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भक्ति का जन्म-चरण: जिज्ञासा (प्रश्न) से श्रद्धा, फिर श्रद्धा से शरणागति। बालकाण्ड ‘सोपान’ में साधक को ‘कथा-प्रवेश’ का अधिकार देता है—जहाँ अहं-रहित प्रश्न (उमा) और कृपा-समाधान (शंकर) से मानस-सर में प्रथम अवगाहन होता है। यहाँ रामावतार का हेतु ‘धर्म-स्थापन’ मात्र नहीं, ‘भक्त-हित’ और ‘माया-विनय’ भी है—अर्थात् मुक्ति-सीढ़ी की पहली पायदान: मोह-नाश और राम-स्वरूप-परिचय।
अत्र खण्ड-स्थले रसस्य प्रधान-प्रवाहः ‘शान्ताद्भुत’ इति, यस्मिन् ‘करुणा’ सूक्ष्म-धारा प्रवहति। उमायाः मोह-निवारणम् (“मिटा मोह”) साधकस्य आन्तरिक-अन्धकार-ह्रासस्य सूचनम्—कथा-श्रवणमेव साधना भवति। शङ्करः अत्र गुरु-स्वरूपः; स रामं ‘ब्रह्म चिन्मयम् अविनाशि’ इति निगदन् निर्गुण-सत्यं स्थापयति, ततः तस्यैव ब्रह्मणः ‘नर-तनु’ धारणं—सगुण-लीला—भक्त-हिताय धर्म-रक्षणाय च व्याचष्टे। अनन्तरं जय-विजय-प्रसङ्गः, जलन्धर-रावण-सम्बन्धः, नारद-प्रसङ्गश्च इत्यादयः पौराणिक-ग्रन्थयः अवतार-हेतुं बहु-स्तरीकुर्वन्ति—कर्म-फलम्, शाप-वरौ, लीला-न्यायश्च। एवं बालकाण्डस्यायं भागः ‘कथा-प्रमाणम्’ (वेद-पुराण-सम्मतम्) तथा ‘भक्ति-प्रमाणम्’ (नाम-गुण-श्रवणेन भव-तरणम्) उभयं युगपत् प्रतिष्ठापयति—मानस-तत्त्व-शास्त्रे प्रवेश-द्वारम्।
Verse 258 (दोहा/सोरठा)
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु। जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।121।।
asura māri thāpahiṁ suranha rākha-hiṁ nija śruti setu | jaga bistārahiṁ bisada jasa rāma janma kara hetu ||121||
राक्षसान् निहत्य देवतान् पुनः प्रतिष्ठापयति, वेदस्य मर्यादां धर्मसेतुं च परिरक्षति॥ जगति विमलं यशः प्रसारयति— एष एव रामावतारस्य परमः प्रयोजनः॥
Verse 259 (चौपाई)
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं।। राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका।। जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी।। द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ।। बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई।। कनककसिपु अरु हाटक लोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन।। बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता।। होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा।।
soi jasa gāi bhagata bhava tarahīṁ | kṛpāsiṁdhu jana-hita tanu dharahīṁ || rāma janama ke hetu anekā | parama bicitra eka tēṁ ekā || janama eka dui kahuṁ bakhānī | sāvadhāna sunu sumati bhavānī || dvārapāla hari ke priya doū | jaya aru vijaya jāna saba koū || bipra śrāpa tēṁ dūnau bhāī | tāmasa asura deha tinh pāī || kanakakasipu aru hāṭaka-locana | jagata bidita surapati mada mocana || vijayī samara bīra bikhyātā | dhari barāha bapu eka nipātā || hoi narahari dūsara puni mārā | jana prahalāda sujasa bistārā ||
तदेव यशः गायन्तो भक्ता भवसागरं तरन्ति, कृपासिन्धुर्जनहिताय शरीरं धरति। रामजन्मनः कारणानि बहूनि, परमविचित्राणि एकमपरस्मात्श्रेष्ठतराणि। एकं द्वे वा जन्म कथयामि, सावधानं मनसा शृणु सुमते भवानि। हरेः द्वावप्यासन्नितरौ द्वारपालकौ, जयविजयौ सर्वैर्विदितौ। ब्राह्मणशापात्तौ भ्रातरौ तामसासुरशरीरे प्राप्तवन्तौ। कनककशिपुर्हाटकलोचनश्च जगति प्रसिद्धौ, सुरपतेः मदं मोचयितुम्। विजयी समरे वीरः प्रख्यातः, वराहवपुर्धृत्वा एकं निपातितवान्। नृसिंहो भूत्वा द्वितीयं हतवान्, प्रह्लादस्य सुयशः प्रसारितवान्।
Verse 260 (दोहा/सोरठा)
भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान। कुंभकरन रावण सुभट सुर बिजई जग जान।।122 ।
bhae nisācara jāi tei mahābīra balavāna | kumbhakarana rāvaṇa subhaṭa sura-bijayī jaga jāna ||122||
ते निशाचरराक्षसाः प्रस्थितमात्रा एव महाबलपराक्रमाः। कुम्भकर्णो दशग्रीवो रावणश्च महाबलः॥ धीराः शूराश्च विक्रान्ताः, जगति विख्यातदेवजितः॥
Verse 261 (चौपाई)
मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।। एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी।। कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता।। एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित्र पवित्र किए संसारा।। एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे।। संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा।। परम सती असुराधिप नारी। तेहि बल ताहि न जितहिं पुरारी।।
mukuta na bhae hate bhagavānā | tīni janama dvija bacana pravānā || eka bāra tinha ke hita lāgī | dhareu sarīra bhagata anurāgī || kaśyapa aditi tahā̃ pitu mātā | dasaratha kausalya bikhyātā || eka kalapa ehi bidhi avatārā | caritra pavitra kie saṃsārā || eka kalapa sur dekhi dukhāre | samara jalaṃdhara sana saba hāre || saṃbhu kīnha saṅgrāma apārā | danuja mahābala marai na mārā || parama satī asurādhipa nārī | tehi bala tāhi na jitahiṃ purārī ||
भगवता हतेऽपि मुक्तौ न प्राप्ते, द्विजवचनं त्रिषु जन्मसु प्रमाणमासीत्। एकवारं तयोर्हिताय भक्तानुरागी शरीरमाश्रितवान्। कश्यपोऽदितिश्च तत्र पितामातरौ, दशरथः कौसल्या च विख्यातौ। एकस्मिन्कल्पे एवमवतीर्णः, पवित्रचरित्रैः संसारं पवित्रमकरोत्। अन्यस्मिन्कल्पे सुराः दुःखिताः दृष्ट्वा, जलन्धरेण सह समरे सर्वे पराजिताः। शम्भुः अपारं संग्राममकरोत्, परन्तु महाबलो दानवो हतोऽपि न म्रियते। परमसती तस्यासुराधिपस्य पत्नी, तस्याः पतिव्रताबलेन पुरारिरपि न जेतुं शक्नोति।
Verse 262 (दोहा/सोरठा)
छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।। जब तेहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह।।123।।
chala kari ṭāreu tāsu brata prabhu sura kāraja kīnhā || jaba tehi jāneu marama taba śrāpa kopa kari dīnhā ||123||
भगवान् ससंकल्पकौशलेन तस्य नरस्य व्रतम् अवरोधयामास, देवतानां नियोजितं कार्यं च समापयामास। स तु यदा हृदयगतं कारणं बुबोध, तदा क्रुद्धः शापं व्याजहार।
Verse 263 (चौपाई)
तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना।। तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ।। एक जनम कर कारन एहा। जेहि लागि राम धरी नरदेहा।। प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी।। नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा।। गिरिजा चकित भई सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानि।। कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा।। यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी।।
tāsu śrāpa hari dīnha pramānā. kautuka-nidhi kṛpāla bhagavānā.. tahā̃ jalaṃdhara rāvaṇa bhayū. rana hati rāma parama pada dayū.. eka janama kara kārana ehā. jehi lāgi rāma dharī nara-dehā.. prati avatāra kathā prabhu kerī. sunu muni baranī kabi-nha ghanerī.. nārada śrāpa dīnha eka bārā. kalapa eka tehi lagi avatārā.. girijā cakita bhaī suni bānī. nārada biṣṇu-bhagata puni gyānī.. kārana kavan śrāpa muni dīnhā. kā aparādha ramā-pati kīnhā.. yaha prasaṅga mohi kahahu purārī. muni mana moha ācaraja bhārī..
तस्याः शापं हरिः प्रमाणमस्वीकरोत्, कौतुकनिधिः कृपालुर्भगवान्। तत्र जलन्धरो रावणो जातः, रणे हतः रामेण परमपदं प्राप्तवान्। एकजन्मनः कारणमिदम्, यस्मात्कारणात्प्रभुर्नरदेहमाश्रितवान्। प्रत्यवतारे प्रभुकथा मुनिभिः कविभिश्च बहुधा वर्णिता, शृणु। नारदेन एकवारं शापो दत्तः, एकः कल्पस्तावदवतारस्य कारणमभवत्। गिरिजा वचनं श्रुत्वा चकिता जाता, नारदो विष्णुभक्तो ज्ञानी च। किं कारणेन मुनिना शापो दत्तः, किमपराधं रमापतिना कृतम्। इमं प्रसङ्गं मे कथय पुरारे, मुनेर्मनसि मोहोऽचर्यं भारि।
Verse 264 (दोहा/सोरठा)
बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ। जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।124(क)।। कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु। भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद।।124(ख)।।
bole bihasi mahesa taba gyānī mūṛha na koi | jehi jasa raghupati karahiṃ jaba so tasa tehi chana hoi ||124(ka)|| kahauṃ rāma guna gātha bharadvāja sādara sunahu | bhava-bhañjana raghunātha bhaju tulasī taji māna mada ||124(kha)||
अथ महेशः मृदुहासेनोवाच—न कश्चित् नितरां पण्डितः, न कश्चित् नितरां मूढः। यथा हि रघुपतिः प्राणीं निर्माति, तथैव स तत्क्षणादेव भवति॥ अधुना रामगुणकथां प्रवक्ष्यामि—भरद्वाज, श्रद्धया सावधानः शृणु। भवबन्धच्छेदकं रघुनाथं भज; त्वं च, तुलसी, मानमदं अहङ्कारमत्ततां च परित्यज।
Verse 265 (चौपाई)
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि।। आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा।। निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा।। सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी।। मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना।। सहित सहाय जाहु मम हेतू। चकेउ हरषि हियँ जलचरकेतू।। सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा।। जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं।।
himagiri guhā eka ati pāvani | baha samīpa surasarī suhāvani || āśrama parama punīta suhāvā | dekhi devar̥ṣi mana ati bhāvā || nirakhi saila sari bipina bibhāgā | bhayu ramāpati pada anurāgā || sumirata harihi śrāpa gati bādhī | sahaja bimala mana lāgi samādhī || muni gati dekhi sureśa ḍerānā | kāmahi boli kīnha sanamānā || sahita sahāya jāhu mama hetū | cakeu haraṣi hiyaṁ jalacaraketū || sunāsīra mana mahuṁ asi trāsā | cahata devar̥ṣi mama pura bāsā || je kāmī lolupa jaga māhīṁ | kuṭila kāka iva sabahi ḍerāhīṁ ||
हिमगिरौ गुहाऽसीत्परमपावनी, समीपे सुरसरी सुन्दरी वहति स्म। आश्रमः परमपुनीतः सुन्दरः, देवर्षेर्मनस्यतीव प्रीतिर्जाता। शैलं सरितं विपिनविभागांश्च निरीक्ष्य, रमापतिपादयोरनुरागो जातः। हरिं स्मरतः शापगतिर्बाधिता, सहजविमले मनि समाधिरासीत्। मुनेर्गतिं दृष्ट्वा सुरेन्द्रो भीतः, काममाहूय सम्मानमकरोत्। सहायैः सह मम हेतोर्गच्छ, जलचरकेतुर्हर्षेण चकितो जातः। सुनासीरस्य मनस्येवं भयमासीत्, देवर्षिर्मम पुरे वासं काङ्क्षति। ये जगति कामिनो लोलुपाः, कुटिलकाका इव सर्वान्भयभीतान्कुर्वन्ति।
Verse 266 (दोहा/सोरठा)
सुख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज। छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज।।125।।
sukha hāṛa lai bhāga saṭha svāna nirakhi mṛgarāja | chīni lei jani jāna jaṛa timi surapatihi na lāja ||125||
कृपणः श्वा अल्पास्थिसन्तुष्टः सिंहं दृष्ट्वा पलायते। हे जड, मा मन्यथाः—सिंहः तद् अपहर्तुं प्रवर्तिष्यते; एवं देवेशोऽपि तादृशेषु क्षुद्रेषु वस्तुषु स्पर्धां कर्तुं न लज्जते, न च तस्यावश्यकता।
Verse 267 (चौपाई)
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ।। कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहि भृंगा।। चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी।। रंभादिक सुरनारि नबीना । सकल असमसर कला प्रबीना।। करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हि पानि पतंगा।। देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना।। काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी।। सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासु। बड़ रखवार रमापति जासू।।
tehi āśramahiṁ madana jaba gayaū | nija māyāṁ basanta niramayaū || kusumita bibidha biṭapa bahuraṅgā | kūjahiṁ kokila guṁjahi bhṛṅgā || calī suhāvani tribidha bayārī | kāma kṛsānu baṛhāvanihārī || raṁbhādika suranāri nabīnā | sakala asamasara kalā prabīnā || karahiṁ gāna bahu tāna taraṅgā | bahubidhi krīṛahi pāni pataṅgā || dekhi sahāya madana haraṣānā | kīnhesi puni prapaṁca bidhi nānā || kāma kalā kachu munihi na byāpī | nija bhayaṁ ḍareu manobhava pāpī || sīma ki cāṁpi sakai kou tāsu | baṛa rakhavāra ramāpati jāsu ||
तस्मिन्नाश्रमे मदनो यदा गतः, स्वमायया बसन्तमनघं निर्मितवान्। कुसुमिताः विविधाः वृक्षाः बहुरङ्गाः, कोकिलाः कूजन्ति भृङ्गाः गुञ्जन्ति। सुहावनी त्रिविधा वायुर्वहति, कामकृशानोर्वर्धयित्री। रम्भाद्याः सुरनार्यो नवीनाः, सकलासमसरकलाप्रवीणाः। बहूनि तानतरङ्गानि गायन्ति, बहुविधं पानिपतङ्गैः क्रीडन्ति। सहायान्दृष्ट्वा मदनो हर्षितः, पुनः बहूनि प्रपञ्चान्कृतवान्। कामकला मुनिं न व्याप्तवती, स्वभयेन मनोभवः पापी भीतः। सीमां को चापयितुं शक्नोति, यस्य रमापतिः रक्षकः।
Verse 268 (दोहा/सोरठा)
सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन। गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन।।126।।
sahita sahāya sabhīta ati māni hāri mana maina | gahesi jāi muni carana taba kahi suṭhi ārata baina ||126||
स सखिभिः परिचरैश्च सह महाभीतः, कामविक्षोभेन हृदि स्वात्मानं पराजितमिव मन्यमानः, गत्वा मुनेः पादौ जग्राह; ततः यथोचितैः परं पीडितैः वचोभिः उवाच।
Verse 269 (चौपाई)
भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा।। नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई।। मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी।। सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा।। तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं।। मार चरित संकरहिं सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए।। बार बार बिनवउँ मुनि तोहीं। जिमि यह कथा सुनायहु मोहीं।। तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएडु तबहूँ।।
bhayu na nārada mana kachu roṣā | kahi priya bacana kāma paritoṣā || nāi carana siru āyasu pāī | gayu madana taba sahita sahāī || muni susīlatā āpani karanī | surapati sabhā̃ jāi saba baranī || suni saba keṁ mana acaraju āvā | munihi prasaṁsi harihi siru nāvā || taba nārada gavane siva pāhī̃ | jitā kāma ahamiti mana māhī̃ || māra carita saṅkarahi sunāe | atipriya jāni mahesa sikhāe || bāra bāra binavaũ muni tohī̃ | jimi yaha kathā sunāyahu mohī̃ || timi jani harihi sunāvahu kabahū̃ | calehũ prasaṅga durāeḍu tabahū̃ ||
नारदस्य मनसि कोपो न जातः, प्रियवचनानि कथयित्वा कामं तोषितवान्। चरणयोः शिरसा नमित्वा आज्ञां प्राप्य, मदनः सहायेन सह गतः। मुनेः सुशीलतां स्वकरणीयं च, सुरपतिसभायां गत्वा सर्वं वर्णितवान्। श्रुत्वा सर्वेषां मनस्यचर्यमासीत्, मुनिं प्रशंस्य हरिं शिरसा नमन्ति। ततो नारदः शिवं प्रति गतः, मनसि अहं कामं जितवानिति मत्वा। मदनचरितानि शङ्कराय कथितवान्, अतिप्रियं ज्ञात्वा महेशः उपदिशति। बारं बारं त्वां मुने प्रार्थये, यथा मया इयं कथा कथिता। तथा हरये कदापि मा कथय, प्रसङ्गं गोपयित्वा नारदः पुनरपि ततः प्रस्थितः।
Verse 270 (दोहा/सोरठा)
संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान। भारद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान।।127।।
Śambhu dīnha upadesa hita nahiṁ Nārada-hi sohāna. Bhāradvāja kautuka sunahu Hari icchā balavāna. ||127||
शम्भुना यद्यपि सर्वथा हितायोपदिष्टं, तथापि नारदस्य न रोचत। हे भारद्वाज, एतदद्भुतं विपर्यासं शृणु—प्रभोः संकल्पः खलु महाबलवान्।
Verse 271 (चौपाई)
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई।। संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए।। एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना।। छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा।। हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता।। बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया।। काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे।। अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया।।
rāma kīnha cāhahĩ soi hoī | karai anyathā asa nahĩ koī || śambhu bacana muni mana nahĩ bhāe | taba birañci ke loka sidhāe || eka bāra karatala bara bīnā | gāvata hari guna gāna prabīnā || chīrasindhu gavane munināthā | jahã basa śrīnivāsa śrutimāthā || haraṣi mile uṭhi ramāniketā | baiṭhe āsana riṣihi sametā || bole bihasi carācara rāyā | bahute dinana kīnha muni dāyā || kāma carita nārada saba bhāṣe | jadyapi prathama baraji sivam̐ rākhē || ati pracaṇḍa raghupati kai māyā | jehi na moha asa ko jaga jāyā ||
रामेच्छितं तत्तथैव भवति, अन्यथा कर्तुं न कश्चिदस्ति शक्तः। शम्भोर्वचनानि मुनेर्न रुचिरा बभूवुः, अतो ब्रह्मलोकं प्रतस्थे। स कदाचित्करतले वीणां विभ्रत्, हरिगुणगाने प्रवीणः, क्षीरसिन्धुमभ्यगच्छद्यत्र श्रीनिवासो वसति श्रुतिमौलिः। रमानिकेतः प्रहर्षमुत्थाय मिलत्, ऋषिं सहितं आसने उपवेशयामास। विहस्य चराचरपतिर्व्याजहार - बहूनि दिनानि मुनेरनुग्रहः कृतः। ततो नारदः कामचरितं सर्वमकथयत्, यद्यपि प्रथमं शिवेन निवारितः। अतीव प्रचण्डा रघुपतेः माया, यया न मोहात् कश्चिज्जगति मुक्तः।
Verse 272 (दोहा/सोरठा)
रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान । तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान।।128।।
rūkh badana kari bacana mṛdu bole śrī-bhagavāna | tumhare sumirana tē miṭahiṃ moha māra mada māna ||128||
कठोरं मुखमालम्ब्य भगवान् मधुराक्षरैः। उवाच—त्वत्स्मरणेन मोहः प्रणश्यति, सह दर्पेण मदेन चात्माभिमानेन च॥
Verse 273 (चौपाई)
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाके।। ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा।। नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना।। करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी।। बेगि सो मै डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी।। मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मै सोई।। तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई।। श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी।।
sunu muni moha hoi mana tākeṁ | gyāna birāga hṛdaya nahiṁ jākeṁ || brahmacaraja brata rata mati-dhīrā | tumhahi ki karai manobhava pīrā || nārada kaheu sahita abhimānā | kṛpā tumhāri sakala bhagavānā || karuṇānidhi mana dīkha bicārī | ura aṅkureu garaba taru bhārī || begi so mai ḍārihauṁ ukhārī | pana hamāra sevaka hitakārī || muni kara hita mama kautuka hoī | avasi upāya karabi mai soī || taba nārada hari pada sira nāī | cale hṛdayaṁ ahamiti adhikāī || śrīpati nija māyā taba prerī | sunahu kaṭhina karanī tehi केरī ||
शृणु मुने, मोहः तस्य मनसि भवति यस्य हृदये ज्ञानवैराग्ये न तिष्ठतः। ब्रह्मचर्यव्रतरतः स्थिरबुद्धिः, त्वां कथं मनोभवपीडा स्पृशेत्? नारद उवाच अभिमानेन सहितः - तव कृपा सर्वभगवन् सर्वत्र। करुणानिधिः मनसि विचार्य, हृदये गर्वस्य भारीवृक्ष अङ्कुरितः। शीघ्रमेव तमुन्मूल्य पातयिष्यामि, मम व्रतं तु सेवकहितकारि। मुनेर्हिताय मम कौतूहलमिदम्, अवश्यमेवोपायं करिष्यामि। ततो नारदः हरिपादौ शिरसा नमत्वा चचाल, हृदये अहमित्यधिकारः। श्रीपतिः स्वमायां प्रावर्तयत्, शृणु तस्याः करणीयं कठिनम्।
Verse 274 (दोहा/सोरठा)
बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार। श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार।।129।।
biraceu maga mahũ nagara tehĩ sata jojana bistāra | śrīnivāsapura tẽ adhika racanā bibidha prakāra ||129||
मार्गे स नगरं स्थापयामास शतयोजनविस्तृतम्। नानारचनया नानाविन्यासैश्च तद् नगरं श्रीनिवासपुरमपि अतिशशास॥
Verse 275 (चौपाई)
बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी।। तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा।। सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा।। बिस्वमोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी।। सोइ हरिमाया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी।। करइ स्वयंबर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला।। मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ।। सुनि सब चरित भूपगृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए।।
basahiṁ nagara sundara nara nārī | janu bahu manasija rati tanu-dhārī || tēhiṁ pura basai sīla-nidhi rājā | aganita haya gaya sēna samājā || sata surēsa sama bibhava bilāsā | rūpa tēja bala nīti nivāsā || biswa-mōhinī tāsu kumārī | śrī bimōha jisu rūpu nihārī || soi hari-māyā saba guna khānī | sōbhā tāsu ki jāi bakhānī || karai svayaṁbara sō nṛpa-bālā | āē tahaṁ aganita mahi-pālā || muni kautukī nagara tēhiṁ gayau | pura-bāsinha saba pūchata bhayau || suni saba carita bhūpa-gṛhaṁ āē | kari pūjā nṛpa muni baiṭhāē ||
तस्मिन्नगरे सुन्दरा नरनार्यः वसन्ति, इव बहवः मन्मथाः रतिश्च शरीरधारिणः। तस्मिन्पुरे शीलनिधिः कश्चिद्राजा वसति, अगणिताश्वगजसेनासमाजः। शत्राजित्समो विभवविलासः, रूपतेजोबलनीतिनिवासः। तस्य कुमारी विश्वमोहिनी, यस्याः रूपं दृष्ट्वा श्रीरपि मोहिता भवेत्। सा हरिमायेव सर्वगुणखानिः, तस्याः शोभा कथं वर्णयेत्? सा नृपकन्या स्वयंवरमकरोत्, तत्रागणिता महीपाला आगताः। मुनिः कौतूहलवान् तां नगरीमगच्छत्, पुरवासिनः सर्वे पृच्छन्ति स्म। सर्वं चरितं श्रुत्वा भूपगृहमागताः, पूजां कृत्वा नृपः मुनिमुपवेशयामास।
Verse 276 (दोहा/सोरठा)
आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि। कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि।।130।।
āni dekhāī nāradahi bhūpati rājakumāri | kahahu nātha guna doṣa saba ehi ke hṛdayã bicāri ||130||
कन्यां नीत्वा नारदं मुनिम् दर्शयित्वा नृपोऽब्रवीत्— “भगवन् गुरो, हृदि सम्यक् विचिन्त्य अस्याः सर्वान् गुणदोषान् मम निवेदय।”
Verse 277 (चौपाई)
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी।। लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने।। जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई।। सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही।। लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे।। सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं।। करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी।। जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला।।
dekhi rūpa muni birati bisārī | baṛī bāra lagi rahe nihārī || lacchana tāsu biloki bhulāne | hṛdayaṁ haraṣa nahiṁ pragaṭa bakhāne || jo ehi barai amara soi hoī | samarabhūmi tehi jīta na koī || sevahiṁ sakala carācara tāhī | barai sīlanidhi kanyā jāhī || lacchana saba bicāri ura rākhe | kacchuka banāi bhūpa sana bhāṣe || sutā sulacchana kahi nṛpa pāhīṁ | nārada cale soca mana māhīṁ || karauṁ jāi soi jatana bicārī | jehi prakāra mohi barai kumārī || japa tapa kacchu na hoi tehi kālā | he bidhi milai kavan bidhi bālā ||
तस्याः रूपं दृष्ट्वा मुनिर्वैराग्यमवार्त, बहुकालं यावत् तस्थौ निरीक्षमाणः। तस्याः लक्षणानि विलोक्य मोहितः, हृदये हर्षः न प्रकटमुक्तः। यः एतां वरयति स अमरः सन् प्रसिध्यति, रणभूमौ तं जेतुं न कश्चिदस्ति। सर्वं चराचरं तं सेवते, यं कन्या शीलनिधिः वृणोति। सर्वाणि लक्षणानि विचार्य हृदये निधाय, किञ्चित् संयम्य नृपमभ्यभाषत। पुत्रा सुलक्षणा इति नृपं कथयित्वा नारदः चचाल, मनसि चिन्तयन्। येन प्रकारेण कुमारी मां वृणोति, तमुपायं चिन्तयित्वा गन्तव्यम्। तस्मिन्काले जपस्तपश्च न प्रभवतः, हे विधे, केन उपायेन बाला प्राप्यते?
इस खंड का भक्ति-सार ‘श्रवण-भक्ति’ और ‘गुरु-कृपा’ की अनिवार्यता है: उमा का अहं-रहित प्रश्न साधक की पात्रता बनता है, और शंकर की कृपालु वाणी संशय-निवारण कर ‘श्रद्धा’ को जन्म देती है। शिक्षा यह कि राम केवल ‘धर्म-स्थापन’ के लिए नहीं, ‘भक्त-हित’ और ‘माया-विनय’ के लिए भी अवतरित होते हैं—अर्थात् ईश्वर की लीला जीव के कल्याण-केंद्रित है। निर्गुण-ब्रह्म और सगुण-राम का समन्वय बताता है कि भक्ति तत्त्व-विरोध नहीं, तत्त्व-परिपूर्णता है: नाम-गुण-श्रवण से चित्त शीतल होता है, मोह-ताप मिटता है, और शरणागति सहज बनती है। पौराणिक कड़ियाँ (श्राप-वर/कर्म-फल) यह दृढ़ करती हैं कि ईश्वरीय न्याय करुणा से रहित नहीं—लीला-न्याय के भीतर भक्त-रक्षा का आश्वासन छिपा है।
इस खंड-स्थल में रस का प्रधान प्रवाह ‘शान्त’ और ‘अद्भुत’ है, जिसके भीतर ‘करुण’ की सूक्ष्म धारा चलती है। उमा का मोह-निवारण ("मिटा मोह") साधक के आन्तरिक अन्धकार-ह्रास का संकेत है—कथा सुनना स्वयं साधना बनता है। शंकर यहाँ गुरु-स्वरूप हैं: वे राम को ‘ब्रह्म चिन्मय अविनासी’ कहकर निर्गुण-सत्य की स्थापना करते हैं, फिर उसी ब्रह्म का ‘नरतनु’ धारण करना—सगुण-लीला—भक्त-हित और धर्म-रक्षा हेतु बताते हैं। आगे जय-विजय, जलंधर-रावण, नारद-प्रसंग जैसी पौराणिक कड़ियाँ अवतार-हेतु को बहुस्तरी बनाती हैं: कर्म-फल, श्राप-वर, और लीला-न्याय। इस प्रकार बालकाण्ड का यह भाग ‘कथा-प्रमाण’ (वेद-पुराण-सम्मत) और ‘भक्ति-प्रमाण’ (नाम-गुण-श्रवण से भव-तरण) दोनों को एक साथ स्थापित करता है—मानस की थियोलॉजी में प्रवेश-द्वार।
प्रधान रस-प्रवाह ‘शान्त’ से आरम्भ होकर ‘अद्भुत’ में उत्कर्ष पाता है, और बीच-बीच में ‘करुण’ की सूक्ष्म धारा साधक-हृदय को नम करती है। (1) जिज्ञासा-जन्य व्याकुलता: उमा का अहं-रहित प्रश्न—अज्ञान/मोह का भार, समाधान की प्रतीक्षा। (2) कृपा-प्रकाश: शंकर की वाणी ‘ससि-कर’ (चन्द्र-किरण) समान—श्रवण से मोह-ताप का शमन; शान्त रस स्थिर होता है। (3) तत्त्व-विस्मय: ‘ब्रह्म चिन्मय अविनासी’ की स्थापना से अद्भुत—निर्गुण सत्य का बोध। (4) लीला-आश्चर्य: वही ब्रह्म ‘नरतनु’ धारण करता है—सगुण-लीला का रहस्य; अद्भुत रस और गाढ़ा। (5) न्याय-करुणा का संगम: श्राप-वर, जय-विजय, जलंधर-रावण, नारद-प्रसंग जैसी कड़ियों से ‘लीला-न्याय’ का बोध—करुण रस की अंतर्धारा (जीव-बंधन, कर्म-फल) के साथ शान्ति में परिणति। (6) श्रद्धा से शरणागति: संशय-निवृत्ति के बाद कथा-प्रवेश का अधिकार—भक्ति का प्रथम सोपान दृढ़।
परंपरा अनुसार यहाँ ‘श्रवण-भक्ति’ का फल मोह-क्षय, संशय-निवृत्ति, और अवतार-तत्त्व का बोध है—विशेषतः ‘मान-मद’ का क्षय (दोहा 124(ख) की तुलसी-नीति) और ‘हरि-नाम/हरि-गुण’ में रुचि बढ़ना, जिससे भव-तरण की योग्यता बनती है।
सामान्य मानस-पारायण में ‘राम’ नाम-सम्पुट (जैसे ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’) या ‘सीता-राम’ सम्पुट प्रचलित है; इस खंड में विशेषतः ‘भव भंजन रघुनाथ’ (दोहा 124(ख)) को स्मरण-सम्पुट की तरह जोड़कर मान-त्याग/शरणागति का अभ्यास किया जाता है।
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