर्तते ।। “सम्पूर्ण प्राणियोंद्वारा किये जानेवाले सोना, उठना, चलना, ग्रहण करना, खींचना आदि कर्म अन्नसे ही चलते हैं ।। चतुर्विधानि भूतानि जंगमानि स्थिराणि च । अन्नाद भवन्ति राजेन्द्र सृष्टिरेषा प्रजापते: ।। राजेन्द्र! चारों प्रकारके चराचर प्राणी, जो यह प्रजापतिकी सृष्टि है, अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं ।। विद्यास्थानानि सर्वाणि सर्वयज्ञाक्ष॒ पावना: । अन्नाद यस्मात् प्रवर्तन्ते तस्मादन्न॑ परं स्मृतम् ।। “समस्त विद्यालय और पवित्र बनानेवाले सम्पूर्ण यज्ञ अन्नसे ही चलते हैं। इसलिये अन्न सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।। देवा रुद्रादय: सर्वे पितरो5प्यग्नयस्तथा । यस्मादन्नेन तुष्यन्ति तस्मादन्नं विशिष्यते ।। 'रुद्र आदि सभी देवता, पितर और अग्नि अन्नसे ही संतुष्ट होते हैं; इसलिये अन्न सबसे बढ़कर है ।। यस्मादन्नात् प्रजा: सर्वा: कल्पे कल्पेडसृजत प्रभु: । तस्मादन्नात् परं दानं न भूतं न भविष्यति ।। “शक्तिशाली प्रजापतिने प्रत्येक कल्पमें अन्नसे ही सारी प्रजाकी सृष्टि की है; इसलिये अन्नसे बढ़कर न कोई दान हुआ है और न होगा ।। यस्मादन्नात् प्रवर्तन्ते धर्मार्थोा काम एव च । तस्मादन्नात् परं दान नामुत्रेह च पाण्डव ।। 'पाण्डुनन्दन! धर्म, अर्थ और कामका निर्वाह अन्नसे ही होता है। अत: इस लोक या परलोकमें अन्नसे बढ़कर कोई दान नहीं है ।। यक्षरक्षोग्रहा नागा भूतान्यन्ये च दानवा: । तुष्यन्त्यन्नेन यस्मात् तु तस्मादन्नं परं भवेत् ।। 'यक्ष, राक्षस, ग्रह, नाग, भूत और दानव भी अन्नसे ही संतुष्ट होते हैं; इसलिये अन्नका महत्त्व सबसे बढ़कर है ।। ब्राह्म॒णाय दरिद्राय योऊन्जं संवत्सरं नूप । श्रोत्रियाय प्रयच्छेद् वै पाकभेदविवर्जित: ।। दम्भानृतविमुक्तस्तु परां भक्तिमुपागत: । स्वधमेणार्जितफलं तस्य पुण्यफलं शृणु ।। “राजन! जो मनुष्य दम्भ और असत्यका परित्याग करके मुझमें परम भक्ति रखकर रसोईमें भेद न करते हुए दरिद्र एवं श्रोत्रिय ब्राह्मणको एक वर्षतक अपने द्वारा धर्मपूर्वक उपार्जित अन्नका दान करता है, उसके पुण्यके फलको सुनो ।। शतवर्षसहस्राणि कामग: कामरूपधृक् । मोदते5मरलोकस्थ: पूज्यमानो5प्सरोगणै: ।। ततश्नापि च्युत: कालान्नरलोके द्विजो भवेत् ।। “वह एक लाख वर्षतक बड़े सम्मानके साथ देवलोकमें निवास करता है तथा वहाँ इच्छानुसार रूप धारण करके यथेष्ट विचरता रहता है एवं अप्सराओंका समुदाय उसका सत्कार करता है। फिर समयानुसार पुण्य क्षीण हो जानेपर वह जब स्वर्गसे नीचे उतरता है, तब मनुष्यलोकमें ब्राह्मण होता है ।। अग्रभिक्षां च यो दद्याद् दरिद्राय द्विजातये । षण्मासान् वार्षिक श्राद्ध तस्य पुण्यफलं शृणु ।। 'जो छ: महीने या वार्षिक श्राद्धपर्यन्त प्रतेदिनकी पहली भिक्षा दरिद्र ब्राह्मणको देता है, उसका पुण्यफल सुनो ।। गोसहस्रप्रदानेन यत् पुण्यं समुदाह्मतम् । तत् पुण्यफलमाप्रोति नरो वै नात्र संशय: ।। “एक हजार गोदानका जो पुण्यफल बताया गया है, वह उसी पुण्यके समान फल पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। अध्वश्रान्ताय विप्राय क्षुधितायान्नकाड्क्षिणे । देशकालाभियाताय दीयते पाण्डुनन्दन ।। 'पाण्डुनन्दन! देश-कालके अनुसार प्राप्त एवं रास्ता चलकर थके-माँदे आये हुए भूखे और अन्न चाहनेवाले ब्राह्मणको अन्न-दान करना चाहिये ।। यस्तु पांसुलपादश्न दूराध्वश्रमकर्शित: । क्षुत्पिपासाश्रमश्रान्त आर्त: खिन्नगतिर्दधिज: ।। पृच्छन् वै ह्ृन्नदातारं गृहमभ्येत्य याचयेत् । त॑ पूजयेत् तु यत्नेन सो5तिथि: स्वर्गसंक्रम: ।। तम्मिंस्तुष्टे नरश्रेष्ठ तुष्टा: स्युः सर्वदेवता: ।। “जो दूरका रास्ता तय करनेके कारण दुर्बल तथा भूख-प्यास और परिश्रमसे थका- माँदा हो, जिसके पैर बड़ी कठिनतासे आगे बढ़ते हों तथा जो बहुत पीड़ित हो रहा हो, ऐसा ब्राह्मण अन्नदाताका पता पूछता हुआ धूलभरे पैरोंसे यदि घरपर आकर अन्नकी याचना करे तो यत्नपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि वह अतिथि स्वर्गका सोपान होता है। नरश्रेष्ठ! उसके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं ।। न तथा हविषा होमैर्न पुष्पैननिलेपनै: । अनय: पार्थ तुष्यन्ति यथा हातिथिपूजनात् ।। 'पार्थ! अतिथिकी पूजा करनेसे अग्निदेवको जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी हविष्यसे होम करने और फूल तथा चन्दन चढ़ानेसे भी नहीं होती ।। देवमाल्यापनयन द्विजोच्छिष्टापमार्जनम् । श्रान्तसंवाहनं चैव तथा पादावसेचनम् ।। प्रतिश्रयप्रदानं च तथा शय्यासनस्य च । एकैकं पाण्डवश्रेष्ठ गोप्रदानाद् विशिष्यते ।। 'पाण्डवश्रेष्ठ] देवताके ऊपर चढ़ी हुई पत्र-पुष्प आदि पूजन-सामग्रीको हटाकर उस स्थानको साफ करना, ब्राह्मणके जूठे किये हुए बर्तन और स्थानको माँज-धो देना, थके हुए ब्राह्मणका पैर दबाना, उसके चरण धोना, उसे रहनेके लिये घर, सोनेके लिये शय्या और बैठनेके लिये आसन देना--इनमेंसे एक-एक कार्यका महत्त्व गोदानसे बढ़कर है ।। पादोदकं पादघृतं दीपमन्न॑ प्रतिश्रयम् । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो नोपसर्पन्ति ते यमम् ।। 'जो मनुष्य ब्राह्मणोंको पैर धोनेके लिये जल, पैरमें लगानेके लिये घी, दीपक, अन्न और रहनेके लिये घर देते हैं, वे कभी यमलोकमें नहीं जाते ।। विप्रातिथ्ये कृते राजन् भक्त्या शुश्रूषितेडपि च । देवा: शुश्रूषिता: सर्वे त्रयस्त्रिंशदरिंदम ।। “शत्रुदमन! राजन! ब्राह्मगका आतिथ्य सत्कार तथा भक्तिपूर्वक उसकी सेवा करनेसे समस्त तैंतीसों देवताओंकी सेवा हो जाती है ।। अभ्यागतो ज्ञातपूर्वो हृज्ञातोडतिथिरुच्यते । तयो: पूजां द्विज: कुर्यादेति पौराणिकी श्रुति: ।। “पहलेका परिचित मनुष्य यदि घरपर आवे तो उसे अभ्यागत कहते हैं और अपरिचित पुरुष अतिथि कहलाता है। द्विजोंको इन दोनोंकी ही पूजा करनी चाहिये। यह पड्चम वेद -पुराणकी श्रुति है ।। पादाभ्यज्ञान्नपानैस्तु योडतिरथिं पूजयेन्नर: । पूजितस्तेन राजेन्द्र भवामीह न संशय: ।। 'राजेन्द्र! जो मनुष्य अतिथिके चरणोंमें तेल मलकर, उसे भोजन कराकर और पानी पिलाकर उसकी पूजा करता है, उसके द्वारा मेरी भी पूजा हो जाती है--इसमें संशय नहीं है ।। शीघ्र पापाद् विनिर्मुक्तो मया चानुग्रहीकृत: । विमानेनेन्दुकल्पेन मम लोक॑ स गच्छति ।। “वह मनुष्य तुरंत सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है और मेरी कृपासे चन्द्रमाके समान उज्ज्वल विमानपर आरूढ़ होकर मेरे परमधामको पधारता है ।। अभ्यागतं श्रान्तमनुव्रजन्ति देवाश्न सर्वे पितरोग्ग्नयश्न । तस्मिन् द्विजे पूजिते पूजिता: स्यु- गते निराशा: पितरो व्रजन्ति ।। “थका हुआ अभ्यागत जब घरपर आता है, तब उसके पीछे-पीछे समस्त देवता, पितर और अग्नि भी पदार्पण करते हैं। यदि उस अभ्यागत द्विजकी पूजा हुई तो उसके साथ उन देवता आदिकी भी पूजा हो जाती है और उसके निराश लौटनेपर वे देवता, पितर आदि भी हताश होकर लौट जाते हैं ।। अतिथििर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते । पितरस्तस्य नाश्नन्ति दशवर्षाणि पठ्च च ।। “जिसके घरसे अतिथिको निराश होकर लौटना पड़ता है, उसके पितर पंद्रह वर्षोतक भोजन नहीं करते ।। निर्वासयति यो विप्रं देशकालागतं गृहात् । पतितस्तत्क्षणादेव जायते नात्र संशय: ।। “जो देश-कालके अनुसार घरपर आये हुए ब्राह्मणको वहाँसे बाहर कर देता है, वह तत्काल पतित हो जाता है--इसमें संदेह नहीं है ।। चाण्डालो<प्यतिथि: प्राप्तो देशकाले5न्नकाड्क्षया । अभ्युद्गभ्यो गृहस्थेन पूजनीयश्व सर्वदा ।। “यदि देश-कालके अनुसार अन्नकी इच्छासे चाण्डाल भी अतिथिके रूपमें आ जाय तो गृहस्थ पुरुषको सदा उसका सत्कार करना चाहिये ।। मोघं ध्रुवं प्रोर्णपति मोघमस्य तु पच्यते । मोघमन्नं सदाश्षाति यो5तिर्थिं न च पूजयेत् ।। “जो अतिथिका सत्कार नहीं करता, उसका ऊनी वस्त्र ओढ़ना, अपने लिये रसोई बनवाना और भोजन करना--सब कुछ निश्चय ही व्यर्थ है ।। साड्र्ेपाड़ांस्तु यो वेदान् पठतीह दिने दिने । न चातिथिं पूजयति वृथा भवति स द्विज: ।। 'जो प्रतिदिन सांगोपांग वेदोंका स्वाध्याय करता है, किंतु अतिथिकी पूजा नहीं करता, उस द्विजका जीवन व्यर्थ है ।। पाकयज्ञमहायज्ञै: सोमसंस्थाभिरेव च । ये यजन्ति न चार्चन्ति गृहेष्वतिथिमागतम् ।। तेषां यशो5भिकामानां दत्तमिष्टं च यद् भवेत् । वृथा भवति तत् सर्वमाशया हि तया हतम् ।। “जो लोग पाक-यज्ञ, पञ्चमहायज्ञ तथा सोमयाग आदिके द्वारा यजन करते हैं, परंतु घरपर आये हुए अतिथिका सत्कार नहीं करते, वे यशकी इच्छासे जो कुछ दान या यज्ञ करते हैं, वह सब व्यर्थ हो जाता है। अतिथिकी मारी गयी आशा मनुष्यके समस्त शुभ- कर्मोंका नाश कर देती है ।। देशं कालं च पात्र च स्वशक्ति च निरीक्ष्य च । अल्पं सम॑ महद् वापि कुर्यादातिथ्यमाप्तवान् ।। “इसलिये श्रद्धालु होकर देश, काल, पात्र और अपनी शक्तिका विचार करके अल्प, मध्यम अथवा महान् रूपमें अतिथि-सत्कार अवश्य करना चाहिये ।। ” सुमुख: सुप्रसन्नात्मा धीमानतिथिमागतम् । स्वागतेनासनेनाद्िरन्नाद्येयन च पूजयेत् ।। “जब अतिथि अपने द्वारपर आवे, तब बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए मुखसे अतिथिका स्वागत करे तथा बैठनेको आसन और चरण धोनेके लिये जल देकर अन्न-पान आदिके द्वारा उसकी पूजा करे ।। हित: प्रियो वा द्वेष्यो वा मूर्ख: पण्डित एव वा । प्राप्तो यो वैश्वंदेवान्ते सोडतिथि: स्वर्गसंक्रम: ।। “अपना हितैषी, प्रेमपात्र, द्वेषी, मूर्ख अथवा पण्डित--जो कोई भी बलिवैश्वदेवके बाद आ जाय, वह स्वर्गतक पहुँचानेवाला अतिथि है ।। क्षुत्पिपासाश्रमार्ताय देशकालागताय च | सत्कृत्यान्नं प्रदातव्यं यज्ञस्य फलमिच्छता ।। “जो यज्ञका फल पाना चाहता हो, वह भूख-प्यास और परिश्रमसे दुःखी तथा देश- कालके अनुसार प्राप्त हुए अतिथिको सत्कारपूर्वक अन्न प्रदान करे ।। भोजयेदात्मन: श्रेष्ठान् विधिवद् हव्यकव्ययो: । अन्न प्राणो मनुष्याणामन्नद: प्राणदो भवेत् ।। तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ।। 'यज्ञ और श्राद्धमें अपनेसे श्रेष्ठ पुरषको विधिवत् भोजन कराना चाहिये। अन्न मनुष्योंका प्राण है, अन्न देनेवाला प्राणदाता होता है; इसलिये कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको विशेषरूपसे अन्न-दान करना चाहिये ।। अन्नदः सर्वकामैस्तु सुतृप्त: सुछ्॒वलंकृत: । पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता ।। सेव्यमानो वरस्त्रीभि्देवलोक॑ स गच्छति । “अन्न प्रदान करनेवाला मनुष्य सब भोगोंसे तृप्त होकर भलीभाँति आभूषणोंसे सम्पन्न हुआ पूर्ण चन्द्रमाके प्रकाशसे प्रकाशित विमानद्वारा देवलोकमें जाता है। वहाँ सुन्दर स्त्रियोंद्वारा उसकी सेवा की जाती है ।। क्रीडित्वा तु ततस्तस्मिन् वर्षकोटिं यथामर: ।। ततश्नापि च्युत: कालादिह लोके महायशा: । वेदशाल्त्रार्थतत्त्वज्ञो भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ।। “वहाँ करोड़ वर्षोतक देवताओंके समान भोग भोगनेके बाद समयपर वहाँसे गिरकर यहाँ महायशस्वी और वेदशास्त्रोंके अर्थ और तत्त्वको जाननेवाला भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है ।। यथाश्रद्धं तु यः कुर्यान्मनुष्येषु प्रजायते । महाधनपति: श्रीमान् वेदवेदाड़पारग: । सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ।। 'जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक अतिथि-सत्कार करता है, वह मनुष्योंमें महान् धनवान, श्रीमान, वेद-वेदांगका पारदर्शी, सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थ और तत्त्वका ज्ञाता एवं भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है ।। सर्वातिथ्यं तु यः कुर्याद् वर्षमेकमकल्मष: । धर्मार्जितथनो भूत्वा पाकभेदविवर्जित: ।। “जो मनुष्य धर्मपूर्वक धनका उपार्जन करके भोजनमें भेद न रखते हुए एक वर्षतक सबका अतिथि-सत्कार करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं |। सर्वातिथ्यं तु यः कुर्याद् यथाश्रद्धं नरेश्वर । अकालनियमेनापि सत्यवादी जितेन्द्रिय: ।। सत्यसंधो जितक्रोध: शाखाधर्मविवर्जित: । अधर्मभीरुर्धमिष्ठो मायामात्सर्यवर्जित: ।। श्रद्दधान: शुचिर्नित्यं पाकभेदविवर्जित: । स विमानेन दिव्येन दिव्यरूपी महायशा: ।। पुरंदरपुरं याति गीयमानो5प्सरोगणै: । “नरेश्वर! जो सत्यवादी जितेन्द्रिय पुरुष समयका नियम न रखकर सभी अतिथियोंकी श्रद्धापूर्वक सेवा करता है, जो सत्यप्रतिज्ञ है, जिसने क्रोधको जीत लिया है, जो शाखाधर्मसे रहित, अधर्मसे डरनेवाला और धर्मात्मा है, जो माया और मत्सरतासे रहित है, जो भोजनमें भेद-भाव नहीं करता तथा जो नित्य पवित्र और श्रद्धासम्पन्न रहता है, वह दिव्य विमानके द्वारा इन्द्रलोकमें जाता है। वहाँ वह दिव्यरूपधारी और महायशस्वी होता है। अप्सराएँ उसके यशका गान करती हैं ।। मन्वन्तरं तु तत्रैव क्रीडित्वा देवपूजित: । मानुष्यलोकमागम्य भोगवान ब्राह्मणो भवेत् ।। “वह एक मन्वन्तरतक वहीं देवताओंसे पूजित होता है और क्रीड़ा करता रहता है। उसके बाद मनुष्यलोकमें आकर भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है' ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [भूमि-दान, तिल-दान और उत्तम ब्राह्मणकी महिमा] श्रीभगवानुवाच अतः: पर प्रवक्ष्यामि भूमिदानमनुत्तमम् ।। यः प्रयच्छति विप्राय भूमिं रम्यां सदक्षिणाम् | श्रोत्रियाय दरिद्राय साग्निहोत्राय पाण्डव ।। स सर्वकामतृप्तात्मा सर्वरत्नविभूषित: । सर्वपापविनिर्मुक्तो दीप्यमानो$र्कवत् तदा ।। श्रीभगवानने कहा--पाण्डुनन्दन! अब मैं सबसे उत्तम भूमिदानका वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य रमणीय भूमिका दक्षिणाके साथ श्रोत्रिय अग्निहोत्री दरिद्र ब्राह्मणको दान देता है, वह उस समय सभी भोगोंसे तृप्त, सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित एवं सब पापोंसे मुक्त हो सूर्यके समान देदीप्यमान होता है ।। बालसूर्यप्रकाशेन विचित्रध्वजशोभिना । याति यानेन दिव्येन मम लोक॑ महायशा: ।। वह महायशस्वी पुरुष प्रातःकालीन सूर्यके समान प्रकाशित, विचित्र ध्वजाओंसे सुशोभित दिव्य विमानके द्वारा मेरे लोकमें जाता है ।। न हि भूमिप्रदानाद् वै दानमन्यद् विशिष्यते । न चापि भूमिहरणात् पापमन्यद् विशिष्यते ।। क्योंकि भूमिदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है और भूमि छीन लेनेसे बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है ।। दानान्यन्यानि हीयन्ते कालेन कुरुपुड्भव । भूमिदानस्य पुण्यस्य क्षयो नैवोपपद्यते ।। कुरुश्रेष्ठ! दूसरे दानोंके पुण्य समय पाकर क्षीण हो जाते हैं, किंतु भूमिदानके पुण्यका कभी भी क्षय नहीं होता ।। सुवर्णमणिरत्नानि धनानि च वसूनि च । सर्वदानानि वै राजन् ददाति वसुधां ददत् ।। राजन! पृथ्वीका दान करनेवाला मानो सुवर्ण, मणि, रत्न, धन और लक्ष्मी आदि समस्त पदार्थोंका दान करता है ।। सागरान् सरित: शैलान् समानि विषमाणि च । सर्वगन्धरसांश्वैव ददाति वसुधां ददत् ।। भूमि-दान करनेवाला मनुष्य मानो समस्त समुद्रोंकोी, सरिताओंको, पर्वतोंको, सम- विषम प्रदेशोंको, सम्पूर्ण गन्ध और रसोंको देता है ।। ओषधी: फलसम्पन्ना नानापुष्पसमन्विता: । कमलोत्पलषण्डांश्व ददाति वसुधां ददत् ।। पृथ्वीका दान करनेवाला मनुष्य मानो नाना प्रकारके पुष्पों और फलोंसे युक्त वृक्षोंका तथा कमल और उत्पलोंके समूहोंका दान करता है ।। अग्निष्टोमादिभिरय्यजैयें यजन्ते सदक्षिणै: । न तत् फलं लभन्ते ते भूमिदानस्य यत् फलम् ।। जो लोग दक्षिणासे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंके द्वारा देवताओंका यजन करते हैं, वे भी उस फलको नहीं पाते, जो भूमि-दानका फल है ।। सस्यपूर्णा महीं यस्तु श्रोत्रियाय प्रयच्छति । पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदा भूतसम्प्लवम् ।। जो मनुष्य श्रोत्रिय ब्राह्मणको धानसे भरे हुए खेतकी भूमि दान करता है, उसके पितर महाप्रलयकालतक तृप्त रहते हैं ।। मम रुद्रस्य सवितुस्त्रिदशानां तथैव च । प्रीतये विद्धि राजेन्द्र भूमिर्दत्ता द्विजाय वै ।। राजेन्द्र! ब्राह्मणको भूमि-दान करनेसे सब देवता, सूर्य, शंकर और मैं--ये सभी प्रसन्न होते हैं ऐसा समझो ।। तेन पुण्येन पूतात्मा दाता भूमेर्युधिष्ठिर । मम सालोक्यमाप्रोति नात्र कार्या विचारणा ।। युधिष्ठिर! भूमि-दानके पुण्यसे पवित्रचित्त हुआ दाता मेरे परम धाममें निवास करता है --इसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है ।। यत्किंचित् कुरुते पाप॑ पुरुषो वृत्तिकर्शित: । स च गोकर्णमात्रेण भूमिदानेन शुद्धयति ।। मनुष्य जीविकाके अभावमें जो कुछ पाप करता है, उससे गोकर्णमात्र भूमि-दान करनेपर भी छुटकारा पा जाता है ।। मासोपवासे यत् पुण्यं कृच्छे चान्द्रायणेडपि च । भूमिगोकर्णमात्रेण तत् पुण्यं तु विधीयते ।। एक महीनेतक उपवास, कृच्छू और चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान करनेसे जो पुण्य होता है, वह गोकर्णमात्र भूमि-दान करनेसे हो जाता है ।। सर्वतीर्थाभिषेके च यत् पुण्यं समुदाह्तम् । भूमिगोकर्णमात्रेण तत् पुण्यं तु विधीयते ।। सम्पूर्ण तीर्थोमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, वह सारा पुण्य गोकर्णमात्र भूमिका दान करनेसे प्राप्त हो जाता है ।। युधिछ्िर उवाच देवदेव नमस्ते<स्तु वासुदेव सुरेश्वर । गोकर्णस्य प्रमाणं वै वक्तुमहसि तत्त्वत: ।। युधिष्ठिरने कहा--देवेश्वर कृष्ण! आपको नमस्कार है। सुरेश्वर! मुझे गोकर्णमात्र भूमिका ठीक-ठीक माप बतलानेकी कृपा कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच शृणु गोकर्णमात्रस्य प्रमाणं पाण्डुनन्दन । त्रिंशदूदण्डप्रमाणेन प्रमितं सर्वतो दिशम् ।। प्रत्यक् प्रागपि राजेन्द्र तत् तथा दक्षिणोत्तरम् | गोकर्ण तद्विदः प्राहु: प्रमाणं धरणे्नप ।। श्रीभगवान् बोले--नृपश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! गोकर्णमात्र भूमिका प्रमाण सुनो। पूर्वसे पश्चिम और उत्तरसे दक्षिण चारों ओर तीस-तीस दण्ड- नापनेसे जितनी भूमि होती है, उसको भूमिके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष गोकर्णमात्र भूमिका माप बताते हैं ।। सवृषं गोशतं यत्र सुख तिष्ठत्ययन्त्रितम् । सवत्सं कुरुशार्टूल तच्च गोकर्णमुच्यते ।। कुरुश्रेष्ठ! जितनी भूमिमें खुली हुई सौ गौएँ बैलों और बछड़ोंके साथ सुखपूर्वक रह सकें, उतनी भूमिको भी गोकर्ण कहते हैं ।। किंकरा मृत्युदण्डाश्न कुम्भीपाकाश्न दारुणा: । घोराश्न वारुणा: पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ।। निरया रौरवाद्याश्न तथा वैतरणी नदी । तीव्राश्न यातना: कष्टा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ।। भूमिका दान करनेवाले पुरुषके पास यमराजके दूत नहीं फटकने पाते। मृत्युके दण्ड, दारुण कुम्भीपाक, भयानक वरुणपाश, रौरव आदि नरक, वैतरणी नदी और कठोर यम- यातनाएँ भी भूमिदान करनेवालोंको नहीं सतातीं ।। चित्रगुप्त: कलि: काल: कृतान्तो मृत्युरेव च । यमश्न भगवान् साक्षात् पूजयन्ति महीप्रदम् ।। चित्रगुप्त, कलि, काल, कृतान्त मृत्यु और साक्षात् भगवान् यम भी भूमिदान करनेवालेका आदर करते हैं ।। रुद्र: प्रजापति: शक्र: सुरा ऋषिगणास्तथा । अहं च प्रीतिमान् राजन् पूजयामो महीप्रदम् ।। राजन! रुद्र, प्रजापति, इन्द्र, देवता, ऋषिगण और स्वयं मैं--ये सभी प्रसन्न होकर भूमिदाताका आदर करते हैं ।। कृशभृत्यस्य कृशगो: कृशाश्वस्य कृतातिथे: । भूमिर्देया नरश्रेष्ठ स निधि: पारलौकिक: ।। नरश्रेष्ठट जिसके कुटुम्बके लोग जीविकाके अभावसे दुर्बल हो गये हों, जिसकी गौएँ और घोड़े भी दुबले-पतले दिखायी देते हों तथा जो सदा अतिथि-सत्कार करनेवाला हो, ऐसे ब्राह्मणको भूमि-दान देना चाहिये; क्योंकि वह परलोकके लिये खजाना है ।। सीदमानकुटुम्बाय श्रोत्रियायाग्निहोत्रिणे । ब्रतस्थाय दरिद्राय भूमिर्देया नराधिप ।। नरेश्वर! जिसके कुटुम्बीजन कष्ट पा रहे हों--ऐसे श्रोत्रिय, अग्निहोत्री, व्रतधारी एवं दरिद्र ब्राह्मणको भूमि देनी चाहिये ।। यथा हि धात्री क्षीरेण पुत्र वर्धयति स्वयम् । दातारमनुगृह्नाति दत्ता होवं वसुन्धरा ।। जैसे धाय अपना दूध पिलाकर पुत्रका पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार दानमें दी हुई भूमि दातापर अनुग्रह करती है ।। यथा बिभर्ति गौर्वत्सं सृजन्ती क्षीरमात्मन: । तथा सर्वगुणोपेता भूमिर्वहति भूमिदम् ।। जैसे गौ अपना दूध पिलाकर बछड़ेका पालन करती है, वैसे ही सर्वगुणसम्पन्न भूमि अपने दाताका कल्याण करती है ।। यथा बीजानि रोहन्ति जलसिक्तानि भूपते । तथा कामा: प्ररोहन्ति भूमिदस्य दिने दिने ।। भूपाल! जिस प्रकार जलसे सींचे हुए बीज अंकुरित होते हैं, वैसे ही भूमिदाताके मनोरथ प्रतिदिन पूर्ण होते रहते हैं ।। यथा तेजस्तु सूर्यस्य तम: सर्व व्यपोहति । तथा पापं नरस्येह भूमिदानं व्यपोहति ।। जैसे सूर्यका तेज समस्त अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार यहाँ भूमि-दान मनुष्यके सम्पूर्ण पापोंका नाश कर डालता है ।। आश्र॒त्य भूमिदान तु दत्त्वा यो वा हरेत् पुनः । स बद्धो वारुणै: पाशै: क्षिप्यते पूयशोणिते ।। कुरुश्रेष्ठ! जो भूमि-दानकी प्रतिज्ञा करके नहीं देता अथवा देकर फिर छीन लेता है, उसे वरुणके पाशसे बाँधकर पीब और रक्तसे भरे हुए नरक-कुण्डमें डाला जाता है ।। स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत वसुन्धराम् । न तस्य नरकाद् घोराद् विद्यते निष्कृति: क्वचित् ।। जो अपने या दूसरेकी दी हुई भूमिका अपहरण करता है, उसके लिये नरकसे उद्धार पानेका कोई उपाय नहीं है ।। दत्त्वा भूमिं द्विजेन्द्राणां यस्तामेवोपजीवति । स मूढो याति दुष्टात्मा नरकानेकविंशतिम् । नरकेभ्यो विनिर्मुक्त: शुनां योनिं स गच्छति ।। जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भूमिका दान करके उसीसे अपनी जीविका चलाता है, वह दुष्टात्मा मूर्ख इक्कीस नरकोंमें गिरता है। फिर नरकोंसे निकलकर कुत्तोंकी योनिको प्राप्त होता है ।। हलकृष्टा मही देया सबीजा सस्यमालिनी । अथवा सोदका देया दरिद्राय द्विजातये ।। जिसमें हलसे जोतकर बीज बो दिये गये हों तथा जहाँ हरी-भरी खेती लहलहा रही हो, ऐसी भूमि दरिद्र ब्राह्मणको देनी चाहिये अथवा जहाँ जलका सुभीता हो, वह भूमि दानमें देनी चाहिये ।। एवं दत्ता मही राजन प्रहृष्टेनान्तरात्मना । सर्वान् कामानवाप्रोति मनसा चिन्तितानि च ।। राजन! इस प्रकार प्रसन्नचित्त होकर मनुष्य यदि पृथ्वीका दान करे तो वह सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त करता है ।। बहुभिववसुधा दत्ता दीयते च नराधिपै: । यस्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य तदा फलम् ।। बहुत-से राजाओंने इस पृथ्वीको दानमें दिया है और बहुत-से अभी दे रहे हैं। यह भूमि जब जिसके अधिकारमें रहती है, उस समय वही उसे दानमें देता है और उसके फलका भागी होता है ।। यश्च रूप्यं प्रयच्छेद् वै दरिद्राय द्विजातये । कृशवृत्ते: कृशगवे स मुक्त: सर्वकिल्बिषै: ।। पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता । कामरूपी यथाकामं स्वर्गलोके महीयते ।। जिसकी जीविका क्षीण और गौएँ दुर्बल हो गयी हैं, ऐसे दरिद्र ब्राह्मणको जो चाँदी दान करता है, वह सब पापोंसे छूटकर और सुन्दर रूप धारण करके पूर्णिमाके चन्द्रमाके प्रकाशके समान प्रकाशित विमानके द्वारा इच्छानुसार स्वर्गलोकमें महिमान्वित होता है ।। ततो<वतीर्ण: कालेन लोके चास्मिन् महायशा: । सर्वलोकार्चित: श्रीमान् राजा भवति वीर्यवान् ।। फिर पुण्यका क्षय होनेपर समयानुसार वहाँसे उतरकर इस लोकमें सम्पूर्ण लोगोंसे पूजित, धनवान, महायशस्वी और महापराक्रमी राजा होता है ।। तिलपर्वतकं यस्तु श्रोत्रियाय प्रयच्छति । विशेषेण दरिद्राय तस्यापि शृूणु यत् फलम् ।। जो श्रोत्रिय ब्राह्यगको--विशेषतः दरिद्रको तिलका पर्वत दान करता है, उसको जो फल मिलता है; वह सुनो ।। पुण्यं वृषायुतोत्सगें यत् प्रोक्ते पाण्डुनन्दन । तत् पुण्यं समनुप्राप्य तत्क्षणाद् विरजा भवेत् ।। पाण्डुनन्दन! दस हजार वृषोत्सर्गका जो पुण्यफल कहा गया है, उस पुण्यको वह प्राप्त करके तत्काल निष्पाप हो जाता है ।। यथा त्वचं भुजड़ो वै त्यक्त्वा शुद्धतनुर्भवेत् । तथा तिलप्रदानादू वै पापं त्यक्त्वा विशुद्धयति ।। जैसे साँप केंचुलको छोड़कर शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार तिल-दान करनेवाला मनुष्य पापोंसे मुक्त हो शुद्ध हो जाता है ।। तिलषण्डं प्रयुज्चानो जाम्बूनदविभूषितम् | विमान दिव्यमारूढ: पितृलोके महीयते ।। तिलके ढेरका दान करनेवाला स्वर्णभूषित दिव्य विमानपर आरूढ़ हो पितृलोकमें सम्मानित होता है ।। षष्टिं वर्षसहस्राणि कामरूपी महायशा: । तिलप्रदाता रमते पितृलोके यथासुखम् ।। वह तिलका दान करनेवाला मनुष्य महान् यश और इच्छानुकूल रूप धारण करनेकी शक्ति पाकर साठ हजार वर्षोतक पितृलोकमें सुख और आनन्द भोगता है ।। तिल॑ गाव: सुवर्ण चाप्यन्नं कन्या वसुन्धरा । तारयन्तीह दत्तानि ब्राह्मणेभ्यो महाभुज ।। महाबाहो! तिल, गौ, सोना, अन्न, कन्या और पृथ्वी--इतने पदार्थ यदि ब्राह्मणोंको दिये जायाँ तो ये दाताका उद्धार कर देते हैं ।। ब्राह्म॒णं वृत्तसम्पन्नमाहिताग्निमलोलुपम् । तर्पयेद् विधिवद् राजन् स निधि: पारलौकिक: ।। सदाचारसम्पन्न, अग्निहोत्री तथा अलोलुप ब्राह्मणकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये; क्योंकि वह परलोकमें काम देनेवाला खजाना है ।। आहिताननें दरिद्रं च श्रोत्रियं च जितेन्द्रियम् । शूद्रान्नवर्जितं चैव द्विजं यत्नेन पूजयेत् ।। जो ब्राह्मण वेदका विद्वान, अग्निहोत्रपरायण, जितेन्द्रिय, शूद्रके अन्नसे दूर रहनेवाला और दरिद्र हो, उसकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये ।। आठहिताग्नि: सदा पात्रमग्निहोत्री च वेदवित् । पात्राणामपि तत्पात्रं शूद्रान्नं यस्य नोदरे ।। नित्य अग्निहोत्र करनेवाला वेदवेत्ता ब्राह्मण दानका सदा पात्र है। जिसके पेटमें शूद्रका अन्न नहीं जाता, वह पात्रोंमें भी उत्तम पात्र है ।। यच्च वेदमयं पात्र यच्च पात्र तपोमयम् । असंकीर्ण च यत् पात्र तत् पात्र तारयिष्यति ।। जो वेदसम्पन्न पात्र है, जो तपोमय पात्र है और जो किसीका भी भोजन न करनेवाला पात्र है, वह पवित्र पात्र दाताका उद्धार कर देता है ।। नित्यस्वाध्यायनिरतास्त्वसंकीर्णेद्धियाश्व ये । पज्चयज्ञपरा नित्यं पूजितास्तारयन्ति ते ।। जो ब्राह्मण नित्य स्वाध्यायमें संलग्न रहते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, जो सदा ही पञ्च महायज्ञ करनेमें तत्पर रहते हैं, वे पूजा करनेवालेका उद्धार कर देते हैं ।। ये क्षान्तिदान्ता: श्रुतिपूर्णकर्णा जितेन्द्रिया: प्राणिवधे निवृत्ता: । प्रतिग्रहे संकुचिता गृहस्था- स्ते ब्राह्मणास्तारयितुं समर्था: ।। जो क्षमाशील, संयतचित्त और जितेन्द्रिय हैं, जिनके कान वेदवाणीसे भरे हुए हैं, जो प्राणियोंकी हत्यासे निवृत्त हो चुके हैं और जिनको दान लेनेमें संकोच होता है, ऐसे गृहस्थ ब्राह्मण दाताका उद्धार करनेमें समर्थ हैं ।। नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती नित्यस्वाध्यायी बृषलान्नवर्जी । ऋतौ गच्छन् विधिवच्चापि जुद्वत् स ब्राह्मणस्तारयितुं समर्थ: ।। जो प्रतिदिन तर्पण करनेवाला, सदा यज्ञोपवीत धारण किये रहनेवाला, नित्यप्रति स्वाध्यायपरायण, शूद्रका अन्न न खानेवाला, ऋतुकालमें ही अपनी स्त्रीसे समागम करनेवाला और विधिपूर्वक अग्निहोत्र करनेवाला हो, वह ब्राह्मण दूसरोंको तारनेमें समर्थ होता है ।। ब्राह्मणो यस्तु मद्भक्तो मद्रागी मत्परायण: । मयि संन्यस्तकर्मा च स वित्रस्तारयेद् ध्रुवम् ।। जो ब्राह्मण मेरा भक्त, मुझमें अनुराग रखने-वाला, मेरे भजनमें परायण और मुझे ही कर्मफलोंको अर्पण करनेवाला है, वह ब्राह्मण अवश्य संसार-समुद्रसे तार सकता है ।। द्वादशाक्षरतत्त्वज्ञश्षतुर्व्यूहविभागवित् । अच्छिद्रपञ्चकालज्ञ: स विप्रस्तारयिष्यति ।। जो द्वादशाक्षर मन्त्र (३० नमो भगवते वासुदेवाय)-का तत्त्वज्ञ है, जो चतुर्व्यूहके विभागको जाननेवाला है एवं जो दोषरहित रहकर पाँचों समयकी उपासनाओं का ज्ञाता है, वह ब्राह्मण दूसरोंका भी उद्धार कर देता है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) - एक पुरुष अर्थात् चार हाथके नापको दण्ड कहते हैं। [अनेक प्रकारके दानोंकी महिमा] वैशम्पायन उवाच वासुदेवेन दानेषु कथितेषु यथाक्रमम् | अवितृप्तश्च धर्मेषु केशवं पुनरब्रवीत् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा क्रमसे दान और धर्मकी बात कही जानेपर युधिष्छिर तृप्त न होकर फिर भगवान् केशवसे कहने लगे-- ।। देव धर्मामृतमिदं शृण्वतोडपि परंतप । न विद्यते सुरश्रेष्ठ मम तृप्तिहि माधव ।। 'सुरश्रेष्ठ! देवेश्वर! परंतप माधव! आपके मुँहसे इस धर्ममय अमृतका श्रवण करते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती है ।। यानि चान्यानि दानानि त्वया नोक्तानि कानिचित् | तान्याचक्ष्व सुरश्रेष्ठ तेषां चानुक्रमात् फलम् ।। 'सुरश्रेष्ठी जो अन्य प्रकारके दान हैं, जिनको अभीतक आपने नहीं बताया है, उनका वर्णन कीजिये और क्रमश: उनका फल भी बतानेकी कृपा कीजिये” ।। श्रीभगवानुवाच शय्यां प्रस्तरणोपेतां य: प्रयच्छति पाण्डव । अर्चयित्वा द्विजं भक्त्या वस्त्रमाल्यानुलेपनै: । भोजयित्वा विचित्रान्नं तस्य पुण्यफलं शुणु ।। श्रीभगवानने कहा--पाण्डुनन्दन! जो मनुष्य भक्तिके साथ वस्त्र, माला और चन्दन चढ़ाकर ब्राह्मणकी पूजा करता है तथा उसे भाँति-भाँतिके अन्नका भोजन कराकर बिछौनेसहित शय्या दान करता है, उसका पुण्यफल सुनो ।। धेनुदानस्य यत् पुण्यं विधिदत्तस्य पाण्डव | तत् पुण्यं समनुप्राप्य पितृलोके महीयते ।। पाण्डुनन्दन! विधिवत् किये हुए गोदानका जो पुण्य होता है, उस पुण्यको प्राप्त करके वह पितृलोकमें सम्मान पाता है ।। आहिताग्निसहस्रस्थ पूजितस्यैव यत् फलम् | तत् पुण्यफलमाप्रोति यस्तु शय्यां प्रयच्छति ।। तथा एक हजार अमनि्निहोत्री ब्राह्मणोंका पूजन करनेसे जो फल मिलता है, उसी पुण्य- फलको वह प्राप्त करता है, जो शय्याका दान करता है ।। शिल्पमध्ययन वापि विद्यां मन्त्रौषधीनि च । यः प्रयच्छति विप्राय तस्य पुण्यफलं शृणु ।। जो मनुष्य ब्राह्मणको शिल्प, वेद, मन्त्र, ओषधि आदि विद्याओंका दान करता है, उसके पुण्यफलको सुनो ।। छन्दोभि: सम्प्रयुक्तेन विमानेन विराजता | सप्तर्षिलोकान् व्रजति पूज्यते ब्रह्मवादिभि: ।। वह वेदमन्त्रोंके बलसे चलनेवाले सुन्दर विमानपर आरूढ़ हो सप्तर्षियोंके लोकमें जाता और वहाँ ब्रह्मवादी महर्षियोंसे पूजित होता है ।। चतुर्युगानि वै त्रिंशत् क्रीडित्वा तत्र देववत् । इह मानुष्यके लोके विप्रो भवति वेदवित् ।। उस लोकमें तीस चतुर्युगीतक देवताओंकी भाँति क्रीड़ा करके वह मनुष्यलोकमें वेदवेत्ता ब्राह्मण होता है ।। विश्रामयति यो विप्रं श्रान्तमध्वनि कर्शितम् । विनश्यति तदा पापं तस्य वर्षकृतं नृप ।। राजन! जो रास्तेके थके-माँदे दुर्बल ब्राह्मणको विश्राम देता है, उसका एक वर्षका किया हुआ पाप तत्काल नष्ट हो जाता है ।। अथ प्रक्षालयेत् पादौ तस्य तोयेन भक्तिमान् | दशवर्षकृतं पापं व्यपोहति न संशय: ।। तदनन्तर जब वह भक्तिपूर्वक उस अतिथिके दोनों चरणोंको जलसे पखारता है, उस समय उसके दस वर्षके किये हुए पाप निःसंदेह नष्ट हो जाते हैं ।। घृतेन वाथ तैलेन पादौ तस्य तु पूजयेत् । तद् द्वादशसमारूढं पापमाशु व्यपोहति ।। तथा यदि वह उसके दोनों पैरोंमें घी या तेल मलकर उसकी पूजा करता है तो उसके बारह वर्षोंके पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं ।। स्वागतेन तु यो विप्रं पूजयेदासनेन च । प्रत्युत्थानेन वा राजन् स देवानां प्रियो भवेत् ।। राजन्! जो घरपर आये हुए ब्राह्मणका स्वागत करके उसे आसन और अभ्युत्थान देकर पूजन करता है, वह देवताओंका प्रिय होता है ।। स्वागतेनाग्नयो राजन्नासनेन शतक्रतुः । प्रत्युत्थानेन पितर: प्रीतिं यान्त्यतिथिप्रिया: ।। महाराज! अतिथिके स्वागतसे अग्नि, उसे आसन देनेसे इन्द्र और अगवानी करनेसे अतिथियोंपर प्रेम रखनेवाले पितर प्रसन्न होते हैं ।। अग्निशक्रपितृणां च तेषां प्रीत्या नराधिप । संवत्सरकृतं पापं तस्य सद्यो विनश्यति ।। नरेश्वर! इस प्रकार अग्नि, इन्द्र और पितरोंके प्रसन्न होनेपर मनुष्यका एक वर्षका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है ।। यः प्रयच्छति विप्राय आसन माल्यभूषितम् । स याति मणिचित्रेण रथेनेन्द्रनिकेतनम् ।। जो मनुष्य ब्राह्मणको मालाओंसे विभूषित आसन प्रदान करता है, वह मणियोंसे चित्रित रथके द्वारा इन्द्रलोकमें जाता है ।। पुरंदरासने तत्र दिव्यनारीविभूषित: । षष्टिं वर्षमहसत्राणि क्रडित्यप्सरसां गणै: ।। वहाँ इन्द्रासनपर दिव्य स्त्रियोंक साथ शोभा पाता है और साठ हजार वर्षोतक अप्सरागणोंके साथ क्रीड़ा करता है ।। वाहनं यः प्रयच्छेत ब्राह्मणाय युधिष्ठिर स याति रत्नचित्रेण वाहनेन सुरालयम् ।। युधिष्ठिर! जो मनुष्य ब्राह्मणको सवारी दान करता है, वह रत्नोंसे चित्रित विमानपर बैठकर स्वर्गलोकको जाता है ।। स तत्र काम॑ क्रीडित्वा सेव्यमानो5प्सरोगणै: । इह राजा भवेद् राजन नात्र कार्या विचारणा ।। राजन! वहाँ वह अप्सरागणोंके द्वारा सेवित होकर इच्छानुसार क्रीड़ा करता है। फिर इस लोकमें राजा होता है--इसमें कोई विचारकी बात नहीं है ।। पादपं पललवाकीर्ण पुष्पितं फलितं तथा । गन्धमाल्यैरथाभ्यर्च्य वस्त्राभरणभूषितम् | यः प्रयच्छति विप्राय श्रोत्रियाय सदक्षिणम् । भोजयित्वा यथाकामं तस्य पुण्यफलं शृणु ।। जो पुरुष पत्ते, फूल और फलोंसे भरे हुए वृक्षोंको वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित करके चन्दन और फूलोंसे उसकी पूजा करता है तथा वेदवेत्ता ब्राह्मणफो भोजन कराकर दक्षिणाके साथ उस वृक्षका दान कर देता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।। जाम्बूनदविचित्रेण विमानेन विराजता । पुरंदरपुरं याति जयशब्दरवैर्युत: ।। वह सुवर्णजटित सुन्दर विमानपर बैठकर जय-जयकारके शब्द सुनता हुआ इन्द्रलोकमें जाता है ।। तत्र शक्रपुरे रम्ये तस्प कल्पकपादप: । ददाति चेप्सितं सर्व मनसा यद् यदिच्छति ।। वहाँ रमणीय इन्द्रनगरीमें उसके मनमें जो-जो इच्छाएँ होती हैं, उन सब अभीष्ट वस्तुओंको कल्पवृक्ष देता है ।। यावन्ति तस्य पत्राणि पुष्पाणि च फलानि च । तावद् वर्षसहसत्राणि शक्रलोके महीयते ।। दानमें दिये हुए उस वृक्षके जितने पत्ते, फ़ूल और फल होते हैं, उतने ही हजार वर्षोतक वह इन्द्रलोकमें महिमा पाता है ।। शक्रलोकावतीर्णश्व मानुष्यं लोकमागत: । रथाश्चवगजसम्पूर्ण पुरं राज्यं च रक्षति ।। इन्द्रलोकसे उतरकर जब वह मनुष्यलोकमें आता है, तब रथ, घोड़े और हाथियोंसे पूर्ण नगरके राज्यकी रक्षा करता है ।। स्थापयित्वा तु मद्भक्त्या यो मत्प्रतिकृतिं नर: । आलयं विधिवत् कृत्वा पूजाकर्म च कारयेत् । स्वयं वा पूजयेद् भकत्या तस्य पुण्यफलं शृणु ।। जो पुरुष भक्तिपूर्वक मन्दिर बनवाकर उसमें मेरी प्रतिमाकी विधिपूर्वक स्थापना करता है और दूसरेसे उसकी पूजा करवाता है या स्वयं भक्तिके साथ पूजा करता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।। अश्वमेधसहस्रस्य यत् पुण्यं समुदाह्तम् । तत् फलं समवाप्रोति मत्सालोक्यं प्रपद्यते । न जाने निर्गम तस्य मम लोकाद् युधिष्ठिर ।। एक हजार अभश्वमेधयज्ञका जो पुण्य बताया गया है, उस फलको पाकर वह मेरे परमधामको पधारता है। युधिष्ठिर! मैं जानता हूँ, वह वहाँसे कभी लौटकर इस लोकमें नहीं आता |। देवालये विप्रगृहे गोवाटे चत्वरेडपि वा । प्रज्वालयति यो दीप॑ तस्य पुण्यफलं शृणु ।। जो मनुष्य देवमन्दिरमें, ब्राह्मणके घरमें, गोशालामें और चौराहेपर दीपक जलाता है, उसके पुण्यफलको सुनो ।। आरुह्यु काज्चनं यान द्योतयन् सर्वतो दिशम् | गच्छेदादित्यलोक॑ स सेव्यमान: सुरोत्तमै: ।। वह सुवर्णमय विमानपर बैठकर सम्पूर्ण दिशाओंको देदीप्यमान करता हुआ सूर्यलोकको जाता है, उस समय श्रेष्ठ देवता उसकी सेवामें उपस्थित रहते हैं ।। तत्र प्रकामं क्रीडित्वा वर्षकोटिं महातपा: । इह लोके भवेद् विप्रो वेदवेदाड्रपारग: ।। वह महातपस्वी पुरुष करोड़ों वर्षोतक सूर्यलोकमें यथेष्ट विहार करनेके पश्चात् मर्त्यलोकमें आकर वेद-वेदांगोंमें पारंगत ब्राह्मण होता है ।। करकां कर्णिकां वापि महद् वा जलभाजनम् | यः प्रयच्छति विप्राय तस्य पुण्यफलं शृणु ।। जो मनुष्य ब्राह्मणको करका (कमण्डलु), कर्णिका (गिलास) अथवा महान् जलपात्र दान करता है, उसका पुण्यफल सुनो ।। ब्रह्मकूर्चे तु यत् पीते फल प्रोक्तं नराधिप । तत् पुण्यफलमाप्रोति जलभाजनदो नर: ।। सुतृप्त: सर्वसौगन्ध: प्रहृष्टेन्द्रियमानस: ।। जनेश्वर! पठचगव्य पीनेवाले मनुष्यके लिये जो फल बताया गया है, उस फलको वह जलपात्र दान करनेवाला मनुष्य पाता है। वह सदा तृप्त रहता है। उसे सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ सुलभ होते हैं तथा उसकी इन्द्रियाँ और मन सदा प्रसन्न रहते हैं ।। हंससारसयुक्तेन विमानेन विराजता । स याति वारुणं लोकं दिव्यगन्धर्वसेवितम् ।। इतना ही नहीं, वह हंस और सारसोंसे जुते हुए सुन्दर विमानपर बैठकर दिव्य गन्धर्वोंसे सेवित वरुणलोकमें जाता है ।। पानीयं य: प्रयच्छेद् वै जीवानां जीवनं परम् । ग्रीष्मे च त्रिषु मासेषु तस्य पुण्यफलं शृणु ।। जो गर्मीके तीन महीनोंमें जीवोंके जीवनभूत जलका दान करता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।। पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता । स गच्छेदिन्द्रभवनं सेव्यमानो5प्सरोगणै: ।। वह पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशमान सुन्दर विमानपर आरूढ़ होकर अप्सरागणोंसे सेवित हुआ इन्द्रभवनकी यात्रा करता है ।। शिरो>भ्यड्रप्रदानेन तेजस्वी प्रियदर्शन: । सुभगो रूपवान् शूर: पण्डितश्न भवेद् द्विज: ।। सिरमें लगानेके लिये तेल-दान करनेसे मनुष्य तेजस्वी, दर्शनीय, सुन्दर, रूपवान्, शूरवीर और पण्डित ब्राह्मण होता है ।। वस्त्रदायी तु तेजस्वी सर्वत्र प्रियदर्शन: । सुभगो भवति श्रीमान् स्त्रीणां नित्यं मनोरम: ।। वस्त्र-दान करनेवाला पुरुष भी तेजस्वी, दर्शनीय, सुन्दर, श्रीसम्पन्न और सदा स्त्रियोंके लिये मनोरम होता है ।। उपानहौ च छत्र॑ च यो ददाति नरोत्तम: । स याति रथमुख्येन काञज्चनेन विराजता । शक्रलोकं महातेजा: सेव्यमानो5प्सरोगणै: ।। जो उत्तम पुरुष जूता और छाता दान करता है, वह महान् तेजसे सम्पन्न हो सोनेके बने हुए सुन्दर रथपर बैठकर अप्सरागणोंसे सेवित हुआ इन्द्रलोकमें जाता है ।। काष्ठपादुकदा यान्ति विमानैर्वृक्षनिर्मिति: । धर्मराजपुरं रम्यं सेव्यमाना: सुरोत्तमै: ।। जो काठकी खड़ाऊँ दान करते हैं, वे काष्ठनिर्मित विमानोंपर आरूढ़ होकर श्रेष्ठ देवताओंसे सेवित हो धर्मराजके रमणीय नगरमें प्रवेश करते हैं ।। दन्तकाष्ठ प्रदानेन प्रियवाक्यो भवेन्नर: । सुगन्धवदन: श्रीमान् मेधासौभाग्यसंयुत: ।। दातौनका दान करनेसे मनुष्य मधुरभाषी होता है। उसके मुँहसे सुगन्ध निकलती रहती है तथा वह लक्ष्मीवान् एवं बुद्धि और सौभाग्यसे सम्पन्न होता है ।। अनन्तराशी यश्चापि वर्तते व्रतवत् सदा । सत्यवाक्क्रोधरहित: शुचि: स्नानरत: सदा । स विमानेन दिव्येन याति शक्रपुरं नर: ।। जो मनुष्य अतिथि और कुटुम्बीजनोंको भोजन करा लेनेके पश्चात् स्वयं भोजन करता है, सदा व्रतका पालन करता है, सत्य बोलता है, क्रोधसे दूर रहता है तथा स्नान आदिके द्वारा सर्वदा पवित्र रहता है, वह दिव्य विमानके द्वारा इन्द्रलोककी यात्रा करता है ।। एकभूक्तेन यश्चापि वर्षमेकं तु वर्तते । ब्रह्मचारी जितक्रोध: सत्यशौचसमन्वित: । स विमानेन दिव्येन याति शक्रपुरं नर: ।। जो एक वर्षतक प्रतिदिन एक वक्त भोजन करता है, ब्रह्मचर्यका पालन करता है, क्रोधको काबूमें रखता है तथा सत्य और शौचका पालन करता है, वह दिव्य विमानमें बैठकर इन्द्रलोकमें पदार्पण करता है ।। चतुर्थकाले यो भुड्धक्ते ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय: । वर्तते चैकवर्ष तु तस्य पुण्यफलं शृणु ।। जो एक वर्षतक चौथे वक्त अर्थात् प्रति दूसरे दिन भोजन करता है, ब्रह्मचर्यका पालन करता है और इन्द्रियोंको काबूमें रखता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।। चित्रबरहिणयुक्तेन विचित्रध्वजशोभिना । याति यानेन दिव्येन स महेन्द्रपुरं नर: ।। वह मनुष्य विचित्र पंखवाले मोरोंसे जुते हुए अद्भुत ध्वजसे शोभायमान दिव्य विमानपर आरूढ़ हो महेन्द्रलोकमें गमन करता है ।। निवेशयति मन्मूर्त्यामात्मानं मद्गतः शुचि: । रुद्रदक्षिणमूर्त्या वा चतुर्दश्यां विशेषत: ।। सिद्धेर्ब्रह्मर्षिभिश्वैव देवलोकैश्व पूजित:ः । गन्धर्वैर्भूतसड्घचैश्व गीयमानो महातपा: ।। प्रविशेत् स महातेजा मां वा शड्करमेव वा । न स्यात् पुनर्भवो राजन् नात्र कार्या विचारणा ।। राजन! जो मनुष्य पवित्र और मेरे परायण होकर मेरे श्रीविग्रहमें मन लगाता (मेरा ध्यान करता) है तथा विशेषतः चतुर्दशीके दिन रुद्र अथवा दक्षिणामूर्तिमें चित्त एकाग्र करता है, वह महान् तपस्वी पुरुष सिद्धों, ब्रह्मर्षियों और देवताओंसे पूजित होकर गन्धर्वों और भूतोंका गान सुनता हुआ मुझमें या शंकरमें प्रवेश कर जाता है तथा उसका इस संसारमें फिर जन्म नहीं होता--इसमें कोई विचारकी बात नहीं है ।। गोकृते स्त्रीकृते चैव गुरुविप्रकृतेडपि वा । हन्यन्ते ये तु राजेन्द्र शक्रलोकं व्रजन्ति ते ।। राजेन्द्र! जो मनुष्य गौ, स्त्री, गुरु और ब्राह्मणकी रक्षाके लिये प्राण दे डालते हैं, वे इन्द्रलोकमें जाते हैं ।। तत्र जाम्बूनदमये विमाने कामगामिनि । मन्वन्तरं प्रमोदन्ते दिव्यनारीनिषेविता: ।। वहाँ इच्छानुसार विचरनेवाले सुवर्णके बने हुए विमानपर रहकर दिव्य नारियोंसे सेवित हुए एक मन्वन्तरतक आनन्दका अनुभव करते हैं ।। आश्रुतस्य प्रदानेन दत्तस्य हरणेन च । जन्मप्रभूति यद दत्त तत् सर्व तु विनश्यति ।। देनेकी प्रतिज्ञा की हुई वस्तुको न देनेसे अथवा दी हुई वस्तुको छीन लेनेसे जन्मभरका किया हुआ सारा दान-पुण्य नष्ट हो जाता है ।। यद् यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनोपार्जितं च यत् । तत् तद् गुणवते देय॑ं तदेवाक्षय्यमिच्छता ।। अक्षय सुख चाहनेवाले मनुष्यको चाहिये कि जो-जो न्यायसे उपार्जित किया हुआ अत्यन्त अभीष्ट द्रव्य है, वह-वह गुणवान् ब्राह्मणको दानमें दे ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [पञ्चमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवानके प्रिय पुष्प तथा भगवदभक्तोंका वर्णन] युधिछ्िर उवाच पज्च यज्ञा: कथं देव क्रियन्ते5त्र द्विजातिभि: । तेषां नाम च देवेश वक्तुमर्हस्थशेषत: ।। युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! द्विजातियोंके द्वारा पठ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान यहाँ किस प्रकार किया जाता है? देवेश्वर! उन यज्ञोंके नाम भी पूर्णतया बताने चाहिये ।। श्रीभगवानुवाच शृणु पञ्च महायज्ञान् कीर्त्यमानान् युधिष्छिर । यैरेव ब्रह्मसालोक्यं लभ्यते गृहमेधिना ।। श्रीभगवानने कहा--युधिष्ठिर! जिनके अनुष्ठानसे गृहस्थ पुरुषोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है, उन पठचमहायज्ञोंका वर्णन करता हूँ, सुनो ।। ऋषभुयज्ञं ब्रह्मयज्ञं भूतयज्ञं च पाण्डव | नयज्ञं पितृयज्ञं च पञ्च यज्ञान् प्रचक्षते ।। पाण्डुनन्दन! ऋभुयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और पितृयज्ञ--ये पञ्चयज्ञ कहलाते हैं ।। तर्पणं ऋभुयज्ञ: स्यात् स्वाध्यायो ब्रह्म॒यज्ञक: । भूतयज्ञो बलियाज्ञो नृयज्ञोडइतिथिपूजनम् | पितृनुद्दिश्य यत् कर्म पितृयज्ञ: प्रकीर्तित: ।। इनमें “'ऋभुयज्ञ" तर्पणको कहते हैं, 'ब्रह्मययज्ञ" स्वाध्यायका नाम है, समस्त प्राणियोंक लिये अन्नकी बलि देना “भूतयज्ञ” है, अतिथियोंकी पूजाको “मनुष्ययज्ञ' कहते हैं और पितरोंके उद्देश्यसे जो श्राद्ध आदि कर्म किये जाते हैं, उनकी 'पितृयज्ञ' संज्ञा है ।। हुतं चाप्यहुतं चैव तथा प्रहुतमेव च । प्राशितं बलिदानं च पाकयज्ञान् प्रचक्षते ।। हुत, अहुत, प्रहुत, प्राशित और बलिदान--ये पाकयज्ञ कहलाते हैं ।। वैश्वदेवादयो होमा हुतमित्युच्यते बुधैः । अहुतं च भवेद् दत्तं प्रहुतं ब्राह्मणाशितम् ।। वैश्वदेव आदि कर्मोमें जो देवताओंके निमित्त हवन किया जाता है, उसे विद्वान् पुरुष “हुत*” कहते हैं। दान दी हुई वस्तुको “अहुत” कहते हैं। ब्राह्मणोंको भोजन करानेका नाम “प्रहुत' है ।। प्राणाग्निहोत्रहोत्रं च प्राशितं विधिवद् विदु: । बलिकर्म च राजेन्द्र पाकयज्ञा: प्रकीर्तिता: ।। राजेन्द्र! प्राणाग्निहोत्रकी विधिसे जो प्राणोंको पाँच ग्रास अर्पण किये जाते हैं, उनकी “प्राशित” संज्ञा है तथा गौ आदि प्राणियोंकी तृप्तिके लिये जो अन्नकी बलि दी जाती है, उसीका नाम बलिदान है। इन पाँच कर्मोंको पाकयज्ञ कहते हैं।। केचित् पञ्च महायज्ञान् पाकयज्ञान् प्रचक्षते । अपरे ब्रह्मयज्ञादीन् महायज्ञविदो विदु: ।। कितने ही विद्वान् इन पाकयज्ञोंको ही पञज्चमहायज्ञ कहते हैं; किन्तु दूसरे लोग, जो महायज्ञके स्वरूपको जाननेवाले हैं, ब्रह्मयज्ञ आदिको ही पञ्चमहायज्ञ मानते हैं ।। सर्व एते महायज्ञा: सर्वथा परिकीर्तिता: । बुभुक्षितान ब्राह्मणांस्तु यथाशक्ति न हापयेत् ।। ये सभी सब प्रकारसे महायज्ञ बतलाये गये हैं। घरपर आये हुए भूखे ब्राह्मणोंको यथाशक्ति निराश नहीं लौटाना चाहिये ।। तस्मात् स्नात्वा द्विजो विद्वान् कुयदितान् दिने दिने । अतोडन््यथा तु भुज्जन वै प्रायश्षित्ती भवेद् द्विज: ।। इसलिये विद्वान् द्विजको चाहिये कि वह प्रतिदिन स्नान करके इन यज्ञोंका अनुष्ठान करे। इन्हें किये बिना भोजन करनेवाला द्विज प्रायश्रचित्तका भागी होता है।। युधिछिर उवाच देवदेवेश दैत्यघ्न त्वद्धक्तस्य जनार्दन । वक्तुमहसि देवेश स्नानस्य च विधिं मम ।। युधिष्ठिरने कहा--देवदेव! आप दैत्योंके विनाशक और देवताओंके स्वामी हैं। जनार्दन! अपने इस भक्तको स्नान करनेकी विधि बताइये ।। श्रीभगवानुवाच शृणु पाण्डव तत् सर्व पवित्र पापनाशनम् | स््नात्वा येन विधानेन मुच्यन्ते किल्बिषाद् द्विजा: ।। श्रीभगवान् बोले--पाण्डुनन्दन! जिस विधिके अनुसार स्नान करनेसे द्विजगण समस्त पापोंसे छूट जाते हैं, उस परम पवित्र पापनाशक विधिका पूर्णरूपसे श्रवण करो ।। मृदं च गोमयं चैव तिल॑ दर्भासतथैव च । पुष्पाण्यपि यथान्यायमादाय तु जल व्रजेत् ।। मिट्टी, गोबर, तिल, कुशा और फूल आदि शास््त्रोक्त सामग्री लेकर जलके समीप जाय ।। नद्यां सनात्वा न च स्नायादन्यत्र द्विजसत्तम: | सति प्रभूते पयसि नाल्पे स्नायात् कदाचन ।। श्रेष्ठ द्विजको उचित है कि वह नदीमें स्नान करनेके पश्चात् और किसी जलमें न नहाये। अधिक जलवाला जलाशय उपलब्ध हो तो थोड़े-से जलमें कभी स्नान न करे ।। गत्वोदकसमीपं तु शुचौ देशे मनोरमे । ततो मृद्गोमयादीनि तत्र विप्रो विनिक्षिपेत् ।। ब्राह्मणको चाहिये कि जलके निकट जाकर शुद्ध और मनोरम जगहपर मिट्टी और गोबर आदि सामग्री रख दे ।। बहि: प्रक्षाल्य पादौ च द्विराचम्य प्रयत्नतः । प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कुर्यात् तु तज्जलम् ।। तथा पानीसे बाहर ही प्रयत्नपूर्वक अपने दोनों पैर धोकर दो बार आचमन करे। फिर जलाशयकी प्रदक्षिणा करके उसके जलको नमस्कार करे ।। सर्वदेवमया हायापो मन्मया: पाण्डुनन्दन । तस्मात् तास्तु न हन्तव्यास्त्वद्धिः प्रक्षालयेत्स्थलम् ।। पाण्डुनन्दन! जल सम्पूर्ण देवताओंका तथा मेरा भी स्वरूप है; अत: उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये। जलाशयके जलसे उसके किनारेकी भूमिको धोकर साफ करे ।। केवल प्रथमं मज्जेन्नाड्ानि विमृशेद् बुध: । तत् तु तीर्थ समासाद्य कुर्यादाचमनं पुनः ।। फिर बुद्धिमान् पुरुष पानीमें प्रवेश करके एक बार सिर्फ डुबकी लगावे, अंगोंकी मैल न छुड़ाने लगे। इसके बाद पुन: आचमन करे ।। गोकर्णाकृतिवत् कृत्वा कर त्रि:प्रपिबेज्जलम् । द्विस्तत्परिमृजेद् वक्त्रं पादावश्युक्ष्य चात्मन: । शीर्षण्यं तु ततः प्राणान् सकृदेव तु संस्पृशेत् ।। हाथका आकार गायके कानकी तरह बनाकर उससे तीन बार जल पीये। फिर अपने पैरोंपर जल छिड़ककर दो बार मुखमें जलका स्पर्श करे। तदनन्तर गलेके ऊपरी भागमें स्थित आँख, कान और नाक आदि समस्त इन्द्रियोंका एक- एक बार जलसे स्पर्श करे ।। बाहू द्वौ च ततः स्पृष्टवा हृदयं नाभिमेव च । प्रत्यड्रमुदकं स्पृष्टवा मूर्धानं तु पुनः स्पृशेत् ।। फिर दोनों भुजाओंका स्पर्श करनेके पश्चात् हृदय और नाभिका भी स्पर्श करे। इस प्रकार प्रत्येक अंगमें जलका स्पर्श कराकर फिर मस्तकपर जल छिड़के ।। आप: पुनन्त्वित्युकत्वा च पुनराचमनं चरेत् । सोड्कारव्याह्ृतीर्वापि सदसस्पतिमित्यूचम् ।। इसके बाद “आप: पुनन्तु०४” मन्त्र पढ़कर फिर आचमन करे अथवा आचमनके समय ओंकार और व्याहृतियोंसहित “सदसस्पतिम्०१” इस ऋचाका पाठ करे ।। आचरम्य मृत्तिका: पश्चात् त्रिधा कृत्वा समालभेत् | ऋचेदं विष्णुरित्यड्रमुत्तमाधममध्यमम् । आलकभ्य वारुणै: सूक्तैर्नमस्कृत्य जल॑ तत: ।। आचमनके बाद मिट्टी लेकर उसके तीन भाग करे और “इदं विष्णु:०१” इस मन्त्रको पढ़कर उसे क्रमश: ऊपरके, मध्यभागके तथा नीचेके अंगोंमें लगावे। तत्पश्चात् वारुण-सूक्तोंस जलको नमस्कार करके स्नान करे ।। स्रवन्ती चेत् प्रतिस्रोते प्रत्यर्क चान्यवारिषु । मज्जेदोमित्युदाह्ृत्य न च विक्षोभयेज्जलम् ।। यदि नदी हो तो जिस ओरसे उसकी धारा आती हो, उसी ओर मुँह करके तथा दूसरे जलाशगयोंमें सूर्यकी ओर मुँह करके स्नान करना चाहिये। $४कारका उच्चारण करते हुए धीरेसे गोता लगावे, जलमें हलचल पैदा न करे ।। गोमयं च त्रिधा कृत्वा जले पूर्व समालभेत् । सव्याह्ृतीकां सप्रणवां गायत्रीं च जपेत् पुन: ।। इसके बाद गोबरको हाथमें ले जलसे गीला करके उसके तीन भाग करे और उसे भी पूर्ववत् अपने शरीरके ऊर्ध्वभाग, मध्यभाग तथा अधोभागमें लगावे। उस समय प्रणव और व्याहृतियोंसहित गायत्रीमन्त्रकी पुनरावृत्ति करता रहे ।। पुनराचमनं कृत्वा मद्गतेनान्तरात्मना । आपो हिछेति तिसूभिकऋग्भि: पूतेन वारिणा | तथा तरत्समन्दीभि: सिउ्चेच्चतसृभि: क्रमात् ।। गोसूक्तेना श्वसूक्तेन शुद्धवर्गेण चात्मन: । वैष्णवैर्वारुणै: सूक्तैः सावित्रैरिन्द्रदैवतै: ।। वामदैव्येन चात्मानमन्यैर्मन्मयसामभि: । स्थित्वान्तः सलिले सूक्तं जपेद् वा चाघमर्षणम् ।। फिर मुझमें चित्त लगाकर आचमन करनेके पश्चात् “आपो हिछ्ठा मयो”5 इत्यादि तीन ऋचाओंसे, “तरत्समन्दीभि:” इत्यादि चार ऋचाओंसे और गोसूक्त, अभश्वसूक्त, वैष्णवसूक्त, वारुणसूक्त, सावित्रसूक्त, ऐपन्द्रसूक्त, वामदैव्यसूक्त तथा मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य साममन्त्रोंके द्वारा शुद्ध जलसे अपने ऊपर मार्जन करे। फिर जलके भीतर स्थित होकर अघमर्षणसूक्तकाः जप करे ।। सव्याह्वतीकां सप्रणवां गायत्रीं वा ततो जपेत् । आश्चासमोक्षात् प्रणवं जपेद् वा मामनुस्मरन् ।। अथवा प्रणव एवं व्याह्ृतियोंसहित गायत्रीमन्त्र जपे या जबतक साँस रुकी रहे तबतक मेरा स्मरण करते हुए केवल प्रणवका ही जप करता रहे ।। उत्प्लुत्य तीर्थमासाद्य धौते शुक्ते च वाससी । शुद्धे चाच्छादयेत् कक्षे न कुर्यात् परिपाशके ।। इस प्रकार स्नान करके जलाशयके किनारे आकर धोये हुए शुद्ध वस्त्र-- धोती और चादर धारण करे। चादरको काँखमें रस्सीकी भाँति लपेटकर बाँधे नहीं ।। पाशेन बद्ध्वा कक्षे यत् कुरुते कर्म वैदिकम् । राक्षसा दानवा दैत्यास्तद् विलुम्पन्ति हर्षिता: । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कक्ष्यापाशं न धारयेत् ।। जो वस्त्रको काँखमें रस्सीकी भाँति लपेट करके वैदिक कर्मोंका अनुष्ठान करता है, उसके कर्मको राक्षस, दानव और दैत्य बड़े हर्षमें भरकर नष्ट कर डालते हैं; इसलिये सब प्रकारके प्रयत्नसे काँखको वस्त्रसे बाँधना नहीं चाहिये ।। ततः प्रक्षाल्य पादौ च हस्तौ चैव मृदा शनै: । आचरम्य पुनराचामेत् पुनः सावित्रिया द्विज: ।। ब्राह्यणको चाहिये कि वस्त्र-धारणके पश्चात् धीरे-धीरे हाथ और पैरोंको मिट्टीसे मलकर धो डाले, फिर गायत्री-मन्त्र पढ़कर आचमन करे || प्राद्डुखोदज्गुखो वापि ध्यायन् वेदान् समाहितः । जले जलगत: शुद्ध: स्थल एव स्थलस्थित: । उभयत्र स्थितस्तस्मादाचामेदात्मशुद्धये ।। तथा पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके एकाग्रचित्तसे वेदोंका स्वाध्याय करे। जलमें खड़ा हुआ द्विज जलमें ही आचमन करके शुद्ध हो जाता है और स्थलमें स्थित पुरुष स्थलमें ही आचमनके द्वारा शुद्ध होता है, अतः जल और स्थलमेंसे कहीं भी स्थित होनेवाले द्विजको आत्मशुद्धिके लिये आचमन करना चाहिये ।। दर्भेषु दर्भपाणि: सन् प्राडमुख: सुसमाहित: । प्राणायामांस्तत: कुर्यान्मद्गतेनान्तरात्मना ।। इसके बाद संध्योपासन करनेके लिये हाथोंमें कुश लेकर पूर्वाभिमुख हो कुशासनपर बैठे और मुझमें मन लगाकर एकाग्रभावसे प्राणायाम करे ।। सहस्रकृत्व: सावित्रीं शतकृत्वस्तु वा जपेत् । समाहितो जपेत् तस्मात् सावित्र्या चाभिमन्त्रय च । मन्देहानां विनाशाय रक्षसां विक्षिपेज्जलम् ।। फिर एकाग्रचित्त होकर एक हजार या एक सौ गायत्री-मन्त्रका जप करे। मन्देह नामक राक्षसोंका नाश करनेके उद्देश्यसे गायत्री-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जल लेकर सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे ।। उद्धर्गोड्सीत्यथाचान्तः प्रायश्षित्तजल क्षिपेत् ।। उसके बाद आचमन करके “उद्धर्गोडसि” इस मन्त्रसे प्रायश्रित्तके लिये जल छोड़े ।। अथादाय सुपुष्पाणि तोयमञ्जलिना द्विज: । प्रक्षिप्य प्रतिसूर्य च व्योममुद्रां प्रकल्पयेत् ।। फिर द्विजको चाहिये कि अंजलिमें सुगन्धित पुष्प और जल लेकर सूर्यको अर्घ्य दे और आकाभमुद्राका प्रदर्शन करे ।। ततो द्वादशकृत्वस्तु सूर्यस्यैकाक्षरं जपेत् ततः षडक्षरादीनि षट्कृत्व: परिवर्तयेत् ।। तदनन्तर सूर्यके एकाक्षर-मन्त्रका बारह बार जप करे और उनके षडक्षर आदि मन्त्रोंकी छः बार पुनरावृत्ति करे ।। प्रदक्षिणं परामृष्य मुद्रया स्वमुखान्तरे । ऊर्ध्वबाहुस्ततो भूत्वा सूर्यमीक्षेत् समाहित: ।। तन्मण्डलस्थं मां ध्यायेत् तेजोमूर्ति चतुर्भुजम् । उदुत्यं च जपेन्मन्त्रं चित्र॑ तच्चक्षुरित्यपि ।। सावित्रीं च यथाशक्ति जप्त्वा सूक्ते च मामकम् । मन्मयानि च सामानि पुरुषव्रतमेव च ।। आकाशमुद्राको दाहिनी ओरसे घुमाकर अपने मुखमें विलीन करे। इसके बाद दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर एकाग्रचित्तसे सूर्युक्ी ओर देखते हुए उनके मण्डलमें स्थित मुझ चार भुजधारी तेजोमूर्ति नारायणका एकाग्रचित्तसे ध्यान करे। उस समय “उदुत्यम्:”, “चित्र देवानाम्”* “तच्चक्षु:'7 इन मन्त्रोंका, यथाशक्ति गायत्री-मन्त्रका तथा मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले सूक्तोंका जप करके मेरे साममन्त्रों और पुरुषसूक्तका भी पाठ करे ।। ततश्लालोकयेदर्क हंस: शुचिषदित्यपि । प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कृत्य दिवाकरम् ।। तत्पश्चात् “हँस: शुचिषत्”* इस मन्त्रको पढ़कर सूर्यकी ओर देखे और प्रदक्षिणापूर्वक उन्हें नमस्कार करे ।। ततस्तु तर्पयेदद्धि््रह्माणं मां च शड्करम् । प्रजापति च देवांश्न तथा देवमुनीनपि ।। साज्रानपि तथा वेदानितिहासान् क्रतूनपि । पुराणानि च सर्वाणि कुलान्यप्सप्सरसां तथा ।। ऋतून् संवत्सरं चैव कलाकाष्ठात्मक॑ तथा । भूतग्रामांश्न भूतानि सरितः सागरांस्तथा | शैलान् छैलस्थितान् देवानौषधी: सवनस्पती: ।। तर्पयेदुपवीती च प्रत्येक॑ तृप्पतामिति । अन्वारभ्य च सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु ।। इस प्रकार संध्योपासन समाप्त होनेपर क्रमशः ब्रह्माजीका, मेरा, शंकरजीका, प्रजापतिका, देवताओं और देवर्षियोंका, अंगसहित वेदों, इतिहासों, यज्ञों और समस्त पुराणोंका, अप्सराओंका, ऋतु-कलाकाष्ठारूप संवत्सर तथा भूतसमुदायोंका, भूतोंका, नदियों और समुद्रोंका तथा पर्वतों, उनपर रहनेवाले देवताओं, ओषधियों और वनस्पतियोंका जलसे तर्पण करे। तर्पणके समय जनेऊको बायें कंधेपर रखे तथा दायें और बायें हाथकी अंजलिसे जल देते हुए उपर्युक्त देवताओंमेंसे प्रत्येकका नाम लेकर “तृप्पताम्” पदका उच्चारण करे (यदि दो या अधिक देवताओंको एक साथ जल दिया जाय तो क्रमश: द्विववन और बहुवचन--'तृप्पेताम” और “तृप्यन्ताम्” इन पदोंका उच्चारण करना चाहिये) ।। निवीती तर्पयेद् विद्वानूषीन् मन्त्रकृतस्तथा । मरीच्यादीनृषींश्वैव नारदाद्यान् समाहित: ।। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि मन्त्रद्रश्ठ मरीचि आदि तथा नारद आदि ऋषियोंको निवीती होकर अर्थात् जनेऊको गलेमें मालाकी भाँति पहन करके एकाग्रचित्तसे तर्पण करे ।। प्राचीनावीत्यथैतांस्तु तर्पयेद् देवता: पितृन् । ततस्तु कव्यवाडग्निं सोमं वैवस्वतं तथा ।। ततकश्चार्यमणं चापि हाग्निष्वात्तांस्तथैव च | सोमपांश्चैव दर्भेषु सतिलैरेव वारिभि: । तृप्यतामिति पश्चात् तु स पितृंस्तर्पयेत् ततः ।। इसके बाद जनेऊको दाहिने कंधेपर करके आगे बताये जानेवाले पितृ- सम्बन्धी देवताओं एवं पितरोंका तर्पण करे। कव्यवाट्, अग्नि, सोम, वैवस्वत, अर्यमा, अग्निष्वात्त और सोमप--ये पितृ-सम्बन्धी देवता हैं। इनका तिलसहित जलसे कुशाओंपर तर्पण करे और “तृप्यताम्” पदका उच्चारण करे। तदनन्तर पितरोंका तर्पण आरम्भ करे ।। पितृन् पितामहांश्वैव तथैव प्रपितामहान् | पितामहीस्तथा चापि तथैव प्रपितामही: ।। मातरं चात्मनश्वैव गुरुमाचार्यमेव च । पितृमातृस्वसारौ च तथा मातामहीमपि ।। उपाध्यायान् सखीन् बन्धून् शिष्यर्त्विगूज्ञातिबान्धवान् | प्रमीताननृशंस्यार्थ तर्पयेत् तानमत्सर: ।। उनका क्रम इस प्रकार है--पिता, पितामह और प्रपितामह तथा अपनी माता, पितामही और प्रपितामही! इनके सिवा गुरु, आचार्य, पितृष्वसा (बुआ), मातृष्वसा (मौसी), मातामही, उपाध्याय, मित्र, बन्धु, शिष्य, ऋत्विज् और जाति-भाई आदिमेंसे भी जो मर गये हों, उनपर दया करके ईर्ष्या-द्वेष त्यागकर उनका भी तर्पण करना चाहिये ।। तर्पयित्वा तथा5<चम्य स्नानवस्त्रं प्रपीडयेत् वृत्ति भृत्यजनस्याहुः स्नानं पान॑ च तद्विदः । अतर्पयित्वा तान् पूर्व स्नानवस्त्रं न पीडयेत् पीडयेच्च पुरा मोहाद् देवा: सर्षिगणास्तथा ।। तर्पणके पश्चात् आचमन करके स्नानके समय पहने हुए वस्त्रको निचोड़ डाले। उस वस्त्रका जल भी कुलके मरे हुए संतानहीन पुरुषोंका भाग है। वह उनके स्नान करने और पीनेके काम आता है। अत: उस जलसे उनका तर्पण करना चाहिये, ऐसा विद्वानोंका कथन है। पूर्वोक्त देवताओं तथा पितरोंका तर्पण किये बिना स्नानका वस्त्र नहीं धोना चाहिये। जो मोहवश तर्पणके पहले ही धौतवस्त्रको धो लेता है, वह ऋषियों और देवताओंको कष्ट पहुँचाता है ।। तर्पयित्वा तथा5<चम्य स्नानवस्त्रं निपीडयेत् । पितरस्तु निराशास्ते शप्त्वा यान्ति यथागतम् ।। उस अवस्थामें उसके पितर उसे शाप देकर निराश लौट जाते हैं, इसलिये तर्पणके पश्चात् आचमन करके ही स्नान-वस्त्र निचोड़ना चाहिये ।। प्रक्षाल्य तु मृदा पादावाचम्य प्रयत: पुनः । दर्भेषु दर्भपाणि: सन् स्वाध्यायं तु समारभेत् ।। तर्पणकी क्रिया पूर्ण होनेपर दोनों पैरोंमें मिट्टी लगाकर उन्हें धो डाले और फिर आचमन करके पवित्र हो कुशासनपर बैठ जाय और हाथोंमें कुशा लेकर स्वाध्याय आरम्भ करे ।। वेदमादौ समारभ्य ततो पर्युपरि क्रमात् । यदधीते<न्वहं शक््त्या तत् स्वाध्यायं प्रचक्षते ।। पहले वेदका पाठ करके फिर क्रमसे उसके अन्य अंगोंका अध्ययन करे। अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन जो अध्ययन किया जाता है, उसको स्वाध्याय कहते हैं ।। ऋचो वापि यजुर्वापि सामगायमथापि च । इतिहासपुराणानि यथाशक्ति न हापयेत् ।। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदका स्वाध्याय करे। इतिहास और पुराणोंके अध्ययनको भी यथाशक्ति न छोड़े ।। उत्थाय तु नमस्कृत्य दिशो दिग्देवता अपि | ब्रह्माणं च ततश्चाग्निं पृथिवीमोषधीस्तथा ।। वाचं वाचस्पतिं चैव मां चैव सरितस्तथा । नमस्कृत्य तथाद्िस्तु प्रणवादि च पूर्ववत् ।। ततो नमो<द्धय इत्युक्त्वा नमस्कुर्यात् तु तज्जलम् । स्वाध्याय पूर्ण करके खड़ा होकर दिशाओं, उनके देवताओं, ब्रह्माजी, अग्नि, पृथ्वी, ओषधि, वाणी, वाचस्पति और सरिताओंको तथा मुझे भी प्रणाम करे। फिर जल लेकर प्रणवयुक्त “नमो<द्धय:” यह मन्त्र पढ़कर पूर्ववत् जलदेवताको नमस्कार करे ।। घृणि: सूर्यस्तथा55दित्यस्तं प्रणम्य स्वमूर्धनि ।। ततस्त्वालोकयन्नर्क प्रणवेन समाहित: । ततो मामर्चयेत् पुष्पैर्मत्प्रियेरेव नित्यश: ।। इसके बाद घृणि, सूर्य तथा आदित्य आदि नामोंका उच्चारण करके अपने मस्तकपर दोनों हाथ जोड़कर सूर्यदेवको प्रणाम करे और प्रणवका जप करते हुए एकाग्रचित्तसे उनका दर्शन करे। उसके बाद मुझे प्रिय लगनेवाले पुष्पोंसे नित्यप्रति मेरी पूजा करे ।। युधिछ्िर उवाच त्वत्प्रियाणि प्रसूनानि त्वदधिष्ठानि माधव । सर्वाण्याचक्ष्व देवेश त्वद्धक्तस्य ममाच्युत ।। युधिष्ठिरे कहा--अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले माधव! जो पुष्प आपको अत्यन्त प्रिय हों तथा जिनमें आपका निवास हो, उन सबका मुझ अपने भक्तसे वर्णन कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच शृणुष्वावहितो राजन पुष्पाणि प्रियकृन्ति मे । कुमुर्द करवीरं॑ च चणकं चम्पकं तथा ।। मल्लिकाजातिपुष्पं च नन्द्यावर्त च नन्दिकम् | पलाशपुष्पपत्राणि दूर्वाभूड़कमेव च ।। वनमाला च राजेन्द्र मत्प्रियाणि विशेषत: । श्रीभगवान् बोले--राजन्! जो फूल मुझे बहुत प्रिय हैं, उनके नाम बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। राजेन्द्र! कुमुद, करवीर, चणक, चम्पा, मालती, जातिपुष्प, नन्द्यावर्त, नन्दिक, पलाशके फूल और पत्ते, दूर्वा, भृंगक और वनमाला--ये फूल मुझे विशेष प्रिय हैं ।। सर्वेषामपि पुष्पाणां सहस्रगुणमुत्पलम् ।। तस्मात् पद्म तथा राजन् पद्मात् तु शतपत्रकम् | तस्मात् सहस्रपत्र॑ तु पुण्डरीकं ततः परम् ।। पुण्डरीकसहस्रात् तु तुलसी गुणतो5थिका । सब प्रकारके फूलोंसे हजार गुना अच्छा उत्पल माना गया है। राजन! उत्पलसे बढ़कर पद्म, पदासे शतदल, शतदलसे सहस्रदल, सहख्रदलसे पुण्डरीक और हजार पुण्डरीकसे बढ़कर तुलसीका गुण माना गया है ।। वकपुष्पं ततस्तस्मात् सौवर्ण तु ततो5थधिकम् । सौवर्णात् तु प्रसूनाच्च मत्तप्रियं नास्ति पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन! तुलसीसे श्रेष्ठ है वकपुष्प और उससे भी उत्तम है सौवर्ण, सौवर्णके फ़ूलसे बढ़कर दूसरा कोई भी फूल मुझे प्रिय नहीं है ।। पुष्पाभावे तुलस्यास्तु पत्रैर्मामर्चयेत् पुन: । पत्रालाभे तु शाखाभि: शाखालाभे शिफालवै: ।। शिफाभावे मृदा तत्र भक्तिमानर्चयेत माम् । फूल न मिलनेपर तुलसीके पत्तोंसे, पत्तोंके न मिलनेपर उसकी शाखाओंसे और शाखाओंके न मिलनेपर तुलसीकी जड़के टुकड़ोंसे मेरी पूजा करे। यदि वह भी न मिल सके तो जहाँ तुलसीका वृक्ष रहा हो, वहाँकी मिट्टीसे ही भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करे ।। वर्जनीयानि पुष्पाणि शृणु राजन् समाहित: ।। किंकिणीं मुनिपुष्पं च धुर्धूरं पाटलं तथा ।। तथातिमुक्तकं चैव पुन्नागं नक्तमालिकम् | यौधिकं क्षीरिकापुष्पं निर्गुण्डी लांगुली जपा: ।। कर्णिकारं तथाशोकं शाल्मलीपुष्पमेव च । ककुभा: कोविदाराश्च वैभीतकमथापि च ।। कुरण्टकप्रसूनं च कल्पकं कालकं तथा । अड्कोलं गिरिकर्णी च नीलान्येव च सर्वश: । एकपर्णानि चान्यानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ।। राजन! अब त्यागनेयोग्य फूलोंके नाम बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो। किंकिणी, मुनिपुष्प, धुर्धुर, पाटल, अतिमुक्तक, पुन्नाग, नक्तमालिक, यौधिक, क्षीरिकापुष्प, निर्गुण्डी, लांगुली, जपा, कर्णिकार, अशोक, सेमलका फूल, ककुभ, कोविदार, वैभीतक, कुरण्टक, कल्पक, कालक, अंकोल, गिरिकर्णी, नीले रंगके फ़ूल तथा एक पंखड़ीवाले फ़ूल--इन सबका सब प्रकारसे त्याग कर देना चाहिये ।। अर्कपुष्पाणि वर्ज्यानि अर्कपत्रस्थितानि च । व्याधृता: पिचुमन्दानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ।। आक (मदार)-के फूल तथा आकके पत्तेपर रखे हुए फूल भी वर्जित हैं। नीमके फूलोंका भी परित्याग कर देना चाहिये ।। अन्यैस्तु शुक्लपन्रैस्तु गन्धवद्धिर्नराधिप । अवर्ज्यैस्तैर्यथालाभं मद्धक्तो मां समर्चयेत् ।। नराधिप! इनके अतिरिक्त जिनका निषेध नहीं किया गया है, ऐसे सफेद पंखड़ियोंवाले सुगन्धित पुष्प जितने मिल सकें, उनके द्वारा भक्त पुरुषको मेरी पूजा करनी चाहिये ।। युधिछिर उवाच कथं त्वमर्चनीयो$सि मूर्तय: कीदृशास्तु ते । वैखानसा: कथं ब्रूयु: कथं वा पाउ्चरात्रिका: ।। युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! आपकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये? आपकी मूर्तियाँ कैसी हैं? इस विषयमें वानप्रस्थलोग किस प्रकार बताते हैं और पज्चरात्रवाले किस प्रकार बताते हैं? ।। श्रीभगवानुवाच शृणु पाण्डव तत्सर्वमर्चनाक्रममात्मन: । स्थण्डिले पद्मक॑ कृत्वा चाष्टपत्र॑ सकर्णिकम् ।। अष्टाक्ष विधानेन हााथवा द्वादशाक्षरै: | वैदिकैरथ मन्त्रैश्न मम सूक्तेन वा पुन: ।। स्थापितं मां ततस्तस्मिन्नर्चयित्वा विचक्षण: । पुरुषं च तत: सत्यमच्युतं च युधिष्ठिर ।। श्रीभगवान् बोले--पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर! मेरे अर्चनकी सब विधि सुनो। वेदीपर कर्णिकाओंसे युक्त अष्टदटल कमल बनावे। उसपर अष्टाक्षर अथवा द्वादशाक्षर मन्त्रके विधानसे तथा वैदिक मन्त्रोंके द्वारा और पुरुषसूक्तसे मेरी मूर्तिकी स्थापना करे। फिर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि मुझ सत्यस्वरूप अच्युत पुरुषका पूजन करे ।। अनिरुद्धं च मां प्राहुर्वैखानसविदो जना: । अन््ये त्वेवं विजानन्ति मां राजन् पाउचरात्रिका: ।। वासुदेवं च राजेन्द्र सडुकर्षणम थापि वा | प्रद्युम्न॑ चानिरुद्धं च चतुर्मूर्ति प्रवक्ष्यते ।। नृपश्रेष्ठ महाराज! वानप्रस्थ-धर्मके ज्ञाता मनुष्य मुझे अनिरुद्ध स्वरूप बताते हैं। उनसे भिन्न जो पाउच्रात्रिक हैं, वे मुझे वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्म और अनिरुद्ध--इस प्रकार चतुर्व्यूह-स्वरूप बताते हैं ।। एताश्षान्याश्न राजेन्द्र संज्ञा भेदेन मूर्त्तय: । विद्धयनर्थान्तरा एव मामेवं चार्चयेद् बुध: ।। राजेन्द्र! ये सभी तथा अन्य नामभेदसे मेरी मूर्तियाँ हैं, उन सबका अर्थ एक ही समझना चाहिये। इस प्रकार बुद्धिमान् लोग मेरी पूजा करते हैं ।। युधिछिर उवाच त्वद्धक्ता: कीदृशा देव कानि तेषां व्रतानि च । एतत् कथय देवेश त्वद्धक्तस्य ममाच्युत ।। युधिष्ठिरने पूछा--अच्युत! भगवन्! आपके भक्त कैसे होते हैं और उनके नियम कौन-कौन-से हैं? यह बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि देवेश्वर! मैं भी आपके चरणोंमें भक्ति रखता हूँ ।। श्रीभगवानुवाच अनन्यदेवताभक्ता ये मद्धभक्तजनप्रिया: । मामेव शरणं प्राप्ता मद्धक्तास्ते प्रकीर्तिता: ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! जो दूसरे किसी देवताके भक्त न होकर केवल मेरी ही शरण ले चुके हों तथा मेरे भक्तजनोंके साथ प्रेम रखते हों, वे ही मेरे भक्त कहे गये हैं ।। स्वग्याण्यपि यशस्यानि मत्पप्रियाणि विशेषतः । मद्धक्त: पाण्डवश्रेष्ठ व्रतानीमानि धारयेत् ।। पाण्डवश्रेष्ठ! स्वर्ग और यश देनेवाले होनेके साथ ही जो मुझे विशेष प्रिय हों, ऐसे व्रतोंका ही मेरे भक्त पालन करते हैं ।। नान्यदाच्छादयेद् वस्त्र मद्धक्तो जलतारणे । स्वस्थस्तु न दिवा स्वप्येन्मधुमांसानि वर्जयेत् ।। भक्त पुरुषको जलमें तैरते समय एक वस्त्रके सिवा दूसरा नहीं धारण करना चाहिये। स्वस्थ रहते हुए दिनमें कभी नहीं सोना चाहिये। मधु और मांसको त्याग देना चाहिये ।। प्रदक्षिणं व्रजेद् विप्रान् गामश्वत्थं हुताशनम् । न धावेत् पतिते वर्षे नाग्रभिक्षां च लोपयेत् ।। मार्ममें ब्राह्मण, गो, पीपल और अग्निके मिलनेपर उनको दाहिने करके जाना चाहिये। पानी बरसते समय दौड़ना नहीं चाहिये। पहले मिलनेवाली भिक्षाका त्याग नहीं करना चाहिये ।। प्रत्यक्षलवर्ण नाद्यात्ू सौभाज्जनकरञ्जनौ । ग्रासमुष्टिं गवे दद्याद् धान्याम्लं चैव वर्जयेत् ।। खाली नमक नहीं खाना चाहिये तथा सौभांजन और करंजनका भ्क्षण नहीं करना चाहिये। गौको प्रतिदिन ग्रास अर्पण करे और अन्नमें खटाई मिलाकर न खाय ।। तथा पर्युषितं चापि पक्व॑ परगृहागतम् । अनिवेदितं च यद् द्रव्यं तत् प्रयत्नेन वर्जयेत् ।। दूसरेके घरसे उठाकर आयी हुई रसोई, बासी अन्न तथा भगवान्को भोग न लगाये हुए पदार्थका भी प्रयत्नपूर्वक त्याग करे ।। विभीतककरज्जानां छायां दूरे विवर्जयेत् विप्रदेवपरीवादान् न वदेत् पीडितो5पि सन् ।। बहेड़े और करंजकी छायासे दूर रहे, कष्टमें पड़नेपर भी ब्राह्मणों और देवताओंकी निन्दा न करे ।। उदिते सवितर्याप्य क्रियायुक्तस्य धीमत: । चतुर्वेदविदश्चापि देहे षड् वृषला: स्मृता: ।। सूर्योदयके बाद नित्य क्रियाशील रहनेवाले बुद्धिमान् और चारों वेदोंके विद्वान ब्राह्मणके शरीरमें भी छः: वृषल बताये जाते हैं ।। क्षत्रिया: सप्त विज्ञेया वैश्यास्त्वष्टौ प्रकीर्तिता: | नियता: पाण्डवश्रेष्ठ शूद्राणामेकविंशति: ।। पाण्डवश्रेष्ठ! क्षत्रियोंके शरीरमें सात वृषल जानने चाहिये, वैश्योंके देहमें आठ वृषल बताये गये हैं और शूद्रोंमें इक्कीस वृषलोंका निवास माना गया है ।। काम: क्रोधशक्ष॒ लोभश्व॒ मोहश्षन मद एव च । महामोहश्च इत्येते देहे षड् वृषला: स्मृता: ।। काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और महामोह--ये छः वृषल ब्राह्मणके शरीरमें स्थित बताये गये हैं ।। गर्व: स्तम्भो हााहंकार ईर्ष्या च द्रोह एव च । पारुष्यं क्रूरता चैव सप्तैते क्षत्रिया: स्मृता: ।। गर्व, स्तम्भ (जडता), अहंकार, ईर्ष्या, द्रोह, पारुष्प (कठोर बोलना) और क्रूरता--ये सात क्षत्रिय-शरीरमें रहनेवाले वृषल हैं ।। तीक्षणतानिकृतिर्माया शाख्यं दम्भो हानार्जवम् | पैशुन्यमनृतं चैव वैश्यास्त्वष्टौ प्रकीर्तिता: ।। तीक्ष्णता, कपट, माया, शठता, दम्भ, सरलताका अभाव, चुगली और असत्य-भाषण--ये आठ वैश्य-शरीरके वृषल हैं ।। तृष्णा बुभुक्षा निद्रा च ह्वालस्यं चाघृणादय: । आधिभ्षापि विषादक्ष प्रमादो हीनसत्त्वता ।। भयं विक्लवता जाड्यं पापकं मन्युरेव च । आशा चाश्रद्धधानत्वमनवस्थाप्ययन्त्रणम् ।। आशोौचं मलिनत्वं च शूद्रा होते प्रकीर्तिता: । यस्मिन्नेते न दृश्यन्ते स वै ब्राह्मण उच्यते ।। तृष्णा, खानेकी इच्छा, निद्रा, आलस्य, निर्दयता, क्रूरता, मानसिक चिन्ता, विषाद, प्रमाद, अधीरता, भय, घबराहट, जडता, पाप, क्रोध, आशा, अशभ्रद्धा, अनवस्था, निरंकुशता, अपवित्रता और मलिनता--ये इकक््कीस वृषल शाद्रके शरीरमें रहनेवाले बताये गये हैं। ये सभी वृषल जिसके भीतर न दिखायी दें, वही वास्तवमें ब्राह्मण कहलाता है ।। तस्मात् तु साच्चिको भूत्वा शुचि: क्रोधविवर्जित: । मामर्चयेत् तु सततं मत्प्रियत्वं यदीच्छति ।। अतः ब्राह्मण यदि मेरा प्रिय होना चाहे तो सात्त्विक, पवित्र और क्रोधहीन होकर सदा मेरी पूजा करता रहे ।। अलोलजिद्ठद: समुपस्थितो धृतिं निधाय चक्षुर्युगमात्रमेव तत् । मनश्व वाचं च निगृह चञ्चलं भयान्निवृत्तो मम भक्त उच्यते ।। जिसकी जिह्ठला चंचल नहीं है, जो धैर्य धारण किये रहता है और चार हाथ आगेतक दृष्टि रखते हुए चलता है, जिसने अपने चंचल मन और वाणीको वशभमें करके भयसे छुटकारा पा लिया है, वह मेरा भक्त कहलाता है ।। ईदृशाध्यात्मिनो ये तु ब्राह्मणा नियतेन्द्रिया: तेषां श्राद्धेषु तृप्पन्ति तेन तृप्ता: पितामहा: ।। ऐसे अध्यात्मज्ञानसे युक्त जितेन्द्रिय ब्राह्मण जिनके यहाँ श्राद्धमें तृप्तिपूर्वक भोजन करते हैं, उनके पितर उस भोजनसे पूर्ण तृप्त होते हैं ।। धर्मो जयति नाधर्म: सत्यं जयति नानृतम् । क्षमा जयति न क्रोध: क्षमावान् ब्राह्म॒णो भवेत् ।। धर्मकी जय होती है, अधर्मकी नहीं; सत्यकी विजय होती है, असत्यकी नहीं तथा क्षमाकी जीत होती है, क्रोधकी नहीं। इसलिये ब्राह्मणको क्षमाशील होना चाहिये ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) १. 3० आप: पुनन्तु पृथिवीं पृथिवी पूता पुनातु माम् । पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्त्रह्मपूता पुनातु माम् ।। यदुच्छिष्टमभोज्यं च यद्दवा दुश्चरितं मम । सर्व पुनन्तु मामापो5सतां च प्रतिग्रहँस््वाहा ।। (तै० आ० प्र० १०।२३) २. सदसस्पतिमदभुतम्प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् | सनिम्मेधा मयासिषुँस््वाहा ।। (यजु० अ० ३२ मं० १३) 3. ७ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् | समूढमस्यपाँसुरे स्वाहा ।। (यजु० अ० ५म॑ १५) ३. 3>आपो हि छा मयोभुव:। ३० ता न ऊर्जे दधातन। ३ महे रणाय चक्षसे। &* यो व: शिवतमो रस:। ३० तस्य भाजयतेह नः। 5 उशतीरिव मातर:। ३० तस्मा अरंगमाम व:। ३ यस्य क्षयाय जिन्बथ। 53 आपो जनयथा च न:। (यजु० ११ मं० ५०--५२) २. 35 ऋतजञ्च सत्यज्चाभीद्धात्तपसो5ध्यजायत । ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णव: । समुद्रादर्णादधिसंवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् | दिवञ्च पृथिवीज्चान्तरिक्षमथो स्व: ।। (ऋ० अ० ८अ० ८व० ४८) ३. ७० उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतव: । दृशे विश्वाय सूर्यम् ।। (यजु० अ० ७ मं० ४१) २. ७ चित्र देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्ने: | आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षँश्सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्न ।। (यजु० अ० ७ मं० ४२) 3. ३० तच्चक्षुदेंवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् | पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद: शर्तशूणुयाम शरद: शतं प्रत्रवाम शरद: शतमदीना: स्याम शरद: शतं भूयश्व शरद: शतात् ।। (यजु० अ० ३६ मं० २४) ४. हँस: शुचिषद्धसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् | नृषद्वरसदृतसद्धयोम सदब्जा गोजा ऋतजा अद्विजा ऋतं बृहत् ।। (यजु० १०।२४) [कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद] वैशग्पायन उवाच दानपुण्यफलं श्रुत्वा तप:पुण्यफलानि च । धर्मपुत्र: प्रह्ष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! दान और तपस्याके पुण्य-फलको सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा-- ।। या चैषा कपिला देव पूर्वमुत्पादिता विभो । होमधेनु: सदा पुण्या चतुर्वक्त्रेण माधव ।। सा कथं ब्राह्मणेभ्यो हि देया कस्मिन् दिनेडपि वा । कीदृशाय च विप्राय दातव्या पुण्यलक्षणा ।। 'भगवन्! विभो! जिसे ब्रह्माजीने अग्निहोत्रकी सिद्धिके लिये पूर्वकालमें उत्पन्न किया था तथा जो सदा ही पवित्र मानी गयी है, उस कपिला गौका ब्राह्मणोंको किस प्रकार दान करना चाहिये? माधव! वह पवित्र लक्षणोंवाली गौ किस दिन और कैसे ब्राह्मणको देनी चाहिये? ।। कति वा कपिला प्रोक्ता स्वयमेव स्वयम्भुवा । कैर्वा देयाश्व ता देव श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। “ब्रह्माजीने कपिला गौके कितने भेद बतलाये हैं तथा कपिला गौका दान करनेवाला मनुष्य कैसा होना चाहिये? इन सब बातोंको मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ” ।। एवमुक्तो हृषीकेशो धर्मपुत्रेण संसदि । अब्रवीत् कपिलासंख्यां तासां माहात्म्यमेव च ।। धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके द्वारा सभामें इस प्रकार कहे जानेपर श्रीकृष्ण कपिला गौकी संख्या और उनकी महिमाका वर्णन करने लगे-- ।। शृणु पाण्डव तत्त्वेन पवित्र पावनं परम् । यच्छुत्वा पापकर्मापि नर: पापात् प्रमुच्यते ।। 'पाण्डुनन्दन! यह विषय बड़ा ही पवित्र और पावन है। इसका श्रवण करनेसे पापी पुरुष भी पापसे मुक्त हो जाता है, अतः ध्यान देकर सुनो ।। कपिला हामनि्निहोत्रार्थ विप्रार्थे वा स्वयम्भुवा । सर्व तेजा: समुद्धृत्य निर्मिता ब्रह्मणा पुरा ।। 'पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने अग्निहोत्र तथा ब्राह्मणोंके लिये सम्पूर्ण तेजोंका संग्रह करके कपिला गौको उत्पन्न किया था ।। पवित्र च पवित्राणां मड़लानां च मड्जलम् | पुण्यानां परमं पुण्यं कपिला पाण्डुनन्दन ।। 'पाण्डुनन्दन! कपिला गौ पवित्र वस्तुओंमें सबसे बढ़कर पवित्र, मंगलजनक पदार्थोंमें सबसे अधिक मंगलस्वरूपा तथा पुण्योंमें परमपुण्यस्वरूपा है ।। तपसां तप एवाग्रयं व्रतानामुत्तमं व्रतम् | दानानां परम दान॑ निदानं होतदक्षयम् ।। “वह तपस्याओंमें श्रेष्ठ तपस्या, व्रतोंमें उत्तम व्रत, दानोंमें श्रेष्ठ दान और सबका अक्षय कारण है ।। क्षीरेण कपिलायास्तु दध्ना वा सघृतेन वा । होतव्यान्यग्निहोत्राणि सायं प्रातर्द्धिजातिभि: । 'द्विजातियोंको चाहिये कि वे सायंकाल और प्रातःकालमें कपिला गौके दूध, दही अथवा घीसे अन्निहोत्र करें |। कपिलाया घृतेनापि द्ना क्षीरेण वा पुनः । जुद्वते येडग्निहोत्राणि ब्राह्मणा विधिवत् प्रभो ।। पूजयन्त्यतिथींश्वैव परां भक्तिमुपागता: । शूद्रान्नाद् विरता नित्यं दम्भानृतविवर्जिता: ।। ते यान्त्यादित्यसंकाशैरविंमानैद्धिजसत्तमा: । सूर्यमण्डलमध्येन ब्रह्मलोकमनुत्तमम् ।। 'प्रभो! जो ब्राह्मण कपिला गौके घी, दही अथवा दूधसे विधिवत् अग्निहोत्र करते हैं, भक्तिपूर्वक अतिथियोंकी पूजा करते हैं, शूद्रके अन्नसे दूर रहते हैं तथा दम्भ और असत्यका सदा त्याग करते हैं, वे सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंद्वारा सूर्यममण्डलके बीचसे होकर परम उत्तम ब्रह्मलोकमें जाते हैं ।। शृज्ञाग्रे कपिलायास्तु सर्वतीर्थानि पाण्डव | ब्रह्मणो हि नियोगेन निवसन्ति दिने दिने ।। प्रातरुत्थाय यो मर्त्य: कपिलाशुड्रमस्तकात् । यक्ष्युतामम्बुधारां वै शिरसा प्रयत: शुचि: ।। स तेन पुण्यतीर्थेन सहसा हतकिल्बिष: । जन्मत्रयकृतं पापं प्रदहत्यग्निवत् तृणम् ।। 'युधिष्ठिर! ब्रह्माजीकी आज्ञासे कपिलाके सींगके अग्रभागमें सदा सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। जो मनुष्य शुद्धभावसे नियमपूर्वक प्रतिदिन सबेरे उठकर कपिला गौके सींग और मस्तकसे गिरती हुई जलधाराको अपने सिरपर धारण करता है, वह उस पुण्यके प्रभावसे सहसा पापरहित हो जाता है। जैसे आग तिनकेको जला डालती है, उसी प्रकार वह जल मनुष्यके तीन जन्मोंके पापोंको भस्म कर डालता है ।। मूत्रेण कपिलायास्तु यश्च प्राणानुपस्पृशेत् । स््नानेन तेन पुण्येन नष्टपाप: स मानव: । त्रिंशद् वर्षकृतात् पापान्मुच्यते नात्र संशय: ।। “जो मनुष्य कपिलाका मूत्र लेकर अपनी नेत्र आदि इन्द्रियोंमें लगाता तथा उससे स्नान करता है, वह उस स्नानके पुण्यसे निष्पाप हो जाता है। उसके तीस जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है ।। प्रातरुत्थाय यो भक्त्या प्रयच्छेत् तृणमुष्टिकम् । तस्य नश्यति तत् पापं त्रिंशद्रात्रकृतं नूप ।। “नरपते! जो प्रातः:काल उठकर भक्तिके साथ कपिला गौको घासकी मुट्ठी अर्पण करता है, उसके एक महीनेके पापोंका नाश हो जाता है ।। प्रातरुत्थाय यद्धक्त्या कुर्याद् यस्मात् प्रदक्षिणम् । प्रदक्षिणीकृता तेन पृथिवी नात्र संशय: ।। “जो सबेरे शयनसे उठकर भक्तिपूर्वक कपिला गौकी परिक्रमा करता है, उसके द्वारा समूची पृथ्वीकी परिक्रमा हो जाती है, इसमें संशय नहीं है” ।। कपिलापज्चगव्येन यः स्नायात् तु शुचिर्नर: । स गद्जद्येषु तीर्थेषु स्नातो भवति पाण्डव ।। 'पाण्डुनन्दन! जो पुरुष कपिला गौके पञ्चगव्यसे नहाकर शुद्ध होता है, वह मानो गंगा आदि समस्त तीर्थोमें स्नान कर लेता है ।। दृष्टवा तु कपिलां भव्त्या श्र॒ुत्वा हुंकारनि:स्वनम् । व्यपोहति नर: पापमहोरात्रकृतं नृप ।। “राजन! भक्तिपूर्वक कपिला गौका दर्शन करके तथा उसके रँभानेकी आवाज सुनकर मनुष्य एक दिन-रातके पापोंको नष्ट कर डालता है ।। गोसहसत्रं तु यो दद्यादेकां च कपिलां नर: । सम॑ तस्य फल प्राह ब्रह्मा लोकपितामह: ।। “एक मनुष्य एक हजार गौओंका दान करे और दूसरा एक ही कपिला गौको दानमें दे तो लोकपितामह ब्रह्माजीने उन दोनोंका फल बराबर बतलाया है ।। यस्त्वेवं कपिलां हन्यान्नर: कश्रित् प्रमादत: । गोसहसं हतं तेन भवेन्नात्र विचारणा ।। “इसी प्रकार कोई मनुष्य प्रमादवश यदि एक ही कपिला गौकी हत्या कर डाले तो उसे एक हजार गौओंके वधका पाप लगता है, इसमें संशय नहीं है ।। दश वै कपिला: प्रोक्ता: स्वयमेव स्वयम्भुवा । प्रथमा स्वर्णकपिला द्वितीया गौरपिड्जला । तृतीया रक्तपिड्डाक्षी चतुर्थी गलपिड्रला ।। पज्चमी बश्रुवर्णाभा षष्ठी च श्वेतपिड्ला । सप्तमी रक्तपिज्ञाक्षी त्वष्टमी खुरपिज्रला ।। नवमी पाटला ज्ञेया दशमी पुच्छपिड्ला । दशैता: कपिला: प्रोक्तास्तारयन्ति नरान् सदा ।। “ब्रह्माजीनी कपिला गौके दस भेद बतलाये हैं। पहली स्वर्णकपिलाः, दूसरी गौरपिंगलाः, तीसरी आरक्तपिंगाक्षीः, चौथी गलपिंगलाओ, पाँचवीं बश्रुवर्णाभाः, छठी श्वेतपिंगला*, सातवीं रक्तपिंगाक्षीग, आठवीं खुरपिंगला<, नवीं पाटला” और दसवीं पुच्छपिंगला**--ये दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी गयी हैं, जो सदा मनुष्योंका उद्धार करती हैं ।। मड़ल्याश्ष पवित्राश्न॒ सर्वपापप्रणाशना: । एवमेव हा[नड्वाहो दश प्रोक्ता नरेश्वर ।। “नरेश्वर! वे मंगलमयी, पवित्र और सब पापोंको नष्ट करनेवाली हैं। गाड़ी खींचनेवाले बैलोंके भी ऐसे ही दस भेद बताये गये हैं ।। ब्राह्मणो वाहयेत् तांस्तु नान्यो वर्ण: कथंचन । न वाहयेच्च कपिलां क्षेत्रे वाध्वनि वा द्विज: ।। “उन बैलोंको ब्राह्मण ही अपनी सवारीमें जोते। दूसरे वर्णका मनुष्य उनसे सवारीका काम किसी प्रकार भी न ले। ब्राह्मण भी कपिला गौको खेतमें या रास्तेमें न जोते ।। वाहयेद् हुडकृतेनेव शाखया वा सपत्रया । न दण्डेन न वा यष्ट्या न पाशेन न वा पुनः ।। 'गाड़ीमें जुते रहनेपर उन बैलोंको हुंकारकी आवाज देकर अथवा पत्तेवाली टहनीसे हाँके। डंडेसे, छड़ीसे और रस्सीसे मारकर न हाँके ।। नक्षुत्तृष्णाश्रमश्रान्तान् वाहयेद् विकलेन्द्रियान् । अतृप्तेषु न भुज्जीयात् पिबेत् पीतेषु चोदकम् ।। “जब बैल भूख-प्यास और परिश्रमसे थके हुए हों तथा उनकी इन्द्रियाँ घबरायी हुई हों, तब उन्हें गाड़ीमें न जोते। जबतक बैलोंको खिलाकर तृप्त न कर ले तबतक स्वयं भी भोजन न करे। उन्हें पानी पिलाकर ही स्वयं जलपान करे ।। शुश्रूषोर्मातरश्वैता: पितरस्ते प्रकीर्तिता: । अहं पूर्वत्र भागे च धुर्याणां वाहनं स्मृतम् ।। “सेवा करनेवाले पुरुषकी कपिला गौएँ माता और बैल पिता हैं। दिनके पहले भागमें ही भार ढोनेवाले बैलोंको सवारीमें जोतना उचित माना गया है ।। ' विश्रामेन्मध्यमे भागे भागे चान्ते यथासुखम् । यत्र च त्वरया कृत्यं संशयो यत्र वाध्वनि । वाहयेत् तत्र धुर्यास्तु न स पापेन लिप्यते ।। “दिनके मध्य भागमें--दुपहरीके समय उन्हें विश्राम देना चाहिये; किंतु दिनके अन्तिम भागमें अपनी रुचिके अनुसार बर्ताव करना चाहिये अर्थात् आवश्यकता हो तो उनसे काम ले और न हो तो न ले। जहाँ जल्दीका काम हो अथवा जहाँ मार्गमें किसी प्रकारका भय आनेवाला हो, वहाँ विश्रामके समय भी यदि बैलोंको सवारीमें जोते तो पाप नहीं लगता ।। भ्रूणहत्यासमं पाप॑ तस्य स्यात् पाण्डुनन्दन । अन्यथा वाहयन् राजन् निरयं याति रौरवम् ।। 'पाण्डुनन्दन! परंतु जो विशेष आवश्यकता न होनेपर भी ऐसे समयमें बैलोंको गाड़ीमें जोतता है, उसे भ्रूण-हत्याके समान पाप लगता है और वह रौरव नरकमें पड़ता है ।। रुधिरं पातयेत् तेषां यस्तु मोहान्नराधिप । तेन पापेन पापात्मा नरक॑ यात्यसंशयम् ।। “नराधिप! जो मोहवश बैलोंके शरीरसे रक्त निकाल देता है, वह पापात्मा उस पापके प्रभावसे नि:संदेह नरकमें गिरता है ।। नरकेषु च सर्वेषु समा: स्थित्वा शतं शतम् । इह मानुष्यके लोके बलीवर्दों भविष्यति ।। “वह सभी नरकोंमें सौ-सौ वर्ष रहकर इस मनुष्यलोकमें बैलका जन्म पाता है ।। तस्मात् तु मुक्तिमन्विच्छन् दद्यात् तु कपिलां नर: ।। “अतः जो मनुष्य संसारसे मुक्त होना चाहता हो, उसे कपिला गौका दान करना चाहिये ।। कपिला सर्वयज्ञेषु दक्षिणार्थ विधीयते । तस्मात् तद्दक्षिणा देया यज्ञेष्वेव द्विजातिभि: ।। “सब प्रकारके यज्ञोंमें दक्षिणा देनेके लिये कपिला गौकी सृष्टि हुई है, इसलिये द्विजातियोंको यज्ञमें उनकी दक्षिणा अवश्य देनी चाहिये ।। होमार्थ चाग्निहोत्रस्य यां प्रयच्छेत् प्रयत्नतः । श्रोत्रियाय दरिद्राय श्रान्तायामिततेजसे । तेन दानेन पूतात्मा मम लोके महीयते ।। “जो मनुष्य अग्निहोत्रके होमके लिये अमिततेजस्वी एवं धनहीन श्रोत्रिय ब्राह्मणको प्रयत्नपूर्वक कपिला गौ दानमें देता है, वह उस दानसे शुद्धचित्त होकर मेरे परमधाममें प्रतिष्ठित होता है ।। सुवर्णखुरशृर्धीं च कपिलां य: प्रयच्छति । विषुवे चायने चापि सो<श्वमेधफलं लभेत् । तेनाश्वमेधतुल्येन मम लोक॑ स गच्छति ।। “जो मनुष्य कपिलाके सींग और खुरोंमें सोना मढ़ाकर उसे विषुवयोगमें अथवा उत्तरायण-दक्षिणायनके आरम्भमें दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है तथा उस पुण्यके प्रभावसे वह मेरे लोकमें जाता है ।। अग्निष्टोमसहस््रस्थ वाजपेयं च तत्समम् | वाजपेयसहस्रस्य अश्वमेधं च तत्समम् | अश्वमेधसहस्रस्य राजसूयं च तत्समम् ।। “एक हजार अमग्निष्टोमके समान एक वाजपेय-यज्ञ होता है। एक हजार वाजपेयके समान एक अश्वमेध होता है और एक हजार अश्वमेधके समान एक राजसूय-यज्ञ होता है ।। कपिलानां सहस्रेण विधिदत्तेन पाण्डव । राजसूयफल प्राप्पय मम लोके महीयते । न तस्य पुनराव॒त्तिर्विद्यते कुरुपुड्व ।। “कुरुश्रेष्ठ पाण्डव! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे एक हजार कपिला गौओंका दान करता है, वह राजसूय-यज्ञका फल पाकर मेरे परमधाममें प्रतिष्ठित होता है; उसे पुनः इस लोकमें नहीं लौटना पड़ता ।। तैस्तैर्गुणै: कामदुधा च भूत्वा नरं प्रदातारमुपैति सा गौ: । स्वकर्मशि क्षाप्यनुबध्यमानं तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम् । महार्णवे नौरिव वायुनीता दत्ता हि गौस्तारयते मनुष्यम् ।। “दानमें दी हुई गौ अपने विभिन्न गुणोंद्वारा कामधेनु बनकर परलोकमें दाताके पास पहुँचती है। वह अपने कर्मोंसे बँधकर घोर अन्धकारपूर्ण नरकमें गिरते हुए मनुष्यका उसी प्रकार उद्धार कर देती है, जैसे वायुके सहारेसे चलती हुई नाव मनुष्यको महासागरमें डूबनेसे बचाती है ।। यथौषध॑ मन्त्रकृतं नरस्य प्रयुक्तमात्रं विनिहन्ति रोगान् | तथैव दत्ता कपिला सुपात्रे पापं नरस्याशु निहन्ति सर्वम् ।। 'जैसे मन्त्रके साथ दी हुई ओषधि प्रयोग करते ही मनुष्यके रोगोंका नाश कर देती है, उसी प्रकार सुपात्रको दी हुई कपिला गौ मनुष्यके सब पापोंको तत्काल नष्ट कर डालती है ।। यथा त्वचं वै भुजगो विहाय पुनर्नवं रूपमुपैति पुण्यम् । तथैव मुक्त: पुरुष: स्वपापै- विरिज्यते वै कपिलाप्रदानात् ।। 'जैसे साँप केंचुल छोड़कर नये स्वरूपको धारण करता है, वैसे ही पुरुष कपिला गौके दानसे पाप-मुक्त होकर अत्यन्त शोभाको प्राप्त होता है ।। यथान्धकारं भवने विलग्नं दीप्तो हि निर्यातयति प्रदीप: । तथा नर: पापमपि प्रलीनं निष्क्रामयेद् वै कपिलाप्रदानात् ।। 'जैसे प्रजवयलित दीपक घरमें फैले हुए अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार मनुष्य कपिला गौका दान करके अपने भीतर छिपे हुए पापको भी निकाल देता है ।। यस्याहिताग्नेरतिथिप्रियस्य शूद्रान्नदूरस्य जितेन्द्रियस्य । सत्यव्रतस्याध्ययनान्वितस्य दत्ता हि गौस्तारयते परत्र ।। “जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेवाला, अतिथिका प्रेमी, शूद्रके अन्नसे दूर रहनेवाला, जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा स्वाध्यायपरायण हो, उसे दी हुई गौ परलोकमें दाताका अवश्य उद्धार करती है! ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) ३. सुवर्णके समान पीले रंगवाली। २. गौर तथा पीले रंगवाली। ३. कुछ लालिमा लिये हुए पीले नेत्रोंवाली। ४. जिसके गरदनके बाल कुछ पीले हों। ५. जिसका सारा शरीर पीले रंगका हो। ६. कुछ सफेदी लिये हुए पीले रोमवाली। ७. सुर्ख और पीली आँखोंवाली। ८. जिसके खुर पीले रंगके हों। ९. जिसका हलका लाल रंग हो। १०. जिसकी पूँछके बाल पीले रंगके हों। [कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन] वैशम्पायन उवाच एवं श्रुत्वा परं पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् । धर्मपुत्र: प्रह्ष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार परम पुण्यमय कपिला गौके उत्तम दानका वर्णन सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरका मन बहुत प्रसन्न हुआ और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे पुन: इस प्रकार प्रश्न किया-- ।। देवदेवेश कपिला यदा विप्राय दीयते । कथं सर्वेषु चाड्रेषु तस्यास्तिष्ठन्ति देवता: ।। *देवदेवेश्वर! जो कपिला गौ ब्राह्मणको दानमें दी जाती है, उसके सम्पूर्ण अंगोंमें देवता किस प्रकार रहते हैं? ।। याश्चैता: कपिला: प्रोक्ता दश चैव त्वया मम । तासां कति सुरश्रेष्ठ कपिला: पुण्यलक्षणा: ।। 'सुरश्रेष्ठ आपने जो दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी हैं, उनमेंसे कितनी कपिलाएँ पुण्यमयी मानी जाती हैं"? ।। युधिष्ठिरेणैवमुक्त: केशव: सत्यवाक् तदा । गुहयानां परम॑ गुह्ां प्रवक्तुमुपचक्रमे ।। शृणु राजन् पवित्र वै रहस्यं धर्ममुत्तमम् ।। युधिष्ठिके ऐसा कहनेपर उस समय सत्यवादी भगवान् श्रीकृष्ण गोपनीयसे भी अत्यन्त गोपनीय कथा कहने लगे--'राजन्! मैं परम पवित्र, गोपनीय एवं उत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ, सुनो ।। इदं पठति य: पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् | प्रातरुत्थाय मद्धभकत्या तस्य पुण्यफलं शूणु ।। “जो मनुष्य सबेरे उठकर मुझमें भक्ति रखते हुए इस परम पुण्यमय उत्तम कपिला- दानके माहात्म्यका पाठ करता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।। मनसा कर्मणा वाचा मतिपूर्व युधिष्ठिर । पापं रात्रिकृतं हन्यादस्याध्यायस्य पाठक: ।। 'युधिष्ठिर! इस अध्यायका पाठ करनेवाला मनुष्य रात्रिमें मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा जान-बूझकर किये हुए सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। इदमावर्तमानस्तु श्राद्धे यस्तर्पयेद् द्विजान् | तस्याप्यमृतम श्रन्ति पितरोत्यन्तहर्षिता: ।। 'जो श्राद्धकालमें इस अध्यायका पाठ करते हुए ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृप्त करता है, उसके पितर अत्यन्त प्रसन्न होकर अमृत भोजन करते हैं ।। यश्चेदं शूणुयाद् भक्त्या मद्गतेनान्तरात्मना । तस्य रात्रिकृतं सर्व पापमाशु प्रणश्यति ।। “जो मुझमें चित्त लगाकर इस प्रसंगको भक्तिपूर्वक सुनता है, उसके एक रातके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।। अतः: पर विशेषं तु कपिलानां ब्रवीमि ते । यश्चैता: कपिला: प्रोक्ता दश राजन् मया तव । तासां चतस्त्र: प्रवरा: पुण्या: पापविनाशना: ।। “अब मैं कपिला गौके सम्बन्धमें विशेष बातें बतला रहा हूँ। राजन्! पहले जो मैंने तुम्हें दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी हैं, उनमें चार कपिलाएँ अत्यन्त श्रेष्ठ, पुण्य प्रदान करनेवाली तथा पाप नष्ट करनेवाली हैं ।। सुवर्णकपिला पुण्यास्तथा रक्ताक्षपिड्ला । पिड़लाक्षी च या गौश्व स्यात् पिड्लपिड्ूला ।। एताक्षुतस्त्र: प्रवरा: पवित्रा: पापनाशना: । नमस्कृता वा दृष्टा वा घ्नन्ति पापं नरस्य तु ।। 'सुवर्णकपिला, रक्ताक्षपिंगला, पिंगलाक्षी और पिंगलपिंगला--ये चार प्रकारकी कपिलाएँ श्रेष्ठ, पवित्र और पाप दूर करनेवाली हैं। इनके दर्शन और नमस्कारसे भी मनुष्यके पाप नष्ट हो जाते हैं ।। यस्यैता: कपिला: सन्ति गृहे पापप्रणाशना: । तत्र श्रीरविजय: कीर्ति: स्फीता नित्यं युधिष्ठिर ।। 'युधिष्ठिर! ये पापनाशिनी कपिला गौएँ जिसके घरमें मौजूद रहती हैं वहाँ श्री, विजय और विशाल कीर्तिका नित्य निवास होता है ।। एतासां प्रीतिमायाति क्षीरेण तु वृषध्वज: । दध्ना च त्रिदशा: सर्वे घृतेन तु हुताशनः ।। “इनके दूधसे भगवान् शंकर, दहीसे सम्पूर्ण देवता और घीसे अग्निदेव तृप्त होते हैं ।। कपिलाया घृत॑ क्षीरं दधि पायसमेव वा । श्रोत्रियेभ्य: सकृद् दत्त्वा नर: पापै: प्रमुच्यते ।। “कपिला गौके घी, दूध, दही अथवा खीरका एक बार भी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दान करके मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।। उपवासं तु यः कृत्वाप्यहोरात्रं जितेन्द्रिय: । कपिलापज्चगव्यं तु पीत्वा चान्द्रायणात् परम् ।। 'जो जितेन्द्रिय रहकर एक दिन-रात उपवास करके कपिला गौका पज्चगव्य पान करता है, उसे चान्द्रायणसे बढ़कर उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ।। सौम्ये मुहूर्ते तत् प्राश्य शुद्धात्मा शुद्धमानस: । क्रोधानृतविनिर्मुक्तो मद्गतेनान्तरात्मना ।। 'जो क्रोध और असत्यका त्याग करके मुझमें चित्त लगाकर शुभ मुहूर्तमें कपिला गौके पंचगव्यका आचमन करता है, उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है ।। कपिलापज्चगव्येन समन्त्रेण पृथक् पृथक् । यो मत्प्रतिकृतिं वापि शड्कराकृतिमेव वा । स्नापयेद् विषुवे यस्तु सो5श्वमेधफलं लभेत् ।। “जो विषुवयोगमें पृथक्-पृथक् मन्त्र पढ़कर कपिलाके पठ्चगव्यसे मेरी या शंकरकी प्रतिमाको स्नान कराता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है ।। स मुक्तपाप: शुद्धात्मा यानेनाम्बरशोभिना । मम लोकं व्रजेन्मुक्तो रुद्रलोकमथापि वा ।। “वह मुक्त, निष्पाप एवं शुद्धचित्त होकर आकाशकी शोभा बढ़ानेवाले विमानके द्वारा मेरे अथवा रुद्रके लोकमें गमन करता है ।। तस्मात् तु कपिला देया परत्र हितमिच्छता ।। यदा च दीयते राजन कपिला हाम्निहोत्रिणे । तदा च शृड्जभयोस्तस्या विष्णुरिन्द्रश्न तिष्ठत: । “राजन! इसलिये परलोकमें हित चाहनेवाले पुरुषको कपिला गौका दान अवश्य करना चाहिये। जिस समय अनि्निहोत्री ब्राह्यगको कपिला गौ दानमें दी जाती है, उस समय उसके सींगोंके ऊपरी भागमें विष्णु और इन्द्र निवास करते हैं ।। चन्द्रवज्धरौ चापि तिष्ठतः शृज्भमूलयो: । शृज्भरमध्ये तथा ब्रह्मा ललाटे गोर्वृषध्वज: ।। 'सीगोंकी जड़में चन्द्रमा और व्रजधारी इन्द्र रहते हैं। सींगोंके बीचमें ब्रह्मा तथा ललाटमें भगवान् शंकरका निवास होता है ।। ” कर्णयोरश्विनौ देवौ चक्षुपी शशिभास्करौ । दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां वाक् सरस्वती ।। रोमकूपेषु मुनयश्वर्मण्येव प्रजापति: । नि:श्वासेषु स्थिता वेदा: सघडड्रपदक्रमा: ।। दोनों कानोंमें अश्विनीकुमार, नेत्रोंमें चन्द्रमा और सूर्य, दाँतोंमें मरुदगण, जिद्लामें सरस्वती, रोमकूपोंमें मुनि, चमड़ेमें प्रजापति एवं श्वासोंमें षडंग, पद और क्रमसहित चारों वेदोंका निवास है ।। नासापुटे स्थिता गन्धा: पुष्पाणि सुरभीणि च । अधरे वसव: सर्वे मुखे चाग्नि: प्रतिष्ठित: ।। “नासिका-छिठ्रोंमें गन्ध और सुगन्धित पुष्प, नीचेके ओठमें सब वसुगण तथा मुखमें अग्नि निवास करते हैं ।। साध्या देवा: स्थिता: कक्षे ग्रीवायां पार्वती स्थिता । पृष्ठे च नक्षत्रगणा: ककुद्देशे नभ:स्थलम् ।। अपाने सर्वतीर्थानि गोमूत्रे जाह्नवी स्वयम् । अष्टैश्वर्यमयी लक्ष्मीगेमये वसते सदा ।। “कक्षमें साध्य-देवता, गरदनमें पार्वती, पीठपर नक्षत्रगण, ककुद्के स्थानमें आकाश, अपानमें सारे तीर्थ, मूत्रमें साक्षात् गंगाजी तथा गोबरमें आठ ऐश्वर्योंसे सम्पन्न लक्ष्मीजी रहती हैं ।। नासिकायां सदा देवी ज्येष्ठा वसति भामिनी । श्रोणीतटस्था: पितरो रमा लाड्गूलमाश्रिता ।। “नासिकामें परम सुन्दरी ज्येष्ठादेवी, नितम्बोंमें पितर एवं पूँछमें भगवती रमा रहती हैं ।। पार्श्वयोरुभयो: सर्वे विश्वेदेवा: प्रतिछ्तिता: । तिष्ठत्युरसि तासां तु प्रीतः शक्तिधरो गुह: ।। “दोनों पसलियोंमें सब विश्वेदेव स्थित हैं और छातीमें प्रसन्नचित्त शक्तिधारी कार्तिकेय रहते हैं ।। जानुजड्घोरुदेशेषु पञ्च तिष्ठन्ति वायव: । खुरमध्येषु गन्धर्वा: खुराग्रेषु च पन्नगा: ।। “घुटनों और ऊरुओंमें पाँच वायु रहते हैं, खुरोंके मध्यमें गन्धर्व और खुरोंके अग्रभागमें सर्प निवास करते हैं ।। चत्वार: सागरा: पूर्णास्तस्या एव पयोधरा: । रति्मेधा क्षमा स्वाहा श्रद्धा शान्तिर्धति: स्मृति: । कीर्तिर्दीप्ति: क्रिया कान्तिस्तुष्टि: पुष्टिश्ष संतति: । दिशश्न प्रदिशश्वैव सेवन्ते कपिलां सदा ।। “जलसे परिपूर्ण चारों समुद्र उसके चारों स्तन हैं। रति, मेधा, क्षमा, स्वाहा, श्रद्धा, शान्ति, धृति, स्मृति, कीर्ति, दीप्ति, क्रिया, कान्ति, तुष्टि, पुष्टि, संतति, दिशा और प्रदिशा आदि देवियाँ सदा कपिला गौका सेवन किया करती हैं ।। देवा: पितृगणाश्चापि गन्धर्वाप्सरसां गणा: । लोका द्वीपार्णवाश्नैव गड़द्या: सरितस्तथा ।। देवा: पितृगणाश्चापि वेदा: साज्रा: सहाध्वरै: | वेदोक्तैविविधैर्मन्त्रै: स्तुवन्ति हृषितास्तथा ।। विद्याधराश्च ये सिद्धा भूतास्तारागणास्तथा | पुष्पवृष्टिं च वर्षन्ति प्रनृत्यन्ति च हर्षिता: ।। “देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सराएँ, लोक, द्वीप, समुद्र, गंगा आदि नदियाँ तथा अंगों और यज्ञोंसहित सम्पूर्ण वेद नाना प्रकारके मन्त्रोंसे कपिला गौकी प्रसन्नतापूर्वक स्तुति किया करते हैं। विद्याधर, सिद्ध, भूतगण और तारागण--ये कपिला गौको देखकर फूलोंकी वर्षा करते और हर्षमें भरकर नाचने लगते हैं ।। ब्रह्मणोत्पादिता देवी वल्लिकुण्डान्महाप्रभा । नमस्ते कपिले पुण्ये सर्वदेवैर्नमस्कृते ।। कपिले5थ महासत्त्वे सर्वतीर्थमये शुभे | “वे कहते हैं--“सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित पुण्यमयी कपिलादेवी! तुम्हें नमस्कार है। ब्रह्माजीने तुम्हें अग्निकुण्डसे उत्पन्न किया है। तुम्हारी प्रभा विस्तृत और शक्ति महान् है। कपिलादेवी! समस्त तीर्थ तुम्हारे ही स्वरूप हैं और तुम सबका शुभ करनेवाली हो” ।। अहो रत्नमिदं पुण्यं सर्वदुःखध्नमुत्तमम् । अहो धर्मार्जितं शुद्धमिदमग्रयं महाधनम् ।। इत्याकाशस्थितास्ते तु सर्वदेवा जपन्ति च ।। “समस्त देवता आकाशमें खड़े होकर कहा करते हैं--“अहो! यह कपिला गौरूपी रत्न कितना पवित्र और कितना उत्तम है! यह सब दु:खोंको दूर करनेवाला है। अहा! यह धर्मसे उपार्जित, शुद्ध, श्रेष्ठ और महान् धन है” ।। युधिछिर उवाच देवदेवेश दैत्यघ्न काल: को हव्यकव्ययो: । के तत्र पूजामर्हन्ति वर्जनीयाश्व के द्विजा: ।। युधिष्ठिरने पूछा--दैत्योंके विनाशक देवदेवेश्वर! हव्य (यज्ञ) और कव्य (श्राद्ध)-का उत्तम समय कौन-सा है? उसमें किन ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये और किनका परित्याग? ।। श्रीभगवानुवाच दैवं॑ पूर्वाह्निकं ज्ञेयं पैतृक चापरात्निकम् । कालहीनं च यद् दानं तद् दानं राजसं विदु: ।। श्रीभगवानने कहा--युधिष्ठिर! देवकर्म (यज्ञ) पूर्वाह्नकालमें करने योग्य है और पितृकर्म (श्राद्ध) अपराह्नकालमें--ऐसा समझना चाहिये। जो दान अयोग्य समयमें किया जाता है, उस दानको राजस माना गया है ।। अवचषुष्टं च यद् भुक्तमनृतेन च भारत । परामृष्टं शुना वापि तद् भागं राक्षसं विदु: ।। जिसके लिये लोगोंमें ढिंढोरा पीटा गया हो, जिसमेंसे किसी असत्यवादी मनुष्यने भोजन कर लिया हो तथा जो कुत्तेसे छू गया हो, उस अन्नको राक्षसोंका भाग समझना चाहिये ।। यावन्त: पतिता विप्रा जडोन्मत्तादयो5पि च । दैवे च पित्र्ये ते विप्रा राजन् ना्हन्ति सत्क्रियाम् ।। राजन्! जितने पतित, जड और उन्मत्त ब्राह्मण हों, उनका देव-यज्ञ और पितृ-यज्ञमें सत्कार नहीं करना चाहिये ।। क्लीब: प्लीही च कुष्ठी च राजयक्ष्मान्वितश्न यः । अपस्मारी च यश्चापि पित्र्ये नाहति सत्कृतिम् ।। नपुंसक, प्लीहा रोगसे ग्रस्त, कोढ़ी और राजयक्ष्मा तथा मृगीका रोगी भी श्राद्धमें आदरके योग्य नहीं माना गया है ।। चिकित्सका देवलका मिथ्यानियमधारिण: । सोमविक्रयिणश्नपि श्राद्धे ना्हन्ति सत्कृतिम् ।। वैद्य, पुजारी, झूठे नियम धारण करनेवाले (पाखण्डी) तथा सोमरस बेचनेवाले ब्राह्मण श्राद्धमें सत्कार पानेके अधिकारी नहीं हैं ।। गायका नर्तकाश्रैव प्लवका वादकास्तथा । कथका यौधिकाश्रैव श्राद्धे नाहन्ति सत्कृतिम् ।। गवैये, नाचने-कूदनेवाले, बाजा बजानेवाले, बकवादी और योद्धा श्राद्धमें सत्कारके योग्य नहीं हैं ।। अनग्नयश्ष ये विप्रा: शवनिर्यातकाश्न ये । स्तेनाश्नापि विकर्मस्था राजन् ना्हन्ति सत्कृतिम् ।। राजन! अन्निहोत्र न करनेवाले, मुर्दा ढोनेवाले, चोरी करनेवाले और शास्त्रविरुद्ध कर्मसे संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण भी श्राद्धमें सत्कार पानेयोग्य नहीं माने जाते ।। अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपुत्राश्न ये द्विजा: । पत्रिकापुत्रकाश्चपि श्राद्धे नारहन्ति सत्कृतिम् ।। जो अपरिचित हों, जो किसी समुदायके पुत्र हों अर्थात् जिनके पिताका निश्चित पता न हो तथा जो पुत्रिका-धर्मके अनुसार नानाके घरमें रहते हों, वे ब्राह्मण भी श्राद्धके अधिकारी नहीं हैं ।। रणकर्ता च यो विप्रो यश्व॒ वाणिज्यको द्विज: । प्राणिविक्रयव॒त्तिश्न श्राद्ध नारहन्ति सत्कृतिम् ।। युद्धमें लड़नेवाला, रोजगार करनेवाला तथा पशु-पक्षियोंकी विक्रीसे जीविका चलानेवाला ब्राह्मण भी श्राद्धमें सत्कार पानेका अधिकारी नहीं है ।। चीर्णव्रतगुणैर्युक्ता नित्यं स्वाध्यायतत्परा: । सवित्रीज्ञा: क्रियावन्तस्ते श्राद्धे सत्कृतिक्षमा: ।। परंतु जो ब्राह्मण व्रतका आचरण करनेवाले, गुणवान्, सदा स्वाध्यायपरायण, गायत्रीमन्त्रके ज्ञाता और क्रियानिष्ठ हों, वे श्राद्धमें सत्कारके योग्य माने गये हैं ।। श्राद्धस्य ब्राह्मण: काल: प्राप्तं दधि घृतं तथा । दर्भा: सुमनसः: क्षेत्र तत्काले श्राद्धदो भवेत् ।। श्राद्धका सबसे उत्तम काल है सुपात्र ब्राह्यणका मिलना। जिस समय भी ब्राह्मण, दही, घी, कुशा, फूल और उत्तम क्षेत्र प्राप्त हो जाये, उसी समय श्राद्धका दान आस्मभ कर देना चाहिये ।। चारित्रनिरता राजन् कृशा ये कृशवृत्तय: । तपस्विनश्न ये विप्रास्तथा भैक्षचराश्न ये ।। अर्थिन: केचिदिच्छन्ति तेषां दत्त महत् फलम् । राजन! जो ब्राह्मण सदाचारी, थोड़ी-सी आजीविका-पर गुजारा करनेवाले, दुर्बल, तपस्वी और भिक्षासे निर्वाह करनेवाले हों, वे यदि याचक होकर कुछ माँगने आवें तो उन्हें दिये हुए दानका महान् फल होता है ।। एवं धर्मभृतां श्रेष्ठ ज्ञात्वा सर्वात्मना तदा | श्रोत्रियाय दरिद्राय प्रयच्छानुपकारिणे ।। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इन सब बातोंको पूर्णरूपसे जानकर धनहीन और अपना उपकार न करनेवाले वेदवेत्ता ब्राह्मणको दान करो ।। दानं॑ यत् ते प्रियं किंचिच्छोत्रियाणां च यत् प्रियम् । तत् प्रयच्छस्व धर्मज्ञ यदीच्छसि तदक्षयम् |। धर्मज्ञ! यदि तुम अपने दानको अक्षय बनाना चाहते हो तो जो दान तुम्हें प्रिय लगता हो तथा जिसे वेदवेत्ता ब्राह्मण पसंद करते हों, वही दान करो ।। निरयं ये च गच्छन्ति तच्छुणुष्व युधिष्ठिर ।। युधिष्ठिर! अब नरकमें जानेवाले पुरुषोंका वर्णन सुनो ।। परदारापहर्तार: परदाराभिमर्शका: । परदारप्रयोक्तारस्ते वै निरयगामिन: ।। जो परायी स्त्रीका अपहरण करते हैं, परस्त्रीके साथ व्यभिचार करते हैं और दूसरोंकी स्त्रियोंको दूसरे पुरुषोंसे मिलाया करते हैं, वे भी नरकमें पड़ते हैं ।। सूचका: संधिभेत्तार: परद्रव्योपजीविन: । वर्णाश्रमाणां ये बाह्मा:ः पाखण्डाश्वैव पापिन: । उपासते च तानेव ते सर्वे नरकालया: ।। चुगलखोर, सुलहकी शर्त तोड़नेवाले, पराये धनसे जीविका चलानेवाले, वर्ण और आश्रमसे विरुद्ध आचरण करनेवाले, पाखण्डी, पापाचारी तथा जो उनकी सेवा करते हैं, वे सब नरकगामी होते हैं ।। क्षान्तान् दान्तान् कृशान् प्राज्ञान् दीर्घकालं सहोषितान् | त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरयगामिन: ।। जो मनुष्य चिरकालतक अपने साथ रहे हुए सहनशील, जितेन्द्रिय, दुर्बल और बुद्धिमान् मनुष्योंको भी काम निकल जानेपर त्याग देते हैं, वे नरकगामी होते हैं ।। बालानामपि वृद्धानां श्रान्तानां चापि ये नरा: । अदत्त्वाश्रन्ति मृष्टान्नं ते वै निरयगामिन: ।। जो बच्चों, बूढ़ों तथा थके हुए मनुष्योंको कुछ न देकर अकेले ही मिठाई खाते हैं, उन्हें भी नरकमें गिरना पड़ता है ।। एते पूर्वर्षिभि: प्रोक्ता नरा निरयगामिन: । ये स्वर्ग समनुप्राप्तास्तान् शृणुष्व युधिष्िर ।। प्राचीन कालके ऋषियोंने इस प्रकार नरकगामी मनुष्योंका वर्णन किया है। युधिष्छिर! अब स्वर्गमें जानेवालोंका वर्णन सुनो ।। दानेन तपसा चैव सत्येन च दमेन च । ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो दान, तपस्या, सत्य-भाषण और इन्द्रियसंयमके द्वारा निरन्तर धर्माचरणमें लगे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। शुश्रूषयाप्युपाध्यायाच्छुतमादाय पाण्डव | ये प्रतिग्रहनिस्नेहास्ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। पाण्डुनन्दन! जो उपाध्यायकी सेवा करके उनसे वेद पढ़ते तथा प्रतिग्रहमें आसक्ति नहीं रखते, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। मधुमांसासवे भ्यस्तु निवृत्ता व्रतिनस्तु ये । परदारनिवृत्ता ये ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो मधु, मांस, आसव (मदिरा)-से निवृत्त होकर उत्तम व्रतका पालन करते हैं और परस्त्रीके संसर्गसे बचे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।। मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति च ये नरा: । भ्रातृणामपि सस्नेहास्ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो मनुष्य माता-पिताकी सेवा करते हैं तथा भाइयोंके प्रति स्नेह रखते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।। ये तु भोजनकाले तु निर्याताश्चातिथिप्रिया: । द्वाररोधं॑ न कुर्वन्ति ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो भोजनके समय घरसे बाहर निकलकर अतिथि-सेवा करते हैं, अतिथियोंसे प्रेम रखते हैं और उनके लिये कभी अपना दरवाजा बंद नहीं करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। वैवाहिकं तु कन्यानां दरिद्राणां च ये नरा: । कारयन्ति च कुर्वन्ति ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो दरिद्र मनुष्योंकी कन्याओंका धनियोंसे ब्याह करा देते हैं अथवा स्वयं धनी होते हुए भी दरिद्रकी कन्यासे ब्याह करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।। रसानामथ बीजानामोषधीनां तथैव च । दातार: श्रद्धयोपेतास्ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो श्रद्धापूर्वक रस, बीज और ओषधियोंका दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। क्षेमाक्षेमं च मार्गेषु समानि विषमाणि च | अर्थिनां ये च वक्ष्यन्ति ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो मार्ममें जिज्ञासा करनेवाले पथिकोंको अच्छे-बुरे, सुखदायक और दुःखदायक मार्गका ठीक-ठीक परिचय दे देते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। पर्वद्धये चतुर्दश्यामष्ट म्यां संध्ययोर्द्रयो: । आर्द्रायां जन्मनक्षत्रे विषुवे श्रवणेडथवा । ये ग्राम्यधर्मविरतास्ते नरा: स्वर्गगामिन: ।। जो अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अष्टमी--इन तिथियोंमें दोनों संध्याओंके समय, आर्द्रा नक्षत्रमें, जन्म-नक्षत्रमें, विषुव योगमें और श्रवण नक्षत्रमें सत्रीसमागमसे बचे रहते हैं, वे मनुष्य भी स्वर्गमें जाते हैं ।। हव्यकव्यविधानं च नरकस्वर्गगामिनौ । धर्माधर्मी च कथितौ कि भूय: श्रोतुमिच्छसि ।। राजन! इस प्रकार हव्य-कव्यके विधानका समय बताया गया और स्वर्ग तथा नरकमें ले जानेवाले धर्म-अधर्मोंका वर्णन किया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [ब्रह्म॒हत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन] युधिछिर उवाच इदं मे तत्त्वतो देव वक्तुमर्हस्यशेषत: । हिंसामकृत्वा यो मर्त्यों ब्रह्महत्यामवाप्नुयात् ।। युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! मनुष्य ब्राह्मणकी हिंसा किये बिना ही ब्रह्महत्याके पापसे कैसे लिप्त हो जाता है, इस विषयको पूर्णतया ठीक-ठीक बतानेकी कृपा कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच ब्राह्मणं स्वयमाहूय भिक्षार्थ वृत्तिकर्शितम् । ब्रूयान्नास्तीति यः पश्चात् तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ।। श्रीभगवान्ने कहा--राजन्! जो जीविकारहित ब्राह्मणको स्वयं ही भिक्षा देनेके लिये बुलाकर पीछे इनकार कर जाता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं ।। मध्यस्थस्येह विप्रस्थ योडनूचानस्थ भारत । वृत्तिं हरति दुर्बुद्धिस्तमाहुर्त्रह्मघातकम् ।। भरतनन्दन! जो दुष्ट बुद्धिवाला पुरुष मध्यस्थ और ब्रह्मवेत्ता ब्राह्यणकी जीविका छीन लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।। आश्रमे वा55लये वापि ग्रामे वा नगरेडपि वा । आन्निं यः प्रक्षिपेत् क्रुद्धस्तमाहुर्तब्रह्मघातकम् ।। जो क्रोधमें भरकर किसी आश्रम, घर, गाँव अथवा नगरमें आग लगा देता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।। गोकुलस्य तृषार्तस्यथ जलान्ते वसुधाधिप । उत्पादयति यो विषध्नं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ।। पृथ्वीनाथ! प्याससे तड़पते हुए गोसमुदायको जो पानीके निकट पहुँचनेमें बाधा डालता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।। यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यक् शास्त्र वा मुनिभि: कृतम् । दूषयत्यनभिज्ञाय तमाहुर्ब्रह्मयघातकम् ।। जो परम्परागत वैदिक श्रुतियों और ऋषिप्रणीत सच्छास्त्रोंपर बिना समझे-बूझे दोषारोपण करता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा कहते हैं ।। चक्षुषा वापि हीनस्य पड़ोर्वापि जडस्य वा | हरेद् वै यस्तु सर्वस्वं तमाहुर्ब्रह्मयघातकम् ।। जो अन्धे, पंगु और गूँगे मनुष्यका सर्वस्व हरण कर लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।। गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य अतिक्रम्प च शासनम् । वर्तते यस्तु मूढात्मा तमाहुर्तब्रह्मघातकम् ।। जो मूर्खतावश गुरुको 'तू” कहकर पुकारता है, हुंकारके द्वारा उनका तिरस्कार करता है तथा उनकी आज्ञाका उल्लंघन करके मनमाना बर्ताव करता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।। यावत्सारो भवेद् दीनस्तन्नाशे यस्य दुःस्थिति: । तत् सर्वस्वं हरेद् यो वै तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ।। जो दीन मनुष्य किंचित् प्राप्त वस्तुओंको ही अपने लिये सार-सर्वस्व समझता है और उनके नाशसे जिसकी दुर्दशा हो जाती है, ऐसे मनुष्यका जो पुरुष सर्वस्व छीन लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।। युधिछिर उवाच सर्वेषामपि दानानां यत् तु दानं विशिष्यते । अभोज्यान्नाश्न ये विप्रास्तान् वदस्व सुरोत्तम ।। युधिष्ठटिरने पूछा--भगवन्! जो दान सब दानोंसे श्रेष्ठ माना गया हो, उसको बतलाइये। सुरश्रेष्ठ! जिन ब्राह्मणोंका अन्न खाने योग्य न हो, उनका परिचय दीजिये ।। श्रीभगवानुवाच अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ब्रह्मपुरस्सरा: । अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति ।। श्रीभगवान्ने कहा--राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता अन्नकी प्रशंसा करते हैं, अतः अन्नके समान दान न कोई हुआ है न होगा ।। अन्नमूर्जस्करं लोके ह्वान्नात् प्राणा: प्रतिष्ठिता: । अभोज्यान्नान् मया राजन् वक्ष्यमाणान् निबोध मे ।। क्योंकि अन्न ही इस जगत्में बल देनेवाला है तथा अन्नके ही आधारपर प्राण टिके रहते हैं। राजन! अब मैं उन लोगोंका परिचय दे रहा हूँ, जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य नहीं माना गया है, ध्यान देकर सुनो ।। दीक्षितस्य कदर्यस्य क्रुद्धस्य निकृतस्य च । अभिश पप्तस्य षाण्ढस्य पाकभेदकरस्य च ।। चिकित्सकस्य दूतस्य तथा चोच्छिष्टभोजिन: । उग्रान्नं सूतकान्नं च शूद्रोच्छेषणमेव च ।। द्विषदन्न न भोक्तव्यं पतितान्नं च यच्छुतम् । यज्ञमें दीक्षित, कदर्य, क्रोधी, शठ, शापग्रस्त, नपुंसक, भोजनमें भेद करनेवाले, चिकित्सक, दूत, उच्छिष्टभोजी, वर्णसंकर तथा अशौचमें पड़े हुए मनुष्यका अन्न, शूद्रकी जूठन, शत्रुका अन्न और जो पतितका अन्न माना गया है, उसे भी नहीं खाना चाहिये ।। तथा च पिशुनस्यान्नं यज्ञविक्रयिणस्तथा ।। शैलूषं तन्तुवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च । अम्बष्ठ कनिषादानां रज्जावतरकस्य च ।। सुवर्णकर्तुर्वैणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तथा । सूतानां शौण्डिकानां च वैद्यस्य रजकस्य च ।। स्त्रीजितस्य नृशंसस्य तथा माहिषिकस्य च | अनिर्दशानां प्रेतानां गणिकानां तथैव च ।। इसी प्रकार चुगुलखोर, यज्ञका फल बेचनेवाले, नट और कपड़ा बुननेवाले जुलाहेका अन्न एवं कृतघ्नका अन्न, अम्बष्ठ, निषाद, रंगभूमिमें नाटक खेलनेवाले, सुनार, वीणा बजाकर जीनेवाले, हथियार बेचनेवाले, सूत, शराब बेचनेवाले, वैद्य, धोबी, स्त्रीके वशमें रहनेवाले, क्रूर और भैंस चरानेवालेका अन्न भी अग्राह्म माना गया है। जिनके यहाँ मरणाशौचके दस दिन न बीते हों, उनका तथा वेश्याओंका अन्न नहीं खाना चाहिये ।। राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् । आयु: सुवर्णकारान्नं यशश्वर्मविकृन्तिन: ।। राजाका अन्न तेजका, शूद्रका अन्न ब्राह्मणत्वका, सुनारका अन्न आयुका और चमारका अन्न सुयशका नाश करता है ।। गणाजन्नं गणिकान्नं च लोकेभ्य: परिकीर्तितम् । पूयं चिकित्सकस्यान्नं शुक्लं॑ तु वृषलीपते: ।। विष्टा वार्धुषिकस्यान्नं तस्मात् तत् परिवर्जयेत् । किसी समूहका और वेश्याका अन्न भी लोकनिन्दित माना गया है। वैद्यका अन्न पीब तथा व्यभिचारिणीके पतिका अन्न वीर्यके समान एवं व्याजखोरका अन्न विष्ठाके समान माना गया है, इसलिये उसका त्याग कर देना चाहिये ।। अमत्यान्नमथैतेषां भुकत्वा तु त्रियहं क्षियेत् । मत्या भुक्त्वा सकृद् वापि प्राजापत्यं चरेद् द्विज: ।। यदि अनजानमें इनका अन्न ग्रहण कर लिया गया हो तो तीन दिनतक उपवास करना चाहिये; किंतु जान-बूझकर एक बार भी इनका अन्न खा लेनेपर ब्राह्मणको प्राजापत्यव्रतका आचरण करना चाहिये ।। दानानां च फलं यद् वै शृणु पाण्डव तत्त्वतः । जलदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षय्यमन्नद: ।। पाण्डुनन्दन! अब मैं दानोंका यथार्थ फल बतला रहा हूँ, सुनो। जल-दान करनेवालेको तृप्ति होती है और अन्न देनेवालेको अक्षय सुख मिलता है ।। तिलदश्नव प्रजामिष्टां दीपदकश्नक्षुरुत्तमम् । भूमिदो भूमिमाप्रोति दीर्घमायुर्हिरण्यद: ।। तिलका दान करनेवाला मनुष्य मनके अनुरूप संतान, दीप-दान करनेवाला पुरुष उत्तम नेत्र, भूमि देनेवाला भूमि और सुवर्ण-दान करनेवाला दीर्घ आयु पाता है ।। गृहदो<ग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम् । वासोददश्चन्द्रसालोक्यमश्चिसालोक्यमश्चद: ।। गृह देनेवालेको सुन्दर भवन और चाँदी दान करनेवालेको उत्तम रूपकी प्राप्ति होती है। वस्त्र देनेवाला चन्द्रलोकमें और अश्वदान करनेवाला अश्विनीकुमारोंके लोकमें जाता है ।। अनडुहः श्रियं जुष्टां गोदो गोलोकमश्चुते । यानशब्याप्रदो भायमिश्चर्यमभयप्रद: ।। गाड़ी ढोनेवाले बैलका दान करनेवाला मनो<नुकूल लक्ष्मीको पाता है और गो-दान करनेवाला पुरुष गोलोकके सुखका अनुभव करता है। सवारी और शब्या-दान करनेवाले पुरुषको स्त्रीकी तथा अभय दान देनेवालेको एऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है ।। धान्यद: शाश्वृतं सौख्य॑ ब्रह्म॒दो ब्रह्मुसाम्पताम् । सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मुदानं विशिष्यते ।। धान्य दान करनेवाला मनुष्य शाश्वत सुख पाता है और वेद प्रदान करनेवाला पुरुष परब्रह्मकी समताको प्राप्त होता है। वेदका दान सब दानोंमें श्रेष्ठ है ।। हिरण्यभूगवाश्वाजवस्त्रशय्यासनादिषु । योअर्चितः प्रतिगृह्नाति दद्यादुचितमेव च । तावुभौ गच्छत: स्वर्ग नरकं च विपर्यये ।। जो सोना, पृथ्वी, गौ, अश्व, बकरा, वस्त्र, शय्या और आसन आदि वस्तुओंको सम्मानपूर्वक ग्रहण करता है तथा जो दाता न्यायानुसार आदरपूर्वक दान करता है, वे दोनों ही स्वर्गमें जाते हैं; परंतु जो इसके विपरीत अनुचितरूपसे देते और लेते हैं, उन दोनोंको नरकमें गिरना पड़ता है ।। अनृतं न वदेद् विद्वांस्तपस्तप्त्वा न विस्मयेत् । नार्तोज्प्यभिभवेद् विप्रान् न दत्त्वा परिकीर्तयेत् ।। विद्वान् पुरुष कभी झूठ न बोले, तपस्या करके उसपर गर्व न करे, कष्टमें पड़ जानेपर भी ब्राह्मणोंका अनादर न करे तथा दान देकर उसका बखान न करे ।। यज्ञोअनृतेन क्षरति तप: क्षरति विस्मयात् | आयुर्विप्रावमानेन दान तु परिकीर्तनात् ।। झूठ बोलनेसे यज्ञका क्षय होता है, गर्व करनेसे तपस्याका क्षय होता है, ब्राह्मणके अपमानसे आयुका और अपने मुँहसे बखान करनेपर दानका नाश हो जाता है ।। एक: प्रजायते जन्तुरेक एव प्रमीयते । एकोअ<नुभुड्क्ते सुकृतमेकश्चाप्नोति दुष्कृतम् ।। जीव अकेले जन्म लेता है, अकेले मरता है तथा अकेले ही पुण्यका फल भोगता है और अकेले ही पापका फल भोगता है ।। मृतं शरीरमुत्सूज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ । विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुवर्तते ।। बन्धु-बान्धव मनुष्यके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेके समान पृथ्वीपर डालकर मुँह फेरकर चल देते हैं। उस समय केवल धर्म ही जीवके पीछे-पीछे जाता है ।। अनागतानि कार्याणि कर्तु गणयते मन: । शारीरकं समुद्दिश्य स्मयते नूनमन्तक: ।। तस्माद् धर्मसहायस्तु धर्म संचिनुयात् सदा । धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ।। मनुष्यका मन भविष्यके कार्योंकी करनेका हिसाब लगाया करता है, किंतु काल उसके नाशवान् शरीरको लक्ष्य करके मुसकराता रहता है; इसलिये धर्मको ही सहायक मानकर सदा उसीके संग्रहमें लगे रहना चाहिये; क्योंकि धर्मकी सहायतासे मनुष्य दुस्तर नरकके पार हो जाता है ।। येषां तडागानि बहूदकानि सभाश्च कृपाश्च शुभा: प्रपाश्न । अन्नप्रदानं मधुरा च वाणी यमस्य ते निर्विषया भवन्ति ।। जिन्होंने अधिक जलसे भरे हुए अनेक सरोवर, धर्मशालाएँ, कुएँ और सुन्दर पौंसले बनवाये हैं तथा जो सदा अन्नका दान करते हैं और मीठी वाणी बोलते हैं, उनपर यमराजका जोर नहीं चलता ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार दानपात्र ब्राह्मण तथा अन्न-दानकी प्रशंसा] युधिछिर उवाच अनेकान्तं बहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीषिण: । किंलक्षणो5सौ भवति तनमे ब्रूहि जनार्दन ।। युधिष्ठिरने पूछा--जनार्दन! मनीषी पुरुष धर्मको अनेक प्रकारका और बहुत-से द्वारवाला बतलाते हैं। वास्तवमें उसका लक्षण क्या है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।। श्रीभगवानुवाच शृणु राजन् समासेन धर्मशौचविधिक्रमम् । अहिंसा शौचमक्रोधमानृशंस्यं दम: शम: । आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम् ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! तुम धर्म और शौचकी विधिका क्रम संक्षेपसे सुनो। राजेन्द्र! अहिंसा, शौच, क्रोधका अभाव, क्रूरताका अभाव, दम, शम और सरलता--ये धर्मके निश्चित लक्षण हैं ।। ब्रह्मचर्य तपः क्षान्तिर्मधुमांसस्य वर्जनम् । मर्यादायां स्थितिश्वैव शम: शौचस्य लक्षणम् ।। ब्रह्मचर्य, तपस्या, क्षमा, मधु-मांसका त्याग, धर्म-मर्यादाके भीतर रहना और मनको वशमें रखना--ये सब शौच (पवित्रता)-के लक्षण हैं ।। बाल्ये विद्यां निषेवेत यौवने दारसंग्रहम् । वार्थके मौनमातिषछेत् सर्वदा धर्ममाचरेत् ।। मनुष्यको चाहिये कि वह बचपनमें विद्याध्ययन करे, युवावस्था होनेपर स्त्रीके साथ विवाह करे और बुढ़ापेमें मुनिवृत्तिका आश्रय ले एवं धर्मका आचरण सदा ही सब अवस्थाओंमें करता रहे ।। ब्राह्मणान् नावमन्येत गुरून् परिवदेन्न च । यतीनामनुकूल: स्यादेष धर्म: सनातन: ।। ब्राह्मगोंका अपमान न करे, गुरुजनोंकी निन््दा न करे और संन्यासी महात्माओंके अनुकूल बर्ताव करे--यह सनातन धर्म है ।। यतिर्गुरुद्धिजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरु: । पतिरेव गुरु: स्त्रीणां सर्वेषां पार्थिवो गुरु: ।। ब्राह्मणोंका गुरु संन्यासी है, चारों वर्णोंका गुरु ब्राह्मण है, समस्त स्त्रियोंके लिये गुरु उनका पति है और सबका गुरु राजा है ।। एकदण्डी त्रिदण्डी वा शिखी वा मुण्डितो5पि वा । काषायदण्डधारो<5पि यति: पूज्यो न संशय: ।। संन्यासी एक दण्ड धारण करनेवाला हो या तीन दण्ड, बड़ी-बड़ी जटाएँ रखता हो या माथा मुँडाये रहता हो अथवा गेरुआ वस्त्र पहननेवाला हो, निःसंदेह उसका सत्कार करना चाहिये ।। तस्मात् तु यत्नतः पूज्या मद्धभक्ता मत्परायणा: । मयि संन्यस्तकर्माण: परत्र हितकाडुक्षिभि: ।। इसलिये जो परलोकमें अपना कल्याण चाहते हों, उन पुरुषोंको उचित है कि वे मुझमें समस्त कर्मोंका अर्पण करनेवाले मेरे शरणागत भक्तोंका यत्नपूर्वक सत्कार करें ।। प्रहरेन्न द्विजान् विप्रो गां न हन्यात् कदाचन । भ्रूणहत्यासमं चैव उभयं यो निषेवते ।। ब्राह्मणोंपर हाथ न छोड़े और गायको कभी न मारे। जो ब्राह्मण इन दोनोंपर प्रहार करता है, उसे भ्रूणह॒त्याके समान पाप लगता है ।। नाग्निं मुखेनोपधमेन्न च पादौ प्रदापयेत् । नाथ: कुर्यात् कदाचित् तु न पृष्ठ परितापयेत् ।। अग्निको मुँहसे न फूँके, पैरोंको आगपर न तपावे और आगको पैरसे न कुचले तथा पीठकी ओरसे अग्निका सेवन न करे ।। श्वचण्डालादिश्ि: स्पृष्टो नाड़मग्नौ प्रतापयेत् सर्वदेवमयो वल्निस्तस्माच्छुद्ध: सदा स्मृशेत् ।। जो मनुष्य कुत्ते या चाण्डालसे छू गया हो, उसे अपना अंग अग्निमें नहीं तपाना चाहिये; क्योंकि अग्नि सर्वदेवतारूप है। अतः सदा शुद्ध होकर उसका स्पर्श करना चाहिये ।। प्राप्तमूत्रपुरीषस्तु न स्पृशेद् वल्निमात्मवान् । यावत् तु धारयेद् वेगं तावदप्रयतो भवेत् ।। मल या मूत्रकी हाजत होनेपर बुद्धिमान् पुरुषको अग्निका स्पर्श नहीं करना चाहिये, क्योंकि जबतक यह मल-मूत्रका वेग धारण करता है, तबतक अशुद्ध रहता है ।। युधिछिर उवाच कीदृशा: साधवो विदप्रास्तेभ्यो दत्त महाफलम् । कीदृशेभ्यो हि दातव्यं तन्मे ब्रूहि जनार्दन ।। युधिष्ठटिरने पूछा--जनार्दन! जिनको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है, वे श्रेष्ठ ब्राह्मण कैसे होते हैं तथा किस प्रकारके ब्राह्मणोंको दान देना चाहिये? यह मुझे बताइये ।। श्रीभगवानुवाच अक्रोधना: सत्यपरा धर्मनित्या जितेन्द्रिया: । तादृशा: साधवो वित्रास्ते भ्यो दत्त महाफलम् ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! जो क्रोध न करनेवाले, सत्यपरायण, सदा धर्ममें लगे रहनेवाले और जितेन्द्रिय हों, वे ही श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं तथा उन्हींको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है ।। अमानिन: सर्वसहा दृष्टार्था विजितेन्द्रिया: । सर्वभूतहिता मैत्रास्तेभ्यो दत्त महाफलम् ।। जो अभिमानशून्य, सब कुछ सहनेवाले, शास्त्रीय अर्थके ज्ञाता, इन्द्रियजयी, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितकारी, सबके साथ मैत्रीका भाव रखनेवाले हैं, उनको दिया हुआ दान महान् फलदायक है ।। अलुब्धा: शुचयो वैद्या ह्वीमन्त: सत्यवादिन: । स्वधर्मनिरता ये तु तेभ्यो दत्त महाफलम् ।। जो निलभ, पवित्र, विद्वान, संकोची, सत्यवादी और स्वधर्मपरायण हों, उनको दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है ।। साड्रांश्न चतुरो वेदान् योडधीयेत दिने दिने । शूद्रान्नं यस्य नो देहे तत् पात्रमृषयो विदु: ।। जो प्रतिदिन अंगोंसहित चारों वेदोंका स्वाध्याय करता हो और उसके उदरमें शूद्रका अन्न न पड़ा हो, उसको ऋषियोंने दानका उत्तम पात्र माना है ।। प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च समन्वित: । तारयेत् तत्कुलं सर्वमेको5पीह युधिष्ठिर ।। युधिष्ठिर! यदि शुद्ध बुद्धि, शास्त्रीय ज्ञान, सदाचार और उत्तम शीलसे युक्त एक ब्राह्मण भी दान ग्रहण कर ले तो वह दाताके समस्त कुलका उद्धार कर देता है ।। गामश्वमन्नं वित्त वा तद्विधे प्रतिपादयेत् । निशम्य तु गुणोपेतं ब्राह्म॒णं साधुसम्मतम् । दूरादाह्वत्य सत्कृत्य तं प्रयत्नेन पूजयेत् ।। ऐसे ब्राह्मणको गाय, घोड़ा, अन्न और धन देना चाहिये। सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित किसी गुणवान् ब्राह्मणका नाम सुनकर उसे दूरसे भी बुलाना और प्रयत्नपूर्वक उसका सत्कार तथा पूजन करना चाहिये ।। युधिछिर उवाच धर्माधर्मविधिस्त्वेवं भीष्मेण सम्प्रभाषितम् । भीष्मवाक्यात् सारभूत॑ वद धर्म सुरेश्वर ।। युधिष्ठिरने कहा--देवेश्वर! धर्म और अधर्मकी इस विधिका भीष्मजीने विस्तारके साथ वर्णन किया था। आप उनके वचनोंमेंसे सारभूत धर्म छाँटकर बतलाइये ।। श्रीभगवानुवाच अन्नेन धार्यते सर्व जगदेतच्चराचरम् | अन्नात् प्रभवति प्राण: प्रत्यक्ष नास्ति संशय: ।। श्रीभगवान् बोले--राजन्! समस्त चराचर जगत् अन्नके ही आधारपर टिका हुआ है। अन्नसे प्राणकी उत्पत्ति होती है, यह बात प्रत्यक्ष है; इसमें संशय नहीं है ।। कलनत्र॑ पीडयित्वा तु देशो काले च शक्तित: । दातव्यं भिक्षवे चान्नमात्मनो भूतिमिच्छता ।। अतः अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको स्त्रीको कष्ट देकर अर्थात् उसके भोजनमेंसे बचाकर भी देश और कालका विचार करके भिक्षुकको शक्तिके अनुसार अवश्य अन्नदान करना चाहिये ।। विप्रमध्वपरिश्रान्तं बाल॑ वृद्धमथापि वा | अर्चयेद् गुरुवत् प्रीतो गृहस्थो गृहमागतम् ।। ब्राह्मण बालक हो अथवा बूढ़ा, यदि वह रास्तेका थका-माँदा घरपर आ जाय तो गृहस्थ पुरुषको बड़ी प्रसन्नताके साथ गुरुकी भाँति उसका सत्कार करना चाहिये ।। क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सर: । अर्चयेदतियथिं प्रीत: परत्र हितभूतये ।। परलोकमें कल्याणकी प्राप्तिके लिये मनुष्यको अपने प्रकट हुए क्रोधको भी रोककर, मत्सरताका त्याग करके सुशीलता और प्रसन्नतापूर्वक अतिथिकी पूजा करनी चाहिये ।। अतिथिं नावमन्येत नानृतां गिरमीरयेत् । न पृच्छेद् गोत्रचरणं नाधीतं वा कदाचन ।। गृहस्थ पुरुष कभी अतिथिका अनादर न करे, उससे झूठी बात न कहे तथा उसके गोत्र शाखा और अध्ययनके विषयमें भी कभी प्रश्न न करे ।। चण्डालो वा श्रव॒पाको वा काले य: कश्षिदागत: । अन्नेन पूजनीय: स्यात् परत्र हितमिच्छता ।। भोजनके समयपर चाण्डाल या श्वपाक (महा चाण्डाल) भी घर आ जाय तो परलोकमें हित चाहनेवाले गृहस्थको अन्नके द्वारा उसका सत्कार करना चाहिये ।। पिधाय तु गृहद्वारं भुड्धक्ते योऊचन्न प्रह्ष्टवान् । स्वर्गद्वारपिधानं वै कृतं तेन युधिष्ठिर ।। युधिष्ठिर! जो (किसी भिक्षुकके भयसे) अपने घरका दरवाजा बंद करके प्रसन्नतापूर्वक भोजन करता है, उसने मानो अपने लिये स्वर्गका दरवाजा बंद कर दिया है ।। पितृन् देवानूषीन् विप्रानतिथींश्व निराश्रयान् । यो नर: प्रीणयत्यन्नैस्तस्थ पुण्यफलं महत् ।। जो देवताओं, पितरों, ऋषियों, ब्राह्मणों, अतिथियों और निराश्रय मनुष्योंको अन्नसे तृप्त करता है, उसको महान् पुण्यफलकी प्राप्ति होती है ।। कृत्वा तु पापं बहुशो यो दद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणाय विशेषेण सर्वपापै: प्रमुच्यते ।। जिसने अपने जीवनमें बहुत-से पाप किये हों, वह भी यदि याचक ब्राह्मणको विशेषरूपसे अन्नदान करता है तो सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।। अन्नद: प्राणदो लोके प्राणद: सर्वदो भवेत् । तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ।। संसारमें अन्न देनेवाला पुरुष प्राणदाता माना जाता है और जो प्राणदाता है, वही सब कुछ देनेवाला है। अतः कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अन्नका दान विशेषरूपसे करना चाहिये ।। अन्न हामृतमित्याहुरन्नं प्रजननं स्मृतम् । अन्नप्रणाशे सीदन्ति शरीरे पजच धातव: ।। अन्नको अमृत कहते हैं और अन्न ही प्रजाको जन्म देनेवाला माना गया है। अन्नके नाश होनेपर शरीरके पाँचों धातुओंका नाश हो जाता है ।। बल॑ बलवतो नश्येदन्नहीनस्य देहिन: । तस्मादन्नं विशेषेण श्रद्धयाश्रद्धयापि वा ।। बलवान पुरुष भी यदि अन्नका त्याग कर दे तो उसका बल नष्ट हो जाता है। इसलिये श्रद्धासे हो या अश्रद्धासे, अधिक चेष्टा करके अन्न-दान देना चाहिये ।। आदत्ते हि रसं सर्वमादित्य: स्वगभस्तिभि: । वायुस्तस्मात् समादाय रसं मेघेषु धारयेत् ।। सूर्य अपनी किरणोंसे पृथ्वीका सारा रस खींचते हैं और हवा उसे लेकर बादलोंमें स्थापित कर देती है ।। तत् तु मेघगतं भूमौ शक्रो वर्षति तादृशम् । तेन दिग्धा भवेद् देवी मही प्रीता च भारत ।। भरतनन्दन! बादलोंमें पड़े हुए उस रसको इन्द्र पुनः: इस पृथ्वीपर बरसाते हैं। उससे आप्लावित होकर पृथ्वी देवी तृप्त होती हैं ।। तस्यां सस्यानि रोहन्ति यैर्जीवन्त्यखिला: प्रजा: । मांसमेदो5स्थिमज्जानां सम्भवस्तेभ्य एव हि ।। तब उसमेंसे अन्नके पौधे उगते हैं, जिनसे सम्पूर्ण प्रजाका जीवन-निर्वाह होता है। मांस, मेद, अस्थि और मज्जाकी उत्पत्ति नाना प्रकारके अन्नसे ही होती है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध] युधिछिर उवाच अन्नदानपल श्र॒त्वा प्रीतो5स्मि मधुसूदन । भोजनस्य विधिं वक्तुं देवदेव त्वमहसि ।। युधिषछ्िरने कहा--देवाधिदेव मधुसूदन! अन्न-दानका फल सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, अब आप भोजनकी विधि बतानेकी कृपा कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच भोजनस्य द्विजातीनां विधानं शूणु पाण्डव । स्नात: शुचि: शुचौ देशे निर्जने हुतपावक: ।। मण्डलं कारयित्वा च चतुरसंर द्विजोत्तम: । क्षत्रियश्वेत् ततो वृत्तं वैश्यो<र्थेन्दुसमाकृतम् ।। श्रीभगवान् बोले--पाण्डुनन्दन! द्विजातियोंके भोजनका जो विधान है, उसे सुनो। श्रेष्ठ द्विजको उचित है कि वह स्नान करके पवित्र हो अग्निहोत्र करनेके बाद शुद्ध और एकान्त स्थानमें बैठकर ब्राह्मण हो तो चौकोना, क्षत्रिय हो तो गोलाकार और वैश्य हो तो अर्धचन्द्राकार मण्डल बनावे ।। आरर्द्रपादस्तु भुञ्जीयात् प्राडमुखश्वासने शुचौ । पादाभ्यां धरणीं स्पृष्टवा पादेनैकेन वा पुनः ।। उसके बाद पैर धोकर उसी मण्डलमें बिछे हुए शुद्ध आसनके ऊपर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जाय और दोनों पैरोंसे अथवा एक पैरके द्वारा पृथ्वीका स्पर्श किये रहे ।। नैकवासास्तु भुज्जीयान्न चान्तर्धाय वा द्विज: । न भिजन्नपात्रे भुज्जीत पर्णपृष्ठे तथैव च ।। द्विज एक वस्त्र पहनकर तथा सारे शरीरको कपड़ेसे ढककर भी भोजन न करे। इसी प्रकार फूटे हुए बर्तनमें तथा उलटी पत्तलमें भी भोजन करना निषिद्ध है ।। अन्न पूर्व नमस्कुर्यात् प्रह्ृष्टेनान््तरात्मना । नान्यदालोकयेदन्नान्न जुगुप्सेत तत्पर: ।। भोजन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि प्रसन्नचित्त होकर पहले अन्नको नमस्कार करे। अन्नके सिवा दूसरी ओर दृष्टि न डाले तथा भोजन करते समय परोसे हुए अन्नकी निन्दा न करे ।। जुगुप्सितं च यच्चान्न॑ राक्षसा एव भुज्जते । पाणिना जलमुद्धृत्य कुर्यादन्न॑ प्रदक्षिणम् ।। जिस अन्नकी निन्दा की जाती है, उसे राक्षस खाते हैं! भोजन आरम्भ करनेसे पहले हाथमें जल लेकर उसके द्वारा अन्नकी प्रदक्षिणा करे ।। पज्च प्राणाहुती: कुर्यात् समन्त्रं तु पूृथक् पृथक् ।। फिर मन्त्र पढ़कर पृथक्-पृथक् पाँचों प्राणोंको अन्नकी आहुति दे ।। यथा रसं न जानाति जिद्दा प्राणाहुतौ नूप । तथा समाहित: कुर्यात् प्राणाहुतिमतन्द्रित: ।। राजन! प्राणोंको आहुति देते समय स्थिरचित्त और सावधान होकर इस प्रकार प्राणोंको आहुति दे जिससे जिह्वाको रसका ज्ञान न हो ।। विदित्वान्नमथान्नादं पञ्च प्राणांक्ष॒ पाण्डव । यः कुर्यादाहुती: पड्च तेनेष्टा: पडच वायव: ।। पाण्डुनन्दन! अन्न, अन्नाद और पाँचों प्राणोंके तत्वको जानकर जो प्राणाग्निहोत्र करता है, उसके द्वारा पज्चवायुओंका यजन हो जाता है ।। अतो<न््यथा तु भुज्जानो ब्राह्माणो ज्ञानदुर्बल: । तेनान्नेनासुरान् प्रेतान् राक्षसांस्तर्पयिष्यति ।। इसके विपरीत भोजन करनेवाला मूर्ख ब्राह्मण अन्नके द्वारा असुर, प्रेत और राक्षसोंको ही तृप्त करता है ।। वकक्त्रप्रमाणान् पिण्डांश्व ग्रसेदकैकश: पुन: । वक्त्राधिकं तु यत् पिण्डमात्मोच्छिष्टं तदुच्यते ।। प्राणोंको आहुति देनेके पश्चात् अपने मुखमें पड़ने लायक एक-एक ग्रास अन्न उठाकर भोजन करे। जो ग्रास अपने मुखमें जानेकी अपेक्षा बड़ा होनेके कारण एक बारमें न खाया जा सके, उसमेंसे बचा हुआ ग्रास अपना उच्छिष्ट कहा जाता है ।। पिण्डावशिष्टमन्यच्च वक्त्रान्निस्सृतमेव च । अभोज्यं तद् विजानीयाद्ू भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् । ग्राससे बचे हुए तथा मुँहसे निकले हुए अन्नको अखाद्य समझे और उसे खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करे ।। स्वमुच्छिष्ट॑ तु यो भुड्क्ते यो भुड्क्ते मुक्तमोजनम् ।। चान्द्रायणं चरेत् कृच्छों प्राजापत्यमथापि वा । जो अपना जूठा खाता है तथा एक बार खाकर छोड़े हुए भोजनको फिर ग्रहण करता है, उसको चान्द्रायण, कृच्छु अथवा प्राजापत्य-व्रतका आचरण करना चाहिये ।। स्त्रीपात्रभुडनर: पाप: स्त्रीणामुच्छिष्ट भुक्तथा । तया सह च यो भुदुक्ते स भुड्त्ते मद्यमेव हि । न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभि: ।। जो पापी स्त्रीके भोजन किये हुए पात्रमें भोजन करता है, स्त्रीका जूठा खाता है तथा सत्रीके साथ एक बर्तनमें भोजन करता है, वह मानो मदिरा पान करता है। तत्त्वदर्शी मुनियोंने उस पापसे छूटनेका कोई प्रायश्चित्त ही नहीं देखा है ।। पिबत: पतिते तोये भोजने मखनिस्सृते । अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक््त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।। यदि पानी पीते-पीते उसकी बूँद मुँहले निकलकर भोजनमें गिर पड़े तो वह खानेयोग्य नहीं रह जाता। जो उसे खा लेता है, उस पुरुषको चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।। पीतशेषं तु तन्नाम न पेयं पाण्डुनन्दन । पिबेद् यदि हि तन्मोहाद् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।। पाण्डुनन्दन! इसी प्रकार पीनेसे बचा हुआ पानी भी पुनः पीनेके योग्य नहीं रहता। यदि कोई ब्राह्मण मोहवश उसको पी ले तो उसे चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।। मौनी वाप्यथवा भूमौ नावलोक्य दिशस्तथा । भुज्जीत विधिवद् विप्रो न चोच्छिष्ट॑ प्रदापयेत् ।। ब्राह्णणको उचित है कि वह मौन होकर पृथ्वी या दिशाओंकी ओर न देखते हुए विधिवत् भोजन करे, किसीको अपना जूठा न दे ।। सदा चात्यशन नद्यान्नातिहीनं च कर्िचित् । यथान्नेन व्यथा न स्यात् तथा भुज्जीत नित्यश: ।। कभी भी न तो बहुत अधिक और न कम ही भोजन करे। प्रतिदिन उतना ही अन्न खाय, जिससे अपनेको कष्ट न हो ।। केशकीटोपपन्नं च मुखमारुतवीजितम् । अभोज्यं तद् विजानीयाद्ू भुक््त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।। जिस भोजनमें बाल या कोई कीड़ा पड़ा हो, जिसे मुँहसे फूँककर ठंडा किया गया हो उसको अखाद्य समझना चाहिये। ऐसे अन्नको भोजन कर लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।। उत्थाय च पुन: स्मृष्टं पादस्पृष्टं च लड्घितम् । अन्न तद् राक्षसं विद्यात् तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ।। भोजनके स्थानसे उठ जानेके बाद जिसे फिर छू दिया गया हो, जो पैरसे छू गया या लाँघ दिया गया हो, वह राक्षसके खानेयोग्य अन्न है; ऐसा समझकर उसका त्याग कर देना चाहिये ।। यद्युत्तिष्ठत्यनाचान्तो भुक्तवानासनात् ततः । स््नान॑ सद्यः प्रकुर्वीत सोडन्यथाप्रयतो भवेत् ।। यदि आचमन किये बिना ही भोजन करनेवाला द्विज भोजनके आसनसे उठ जाय तो उसे तुरंत स्नान करना चाहिये, अन्यथा वह अपवित्र ही रहता है ।। युधिछिर उवाच तृणमुष्टिविधानं च तिलमाहात्म्यमेव च । इक्षो: सोमसमुद्भूतिं वक्तुमहसि मानद ।। युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! गौओंके आगे घासकी मुट्ठी डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य क्या है तथा गन्नेसे चन्द्रमाकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है--यह बतानेकी कृपा कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच पितरो वृषभा ज्ञेया गावो लोकस्य मातर: | तासां तु पूजया राजन पूजिता: पितृदेवता: ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! बैलोंको जगत्का पिता समझना चाहिये और गौएँ संसारकी माताएँ हैं, उनकी पूजा करनेसे सम्पूर्ण पितरों और देवताओंकी पूजा हो जाती है ।। सभा प्रपा गृहाश्वापि देवतायतनानि च । शुद्धयन्ति शकृता यासां कि भूतमधिकं ततः ।। जिनके गोबरसे लीपनेपर सभा-भवन, पौंसले, घर और देवमन्दिर भी शुद्ध हो जाते हैं, उन गौओंसे बढ़कर और कौन प्राणी हो सकता है? ।। ग्रासमुष्टिं परगवे दद्यात् संवत्सरं तु यः । अकृत्वा स्वयमाहार प्राप्तस्तत् सार्वकालिकम् ।। जो मनुष्य एक सालतक स्वयं भोजन करनेके पहले प्रतिदिन दूसरेकी गायको मुदट्टठीभर घास खिलाया करता है, उसको प्रत्येक समय गौकी सेवा करनेका फल प्राप्त होता है ।। गावो मे मातर: सर्वा: पितरश्रैव गोवृषा: । ग्रासमुष्टिं मया दत्तं प्रतिगृह्लीत मातर: ।। गोमाताके सामने घास रखकर इस प्रकार कहना चाहिये--'संसारकी समस्त गौएँ मेरी माताएँ और सम्पूर्ण वृषभ मेरे पिता हैं। गोमाताओ! मैंने तुम्हारी सेवामें यह घासकी मुद्दी अर्पण की है, इसे स्वीकार करो” ।। इत्युक्त्वानेन मन्त्रेण गायत्र्या वा समाहित: । अभिमन्त्र्य ग्रासमुष्टिं तस्य पुण्यफलं शृणु ।। यह मन्त्र पढ़कर अथवा गायत्रीका उच्चारण करके एकाग्रचित्तसे घासको अभिमन्त्रित करके गौको खिला दे। ऐसा करनेसे जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होती है, उसे सुनो ।। यत् कृतं दुष्कृतं तेन ज्ञानतोऊज्ञानतो5डपि वा । तस्य नश्यति तत् सर्व दुःस्वप्नं च विनश्यति ।। उस पुरुषने जान-बूझकर या अनजानमें जो-जो पाप किये होते हैं, वह सब नष्ट हो जाते हैं तथा उसको कभी बुरे स्वप्न नहीं दिखायी देते ।। तिला: पवित्रा: पापघ्ना नारायणसमुद्धवा: । तिलान श्राद्धे प्रशंसन्ति दानं चेदमनुत्तमम् ।। तिल बड़े पवित्र और पापनाशक होते हैं, भगवान् नारायणसे उनकी उत्पत्ति हुई है। इसलिये श्राद्धमें तिलकी बड़ी प्रशंसा की गयी है और तिलका दान अत्यन्त उत्तम दान बताया गया है ।। तिलान् दद्यात् तिलान् भक्ष्यात् तिलान् प्रातरुपस्पृशेत् | तिल॑ तिलमिति ब्रूयात् तिला: पापहरा हि ते ।। तिल दान करे, तिल भक्षण करे और सबेरे तिलका उबटन लगाकर स्नान करे तथा सदा ही अपने मुहसे “तिल-तिल” का उच्चारण किया करे; क्योंकि तिल सब पापोंको नष्ट करनेवाले होते हैं ।। तिलान् न पीडयेद् विप्रो यन्त्रचक्रे स्वयं नूप । पीडयन् हि द्विजो मोहान्नरकं॑ याति रौरवम् ।। राजन! ब्राह्मणको स्वयं तिल पेरनेकी मशीनमें तिल डालकर तेल नहीं पेरना चाहिये। जो मोहवश स्वयं ही तिल पेरता है, वह रौरव नरकमें पड़ता है ।। इक्षुवंशोद्धव: सोम: सोमवंशोद्भवा द्विजा: । तस्मान्न पीडयेदिक्षुं यन्त्रचक्रे द्विजोत्तम: ।। युधिष्ठिर! चन्द्रमा इक्षु (गन्ने)-के वंशमें उत्पन्न हुआ है और ब्राह्मण चन्द्रमाके वंशमें उत्पन्न हुए हैं। इसलिये ब्राह्मणको कोल्हूमें गन्ना नहीं पेरना चाहिये ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन] युधिछिर उवाच समुच्चयं च धर्माणां भोज्याभोज्यं तथैव च । श्रुतं मया त्वत्प्रसादादापद्धर्म वदस्व मे ।। युधिष्ठिरने कहा--भगवन्! आपकी कृपासे मैंने सब धर्मोके संग्रहका एवं भोजनके योग्य और भोजनके अयोग्य अन्नका विषय भी सुन लिया। अब कृपा करके आपद्धर्मका वर्णन कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच दुर्भिक्षे राष्ट्रसम्बाधे5प्याशौचे मृतसूतके । धर्मकाले5ध्वनि तथा नियमो येन लुप्यते ।। दूराध्वगमनात् खिन्नो द्विजालाभेडथ शूद्रत: । अकृतान्न॑ तु यत् किंचिद् गृह्नीयादात्मवृत्तये ।। श्रीभगवान् बोले--राजन्! जब देशमें अकाल पड़ा हो, राष्ट्रके ऊपर कोई आपत्ति आयी हो, जन्म या मृत्युका सूतक हो तथा कड़ी धूपमें रास्ता चलना पड़ा हो और इन सब कारणोंसे नियमका निर्वाह न हो सके तथा दूरका मार्ग तै करनेके कारण विशेष थकावट आ गयी हो, उस अवस्थामें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके न मिलनेपर शूद्रसे भी जीवन- निर्वाहके लिये थोड़ा-सा कच्चा अन्न लिया जा सकता है ।। आतुरो दु:ःखितो वापि तथार्तो वा बुभुक्षित: । भुज्जन्नविधिना विद्र: प्रायश्षित्तायते न च ।। रोगी, दुखी, पीड़ित और भूखा ब्राह्मण यदि विधि-विधानके बिना भोजन कर ले तो भी उसे प्रायश्चित्त नहीं लगता ।। अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूलं घृतं पय: । हविर्त्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम् ।। जल, मूल, घी, दूध, हवि, ब्राह्मणकी इच्छा पूर्ण करना, गुरुकी आज्ञाका पालन और ओषधि--इन आठोंके सेवनसे व्रतका भंग नहीं होता ।। अशक्तो विधिवत कर्तु प्रायश्चित्तानि यो नर: । विदुषां वचनेनापि दानेनापि विशुद्धयति ।। जो मनुष्य विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करनेमें असमर्थ हो, वह विद्वानोंके वचनसे तथा दानके द्वारा भी शुद्ध हो सकता है ।। अनृतावृतुकाले वा दिवा रात्रौ तथापि वा । प्रोषितस्तु स्त्रियं गच्छेत् प्रायश्षित्तीयते न च ।। परदेशमें रहनेवाला पुरुष यदि कुछ कालके लिये घर आवे तो वह ऋतुकालमें तथा उससे भिन्न समयमें भी, रातमें या दिनमें भी अपनी स्त्रीके साथ समागम करनेपर प्रायश्रित्तका भागी नहीं होता ।। युधिछिर उवाच प्रशस्या: कीदृशा विदप्रा निन्द्याश्चापि सुरेश्वर । अष्टकायाश्च कः कालस्तन्मे कथय सुव्रत ।। युधिष्ठिरने पूछा--उत्तम व्रतका पालन करनेवाले देवेश्वर! कैसे ब्राह्मण प्रशंसाके योग्य होते हैं और कैसे निन्दाके योग्य? तथा अष्टका-श्राद्धका कौन-सा समय है? यह मुझे बताइये ।। श्रीभगवानुवाच कुलीन: कर्मकृद् वैद्यस्तथा चाप्यानृशंस्यवान् । श्रीमानृजु: सत्यवादी पात्रा: सर्व इमे द्विजा: ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! उत्तम कुलमें उत्पन्न, शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले, विद्वान, दयालु, श्रीसम्पन्न, सरल और सत्यवादी--ये सभी ब्राह्मण सुपात्र (प्रशंसाके योग्य) माने जाते हैं ।। एते चाग्रासनस्थास्ते भुठ्जाना: प्रथमं द्विजा: । तस्यां पद्धक्तयां तु ये चान्ये तान् पुनन्त्येव दर्शनात् ।। ये आगेके आसनपर बैठकर सबसे पहले भोजन करनेके अधिकारी हैं तथा उस पंक्तिमें जितने लोग बैठे होते हैं, उन सबको ये अपने दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं ।। मद्भक्ता ये द्विजश्रेष्ठा मद्गता मत्परायणा: । तान् पद्धक्तिपावनान् विद्धि पूज्यांश्नैव विशेषतः ।। जो श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझमें मन लगानेवाले और मेरे शरणागत भक्त हों, उन्हें पड्क्तिपावन समझो। वे विशेषरूपसे पूजा करनेके योग्य हैं ।। निन्द्यान् शृणु द्विजान् राजन्नपि वा वेदपारगान् ।। ब्राह्मणच्छञग्मना लोके चरत: पापकारिण: । राजन्! अब निन्दाके योग्य ब्राह्मणोंका वर्णन सुनो। जो ब्राह्मण संसारमें कपटपूर्ण बर्ताव करते हैं, वे वेदोंके पारगामी विद्वान् होनेपर भी पापाचारी ही माने जाते हैं ।। अनग्निरनधीयान: प्रतिग्रहरुचिस्तु यः ।। यतस्ततस्तु भुञ्जानस्तं विद्याद् ब्रह्मदूषकम् । जो अग्निहोत्र और स्वाध्याय न करता हो, सदा दान लेनेकी ही रुचि रखता हो और जहाँ-कहीं भी भोजन कर लेता हो, उसको ब्राह्मगजातिका कलंक समझना चाहिये ।। मृतसूतकपुष्टाड़ो यश्च शूद्रान्नभुग् द्विज: । अहं चापि न जानामि गति तस्य नराधिप ।। शूद्रान्नरसपुष्टाड़्ोडप्यधीयानो हि नित्यश: । जपतो जुह्वतो वापि गतिरूर्ध्व न विद्यते ।। नरेश्वरर जिसका शरीर मरणाशौचका अन्न खाकर मोटा हुआ हो, जो शूद्रका अन्न भोजन करता हो और शूटद्रके ही अन्नके रससे पुष्ट हुआ हो, उस ब्राह्मणकी किस प्रकार गति होती है, मैं नहीं जानता; क्योंकि प्रतिदिन स्वाध्याय, जप और होम करनेपर भी उसकी उत्तम गति नहीं होती ।। आहितान्निश्च यो विप्र: शूद्रान्नान्न निवर्तते । पज्च तस्य प्रणश्यन्ति आत्मा ब्रह्म त्रयो5ग्नय: ।॥। जो ब्राह्मण प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेपर भी शूद्रके अन्नसे बचा न रहता हो, उसके आत्मा, वेदाध्ययन और तीनों अग्नि--इन पाँचोंका नाश हो जाता है ।। शूद्रप्रेषणकर्त श्व ब्राह्मणस्य विशेषत: । भूमावन्नं प्रदातव्यं श्वशृगालसमो हि सः ।। शूद्रकी सेवा करनेवाले ब्राह्मणको खानेके लिये विशेषत: जमीनपर ही अन्न डाल देना चाहिये; क्योंकि वह कुत्ते और गीदड़के ही समान होता है ।। प्रेतभूतं तु यः शूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बल: । अनुगच्छेन्नीयमान त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।। जो ब्राह्मण मूर्खतावश मरे हुए शूद्रके शवके पीछे-पीछे श्मशानभूमिमें जाता है, उसको तीन रातका अशौच लगता है ।। त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे नदीं गत्वा समुद्रगाम् । प्राणायामशतं कृत्वा घृतं प्राश्य विशुद्धयति ।। तीन रात पूर्ण होनेपर किसी समुद्रमें मिलनेवाली नदीके भीतर स्नान करके सौ बार प्राणायाम करे और घी पीवे तो वह शुद्ध होता है ।। अनाथं ब्रद्दाणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजोत्तमा: | पदे पदे<श्वमेधस्य फल ते प्राप्रुवन्ति हि ।। जो श्रेष्ठ द्विज किसी अनाथ ब्राह्मणके शवको श्मशानमें ले जाते हैं, उन्हें पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है ।। न तेषामशुभं किंचित् पापं वा शुभकर्मणाम् | जलावगाहनादेव सद्य: शौचं विधीयते ।। उन शुभ कर्म करनेवालोंको किसी प्रकारका अशुभ या पाप नहीं लगता। वे जलनमें स्नान करनेमात्रसे तत्काल शुद्ध हो जाते हैं ।। शूद्रवेश्मनि विप्रेण क्षीर॑ं वा यदि वा दधि । निवृत्तेन न भोक्तव्यं विद्धि शूद्रान्नमेव तत् ।। निवृत्तिमार्गपरायण ब्राह्मणको शूद्रके घरमें दूध या दही भी नहीं खाना चाहिये। उसे भी शूद्रात्न ही समझना चाहिये ।। विप्राणां भोक्तुकामानामत्यन्तं चान्नकाड्क्षिणाम् । यो विघ्नं कुरुते मर्त्यस्ततो नान्यो5स्ति पापकृत् ।। अत्यन्त भूखे होनेके कारण अन्नकी इच्छावाले ब्राह्मणोंके भोजनमें जो मनुष्य विधघ्न डालता है, उससे बढ़कर पापी दूसरा कोई नहीं है ।। सर्वे च वेदा: सह षड्भिरज्जैः सांख्यं पुराणं च कुले च जन्म । नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति शीलव्यपेतस्य नृप द्विजस्य ।। राजन! यदि ब्राह्मण शील एवं सदाचारसे रहित हो जाय तो छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेद, सांख्य, पुराण और उत्तम कुलका जन्म--ये सब मिलकर भी उसे सद्गति नहीं दे सकते ।। ग्रहोपरागे विषुवे5यनान्ते पित्रये मघासु स्वसुते च जाते । गयेषु पिण्डेषु च पाण्डुपुत्र दत्तं भवेन्निष्कसहस्रतुल्यम् ।। पाण्डुनन्दन! ग्रहणके समय, विषुवयोगमें, अयन समाप्त होनेपर, पितृकर्म (श्राद्ध आदि)-में, मघा-नक्षत्रमें, अपने यहाँ पुत्रका जन्म होनेपर तथा गयामें पिण्डदान करते समय जो दान दिया जाता है, वह एक हजार स्वर्णमुद्राके दान देनेके समान होता है ।। वैशाखमासस्य तु या तृतीया- नवद्यासौ कार्त्तिकशुक्लपक्षे नभस्यमासस्य च कृष्णपक्षे त्रयोदशी पञठचदशी च माघे ।। उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्न श्राद्धस्य कालो हायनद्वये च । पानीयमप्यत्र तिलैविंमि श्रं दद्यात् पितृभ्य: प्रयतो मनुष्य: । श्राद्ध कृतं तेन समा सहस रहस्यमेतत् पितरो वदन्ति ।। वैशाखमासकी शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्लपक्षकी तृतीया, भाद्रपद मासकी कृष्णा त्रयोदशी, माघकी अमावास्या, चन्द्रमा और सूर्यका ग्रहण तथा उत्तरायण और दक्षिणायनके प्रारम्भिक दिन--ये श्राद्धके उत्तम काल हैं। इन दिनोंमें मनुष्य पवित्रचित्त होकर यदि पितरोंके लिये तिलमिश्रित जलका भी दान कर दे तो उसके द्वारा एक हजार वर्षतक श्राद्ध किया हुआ हो जाता है। यह रहस्य स्वयं पितरोंका बतलाया हुआ है ।। यस्त्वेकपड्क्त्यां विषमं ददाति स्नेहाद् भयाद् वा यदि वार्थहेतो: । क़रूरं दुराचारमनात्मवन्तं ब्रह्मघ्नमेनं कवयो वदन्ति ।। जो मनुष्य स्नेह या भयके कारण अथवा धन पानेकी इच्छासे एक पंक्तिमें बैठे हुए लोगोंको भोजन परोसनेमें भेद करता है, उसे विद्वान पुरुष क्रूर, दुराचारी, अजितात्मा और ब्रह्महत्यारा बतलाते हैं ।। धनानि येषां विपुलानि सन्ति नित्यं रमन््ते परलोकमूढा: । तेषामयं शत्रुवरघ्न लोको नान्यत् सुखं देहसुखे रतानाम् ।। शत्रुसूदन! जिनके पास धनका भण्डार भरा हुआ है और जो परलोकके विषयमें कुछ भी न जाननेके कारण सदा भोग-विलासमें ही रम रहे हैं, वे केवल दैहिक सुखमें ही आसक्त हैं। अतः उनके लिये इस लोकका ही सुख सुलभ है; पारलौकिक सुख तो उन्हें कभी नहीं मिलता ।। ये चैव मुक्तास्तपसि प्रयुक्ता: स्वाध्यायशीला जरयन्ति देहम् जितेन्द्रिया भूतहिते निविष्टा- स्तेषामसौ चापि परक्षु लोक: ।। जो विषयोंकी आसक्तिसे मुक्त होकर तपस्यामें संलग्न रहते हों, जिन्होंने नित्य स्वाध्याय करते हुए अपने शरीरको दुर्बल कर दिया हो, जो इन्द्रियोंको वशमें रखते हों और समस्त प्राणियोंके हित-साधनमें लगे रहते हों, उनके लिये इस लोकका भी सुख सुलभ है और परलोकका भी ।। ये चैव विद्यां न तपो न दानं न चापि मूढा: प्रजने यतन्ते । न चापि गच्छन्ति सुखानि भोगां- स्तेषामयं चापि परश्न नास्ति ।। परंतु जो मूर्ख न विद्या पढ़ते हैं, न तप करते हैं, न दान देते हैं, न शास्त्रानुसार संतानोत्पादनका प्रयत्न करते हैं और न अन्य सुख-भोगोंका ही अनुभव कर पाते हैं, उनके लिये न इस लोकमें सुख है न परलोकमें ।। युधिछिर उवाच नारायण पुराणेश लोकावास नमोउस्तु ते । श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन धर्मसारसमुच्चयम् ।। युधिष्ठिरने कहा--भगवन्! आप साक्षात् नारायण, पुरातन ईश्वर और सम्पूर्ण जगतके निवासस्थान हैं। आपको नमस्कार है। अब मैं सम्पूर्ण धर्मोका सार पूर्णतया श्रवण करना चाहता हूँ ।। श्रीभगवानुवाच धर्मसारं महाप्राज्ञ मनुना प्रोक्तमादित: । प्रवक्ष्यामि मनुप्रोक्तं पौराणं श्रुतिसंहितम् ।। श्रीभगवान् बोले--महाप्राज्ञ! मनुजीने सृष्टिके आदिकालमें जो धर्मके सार-तत्त्वका वर्णन किया है, वह पुराणोंके अनुकूल और वेदके द्वारा समर्थित है। उसी मनुप्रोक्त धर्मका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ।। अग्निचित्कपिला सत्री राजा भिक्षुर्महोदधि: । दृष्टमात्रात् पुनन्त्येते तस्मात् पश्येत तान् सदा ।। अन्निहोत्री द्विज, कपिला गौ, यज्ञ करनेवाला पुरुष, राजा, संन्यासी और महासागर-- ये दर्शनमात्रसे मनुष्यको पवित्र कर देते हैं, इसलिये सदा इनका दर्शन करना चाहिये ।। बहूनां न प्रदातव्या गौर्वस्त्रं शयनं स्त्रिय: । तादगभूतं तु तद् दानं दातारं नोपतिष्ठति ।। एक गौ, एक वस्त्र, एक शय्या और एक स्त्रीको कभी अनेक मनुष्योंके अधिकारमें नहीं देना चाहिये; क्योंकि वैसा करनेपर उस दानका फल दाताको नहीं मिलता ।। मा ददात्विति यो ब्रूयाद् ब्राह्मणेषु च गोषु च । तिर्यग्योनिशतं गत्वा चण्डालेषूपजायते ।। जो ब्राह्मणको और गौको आहार देते समय “मत दो” कहकर मना करता है, वह सौ बार पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेकर अन्तमें चाण्डाल होता है ।। ब्राह्मणस्वं च यद् दैवं दरिद्रस्यैव यद् धनम् । गुरोश्वापि हृतं राजन् स्वर्गस्थानपि पातयेत् ।। राजन! ब्राह्मणका, देवताका, दरिद्रका और गुरुका धन यदि चुरा लिया जाय तो वह स्वर्गवासियोंको भी नीचे गिरा देता है ।। धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परम॑ं श्रुति: । द्वितीयं धर्मशास्त्राणि तृतीयं लोकसंग्रह: ।। जो धर्मका तत्त्व जानना चाहते हैं, उनके लिये वेद मुख्य प्रमाण हैं, धर्मशास्त्र दूसरा प्रमाण है और लोकाचार तीसरा प्रमाण है ।। आसमुद्राच्च यत् पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात् हिमाद्रिविन्ध्ययोर्म ध्यमार्यावर्त प्रचक्षते ।। पूर्व समुद्रसे लेकर पश्चिम समुद्रतक और हिमालय तथा विन्ध्याचलके बीचका जो देश है, उसे आर्यावर्त कहते हैं ।। सरस्वतीदृषद्धत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तद् देवनिर्मित देशं ब्रह्मावर्त्त प्रचक्षते ।। सरस्वती और दृषद्वती--इन दोनों देवनदियोंके बीचका जो देवताओंद्वारा रचा हुआ देश है, उसे ब्रह्मावर्त कहते हैं ।। यस्मिन् देशे य आचार: पारम्पर्यक्रमागत: । वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ।। जिस देशमें चारों वर्णों तथा उनके अवान्तर भेदोंका जो आचार पूर्वपरम्परासे चला आता है, वही उनके लिये सदाचार कहलाता है ।। कुरुक्षेत्र च मत्स्याश्न पजचाला: शूरसेनय: । एते ब्रद्मर्षिदेशास्तु ब्रह्मावर्तादनन्तरा: ।। कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाउ्चाल और शूरसेन--ये ब्रह्मर्षियोंके देश हैं और ब्रह्मावर्तके समीप हैं ।। एतददेशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन: । स्वं चरित्र च गृह्लीयुः पृथिव्यां सर्वमानवा: ।। इस देशगमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंक पास जाकर भूमण्डलके सम्पूर्ण मनुष्योंको अपने- अपने आचरणकी शिक्षा लेनी चाहिये ।। हिमवद्विन्ध्ययोर्म ध्यं यत्प्राग्विशसनादपि । प्रत्यगेव प्रयागात् तु मध्यदेश: प्रकीर्तित: ।। हिमालय और विन्ध्याचलके बीचमें कुरुक्षेत्रसे पूर्व और प्रयागसे पश्चिमका जो देश है, वह मध्यदेश कहलाता है ।। कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावत: । स ज्ञेयो याज्ञिको देशो म्लेच्छदेशस्तत: परम् ।। जिस देशमें कृष्णसार नामक मृग स्वभावत: विचरा करता है, वही यज्ञके लिये उपयोगी देश है; उससे भिन्न म्लेच्छोंका देश है ।। एतान् विज्ञाय देशांस्तु संश्रयेरन् द्विजातय: । शूद्रस्तु यस्मिन् कस्मिन् वा निवसेद् वृत्तिकर्शित: ।। इन देशोंका परिचय प्राप्त करके द्विजातियोंको इन्हींमें निवास करना चाहिये; किंतु शूद्र जीविका न मिलनेपर निर्वाहके लिये किसी भी देशमें निवास कर सकता है ।। आचार: प्रथमो धर्मो हाहिंसा सत्यमेव च | दान॑ं चैव यथाशक्ति नियमाश्चन् यमै: सह ।। सदाचार, अहिंसा, सत्य, शक्तिके अनुसार दान तथा यम और नियमोंका पालन--ये मुख्य धर्म हैं ।। वैदिकै: कर्मभि: पुण्यैर्निषेकादिदद्धिजन्मनाम् | कार्य: शरीरसंस्कार: पावन: प्रेत्य चेह च ।। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टिपर्यन्त सब संस्कार वेदोक्त पवित्र विधियों और मन्त्रोंके अनुसार कराना चाहिये; क्योंकि संस्कार इहलोक और परलोकमें भी पवित्र करनेवाला है ।। गर्भहोमैर्जातकर्मनामचौलोपनायनै: । स्वाध्यायैस्तद् व्रतैश्नेव विवाहस्नातकव्रतै: ॥। महायजैश्न यज्जैश्न ब्राह्मीयं क्रियते तनु: ।। गर्भाधान-संस्कारमें किये जानेवाले हवनके द्वारा और जातकर्म, नामकरण, चूड़ाकरण, यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन, वेदोक्त व्रतोंके पालन, स्नातकके पालनेयोग्य व्रत, विवाह, पञ्चमहायज्ञोंके अनुष्ठान तथा अन्यान्य यज्ञोंके द्वारा इस शरीरको परब्रह्मकी प्राप्तिके योग्य बनाया जाता है ।। धर्मार्थी यदि न स्यातां शुश्रूषा वापि तद्विधा । विद्या तस्मिन् न वक्तव्या शुभं बीजमिवोषरे ।। जिससे न धर्मका लाभ होता हो, न अर्थका तथा विद्याप्राप्तिके अनुकूल जो सेवा भी नहीं करता हो, उस शिष्यको विद्या नहीं पढ़नी चाहिये, ठीक उसी तरह जैसे ऊसर खेतमें उत्तम बीज नहीं बोया जाता ।। लौकिकं वैदिकं वापि तथा<<ध्यात्मिकमेव वा । यस्माउज्ञानमिदं प्राप्तं त॑ पूर्वमभिवादयेत् ।। जिस पुरुषसे लौकिक, वैदिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ हो, उस गुरुको पहले प्रणाम करना चाहिये ।। सव्येन सव्यं संगृहा दक्षिणेन तु दक्षिणम् | न कुर्यादेकहस्तेन गुरो: पादाभिवादनम् ।। अपने दाहिने हाथसे गुरुका दाहिना चरण और बायें हाथसे उनका बायाँ चरण पकड़कर प्रणाम करना चाहिये। गुरुको एक हाथसे कभी प्रणाम नहीं करना चाहिये ।। निषेकादीनि कर्माणि य: करोति यथाविधि । अध्यापयति चैवैनं स विप्रो गुरुरुच्यते ।। जो गर्भाधान आदि सब संस्कार विधिवत् कराता है और वेद पढ़ाता है, वह ब्राह्मण गुरु कहलाता है ।। कृत्वोपनयन वेदान् यो5ध्यापयति नित्यश: । सकल्पान् सरहस्यांश्व॒ स चोपाध्याय उच्यते ।। जो उपनयन-संस्कार कराकर कल्प और रहस्यों-सहित वेदोंका नित्य अध्ययन कराता है, उसे उपाध्याय कहते हैं ।। साड़ांश्न॒ वेदानध्याप्य शिक्षयित्वा व्रतानि च । विवृणोति च मन्त्रार्थनाचार्य: सोडभिधीयते ।। जो षडड़युक्त वेदोंको पढ़ाकर वैदिक व्रतोंकी शिक्षा देता है और मन्त्रार्थोंकी व्याख्या करता है, वह आचार्य कहलाता है ।। उपाध्यायाद् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता । पितु: शतगुणं माता गौरवेणातिरिच्यते ।। गौरवमें दस उपाध्यायोंसे बढ़कर एक आचार्य, सौ आचार्योंसे बढ़कर पिता और सौ पितासे भी बढ़कर माता है ।। एतेषामपि सर्वेषां गरीयान् ज्ञानदो गुरु: । गुरो: परतरं किंचिन्न भूतं न भविष्यति ।। किंतु जो ज्ञान देनेवाले गुरु हैं, वे इन सबकी अपेक्षा अत्यन्त श्रेष्ठ हैं। गुरुसे बढ़कर न कोई हुआ, न होगा ।। तस्मात् तेषां वशे तिष्ेच्छुश्रूषापरमो भवेत् । अवमानद्धि तेषां तु नरक॑ स्यान्न संशय: ।। इसलिये मनुष्यको उपर्युक्त गुरुजनोंके अधीन रहकर उनकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहना चाहिये। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि गुरुजनोंके अपमानसे नरकमें गिरना पड़ता है ।। हीनाड्नतिरिक्ताड़न् विद्याहीनान् वयोडधिकान् । रूपद्रविणहीनांश्व जातिहीनांश्न नाक्षिपेत् ।। जो लोग किसी अंगसे हीन हों, जिनका कोई अंग अधिक हो, जो विद्यासे हीन, अवस्थाके बूढ़े, रूप और धनसे रहित तथा जातिसे भी नीच हों, उनपर आक्षेप नहीं करना चाहिये ।। शपता यत् कृतं पुण्यं शप्यमानं तु गच्छति । शप्यमानस्य यत् पापं शपन्तमनुगच्छति ।। क्योंकि आक्षेप करनेवाले मनुष्यका पुण्य, जिसका आक्षेप किया जाता है, उसके पास चला जाता है और उसका पाप आक्षेप करनेवालेके पास चला आता है ।। नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोध॑ तैक्ष्ण्यं विवर्जयेत् ।। नास्तिकता, वेदोंकी निन््दा, देवताओंपर दोषारोपण, द्वेष, दम्भ, अभिमान, क्रोध तथा कठोरता--इनका परित्याग कर देना चाहिये ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [अग्निके स्वरूपमें अग्निहोत्रकी विधि तथा उसके माहात्म्यका वर्णन] युधिष्ठिर उदाच कथं तद् ब्राह्मणैदेव होतव्यं क्षत्रियै: कथम् | वैश्यैर्वा देवदेवेश कथं वा सुहुतं भवेत् ।। युधिषछ्िरने पूछा--देवदेवेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको किस प्रकार हवन करना चाहिये? और उनके द्वारा किस प्रकार किया हुआ हवन शुभ होता है? ।। कत्यग्नय: किमात्मान: स्थानं कि कस्य वा विभो | कतरस्मिन् हुते स्थान कं व्रजेदाग्निहोत्रिक: ।। विभो! अग्निके कितने भेद हैं? उनके पृथक्-पृथक् स्वरूप क्या हैं? किस अग्निका कहाँ स्थान है? अग्निहोत्री पुरुष किस अग्निमें हवन करके किस लोकको प्राप्त होता है? ।। अग्निहोत्रनिमित्तं च किमुत्पन्नं पुरानघ । कथमेवाथ हूयन्ते प्रीयन्ते च सुरा: कथम् ।। निष्पाप! पूर्वकालमें अग्निहोत्र किसके निमित्तसे उत्पन्न हुआ था? देवताओंके लिये किस प्रकार हवन किया जाता है और कैसे उनकी तृप्ति होती है? ।। विधिवन्न्मन्त्रवत् कृत्वा पूजितास्वग्नय: कथम् | कां गतिं वदतां श्रेष्ठ नयन्ति हाग्निहोत्रिण: ।। प्रवक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! विधिके अनुसार मन्त्रोंसहित पूजा की जानेपर तीनों अग्नियाँ अग्निहोत्रीको किस प्रकार किस गतिको प्राप्त कराती हैं? ।। दुर्हताश्नापि भगवन्नविज्ञातास्त्रयोडग्नय: । किमाहिताग्ने: कुर्वन्ति दुश्चीर्णा वापि केशव ।। भगवन्! केशव! यदि तीनों अग्नियोंके स्वरूपको न जानकर उनमें अविधिपूर्वक हवन किया जाय अथवा उनकी उपासनामें त्रुटि रह जाय तो वे त्रिविध अग्नि अग्निहोत्रीका क्या अनिष्ट करते हैं? ।। उत्सन्नाग्निस्तु पापात्मा कां योनिं देव गच्छति । एतत् सर्व समासेन भक््त्या ह्युपगतस्य मे । वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ सर्वाधिक नमोस्तु ते ।। देवेश्वर! जिसने अग्निका परित्याग कर दिया हो, वह पापात्मा किस योनिमें जन्म लेता है? ये सारी बातें संक्षेपमें मुझे सुनाइये; क्योंकि मैं भक्तिभावसे आपकी शरणमें आया हूँ। भगवन्! आप सर्वज्ञ हैं, सबसे महान् हैं; अत: आपको मैं नमस्कार करता हूँ ।। श्रीभगवानुवाच शृणु राजन् महापुण्यमिदं धर्मामृतं परम् यत् तु तारयते युक्तान् ब्राह्मणानग्निहोत्रिण: ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! इस महान् पुण्यदायक और परम धर्मरूपी अमृतका वर्णन सुनो। यह धर्मपरायण अग्निहोत्री ब्राह्मणोंको भवसागरसे पार कर देता है ।। ब्रह्मत्वेनासूजं लोकानहमादौ महाद्ुते । सृष्टो अग्निर्मुखत: पूर्व लोकानां हितकाम्यया ।। महातेजस्वी महाराज! मैंने सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्मस्वरूपसे सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की और लोगोंकी भलाईके लिये अपने मुखसे सर्वप्रथम अग्निको प्रकट किया ।। यस्मादग्रे स भूतानां सर्वेषां निर्मितो मया । तस्मादग्नीत्यभिहित:ः पुराणज्ैर्मनीषिभि: |। इस प्रकार अग्नि-तत्त्व मेरे द्वारा सब भूतोंके पहले उत्पन्न किया गया है, इसलिये पुराणोंके ज्ञाता मनीषी विद्वान् उसे अग्नि कहते हैं ।। यस्मात् तु सर्वकृत्येषु पूर्वमस्मै प्रदीयते । आहुतिर्दीप्पमानाय तस्मादग्नीति कथ्यते ।। समस्त कार्योमें सबसे आगे प्रज्वलित आगमें ही आहुति दी जाती है, इसलिये यह अग्नि कहा जाता है ।। यस्माच्च तु नयत्यग्रां गतिं विप्रान् सुपूजित: । तस्माच्च नयनादू राजन देवेष्वग्नीति कथ्यते ।। राजन! यह भलीभाँति पूजित होनेपर ब्राह्मणोंको अम्र्यगति (परमपद)-की प्राप्ति कराता है, इसलिये भी देवताओंमें अग्निके नामसे विख्यात है ।। यस्माच्च दुर्ुत: सो5यमलं भक्षयितु क्षणात् । यजमानं नरश्रेष्ठ क्रव्यादो5ग्निस्ततः स्मृत: ।। सर्वभूतात्मको राजन् देवानामेष वै मुखम् | नरोत्तम! यदि इसमें विधिका उल्ललड्घन करके हवन किया जाय तो यह एक क्षणमें ही यजमानको खा जानेकी शक्ति रखता है, इसलिये अग्निको क्रव्याद कहा गया है। राजन! यह अग्नि सम्पूर्ण भूतोंका स्वरूप और देवताओंका मुख है ।। तेन सप्तर्षय: सिद्धा: संयतेन्द्रियबुद्धयः । गता हामरसायुज्यं ते हाग्न्यर्चनतत्परा: ।। अतः इन्द्रियों और मन-बुद्धिपर संयम रखनेवाले सिद्ध सप्तर्षिगण अग्निकी आराधनामें तत्पर रहनेके कारण ही देवताओंके स्वरूपको प्राप्त हुए हैं ।। अग्निहोत्रप्रकारं च शृणु राजन् समाहित: । त्रयाणां गुणनामानि वल्लीनामुच्यते मया ।। राजन्! अब एकाग्रचित्त होकर अग्निहोत्रका प्रकार सुनो। अब मैं तीनों अग्नियोंके गुणके अनुसार नाम बता रहा हूँ ।। गृहाणां हि पतित्वं हि गृहपत्यमिति स्मृतम् । गृहपत्यं तु यस्यासीत् तत् तस्माद् गार्हपत्यता ।। गृहोंका आधिपत्य ही गृहपत्य माना गया है। यह गृहपत्य जिस अम्निमें प्रतिष्ठित है, वही 'गार्हपत्य अग्नि” के नामसे प्रसिद्ध है ।। यजमानं तु यस्मात् तु दक्षिणां तु गति नयेत् । दक्षिणाग्निं तमाहुस्ते दक्षिणायतनं द्विजा: ।। जो अग्नि यजमानको दक्षिण मार्गसे स्वर्गमें ले जाता है, उस दक्षिणमें रहनेवाले अग्निको ब्राह्मणलोग “दक्षिणाग्नि' कहते हैं ।। आहुति: सर्वमाख्याति हव्यं वै वहन॑ स्मृतम् सर्वहव्यवहों वल्निर्गतश्नाहवनीयताम् ।। “आहुति' शब्द सर्वका वाचक है और हवन नाम ही है हव्यका। सब प्रकारके हव्यको स्वीकार करनेवाला वह्नलि 'आहवनीय अग्नि” कहलाता है ।। ब्रह्मा च गार्हपत्यो5ग्निस्तस्मिन्नेव हि सो5भवत् । दक्षिणानिनिस्त्वयं रुद्र: क्रोधात्मा चण्ड एव सः ।। गार्हपत्य अनिन ब्रह्माका स्वरूप है, क्योंकि ब्रह्माजीसे ही उसका प्रादुर्भाव हुआ है और यह दक्षिणाग्नि रुद्रस्वरूप है, क्योंकि वह क्रोधरूप और प्रचण्ड है ।। अहमाहवनीयोडग्निराहोमाद् यस्य वै मुखे । होमके आरम्भसे लेकर अन्ततक जिसके मुखमें आहुति डाली जाती है, वह आहवनीय अग्नि स्वयं मैं हूँ ।। पृथिवीमन्तरिक्षं च दिवमृषिगणै: सह । जयत्याहवनीयं यो जुहुयाद् भक्तिमान् नर: ।। जो मनुष्य भक्तियुक्त चित्तसे प्रतिदिन आहवनीय अग्निमें हवन करता है, वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष और ऋषियों-सहित स्वर्गलोकपर भी अधिकार प्राप्त कर लेता है ।। अआभिमुख्येन होमस्तु यस्य यज्ञेषु वर्तते । तेनाप्याहवनीयत्वं गतो वदल्िर्महाद्युति: ।। यज्ञोंमें सब ओरसे अग्निके मुखमें हवन किया जाता है, इसलिये वह अत्यन्त कान्तिमान् अग्नि 'आहवनीय:' संज्ञाको प्राप्त होता है ।। आहोमादन्निहात्रेषु यज्ञैर्वा यत्र सर्वश:ः । यस्मात् तस्मात् प्रवर्तन्ते ततो हाहवनीयता ।। अग्निहोत्र अथवा अन्यान्य यज्ञोंमें होमके आरम्भसे ही अग्निके भीतर सब प्रकारसे आहुति डाली जाती है, इसलिये भी उसे आहवनीय कहते हैं ।। आध्यात्मिक चाधिदैवमाधिभौतिकमेव च । एतत् तापत्रयं प्रोक्तमात्मवद्धिर्नराधिप ।। नरेश्वर! आत्मवेत्ता विद्वानोंने आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक--ये तीन प्रकारके दुःख बतलाये हैं ।। यस्माद् वै त्रायते दुःखादू यजमानं हुतोडनल: । तस्मात् तु विधिवत प्रोक्तमग्निहोत्रमिति श्रुतौ ।। विधिवत् होम करनेपर अग्नि इन तीनों प्रकारके दुःखोंसे यजमानका त्राण करता है, इसलिये उस कर्मको वेदमें अग्निहोत्र नाम दिया गया है |। तदग्निहोत्रं सृष्ट वै ब्राह्मणा लोककर्त॒णा । वेदाश्षाप्यग्निहोत्रं तु जज्ञिरे स््वयमेव तु ।। विश्वविधाता ब्रह्माजीने ही सबसे पहले अग्निहोत्रको प्रकट किया। वेद और अग्निहोत्र स्वतः उत्पन्न हुए हैं ।। अन्निहोत्रफला वेदा: शीलवृत्तफलं श्रुतम् । रतिपुत्रफला दारा दत्तभुक्तफलं धनम् ।। वेदाध्ययनका फल अमनि्निहोत्र है (अर्थात् वेद पढ़कर जिसने अग्निहोत्र नहीं किया, उसका वह अध्ययन निष्फल है)। शास्त्रज्ञाकका फल शील और सदाचार है, स्त्रीका फल रति और पुत्र है तथा धनकी सफलता दान और उपभोग करनेमें है ।। त्रिवेदमन्त्रसंयोगादग्निहोत्र प्रवर्तते । ऋग्यजु: सामश्रि: पुण्य: स्थाप्यते सूत्रसंयुतैः ।। तीनों वेदोंके मन्त्रोंके संयोगसे अग्निहोत्रकी प्रवृत्ति होती है। ऋकू, यजु: और सामवेदके पवित्र मन्त्रों तथा मीमांसासूृत्रोंके द्वारा अग्निहोत्र-कर्मका प्रतिपादन किया जाता है ।। वसन्ते ब्राह्मणस्य स्यादाधेयोग्निर्नराधिप । वसन्तो ब्राह्मणो ज्ञेयो वेदयोनि: स उच्यते ।। नरेश्वर! वसन्त-ऋतुको ब्राह्मणका स्वरूप समझना चाहिये तथा वह वेदकी योनिरूप है, इसलिये ब्राह्मणको वसन्त-ऋतुमें अग्निकी स्थापना करनी चाहिये ।। अग्न्याधेयं तु येनाथ वसन्ते क्रियतेडनघ । तस्य श्रीर्रह्यवद्धिश्न ब्राह्मणस्य विवर्धते ।। निष्पाप! जो वसन्त-ऋतुमें अग्न्याधान करता है, उस ब्राह्मणकी श्रीवृद्धि होती है तथा उसका वैदिक ज्ञान भी बढ़ता है ।। क्षत्रियस्याग्निराधेयो ग्रीष्मे श्रेष्ठ: स वै नृप । येनाधान तु वै ग्रीष्मे क्रियते तस्य वर्धते । श्री: प्रजा: पशवश्नैव वित्तं तेजो बल॑ यश: ।। राजन! क्षत्रियके लिये ग्रीष्म-ऋतुमें अग्न्याधान करना श्रेष्ठ माना गया है। जो क्षत्रिय ग्रीष्म-ऋतुमें अग्नि-स्थापना करता है, उसकी सम्पत्ति, प्रजा, पशु, धन, तेज, बल और यशकी अभिवृद्धि होती है ।। शरदृतौ तु वैश्यस्य ह्वाधानीयो हुताशन: । शरद्रात्रं स्वयं वैश्यो वैश्ययोनि: स उच्यते ।। शरत्कालकी रात्रि साक्षात् वैश्यका स्वरूप है, इसलिये वैश्यको शरदू-ऋतुमें अग्निका आधान करना चाहिये; उस समयकी स्थापित की हुई अग्निको वैश्य योनि कहते हैं ।। शरद्याधानमेवं वै क्रियते येन पाण्डव । तस्यापि श्री: प्रजायुश्च॒ पशवोर्थश्न वर्धते ।। पाण्डुनन्दन! जो वैश्य शरद-ऋतुमें अग्निकी स्थापना करता है, उसकी सम्पत्ति, प्रजा, आयु, पशु और धनकी वृद्धि होती है ।। रसा: स्नेहास्तथा गन्धा रत्नानि मणयस्तथा । काज्चनानि च लौहानि हाग्निहोत्रकृते5भवन् ।। सब प्रकारके रस, घी आदि स्निग्ध पदार्थ, सुगन्धित द्रव्य, रत्न, मणि, सुवर्ण और लोहा--इन सबकी उत्पत्ति अग्निहोत्रके लिये ही है ।। आयुर्वेदो धनुर्वेदो मीमांसा न्यायविस्तर: । धर्मशास्त्रं च तत्सर्वमग्निहोत्रकृते कृतम् ।। अग्निहोत्रको ही जाननेके लिये आयुर्वेद, धनुर्वेद, मीमांसा, विस्तृत न्याय-शास्त्र और धर्मशास्त्रका निर्माण किया गया है ।। छन््द: शिक्षा च कल्पश्च तथा व्याकरणानि च । शास्त्र ज्योतिर्निरुक्त चाप्यग्निहोत्रकृते कृतम् ।। छन्द, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्यौतिषशास्त्र और निरुक्त भी अग्निहोत्रके लिये ही रचे गये हैं ।। इतिहासपुराणं च गाथाश्वोपनिषत् तथा । आशथर्वणानि कर्माणि चाग्निहोत्रकृते कृतम् ।। इतिहास, पुराण, गाथा, उपनिषद् और अथर्ववेदके कर्म भी अनग्निहोत्रके लिये ही हैं ।। तिथिनक्षत्रयोगानां मुहूर्तकरणात्मकम् । कालस्य वेदनार्थ तु ज्योतिरज्ञानं पुरानध ।। निष्पाप! तिथि, नक्षत्र, योग, मुहूर्त और करणरूप कालका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें ज्यौतिष-शास्त्रका निर्माण हुआ है ।। ऋग्यजु:साममन्त्राणां श्लोकतत्त्वार्थचिन्तनात् । प्रत्यापत्तिविकल्पानां छन््दोज्ञानं प्रकल्पितम् ।। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंके छन्दका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तथा संशय और विकल्पके निराकरणपूर्वक उनका तात्त्विक अर्थ समझनेके लिये छन््दः:शास्त्रकी रचना की गयी है ।। वर्णाक्षरपदार्थानां संधिलिजुं प्रकीर्तितम् । नामधातुविवेकार्थ पुरा व्याकरण स्मृतम् ।। वर्ण, अक्षर और पदोंके अर्थका, संधि और लिड्रका तथा नाम और धातुका विवेक होनेके लिये पूर्वकालमें व्याकरणशास्त्रकी रचना हुई है ।। यूपवेद्यध्वरार्थ तु प्रोक्षणश्रपणाय तु । यज्ञदैवतयोगर्थ शिक्षाज्ञानं प्रकल्पितम् ।। यूप, वेदी और यज्ञका स्वरूप जाननेके लिये, प्रोक्षण और श्रपण (चरु पकाना) आदिकी इतिकर्तव्यताको समझनेके लिये तथा यज्ञ और देवताके सम्बन्धका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये शिक्षा नामक वेदांगकी रचना हुई है ।। यज्ञपात्रपवित्रार्थ द्रव्यसम्भारणाय च । सर्वयज्ञविकल्पाय पुरा कल्पं प्रकीर्तितम् ।। यज्ञके पात्रोंकी शुद्धि, यज्ञसम्बन्धी सामग्रियोंके संग्रह तथा समस्त यज्ञोंके वैकल्पिक विधानोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें कल्पशास्त्रका निर्माण किया गया है ।। नामधातुविकल्पानां तत्त्वार्थनियमाय च । सर्ववेदनिरुक्तानां निरुक्तमृषिभि: कृतम् ।। सम्पूर्ण वेदोंमें प्रयुक्त नाम, धातु और विकल्पोंके तात्विक अर्थका निश्चय करनेके लिये ऋषियोंने निरुक्तकी रचना की है ।। वेद्यर्थ पृथिवी सृष्टा सम्भारार्थ तथैव च | इध्मार्थमथ यूपार्थ ब्रह्मा चक्रे वनस्पतिम् ।। यज्ञकी वेदी बनाने तथा अन्य सामग्रियोंको धारण करनेके लिये ब्रह्माजीने पृथ्वीकी सृष्टि की है। समिधा और यूप बनानेके लिये वनस्पतियोंकी रचना की है ।। गावो यज्ञार्थमुत्पन्ना दक्षिणार्थ तथैव च । सुवर्ण रजतं चैव पात्रकुम्भार्थमेव च ।। गौएँ यज्ञ और दक्षिणाके लिये उत्पन्न हुई हैं, क्योंकि गोघृत और गोदक्षिणाके बिना यज्ञ सम्पन्न नहीं होता। सुवर्ण और चाँदी--ये यज्ञके पात्र और कलश बनानेका काम लेनेके लिये पैदा हुए हैं |। दर्भा: संस्तरणार्थ तु रक्षसां रक्षणाय च । पूजनार्थ द्विजा: सृष्टास्तारका दिवि देवता: ।। कुशोंकी उत्पत्ति हवनकुण्डके चारों ओर फैलाने और राक्षसोंसे यज्ञकी रक्षा करनेके लिये हुई है। पूजन करनेके लिये ब्राह्मणोंको, नक्षत्रोंको और स्वर्गके देवताओंको उत्पन्न किया गया है ।। क्षत्रिया: रक्षणार्थ तु वैश्या वार्तानिमित्तत: । शुश्रूषार्थ त्रयाणां वै शूद्रा: सृष्टा: स्वयम्भुवा ।। सबकी रक्षाके लिये क्षत्रिय-जातिकी सृष्टि की गयी है। कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य आदि जीविकाका साधन जुटानेके लिये वैश्योंकी उत्पत्ति हुई है और तीनों वर्णोकी सेवाके लिये ब्रह्माजीने शूद्रोंको उत्पन्न किया है ।। यथोक्तमन्निहोत्राणां शुश्रूषन्ति च ये द्विजा: । तैर्दत्तं सहुतं चेष्टं दत्तमध्यापितं भवेत् ।। जो द्विज विधिपूर्वक अग्निहोत्रका सेवन करते हैं, उनके द्वारा दान, होम, यज्ञ और अध्यापन--ये समस्त कर्म पूर्ण हो जाते हैं |। एवमिष्टं च पूर्त च यद् विप्रै: क्रियते नूप । तत् सर्व सम्यगाहृत्य चादित्ये स्थापयाम्यहम् ।। राजन! इसी प्रकार ब्राह्मणोंके द्वारा जो यज्ञ करने, बगीचे लगाने और कुएँ खुदवाने आदिके कार्य होते हैं, उन सबके पुण्यको लेकर मैं सूर्यमण्डलमें स्थापित कर देता हूँ ।। मया स्थापितमादित्ये लोकस्य सुकृतं हि तत् | धारयेद् यत् सहस्रांशु: सुकृतं हाग्निहोत्रिणाम् ।। मेरे द्वारा आदित्यमें स्थापित किये हुए संसारके पुण्य और अग्निहोत्रियोंके सुकृतको सहसीरों किरणोंवाले सूर्यदेव धारण किये रहते हैं ।। तस्मादप्रोषितैर्नित्यमग्निहोत्र द्विजातिभि: । होतव्यं विधिवद् राजन्नूर्व्वामिच्छन्ति ये गतिम् ।। इसलिये राजन! जो द्विज परदेशमें न रहते हों और ऊर्ध्वगतिको प्राप्त करना चाहते हों, उन्हें प्रतिदिन विधिपूर्वक अग्निहोत्र करना चाहिये ।। आत्मवन्नावमन्तव्यमन्निहोत्रं युधिष्ठिर । न त्याज्यं क्षणमप्येतदग्निहोत्रं युधिष्ठिर ।। महाराज युधिष्ठिर! अग्निहोत्रको अपने आत्माके समान समझकर कभी भी उसका अपमान या एक क्षणके लिये भी त्याग नहीं करना चाहिये ।। बालाहिताग्नयो ये च शूद्रान्नाद् विरता: सदा | क्रोधलोभविनिर्मुक्ता: प्रात:स्नानपरायणा: । यथोक्तमनिनिहोत्र॑ वै जुद्धते विजितेन्द्रिया: ।। आतिथेया: सदा सौम्या द्विकालं मत्परायणा: । ते यान्त्यपुनरावृत्तिं भित्त्वा चादित्यमण्डलम् ।। जो बाल्यकालसे ही अग्निहोत्रका सेवन करते और शूद्रके अन्नसे सदा दूर रहते हैं, जो क्रोध और लोभसे रहित हैं, जो प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके जितेन्द्रियभावसे विधिवत् अग्निहोत्रका अनुष्ठान करते हैं, सदा अतिथिकी सेवामें लगे रहते हैं तथा शान्तभावसे रहकर दोनों समय मेरे परायण होकर मेरा ध्यान करते हैं, वे सूर्यमण्डलको भेदकर मेरे परम धामको प्राप्त होते हैं, जहाँसे पुन: इस संसारमें नहीं लौटना पड़ता ।। श्रुतिं केचिन्निन्दमाना: श्रुतिं दृष्यन्त्यबुद्धय: । प्रमाणं न च कुर्वन्ति ये यान्तीहापि दुर्गतिम् ।। इस संसारमें कुछ मूर्ख मनुष्य श्रुतिपर दोषारोपण करते हुए उसकी निन्दा करते हैं तथा उसे प्रमाणभूत नहीं मानते, ऐसे लोगोंकी बड़ी दुर्गति होती है ।। प्रमाणमितिहासं च वेदान् कुर्वन्ति ये द्विजा: । ते यान्त्यमरसायुज्यं नित्यमास्तिक्यबुद्धय: ।। परंतु जो द्विज नित्य आस्तिक्यबुद्धिसे युक्त होकर वेदों और इतिहासोंको प्रामाणिक मानते हैं, वे देवताओंका सायुज्य प्राप्त करते हैं ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [चान्द्रायण-व्रतकी विधि, प्रायश्ित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन] युधिछिर उवाच चक्रायुध नमस्ते<स्तु देवेश गरुडध्वज । चान्द्रायणविधिं पुण्यमाख्याहि भगवन् मम ।। युधिष्ठिरने कहा--चक्रधारी देवेश्वर! आपको नमस्कार है। गरुडध्वज भगवन्! अब आप मुझसे चान्द्रायणकी परम पावन विधिका वर्णन कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच शृणु पाण्डव तत्त्वेन सर्वपापप्रणाशनम् । पापिनो येन शुद्धान्ति तत् ते वक्ष्यामि सर्वश: ।। श्रीभगवान् बोले--पाण्डुनन्दन! समस्त पापोंका नाश करनेवाले चान्द्रायण-व्रतका यथार्थ वर्णन सुनो। इसके आचरणसे पापी मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं। उसे मैं तुम्हें पूर्णतया बताता हूँ ।। ब्राह्मण: क्षत्रियो वापि वैश्यो वा चरितव्रत: । यथावत् कर्तुकामो वै तस्यैवं प्रथमा क्रिया ।। शोधयेत् तु शरीरं स्वं पठचगव्येन यन्त्रित: । सशिर: कृष्णपक्षस्य ततः कुर्वीत वापनम् ।। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य--जो कोई भी चान्द्रायण- व्रतका विधिवत् अनुष्ठान करना चाहते हों, उनके लिये पहला काम यह है कि वे नियमके अंदर रहकर पज्चगव्यके द्वारा समस्त शरीरका शोधन करें। फिर कृष्णपक्षके अन्तमें मस्तकसहित दाढ़ी-मूँछ आदिका मुण्डन करावें ।। शुक्लवासा: शुचिर्भूत्वा मौज्जीं बध्नीत मेखलाम् । पालाशदण्डमादाय ब्रह्मचारिव्रते स्थित: ।। तत्पश्चात् स्नान करके शुद्ध हो श्वेत वस्त्र धारण करें, कमरमें मूँजकी बनी हुई मेखला बाँधे और पलाशका दण्ड हाथमें लेकर ब्रह्मचारीके व्रतका पालन करते रहें ।। कृतोपवास: पूर्व तु शुक्लप्रतिपदि द्विज: । नदीसंगमतीर्थेषु शुचौ देशे गृहेडपि वा ।। द्विजको चाहिये कि वह पहले दिन उपवास करके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको नदियोंके संगमपर, किसी पवित्र स्थानमें अथवा घरपर ही व्रत आरम्भ करे ।। आधघारावाज्यभागौ च प्रणवं व्याहृतीस्तथा । वारुणं चैव पज्चैव हुत्वा सर्वान् यथाक्रमम् ।। सत्याय विष्णवे चेति ब्रद्यर्षिभ्यो5थ ब्रह्मणे । विश्वेभ्यो हि च देवेभ्य: सप्रजापतये तथा ।। षदुक्ता जुहुयात् पश्चात् प्रायश्षित्ताहुतिं द्विज: । पहले नित्य-नियमसे निवृत्त होकर एक वेदीपर अग्निकी स्थापना करे और उसमें क्रमश: आघार, आज्यभाग, प्रणव, महाव्याहृति और पञचवारुण होम करके सत्य, विष्णु, ब्रह्मर्षिगण, ब्रह्मा, विश्वेदव तथा प्रजापति--इन छः: देवताओंके निमित्त हवन करे। अन्तमें प्रायश्चित्त-होम करे ।। अतः समापयेदग्निं शान्तिं कृत्वाथ पौष्टिकीम् ।। प्रणम्य चाग्निं सोम॑ं च भस्म धृत्वा यथाविधि । नदीं गत्वा विशुद्धात्मा सोमाय वरुणाय च । आदित्याय नमस्कृत्वा ततः स्नायात् समाहित: ।। फिर शान्ति और पौष्टिक कर्मका अनुष्ठान करके अग्निमें हवनका कार्य समाप्त कर दे। तत्पश्चात् अग्नि तथा सोमदेवताको प्रणाम करे और विधिपूर्वक शरीरमें भस्म लगाकर नदीके तटपर जा विशुद्धचित्त होकर सोम, वरुण तथा आदित्यको प्रणाम करके एकाग्र भावसे जलमें स्नान करे ।। उत्तीर्योदकमाचम्य चासीन: पूर्वतोमुख: । प्राणायामं तत: कृत्वा पवित्रैरभिषेचनम् ।। इसके बाद बाहर निकलकर आचमन करनेके पश्चात् पूर्वाभिमुख होकर बैठे और प्राणायाम करके कुशकी पवित्रीसे अपने शरीरका मार्जन करे ।। आचान्तस्त्वभिवीक्षेत ऊर्ध्वबाहुर्दिवाकरम् । कृताञ्जलिपुट: स्थित्वा कुर्याच्चैव प्रदक्षिणम् ।। फिर आचमन करके दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्यका दर्शन करे और हाथ जोड़कर खड़ा हो सूर्यकी प्रदक्षिणा करे ।। नारायणं वा रुद्रं वा ब्रद्माणमथवापि वा । वारुणं मन्त्रसूक्त वा प्राग्भोजनमथापि वा ।। उसके बाद भोजनसे पूर्व ही नारायण, रुद्र, ब्रह्मा या वरुणसम्बन्धी सूक्तका पाठ करे ।। वीरघ्नमृषथं वापि तथा चाप्यघमर्षणम् | गायत्रीं मम देवीं वा सावित्रीं वा जपेत् ततः । शतं वाष्टशतं वापि सहस्रमथवा परम् ।। अथवा वीरघ्न, ऋषभ, अधघमर्षण, गायत्री या मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले वैष्णव गायत्री- मन्त्रका जप करे। यह जप सौ बार या एक सौ आठ बार अथवा एक हजार बार करना चाहिये ।। ततो मध्याद्वकाले वै पायसं यावकं हि वा । पाचयित्वा प्रयत्नेन प्रयतः सुसमाहितः ।। तदनन्तर पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर मध्याह्नकालमें यत्नपूर्वक खीर या जौकी लप्सी बनाकर तैयार करे ।। पात्र तु सुसमादाय सौवर्ण राजतं तु वा । ताम्रं वा मृण्मयं वापि औदुम्बरमथापि वा ।। वृक्षाणां यज्ञियानां तु पर्णरा््रैरकुत्सितै: । पुटकेन तु गुप्तेन चरेद् भैक्ष॑ं समाहित: ।। अथवा सोने, चाँदी, ताँबे, मिट्टी या गूलरकी लकड़ीका पात्र अथवा यज्ञके लिये उपयोगी वृक्षोंके हरे पत्तोंका दोना बनाकर हाथमें ले ले और उसको ऊपरसे ढक ले। फिर सावधानतापूर्वक भिक्षाके लिये जाय ।। ब्राह्मणानां गृहाणां तु सप्तानां नापरं व्रजेत् । गोदोहमात्र तिछेत् तु वाग्यत: संयतेन्द्रिय: ।। सात ब्राह्मणोंके घरपर जाकर भिक्षा माँगे, सातसे अधिक घरोंपर न जाय। गौ दुहनेमें जितनी देर लगती है, उतने ही समयतक एक द्वारपर खड़ा होकर भिक्षाके लिये प्रतीक्षा करे, मौन रहे और इन्द्रियोंपर काबू रखे ।। न हसेन्न च वीक्षेत नाभिभाषेत वा स्त्रियम् ।। भिक्षा माँगनेवाला पुरुष न तो हँसे, न इधर-उधर दृष्टि डाले और न किसी स्त्रीसे बातचीत करे ।। दृष्टवा मूत्रं पुरीषं वा चाण्डालं वा रजस्वलाम् | पतितं च तथा श्वानमादित्यमवलोकयेत् ।। यदि मल, मूत्र, चाण्डाल, रजस्वला स्त्री, पतित मनुष्य तथा कुत्तेपर दृष्टि पड़ जाय तो सूर्यका दर्शन करे ।। ततस्त्वावसथं प्राप्तो भिक्षां निक्षिप्य भूतले । प्रक्षाल्य पादावाजान्वोह्स्तावाकूर्परं पुन: । आचरम्य वारिणा तेन बह्िं विप्रांश्व पूजयेत् ।। तदनन्तर अपने निवासस्थानपर आकर भिक्षापात्रको जमीनपर रख दे और पैरोंको घुटनोंतक तथा हाथोंको दोनों कोहनियोंतक धो डाले। इसके बाद जलसे आचमन करके अग्नि और ब्राह्मणोंकी पूजा करे ।। पज्च सप्ताथवा कुर्याद् भागान् भैक्षस्य तस्य वै । तेषामन्यतमं पिण्डमादित्याय निवेदयेत् ।। फिर उस भिक्षाके पाँच या सात भाग करके उतने ही ग्रास बना ले। उनमेंसे एक ग्रास सूर्यको निवेदन करे ।। ब्रह्मणे चाग्गनये चैव सोमाय वरुणाय च । विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो दद्यादन्न॑ यथाक्रमम् ।। फिर क्रमशः: ब्रह्मा, अग्नि, सोम, वरुण तथा विश्वेदेवोंको एक-एक ग्रास दे ।। अवशिष्टमथैकं तु वक््त्रमात्र॑ प्रकल्पयेत् । अन्तमें जो एक ग्रास बच जाय, उसको ऐसा बना ले, जिससे वह सुगमतापूर्वक मुँहमें आसके || अडजुल्यग्रे स्थितं पिण्डं गायत्रया चाभिमन्त्रयेत् । अड्गुलीभिस्त्रिभि: पिण्डं प्राश्नीयात् प्राडमुख: शुचि: ।। फिर पवित्र भावसे पूर्वांभिमुख होकर उस ग्रासको दाहिने हाथकी अंगुलियोंके अग्रभागपर रखकर गायत्री-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे और तीन अंगुलियोंसे ही उसे मुँहमें डालकर खा जाय |। यथा च वर्धते सोमो हसते च यथा पुन: । तथा पिण्डाश्न वर्धन्ते हसन्ते च दिने दिने ।। जैसे चन्द्रमा शुक्लपक्षमें प्रतिदिन बढ़ता है और कृष्णपक्षमें प्रतिदिन घटता रहता है, उसी प्रकार ग्रासोंकी मात्रा भी शुक्लपक्षमें बढ़ती है और कृष्णपक्षमें घटती रहती है ।।- त्रिकालं स्नानमस्योक्तं द्विकालमथवा सकृत् | ब्रहद्मचारी सदा वापि न च वस्त्र प्रपीडयेत् ।। चान्द्रायण-व्रत करनेवालेके लिये प्रतिदिन तीन समय, दो समय अथवा एक समय भी स्नान करनेका विधान मिलता है। उसे सदा ब्रह्मचारी रहना चाहिये और तर्पणके पूर्व वस्त्र नहीं निचोड़ना चाहिये ।। स्थाने न दिवसं तिष्ठेद् रात्रौ वीरासनं व्रजेत् । भवेत् स्थण्डिलशायी वाप्यथवा वृक्षमूलिक: ।। दिनमें एक जगह खड़ा न रहे, रातको वीरासनसे बैठे अथवा वेदीपर या वृक्षकी जड़पर सो रहे ।। वल्कलं यदि वा क्षौमं शाणं कार्पासकं तथा | आच्छादनं भवेत् तस्य वत्त्रार्थ पाण्डुनन्दन ।। पाण्डुनन्दन! उसे शरीर ढकनेके लिये वल्कल, रेशम, सन अथवा कपासका वस्त्र धारण करना चाहिये ।। एवं चान्द्रायणे पूर्णे मासस्यान्ते प्रयत्नवान् । ब्राह्म॒णान् भोजयेद् भक्त्या दद्याच्चैव च दक्षिणाम् ।। इस प्रकार एक महीने बाद चान्द्रायणव्रत पूर्ण होनेपर उद्योग करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मगोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा दे ।। चान्द्रायणेन चीर्णेन यत् कृतं तेन दुष्कृतम् तत् सर्व तत्क्षणादेव भस्मी भवति काष्ठवत् ।। चान्द्रायण-व्रतके आचरणसे मनुष्यके समस्त पाप सूखे काठकी भाँति तुरंत जलकर खाक हो जाते हैं ।। ब्रह्महत्या च गोहत्या सुवर्णस्तैन्यमेव च । भ्रूणहत्या सुरापान गुरोदरिव्यतिक्रम: ।। एवमन्यानि पापानि पातकीयानि यानि च । चान्द्रायणेन नश्यन्ति वायुना पांसवो यथा ।। ब्रह्महत्या, गोहत्या, सुवर्णकी चोरी, भ्रूणहत्या, मदिरापान और गुरु-स्त्री-गमन तथा और भी जितने पाप या पातक हैं, वे चान्द्रायण-व्रतसे उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे हवाके वेगसे धूल उड़ जाती है ।। अनिर्दशाया गो: क्षीरमौष्टमाविकमेव च | मृतसूतकयोश्षान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।। जिस गौको ब्याये हुए दस दिन भी न हुए हों, उसका दूध तथा ऊँटनी एवं भेड़का दूध पी जानेपर और मरणाशौचका तथा जननाशौचका अन्न खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करे ।। उपपातकिनश्षान्नं पतितान्नं तथैव च । शूद्रस्योच्छेषणं चैव भुक््त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।। उपपातकी तथा पतितका अन्न और शूद्रका जूठा अन्न खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।। आकाश-स्थं तु हस्तस्थमध:स्रस्तं तथैव च । परहस्तस्थितं चैव भुक््त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।। आकाशमें लटकते हुए वृक्ष आदिके फलोंको, हाथपर रखे हुए, नीचे गिरे हुए तथा दूसरेके हाथपर पड़े हुए अन्नको खा लेनेपर भी चान्द्रायण-व्रत करे ।। अथाग्रे दिधिषोरन्नं दिधिषूपपतेस्तथा । परिवेत्तुस्तथा चान्न॑ परिवित्तान्नमेव च ।। कुण्डान्नं गोलकान्नं च देवलान्न॑ तथैव च । तथा पुरोहितस्यान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।। बड़ी बहिनके अविवाहित रहते पहले विवाह कर लेनेवाली छोटी बहिनका तथा अपने भाईकी विधवा स्त्रीसे विवाह करनेवालेका एवं बड़े भाईके अविवाहित रहते विवाह करनेवाले छोटे भाईका और अविवाहित बड़े भाईका अन्न, कुण्डका, गोलकका और पुजारीका अन्न तथा पुरोहितका अन्न भोजन कर लेनेपर भी चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।। सुरासवं विषं सर्पिलाक्षा लवणमेव च । तैलं चापि च विक्रीणन् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।। मदिरा, आसव, विष, घी, लाख, नमक और तेलकी बिक्री करनेवाले ब्राह्मणको भी चान्द्रायण-व्रत करना आवश्यक है ।। एकोद्दिष्ट तु यो भुड़क्ते जनमध्यगतोडपि य: । भिन्नभाण्डेषु यो भुड्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।। जो द्विज एकोद्िष्ट श्राद्धका अन्न खाता है और अधिक मनुष्योंकी भीड़में भोजन करता है तथा फूटे बर्तनोंमें खाता है, उसे चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।। यो भुद्धक्तेडनुपनीतेन यो भुऊझुक्ते च स्त्रिया सह | कन्यया सह यो भुड्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।। जो उपनयन-संस्कारसे रहित बालक, कन्या और स्त्रीके साथ (एक पात्रमें) भोजन करता है, वह ब्राह्मण चान्द्रायण-व्रत करे ।। उच्छिष्टं स्थापयेद् विप्रो यो मोहाद् भोजनान्तरे । दद्याद् वा यदि वा मोहाद् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।। जो मोहवश अपना जूठा दूसरेके भोजनमें मिला देता है अथवा मोहके कारण दूसरेको देता है, उस ब्राह्मणको भी चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।। तुम्बकोशातकं चैव पलाण्डुं गृज्जनं तथा । छत्राकं लशुनं चैव भुक््त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।। यदि द्विज तुम्बा और जिसमें केश पड़ा हो, ऐसा अन्न तथा प्याज, गाजर, छत्राक (कुकुरमुत्ते) और लहसुनको खा ले तो उसे चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये ।। उदक्यया शुना वापि चाण्डालैव द्विजोत्तम: | दृष्टमन्न तु भुज्जानो द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।। यदि ब्राह्मण रजस्वला स्त्री, कुत्ते अथवा चाण्डालके द्वारा देखा हुआ अन्न खा ले तो उस ब्राह्मणको चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।। एतत् पुरा विशुद्धार्थमृषिभि क्षरितं व्रतम् । पावन सर्वभूतानां पुण्यं पाण्डव चोदितम् ।। पाण्डुनन्दन! पूर्वकालमें ऋषियोंने आत्मशुद्धिके लिये इस व्रतका आचरण किया था, यह सब प्राणियोंको पवित्र करनेवाला और पुण्यरूप बताया गया है ।। यथोक्तमेतद् यः कुर्याद् द्विज: पापप्रणाशनम् । स दिवं याति पूतात्मा निर्मलादित्यसंनिभ: ।। जो द्विज इस पूर्वोक्त पापनाशक व्रतका अनुष्ठान करता है, वह पवित्रात्मा तथा निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी होकर स्वर्गलोकको प्राप्त होता है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) > अर्थात् शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको एक ग्रास और द्वितीयाको दो ग्रास भोजन करना चाहिये। इसी तरह पूर्णिमाको पंद्रह ग्रास भोजन करके कृष्णपक्षकी प्रतिपदासे चतुर्दशीतक प्रतिदिन एक-एक ग्रास कम करना चाहिये। अमावस्याको उपवास करनेपर इस व्रतकी समाप्ति होती है। यह एक प्रकारका चान्द्रायण है। स्मृतियोंमें इसके और भी अनेकों प्रकार उपलब्ध होते हैं। [सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान्की स्तुति] युधिछिर उवाच सर्वभूतपते श्रीमन् सर्वभूतनमस्कृत । सर्वभूतहितं धर्म सर्वज्ञ कथयस्व न: ।। युधिष्ठिने कहा--भगवन्! आप सब प्राणियोंके स्वामी, सबके द्वारा नमस्कृत, शोभासम्पन्न और सर्वज्ञ हैं। अब आप मुझसे समस्त प्राणियोंके लिये हितकारी धर्मका वर्णन कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच यद् दरिद्रजनस्यापि स्वर्ग्यं सुखकरं भवेत् | सर्वपापप्रशमनं तच्छूणुष्व युधिष्ठिर ।। श्रीभगवान् बोले--युधिष्ठिर! जो धर्म दरिद्र मनुष्योंको भी स्वर्ग और सुख प्रदान करनेवाला तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो ।। एकभुक्तेन वर्तेत नर: संवत्सरं तु यः । ब्रह्मचारी जितक्रोधो हथ:शायी जितेन्द्रिय: ।। शुचिश्न स्नातो हाव्यग्र: सत्यवागनसूयक: । अर्चन्नेव तु मां नित्यं मद्गतेनान्तरात्मना । संध्ययोस्तु जपेन्नित्यं मद्गायत्रीं समाहितः ।। नमो ब्रह्माण्यदेवायेत्यसकृन्मां प्रणम्य च । विप्रमग्रासने कृत्वा यावकं भैक्षमेव वा ।। भुक्त्वा तु वाग्यतो भूमावाचान्तस्य द्विजन्मन: । नमोअस्तु वासुदेवायेत्युक्त्वा तु चरणौ स्पृशेत् ।। मासे मासे समाप्ते तु भोजयित्वा द्विजान् शुचीन् । संवत्सरे ततः पूर्णे दद्यात् तु व्रतदक्षिणाम् ।। नवनीतमयीं गां वा तिलधेनुमथापि वा । विप्रहस्तच्युतैस्तोयै: सहिरण्यै: समुक्षित: । तस्य पुण्यफलं राजन् कथ्यमानं मया शृणु ।। राजन! जो मनुष्य एक वर्षतक प्रतिदिन एक समय भोजन करता है, ब्रह्मचारी रहता है, क्रोधको काबूमें रखता है, नीचे सोता है और इन्द्रियोंको वशमें रखता है, जो स्नान करके पवित्र रहता है, व्यग्र नहीं होता है, सत्य बोलता है, किसीके दोष नहीं देखता है और मुझमें चित्त लगाकर सदा मेरी पूजामें ही संलग्न रहता है, जो दोनों संध्याओंके समय एकाग्रचित्त होकर मुझसे सम्बन्ध रखनेवाली गायत्रीका जप करता है, “नमो ब्रह्मण्यदेवाय”- कहकर सदा मुझे प्रणाम किया करता है, पहले ब्राह्मगको भोजनके आसनपर बिठाकर भोजन करानेके पश्चात् स्वयं मौन होकर जौकी लप्सी अथवा भिक्षात्रका भोजन करता है तथा “नमोस्तु वासुदेवाय” कहकर ब्राह्मणके चरणोंमें प्रणाम करता है; जो प्रत्येक मास समाप्त होनेपर पवित्र ब्राह्मणोंको भोजन कराता है और एक सालतक इस नियमका पालन करके ब्राह्मणको इस व्रतकी दक्षिणाके रूपमें माखन अथवा तिलकी गौ दान करता है तथा ब्राह्मणके हाथसे सुवर्णयुक्त जल लेकर अपने शरीरपर छिड़कता है, उसके पुण्यका फल बतलाता हूँ, सुनो ।। दशजन्मकृतं पापं ज्ञानतोऊज्ञानतोडपि वा | तद् विनश्यति तस्याशु नात्र कार्या विचारणा ।। उसके जान-बूझकर या अनजानमें किये हुए दस जन्मोंतकके पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं--इसमें तनिक भी अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। युधिछिर उवाच सर्वेषामुपवासानां यच्छेय: सुमहत्फलम् । यच्च नि:श्रेयसं लोके तद् भवान् वक्तुमर्हति ।। युधिष्ठिने कहा--भगवन्! सब प्रकारके उपवासोंमें जो सबसे श्रेष्ठ, महान् फल देनेवाला और कल्याणका सर्वोत्तम साधन हो, उसका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच शृणु राजन् मया पूर्व यथा गीतं तु नारदे । तथा ते कथयिष्यामि मद्धक्ताय युधिष्ठिर ।। श्रीभगवान् बोले--महाराज युधिष्छिर! तुम मेरे भक्त हो। जैसे पूर्वमें मैंने नारदसे कहा था, वैसे ही तुम्हें बतलाता हूँ, सुनो ।। यस्तु भव्त्या शुचिर्भूत्वा पञ्चम्यां मे नराधिप । उपवासत्रतं कुर्यात् त्रिकालं चार्चयंस्तु माम् । सर्वक्रतुफलं लब्ध्वा मम लोके महीयते ।। नरेश! जो पुरुष स्नान आदिसे पवित्र होकर मेरी पठचमीके दिन भक्तिपूर्वक उपवास करता है तथा तीनों समय मेरी पूजामें संलग्न रहता है, वह सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाकर मेरे परम धाममें प्रतिष्ठित होता है ।। पर्वद्वयं च द्वादश्यौ श्रवण च नराधिप । मत्पञ्चमीति विख्याता मत्प्रिया च विशेषत:ः ।। नरेश्वर! अमावास्या और पूर्णिमा--ये दोनों पर्व, दोनों पक्षकी द्वादशी तथा श्रवण- नक्षत्र--ये पाँच तिथियाँ मेरी पजचमी कहलाती हैं। ये मुझे विशेष प्रिय हैं ।। तस्मात् तु ब्राह्मणश्रेष्ठेर्मन्निवेशितबुद्धिभि: । उपवासस्तु कर्तव्यो मत्प्रियार्थ विशेषत: ।। अतः: श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उचित है कि वे मेरा विशेष प्रिय करनेके लिये मुझमें चित्त लगाकर इन तिथियोंमें उपवास करें ।। द्वादश्यामेव वा कुर्यादुपवासमशव्नुवन् | तेनाहं परमां प्रीतिं यास्यामि नरपुड्रव ।। नरश्रेष्ठ! जो सबमें उपवास न कर सके, वह केवल द्वादशीको ही उपवास करे; इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है ।। अहोरात्रेण द्वादश्यां मार्गशीर्षेण केशवम् । उपोष्य पूजयेद् यो मां सो5श्वमेधफलं लभेत् ।। जो मार्गशीर्षकी द्वादशीको दिन-रात उपवास करके “केशव” नामसे मेरी पूजा करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है ।। द्वादश्यां पुष्यमासे तु नाम्ना नारायणं तु माम् । उपोष्य पूजयेद् यो मां वाजिमेधफलं लभेत् ।। जो पौष मासकी द्वादशीको उपवास करके “नारायण” नामसे मेरी पूजा करता है, वह वाजिमेध-यज्ञका फल पाता है ।। द्वादश्यां माघमासे तु मामुपोष्य तु माधवम् | पूजयेद् य: समाप्रोति राजसूयफलं नृप ।। राजन! जो माघकी द्वादशीको उपवास करके “माधव” नामसे मेरा पूजन करता है, उसे राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। द्वादश्यां फाल्गुने मासि गोविन्दाख्यमुपोष्य माम् | पूजयेद् यः समाप्रोति हृतिरात्रफलं नृप ।। नरेश्वर! फाल्गुनके महीनेमें द्वादशीको उपवास करके जो “गोविन्द” के नामसे मेरा अर्चन करता है, उसे अतिरात्र यागका फल मिलता है ।। द्वादश्यां मासि चैत्रे तु मां विष्णुं समुपोष्य यः । पूजयंस्तदवाप्नोति पौण्डरीकस्य यत् फलम् ।। चैत्र महीनेकी द्वादशी तिथिको व्रत धारण करके जो “विष्णु” नामसे मेरी पूजा करता है, वह पुण्डरीक-यज्ञके फलका भागी होता है ।। द्वादश्यां मासि वैशाखे मधुसूदनसंज्ञितम् । उपोष्य पूजयेद् यो मां सो<ग्निष्टोमस्य पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन! वैशाखकी द्वादशीको उपवास करके “मधुसूदन' नामसे मेरी पूजा करनेवालेको अग्निष्टोम-यज्ञका फल मिलता है ।। द्वादश्यां ज्येष्ठमासे तु मामुपोष्य त्रिविक्रमम् अर्चयेद् यः समाप्रोति गवां मेधफलं नृप ।। राजन! जो मनुष्य ज्येष्ठमासकी द्वादशी तिथिको उपवास करके "“त्रिविक्रम” नामसे मेरी पूजा करता है, वह गोमेधके फलका भागी होता है ।। आषाढे वामनाख््य मां द्वादश्यां समुपोष्य यः । नरमेधस्य स फल प्राप्नोति भरतर्षभ ।। भरतश्रेष्ठ] आषाढ़मासकी द्वादशीको व्रत रहकर “वामन'” नामसे मेरी पूजा करनेवाले पुरुषको नरमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। द्वादश्यां श्रावणे मासि श्रीधराख्यमुपोष्य माम् | पूजयेद् य: समाप्रोति पञचयज्ञफलं नृप ।। राजन! श्रावण महीनेमें द्वादशी तिथिको उपवास करके जो “श्रीधर' नामसे मेरा पूजन करता है, वह पञ्चयज्ञोंका फल पाता है ।। मासे भाद्रपदे यो मां हृषीकेशाख्यमर्चयेत् । उपोष्य स समाप्रोति सौत्रामणिफलं नृप ।। नरेश्वर! भाद्रपदमासकी द्वादशी तिथिको उपवास करके “हृषीकेश” नामसे मेरा अर्चन करनेवालेको सौत्रामणि-यज्ञका फल मिलता है ।। द्वादश्यामाश्वयुड्मासे पद्मनाभमुपोष्य माम् | अचेयेद् यः समाप्रोति गोसहस्रफलं नृप ।। महाराज! आश्चिनकी द्वादशीको उपवास करके जो “पद्मनाभ” नामसे मेरा अर्चन करता है, उसे एक हजार गोदानका फल प्राप्त होता है ।। द्वादश्यां कार्तिके मासि मां दामोदरसंज्ञितम् । उपोष्य पूजयेद् यस्तु सर्वक्रतुफलं नृप ।। राजन! कार्तिक महीनेकी द्वादशी तिथिको व्रत रहकर जो “दामोदर” नामसे मेरी पूजा करता है, उसको सम्पूर्ण यज्ञोंका फल मिलता है ।। केवलेनोपवासेन द्वादश्यां पाण्डुनन्दन । यत् फल पूर्वमुद्दिष्टं तस्यार्ध लभते नृप ।। नरपते! जो द्वादशीको केवल उपवास ही करता है, उसे पूर्वोक्त फलका आधा भाग ही प्राप्त होता है ।। श्रावणे<प्येवमेवं मामर्चयेद् भक्तिमान् नर: । मम सालोक्यमाप्रोति नाज कार्या विचारणा ।। इसी प्रकार श्रावणमें भी यदि मनुष्य भक्तियुक्त चित्तसे मेरी पूजा करता है तो वह मेरी सालोक्य मुक्तिको प्राप्त होता है, इसमें तनिक भी अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। मासे मासे समभ्यर्च्य क्रमशो मामतन्द्रित: । पूर्णे संवत्सरे कुर्यात् पुन: संवत्सरं तु माम् ।। उपर्युक्तरूपसे प्रतिमास आलस्य छोड़कर मेरी पूजा करते-करते जब एक साल पूरा हो जाय, तब पुनः दूसरे साल भी मासिक पूजन प्रारम्भ कर दे ।। एवं द्वादशवर्ष यो मद्धक्तो मत्परायण: । अविष्नमर्चयानस्तु मम सायुज्यमाप्तुयात् ।। इस प्रकार जो मेरा भक्त मेरी आराधनामें तत्पर होकर बारह वर्षतक बिना किसी विघ्न-बाधाके मेरी पूजा करता रहता है, वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ।। अर्चयेत् प्रीतिमान् यो मां द्वादश्यां वेदसंहिताम् । स पूर्वोक्तफलं राजँल्लभते नात्र संशय: ।। राजन! जो मनुष्य द्वादशी तिथिको प्रेमपूर्वक मेरी और वेदसंहिताकी पूजा करता है, उसे पूर्वोक्त फलोंकी प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं है ।। गन्धं पुष्पं फलं तोयं पत्र वा मूलमेव वा । द्वादश्यां मम यो दद्यात् तत्समो नास्ति मत्प्रिय: ।। जो द्वादशी तिथिको मेरे लिये चन्दन, पुष्प, फल, जल, पत्र अथवा मूल अर्पण करता है उसके समान मेरा प्रिय भक्त कोई नहीं है ।। एतेन विधिना सर्वे देवा: शक्रपुरोगमा: । मद्धभधक्ता नरशार्दूल स्वर्गलोकं तु भुज्जते ।। नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता उपर्युक्त विधिसे मेरा भजन करनेके कारण ही आज स्वर्गीय सुखका उपभोग कर रहे हैं ।। वैशम्पायन उवाच एवं वदति देवेशे केशवे पाण्डुनन्दन: । कृताञ्जलि: स्तोत्रमिदं भक्त्या धर्मात्मजोडब्रवीत् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार उपदेश देनेपर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे-- ।। सर्वलोकेश देवेश हृषीकेश नमोस्तु ते । सहस्रशिरसे नित्यं सहस्राक्ष नमोस्तु ते ।। “हृषीकेश! आप सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी और देवताओंके भी ईश्वर हैं। आपको नमस्कार है। हजारों नेत्र धारण करनेवाले परमेश्वर! आपके सहस्रों मस्तक हैं, आपको सदा प्रणाम है ।। त्रयीमय त्रयीनाथ त्रयीस्तुत नमो नमः । यज्ञात्मन् यज्ञसम्भूत यज्ञनाथ नमो नमः ।। 'वेदत्रयी आपका स्वरूप है, तीनों वेदोंके आप अधीश्वर हैं और वेदत्रयीके द्वारा आपकी ही स्तुति की गयी है। आप ही यज्ञस्वरूप, यज्ञमें प्रकट होनेवाले और यज्ञके स्वामी हैं। आपको बारंबार नमस्कार है ।। चतुर्मूर्ते चतुर्बाहो चतुर्व्यूह नमो नमः । लोकात्मँललोककृन्नाथ लोकावास नमो नमः ।। “आप चार रूप धारण करनेवाले, चार भुजाधारी और चतुर्व्यूहस्वरूप हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। आप विश्वरूप, लोकेश्चरोंके अधीश्वर तथा सम्पूर्ण लोकोंके निवासस्थान हैं, आपको मेरा पुनः-पुनः प्रणाम है ।। सृष्टिसंहारकत्रें ते नरसिंह नमो नमः । भक्तप्रिय नमस्ते5स्तु कृष्ण नाथ नमो नमः ।। “नरसिंह! आप ही इस जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाले हैं आपको बारंबार नमस्कार है। भक्तोंके प्रियतम श्रीकृष्ण! स्वामिन्! आपको बारंबार प्रणाम है ।। लोकप्रिय नमस्ते<स्तु भक्तवत्सल ते नम: । ब्रह्मावास नमस्ते<स्तु ब्रह्मनाथ नमो नम: ।। “आप सम्पूर्ण लोकोंके प्रिय हैं। आपको नमस्कार है। भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है। आप ब्रह्माके निवासस्थान और उनके स्वामी हैं। आपको प्रणाम है ।। रुद्ररूप नमस्ते<स्तु रुद्रकर्मरताय ते । पज्चयज्ञ नमस्ते&स्तु सर्वयज्ञ नमो नमः ।। रुद्रूप! आपको नमस्कार है। रौद्र कर्ममें रत रहनेवाले आपको नमस्कार है। पञ्चयज्ञरूप! आपको नमस्कार है। सर्वयज्ञस्वरूप! आपको नमस्कार है ।। कृष्ण प्रिय नमस्ते5स्तु कृष्ण नाथ नमो नमः । योगिप्रिय नमस्ते5स्तु योगिनाथ नमो नमः ।। प्यारे श्रीकृष्ण! आपको प्रणाम है। स्वामिन्! श्रीकृष्ण! आपको बारंबार नमस्कार है। योगियोंके प्रिय! आपको नमस्कार है। योगियोंके स्वामी! आपको बार-बार प्रणाम है ।। हयवकत्र नमस्ते<स्तु चक्रपाणे नमो नमः । पञ्चभूत नमस्ते<स्तु पठ्चायुध नमो नम: ।। /हयग्रीव!ः आपको नमस्कार है। चक्रपाणे! आपको बारंबार नमस्कार है। पजञ्चभूतस्वरूप! आपको नमस्कार है। आप पाँच आयुध धारण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है' ।। वैशम्पायन उवाच भक्तिगद्गदया वाचा स्तुवत्येवं युधिष्ठिरे । गृहीत्वा केशवो हस्ते प्रीतात्मा त॑ं न््यवारयत् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! धर्मराज युधिष्ठिर जब भक्तिगद्गद वाणीसे इस प्रकार भगवानकी स्तुति करने लगे, तब श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक धर्मराजका हाथ पकड़कर उन्हें रोका ।। निवार्य च पुनर्वाचा भक्तिनगम्रं युधिष्ठिरम् । वक्तुमेव नरश्रेष्ठ धर्मपुत्र॑ प्रचक्रमे ।। नरोत्तम! भगवान् श्रीकृष्ण पुनः वाणीद्वारा निवारण करके भक्तिसे विनम्र हुए धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे यों कहने लगे ।। श्रीभगवानुवाच अन्यवत् किमिदं राजन् मां स्तौषि नरपुड्रव । तिष्ठ प्रच्छ यथापूर्व धर्मपुत्र युधिष्ठिर ।। श्रीभगवान् बोले--राजन्! यह क्या है? तुम भेद-भाव रखनेवाले मनुष्यकी भाँति मेरी स्तुति क्यों करने लगे? पुरुषप्रवर धर्मपुत्र युधिष्ठिर! इसे बंद करके पहलेके ही समान प्रश्न करो ।। युधिषछ्िर उवाच इदं च धर्मसम्पन्नं वक्तुमहसि मानद । कृष्णपक्षेषु द्वादश्यामर्चनीय: कथं भवेत् ।। युधिष्ठिरने पूछा--मानद! कृष्णपक्षमें द्वादशीको आपकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये? इस धर्मयुक्त विषयका वर्णन कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच शृणु राजन् यथा पूर्व तत् सर्व कथयामि ते । परम कृष्णद्वादश्यामर्चनायां फलं मम ।। श्रीभगवानने कहा--राजन! मैं पूर्ववत् तुम्हारे सभी प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ, सुनो। कृष्णपक्षकी द्वादशीको मेरी पूजा करनेका बहुत बड़ा फल है ।। एकादश्यामुपोष्याथ द्वादश्यामर्चयेत् तु माम् । विप्रानपि यथालाभ॑ पूजयेद् भक्तिमान् नर: ।। एकादशीको उपवास करके द्वादशीको मेरा पूजन करना चाहिये। उस दिन भक्तियुक्त मनुष्यको यथाशक्ति ब्राह्मणोंका भी पूजन करना चाहिये ।। स गच्छेद् दक्षिणामूर्ति मां वा नात्र विचारणा । चन्द्रसालोक्यमथवा ग्रहनक्षत्रपूजित: ।। ऐसा करनेसे मनुष्य दक्षिणामूर्ति शिवको अथवा मुझे प्राप्त होता है; इसमें कोई संशय नहीं है। अथवा वह ग्रह-नक्षत्रोंसे पूजित हुआ चन्द्रमाके लोकको प्राप्त हो जाता है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) - नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ।। [विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्षित्त] युधिछिर उवाच देव कि फलमाख्यातं विषुवेष्वमरेश्वर । सूर्येन्दूपप्लवे चैव वक्तुमहसि तत् फलम् ।। युधिष्ठिरने पूछा--भगवन! देवेश्वर! विषुव-योगमें तथा सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणके समय दान देनेसे किस फलकी प्राप्ति बतायी गयी है, यह बतलानेकी कृपा करें ।। श्रीभगवानुवाच शृणुष्व राजन् विषुवे सोमार्कग्रहणेषु च । व्यतीपातेड्यने चैव दानं स्यादक्षयं फलम् ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! विषुवयोगमें, सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणके समय, व्यतीपातयोगमें तथा उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन जो दान दिया जाता है, वह अक्षय फल देनेवाला होता है। इस विषयका वर्णन करता हूँ, सुनो ।। राजन्नयनयोर्म ध्ये विषुव॑ सम्प्रचक्षते । समे रात्रिदिने तत्र संध्यायां विषुवे नूप ।। ब्रह्माहं शड्करश्चापि तिष्ठाम: सहिता: सकृत् | क्रियाकरणकार्याणामेकी भावत्वकारणात् ।। महाराज युधिष्ठिर! उत्तरायण और दक्षिणायनके मध्य भागमें जब कि रात और दिन बराबर होते हैं, वह समय “विषुवयोग” के नामसे पुकारा जाता है। उस दिन संध्याके समय मैं, ब्रह्मा और महादेवजी क्रिया, करण और कार्योंकी एकतापर विचार करनेके लिये एक बार एकत्रित होते हैं ।। अस्माकमेकी भूतानां निष्कलं परमं पदम् । तन्मुहूर्त परं पुण्यं राजन् विषुवसंज्ञितम् ।। नरेश्वर! जिस मुहूर्तमें हम लोगोंका समागम होता है, वह कलारहित परम पद है। वह मुहूर्त परम पवित्र और विषुवपर्वके नामसे प्रसिद्ध है ।। तदेवाद्यक्षरं ब्रह्म परं ब्रह्मेति कीर्तितम् । तस्मिन् मुहूर्ते सर्वे तु चिन्तयन्ति परं पदम् ।। उसे अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म भी कहते हैं। उस मुहूर्तमें सब लोग परम पदका चिन्तन करते हैं ।। देवाश्ष वसवो रुद्रा: पितरश्नाश्विनौ तथा । साध्याश्ष विश्वे गन्धर्वा: सिद्धा ब्रह्मर्षपस्तथा ।। सोमादयो ग्रहाश्वनैव सरित: सागरास्तथा । मरुतो5प्सरसो नागा यक्षराक्षसगुहुका: ।। एते चान्ये च राजेन्द्र विषुवे संयतेन्द्रिया: । सोपवासा: प्रयत्नेन भवन्ति ध्यानतत्परा: ।। राजेन्द्र! देवता, वसु, रुद्र, पितर, अश्विनीकुमार, साध्यगण, विश्वेदेव, गन्धर्व, सिद्ध, ब्रह्मर्षि, सोम आदि ग्रह, नदियाँ, समुद्र, मरुत, अप्सरा, नाग, यक्ष, राक्षस और गुहाक--ये तथा दूसरे देवता भी विषुवपर्वमें इन्द्रिय-संयमपूर्वक उपवास करते हैं और प्रयत्नपूर्वक परमात्माके ध्यानमें संलग्न होते हैं ।। अन्न गावस्तिलान् भूमिं कन्यादानं तथैव च । गृहमायतनं धान्यं वाहनं शयनं तथा ।। यच्चान्यच्च मया प्रोक्तं तत् प्रयच्छ युधिष्ठिर । इसलिये युधिष्ठिर! तुम अन्न, गौ, तिल, भूमि, कन्या, घर, विश्रामस्थान, धान्य, वाहन, शय्या तथा और जो वस्तुएँ मेरे द्वारा दानके योग बतलायी गयी हैं, उन सबका विषुवपर्वमें दान करो ।। दीयते विषुवेष्वेवं श्रोत्रियेभ्यो विशेषतः ।। तस्य दानस्य कौन्तेय क्षयं नैवोपपद्यते । वर्धते5हरहः पुण्यं तद् दानं कोटिसम्मितम् ।। कुन्तीनन्दन! जो दान विषुवयोगमें विशेषत:ः श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दिया जाता है, उस दानका कभी नाश नहीं होता। उस दानका पुण्य प्रतिदिन बढ़ते-बढ़ते करोड़ गुना हो जाता है ।। चन्द्रसूर्यग्रहे व्योम्नि मम॒ वा शड्करस्य वा । गायत्रीं मामिकां वापि जपेद् यः: शड्करस्य वा ।। शड्खतूर्यस्वनैश्वैव कांस्यघण्टास्वनैरपि । कारयेत् तु ध्वनिं भक््त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ।। आकाशमें जब चन्द्रग्रहण अथवा सूर्यग्रहण लगा हो, उस समय जो मेरी अथवा भगवान् शड्करकी पूजा करता हुआ मेरी या शड्करकी गायत्रीका जप करता है तथा भक्तिके साथ शंख, तूर्य, झाँझ और घंटा बजाकर उनकी ध्वनि करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो ।। गान्धर्वैहोमजप्यैस्तु जप्तैरुत्कृष्टनामभि: । दुर्बलोडपि भवेदू राहु: सोमश्न बलवान् भवेत् ।। मेरे सामने गीत गाने, होम और जप करने तथा मेरे उत्तम नामोंका कीर्तन करनेसे राहु दुर्बल और चन्द्रमा बलवान होते हैं ।। सूर्येन्दूपप्लवे चैव श्रोत्रियेभ्य: प्रदीयते । तत्सहस््रगुणं भूत्वा दातारमुपतिष्ठति ।। सूर्य और चन्द्रमाके ग्रहणकालमें श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको जो दान दिया जाता है, वह हजार गुना होकर दाताको मिलता है ।। महापातकयुक्तो5पि यद्यपि स्यान्नरोत्तम: | निष्पापस्तत्क्षणादेव तेन दानेन जायते ।। महान् पातकी मनुष्य भी उस दानसे तत्काल पापरहित होकर पुरुषश्रेष्ठ हो जाता है ।। चन्द्रसूर्प्रकाशेन विमानेन विराजता । याति सोमपुरं रम्यं सेव्यमानो5प्सरोगणै: ।। वह चन्द्रमा और सूर्यके प्रकाशसे प्रकाशित सुन्दर विमानपर बैठकर रमणीय चन्द्रलोकमें गमन करता है और वहाँ अप्सरागणोंसे उसकी सेवा की जाती है ।। यावदृक्षाणि तिष्ठन्ति गगने शशिना सह । तावत् काल स राजेन्द्र सोमलोके महीयते ।। राजेन्द्र! जबतक आकाशमें चन्द्रमाके साथ तारे मौजूद रहते हैं, तबतक चन्द्रलोकमें वह सम्मानके साथ निवास करता है ।। ततश्नापि च्युत: कालादिह लोके युधिष्ठिर । वेदवेदाड़रविद् विप्र: कोटीधनपतिर्भवेत् ।। युधिष्ठि! फिर समयानुसार वहाँसे लौटनेपर इस संसारमें वह वेद-वेदांगोंका विद्वान् और करोड़पति ब्राह्मण होता है ।। युधिछिर उवाच भगवंस्तव गायत्री जप्यते च कथं विभो | कि वा तस्य फलं॑ देव ममाचक्ष्व सुरेश्वर ।। युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! विभो! आपकी गायत्रीका जप किस तरह किया जाता है? देवदेवेश्वर! उसका क्या फल होता है--यह बतानेकी कृपा कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच द्वादश्यां विषुर्व चैव चन्द्रसूर्यग्रहे तथा । अयने श्रवणे चैव व्यतीपाते तथैव च ।। अश्वत्थदर्शने चैव तथा मद्दर्शनेडपि च | जप्या तु मम गायत्री चाथवाष्टाक्षरं नूप । अर्जित दुष्कृतं तस्य नाशयेन्नात्र संशय: ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! द्वादशी तिथिको, विषुवपर्वमें, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय, उत्तरायण तथा दक्षिणायनके आरम्भके दिन, श्रवण-नक्षत्रमें तथा व्यतीपात योगमें पीपलका या मेरा दर्शन होनेपर मेरी गायत्रीका अथवा अष्टाक्षर मन्त्र (३० नमो नारायणाय)-का जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यके पूर्वकृत् पापोंका नि:संदेह नाश हो जाता है ।। युधिछिर उवाच अश्वत्थदर्शनं चैव कि त्वद्दर्शनसम्मितम् । एतत् कथय मे देव परं कौतूहलं हि मे ।। युधिष्ठिरने पूछा--देव! अब यह बतलाइये कि पीपलका दर्शन आपके दर्शनके समान क्यों माना जाता है। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ।। श्रीभगवानुवाच अहमश्चत्थरूपेण पालयामि जगत्त्रयम् अश्रत्थो न स्थितो यत्र नाहं तत्र प्रतिष्ठित: ।। श्रीभगवानने कहा--राजन! मैं ही पीपलके वृक्षके रूपमें रहकर तीनों लोकोंका पालन करता हूँ। जहाँ पीपलका वृक्ष नहीं है, वहाँ मेरा वास नहीं है ।। यत्राहं संस्थितो राजन्नश्वत्थश्षापि तिष्ठति | यस्त्वेनमर्चयेद् भक्त्या स मां साक्षात् समर्चति ।। राजन! जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ पीपल भी रहता है। जो मनुष्य भक्तिभावसे पीपल- वृक्षकी पूजा करता है, वह साक्षात् मेरी ही पूजा करता है ।। यस्त्वेनं प्रहरेत् कोपान्मामेव प्रहरेत् तु सः । तस्मात् प्रदक्षिणं कुर्यान्न छिन्द्यादेनमन्वहम् ।। जो क्रोध करके पीपलपर प्रहार करता है, वह वास्तवमें मुझपर ही प्रहार करता है। इसलिये पीपलकी सदा प्रदक्षिणा करनी चाहिये, उसको काटना नहीं चाहिये ।। व्रतस्य पारणं तीर्थमार्जवं तीर्थमुच्यते । देवशुश्रूषणं तीर्थ गुरुशुश्रूषणं तथा ।। व्रतका पारण, सरलता, देवताओंकी सेवा और गुरुशुश्रूषा--ये सब तीर्थ कहे जाते हैं ।। पितृशुश्रूषणं तीर्थ मातृशुश्रूषणं तथा । दाराणां तोषणं तीर्थ गार्हस्थ्यं तीर्थमुच्यते ।। माता-पिताकी सेवा, स्त्रियोंको संतुष्ट रखना और गृहस्थ-धर्मका पालन करना--ये सब तीर्थ कहे गये हैं ।। आतिथेय: परं तीर्थ ब्रह्मतीर्थ सनातनम् | ब्रह्मचर्य परं तीर्थ त्रेताग्निस्तीर्थमुच्यते ।। अतिथि-सेवामें लगे रहना परम तीर्थ है। वेदका अध्ययन सनातन तीर्थ है। ब्रह्मचर्यका पालन करना परम तीर्थ है। आहवनीयादि तीन प्रकारकी अग्नियाँ--ये तीर्थ कहे जाते हैं ।। मूलं धर्म तु विज्ञाय मनस्तत्रावधार्यताम् । गच्छ तीर्थानि कौन्तेय धर्मो धर्मेण वर्धते ।। कुन्तीनन्दन! इन सबका मूल है 'धर्म'--ऐसा जानकर इनमें मन लगाओ तथा तीथोॉमें जाओ; क्योंकि धर्म करनेसे धर्मकी वृद्धि होती है ।। द्विविध॑ तीर्थमित्याहु: स्थावरं जज्भमं तथा । स्थावराज्जड्जमं तीर्थ ततो ज्ञानपरिग्रह: ।। दो प्रकारके तीर्थ बताये जाते हैं--स्थावर और जंगम। स्थावर तीर्थसे जंगम तीर्थ श्रेष्ठ है; क्योंकि उससे ज्ञानकी प्राप्ति होती है ।। कर्मणापि विशुद्धस्य पुरुषस्थेह भारत । ह्ृदये सर्वतीर्थानि तीर्थभूत: स उच्यते ।। भारत! इस लोकमें पुण्यकर्मके अनुष्ठानसे विशुद्ध हुए पुरुषके हृदयमें सब तीर्थ वास करते हैं, इसलिये वह तीर्थस्वरूप कहलाता है ।। गुरुतीर्थ परं ज्ञानमतस्तीर्थ न विद्यते । ज्ञानतीर्थ परं तीर्थ ब्रह्मतीर्थ सनातनम् ।। गुरुरूपी तीर्थसे परमात्माका ज्ञान प्राप्त होता है, इसलिये उससे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है। ज्ञानतीर्थ सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है और ब्रह्मतीर्थ सनातन है ।। क्षमा तु परम॑ तीर्थ सर्वतीर्थेषु पाण्डव । क्षमावतामयं लोक: परश्रैव क्षमावताम् ।। पाण्डुनन्दन! समस्त तीर्थोमें भी क्षमा सबसे बड़ा तीर्थ है। क्षमाशील मनुष्योंको इस लोक और परलोकमें भी सुख मिलता है ।। मानितो<मानितो वापि पूजितो5पूजितो5पि वा । आक्रुष्टस्तर्जितो वापि क्षमावांस्तीर्थमुच्यते ।। कोई मान करे या अपमान, पूजा करे या तिरस्कार, अथवा गाली दे या डाँट बतावे, इन सभी परिस्थितियोंमें जो क्षमाशील बना रहता है, वह तीर्थ कहलाता है ।। क्षमा यश: क्षमा दान क्षमा यज्ञ: क्षमा दम: | क्षमा हिंसा क्षमा धर्म: क्षमा चेन्द्रियनिग्रह: ।। क्षमा ही यश, दान, यज्ञ और मनोनिग्रह है। अहिंसा, धर्म और इन्द्रियोंका संयम क्षमाके ही स्वरूप हैं ।। क्षमा दया क्षमा यज्ञ: क्षमयैव धृतं जगत् । क्षमावान् ब्राह्मणो देव: क्षमावान् ब्राह्मणो वर: ।। क्षमा ही दया और क्षमा ही यज्ञ है। क्षमासे ही सारा जगत् टिका हुआ है; अतः जो ब्राह्मण क्षमावान् है, वह देवता कहलाता है, वही सबसे श्रेष्ठ है ।। क्षमावान् प्राप्तुयात् स्वर्ग क्षमावानाप्नुयाद् यश: । क्षमावान् प्राप्तुयान्मोक्षं तस्मात् साधु: स उच्यते ।। क्षमाशील मनुष्यको स्वर्ग, यश और मोक्षकी प्राप्ति होती है; इसलिये क्षमावान् पुरुष साधु कहलाता है ।। आत्मा नदी भारत पुण्यतीर्थ- मात्मा तीर्थ सर्वतीर्थप्रधानम् । आत्मा यज्ञ: सततं मन्यते वै स्वर्गो मोक्ष: सर्वमात्मन्यधीनम् ।। राजन! आत्मारूप नदी परम पावन तीर्थ है, यह सब तीथ्थोमें प्रधान है। आत्माको सदा यज्ञरूप माना गया है। स्वर्ग, मोक्ष--सब आत्माके ही अधीन हैं ।। आचारनैर्मल्यमुपागतेन सत्यक्षमानिस्तुलशीतलेन । ज्ञानाम्बुना स्नाति हि नित्यमेवं कि तस्य भूय: सलिलेन तीर्थम् ।। जो सदाचारके पालनसे अत्यन्त निर्मल हो गया है तथा सत्य और क्षमाके द्वारा जिसमें अतुलनीय शीतलता आ गयी है--ऐसे ज्ञानरूपी जलमें निरन्तर स्नान करनेवाले पुरुषको केवल पानीसे भरे हुए तीर्थकी क्या आवश्यकता है? ।। युधिछिर उवाच भगवन् सर्वपापष्न॑ प्रायश्षित्तमदुष्करम् । त्वद्धक्तस्य सुरश्रेष्ठ मम त्वं वक्तुमहसि ।। युधिष्ठिरने कहा--देवश्रेष्ठ भगवन्! मैं आपका भक्त हूँ। अब मुझे कोई ऐसा प्रायश्ित्त बतलाइये, जो करनेमें सरल और समस्त पापोंका नाश करनेवाला हो ।। श्रीभगवानुवाच रहस्यमिदमत्यर्थमश्राव्यं पापकर्मणाम् । अधार्मिकाणामभश्राय्यं प्रायश्षित्तं ब्रवीमि ते ।। श्रीभगवान् बोले--राजन! मैं तुम्हें अत्यन्त गोपनीय प्रायश्चित्त बता रहा हूँ। यह अधर्ममें रुचि रखनेवाले पापाचारी मनुष्योंको सुनाने योग्य नहीं है ।। पावन ब्राह्मणं दृष्टवा मदगतेनान्तरात्मना | नमो ब्रह्माण्यदेवायेत्यभिवादनमाचरेत् ।। किसी पवित्र ब्राह्मणको सामने देखनेपर सहसा मेरा स्मरण करे और “नमो ब्रह्मण्यदेवाय” कहकर भगवद्बुद्धिसे उन्हें प्रणाम करे ।। प्रदक्षिणं च य: कुर्यात् पुनरष्टाक्षरेण तु । तेन तुष्टेन विप्रेण तत्पापं क्षपयाम्यहम् ।। इसके बाद अष्टाक्षर मन्त्रका जप करते हुए ब्राह्मणदेवताकी परिक्रमा करे। ऐसा करनेसे ब्राह्मण संतुष्ट होते हैं और मैं उस प्रणाम करनेवाले मनुष्यके पापोंका नाश कर देता हूँ ।। यत्र कृष्टां वराहस्य मृत्तिकां शिरसा वहन् | प्राणायामशतं कृत्वा नर: पापै: प्रमुच्यते ।। जहाँ वराहद्वारा उखाड़ी हुई मृत्तिका हो, उसको सिरपर धारण करके मनुष्य सौ प्राणायाम करता है तो वह पापोंसे छूट जाता है ।। दक्षिणावर्तशड्खाद् वा कपिलाशुड्रतो5पि वा । प्राक्स्रोतसं नदीं गत्वा ममायतनसंनिधौ ।। सलिलेन तु यः स्नायात् सकृदेव रविग्रहे । तस्य यत् संचितं पाप॑ं तत्क्षणादेव नश्यति ।। जो मनुष्य सूर्यग्रहणके समय पूर्ववाहिनी नदीके तटपर जाकर मेरे मन्दिरके निकट दक्षिणावर्त शंखके जलसे अथवा कपिला गायके सींगका स्पर्श कराये हुए जलसे एक बार भी स्नान कर लेता है, उसके समस्त संचित पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं ।। पिबेत् तु पञ्चगव्यं यः पौर्णमास्यामुपोष्य तु । तस्य नश्यति तत् पाप॑ यत् पापं पूर्वसंचितम् ।। जो पूर्णिमाको उपवास करके पञ्चगव्यका पान करता है, उसके भी पूर्वसंचित पाप नष्ट हो जाते हैं ।। तथैव ब्रह्मकूर्च तु समन्त्र तु पृथक् पृथक् । मासि मासि पिबेद् यस्तु तस्य पापं प्रणश्यति ।। इसी प्रकार जो प्रतिमास अलग-अलग मन्त्र पढ़कर संग्रह किये हुए ब्रह्मकूर्चका पान करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं ।। पात्र च ब्रह्मकूर्च च शृणु तत्र च भारत । पलाशं पद्मपत्रं च ताम्रं वाथ हिरण्मयम् । सादयित्वा तु गृह्नीयात् तत् तु पात्रमुदाह्॒तम् ।। भरतनन्दन! अब मैं ब्रह्मकूर्च और उसके पात्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। पलाश या कमलके पत्तेमें अथवा ताँबे या सोनेके बने हुए बर्तनमें ब्रह्मकूर्च रखकर पीना चाहिये। ये ही उसके उपयुक्त पात्र कहे गये हैं ।। गायदत्र्या गृह्नते मूत्र गन्धद्वारेति गोमयम् | आप्यायस्वेति च क्षीरं दधि क्राव्णेति वै दधि ।। तेजो5सि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम् । आपो हिछेत्यूचा गृह यवचूर्ण यथाविधि ।। ब्रह्मणे च यथा हुत्वा समिद्धे च हुताशने । आलोड्य प्रणवेनैव निर्मथ्य प्रणवेन तु ।। (ब्रह्मकूर्चकी विधि इस प्रकार है--) गायत्रीः मन्त्र पढ़कर गौका मूत्र, “गन्धद्वार०'३ इत्यादि मन्त्रसे गौका गोबर, “आप्यायस्व०'3 इस मन्त्रसे गायका दूध, “दधि क्राव्ण०'* इस मन्त्रसे दही, “तेजो5सि शुक्रम्०** इस मन्त्रसे घी, “देवस्य त्वा०“* आदि मन्त्रके द्वारा कुशका जल तथा “आपो हिछ्ठा मयो०” इस ऋचाके द्वारा जौका आटा लेकर सबको एकमें मिला दे और प्रज्वलित अग्निमें ब्रह्माके उद्देश्यसे विधिपूर्वक हवन करके प्रणवका उच्चारण करते हुए उपर्युक्त वस्तुओंका आलोडन और मन्थन करे ।। उद्धृत्य प्रणवेनैव पिबेत् तु प्रणवेन तु । महतापि स पापेन त्वचेवाहिर्विमुच्यते ।। फिर प्रणवका उच्चारण करके उसे पात्रमेंसे निकालकर हाथमें ले और प्रणवका पाठ करते हुए ही उसे पी जाय। इस प्रकार ब्रह्मकूर्चका पान करनेसे मनुष्य बड़े-से-बड़े पापसे भी उसी प्रकार छुटकारा पा जाता है, जैसे साँप अपनी केंचुलसे पृथक् हो जाता है ।। भद्रें न इति यः पादं पठन् ऋक् संहितां तदा । अन्तर्जले वाभ्यादित्ये तस्य पाप॑ प्रणश्यति ।। जो मनुष्य जलके भीतर बैठकर अथवा सूर्यके सामने दृष्टि रखकर “भद्रें न:०“* इस ऋचाके एक चरणका या ऋक्संहिताका पाठ करता है, उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं ।। मम सूचक्तं जपेद् यस्तु नित्यं मद्गतमानस: । न पापेन स लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा ।। जो मुझमें चित्त लगाकर प्रतिदिन मेरे सूक्त (पुरुषसूक्त)-का पाठ करता है, वह जलसे निर्लिप्त रहनेवाले कमलके पत्तेकी तरह कभी भी पापसे लिप्त नहीं होता ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) ३. तत्सवितुव्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् ।। २. गन्धद्वारां दुराधर्षा नित्यपुष्टां करीषिणीम् | ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्नये श्रियम् ।। 3. आप्यायस्व समेतु ते विश्वत: सोमवृष्ण्यम् | भवाव्वाजस्य सड़थे ।। (यजु० अ० १२ मं० ११२) ४. दधि क्राव्णो5कारिषज्जिष्णोरश्वस्य वाजिन: । सुरभि नो मुखाकरत्प्रण5आयूँ:षि तारिषत् ।। (यजु० अ० २३।३२) ५. ३० तेजो$सि शुक्रमस्यमृतमसि । धामनामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि ।। (यजु० १॥३१) ३. देवस्य त्वा सवितु: प्रसवेश्चिनोर्बाहुभ्याम्पूृष्णो हस्ताभ्याम् आददे। (यजु० अ० ३८।१) २. भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम् | अध ते सख्ये अन्धसो विवो मदे रणान्गावो न यवसे विवक्षसे |। (ऋ० मं० १० अ० २ सू० २६ मन्त्र १) [उत्तम और अधम ब्राह्माणोंके लक्षण, भक्त, गौ और पीपलकी महिमा] युधिछिर उवाच कीदृशा ब्राह्मुणा: पुण्या भावशुद्धा: सुरेश्वर । यत्कर्म सफलं नेति कथयस्व ममानघ ।। युधिष्ठिरने पूछा--निष्पाप देवेश्वर! जिनके भाव शुद्ध हों, वे पुण्यात्मा ब्राह्मण कैसे होते हैं तथा ब्राह्मगगको अपने कर्ममें सफलता न मिलनेका क्या कारण है? यह बतानेकी कृपा कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच शृणु पाण्डव तत् सर्व ब्राह्मणानां यथाक्रमम् सफल निष्फलं चैव तेषां कर्म ब्रवीमि ते ।। श्रीभगवानने कहा--पाण्डुनन्दन! ब्राह्मणोंका कर्म क्यों सफल होता है और क्यों निष्फल--इन बातोंको मैं क्रमश: बताता हूँ, सुनो ।। त्रिदण्डधारणं मौनं जटाधारणमुण्डनम् | वल्कलाजिनसंवासो ब्रह्मचर्याभिषेचनम् ।। अन्निहोत्रं गृहे वास: स्वाध्यायं दारसत्क्रिया । सर्वाण्येतानि वै मिथ्या यदि भावो न निर्मल: ।। यदि हृदयका भाव शुद्ध न हो तो त्रिदण्ड धारण करना, मौन रहना, जटा रखाना, माथा मुँड़ाना, वल्कल या मृगचर्म पहनना, व्रत और अभिषेक करना, अग्निमें आहुति देना, गृहस्थ-धर्मका पालन करना, स्वाध्यायमें संलग्न रहना और अपनी स्त्रीका सत्कार करना-- ये सारे कर्म व्यर्थ हो जाते हैं ।। क्षान्तं दान्तं जितक्रोधं जितात्मानं जितेन्द्रियम तमग्रयं ब्राह्मणं मन्ये शेषा: शूद्रा इति स्मृता: ।। जो क्षमाशील, दमका पालन करनेवाला, क्रोधरहित तथा मन और इन्द्रियोंको जीतनेवाला हो, उसीको मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण मानता हूँ। उसके अतिरिक्त जो ब्राह्मण कहलानेवाले लोग हैं, वे सब शूट्र माने गये हैं ।। अग्निहोत्रव्रतपरान् स्वाध्यायनिरतान् शुचीन् । उपवासरतान् दान्तांस्तान् देवा ब्राह्मणा विदु: ।। न जात्या पूजितो राजन् गुणा: कल्याणकारणा: । जो अन्निहोत्र, व्रत और स्वाध्यायमें लगे रहनेवाले, पवित्र, उपवास करनेवाले और जितेन्द्रिय हैं, उन्हीं पुरुषोंको देवता लोग ब्राह्मण मानते हैं। राजन! केवल जातिसे किसीकी पूजा नहीं होती, उत्तम गुण ही कल्याण करनेवाले होते हैं ।। मनश्शौचं कर्मशौचं कुलशौचं च भारत | शरीरशौचं वाक्छौचं शौचं पञ्चविध॑ स्मृतम् ।। मनःशुद्धि, क्रियाशुद्धि, कुलशुद्धि, शरीरशुद्धि और वाक्-शुद्धि--इस तरह पाँच प्रकारकी शुद्धि बतायी गयी है ।। पज्चस्वेतेषु शौचेषु हृदि शौचं विशिष्यते । हृदयस्य च शौचेन स्वर्ग गच्छन्ति मानवा: ।। इन पाँचों शुद्धियोंमें हृदयकी शुद्धि सबसे बढ़कर है। हृदयकी ही शुद्धिसे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।। अन्निहोत्रपरि भ्रष्ट: प्रसक्त: क्रयविक्रयै: । वर्णसंकरकर्ता च ब्राह्मणो वृषलै: सम: ।। जो ब्राह्मण अग्निहोत्रका त्याग करके खरीद-बिक्रीमें लग गया है, वह वर्णसंकरताका प्रचार करनेवाला और शूद्रके समान माना गया है ।। यस्य वेदश्रुतिर्नष्टा कर्षकश्नापि यो द्विज: । विकर्मसेवी कौन्तेय स वै वृषल उच्यते ।। कुन्तीनन्दन! जिसने वैदिक श्रुतियोंको भुला दिया है तथा जो खेतमें हल जोतता है, अपने वर्णके विरुद्ध काम करनेवाला वह ब्राह्मण वृषल माना गया है ।। वृषो हि धर्मो विज्ञेयस्तस्य य: कुरुते लयम् । वृषलं त॑ विदुर्देवा निकृष्टे श्वपचादपि ।। वृष शब्दका अर्थ है धर्म; उसका जो लय करता है, उसको देवतालोग वृषल मानते हैं। वह चाण्डालसे भी नीच होता है ।। स्तुतिभिन्रह्यगीताभियर: शूद्रं स्तौति मानव: । नतु मां स्तौति पापात्मा स तु चण्डालत: सम: ।। जो पापात्मा मनुष्य ब्रह्मगीता आदिके द्वारा मेरी स्तुति न करके किसी शूद्रका स्तवन करता है, वह चाण्डालके समान है ।। श्वदृती तु यथा क्षीरं ब्रह्म वै वृषले तथा । दुष्टतामेति तत् सर्व शुना लीढं हविर्यथा ।। जैसे कुत्तेकी खालमें रखा हुआ दूध और कुत्तेका चाटा हुआ हविष्य अशुद्ध होता है, उसी प्रकार वृषल मनुष्यकी बुद्धिमें स्थित वेद भी दूषित हो जाता है ।। अड्भनि वेदाश्ष॒त्वारो मीमांसा न््यायविस्तर: । धर्मशास्त्रं पुराणं च विद्या होताश्चतुर्दश ।। चार वेद, छ: अंग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र और पुराण--ये चौदह विद्याएँ हैं ।। यान्युक्तानि मया सम्यग् विद्यास्थानानि भारत | उत्पन्नानि पवित्राणि भुवनार्थ तथैव च ।। तस्मात् तानि न शूद्रस्य स्पृष्टव्यानि युधिष्ठिर । सर्व च शूद्रसंस्पृष्टमपवित्र॑ न संशय: ।। भरतनन्दन! मैंने जो विद्याके चौदह पवित्र स्थान पूर्णतया बताये हैं, वे तीनों लोकोंके कल्याणके लिये प्रकट हुए हैं। अतः शूद्रको इनका स्पर्श नहीं करना चाहिये। युधिष्ठिर! शूद्रके सम्पर्कमें आनेवाली सभी वस्तुएँ अपवित्र हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं है ।। लोके त्रीण्यपवित्राणि पञ्चामेध्यानि भारत । श्वा च शूद्र:श्वपाकश्न॒ अपवित्राणि पाण्डव ।। भारत! इस संसारमें तीन अपवित्र और पाँच अमेध्य हैं। पाण्डुनन्दन! कुत्ता, शूद्र और श्रपाक (चाण्डाल)--ये तीन अपवित्र होते हैं |। गायक: कुक्कुटो यूपो हुदक््या वृषलीपति: । पज्चैते स्युरमेध्याश्व स्प्रष्टटया न कदाचन । स्पृष्टवैतानष्ट वै विप्र: सचैलो जलमाविशेत् ।। तथा अश्लील गायक, मुर्गा, जिसमें वध करनेके लिये पशुओंको बाँधा जाय वह खम्भा, रजस्वला स्त्री और वृषल जातिकी स्त्रीसे ब्याह करनेवाला द्विज--ये पाँच अमेध्य माने गये हैं; इनका कभी भी स्पर्श नहीं करना चाहिये। यदि ब्राह्मण इन आठोंमेंसे किसीका स्पर्श कर ले तो वस्त्रसहित जलमें प्रवेश करके स्नान करे ।। मद्धक्तान् शूद्रसामान्यादवमन्यन्ति ये नरा: । नरकेष्वेव तिष्ठन्ति वर्षकोटिं नराधमा: ।। जो मनुष्य मेरे भक्तोंका शुद्र-जातिमें जन्म होनेके कारण अपमान करते हैं, वे नराधम करोड़ों वर्षतक नरकोंमें निवास करते हैं ।। चण्डालमपि मद्धक्तं नावमन्येत बुद्धिमान् । अवमानात् पतन्त्येव नरके रौरवे नरा: ।। अतः चाण्डाल भी यदि मेरा भक्त हो तो बुद्धिमान् पुछषको उसका अपमान नहीं करना चाहिये। अपमान करनेसे मनुष्यको रौरव नरकमें गिरना पड़ता है ।। मम भक्तस्य भक्तेषु प्रीतिरभ्यधिका मम । तस्मान्मदभक्तभक्ताश्न पूजनीया विशेषतः ।। जो मनुष्य मेरे भक्तोंके भक्त होते हैं, उनपर मेरा विशेष प्रेम होता है, इसलिये मेरे भक्तके भक्तोंका विशेष सत्कार करना चाहिये ।। कीटपक्षिमृगाणां च मयि संन्यस्यचेतसाम् | ऊध्वमिव गतिं विद्धि किं पुनरज्ञानिनां नृणाम् ।। मुझमें चित्त लगानेपर कीड़े, पक्षी और पशु भी ऊर्ध्वगतिको ही प्राप्त होते हैं, फिर ज्ञानी मनुष्योंकी तो बात ही कया है? ।। पत्र॑ वाप्यथवा पुष्पं फलं वाप्पप एव वा | ददाति मम शूद्रो यच्छिरसा धारयामि तत् ।। मेरा भक्त शूद्र भी यदि पत्र, पुष्प, फल अथवा जल ही अर्पण करे तो मैं उसे सिरपर धारण करता हूँ ।। वेदोक्तेनैव मार्गेण सर्वभूतहृदि स्थितम् । मामर्चयन्ति ये विप्रा मत्सायुज्यं व्रजन्ति ते ।। जो ब्राह्मण सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें विराजमान मुझ परमेश्वरका वेदोक्त रीतिसे पूजन करते हैं, वे मेरे सायुज्यको प्राप्त होते हैं ।। मदभक्तानां हितायैव प्रादुर्भाव: कृतो मया । प्रादुर्भावकृता काचिदर्चनीया युधिष्ठिर ।। युधिष्ठिर! मैं अपने भक्तोंका हित करनेके लिये ही अवतार धारण करता हूँ; अतः मेरे प्रत्येक अवतार-विग्रहका पूजन करना चाहिये ।। आसामन्यतमां मूर्ति यो मद्भक्त्या समर्चति । तेनैव परितुष्टोड5हं भविष्यामि न संशय: ।। जो मनुष्य मेरे अवतार-विग्रहोंमेंसे किसी एककी भी भक्तिभावसे आराधना करता है, उसके ऊपर मैं निःसंदेह प्रसन्न होता हूँ ।। मृदा च मणिरल्नैश्व ताम्रेण रजतेन च । कृत्वा प्रतिकृतिं कुर्यादर्चनां काउचनेन वा । पुण्यं दशगुणं विद्यादेतेषामुत्तरोत्तरम् ।। मिट्टी, ताँबा, चाँदी, स्वर्ण अथवा मणि एवं रत्नोंकी मेरी प्रतिमा बनवाकर उसकी पूजा करनी चाहिये। इनमें उत्तरोत्तर मूर्तियोंकी पूजासे दसगुना अधिक पुण्य समझना चाहिये ।। जयकामो भवेद् राजा विद्याकामो द्विजोत्तम: । वैश्यो वा धनकामस्तु शूद्र: सुखफलप्रिय: । सर्वकामा: स्त्रियो वापि सर्वान् कामानवाप्रुयु: ।। यदि ब्राह्मणको विद्याकी, क्षत्रियको युद्धमें विजयकी, वैश्यको धनकी, शूद्रको सुखरूप फलकी तथा स्त्रियोंको सब प्रकारकी कामना हो तो ये सब मेरी आराधनासे अपने सभी मनोरथोंको प्राप्त कर सकते हैं ।। युधिछिर उवाच कीदृशानां तु शूद्राणां नानुगृह्नासि चार्चनम् उद्वेगस्तव कस्माद्धि तनमे ब्रूहि सुरेश्वर ।। युधिष्ठटिरने पूछा--देवेश्वर! आप किस तरहके शूद्रोंकी पूजा नहीं स्वीकार करते तथा आपको कौन-सा कार्य बुरा लगता है? यह मुझे बतलाइये ।। श्रीभगवानुवाच अव्रतेनाप्यभक्तेन स्पृष्टां शूद्रेण चार्चनाम् । तां वर्जयामि राजेन्द्र श्वपाकविहितामिव ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! जो व्रतका पालन न करनेवाला और मेरा भक्त नहीं है, उस शूद्रकी स्पर्श की हुई पूजाको मैं कुत्ता पकानेवाले चाण्डालकी की हुई समझकर त्याग देता हूँ ।। नन््वहं शड्करश्नापि गावो विप्रास्तथैव च । अश्वत्थोडमररूपं हि त्रयमेतद् युधिष्ठिर ।। एतत्त्रयं हि मद्धक्तो नावमन्येत कह्िचित् । युधिष्ठिर! गौ, ब्राह्मण और पीपलका वृक्ष--ये तीनों देवरूप हैं। इन्हें मेरा और भगवान् शंकरका स्वरूप समझना चाहिये। मेरे भक्त पुरुषको उचित है कि वह इन तीनोंका कभी अपमान न करे |। अभश्रत्थो ब्राह्मणा गावो मन्मयास्तारयन्ति हि | तस्मादेतत् प्रयत्नेन त्रयं पूजय पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन! मेरे स्वरूप होनेके कारण पीपल, ब्राह्मण और गौ--ये तीनों मनुष्यका उद्धार करनेवाले हैं, इसलिये तुम यत्नपूर्वक इन तीनोंकी पूजा किया करो ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [भगवान्के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन] युधिछिर उवाच देशान्तरगते विप्रे संयुक्ते कालधर्मणा । शरीरनाशे सम्प्राप्ते कथं प्रेततवकल्पना ।। युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! यदि कोई ब्राह्मण परदेश गया हो और वहीं कालकी प्रेरणासे उसका शरीर नष्ट हो जाय तो उसकी प्रेतक्रिया (अन्त्येष्टि-संस्कार) किस प्रकार सम्भव है? ।। श्रीभगवानुवाच श्रूयतामाहिताग्नेस्तु तथाभूतस्य संस्क्रिया । पालाशदबृन्दै: प्रतिमा कर्तव्या कल्पचोदिता ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! यदि किसी अन्निहोत्री ब्राह्मणकी इस प्रकार मृत्यु हो जाय तो उसका संस्कार करनेके लिये प्रेतकल्पमें बताये अनुसार उसकी काष्ठमयी प्रतिमा बनवानी चाहिये। वह काष्ठ पलाशका ही होना उचित है ।। त्रीणि षष्टिशतान्याहुरस्थीन्यस्य युधिष्ठिर । तेषां विकल्पना कार्या यथाशास्त्र विनिश्चितम् ।। युधिष्ठिर! मनुष्यके शरीरमें तीन सौ साठ हड्डियाँ बतायी गयी हैं। उन सबकी शारस्त्रोक्त रीतिसे कल्पना करके उस प्रतिमाका दाह करना चाहिये ।। युधिछिर उवाच विशेषतीर्थ सर्वेषामशक्तानामनुग्रहात् । भक्तानां तारणार्थ तु वक्तुमर्हसि धर्मतः ।। युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! जो भक्त तीर्थयात्रा करनेमें असमर्थ हों, उन सबको तारनेके लिये कृपया किसी विशेष तीर्थका धर्मानुसार वर्णन कीजिये ।। श्रीभगवानुवाच पावन सर्वतीर्थानां सत्यं गायन्ति सामगा: । सत्यस्य वचन तीर्थमहिंसा तीर्थमुच्यते ।। श्रीभगवानने कहा--राजन्! सामवेदका गायन करनेवाले विद्वान् कहते हैं कि सत्य सब तीर्थोंको पवित्र करनेवाला है। सत्य बोलना और किसी जीवकी हिंसा न करना--ये तीर्थ कहलाते हैं ।। तपस्तीर्थ दया तीर्थ शीलं तीर्थ युधिष्ठिर । अल्पसंतोषकं तीर्थ नारी तीर्थ पतिव्रता ।। युधिष्ठिर! तप, दया, शील, थोड़ेमें संतोष करना--ये सदगुण भी तीर्थरूपमें ही हैं तथा पतिव्रता नारी भी तीर्थ है ।। संतुष्टो ब्राह्मणस्तीर्थ ज्ञानं वा तीर्थमुच्यते । मद्धक्ता: सततं तीर्थ शड्करस्य विशेषतः ।। संतोषी ब्राह्मण और ज्ञानको भी तीर्थ कहते हैं। मेरे भक्त सदैव तीर्थरूप हैं और शंकरके भक्त विशेषतया तीर्थ हैं ।। यतयस्तीर्थमित्येवं विद्वांसस्तीर्थमुच्यते । शरण्यपुरुषस्तीर्थम भयं तीर्थमुच्यते ।। संन्यासी और विद्वान् भी तीर्थ कहे जाते हैं। दूसरोंको शरण देनेवाले पुरुष भी तीर्थ हैं। जीवोंको अभय दान देना भी तीर्थ ही कहलाता है ।। त्रैलोक्ये5स्मिन् निरुद्धिग्नो न बिभेमि कुतश्चन । न दिवा यदि वा रात्रावुद्वेग: शूद्रलड्घनात् ।। मैं तीनों लोकोंमें उद्वेगशून्य हूँ। दिन हो या रात, मुझे कभी किसीसे भी भय नहीं होता; किंतु शूद्रका मर्यादा-भंग करना मुझे बुरा लगता है ।। न भयं देवदैत्येभ्यो रक्षोभ्यश्वैव मे नृप । शूद्रवक्त्राच्च्युतं ब्रह्म भयं तु मम सर्वदा ।। राजन! देवता, दैत्य और राक्षसोंसे भी मैं नहीं डरता। परंतु शूद्रके मुखसे जो वेदका उच्चारण होता है, उससे मुझे सदा ही भय बना रहता है ।। तस्मात् सप्रणवं शूद्रो मन्नामापि न कीर्तयेत् । प्रणवं हि परं लोके ब्रद्दा ब्रह्म॒विदो विदु: ।। इसलिये शूद्रको मेरे नामका भी प्रणवके साथ उच्चारण नहीं करना चाहिये, क्योंकि वेदवेत्ता विद्वान् इस संसारमें प्रणवको सर्वोत्कृष्ट वेद मानते हैं |। द्विजशुश्रूषणं धर्म: शूद्राणां भक्तितो मयि । शूद्र मुझमें भक्ति रखते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवा करे--यही उनका परम धर्म है ।। द्विजशुश्रूषया शूद्र: परं श्रेयोडधिगच्छति । द्विजशुश्रूषणादन्यन्नास्ति शूद्रस्य निष्कृति: ।। द्विजोंकी सेवासे ही शूद्र परम कल्याणके भागी होते हैं। इसके सिवा उनके उद्धारका दूसरा कोई उपाय नहीं है ।। सृष्टवा पितामह: शूद्रमभिभूतं तु तामसै: । द्विजशुश्रूषणं धर्म शूद्राणां तु प्रयुक्तवान् नश्यन्ति तामसा भावा: शूद्रस्य द्विजभक्तित: ।। ब्रह्माजीने शूद्रोंको तामस गुणोंसे युक्त उत्पन्न करके उनके लिये द्विजोंकी सेवारूप धर्मका उपदेश किया। द्विजोंकी भक्तिसे शूद्रके तामस भाव नष्ट हो जाते हैं ।। पत्र॑ पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपद्वत॑ मूर्थ्ना गृह्नामि शूद्रत: ।। शूद्र भी यदि भक्तिपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल अथवा जल अर्पण करता है तो मैं उसके भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहारको सादर शीश चढ़ाता हूँ ।। अग्रजो वापि य: कश्चित् सर्वपापसमन्वित: । यदि मां सतत ध्यायेत् सर्वपापै: प्रमुच्यते ।। सम्पूर्ण पापोंसे युक्त होनेपर भी यदि कोई ब्राह्मण सदा मेरा ध्यान करता रहता है तो वह अपने सम्पूर्ण पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।। विद्याविनयसम्पन्ना ब्राह्मणा वेदपारगा: । मयि भरक्ति न कुर्वन्ति चाण्डालसदृशा हि ते ।। विद्या और विनयसे सम्पन्न तथा वेदोंके पारंगत विद्वान् होनेपर भी जो ब्राह्मण मुझमें भक्ति नहीं करते, वे चाण्डालके समान हैं ।। वृथा दानं॑ वृथा तप्तं वृथा चेष्टं वृथा हुतम् वृथा55तिभ्यं च तत् तस्य यो न भक्तो मम द्विज: ।। जो द्विज मेरा भक्त नहीं है, उसके दान, तप, यज्ञ, होम और अतिथि-सत्कार--ये सब व्यर्थ हैं ।। स्थावरे जड़मे वापि सर्वभूतेषु पाण्डव | समत्वेन यदा कुर्यान्मद्भक्तो मित्रशत्रुषु ।। पाण्डुनन्दन! जब मनुष्य समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंमें एवं मित्र और शत्रुमें समान दृष्टि कर लेता है, उस समय वह मेरा सच्चा भक्त होता है ।। आनृशंस्यमहिंसा च यथा सत्यं तथा5अ<र्जवम् | अद्रोहश्वैव भूतानां मद्गतानां व्रतं नूप ।। राजन! क्रूरताका अभाव, अहिंसा, सत्य, सरलता तथा किसी भी प्राणीसे ट्रोह न करना यह मेरे भक्तोंका व्रत है ।। नम इत्येव यो ब्रूयान्मदभक्तं श्रद्धयान्वित: । तस्याक्षया5भवृँल्लोका: श्वपाकस्यापि पार्थिव ।। पृथ्वीनाथ! जो मनुष्य मेरे भक्तको श्रद्धापूर्वक नमस्कार करता है, वह चाण्डाल ही क्यों न हो, उसे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है ।। कि पुनर्ये यजन्ते मां सदारं विधिपूर्वकम् । मद्धभधक्ता मद्गतप्राणा: कथयन्तश्न मां सदा ।। फिर जो साक्षात् मेरे भक्त हैं, जिनके प्राण मुझमें ही लगे रहते हैं तथा जो सदा मेरे ही नाम और गुणोंका कीर्तन करते रहते हैं, वे यदि लक्ष्मीसहित मेरी विधिवत् पूजा करते हैं तो उनकी सदगतिके विषयमें क्या कहना है? ।। बहुवर्षसहस्राणि तपस्तपति यो नर: । नासौ पदमवाप्रोति मद्धभक्तैर्यदवाप्यते ।। अनेकों हजार वर्षोतक तपस्या करनेवाला मनुष्य भी उस पदको प्राप्त नहीं होता, जो मेरे भक्तोंको अनायास ही मिल जाता है ।। मामेव तस्माद् राजेन्द्र ध्यायन् नित्यमतन्द्रित: । अवाप्स्यसि तत: सिद्धि द्रक्ष्यत्येव परं पदम् ।। इसलिये राजेन्द्र! तुम सदा सजग रहकर निरन्तर मेरा ही ध्यान करते रहो, इससे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी और तुम निश्चय ही परम पदका साक्षात्कार कर सकोगे ।। ऋग्वेदेनैव होता च यजुषाध्वर्युरेव च । सामवेदेन चोद्वाता पुण्येनाभिष्ट्वन्ति माम् ।। अथर्वशिरसा चैव नित्यमाथर्वणा द्विजा: । स्तुवन्ति सततं ये मां ते वै भागवता: स्मृता: ।। जो होता बनकर ऋग्वेदके द्वारा, अध्वर्यु होकर यजुर्वेदके द्वारा, उद्बाता बनकर परम पवित्र सामवेदके द्वारा मेरा स््तवन करते हैं तथा अथर्ववेदीय द्विजोंके रूपमें जो अथर्ववेदके द्वारा हमेशा मेरी स्तुति किया करते हैं, वे भगवद्भक्त माने गये हैं ।। वेदाधीना: सदा यज्ञा यज्ञाधीनास्तु देवता: । देवता: ब्राह्मणाधीनास्तस्माद् विप्रास्तु देवता: ।। यज्ञ सदा वेदोंके अधीन हैं और देवता यज्ञों तथा ब्राह्मणोंके अधीन होते हैं, इसलिये ब्राह्मण देवता हैं ।। अनतश्रित्योच्छूयं नास्ति मुख्यमाश्रयमाश्रयेत् । रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रित: ।। किसीका सहारा लिये बिना कोई ऊँचे नहीं चढ़ सकता, अत: सबको किसी प्रधान आश्रयका सहारा लेना चाहिये। देवतालोग भगवान् रुद्रके आश्रयमें रहते हैं, रुद्र ब्रह्माजीके अश्रित हैं |। ब्रह्मा मामाश्रितो राजन नाहं कंचिदुपाश्रित: । ममाश्रयो न वकच्षित् तु सर्वेषामाश्रयो हाहम् ।। ब्रह्माजी मेरे आश्रयमें रहते हैं, किंतु मैं किसीके आश्रित नहीं हूँ। राजन्! मेरा आश्रय कोई नहीं है। मैं ही सबका आश्रय हूँ ।। एवमेतन्मया प्रोक्ते रहस्यमिदमुत्तमम् | धर्मप्रियस्य ते नित्यं राजन्नेवं समाचर ।। राजन! इस प्रकार ये उत्तम रहस्यकी बातें मैंने तुम्हें बतायी हैं, क्योंकि तुम धर्मके प्रेमी हो। अब तुम इस उपदेशके ही अनुसार सदा आचरण करो ।। इदं पवित्रमाख्यान॑ पुण्यं वेदेन सम्मितम् । य: पठेन्मामकं धर्ममहन्यहनि पाण्डव ।। धर्मोडपि वर्धते तस्य बुद्धिश्चापि प्रसीदति । पापक्षयमुपेत्यैवं कल्याणं च विवर्धते ।। यह पवित्र आख्यान पुण्यदायक एवं वेदके समान मान्य है। पाण्डुनन्दन! जो मेरे बताये हुए इस वैष्णव-धर्मका प्रतिदिन पाठ करेगा, उसके धर्मकी वृद्धि होगी और बुद्धि निर्मल। साथ ही उसके समस्त पापोंका नाश होकर परम कल्याणका विस्तार होगा ।। एतत् पुण्यं पवित्र च पापनाशनमुत्तमम् । श्रोतव्य॑ श्रद्धया युक्ते: श्रोत्रियैश्न विशेषत: ।। यह प्रसंग परम पवित्र, पुण्यदायक, पापनाशक और अत्यन्त उत्कृष्ट है। सभी मनुष्योंको, विशेषत: श्रोत्रिय विद्वानोंको श्रद्धाके साथ इसका श्रवण करना चाहिये ।। श्रावयेद् यस्त्विदं भक्त्या प्रयतो5थ शृणोति वा । स गच्छेन्मम सायुज्यं नात्र कार्या विचारणा ।। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसे सुनाता और पवित्रचित्त होकर सुनता है, वह मेरे सायुज्यको प्राप्त होता है, इसमें कोइ शंका नहीं है ।। यश्नैमं श्रावयेच्छाद्धे मदभक्तो मत्परायण: । पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसम्प्लवम् ।। मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाला जो भक्त पुरुष श्राद्धमें इस धर्मको सुनाता है, उसके पितर इस ब्रह्माण्डके प्रलय होनेतक सदा तृप्त बने रहते हैं ।। वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा भागवतान् धर्मान् साक्षाद् विष्णोर्जगद्गुरो: । प्रहष्टमनसो भूत्वा चिन्तयन्तो5द्भुता: कथा: ।। ऋषय: पाण्डवाश्रैव प्रणेमुस्तं जनार्दनम् । पूजयामास गोविन्द धर्मपुत्र: पुनः पुन: ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! साक्षात् विष्णुस्वरूप जगदगुरु भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे भागवत-धर्मोंका श्रवण करके इस अदभुत प्रसंगपर विचार करते हुए ऋषि और पाण्डवलोग बहुत प्रसन्न हुए और सबने भगवान्को प्रणाम किया। धर्मनन्दन युधिष्ठिरने तो बारंबार गोविन्दका पूजन किया ।। देवा ब्रह्मर्षय: सिद्धा गन्धर्वाप्सरसस्तथा । ऋषयश्च महात्मानो गुहरका भुजगास्तथा ।। बालखिलल््या महात्मानो योगिनस्तत्त्वदर्शिन: । तथा भगवताश्चापि पजचकालमुपासका: ।। कौतूहलसमायुक्ता भगवद्धक्तिमागता: । श्रुत्वा तु परम पुण्यं वैष्णवं धर्मशासनम् ।। विमुक्तपापा: पूतास्ते संवृत्तास्तत्क्षणेन तु । देवता, ब्रह्मर्षि, सिद्ध, गन्धर्व, अप्सराएँ, ऋषि, महात्मा, गुह्यक, सर्प, महात्मा बालखिल्य, तत्त्वदर्शी योगी तथा पठचयाम उपासना करनेवाले भगवदभक्त पुरुष, जो अत्यन्त उत्कण्ठित होकर उपदेश सुननेके लिये पधारे थे, इस परम पवित्र वैष्णव-धर्मका उपदेश सुनकर तत्क्षण निष्पाप एवं पवित्र हो गये। सबमें भगवद्भक्ति उमड़ आयी ।। प्रणम्य शिरसा विष्णु प्रतिनन्द्य च ता: कथा: ।। फिर उन सबने भगवान्के चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और उनके उपदेशकी प्रशंसा की ।। द्रष्टारो द्वारकायां वै वयं सर्वे जगद्गुरुम् । इति प्रहृष्टमनसो ययुर्देवगणै: सह । सर्वे ऋषिगणा राजन् ययु: स्वं स्वं निवेशनम् ।। फिर 'भगवन्! अब हम द्वारकामें पुन: आप जगदगुरुका दर्शन करेंगे।” यों कहकर सब ऋषि प्रसन्नचित्त हो देवताओंके साथ अपने-अपने स्थानको चले गये ।। गतेषु तेषु सर्वेषु केशव: केशिहा हरि: । सस्मार दारुकं॑ राजन् स च सात्यकिना सह । समीपस्थो5भवत् सूतो याहि देवेति चाब्रवीत् ।। राजन! उन सबके चले जानेपर केशिनिषूदन भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिसहित दारुकको याद किया। सारथि दारुक पास ही बैठा था, उसने निवेदन किया--“भगवन्! रथ तैयार है, पधारिये ।। ” ततो विषण्णवदना: पाण्डवा: पुरुषोत्तमम् | अज्चलिं मूर्थ्नि संधाय नेत्रैरश्रुपरिप्लुतै: । पिबन्त: सततं कृष्णां नोचुरार्ततरास्तदा ।। यह सुनकर पाण्डवोंका मुँह उदास हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर सिरसे लगाया और वे आँसूभरे नेत्रोंसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्णणी ओर एकटक देखने लगे, किंतु अत्यन्त दुखी होनेके कारण उस समय कुछ बोल न सके ।। कृष्णो5पि भगवान् देव: पृथामामन्त्रय चार्तवत् । धृतराष्ट्रं च गान्धारी विदुरं द्रौपदी तथा ।। कृष्णद्वैपायनं व्यासमृषीनन्यांश्व मन्त्रिण: । सुभद्रामात्मजयुतामुत्तरां स्पृश्य पाणिना । निर्गत्य वेश्मनस्तस्मादारुरोह तदा रथम् ।। देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण भी उनकी दशा देखकर दुखी-से हो गये और उन्होंने कुन्ती, धृतराष्ट्र, गान्धारी, विदुर, द्रौपदी, महर्षि व्यास और अन्यान्य ऋषियों एवं मन्त्रियोंसे बिदा लेकर सुभद्रा तथा पुत्रसहित उत्तराकी पीठपर हाथ फेरा और आशीर्वाद देकर वे उस राजभवनसे बाहर निकल आये और रथपर सवार हो गये ।। वाजिभि: शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकै: । युक्त तु ध्वजभूतेन पतगेन्द्रेण धीमता ।। उस रथमें शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले चार घोड़े जुते हुए थे तथा बुद्धिमान् गरुड़का ध्वज फहरा रहा था ।। अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिर: । अपास्य चाशु यन्तारं दारुक॑ सूतसत्तमम् | अभीषून् प्रतिजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा ।। उस समय कुरुदेशके राजा युधिष्छिर भी प्रेमवश भगवानके पीछे-पीछे स्वयं भी रथपर जा बैठे और तुरंत ही श्रेष्ठ दारुकको सारथिके स्थानसे हटाकर उन्होंने घोड़ोंकी बागडोर अपने हाथमें ले ली ।। उपारुह्ार्जुनश्वापि चामरव्यजनं शुभम् | रुक्मदण्डं बृहन्मूर्ध्नि दुधावाभिप्रदक्षिणम् ।। फिर अर्जुन भी रथपर आरूढ़ हो स्वर्णदण्डयुक्त विशाल चँवर हाथमें लेकर दाहिनी ओरसे भगवान्के मस्तकपर हवा करने लगे ।। तथैव भीमसेनो5पि रथमारुह्ा[ वीर्यवान् | छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम् ।। इसी प्रकार महाबली भीमसेन भी रथपर जा चढ़े और भगवान्के ऊपर छत्र लगाये खड़े हो गये। वह छत्र सौ कमानियोंसे युक्त तथा दिव्य मालाओंसे सुशोभित था ।। वैदूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम् । दधार तरसा भीमश्छत्र तच्छाई'धन्वन: ।। उसका डंडा वैदूर्यमणिका बना हुआ था तथा सोनेकी झालरें उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। भीमसेनने शार्क््धनुषधारी श्रीकृष्णके उस छत्रको शीघ्र ही धारण कर लिया ।। उपारुहा[ रथं शीघ्र चामरव्यजने सिते । नकुल: सहदेवश्न धूयमानौ जनार्दनम् ।। नकुल और सहदेव भी अपने हाथोंमें सफेद चँवर लिये शीघ्र रथपर सवार हो गये और भगवान् जनार्दनके ऊपर डुलाने लगे ।। भीमसेनोडर्जुनश्वैव यमावप्यरिसूदनौ । पृष्ठतोडनुययु: कृष्णं मा शब्द इति हर्षिता: ।। इस प्रकार युधिष्ठि भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवने हर्षपूर्वक श्रीकृष्णका अनुसरण किया और कहने लगे--'आप मत जाइये' ।। त्रियोजने व्यतीते तु परिष्वज्य च पाण्डवान् । विसृज्य कृष्णस्तान् सर्वान् प्रणतान् द्वारकां ययौ ।। तीन योजन (चौबीस मील) तक चले आनेके बाद भगवान् श्रीकृष्णने अपने चरणोंमें पड़े हुए पाण्डवोंको गलेसे लगाकर विदा किया और स्वयं द्वारकाको चले गये ।। तथा प्रणम्य गोविन्द तदाप्रभृति पाण्डवा: । कपिलाद्यानि दानानि ददुर्धर्मपरायणा: ।। इस प्रकार भगवान् गोविन्दको प्रणाम करके जब पाण्डव घर लौटे, उस दिनसे सदा धर्ममें तत्पर रहकर कपिला आदि गौओंका दान करने लगे ।। मधुसूदनवाक्यानि स्मृत्वा स्मृत्वा पुन: पुन: । मनसा पूजायामासुर्हददयस्थानि पाण्डवा: ।। वे सब पाण्डव भगवान् श्रीकृष्णके वचनोंको बारंबार याद करके और उनको हृदयमें धारण करके मन-ही-मन उनकी सराहना करते थे ।। युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा हृदि कृत्वा जनार्दनम् | तदभक्तस्तन्मना युक्तस्तद्याजी तत्परो5भवत् ।। धर्मात्मा युधिष्ठिर ध्यानद्वारा भगवान्को अपने हृदयमें विराजमान करके उन्हींके भजनमें लग गये, उन्हींका स्मरण करने लगे और योगयुक्त होकर भगवान्का यजन करते हुए उन्हींके परायण हो गये ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि नकुलोपाख्याने द्विनवतितमो<ध्याय:
Janamejaya said: “O sage, when the ancient Aśvamedha had been completed, what question did my grandsire (King Yudhiṣṭhira) ask Keśava, the slayer of Keśin, when a doubt about dharma arose in his mind?” Vaiśampāyana said: “After the final rite of the Aśvamedha, when Yudhiṣṭhira had performed the concluding bath, the king bowed to Keśava and began to speak again.”
Verse 131
तथा हानेकैर्मुनिभिर्महान्त: क्रतव: कृता: । एवंविधे त्वगस्त्यस्य वर्तमाने तथाध्वरे | न ववर्ष सहस्राक्षस्तदा भरतसत्तम
Vaiśampāyana said: “So too, many great sages performed mighty sacrifices. Yet, while Agastya was conducting a sacrifice of this very kind, Indra of the thousand eyes did not send rain at that time, O best of the Bharatas.”
Verse 163
प्रोवाच वाक््यं स तदा प्रसाद्य शिरसा मुनीन् | उनके ऐसा कहनेपर प्रतापी अगस्त्य उन मुनियोंकों सिरसे प्रणाम करके उन्हें राजी करते हुए इस प्रकार बोले--
Then he spoke, having first appeased the sages. The mighty Agastya bowed his head in reverence to the munis and addressed them with conciliatory words, restoring harmony before speech or deed.
Verse 176
चिन्तायज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातन: । “यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं चिन्तनमात्रके द्वारा मानसिक यज्ञ करूँगा। यह यज्ञकी सनातन विधि है
Vaiśampāyana said: “I shall perform a sacrifice made of contemplation alone—a mental yajña. This is the ancient, time-honoured rule.”
Verse 183
स्पर्शयज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातन: । “यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं स्पर्शयज्ञ- करूँगा। यह भी यज्ञकी सनातन विधि है”
Vaiśampāyana said: “I shall perform the Sparśa-sacrifice; this is an ancient and time-honoured rite. If Indra withholds rain for twelve years, then I will undertake the Sparśa-yajña—such is the perennial ordinance of sacrifice.”
Verse 193
ध्येयात्मना हरिष्यामि यज्ञानेतान् यतव्रत: । “यदि इन्द्र बारह वर्षोतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं व्रत-नियमोंका पालन करता हुआ ध्यानद्वारा ध्येयरूपसे स्थित हो इन यज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा
Vaiśampāyana said: “With my mind fixed on the object of meditation, and steadfast in my vows, I shall carry these sacrifices through. If Indra does not send rain for twelve years, then, maintaining my disciplines, I will remain established in meditative concentration and still perform these rites.”
Verse 203
बीजैर्हि तं करिष्यामि नात्र विघ्नो भविष्यति । “यह बीज-यज्ञ मैंने बहुत वर्षोसे संचित कर रखा है। उन बीजोंसे ही मैं अपना यज्ञ पूरा कर लूँगा। इसमें कोई विघ्न नहीं होगा
Vaiśampāyana said: “With those very seeds I shall accomplish that rite; there will be no obstruction in this.” The words proclaim steadfast resolve and confidence in fulfilling sacred duty with resources long gathered and preserved.
Verse 216
वर्षिष्यतीह वा देवो न वा वर्ष भविष्यति । “इन्द्रदेव यहाँ वर्षा करें अथवा यहाँ वर्षा न हो, इसकी मुझे परवा नहीं है, मेरे इस यज्ञको किसी तरह व्यर्थ नहीं किया जा सकता
Vaiśampāyana said: “Whether the god (Indra) sends rain here or whether rain does not come at all, I do not care. This sacrifice of mine cannot be rendered futile by any means.”
Verse 217
यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षेष्यति वासव:
Vaiśampāyana said: “If Vāsava (Indra) does not send rain for twelve years…”
Verse 233
विशेषं चैव कर्तास्मि पुनः: पुनरतीव हि । “जो जिस आहारसे उत्पन्न हुआ है, उसे वही प्राप्त होगा तथा मैं बारंबार अधिक मात्रामें विशेष आहारकी भी व्यवस्था करूँगा
Vaiśampāyana said: “Moreover, I shall make special provision—again and again, and in great measure. Whoever has arisen from a particular kind of sustenance shall attain that very sustenance; and I will repeatedly arrange, in increased measure, even special foods.”
Verse 243
त्रिषु लोकेषु यच्चास्ति तदिहागम्यतां स्वयम् । “तीनों लोकोंमें जो सुवर्ण या दूसरा कोई धन है, वह सब आज यहाँ स्वतः आ जाय
Vaiśampāyana said: “Whatever wealth exists in the three worlds—gold or any other treasure—let it come here of its own accord.”
Verse 253
विश्वावसुश्न ये चान्ये ते5प्युपासन्तु मे मखम् । “दिव्य अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व, किन्नर, विश्वावसु तथा जो अन्य प्रमुख गन्धर्व हैं, वे सब यहाँ आकर मेरे यज्ञकी उपासना करें
Vaiśampāyana said: “Let Viśvāvāsu and all the other eminent Gandharvas as well come and attend upon my sacrificial rite.”
Verse 346
विसर्जिता: समाप्तौ च सत्रादस्माद् व्रजामहे । धर्मशास्त्रमें देखे गये विधि-विधानसे ही हम तपस्या करेंगे। आपको हिंसारहित बुद्धि ही अधिक प्रिय है; अतः प्रभो! आप यज्ञोंमें सदा इस अहिंसाका ही प्रतिपादन करें। द्विजश्रेष्ठ! ऐसा करनेसे हम आपपर बहुत प्रसन्न होंगे। यज्ञकी समाप्ति होनेपर जब आप हमें विदा करेंगे, तब हम यहाँसे अपने घरको जायँगे
Vaiśampāyana said: “When this sacrificial session is concluded and we are formally dismissed, we shall depart from here. We will undertake our austerities strictly according to the procedures and injunctions taught in the Dharmaśāstras. Since a non-violent disposition is dearest to you, O lord, you should always uphold and teach this very principle of ahiṃsā in sacrifices. O best of twice-born, by doing so we shall be greatly pleased with you. When, at the end of the rite, you grant us leave, then we shall go from here to our own homes.”
Verse 363
निकामवर्षी पर्जन्यो बभूव जनमेजय । जनमेजय! जब ऋषि लोग ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महा तेजस्वी देवराज इन्द्रने महर्षिका तपोबल देखकर पानी बरसाना आरम्भ किया। जबतक उस यज्ञकी समाप्ति नहीं हुई, तबतक अमितपराक्रमी इन्द्रने वहाँ इच्छानुसार वर्षा की
Vaiśampāyana said: “O Janamejaya, the rains became abundant and timely. Just as the sages were speaking in this manner, the radiant king of the gods, Indra, perceiving the power of the great seers’ austerities, began to send down rain. Until that sacrifice was brought to completion, Indra of immeasurable might caused rain to fall there according to his will.”
How to rank religious merit: whether a procedurally perfect, large-scale royal sacrifice is inherently superior to a small but costly gift made from austere livelihood and sincere intention.
Ethical value is not reducible to magnitude; disciplined livelihood, truthfulness, and ungrudging generosity can generate merit that rivals or exceeds ceremonial grandeur.
A narrative “proof” is introduced: the uñchavṛtti brāhmaṇa’s ascent to heaven with family and Nakula’s partial golden transformation function as an evidentiary sign that dharmic merit is validated by outcomes aligned with the epic’s moral economy.