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भक्ति का जन्म-चरण: जिज्ञासा (प्रश्न) से श्रद्धा, फिर श्रद्धा से शरणागति। बालकाण्ड ‘सोपान’ में साधक को ‘कथा-प्रवेश’ का अधिकार देता है—जहाँ अहं-रहित प्रश्न (उमा) और कृपा-समाधान (शंकर) से मानस-सर में प्रथम अवगाहन होता है। यहाँ रामावतार का हेतु ‘धर्म-स्थापन’ मात्र नहीं, ‘भक्त-हित’ और ‘माया-विनय’ भी है—अर्थात् मुक्ति-सीढ़ी की पहली पायदान: मोह-नाश और राम-स्वरूप-परिचय।
ଏହି ଖଣ୍ଡ-ସ୍ଥଳରେ ରସର ପ୍ରଧାନ ପ୍ରବାହ ‘ଶାନ୍ତ’ ଓ ‘ଅଦ୍ଭୁତ’, ଯାହାର ଭିତରେ ‘କରୁଣ’ର ସୂକ୍ଷ୍ମ ଧାରା ଚାଲିଥାଏ। ଉମାଙ୍କ ମୋହ-ନିବାରଣ (“ମିଟା ମୋହ”) ସାଧକର ଆନ୍ତରିକ ଅନ୍ଧକାର-ହ୍ରାସର ସଙ୍କେତ—କଥା ଶୁଣିବା ନିଜେ ସାଧନା ହୋଇଯାଏ। ଶଙ୍କର ଏଠାରେ ଗୁରୁ-ସ୍ୱରୂପ: ସେ ରାମଙ୍କୁ ‘ବ୍ରହ୍ମ ଚିନ୍ମୟ ଅବିନାଶୀ’ କହି ନିର୍ଗୁଣ-ସତ୍ୟ ସ୍ଥାପନ କରନ୍ତି, ପୁଣି ସେଇ ବ୍ରହ୍ମର ‘ନରତନୁ’ ଧାରଣ—ସଗୁଣ-ଲୀଳା—ଭକ୍ତ-ହିତ ଓ ଧର୍ମ-ରକ୍ଷା ପାଇଁ ବୋଲି କହନ୍ତି। ଆଗକୁ ଜୟ-ବିଜୟ, ଜଲନ୍ଧର-ରାବଣ, ନାରଦ-ପ୍ରସଙ୍ଗ ପରି ପୌରାଣିକ କଡ଼ିଗୁଡ଼ିକ ଅବତାର-ହେତୁକୁ ବହୁସ୍ତରୀ କରେ: କର୍ମ-ଫଳ, ଶାପ-ବର, ଓ ଲୀଳା-ନ୍ୟାୟ। ଏଭଳି ବାଳକାଣ୍ଡର ଏହି ଭାଗ ‘କଥା-ପ୍ରମାଣ’ (ବେଦ-ପୁରାଣ-ସମ୍ମତ) ଓ ‘ଭକ୍ତି-ପ୍ରମାଣ’ (ନାମ-ଗୁଣ-ଶ୍ରବଣରେ ଭବ-ତରଣ) ଦୁହିଁକୁ ଏକାସାଥି ସ୍ଥାପନ କରେ—ମାନସର ଥିଓଲୋଜିର ପ୍ରବେଶ-ଦ୍ୱାର।
ଚୌପାଈ 120.1-4
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी।मिटा मोह सरदातप भारी।।
तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ।राम स्वरुप जानि मोहि परेऊ।।
नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा।सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा।।
अब मोहि आपनि किंकरि जानी।जदपि सहज जड नारि अयानी।।
प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू।जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू।।
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी।सर्ब रहित सब उर पुर बासी।।
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू।मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू।।
उमा बचन सुनि परम बिनीता।रामकथा पर प्रीति पुनीता।।
sasi-kara-sama suni girā tumhārī |miṭā moha sarad-ātapa bhārī ||
tumha kṛpāla sabu saṃsau hareū |rāma-svarūpa jāni mohi pareū ||
nātha kṛpā̃ aba gayau biṣādā |sukhī bhayauṁ prabhu carana prasādā ||
aba mohi āpani kiṃkarī jānī |jadapi sahaja jaḍa nāri ayānī ||
prathama jo maiṁ pūchā soi kahahū |jauṁ mo-para prasanna prabhu ahahū ||
rāma brahma cinamaya abināsī |sarba-rahita saba ura pura bāsī ||
nātha dhareu nara-tanu kehi hetū |mohi samujhāi kahahu bṛṣaketū ||
umā bacana suni parama binītā |rāma-kathā para prīti punītā ||
ହେ ପାର୍ବତୀ, ତୁମ୍ଭର ବାଣୀ ଚନ୍ଦ୍ରକିରଣ ସମାନ ଶୀତଳ ଶୁଣି, ମୋର ହୃଦୟର ଭାରୀ ମୋହ ଦୂର ହେଲା, ଯେପରି ଶରତର ତୀବ୍ର ଉତ୍ତାପ ଦୂର ହୁଏ। ହେ କୃପାଳୁ, ତୁମ୍ଭେ ମୋର ସମସ୍ତ ସନ୍ଦେହ ଦୂର କରିଛ; ରାମଙ୍କର ସ୍ୱରୂପ ଜାଣି ମୁଁ ତାହାଙ୍କ ଚରଣରେ ପଡ଼ିଛି। ହେ ନାଥ, ତୁମ୍ଭର କୃପାରୁ ମୋର ବିଷାଦ ଦୂର ହେଲା; ପ୍ରଭୁଙ୍କ ଚରଣର କୃପାରୁ ମୁଁ ସୁଖୀ ହେଲି। ଏବେ ମୋତୁ ତୁମ୍ଭର ନିଜର ଦାସୀ ବୋଲି ଜାଣ, ଯଦିଓ ମୁଁ ସ୍ୱାଭାବିକ ଭାବରେ ଜଡ଼, ସରଳ ଓ ଅଜ୍ଞାନ ନାରୀ। ପ୍ରଥମେ ମୁଁ ଯାହା ପଚାରିଥିଲି, ତାହା କୁହ ଯଦି ପ୍ରଭୁ ମୋ ପ୍ରତି ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ଅଛନ୍ତି। ରାମ ବ୍ରହ୍ମ, ଚିନ୍ମୟ, ଅବିନାଶୀ; ସମସ୍ତ ଗୁଣରୁ ମୁକ୍ତ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ହୃଦୟରେ ବାସ କରନ୍ତି। ହେ ନାଥ, ପ୍ରଭୁ କାହିଁକି ମନୁଷ୍ୟ ଶରୀର ଧାରଣ କଲେ? ହେ ବୃଷକେତୁ, ମୋତୁ ବୁଝାଇ କୁହ। ଉମାଙ୍କର ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିନୟୀ ବଚନ ଶୁଣି, ରାମକଥା ପ୍ରତି ତାଙ୍କର ପବିତ୍ର ପ୍ରେମ ଆହୁରି ଦୃଢ଼ ହେଲା।
ଦୋହା 120(क), ସୋରଠା 120(ख)-(घ)
हिंयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान।बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान।।120(क)।।
सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल।कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड।।120(ख)।।
सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब।सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ।।120(ग)।।
हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित।मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु।।120(घ)।।
hiṁyaṁ haraṣe kāmāri taba śaṅkara sahaja sujāna |bahu bidhi umahi prasaṁsi puni bole kṛpānidhāna ||120(ka)||
sunu subha kathā bhavāni rāmacaritamānasa bimala |kahā bhusuṇḍi bakhāni sunā bihaga-nāyaka garuḍa ||120(kha)||
so saṁbāda udāra jehi bidhi bhā āgẽ kahaba |sunahu rāma avatāra carita parama suṁdara anagha ||120(ga)||
hari guna nāma apāra kathā rūpa aganita amita |maiṁ nija mati anusāra kahauṁ umā sādara sunahu ||120(gha)||
ତେବେ କାମଦମନ ଶିବ ହୃଦୟରେ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ, ଏବଂ ସ୍ୱଭାବତଃ ବିବେକୀ ଶଙ୍କର ଉମାଙ୍କୁ ନାନା ପ୍ରକାରେ ପ୍ରଶଂସା କରି, କରୁଣାର ଭଣ୍ଡାର ସ୍ୱରୂପ ପୁନଃ କହିଲେ— “ହେ ଭବାନୀ, ରାମଚରିତମାନସର ଶୁଭ, ନିର୍ମଳ କଥା ଶୁଣ—ଭୁଷୁଣ୍ଡି କିପରି କହିଥିଲେ ଏବଂ ପକ୍ଷୀରାଜ ଗରୁଡ଼ କିପରି ଶୁଣିଥିଲେ। ସେଇ ପବିତ୍ର ସମ୍ବାଦ ଯେପରି ଘଟିଥିଲା, ତାହା ମୁଁ ପରେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବି। ରାମାବତାରର ନିର୍ଦୋଷ, ଅତିଶୟ ସୁନ୍ଦର ଲୀଳା ଶୁଣ। ହରିଙ୍କ ଗୁଣ ଓ ନାମ ଅସୀମ; କଥା ଓ ତାହାର ରୂପ ଅନେକ, ଅପରିମେୟ। ମୋର ବୁଝାମଣା ଅନୁସାରେ ମୁଁ କହୁଛି—ହେ ଉମା, ଶ୍ରଦ୍ଧାଭାବରେ ମନ ଲଗାଇ ଶୁଣ।”
ଚୌପାଈ 121.1-4
सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए।बिपुल बिसद निगमागम गाए।।
हरि अवतार हेतु जेहि होई।इदमित्थं कहि जाइ न सोई।।
राम अर्तक्य बुद्धि मन बानी।मत हमार अस सुनहि सयानी।।
तदपि संत मुनि बेद पुराना।जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना।।
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही।समुझि परइ जस कारन मोही।।
जब जब होइ धरम कै हानी।बाढहिं असुर अधम अभिमानी।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी।सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा।हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा।।
sunu girijā haricarita suhāe |bipula bisada nigamāgama gāe ||
hari avatāra hetu jehi hoī |idam-itthaṃ kahi jāi na soī ||
rāma a-tarakya buddhi mana bānī |mata hamāra asa sunahi sayānī ||
tadapi santa muni beda purānā |jasa kachu kahahiṃ sva-mati anumānā ||
tasa maiṃ sumukhi sunāvuṁ tohī |samujhi parai jasu kārana mohī ||
jaba-jaba hoi dharama kai hānī |bāḍhahiṃ asura adhama abhimānī ||
karahiṃ anīti jāi nahiṃ baranī |sīdahiṃ bipra dhenu sura dharanī ||
taba-taba prabhu dhari bibidha sarīrā |harahiṃ kṛpānidhi sajjana pīrā ||
ହେ ଗିରିଜା, ଶୁଣ: ହରିଙ୍କର ଚରିତ୍ର ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୁନ୍ଦର, ବିପୁଳ ଓ ସ୍ପଷ୍ଟ, ବେଦ ଓ ଆଗମରେ ଗାନ କରାଯାଇଛି। ହରି ଅବତାରର କାରଣ ପୂରଣରୂପେ କହିବା ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ। ରାମ ବୁଦ୍ଧି, ମନ ଓ ବାଣୀର ପରେ; ଏହା ମୋର ମତ, ହେ ଜ୍ଞାନୀ, ଶୁଣ। ତଥାପି ସନ୍ତମୁନି, ବେଦ ଓ ପୁରାଣ ନିଜ ବୁଦ୍ଧି ଅନୁସାରେ ଯାହା ଅନୁମାନ କରନ୍ତି, ତାହା କହନ୍ତି। ତେଣୁ, ହେ ସୁମୁଖୀ, ମୁଁ ତୁମ୍ଭକୁ ଯେପରି ବୁଝିପାରୁଛି, ସେପରି ଶୁଣାଉଛି। ଯେତେବେଳେ ଯେତେବେଳେ ଧର୍ମର ହ୍ରାସ ହୁଏ ଓ ଅଧମ, ଅହଙ୍କାରୀ ଅସୁରମାନେ ବୃଦ୍ଧି ପାଆନ୍ତି, ସେମାନେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବାକୁ ଅସମ୍ଭବ ଅନୀତି କରନ୍ତି; ବ୍ରାହ୍ମଣ, ଗାଈ, ଦେବତା ଓ ପୃଥିବୀ ପୀଡ଼ିତ ହୁଅନ୍ତି। ତେବେ ତେବେ ପ୍ରଭୁ ବିଭିନ୍ନ ଶରୀର ଧାରଣ କରନ୍ତି; କୃପାନିଧି ସଜ୍ଜନଙ୍କର ପୀଡ଼ା ଦୂର କରନ୍ତି।
ଦୋହା 121
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।121।।
asura māri thāpahiṁ suranha rākha-hiṁ nija śruti setu |jaga bistārahiṁ bisada jasa rāma janma kara hetu ||121||
ରାକ୍ଷସମାନଙ୍କୁ ବଧ କରି ସେ ଦେବମାନଙ୍କୁ ପୁନଃ ସ୍ଥାପନ କରନ୍ତି, ଏବଂ ବେଦର ଧର୍ମମର୍ଯ୍ୟାଦାର ଯଥାର୍ଥ ସୀମାକୁ ସୁରକ୍ଷା କରନ୍ତି। ଜଗତରେ ନିର୍ମଳ ଯଶ ବିସ୍ତାର କରନ୍ତି—ଏହି ହେଉଛି ରାମଙ୍କ ଅବତାରର ମୂଳ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ।
ଚୌପାଈ 122.1-4
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं।कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं।।
राम जनम के हेतु अनेका।परम बिचित्र एक तें एका।।
जनम एक दुइ कहउँ बखानी।सावधान सुनु सुमति भवानी।।
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ।जय अरु बिजय जान सब कोऊ।।
बिप्र श्राप तें दूनउ भाई।तामस असुर देह तिन्ह पाई।।
कनककसिपु अरु हाटक लोचन।जगत बिदित सुरपति मद मोचन।।
बिजई समर बीर बिख्याता।धरि बराह बपु एक निपाता।।
होइ नरहरि दूसर पुनि मारा।जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा।।
soi jasa gāi bhagata bhava tarahīṁ |kṛpāsiṁdhu jana-hita tanu dharahīṁ ||
rāma janama ke hetu anekā |parama bicitra eka tēṁ ekā ||
janama eka dui kahuṁ bakhānī |sāvadhāna sunu sumati bhavānī ||
dvārapāla hari ke priya doū |jaya aru vijaya jāna saba koū ||
bipra śrāpa tēṁ dūnau bhāī |tāmasa asura deha tinh pāī ||
kanakakasipu aru hāṭaka-locana |jagata bidita surapati mada mocana ||
vijayī samara bīra bikhyātā |dhari barāha bapu eka nipātā ||
hoi narahari dūsara puni mārā |jana prahalāda sujasa bistārā ||
ସେହି ମହିମା ଗାନ କରି ଭକ୍ତମାନେ ସଂସାର ସାଗର ପାର କରନ୍ତି; କୃପାସିନ୍ଧୁ ଜନକଲ୍ୟାଣ ନିମନ୍ତେ ଶରୀର ଧାରଣ କରନ୍ତି। ରାମଙ୍କର ଜନ୍ମର କାରଣ ଅନେକ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଚମତ୍କାରୀ, ଏକା ଅପେକ୍ଷା ଅନ୍ୟ ଅଧିକ। ଗୋଟିଏ ବା ଦୁଇଟି ଜନ୍ମ ମୁଁ ବର୍ଣ୍ଣନା କରୁଛି: ହେ ସୁମତି ଭବାନୀ, ସାବଧାନରେ ଶୁଣ। ହରିଙ୍କର ଦୁଇ ପ୍ରିୟ ଦ୍ୱାରପାଳ ଥିଲେ, ଜୟ ଓ ବିଜୟ, ଯାହା ସମସ୍ତେ ଜାଣନ୍ତି। ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଶାପରୁ ଉଭୟ ଭାଇ ତାମସିକ ଅସୁର ଶରୀର ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ। ସେମାନେ ହିରଣ୍ୟକଶିପୁ ଓ ହିରଣ୍ୟାକ୍ଷ ହେଲେ, ଜଗତରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ, ଦେବରାଜଙ୍କ ଅହଙ୍କାର ଚୂର୍ଣ୍ଣ କରିବାର ଅବସର। ବିଜୟ, ଯୁଦ୍ଧରେ ବୀର ଭାବରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ, ବରାହ ରୂପ ଧାରଣ କରି ପ୍ରଭୁ ତାକୁ ବଧ କଲେ। ନୃସିଂହ ହୋଇ ଅନ୍ୟଟିକୁ ବଧ କଲେ ଓ ତାଙ୍କ ଭକ୍ତ ପ୍ରହ୍ଲାଦଙ୍କ ସୁଯଶ ବିସ୍ତାର କଲେ।
ଦୋହା 122
भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान।कुंभकरन रावण सुभट सुर बिजई जग जान।।122।।
bhae nisācara jāi tei mahābīra balavāna |kumbhakarana rāvaṇa subhaṭa sura-bijayī jaga jāna ||122||
ସେଇ ରାତିରେ ଚରୁଥିବା ରାକ୍ଷସମାନେ, ବାହାରି ପଡ଼ିବା ପରେ, ଅତି ବଳଶାଳୀ ମହାବୀର ପ୍ରମାଣିତ ହେଲେ—କୁମ୍ଭକର୍ଣ୍ଣ ଓ ରାବଣ, ପ୍ରତାପୀ ଯୋଦ୍ଧା; ଜଗତରେ ଦେବଜୟୀ ଭାବେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ।
ଚୌପାଈ 123.1-4
मुकुत न भए हते भगवाना।तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।।
एक बार तिन्ह के हित लागी।धरेउ सरीर भगत अनुरागी।।
कस्यप अदिति तहाँ पितु माता।दसरथ कौसल्या बिख्याता।।
एक कलप एहि बिधि अवतारा।चरित्र पवित्र किए संसारा।।
एक कलप सुर देखि दुखारे।समर जलंधर सन सब हारे।।
संभु कीन्ह संग्राम अपारा।दनुज महाबल मरइ न मारा।।
परम सती असुराधिप नारी।तेहि बल ताहि न जितहिं पुरारी।।
mukuta na bhae hate bhagavānā |tīni janama dvija bacana pravānā ||
eka bāra tinha ke hita lāgī |dhareu sarīra bhagata anurāgī ||
kaśyapa aditi tahā̃ pitu mātā |dasaratha kausalya bikhyātā ||
eka kalapa ehi bidhi avatārā |caritra pavitra kie saṃsārā ||
eka kalapa sur dekhi dukhāre |samara jalaṃdhara sana saba hāre ||
saṃbhu kīnha saṅgrāma apārā |danuja mahābala marai na mārā ||
parama satī asurādhipa nārī |tehi bala tāhi na jitahiṃ purārī ||
ପ୍ରଭୁ ବଧ କରିବା ପରେ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ମୁକ୍ତ ହେଲେ ନାହିଁ, କାରଣ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ବଚନ ତିନି ଜନ୍ମ ପାଇଁ ବନ୍ଧନରେ ଥିଲା। ଗୋଟିଏ ଥର ସେମାନଙ୍କ କଲ୍ୟାଣ ନିମନ୍ତେ ଭକ୍ତବତ୍ସଳ ପ୍ରଭୁ ଶରୀର ଧାରଣ କଲେ। ସେଠାରେ କଶ୍ୟପ ଓ ଅଦିତି ପିତାମାତା ଥିଲେ; ଦଶରଥ ଓ କୌଶଲ୍ୟାଙ୍କ ପୁତ୍ର ଭାବରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ହେଲେ। ଗୋଟିଏ କଳ୍ପରେ ଏପରି ଅବତାର ହେଲେ ଓ ପବିତ୍ର ଚରିତ୍ର ଦ୍ୱାରା ସଂସାରକୁ ପବିତ୍ର କଲେ। ଅନ୍ୟ ଏକ କଳ୍ପରେ ଦେବତାମାନେ ନିଜର ଦୁଃଖ ଦେଖି ଜଳନ୍ଧର ସହ ଯୁଦ୍ଧରେ ସମସ୍ତେ ପରାସ୍ତ ହେଲେ। ଶମ୍ଭୁ ଅପାର ସଂଗ୍ରାମ କଲେ, କିନ୍ତୁ ମହାବଳୀ ଦାନବ ମାରିବାରେ ମରିଲା ନାହିଁ। କାରଣ ଅସୁରରାଜଙ୍କ ପତ୍ନୀ ପରମ ସତୀ ଥିଲେ; ସେହି ପତିବ୍ରତା ଶକ୍ତିରୁ ପୁରାରୀ ତାକୁ ଜିତିପାରିଲେ ନାହିଁ।
ଦୋହା 123
छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।जब तेहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह।।123।।
chala kari ṭāreu tāsu brata prabhu sura kāraja kīnhā |jaba tehi jāneu marama taba śrāpa kopa kari dīnhā ||123||
ପ୍ରଭୁ ଏକ ସୁଚିନ୍ତିତ ଉପାୟରେ ତାହାର ଶପଥକୁ ଭଙ୍ଗ କରାଇ, ଦେବମାନଙ୍କ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ସିଦ୍ଧ କଲେ। ଯେତେବେଳେ ସେ ଅନ୍ତର୍ନିହିତ କାରଣକୁ ବୁଝିଲା, କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ଶାପ ଦେଲା।
ଚୌପାଈ 124.1-4
तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना।कौतुकनिधि कृपाल भगवाना।।
तहाँ जलंधर रावन भयऊ।रन हति राम परम पद दयऊ।।
एक जनम कर कारन एहा।जेहि लागि राम धरी नरदेहा।।
प्रति अवतार कथा प्रभु केरी।सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी।।
नारद श्राप दीन्ह एक बारा।कलप एक तेहि लगि अवतारा।।
गिरिजा चकित भई सुनि बानी।नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानि।।
कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा।का अपराध रमापति कीन्हा।।
यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी।मुनि मन मोह आचरज भारी।।
tāsu śrāpa hari dīnha pramānā.kautuka-nidhi kṛpāla bhagavānā..
tahā̃ jalaṃdhara rāvaṇa bhayū.rana hati rāma parama pada dayū..
eka janama kara kārana ehā.jehi lāgi rāma dharī nara-dehā..
prati avatāra kathā prabhu kerī.sunu muni baranī kabi-nha ghanerī..
nārada śrāpa dīnha eka bārā.kalapa eka tehi lagi avatārā..
girijā cakita bhaī suni bānī.nārada biṣṇu-bhagata puni gyānī..
kārana kavan śrāpa muni dīnhā.kā aparādha ramā-pati kīnhā..
yaha prasaṅga mohi kahahu purārī.muni mana moha ācaraja bhārī..
ହରି ସେହି ଶାପକୁ ପ୍ରମାଣ ରୂପେ ଗ୍ରହଣ କଲେ, ସେ କୌତୁକନିଧି, କୃପାଳୁ ଭଗବାନ। ସେଠାରେ ଜଳନ୍ଧର ରାବଣ ହେଲା; ଯୁଦ୍ଧରେ ବଧ ହୋଇ ରାମ ତାକୁ ପରମ ପଦ ଦେଲେ। ଏହା ଗୋଟିଏ ଜନ୍ମର କାରଣ ଥିଲା, ଯାହା ନିମନ୍ତେ ରାମ ମନୁଷ୍ୟ ଶରୀର ଧାରଣ କଲେ। ପ୍ରଭୁଙ୍କର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଅବତାରର କଥା ଅନେକ କବିଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ବର୍ଣ୍ଣିତ; ହେ ମୁନି, ଶୁଣ। ନାରଦ ଗୋଟିଏ ଥର ଶାପ ଦେଲେ; ଗୋଟିଏ କଳ୍ପ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତାହା ଅବତାରର କାରଣ ହେଲା। ଗିରିଜା ଏହି ବଚନ ଶୁଣି ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟଚକିତ ହେଲେ: ନାରଦ ବିଷ୍ଣୁଭକ୍ତ ଓ ଜ୍ଞାନୀ। କାରଣ କଣ ପାଇଁ ମୁନି ଶାପ ଦେଲେ? ରମାପତି କଣ ଅପରାଧ କଲେ? ହେ ପୁରାରୀ, ମୋତୁ ଏହି ପ୍ରସଙ୍ଗ କୁହ; ମୁନିଙ୍କ ମନରେ ମୋହ ଥିଲା, ଏହା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟର ବିଷୟ।
ଦୋହା 124(क), ସୋରଠା 124(ख)
बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।124(क)।।
कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु।भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद।।124(ख)।।
bole bihasi mahesa taba gyānī mūṛha na koi |jehi jasa raghupati karahiṃ jaba so tasa tehi chana hoi ||124(ka)||
kahauṃ rāma guna gātha bharadvāja sādara sunahu |bhava-bhañjana raghunātha bhaju tulasī taji māna mada ||124(kha)||
ତେବେ ମହେଶ ମୃଦୁ ହାସରେ କହିଲେ—ନ କେହି ସତ୍ୟରେ ପଣ୍ଡିତ, ନ କେହି ସତ୍ୟରେ ମୂର୍ଖ। କାରଣ ରଘୁପତି ଯେପରି ଭାବେ ଯାହାକୁ ଗଢ଼ନ୍ତି, ସେହି କ୍ଷଣରେ ସେ ତେଣୁହିଁ ହୋଇଯାଏ। ଏବେ ମୁଁ ଶ୍ରୀରାମଙ୍କ ଗୁଣକଥା କହିବି—ଭାରଦ୍ୱାଜ, ଭକ୍ତିଭାବରେ ସାବଧାନ ହୋଇ ଶୁଣ। ଭବବନ୍ଧନ ଛେଦକ ରଘୁନାଥଙ୍କୁ ପୂଜ; ଏବଂ ହେ ତୁଲସୀ, ଗର୍ବ ଓ ଅହଂକାରର ମଦକୁ ତ୍ୟାଗ କର।
ଚୌପାଈ 125.1-4
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि।बह समीप सुरसरी सुहावनि।।
आश्रम परम पुनीत सुहावा।देखि देवरिषि मन अति भावा।।
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा।भयउ रमापति पद अनुरागा।।
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी।सहज बिमल मन लागि समाधी।।
मुनि गति देखि सुरेस डेराना।कामहि बोलि कीन्ह सनमाना।।
सहित सहाय जाहु मम हेतू।चकेउ हरषि हियँ जलचरकेतू।।
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा।चहत देवरिषि मम पुर बासा।।
जे कामी लोलुप जग माहीं।कुटिल काक इव सबहि डेराहीं।।
himagiri guhā eka ati pāvani |baha samīpa surasarī suhāvani ||
āśrama parama punīta suhāvā |dekhi devar̥ṣi mana ati bhāvā ||
nirakhi saila sari bipina bibhāgā |bhayu ramāpati pada anurāgā ||
sumirata harihi śrāpa gati bādhī |sahaja bimala mana lāgi samādhī ||
muni gati dekhi sureśa ḍerānā |kāmahi boli kīnha sanamānā ||
sahita sahāya jāhu mama hetū |cakeu haraṣi hiyaṁ jalacaraketū ||
sunāsīra mana mahuṁ asi trāsā |cahata devar̥ṣi mama pura bāsā ||
je kāmī lolupa jaga māhīṁ |kuṭila kāka iva sabahi ḍerāhīṁ ||
ହିମଗିରିରେ ଗୋଟିଏ ଗୁହା ଥିଲା, ଅତ୍ୟନ୍ତ ପବିତ୍ର; ତାହା ନିକଟରେ ସୁନ୍ଦର ସୁରସରୀ ପ୍ରବାହିତ ହେଉଥିଲା। ଏକ ଆଶ୍ରମ ପରମ ପୁନୀତ ଓ ସୁନ୍ଦର ଥିଲା; ଦେଖି ଦେବର୍ଷିଙ୍କ ମନ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲା। ପର୍ବତ, ନଦୀ ଓ ବନର ବିଭାଗକୁ ଦେଖି, ସେ ରମାପତିଙ୍କ ଚରଣରେ ଅନୁରକ୍ତ ହେଲେ। ହରିଙ୍କୁ ସ୍ମରଣ କରିବାରୁ ଶାପର ବନ୍ଧନ ରୁଦ୍ଧ ହେଲା; ତାଙ୍କର ସ୍ୱାଭାବିକ ନିର୍ମଳ ମନ ସମାଧିରେ ଲାଗିଲା। ମୁନିଙ୍କ ଅବସ୍ଥା ଦେଖି ସୁରେଶ ଭୟଭୀତ ହେଲେ; କାମକୁ ଡାକି ସମ୍ମାନ ଦେଲେ। ମୋର କାର୍ଯ୍ୟ ନିମନ୍ତେ ସହାୟକଙ୍କ ସହ ଯାଅ ବୋଲି କହିଲେ। ଏହା ଶୁଣି ଜଳଚରକେତୁ ଆନନ୍ଦରେ ଚକିତ ହେଲେ। ସୁନାସୀରଙ୍କ ମନରେ ଏପରି ଭୟ ହେଲା: ଦେବର୍ଷି ମୋର ନଗରରେ ବାସ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛନ୍ତି। ଜଗତରେ ଯେଉଁମାନେ କାମୀ ଓ ଲୋଭୀ, ସେମାନେ କୁଟିଳ କାକ ପରି ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଭୟ ଦେଖାନ୍ତି।
ଦୋହା 125
सुख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज।।125।।
sukha hāṛa lai bhāga saṭha svāna nirakhi mṛgarāja |chīni lei jani jāna jaṛa timi surapatihi na lāja ||125||
ତୁଚ୍ଛ କୁକୁର ହାଡ଼ ମାତ୍ରରେ ଆନନ୍ଦିତ ହୋଇ, ସିଂହକୁ ଦେଖିଲେ ଦୌଡ଼ି ପଳାଏ। ହେ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି, ଏହା ଭାବିବୁ ନାହିଁ ଯେ ସିଂହ ତାହା ଛିନିନେବ—ସେପରି ଦେବେଶ୍ୱରଙ୍କୁ ଏମିତି ତୁଚ୍ଛ ବିଷୟ ପାଇଁ ପ୍ରତିସ୍ପର୍ଧା କରିବାର ନ ଲଜ୍ଜା ଅଛି, ନ ଆବଶ୍ୟକତା।
ଚୌପାଈ 126.1-4
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ।निज मायाँ बसंत निरमयऊ।।
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा।कूजहिं कोकिल गुंजहि भृंगा।।
चली सुहावनि त्रिबिध बयारी।काम कृसानु बढ़ावनिहारी।।
रंभादिक सुरनारि नबीना।सकल असमसर कला प्रबीना।।
करहिं गान बहु तान तरंगा।बहुबिधि क्रीड़हि पानि पतंगा।।
देखि सहाय मदन हरषाना।कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना।।
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी।निज भयँ डरेउ मनोभव पापी।।
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासु।बड़ रखवार रमापति जासू।।
tehi āśramahiṁ madana jaba gayaū |nija māyāṁ basanta niramayaū ||
kusumita bibidha biṭapa bahuraṅgā |kūjahiṁ kokila guṁjahi bhṛṅgā ||
calī suhāvani tribidha bayārī |kāma kṛsānu baṛhāvanihārī ||
raṁbhādika suranāri nabīnā |sakala asamasara kalā prabīnā ||
karahiṁ gāna bahu tāna taraṅgā |bahubidhi krīṛahi pāni pataṅgā ||
dekhi sahāya madana haraṣānā |kīnhesi puni prapaṁca bidhi nānā ||
kāma kalā kachu munihi na byāpī |nija bhayaṁ ḍareu manobhava pāpī ||
sīma ki cāṁpi sakai kou tāsu |baṛa rakhavāra ramāpati jāsu ||
ଯେତେବେଳେ ମଦନ ସେହି ଆଶ୍ରମରେ ଗଲେ, ନିଜ ମାୟାରେ ନିର୍ମଳ ବସନ୍ତ ସୃଷ୍ଟି କଲେ। ବହୁ ପ୍ରକାରର ବିଟପ ଫୁଲରେ ଶୋଭାଇତ ଥିଲେ, ବହୁ ବର୍ଣ୍ଣର; କୋକିଲ କୂଜନ କରୁଥିଲେ ଓ ଭୃଙ୍ଗ ଗୁଞ୍ଜରିତ ହେଉଥିଲେ। ତ୍ରିବିଧ ମନୋହର ବାୟୁ ପ୍ରବାହିତ ହେଲା, କାମାଗ୍ନିକୁ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ କରୁଥିଲା। ରମ୍ଭାଦି ସୁରନାରୀମାନେ ନବୀନ ଯୌବନରେ, ଅତୁଳ ଓ ସମସ୍ତ କଳାରେ ପାରଙ୍ଗମ, ବହୁ ତାନ ଓ ତରଙ୍ଗରେ ଗାନ କରୁଥିଲେ; ଜଳପକ୍ଷୀମାନେ ବହୁବିଧରେ କ୍ରୀଡ଼ା କରୁଥିଲେ। ଏପରି ସହାୟକଙ୍କୁ ଦେଖି ମଦନ ହର୍ଷିତ ହେଲେ ଓ ପୁଣି ନାନା ପ୍ରପଞ୍ଚ କଲେ। କିନ୍ତୁ ମୁନିଙ୍କୁ କାମକଳା ସ୍ପର୍ଶ କରିପାରିଲା ନାହିଁ; ପାପୀ ମନୋଭବ ନିଜ ଭୟରେ ଭୟଭୀତ ହେଲେ। ଯାହାଙ୍କର ରମାପତି ରକ୍ଷକ, ତାହାଙ୍କୁ କିଏ ସୀମିତ କରିପାରିବ? କିଏ ତାହାଙ୍କ ଉପରେ ଦବାଣ କରିପାରିବ?
ଦୋହା 126
सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन।गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन।।126।।
sahita sahāya sabhīta ati māni hāri mana maina |gahesi jāi muni carana taba kahi suṭhi ārata baina ||126||
ସହଚର ଓ ପରିଚାରକମାନଙ୍କ ସହିତ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଭୀତ ହୋଇ—କାମବିକାରର ଉଥଳପାଥଳରେ ମନେ ନିଜକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ପରାଜିତ ଭାବି—ସେ ଯାଇ ମୁନିଙ୍କ ପାଦ ଧରିଲା, ତାପରେ ଯଥୋଚିତ କିନ୍ତୁ ବିଷାଦଭରା ବାଣୀରେ କହିଲା।
ଚୌପାଈ 127.1-4
भयउ न नारद मन कछु रोषा।कहि प्रिय बचन काम परितोषा।।
नाइ चरन सिरु आयसु पाई।गयउ मदन तब सहित सहाई।।
मुनि सुसीलता आपनि करनी।सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी।।
सुनि सब कें मन अचरजु आवा।मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा।।
तब नारद गवने सिव पाहीं।जिता काम अहमिति मन माहीं।।
मार चरित संकरहिं सुनाए।अतिप्रिय जानि महेस सिखाए।।
बार बार बिनवउँ मुनि तोहीं।जिमि यह कथा सुनायहु मोहीं।।
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ।चलेहुँ प्रसंग दुराएडु तबहूँ।।
bhayu na nārada mana kachu roṣā |kahi priya bacana kāma paritoṣā ||
nāi carana siru āyasu pāī |gayu madana taba sahita sahāī ||
muni susīlatā āpani karanī |surapati sabhā̃ jāi saba baranī ||
suni saba keṁ mana acaraju āvā |munihi prasaṁsi harihi siru nāvā ||
taba nārada gavane siva pāhī̃ |jitā kāma ahamiti mana māhī̃ ||
māra carita saṅkarahi sunāe |atipriya jāni mahesa sikhāe ||
bāra bāra binavaũ muni tohī̃ |jimi yaha kathā sunāyahu mohī̃ ||
timi jani harihi sunāvahu kabahū̃ |calehũ prasaṅga durāeḍu tabahū̃ ||
ନାରଦଙ୍କ ମନରେ କୌଣସି ରୋଷ ହେଲା ନାହିଁ। ପ୍ରିୟ ବଚନ କହି କାମଙ୍କୁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କଲେ। ଚରଣରେ ମୁଣ୍ଡ ନମାଇ ଆଜ୍ଞା ପାଇ ମଦନ ସହାୟକ ସହ ଚାଲିଗଲେ। ମୁନିଙ୍କ ସୁସୀଳତା ଓ ନିଜ ଆଚରଣ ସୁରପତିଙ୍କ ସଭାରେ ଗିଆଇ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବର୍ଣ୍ଣନା କଲେ। ସମସ୍ତେ ଶୁଣି ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟଚକିତ ହେଲେ; ମୁନିଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କରି ହରିଙ୍କୁ ମସ୍ତକ ନମନ କଲେ। ତାହା ପରେ ନାରଦ ଶିବଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ, ମନରେ ଭାବୁଥିଲେ ମୁଁ କାମକୁ ଜିତିଛି। ଶଙ୍କରଙ୍କୁ ମଦନଙ୍କ ଚରିତ୍ର ଶୁଣାଇଲେ; ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ ଜାଣି ମହେଶ ତାଙ୍କୁ ଉପଦେଶ ଦେଲେ: ହେ ମୁନି, ବାରମ୍ବାର ତୁମ୍ଭକୁ ପ୍ରାର୍ଥନା କରୁଛି, ଯେପରି ତୁମ୍ଭେ ମୋତେ ଏହି କଥା ଶୁଣାଇଛ, ସେପରି କଦାପି ହରିଙ୍କୁ ଶୁଣାଅ ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ନାରଦ ପ୍ରସଙ୍ଗକୁ ଲୁଚାଇ ଆଗକୁ ବଢ଼ିଗଲେ।
ଦୋହା 127
संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान।भारद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान।।127।।
Śambhu dīnha upadesa hita nahiṁ Nārada-hi sohāna.Bhāradvāja kautuka sunahu Hari icchā balavāna ||127||
ଶମ୍ଭୁ ଯଦିଓ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ତାହାର ମଙ୍ଗଳ ପାଇଁ ଉପଦେଶ ଦେଲେ, ତଥାପି ନାରଦଙ୍କୁ ସେ ଭଲ ଲାଗିଲା ନାହିଁ। ହେ ଭାରଦ୍ୱାଜ, ଏହି ଅଦ୍ଭୁତ ପରିଣତି ଶୁଣ—ପ୍ରଭୁଙ୍କ ଇଚ୍ଛା ନିଶ୍ଚୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରବଳ।
ଚୌପାଈ 128.1-4
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई।करै अन्यथा अस नहिं कोई।।
संभु बचन मुनि मन नहिं भाए।तब बिरंचि के लोक सिधाए।।
एक बार करतल बर बीना।गावत हरि गुन गान प्रबीना।।
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा।जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा।।
हरषि मिले उठि रमानिकेता।बैठे आसन रिषिहि समेता।।
बोले बिहसि चराचर राया।बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया।।
काम चरित नारद सब भाषे।जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे।।
अति प्रचंड रघुपति कै माया।जेहि न मोह अस को जग जाया।।
rāma kīnha cāhahĩ soi hoī |karai anyathā asa nahĩ koī ||
śambhu bacana muni mana nahĩ bhāe |taba birañci ke loka sidhāe ||
eka bāra karatala bara bīnā |gāvata hari guna gāna prabīnā ||
chīrasindhu gavane munināthā |jahã basa śrīnivāsa śrutimāthā ||
haraṣi mile uṭhi ramāniketā |baiṭhe āsana riṣihi sametā ||
bole bihasi carācara rāyā |bahute dinana kīnha muni dāyā ||
kāma carita nārada saba bhāṣe |jadyapi prathama baraji sivam̐ rākhē ||
ati pracaṇḍa raghupati kai māyā |jehi na moha asa ko jaga jāyā ||
ରାମ ଯାହା ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ସେହି ହୁଏ; ଅନ୍ୟଥା କରିବାକୁ କେହି ସମର୍ଥ ନୁହଁନ୍ତି। ଶମ୍ଭୁଙ୍କ ବଚନ ମୁନିଙ୍କ ମନକୁ ପସନ୍ଦ ହେଲା ନାହିଁ; ତେଣୁ ସେ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ଲୋକକୁ ଗଲେ। ଥରେ ହାତରେ ବୀଣା ଧରି, ହରିଙ୍କ ଗୁଣ ଗାନରେ ନିପୁଣ, ସେ ଆଗେଇ ଗଲେ। କ୍ଷୀରସାଗରକୁ ମୁନିନାଥ ଗଲେ, ଯେଉଁଠାରେ ଶ୍ରୀନିବାସ ବାସ କରନ୍ତି। ରମାନିକେତ ଆନନ୍ଦରେ ଉଠି ତାଙ୍କୁ ସ୍ୱାଗତ କଲେ; ଋଷିଙ୍କ ସହ ମିଳିତ ଭାବେ ସେ ତାଙ୍କୁ ସମ୍ମାନଜନକ ଆସନରେ ବସାଇଲେ। ହସି ଚରାଚରର ରାଜା କହିଲେ: ମୁନି, ଅନେକ ଦିନ ପରେ ତୁମେ କୃପା ଦେଖାଇଛ। ତାପରେ ନାରଦ କାମର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କଥା କହିଲେ, ଯଦିଓ ପ୍ରଥମେ ଶିବ ତାଙ୍କୁ ନିବାରଣ କରିଥିଲେ। ରଘୁପତିଙ୍କ ମାୟା ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରବଳ, ଯାହାଙ୍କୁ ଏହି ଜଗତରେ ମୋହରୁ ମୁକ୍ତ କରିବାକୁ କେହି ନାହାନ୍ତି।
ଦୋହା 128
रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान।तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान।।128।।
rūkh badana kari bacana mṛdu bole śrī-bhagavāna |tumhare sumirana tē miṭahiṃ moha māra mada māna ||128||
କଠୋର ଭାବ ଧରି ମଧୁର ବଚନ କହିଲେ ଭଗବାନ: “ତୋର ସ୍ମରଣେ ମୋହ ନାଶ ହୁଏ— ସହିତେ ଅହଂକାର, ମଦମତ ଗର୍ବ ଓ ଆତ୍ମାଭିମାନ ମଧ୍ୟ ହରାଏ।”
ଚୌପାଈ 129.1-4
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें।ग्यान बिराग हृदय नहिं जाके।।
ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा।तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा।।
नारद कहेउ सहित अभिमाना।कृपा तुम्हारि सकल भगवाना।।
करुनानिधि मन दीख बिचारी।उर अंकुरेउ गरब तरु भारी।।
बेगि सो मै डारिहउँ उखारी।पन हमार सेवक हितकारी।।
मुनि कर हित मम कौतुक होई।अवसि उपाय करबि मै सोई।।
तब नारद हरि पद सिर नाई।चले हृदयँ अहमिति अधिकाई।।
श्रीपति निज माया तब प्रेरी।सुनहु कठिन करनी तेहि केरी।।
sunu muni moha hoi mana tākeṁ |gyāna birāga hṛdaya nahiṁ jākeṁ ||
brahmacaraja brata rata mati-dhīrā |tumhahi ki karai manobhava pīrā ||
nārada kaheu sahita abhimānā |kṛpā tumhāri sakala bhagavānā ||
karuṇānidhi mana dīkha bicārī |ura aṅkureu garaba taru bhārī ||
begi so mai ḍārihauṁ ukhārī |pana hamāra sevaka hitakārī ||
muni kara hita mama kautuka hoī |avasi upāya karabi mai soī ||
taba nārada hari pada sira nāī |cale hṛdayaṁ ahamiti adhikāī ||
śrīpati nija māyā taba prerī |sunahu kaṭhina karanī tehi केरī ||
ଶୁଣ ମୁନି, ତାଙ୍କ ମନ ମୋହରେ ଆବଦ୍ଧ, ଯାହାଙ୍କ ହୃଦୟରେ ଜ୍ଞାନ ଓ ବୈରାଗ୍ୟ ନାହିଁ। ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ ବ୍ରତରେ ରତ ଓ ବୁଦ୍ଧିମାନ, କିପରି ମନୋଭବଙ୍କ ପୀଡ଼ା ତୁମକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରିବ? ନାରଦ ଅଭିମାନ ସହ କହିଲେ: ହେ ସମସ୍ତଙ୍କ ଅଧିପତି, ତୁମର କୃପା ସର୍ବତ୍ର ବ୍ୟାପ୍ତ। କରୁଣାନିଧି ତାଙ୍କ ମନର ଭାବ ଦେଖିଲେ; ତାଙ୍କ ହୃଦୟରେ ଗର୍ବର ଭାରୀ ବୃକ୍ଷ ଅଙ୍କୁରିତ ହେଲା। ଶୀଘ୍ର ମୁଁ ତାହାକୁ ଉତ୍ପାଟନ କରିବି, କିନ୍ତୁ ମୋର ସଂକଳ୍ପ ସର୍ବଦା ସେବକଙ୍କ କଲ୍ୟାଣ ପାଇଁ। ମୁନିଙ୍କ ହିତ ପାଇଁ ଏହା ମୋର ଲୀଳା; ନିଶ୍ଚିତ ମୁଁ ସେହି ଉପାୟ କରିବି। ତାପରେ ନାରଦ ହରିଙ୍କ ଚରଣରେ ମସ୍ତକ ନତ କରି ଚାଲିଗଲେ, ହୃଦୟରେ ଅହଂକାର ବୃଦ୍ଧି ପାଉଥିଲା। ତାହାପରେ ଶ୍ରୀପତି ନିଜ ମାୟା ପ୍ରବର୍ତ୍ତାଇଲେ, ଶୁଣ ଏହାର କଠିନ ପରିଣାମ।
ଦୋହା 129
बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार।श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार।।129।।
biraceu maga mahũ nagara tehĩ sata jojana bistāra |śrīnivāsapura tẽ adhika racanā bibidha prakāra ||129||
ପଥମଧ୍ୟେ ସେ ଏକ ନଗର ବସାଇଲେ, ଶତ ଯୋଜନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବିସ୍ତାରିତ। ବିବିଧ ରଚନା ଓ ନାନା ବ୍ୟବସ୍ଥାରେ ସେ ଶ୍ରୀନିବାସପୁରକୁ ମଧ୍ୟ ଅତିକ୍ରମ କଲା।
परंपरा अनुसार यहाँ ‘श्रवण-भक्ति’ का फल मोह-क्षय, संशय-निवृत्ति, और अवतार-तत्त्व का बोध है—विशेषतः ‘मान-मद’ का क्षय (दोहा 124(ख) की तुलसी-नीति) और ‘हरि-नाम/हरि-गुण’ में रुचि बढ़ना, जिससे भव-तरण की योग्यता बनती है।
सामान्य मानस-पारायण में ‘राम’ नाम-सम्पुट (जैसे ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’) या ‘सीता-राम’ सम्पुट प्रचलित है; इस खंड में विशेषतः ‘भव भंजन रघुनाथ’ (दोहा 124(ख)) को स्मरण-सम्पुट की तरह जोड़कर मान-त्याग/शरणागति का अभ्यास किया जाता है।
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