
Sūrya-stava: Dhaumya’s Counsel and the Aṣṭaśata-nāma of Sūrya
Upa-parva: Sūrya-stava (Dhaumya-upadeśa) Episode
Vaiśaṃpāyana narrates that Yudhiṣṭhira, addressed in context by Śaunaka’s earlier prompting, consults the priest Dhaumya amid his brothers. Yudhiṣṭhira reports that Veda-versed Brahmins are following the exiled party, yet he lacks the capacity to protect and provide for them, nor can he abandon them; he requests a Dharmic course of action. Dhaumya reflects and answers by grounding sustenance in cosmic order: beings suffer hunger; Sūrya, like a father, cyclically draws and returns energies through uttarāyaṇa/dakṣiṇāyana, enabling the generation of medicinal plants and edible essences that sustain life. Dhaumya therefore directs Yudhiṣṭhira to take refuge in Sūrya and to uphold Brahmins through tapas. Exempla of earlier kings who rescued subjects through austere discipline are cited, and Yudhiṣṭhira undertakes solar worship with offerings, self-restraint, and prāṇāyāma at the Gaṅgā. Janamejaya asks how this worship was performed; Vaiśaṃpāyana introduces the prescribed eight-hundred sacred names of Sūrya, lists representative epithets, and concludes with a phalaśruti: recitation at sunrise grants prosperity, memory, intelligence, and relief from sorrow, presenting the hymn as a practical-ritual technology for ethical stewardship in exile.
Chapter Arc: वन-प्रस्थान के साथ ही युधिष्ठिर देखते हैं कि वेदपारंगत ब्राह्मण उनके पीछे-पीछे चले आ रहे हैं—और उनके पास उन्हें पोषित करने का साधन नहीं। → राजा का अंतःकरण दान-धर्म से बँधा है: वे ब्राह्मणों को त्याग नहीं सकते, पर दान-शक्ति भी नहीं। धौम्य से प्रश्न उठता है—ऐसी विपत्ति में राजधर्म कैसे निभे? → धौम्य के उपदेश पर युधिष्ठिर संयमित व्रत लेकर सूर्य की उपासना करते हैं; स्तुति में सूर्य के विश्वव्यापी तेज, ऋतु-रश्मियों और प्रलयकालीन संवर्तकाग्नि तक का विराट रूप उभरता है, और अंततः सूर्य प्रसन्न होकर अक्षय अन्न-दान का वर देते हैं। → सूर्य-प्रसाद से युधिष्ठिर तिथि-नक्षत्र-पर्वों पर पुरोहित के नेतृत्व में ब्राह्मणों सहित सबको इच्छित भोजन कराने में समर्थ हो जाते हैं; धौम्य स्वस्तिवाचन कराते हैं और पाण्डव ब्राह्मण-समुदाय सहित काम्यक वन की ओर प्रस्थान करते हैं। → वनवास की दीर्घ परीक्षा के बीच आश्वासन गूँजता है—चौदहवें वर्ष में राज्य पुनः मिलेगा; पर तब तक धर्म-रक्षा की राह और कितनी कठिन होगी?
Verse 1
हि मय न हुक है ० - धनके लोभसे मनुष्य धनके रक्षककी हत्या कर डालते हैं। तृतीयो<थध्याय: युधिष्ठिरके द्वारा अन्नके लिये भगवान् सूर्यकी उपासना और उनसे अक्षयपात्रकी प्राप्ति वैशम्पायन उवाच शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येडब्रवीदिदम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शौनकके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठछिर अपने पुरोहितके पास आकर भाइयोंके बीचमें इस प्रकार बोले--
Vaiśampāyana berkata: Setelah Śaunaka berkata demikian, Yudhiṣṭhira putra Kuntī mendatangi purohita-nya, lalu di tengah saudara-saudaranya ia berkata demikian.
Verse 2
प्रस्थितं मानुयान्तीमे ब्राह्मणा वेदपारगा: । न चास्मि पोषणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः,“विप्रवर! ये वेदोंके पारंगत विद्वान ब्राह्मण मेरे साथ वनमें चल रहे हैं। परंतु मैं इनका पालन-पोषण करनेमें असमर्थ हूँ, यह सोचकर मुझे बड़ा दुःख हो रहा है
Vaiśampāyana berkata: “Para brahmana yang mahir dalam Weda ini mengikuti aku ketika aku berangkat. Namun aku tidak mampu menanggung pemeliharaan mereka; terbebani oleh hal itu, aku diliputi duka yang besar.”
Verse 3
परित्यक्तुं न शक्तो5स्मि दानशक्तिश्च नास्ति मे । कथमत्र मया कार्य तद् ब्रूहि भगवन् मम,“भगवन्! मैं इन सबका त्याग नहीं कर सकता; परंतु इस समय मुझमें इन्हें अन्न देनेकी शक्ति नहीं है। ऐसी अवस्थामें मुझे क्या करना चाहिये? यह कृपा करके बताइये” इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि काम्यकवनप्रवेशे तृतीयो5ध्याय:
Wahai Bhagawan, aku tidak sanggup meninggalkan mereka; namun saat ini aku pun tidak memiliki kemampuan untuk memberi mereka makanan. Dalam keadaan demikian, apa yang harus kulakukan? Mohon jelaskan kepadaku.
Verse 4
वैशम्पायन उवाच मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणान्विष्य तां गतिम् । युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभूतां वर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धौम्य मुनिने युधिष्ठिरका प्रश्न सुनकर दो घड़ीतक ध्यान-सा लगाया और धर्मपूर्वक उस उपायका अन्वेषण करनेके पश्चात् उनसे इस प्रकार कहा
Vaiśampāyana berkata: Setelah merenung sejenak dan menelusuri jalan yang patut menurut dharma, Dhaumya—yang utama di antara para penegak dharma—berkata demikian kepada Yudhiṣṭhira.
Verse 5
धौग्य उवाच पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम् । ततो<नुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा,धौम्य बोले--राजन्! सृष्टिके प्रारम्भकालमें जब सभी प्राणी भूखसे अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे, तब भगवान् सूर्यने पिताकी भाँति उन सबपर दया करके उत्तरायणमें जाकर अपनी किरणोंसे पृथ्वीका रस (जल) खींचा और दक्षिणायनमें लौटकर पृथ्वीको उस रससे आविष्ट किया
Dhaumya berkata: “Wahai Raja, pada masa awal penciptaan, ketika semua makhluk sangat tersiksa oleh lapar, Sang Surya menaruh belas kasih kepada mereka, laksana ayah kepada anak-anaknya.”
Verse 6
गत्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभि: । दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रवि:,धौम्य बोले--राजन्! सृष्टिके प्रारम्भकालमें जब सभी प्राणी भूखसे अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे, तब भगवान् सूर्यने पिताकी भाँति उन सबपर दया करके उत्तरायणमें जाकर अपनी किरणोंसे पृथ्वीका रस (जल) खींचा और दक्षिणायनमें लौटकर पृथ्वीको उस रससे आविष्ट किया 4 स्ि नि पर झ जय प् क्र पाण्डवोंका वनगमन उर्वशीका अर्जुनको शाप देना नलका अपने पूर्वरूपमें प्रकट होकर दमयन्तीसे मिलना भीताप्रेसे गो जमदग्निका परशुरामसे कार्तवीर्य-अर्जुनका अपराध बताना महाप्रलयके समय भगवान् मत्स्यके सींगमें बँधी हुई मनु और सप्तर्षियोंसहित नौका मार्कण्डेय मुनिको अक्षयवटकी शाखापर बालमुकुन्दका दर्शन #% कि
Dhaumya berkata: “Wahai Raja, Surya menempuh uttarāyaṇa dan dengan sinarnya menarik sari bumi—kelembapannya. Lalu, ketika berbalik menempuh dakṣiṇāyana, ia kembali menetap di atas bumi, menyelimutinya lagi dengan sari itu.”
Verse 7
क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपति: । दिवस्तेज: समुद्धृत्य जनयामास वारिणा,इस प्रकार जब सारे भूमण्डलमें क्षेत्र तैयार हो गया, तब ओषधियोंके स्वामी चन्द्रमाने अन्तरिक्षमें मेघोंके रूपमें परिणत हुए सूर्यके तेजको प्रकट करके उसके द्वारा बरसाये हुए जलसे अन्न आदि ओषधियोंको उत्पन्न किया
Ketika seluruh bumi telah menjadi ladang yang siap, Sang Candra—penguasa tumbuh-tumbuhan obat—menarik keluar cahaya Surya yang di angkasa telah berubah menjadi awan; dan melalui air hujan yang tercurah oleh perantara itu, ia menumbuhkan aneka herba serta biji-bijian pangan.
Verse 8
निषिक्तश्नन्द्रतेजोभि: स्वयोनौ निर्गते रवि: । ओषध्य: षड़सा मेध्यास्तदन्न॑ प्राणिनां भुवि,चन्द्रमाकी किरणोंसे अभिषिक्त हुआ सूर्य जब अपनी प्रकृतिमें स्थित हो जाता है, तब छः प्रकारके रसोंसे युक्त पवित्र ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। वही पृथ्वीमें प्राणियोंके लिये अन्न होता है
Dhāumya berkata: Ketika Surya, setelah dimandikan oleh sinar Candra, kembali tegak pada kedudukannya yang alami, muncullah tumbuh-tumbuhan obat yang suci, berhiaskan enam rasa; dan herba-herba itulah yang menjadi pangan bagi makhluk di bumi.
Verse 9
एवं भानुमयं हान्न॑ भूतानां प्राणधारणम् | पितैष सर्वभूतानां तस्मात् तं शरणं व्रज,इस प्रकार सभी जीवोंके प्राणोंकी रक्षा करनेवाला अन्न सूर्यरूप ही है। अतः भगवान् सूर्य ही समस्त प्राणियोंके पिता हैं, इसलिये तुम उनन््हींकी शरणमें जाओ
Dhāumya berkata: “Demikianlah, pangan yang menopang napas kehidupan semua makhluk sesungguhnya bersifat Surya. Karena itu Surya adalah bapa segala makhluk; maka berlindunglah kepadanya.”
Verse 10
राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिता: । उद्धरन्ति प्रजा: सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम्,जो जन्म और कर्म दोनों ही दृष्टियोंसे परम उज्ज्वल हैं, ऐसे महात्मा राजा भारी तपस्याका आश्रय लेकर सम्पूर्ण प्रजाजनोंका संकटसे उद्धार करते हैं
Raja-raja yang berhati agung—yang disucikan dan dimuliakan oleh keluhuran asal-usul serta perbuatan—menempuh tapa yang melimpah dan dengan daya itu mengangkat seluruh rakyatnya keluar dari kesusahan.
Verse 11
भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च । तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धता ह्यापद: प्रजा:,भीम, कार्तवीर्य अर्जुन, वेनपुत्र पृथु तथा नहुष आदि नरेशोंने तपस्या, योग और समाधिमें स्थित होकर भारी आपत्तियोंसे प्रजाको उबारा है
Dhāumya berkata: “Oleh Bhīma, oleh Kārtavīrya, oleh Vainya (Pṛthu putra Vena), dan juga oleh Nahuṣa—para raja yang teguh dalam tapa, yoga yang teratur, dan samādhi—bencana-bencana besar sungguh telah disingkirkan dari rakyat.”
Verse 12
तथा त्वमपि धर्मात्मन् कर्मणा च विशोधित: । तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन् भर भारत,धर्मात्मा भारत! इसी प्रकार तुम भी सत्कर्मसे शुद्ध होकर तपस्याका आश्रय ले धर्मानुसार द्विजातियोंका भरण-पोषण करो
Wahai yang berhati dharma, engkau pun—disucikan oleh perbuatanmu—berlindunglah pada tapa, dan menurut dharma, peliharalah serta topanglah kaum dwija, wahai Bhārata.
Verse 13
जनमेजय उवाच कथर्थ॑ कुरूणामृषभ: स तु राजा युधिष्ठिर: । विप्रार्थमाराधितवान् सूर्यमद्भुतदर्शनम्,जनमेजयने पूछा--भगवन्! पुरुषश्रेष्ठ राजा युधिष्छिरने ब्राह्मणोंके भरण-पोषणके लिये, जिनका दर्शन अत्यन्त अद्भुत है, उन भगवान् सूर्यकी आराधना किस प्रकार की?
Janamejaya berkata: “Bagaimanakah Raja Yudhiṣṭhira—sang banteng terunggul di antara para Kuru—memuja Sang Surya yang penglihatannya menakjubkan, demi memenuhi keperluan para Brahmana?”
Verse 14
वैशम्पायन उवाच शृणुष्वावहितो राजन् शुचिर्भूत्वा समाहित: । क्षणं च कुरु राजेन्द्र सम्प्रवक्ष्याम्यशेषत:,वैशम्पायनजीने कहा--राजेन्द्र! मैं सब बातें बता रहा हूँ। तुम सावधान, पवित्र और एकाग्रचित्त होकर सुनो और धैर्य रखो
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, dengarkan dengan saksama—jadilah suci dan teguh dalam pemusatan batin. Bersabarlah sejenak, wahai raja terbaik; akan kuceritakan semuanya tanpa tersisa.”
Verse 15
धौम्येन तु यथा पूर्व पार्थाय सुमहात्मने । नामाष्टशतमाख्यातं तच्छुणुष्व महामते,महामते! धौम्यने जिस प्रकार महात्मा युधिष्ठिरको पहले भगवान् सूर्यके एक सौ आठ नाम बताये थे, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो
Wahai yang berhikmat, dengarkanlah: akan kuceritakan bagaimana dahulu Dhaumya menyampaikan kepada Pārtha yang mulia rangkaian seratus delapan nama Sang Surya.
Verse 16
धौम्य उवाच सूर्योडर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्क:ः सविता रवि: । गभस्तिमानज: कालो मृत्युर्धाता प्रभाकर:,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Surya, Aryamā, Bhaga, Tvaṣṭṛ, Pūṣan, Arka, Savitṛ, Ravi, Gabhastimān, Aja, Kāla, Mṛtyu, Dhātṛ, dan Prabhākara—itulah nama-nama suci yang patut dilagukan bagi Sang Surya.”
Verse 17
पृथिव्यापश्च तेजश्न खं वायुश्व॒ परायणम् । सोमो बृहस्पति: शूक्रो बुधो5ज़ारक एव च,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Dialah Bumi dan Air, Api, Ruang, dan Angin—perlindungan tertinggi. Dialah pula Soma (Bulan), Bṛhaspati (Jupiter), Śukra (Venus), Budha (Merkurius), dan Aṅgāraka (Mars).”
Verse 18
इन्द्रो विवस्वान् दीप्तांशु: शुचि: शौरि: शनैश्वर: । ब्रह्मा विष्णुश्न रुद्रश्न स्कन्दो वै वरुणो यम:,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Ia dipuji sebagai Indra; Vivasvān; Dīptāṁśu (bercahaya-raya); Śuci (yang suci); Śauri; dan Śanaiśvara (yang bergerak perlahan). Ia juga diseru sebagai Brahmā, Viṣṇu, Rudra, Skanda, Varuṇa, dan Yama.”
Verse 19
वैद्युतो जाठरश्नाग्निरैन्धनस्तेजसां पति: । धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाड़ो वेदवाहन:,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Dialah api kilat, api pencernaan, dan api kurban yang menyala oleh bahan bakar; dialah penguasa segala cahaya. Dialah panji Dharma, pembentuk Weda, anggota Weda, dan pengemban Weda.”
Verse 20
कृतं त्रेता द्वापरश्न कलि: सर्वमलाश्रय: । कला काष्टठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षण:,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Dialah zaman-zaman itu sendiri—Kṛta, Tretā, Dvāpara, dan Kali, yang terakhir menjadi tempat bernaung segala kenajisan; dan dialah waktu dalam ukuran-ukurannya—kalā, kāṣṭhā, muhūrta, juga malam (kṣapā), jaga-jaga malam (yāma), serta sekejap (kṣaṇa).”
Verse 21
संवत्सरकरोडश्वत्थ: कालचक्रो विभावसु: । पुरुष: शाश्व॒तो योगी व्यक्ताव्यक्त: सनातन:,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Dialah pembentuk tahun; dialah aśvattha yang suci; dialah roda Waktu; dialah Vibhāvasu (api yang bercahaya). Dialah Pribadi yang kekal, sang yogin—yang termanifest dan tak termanifest—Sang Purba tanpa awal.”
Verse 22
कालाध्यक्ष: प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुद: । वरुण: सागरों5शुश्व जीमूतो जीवनोडरिहा,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Dialah penguasa Waktu dan penguasa makhluk; Viśvakarman, sang perajin semesta yang menghalau kegelapan; Varuṇa; samudra; sinar surya; awan hujan; pemberi hidup; dan pemusnah musuh.”
Verse 23
भूताश्रयो भूतपति: सर्वतलोकनमस्कृत: । स्रष्टा संवर्तको वह्नि: सर्वस्यादिरलोलुप:,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Dialah sandaran segala makhluk dan Tuhan para makhluk, dihormati oleh semua loka. Dialah Pencipta dan yang menarik kembali segalanya saat pralaya; dialah api suci, awal dari segala sesuatu, dan bebas dari ketamakan.”
Verse 24
अनन्त: कपिलो भानु: कामद: सर्वतोमुख: । जयो विशालो वरद: सर्वधातुनिषेचिता,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “(Sang Surya adalah) Ananta, Kapila, Bhānu; pemberi anugerah keinginan, Yang Bermuka ke segala arah. Dialah Jaya, Yang Mahaluas, Pemberi karunia, dan yang mematangkan serta menumbuhkan segala unsur.”
Verse 25
मनःसुपर्णो भूतादि: शीघ्रग: प्राणधारक: । धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवो $दिते: सुत:,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Ia disebut Manas-suparṇa, sumber mula segala makhluk; yang bergerak cepat, penopang prāṇa. Ia Dhanvantari, yang bertanda panji komet; dewa purba, putra Aditi.”
Verse 26
द्वादशात्मारविन्दाक्ष: पिता माता पितामह: । स्वर्गद्धारं प्रजद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Dialah Yang Berwujud Dua Belas, bermata teratai; ayah, ibu, dan kakek agung. Dialah gerbang surga, gerbang keturunan, dan gerbang mokṣa—dialah Triviṣṭapa itu sendiri.”
Verse 27
देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुख: । चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेय: करुणान्वित:,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Dialah pembentuk makhluk yang berjasad; batinnya tenteram; Ātman semesta, memandang ke segala penjuru; Ātman yang bersemayam dalam yang bergerak maupun yang tak bergerak; hakikatnya halus; bersahabat dan berwelas; penuh kasih sayang.” Dalam konteks bab ini, sebutan-sebutan itu menjadi bagian dari kidung suci nama-nama Sūrya, suatu laku bhakti untuk meneguhkan batin, membangkitkan rasa syukur, dan memanggil tatanan pelindung yang menopang hidup (ṛta) di tengah kesukaran.
Verse 28
एतद् वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजस: । नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत् स्वयंभुवा,धौम्य बोले--१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वानू, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्वर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेज:पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अध्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्लि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मन:सुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित--ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है
Dhaumya berkata: “Inilah nama-nama Sūrya yang layak dilantunkan—Dia yang sinarnya tak terukur. Kidung seratus delapan nama ini diajarkan, mula-mula diucapkan oleh Sang Svayambhū (Brahmā).”
Verse 29
सुरगणपितृयक्षसेवितं हासुरनिशाचरसिद्धवन्दितम् । वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितो5स्मि हिताय भास्करम्,(इन नामोंका उच्चारण करके भगवान् सूर्यको इस प्रकार नमस्कार करना चाहिये।) समस्त देवता, पितर और यक्ष जिनकी सेवा करते हैं, असुर, राक्षस तथा सिद्ध जिनकी वन्दना करते हैं तथा जो उत्तम सुवर्ण और अग्निके समान कान्तिमान् हैं, उन भगवान् भास्करको मैं अपने हितके लिये प्रणाम करता हूँ
Dhaumya berkata: “Demi kesejahteraanku aku bersujud kepada Bhāskara, Sang Surya—yang dilayani para dewa, para Pitṛ, dan Yakṣa; yang dipuji pula oleh Asura, Rākṣasa pengembara malam, dan para Siddha; yang bercahaya laksana emas terbaik dan laksana api yang menyala.”
Verse 30
सूर्योदये यः सुसमाहित: पठेत् स पुत्रदारान् धनरत्नसंचयान् । लभेत जातिस्मरतां नर: सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान्,जो मनुष्य सूर्योदयके समय भलीभाँति एकाग्रचित्त हो इन नामोंका पाठ करता है वह स्त्री, पुत्र, धन, रत्नराशि, पूर्वजन्मकी स्मृति, धैर्य तथा उत्तम बुद्धि प्राप्त कर लेता है
Dhaumya berkata: Siapa pun, saat matahari terbit, melafalkan nama-nama ini dengan batin yang terhimpun dan terpusat, akan memperoleh kesejahteraan rumah tangga—istri dan anak, harta serta timbunan permata. Ia pun meraih ingatan akan kelahiran-kelahiran lampau, beserta keteguhan dan kecerdasan yang tajam.
Verse 31
इमं स्तवं देववरस्य यो नर: प्रकीर्तयेच्छुचिसुमना: समाहित: । विमुच्यते शोकदवाग्निसागरा- ल्लभेत कामान् मनसा यथेप्सितान्,जो मानव स्नान आदि करके पवित्र, शुद्धचित्त एवं एकाग्र हो देवेश्वर 'भगवान्' सूर्यके इस नामात्मक स्तोत्रका कीर्तन करता है वह शोकरूपी दावानलसे युक्त दुस्तर संसारसागरसे मुक्त हो मनचाही वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है
Dhaumya berkata: Barang siapa, setelah menyucikan diri dengan laku seperti mandi, dengan hati yang bening dan konsentrasi yang teguh, melantunkan kidung nama-nama ini bagi Sang Surya—tuan termulia di antara para dewa—ia terbebas dari samudra saṃsāra yang sukar diseberangi, yang menyala oleh kebakaran duka, dan meraih tujuan yang diidamkan hatinya.
Verse 32
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वच: । विप्रत्यागसमाधिस्थ: संयतात्मा दृढव्रत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पुरोहित धौम्यके इस प्रकार समयोचित बात कहनेपर ब्राह्मणोंको देनेके लिये अन्नकी प्राप्तिके उद्देश्यसे नियममें स्थित हो मनको वशमें रखकर दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए शुद्धचेता धर्मराज युधिष्ठिरने उत्तम तपस्याका अनुष्ठान आरम्भ किया। राजा युधिष्ठिरने गंगाजीके जलमें स्नान करके पुष्प और नैवेद्य आदि उपहारोंद्वारा भगवान् दिवाकरकी पूजा की और उनके सम्मुख मुँह करके खड़े हो गये। धर्मात्मा पाण्डुकुमार चित्तको एकाग्र करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए केवल वायु पीकर रहने लगे
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya! Setelah mendengar kata-kata Dhaumya yang tepat pada waktunya, Yudhiṣṭhira—raja dharma—teguh dalam laku, menundukkan diri, dan mantap dalam tekad untuk memperoleh makanan demi diberikan kepada para brāhmaṇa—memulai tapa yang luhur dengan disiplin yang ketat.”
Verse 33
धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम् | पुष्पोपहारैर्बलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पुरोहित धौम्यके इस प्रकार समयोचित बात कहनेपर ब्राह्मणोंको देनेके लिये अन्नकी प्राप्तिके उद्देश्यसे नियममें स्थित हो मनको वशमें रखकर दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए शुद्धचेता धर्मराज युधिष्ठिरने उत्तम तपस्याका अनुष्ठान आरम्भ किया। राजा युधिष्ठिरने गंगाजीके जलमें स्नान करके पुष्प और नैवेद्य आदि उपहारोंद्वारा भगवान् दिवाकरकी पूजा की और उनके सम्मुख मुँह करके खड़े हो गये। धर्मात्मा पाण्डुकुमार चित्तको एकाग्र करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए केवल वायु पीकर रहने लगे
Vaiśampāyana berkata: “Raja dharma Yudhiṣṭhira, yang bening jiwanya, menempuh tapa yang unggul. Setelah memuja Divākara dengan persembahan bunga dan oblation, ia berdiri menghadap-Nya dengan teguh.”
Verse 34
सो<वगाहा जलं राजा देवस्याभिमुखो5 भवत् । योगमास्थाय धर्मात्मा वायुभक्षो जितेन्द्रिय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पुरोहित धौम्यके इस प्रकार समयोचित बात कहनेपर ब्राह्मणोंको देनेके लिये अन्नकी प्राप्तिके उद्देश्यसे नियममें स्थित हो मनको वशमें रखकर दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए शुद्धचेता धर्मराज युधिष्ठिरने उत्तम तपस्याका अनुष्ठान आरम्भ किया। राजा युधिष्ठिरने गंगाजीके जलमें स्नान करके पुष्प और नैवेद्य आदि उपहारोंद्वारा भगवान् दिवाकरकी पूजा की और उनके सम्मुख मुँह करके खड़े हो गये। धर्मात्मा पाण्डुकुमार चित्तको एकाग्र करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए केवल वायु पीकर रहने लगे
Sang raja masuk ke dalam air dan mandi; lalu berdiri menghadap dewa. Berteguh dalam yoga, berhati dharma, menaklukkan indria, Yudhiṣṭhira hidup hanya dengan ‘makanan’ berupa udara.
Verse 35
गाड़ेयं वार्युपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान् । शुचि: प्रयतवाग भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्तत:,गंगाजलका आचमन करके पवित्र हो वाणीको वशमें रखकर तथा प्राणायामपूर्वक स्थित रहकर उन्होंने पूर्वोक्त अष्टोत्तरशतनामात्मक स्तोत्रका जप किया
Setelah menyeruput air Gaṅgā sebagai penyucian, ia berdiri teguh dalam latihan pengendalian napas. Dengan ucapan tertahan dan batin bersih, ia pun memulai pelafalan himne suci.
Verse 36
युधिछिर उवाच त्वं भानो जगतत्नक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम् । त्वं योनि: सर्वभूतानां त्वमाचार: क्रियावताम्,युधिष्ठिर बोले--सूर्यदेव! आप सम्पूर्ण जगतके नेत्र तथा समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं। आप ही सब जीवोंके उत्पत्तिस्थान और कर्मानुष्ठानमें लगे हुए पुरुषोंके सदाचार हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Bhānu, engkaulah mata seluruh jagat, dan engkaulah Ātman bagi semua yang berjasad. Engkaulah sumber kelahiran segala makhluk, dan engkaulah tolok ukur laku benar bagi mereka yang tekun berbuat dharma.”
Verse 37
त्वं गति: सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम् । अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम्,सम्पूर्ण सांख्ययोगियोंके प्राप्तव्य स्थान आप ही हैं। आप ही सब कर्मयोगियोंके आश्रय हैं। आप ही मोक्षके उन्मुक्त द्वार हैं और आप ही मुमुक्षुओंकी गति हैं
Engkaulah tujuan tertinggi para penganut Sāṅkhya dan para yogin; Engkaulah sandaran terakhir mereka. Engkaulah gerbang mokṣa yang terbuka tanpa penghalang; Engkaulah pula jalan dan tujuan para pencari pembebasan.
Verse 38
त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोक: प्रकाश्यते । त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया,आप ही सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं। आपसे ही यह प्रकाशित होता है। आप ही इसे पवित्र करते हैं और आपके ही द्वारा निःस्वार्थभावसे इसका पालन किया जाता है
Oleh-Mu dunia ini ditopang; oleh-Mu pula ia diterangi dan tampak nyata. Oleh-Mu ia disucikan, dan tanpa kepura-puraan serta tanpa pamrih, oleh-Mu jugalah ia dipelihara dan dilindungi.
Verse 39
त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगा: । स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यषिगणार्चितम्,सूर्ययेव!! आप ऋषिगणोंद्वारा पूजित हैं। वेदके तत्त्वज्ञ ब्राह्मणलोग अपनी-अपनी वेदशाखाओंमें वर्णित मन्त्रोंद्रारा उचित समयपर उपस्थान करके आपका पूजन किया करते हैं
Engkau dipuja oleh para ṛṣi. Para brāhmaṇa yang menyeberangi samudra Veda, pada waktu yang semestinya, datang bersujud dan memuja-Mu dengan mantra-mantra yang ditetapkan dalam cabang Veda masing-masing.
Verse 40
तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिन: । सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्मुकपन्नगा:,सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष, गुह्क और नाग आपसे वर पानेकी अभिलाषासे आपके गतिशील दिव्य रथके पीछे-पीछे चलते हैं
Saat kereta ilahi-Mu bergerak maju, para pemohon anugerah mengiringinya—Siddha, Cāraṇa, Gandharva, Yakṣa, Guhyaka, dan bangsa ular (Pannaga)—semuanya mengikuti di belakang-Mu.
Verse 41
त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणा: । सोपेन्द्रा: समहेन्द्राश्न॒ त्वामिष्टवा सिद्धिमागता:,तैंतीसः देवता एवं विमानचारी सिद्धगण भी उपेन्द्र तथा महेन्द्रसाहित आपकी आराधना करके सिद्धिको प्राप्त हुए हैं
Tiga puluh tiga dewa, demikian pula rombongan makhluk surgawi yang berkelana dengan vimāna—bersama Upendra dan bahkan Mahendra—telah memuja-Mu dan mencapai siddhi (kesempurnaan rohani).
Verse 42
उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथा: । दिव्यमन्दारमालाभि स्तूर्ण विद्याधरोत्तमा:,श्रेष्ठ विद्याधरगण दिव्य मन्दार-कुसुमोंकी मालाओंसे आपकी पूजा करके सफलमनोरथ हो तुरंत आपके समीप पहुँच जाते हैं। गुह्यक, सातः प्रकारके पितृगण तथा दिव्य मानव (सनकादि) आपकी ही पूजा करके श्रेष्ठ पदको प्राप्त करते हैं। वसुगण, मरुदगण, रुद्र, साध्य तथा आपकी किरणोंका पान करनेवाले वालखिल्य आदि सिद्ध महर्षि आपकी ही आराधनासे सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ हुए हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Setelah memuja-Mu dan memperoleh terpenuhinya segala hasrat, para Vidyādhara yang utama segera mendekat kepada-Mu, membawa rangkaian bunga mandāra surgawi. Demikian pula para Guhyaka, tujuh golongan Pitṛ—baik yang bersifat ilahi maupun manusiawi—serta para resi laksana dewa, mencapai kedudukan luhur melalui pemujaan kepada-Mu semata. Kaum Vasu, Marut, Rudra, dan Sādhya, juga para resi sempurna seperti Vālakhilya yang hidup dari meneguk sinar-Mu, menjadi yang terunggul di antara makhluk berkat bakti dan pemujaan kepada-Mu saja.”
Verse 43
गुहाया: पितृगणा: सप्त ये दिव्या ये च मानुषा: । ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम्,श्रेष्ठ विद्याधरगण दिव्य मन्दार-कुसुमोंकी मालाओंसे आपकी पूजा करके सफलमनोरथ हो तुरंत आपके समीप पहुँच जाते हैं। गुह्यक, सातः प्रकारके पितृगण तथा दिव्य मानव (सनकादि) आपकी ही पूजा करके श्रेष्ठ पदको प्राप्त करते हैं। वसुगण, मरुदगण, रुद्र, साध्य तथा आपकी किरणोंका पान करनेवाले वालखिल्य आदि सिद्ध महर्षि आपकी ही आराधनासे सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ हुए हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Para Guhyaka dan tujuh golongan Pitṛ—baik yang bersifat ilahi maupun manusiawi—mereka memuja-Mu semata; dan melalui pemujaan itu mereka segera mencapai keutamaan. Demikianlah semua golongan yang patut dimuliakan, bila berpegang pada pemujaan kepada-Mu, meraih kedudukan tertinggi berkat anugerah-Mu.”
Verse 44
वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपा: । वालखिल्यादय: सिद्धा: श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गता:,श्रेष्ठ विद्याधरगण दिव्य मन्दार-कुसुमोंकी मालाओंसे आपकी पूजा करके सफलमनोरथ हो तुरंत आपके समीप पहुँच जाते हैं। गुह्यक, सातः प्रकारके पितृगण तथा दिव्य मानव (सनकादि) आपकी ही पूजा करके श्रेष्ठ पदको प्राप्त करते हैं। वसुगण, मरुदगण, रुद्र, साध्य तथा आपकी किरणोंका पान करनेवाले वालखिल्य आदि सिद्ध महर्षि आपकी ही आराधनासे सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ हुए हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Kaum Vasu, Marut, Rudra, dan Sādhya; serta para siddha seperti Vālakhilya yang hidup dari meneguk sinar—semuanya telah mencapai keutamaan di antara makhluk hidup.”
Verse 45
सब्रद्यकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च । न तद्धूतमहं मनन््ये यदर्कादतिरिच्यते,ब्रद्मतोकसहित ऊपरके सातों लोकोंमें तथा अन्य सब लोकोंमें भी ऐसा कोई प्राणी नहीं दीखता जो आप भगवान् सूर्यसे बढ़कर हो। भगवन्! जगतमें और भी बहुत-से महान् शक्तिशाली प्राणी हैं; परंतु उनकी कान्ति और प्रभाव आपके समान नहीं हैं। सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थ आपके ही अन्तर्गत हैं। आप ही समस्त ज्योतियोंके स्वामी हैं। सत्य, सत्त्व तथा समस्त सात्त्विक भाव आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। 'शार्इ” नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने जिसके द्वारा दैत्योंका घमंड चूर्ण किया है उस सुदर्शन चक्रको विश्वकर्माने आपके ही तेजसे बनाया है
Yudhiṣṭhira berkata: “Di seluruh dunia—di tujuh alam, termasuk Brahmaloka, dan juga di segala alam lainnya—aku tidak mengira ada satu pun makhluk yang melampaui Sang Surya. Wahai Yang Mulia, memang ada banyak makhluk agung dan perkasa di jagat raya; namun sinar dan pengaruh mereka tidak sebanding dengan milik-Mu. Segala sesuatu yang bercahaya tercakup di dalam diri-Mu; Engkaulah penguasa segala cahaya. Kebenaran, kemurnian, dan seluruh watak sāttvika bersemayam teguh pada-Mu. Bahkan cakra Sudarśana—dengan mana Viṣṇu, pemegang busur Śārṅga, menghancurkan keangkuhan para Dānava—ditempa oleh Viśvakarman dari kemilau keagungan-Mu sendiri.”
Verse 46
सन्ति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च । न तु तेषां तथा दीप्ति: प्रभावो वा यथा तव,ब्रद्मतोकसहित ऊपरके सातों लोकोंमें तथा अन्य सब लोकोंमें भी ऐसा कोई प्राणी नहीं दीखता जो आप भगवान् सूर्यसे बढ़कर हो। भगवन्! जगतमें और भी बहुत-से महान् शक्तिशाली प्राणी हैं; परंतु उनकी कान्ति और प्रभाव आपके समान नहीं हैं। सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थ आपके ही अन्तर्गत हैं। आप ही समस्त ज्योतियोंके स्वामी हैं। सत्य, सत्त्व तथा समस्त सात्त्विक भाव आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। 'शार्इ” नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने जिसके द्वारा दैत्योंका घमंड चूर्ण किया है उस सुदर्शन चक्रको विश्वकर्माने आपके ही तेजसे बनाया है
Yudhiṣṭhira berkata: “Memang ada makhluk lain yang besar dan perkasa di dunia; namun tidak satu pun memiliki sinar atau daya pengaruh seperti milik-Mu.”
Verse 47
ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पति: । त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्व॒ साच्चिका:,ब्रद्मतोकसहित ऊपरके सातों लोकोंमें तथा अन्य सब लोकोंमें भी ऐसा कोई प्राणी नहीं दीखता जो आप भगवान् सूर्यसे बढ़कर हो। भगवन्! जगतमें और भी बहुत-से महान् शक्तिशाली प्राणी हैं; परंतु उनकी कान्ति और प्रभाव आपके समान नहीं हैं। सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थ आपके ही अन्तर्गत हैं। आप ही समस्त ज्योतियोंके स्वामी हैं। सत्य, सत्त्व तथा समस्त सात्त्विक भाव आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। 'शार्इ” नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने जिसके द्वारा दैत्योंका घमंड चूर्ण किया है उस सुदर्शन चक्रको विश्वकर्माने आपके ही तेजसे बनाया है
Yudhiṣṭhira berkata: “Segala cahaya bersemayam dalam dirimu; engkaulah penguasa setiap pelita langit. Dalam dirimu tegak kebenaran dan kemurnian, serta segala watak yang sāttvika. Maka kilau dan wibawamu menjadi ukuran tertinggi, yang tak dapat disamai oleh makhluk perkasa mana pun.”
Verse 48
त्वत्तेजसा कृतं॑ चक्र सुनाभं विश्वकर्मणा । देवारीणां मदो येन नाशित: शार्ज्र्धन्चना,ब्रद्मतोकसहित ऊपरके सातों लोकोंमें तथा अन्य सब लोकोंमें भी ऐसा कोई प्राणी नहीं दीखता जो आप भगवान् सूर्यसे बढ़कर हो। भगवन्! जगतमें और भी बहुत-से महान् शक्तिशाली प्राणी हैं; परंतु उनकी कान्ति और प्रभाव आपके समान नहीं हैं। सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थ आपके ही अन्तर्गत हैं। आप ही समस्त ज्योतियोंके स्वामी हैं। सत्य, सत्त्व तथा समस्त सात्त्विक भाव आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। 'शार्इ” नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने जिसके द्वारा दैत्योंका घमंड चूर्ण किया है उस सुदर्शन चक्रको विश्वकर्माने आपके ही तेजसे बनाया है
Yudhiṣṭhira berkata: “Dari sinarmu sendiri, Viśvakarman menempa cakra yang berpusat indah. Dengan Sudarśana itu, Tuhan Viṣṇu—pemegang busur Śārṅga—meremukkan keangkuhan musuh para dewa. Demikianlah, di balik senjata-senjata ilahi penegak tatanan kosmis pun tersembunyi sumber kilau darimu.”
Verse 49
त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम् । सर्वोौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुडचसि,आप ग्रीष्म-ऋतुमें अपनी किरणोंसे समस्त देहधारियोंके तेज और सम्पूर्ण ओषधियोंके रसका सार खींचकर पुन: वर्षाकालमें उसे बरसा देते हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Pada musim panas, dengan sinarmu engkau menarik daya hidup semua makhluk berbadan dan sari dari getah segala tumbuhan obat; lalu pada musim hujan engkau melepaskannya kembali sebagai curahan yang menghidupkan. Demikian engkau menopang dunia: mengambil dengan kendali, mengembalikan pada waktunya.”
Verse 50
तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा घना: । विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मय:,वर्षा-ऋतुमें आपकी कुछ किरणें तपती हैं, कुछ जलाती हैं, कुछ मेघ बनकर गरजती, बिजली बनकर चमकती तथा वर्षा भी करती हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Pada musim hujan, sinarmu menjelma beragam rupa—sebagian menghangatkan, sebagian membakar; sebagian menjadi awan yang menggelegar, sebagian menyala sebagai kilat, dan sebagian tercurah sebagai hujan.”
Verse 51
न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बला: | शीतवातार्दितं लोक॑ यथा तव मरीचय:,शीतकालकी वायुसे पीड़ित जगत्को अग्नि, कम्बल और वस्त्र भी उतना सुख नहीं देते जितना आपकी किरणें देती हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Bagi dunia yang diguncang angin dingin, tiada api, tiada selimut wol, tiada kain penutup yang memberi kelegaan seperti sinarmu.”
Verse 52
त्रयोदशद्वीपवर्ती गोभिर्भासयसे महीम् । त्रयाणामपि लोकानां हितायैक: प्रवर्तसे,आप अपनी किरणोंद्वारा तेरहः द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण पृथ्वीको प्रकाशित करते हैं; और अकेले ही तीनों लोकोंके हितके लिये तत्पर रहते हैं
Bersemayam di tengah tiga belas dvīpa, engkau menerangi seluruh bumi dengan sinar-sinarmu; dan seorang diri engkau tiada henti bertindak demi kesejahteraan ketiga dunia.
Verse 53
तव यद्युदयो न स्यादन्ध॑ जगदिदं भवेत् | न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरनू मनीषिण:,यदि आपका उदय न हो तो यह सारा जगत् अंधा हो जाय और मनीषी पुरुष धर्म, अर्थ एवं कामसम्बन्धी क्मोंमें प्रवृत्त ही न हों
Jika terbitmu tidak terjadi, seluruh jagat ini akan menjadi gelap bagaikan buta; dan para bijak pun tidak akan bergerak menuju dharma, artha, dan kāma.
Verse 54
आधानपशुबन्न्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रिया: । त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्म॒क्षत्रविशां गणै:,गर्भाधान या अग्निकी स्थापना, पशुओंको बाँधना, इष्टि (पूजा), मन्त्र, यज्ञानुष्ठान और तप आदि समस्त क्रियाएँ आपकी ही कृपासे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यगणों द्वारा सम्पन्न की जाती हैं
Upacara pembuahan (ādhāna), penambatan hewan kurban, persembahan iṣṭi, pelafalan mantra suci, pelaksanaan yajña, dan laku tapa—segala tindakan dharmika semacam itu terlaksana oleh golongan brāhmaṇa, kṣatriya, dan vaiśya semata-mata berkat anugerahmu.
Verse 55
यदहर्ब्रह्मण: प्रोक्ते सहस्रयुगसम्मितम् । तस्य त्वमादिरन्तश्ष॒ कालज्ञै: परिकीर्तित:,ब्रद्माजीका जो एक सहस्र युगोंका दिन बताया गया है, कालमानके जाननेवाले विद्वानोंने उसका आदि और अन्त आपको ही बताया है
‘Sehari Brahmā’ yang dinyatakan setara dengan seribu yuga—atas rentang agung itu, para ahli waktu memaklumkan bahwa engkaulah awal dan engkaulah akhir.
Verse 56
मनूनां मनुपुत्राणां जगतो5मानवस्य च । मन्वन्तराणां सर्वेषामी श्वराणां त्वमी श्वर:,मनु और मनुपुत्रोंके, जगतके, (ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाले) अमानव पुरुषके, समस्त मन्वन्तरोंके तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर आप ही हैं
Engkaulah Tuhan atas para Manu dan putra-putra Manu, atas segenap dunia, dan atas makhluk adimanusia yang menganugerahkan jalan menuju Brahmaloka; bahkan di seluruh Manvantara, engkaulah Penguasa atas para dewa yang pun disebut ‘penguasa’.
Verse 57
संहारकाले सम्प्राप्ते तव क्रोधविनि:सृत: । संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते,प्रलयकाल आनेपर आपके ही क्रोधसे प्रकट हुई संवर्तक नामक अग्नि तीनों लोकोंको भस्म करके फिर आपमें ही स्थित हो जाती है
Ketika saat pralaya tiba, api Saṁvartaka—yang memancar dari murka-Mu sendiri—membakar tiga dunia hingga menjadi abu, lalu kembali berdiam di dalam diri-Mu.
Verse 58
त्वद्वीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघना: । सैरावता: साशनय: कुर्वन्त्याभूतसम्प्लवम्,आपकी ही किरणोंसे उत्पन्न हुए रंग-बिरंगे ऐरावत आदि महामेघ और बिजलियाँ सम्पूर्ण भूतोंका संहार करती हैं
Terlahir dari sinar-Mu sendiri, awan-awan raksasa yang beraneka warna—laksana awan golongan Airāvata, disertai kilat dan gelegar—menimbulkan banjir dahsyat seakan menenggelamkan seluruh makhluk.
Verse 59
कृत्वा द्वादशधा55त्मानं द्वादशादित्यतां गत: । संहृत्यैकार्णवं सर्व त्वं शोषयसि रश्मिभि:,फिर आप ही अपनेको बारह स्वरूपोंमें विभक्त करके बारह सूर्योके रूपमें उदित हो अपनी किरणोंद्वारा त्रिलोकीका संहार करते हुए एकार्णवके समस्त जलको सोख लेते हैं
Lalu Engkau membagi diri menjadi dua belas wujud dan terbit sebagai dua belas Āditya. Segala sesuatu Engkau himpun ke dalam satu samudra tunggal, lalu dengan sinar-Mu Engkau mengeringkan seluruh airnya—demikianlah Engkau menuntaskan pralaya tiga dunia.
Verse 60
त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापति: । त्वमग्निस्त्वं मन: सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम्,आपको ही इन्द्र कहते हैं। आप ही रुद्र, आप ही विष्णु और आप ही प्रजापति हैं। अग्नि, सूक्ष्म मन, प्रभु तथा सनातन ब्रह्म भी आप ही हैं
Engkaulah yang disebut Indra; Engkaulah Rudra, Engkaulah Viṣṇu, dan Engkaulah Prajāpati. Engkaulah Agni; Engkaulah budi yang halus; Engkaulah Sang Penguasa; Engkaulah Brahman yang kekal.
Verse 61
त्वं हंस: सविता भानुरंशुमाली वृषाकपि: । विवस्वान् मिहिर: पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च,आप ही हंस (शुद्धस्वरूप), सविता (जगतकी उत्पत्ति करनेवाले), भानु (प्रकाशमान), अंशुमाली (केरणसमूहसे सुशोभित), वृषाकपि (धर्मरक्षक), विवस्वान् [सर्वव्यापी), मिहिर (जलकी वृष्टि करनेवाले), पूषा (पोषक), मित्र (सबके सुहृद), धर्म (धारण करनेवाले), सहस्ररश्मि (हजारों किरणोंवाले), आदित्य (अदितिपुत्र), तपन (तापकारी), गवाम्पति (किरणोंके स्वामी), मार्तण्ड, अर्क (अर्चनीय), रवि, सूर्य (उत्पादक), शरण्य (शरणागतकी रक्षा करनेवाले), दिनकृत् (दिनके कर्ता), दिवाकर (दिनको प्रकट करनेवाले), सप्तसप्ति (सात घोड़ोंवाले), धामकेशी (ज्योतिर्मय किरणोंवाले), विरोचन (देदीप्यमान), आशुगामी (शीघ्रगामी), तमोघ्न (अन्धकारनाशक) तथा हरिताश्व (हरे रंगके घोड़ोंवाले) कहे जाते हैं
Engkaulah Haṁsa; Engkaulah Savitṛ, Bhānu, Aṁśumālī, dan Vṛṣākapi. Engkaulah Vivasvān, Mihira, Pūṣan, Mitra, dan demikian pula Dharma.
Verse 62
सहस्नरश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवाम्पति: । मार्तण्डो<र्को रवि: सूर्य: शरण्यो दिनकृत् तथा,आप ही हंस (शुद्धस्वरूप), सविता (जगतकी उत्पत्ति करनेवाले), भानु (प्रकाशमान), अंशुमाली (केरणसमूहसे सुशोभित), वृषाकपि (धर्मरक्षक), विवस्वान् [सर्वव्यापी), मिहिर (जलकी वृष्टि करनेवाले), पूषा (पोषक), मित्र (सबके सुहृद), धर्म (धारण करनेवाले), सहस्ररश्मि (हजारों किरणोंवाले), आदित्य (अदितिपुत्र), तपन (तापकारी), गवाम्पति (किरणोंके स्वामी), मार्तण्ड, अर्क (अर्चनीय), रवि, सूर्य (उत्पादक), शरण्य (शरणागतकी रक्षा करनेवाले), दिनकृत् (दिनके कर्ता), दिवाकर (दिनको प्रकट करनेवाले), सप्तसप्ति (सात घोड़ोंवाले), धामकेशी (ज्योतिर्मय किरणोंवाले), विरोचन (देदीप्यमान), आशुगामी (शीघ्रगामी), तमोघ्न (अन्धकारनाशक) तथा हरिताश्व (हरे रंगके घोड़ोंवाले) कहे जाते हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Engkau adalah Āditya yang bersinar dengan seribu sinar, sang pemberi panas, penguasa segala pancaran; Engkau adalah Mārtaṇḍa, Arka, Ravi, Sūrya—pelindung mereka yang berlindung—dan pembentuk siang.”
Verse 63
दिवाकर: सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचन: । आशुगामी तमोष्नश्न हरिताश्वश्न कीर्त्यसे,आप ही हंस (शुद्धस्वरूप), सविता (जगतकी उत्पत्ति करनेवाले), भानु (प्रकाशमान), अंशुमाली (केरणसमूहसे सुशोभित), वृषाकपि (धर्मरक्षक), विवस्वान् [सर्वव्यापी), मिहिर (जलकी वृष्टि करनेवाले), पूषा (पोषक), मित्र (सबके सुहृद), धर्म (धारण करनेवाले), सहस्ररश्मि (हजारों किरणोंवाले), आदित्य (अदितिपुत्र), तपन (तापकारी), गवाम्पति (किरणोंके स्वामी), मार्तण्ड, अर्क (अर्चनीय), रवि, सूर्य (उत्पादक), शरण्य (शरणागतकी रक्षा करनेवाले), दिनकृत् (दिनके कर्ता), दिवाकर (दिनको प्रकट करनेवाले), सप्तसप्ति (सात घोड़ोंवाले), धामकेशी (ज्योतिर्मय किरणोंवाले), विरोचन (देदीप्यमान), आशुगामी (शीघ्रगामी), तमोघ्न (अन्धकारनाशक) तथा हरिताश्व (हरे रंगके घोड़ोंवाले) कहे जाते हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Engkau dipuji dengan banyak nama—Divākara, Saptasapti, Dhāmakeśī, Virocana, Āśugāmī, Tamo-ghna, dan Haritāśva.”
Verse 64
सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक््त्या पूजां करोति यः । अनिर्विण्णो5नहंकारी त॑ लक्ष्मीर्भजते नरम्,जो सप्तमी अथवा षष्ठीको खेद और अहंकारसे रहित हो भक्तिभावसे आपकी पूजा करता है, उस मनुष्यको लक्ष्मी प्राप्त होती है
Yudhiṣṭhira berkata: “Pada hari keenam ataupun ketujuh, siapa yang bersembahyang dengan bhakti—tanpa putus asa dan tanpa keakuan—orang itu dianugerahi Lakṣmī (kemakmuran).”
Verse 65
न तेषामापद: सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा । ये तवानन्यमनस: कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम्,भगवन्! जो अनन्य चित्तसे आपकी अर्चना और वन्दना करते हैं, उनपर कभी आपत्ति नहीं आती। वे मानसिक चिन्ताओं तथा रोगोंसे भी ग्रस्त नहीं होते
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Bhagavan! Mereka yang dengan pikiran tak terbagi memuja dan bersujud kepada-Mu, tidak ditimpa malapetaka; tidak pula dikuasai kegelisahan batin maupun penyakit jasmani.”
Verse 66
सर्वरोगैर्विरहिता: सर्वपापविवर्जिता: । त्वद्धावभक्ता: सुखिनो भवन्ति चिरजीविन:,जो प्रेमपूर्वक आपके प्रति भक्ति रखते हैं वे समस्त रोगों तथा सम्पूर्ण पापोंसे रहित हो चिरंजीवी एवं सुखी होते हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Mereka yang dengan kasih menumbuhkan bhakti kepada-Mu menjadi bebas dari segala penyakit dan terbebas dari seluruh dosa; mereka berumur panjang dan hidup dalam kebahagiaan.”
Verse 67
त्वं ममापन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षत: । अन्नमन्नपते दातुमभित: श्रद्धयाहसि,अन्नपते! मैं श्रद्धापूर्वक सबका आतिथ्य करनेकी इच्छासे अन्न प्राप्त करना चाहता हूँ। आप मुझे अन्न देनेकी कृपा करें
Wahai Annapati, Penguasa Pangan! Meski aku berada dalam kesusahan, aku ingin dengan penuh keyakinan melaksanakan jamuan dan penghormatan yang layak bagi semua tamu; karena itu aku datang berlindung kepadamu demi memperoleh makanan. Berkenanlah menganugerahkan makanan kepadaku.
Verse 68
ये च ते$नुचरा: सर्वे पादोपान्तं समाश्रिता: । माठरारुणदण्डद्यास्तांस्तान् वन्देडशनिक्षुभान्,आपके चरणोंके निकट रहनेवाले जो माठर, अरुण तथा दण्ड आदि अनुचर (गण) हैं, वे विद्युतके प्रवर्तक हैं। मैं उन सबकी वन्दना करता हूँ
Dan semua pengiringmu yang berada dekat di kakimu—seperti Māṭhara, Aruṇa, dan Daṇḍa—yang dikatakan menggerakkan kilat: kepada masing-masing dari mereka aku bersujud hormat.
Verse 69
क्षुभया सहिता मैत्री याश्वान्या भूतमातर: । ताश्न सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम्,क्षुभाके साथ जो मैत्रीदेवी तथा गौरी, पद्मा आदि अन्य भूतमाताएँ हैं, उन सबको मैं नमस्कार करता हूँ। वे सभी मुझ शरणागतकी रक्षा करें
Aku bersujud kepada Maitrī Devī yang menyertai Kṣubhā, dan kepada semua Ibu makhluk lainnya—Gaurī, Padmā, dan yang lain. Semoga mereka melindungiku, karena aku datang mencari perlindungan.
Verse 70
वैशमग्पायन उवाच एवं स्तुतो महाराज भास्करो लोकभावन: । ततो दिवाकर: प्रीतो दर्शयामास पाण्डवम् | दीप्यमान: स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज! जब युधिष्ठिरने लोकभावन भगवान् भास्करका इस प्रकार स्तवन किया, तब दिवाकरने प्रसन्न होकर उन पाण्डुकुमारको दर्शन दिया। उस समय उनके श्रीअंग प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित हो रहे थे
Vaiśampāyana berkata: “Wahai raja agung, ketika Bhāskara, pemelihara dunia, dipuji demikian, maka Sang Pembuat Siang pun berkenan dan menampakkan diri kepada Pāṇḍava. Tubuhnya sendiri menyala oleh cahaya, laksana api yang berkobar.”
Verse 71
विवस्वानुवाच यत् तेडभिलषितं किंचित् तत् त्वं सर्वमवाप्स्यसि | अहमन्न प्रदास्यामि सप्त पठच च ते समा:,भगवान् सूर्य बोले--धर्मराज! तुम जो कुछ चाहते हो, वह सब तुम्हें प्राप्त होगा। मैं बारह वर्षोतक तुम्हें अन्न प्रदान करूँगा
Vivasvān (Dewa Surya) bersabda: “Wahai Dharmarāja, apa pun yang engkau kehendaki, semuanya akan engkau peroleh. Aku akan menyediakan makanan bagimu selama dua belas tahun.”
Verse 72
:६3 कौरवोंद्वारा विराटकी गायोंका हरण गृह्नीष्व पिठरं ताम्र॑ं मया दत्त नराधिप । यावद् वर्त्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत,राजन! यह मेरी दी हुई ताँबेकी बटलोई लो। सुव्रत! तुम्हारे रसोईघरमें इस पात्रद्वारा फल, मूल, भोजन करनेके योग्य अन्य पदार्थ तथा साग आदि जो चार प्रकारकी भोजन- सामग्री तैयार होगी, वह तबतक अक्षय बनी रहेगी, जबतक द्रौपदी स्वयं भोजन न करके परोसती रहेगी
Waiśaṃpāyana berkata: “Wahai Raja, terimalah bejana tembaga yang kuberikan ini. Selama Pāñcālī (Draupadī) yang setia pada ikrarnya masih melayani orang lain tanpa lebih dahulu makan, maka apa pun santapan empat macam—buah-buahan, umbi/akar, olahan lain yang layak dimakan, serta sayur-mayur—yang disiapkan melalui bejana ini di dapurmu akan tetap tak habis-habis. Wahai penguasa, ambillah periuk tembagaku ini.”
Verse 73
फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे । चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति,राजन! यह मेरी दी हुई ताँबेकी बटलोई लो। सुव्रत! तुम्हारे रसोईघरमें इस पात्रद्वारा फल, मूल, भोजन करनेके योग्य अन्य पदार्थ तथा साग आदि जो चार प्रकारकी भोजन- सामग्री तैयार होगी, वह तबतक अक्षय बनी रहेगी, जबतक द्रौपदी स्वयं भोजन न करके परोसती रहेगी
Apa pun yang dimasak di dapurmu—buah-buahan, umbi/akar, daging, dan sayur-mayur—empat macam bekal makanan ini akan menjadi tak habis bagimu. Selama Draupadī belum makan dan terus melayani, persediaan itu tidak akan berkurang, wahai Raja.
Verse 74
वैशम्पायन उवाच एवमुकक््त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्न्तरधीयत,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! इतना कहकर भगवान् सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गये
Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, setelah berkata demikian, Dewa Surya lenyap di tempat itu juga.”
Verse 75
इमं स्तवं प्रयतमना: समाधिना पठेदिहान्यो5पि वरं समर्थयन् | तत् तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं तदाप्रुयाद् यद्यपि तत् सुदुर्लभम्,जो कोई अन्य पुरुष भी मनको संयममें रखकर चित्तवृत्तियोंको एकाग्र करके इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह यदि कोई अत्यन्त दुर्लभ वर भी माँगे तो भगवान् सूर्य उसकी उस मनोवांछित वस्तुको दे सकते हैं
Bahkan orang lain pun, bila melafalkan kidung pujian ini dengan batin yang terkendali dan pemusatan meditasi, dapat memohon anugerah—meski amat sukar diperoleh. Ravi, berkenan oleh bhakti yang terpusat itu, sanggup menganugerahkan apa yang diidamkan; maka ia meraihnya, betapapun langkanya.
Verse 76
यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद् वाप्यभीक्षणश: । पुत्रार्थी लभते पुत्र धनार्थी लभते धनम् । विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषो5प्यथवा स्त्रिय:,जो प्रतिदिन इस स्तोत्रको धारण करता अथवा बार-बार सुनता है, वह यदि पुत्रार्थी हो तो पुत्र पाता है, धन चाहता हो तो धन पाता है, विद्याकी अभिलाषा रखता हो तो उसे विद्या प्राप्त होती है और पत्नीकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको पत्नी सुलभ होती है
Siapa yang senantiasa memelihara (membaca/menjunjung) kidung ini setiap hari, atau berulang kali mendengarkannya, akan memperoleh hasil yang diinginkan: yang mendamba putra memperoleh putra; yang mencari harta memperoleh harta; yang menghendaki ilmu memperoleh ilmu; demikian pula, baik laki-laki maupun perempuan, tujuan yang dicari menjadi mudah dicapai.
Verse 77
उभे संध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि । आप प्राप्य मुच्येत बद्धों मुच्येत बन्धनात्,स्त्री हो या पुरुष यदि दोनों संध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करता है तो आपत्तिमें पड़कर भी उससे मुक्त हो जाता है। बन्धनमें पड़ा हुआ मनुष्य बन्धनसे मुक्त हो जाता है
Baik perempuan maupun laki-laki—siapa yang senantiasa melafalkan kidung pujian ini pada kedua sandhyā (fajar dan senja), akan terbebas bahkan ketika tertimpa malapetaka; dan siapa yang terbelenggu akan dilepaskan dari belenggunya.
Verse 78
एतद् ब्रह्मा ददौ पूर्व शक्राय सुमहात्मने । शक्राच्च नारद: प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम् | धौम्याद् युधिष्ठिर: प्राप्प सर्वान् कामानवाप्तवान्,यह स्तुति सबसे पहले ब्रह्माजीने महात्मा इन्द्रको दी, इन्द्रसे नारदजीने और नारदजीसे धौम्यने इसे प्राप्त किया। धौम्यसे इसका उपदेश पाकर राजा युधिष्ठिरने अपनी सब कामनाएँ प्राप्त कर लीं
Kidung pujian ini mula-mula dianugerahkan oleh Brahmā kepada Śakra yang berhati luhur (Indra). Dari Śakra ia sampai kepada Nārada, lalu kemudian kepada Dhaumya. Setelah menerima ajarannya dari Dhaumya, Raja Yudhiṣṭhira meraih terpenuhinya segala hasratnya yang selaras dengan dharma.
Verse 79
संग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्रुयाद् वसु । मुच्यते सर्वपापेभ्य: सूर्यलोक॑ स गच्छति,जो इसका अनुष्ठान करता है वह सदा संग्राममें विजयी होता है, बहुत धन पाता है, सब पापोंसे मुक्त होता और अन्तमें सूर्यलोकको जाता है
Barangsiapa menjalankan laku ini, ia senantiasa menang dalam pertempuran, memperoleh harta berlimpah, terbebas dari segala dosa, dan pada akhirnya mencapai Sūryaloka, alam Sang Surya.
Verse 80
वैशम्पायन उवाच लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित् । जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातृश्च॒ परिषस्वजे,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पूर्वोक्त वर पाकर धर्मके ज्ञाता कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर गंगाजीके जलसे बाहर निकले। उन्होंने धौम्यजीके दोनों चरण पकड़े और भाइयोंको हृदयसे लगा लिया
Vaiśampāyana berkata: Setelah memperoleh anugerah itu, putra Kuntī—Yudhiṣṭhira, yang mengetahui dharma—naik keluar dari air sungai. Dengan hormat ia memegang kaki Dhaumya dan memeluk saudara-saudaranya dengan kasih yang tulus.
Verse 81
द्रौपद्या सह संगम्य वन्द्यमानस्तया प्रभु: । महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डव:,द्रौपदीने उन्हें प्रणाम किया और वे उससे प्रेमपूर्वक मिले। फिर उसी समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने चूल्हेपर बटलोई रखकर रसोई तैयार करायी
Draupadī memberi hormat kepadanya, dan sang Pāṇḍava menyambutnya dengan kasih. Lalu pada saat itu juga Yudhiṣṭhira mengatur pekerjaan dapur—memerintahkan agar periuk diletakkan di atas tungku.
Verse 82
संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम् | अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान्,उसमें तैयार की हुई चार प्रकारकी थोड़ी-सी भी रसोई उस पात्रके प्रभावसे बढ़ जाती और अक्षय हो जाती थी। उसीसे वे ब्राह्मणोंको भोजन कराने लगे
Waiśaṃpāyana berkata: Bahkan sedikit makanan—yang dimasak menurut empat cara yang lazim—oleh daya bejana itu akan berlipat dan menjadi tak habis-habis. Dengan persediaan yang terus bertambah itu mereka mulai menjamu para dwija (brahmana), menunaikan dharma keramahtamahan dan menegakkan dharma melalui pemberian.
Verse 83
भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वानुजानपि । शेषं विघससंतज्ञं तु पश्चाद् भुड्धक्ते युधिष्ठिर:,ब्राह्मणोंक भोजन कर लेनेपर अपने छोटे भाइयोंको भी भोजन करानेके पश्चात् “विघस' संज्ञक अवशिष्ट अन्नको युधिष्ठिर सबसे पीछे खाते थे
Setelah para brahmana selesai makan dan para adik pun telah diberi makan, Yudhiṣṭhira baru menyantap paling akhir sisa makanan yang disebut “vighasa”.
Verse 84
युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती । द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्न॑ क्षयमेति च । एवं दिवाकरात् प्राप्प दिवाकरसमप्रभ:,युधिष्ठिको भोजन कराकर द्रौपदी शेष अन्न स्वयं खाती थी। द्रौपदीके भोजन कर लेनेपर उस पात्रका अन्न समाप्त हो जाता था। इस प्रकार सूर्यसे मनोवांछित वरोंको पाकर उन्हींके समान तेजस्वी प्रभावशाली राजा युधिष्ठिर ब्राह्मणोंको नियमपूर्वक अन्नदान करने लगे। पुरोहितोंको आगे करके उत्तम तिथि, नक्षत्र एवं पर्वोपर विधि और मन्त्रके प्रमाणके अनुसार उनके यज्ञसम्बन्धी कार्य होने लगे
Setelah Yudhiṣṭhira makan, Pārṣatī (Draupadī) menyantap sisanya. Dan begitu Draupadī mulai makan, makanan dalam bejana itu pun habis—seakan ada aturan yang menutup karunia itu setelah kewajiban ditunaikan.
Verse 85
कामान् मनो5भिलषितान् बाह्नाणेभ्योडददात् प्रभु: | पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु । यज्ञियार्था: प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणत:,युधिष्ठिको भोजन कराकर द्रौपदी शेष अन्न स्वयं खाती थी। द्रौपदीके भोजन कर लेनेपर उस पात्रका अन्न समाप्त हो जाता था। इस प्रकार सूर्यसे मनोवांछित वरोंको पाकर उन्हींके समान तेजस्वी प्रभावशाली राजा युधिष्ठिर ब्राह्मणोंको नियमपूर्वक अन्नदान करने लगे। पुरोहितोंको आगे करके उत्तम तिथि, नक्षत्र एवं पर्वोपर विधि और मन्त्रके प्रमाणके अनुसार उनके यज्ञसम्बन्धी कार्य होने लगे
Sang raja (Yudhiṣṭhira) mulai menganugerahkan kepada para brahmana apa pun yang mereka dambakan. Dengan para purohita di depan, pada tithi yang baik, di bawah rasi bintang yang tepat, dan pada hari-hari perayaan, upacara-upacara yajña berlangsung menurut tata-aturan dan kewibawaan mantra.
Verse 86
ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवा: । द्विजसड्घै: परिवृता: प्रययु: काम्यकं वनम्,तदनन्तर स्वस्तिवाचन कराकर ब्राह्मणसमुदायसे घिरे हुए पाण्डव धौम्यजीके साथ काम्यकवनको चले गये
Kemudian, setelah upacara keberkahan dan doa-doa selamat dilaksanakan, para Pāṇḍava—bersama Dhaumya dan dikelilingi rombongan brahmana—berangkat menuju hutan Kāmyaka.
Verse 733
इतश्नतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि | आजसे चौदहवें वर्षमें तुम अपना राज्य पुन: प्राप्त कर लोगे
Setelah empat belas tahun ini berlalu, engkau akan memperoleh kembali kerajaanmu sekali lagi.
Yudhiṣṭhira must sustain and protect learned Brahmins accompanying him despite exile-induced scarcity, lacking both the power to provide and the ethical permission to abandon dependents.
When institutional power is unavailable, ethical leadership can be maintained through self-discipline and lawful practice; the chapter frames tapas and ordered ritual as instruments to uphold social duty without violating Dharma.
Yes. The text states that reciting the Sūrya-stava with concentration at sunrise yields benefits such as prosperity, acquisitions, heightened memory and intellect, and release from grief—positioning the hymn as both devotional and pragmatic.