Srstikhanda
मुनिप्रश्नवर्णनम् (Description of the Sages’ Questions)
अध्याय 1 का आरम्भ मङ्गल-श्लोकों से होता है, जहाँ शिव को सृष्टि-स्थिति-प्रलय के एकमात्र कारण, शुद्ध चैतन्य, माया से परे होकर भी उसके आधार रूप में स्तुति की जाती है। फिर पुराण-परम्परा का संवाद-परिवेश स्थापित होता है—नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषि, विद्योश्वरसंहिता (विशेषतः साध्यसाधन-खण्ड) की शुभ कथा सुनकर, श्रद्धाभक्ति से सूत के पास आते हैं। वे सूत को आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि उनके वचन से ज्ञानामृत की अविरल मधुर धारा बहती है, अतः आगे भी उपदेश करें। व्यास की कृपा से सूत का अधिकार सिद्ध किया जाता है और उन्हें भूत-वर्तमान-भविष्य का ज्ञाता बताया जाता है। इस प्रकार यह अध्याय शिवतत्त्व की महिमा, मुख्य वक्ता-श्रोता का परिचय, तथा भक्तिपूर्वक प्रश्न और सावधान श्रवण को शैव-ज्ञान प्राप्ति का उचित मार्ग बताकर आगामी सृष्ट्युपाख्यान का आधार बनता है।
नारदतपोवर्णनम् (Nārada’s Austerities Described)
इस अध्याय में सूत नारद का वर्णन करते हैं—ब्रह्मा-पुत्र, संयमी और तप में तत्पर। वे वेगवती दिव्य नदी के निकट हिमालय की उत्तम गुफा-भूमि खोजकर एक तेजस्वी, अलंकृत आश्रम में पहुँचते हैं और दीर्घ तप करते हैं—स्थिर आसन, मौन, प्राणायाम और बुद्धि-शुद्धि। अंततः “अहं ब्रह्म” के अद्वैत भाव से समाधि में स्थित होकर ब्रह्म-साक्षात्कार की ओर उन्मुख ज्ञान प्राप्त करते हैं। उनके तप की तीव्रता से लोकों में क्षोभ होता है; शक्र/इन्द्र भयभीत होकर इसे अपने ऐश्वर्य के लिए संकट मानते हैं और विघ्न हेतु कामदेव (स्मर) को बुलाकर नारद की एकाग्रता भंग करने के लिए काम-शक्ति लगाने को कहते हैं।
नारदमोहवर्णनम् — Description of Nārada’s Delusion
अध्याय 3 संवाद से आरम्भ होता है। ऋषि पूछते हैं कि विष्णु के चले जाने के बाद क्या हुआ और नारद कहाँ गए। व्यास के माध्यम से सूत बताते हैं कि शिव की इच्छा से मायाविद विष्णु ने तुरंत एक अद्भुत माया रची। मुनियों के मार्ग में एक विशाल, मनोहर नगरी प्रकट होती है—अनेक वैभवों से युक्त, स्त्री-पुरुषों से भरी और चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था सहित पूर्ण समाज-रूप। वहाँ धनवान और शक्तिशाली राजा शीलनिधि अपनी पुत्री के स्वयंवर का महान उत्सव कर रहा होता है। चारों दिशाओं से सुसज्जित राजकुमार वधू पाने की आकांक्षा से आते हैं। यह चमत्कार देखकर नारद मोहित हो जाते हैं; जिज्ञासा और कामना बढ़ने पर वे राजा के द्वार की ओर बढ़ते हैं—जहाँ माया, आकर्षण और अहं-शिक्षा का धर्मोपदेश आगे खुलता है।
नारदस्य विष्णूपदेशवर्णनम् — Nārada and Viṣṇu: Instruction after Delusion
अध्याय 4 में सृष्ट्युपाख्यान आगे बढ़ता है और विमोहित नारद का प्रसंग आता है। शिव के गणों को उचित शाप देने के बाद भी शिवेच्छा से वे अभी जाग्रत नहीं होते; वे हरि द्वारा किए गए छल को स्मरण कर असह्य क्रोध में विष्णुलोक जाते हैं। वहाँ वे विष्णु पर द्वैतभाव और जगत् को मोहित करने की शक्ति का आरोप लगाते हुए मोहिनी-प्रसंग तथा असुरों को अमृत के स्थान पर वारुणी बाँटने की बात कहकर कठोर वचन बोलते हैं। इस संवाद से माया का शासन स्पष्ट होता है—दैवी युक्तियाँ नैतिक अराजकता नहीं, बल्कि उच्च शैव-संकल्प के अधीन नियंत्रित लीला हैं। आगे का भाग विष्णु के उपदेश की ओर उन्मुख है, जो नारद की प्रतिक्रियात्मक बुद्धि को शान्त कर क्रोध हरता है और देवताओं की भूमिकाएँ तथा सृष्टि-व्यवस्था में मोह के प्रयोजन को स्पष्ट करता है।
नारदप्रश्नवर्णन (Nāradapraśna-varṇana) — “Account of Nārada’s Inquiry”
इस अध्याय में सूत कहते हैं कि हरि (विष्णु) के अंतर्धान होने पर नारद पृथ्वी पर विचरते हुए अनेक शिव-रूपों और शिवलिंगों का दर्शन करते हैं, जिन्हें भुक्ति और मुक्ति देने वाला बताया गया है। वहीं दो शिवगण उन्हें पहचानकर श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं, उनके चरण पकड़ते हैं और पूर्व शाप से मुक्ति की याचना करते हैं। वे बताते हैं कि वे मूलतः अपराधी नहीं हैं; राजा की कन्या के स्वयंवर में माया-मोह से उनसे त्रुटि हुई थी। वे नारद के शाप को भी परमेश्वर की प्रेरणा मानते हैं और फल को अपना स्वकर्म-फल स्वीकारते हैं, किसी पर दोष नहीं रखते। उनकी भक्तिपूर्ण वाणी सुनकर नारद स्नेह सहित पश्चात्ताप करते हैं और अनुग्रह का मार्ग खोलते हैं; इस प्रकार कर्म-उत्तरदायित्व, ईश्वरीय व्यवस्था और नम्रता से होने वाला मेल, तथा लिंग-दर्शन की पवित्रता प्रतिपादित होती है।
विष्णूत्पत्तिवर्णनम् (Description of the Origin/Manifestation of Viṣṇu)
अध्याय 6 में ब्रह्मा लोक-कल्याण हेतु किए गए पुण्य प्रश्न का उपदेशात्मक उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि इस कथा-श्रवण से समस्त पापों का नाश होता है और वे ‘अनामय’ निर्दोष शिव-तत्त्व का निरूपण करेंगे। फिर प्रलय की अवस्था वर्णित है—चराचर जगत् के लय होने पर सब कुछ तमोमय हो जाता है; सूर्य-चन्द्र, दिन-रात, अग्नि, वायु, पृथ्वी और जल का भी अभाव रहता है। आगे निषेध-मार्ग से कहा गया है कि वहाँ दृश्य गुण नहीं, शब्द-स्पर्श नहीं, गन्ध-रूप अव्यक्त हैं, रस नहीं और दिशाओं का भी बोध नहीं। ब्रह्मा स्वीकार करते हैं कि शिव-तत्त्व को ब्रह्मा और विष्णु भी यथार्थतः पूर्ण रूप से नहीं जान सकते। वह मन-वाणी से परे, नाम-रूप-वर्ण से रहित, न स्थूल न सूक्ष्म है; योगी उसे अंतः-आकाश में अनुभव करते हैं। इसी दिव्य पृष्ठभूमि में, उपसंहार के अनुसार, विष्णु के प्रादुर्भाव का वर्णन आता है—अव्यक्त प्रलय से क्रमबद्ध सृष्टि की ओर संक्रमण में शिवाधार से विष्णु का प्रकट होना।
विष्णु-ब्रह्म-विवाद-वर्णनम् (Description of the Viṣṇu–Brahmā Dispute and Brahmā’s Confusion)
अध्याय 7 में निद्रित नारायण की नाभि से उत्पन्न पद्म से ब्रह्मा के प्राकट्य का वर्णन है। वह कमल अपरिमेय और तेजस्वी बताया गया है, जो सृष्टि के विराट विस्तार का संकेत है। चतुर्मुख हिरण्यगर्भ ब्रह्मा स्वयं को पहचानते हुए भी स्वीकार करते हैं कि माया के प्रभाव से वे कमल से परे अपने जनक को नहीं जान पाते; वे अपने स्वरूप, उद्देश्य और उत्पत्ति पर प्रश्न करते हैं। यह भ्रम महेश्वर की लीला-रूप मायामोहन से उत्पन्न बताया गया है। अध्याय का संदेश है कि उच्च देवता भी कारण-क्रम और श्रेष्ठता के विषय में संशयग्रस्त हो सकते हैं; सत्य ज्ञान मोह-निवृत्ति और परम तत्त्व की पहचान से ही होता है। इसी अज्ञान को आगे होने वाले विवाद का मूल कहा गया है।
शब्दब्रह्मतनुवर्णनम् — Description of the Form of Śabda-Brahman
इस अध्याय में शब्द (नाद) को ब्रह्म/शिव का प्रकाशक रूप मानकर उसका तात्त्विक वर्णन किया गया है। ब्रह्मा कहते हैं कि दीनों पर करुणा करने वाले और अहंकार का नाश करने वाले शम्भु, देवों के दर्शन-प्रार्थना के प्रसंग में प्रकट होते हैं। तभी ‘ॐ’ का स्पष्ट, दीर्घ (प्लुत) नाद उत्पन्न होता है। विष्णु उस महान ध्वनि में ध्यान लगाकर उसका स्रोत खोजते हैं और लिङ्ग के संदर्भ में ओंकार के अकार, उकार, मकार तथा अन्त्य नाद को देखते हैं। सूर्य-मण्डल, अग्नि-तेज, चन्द्र-शीतल प्रभा और स्फटिक-शुद्धि जैसी उपमाओं से वर्ण, दिशा और तत्त्व-क्रम समझाया गया है। अंत में तुरीयातीत, निर्मल, निष्कल, निःक्षोभ परतत्त्व का निरूपण है—अद्वैत, शून्यवत्, बाह्य-आन्तरिक भेद से परे, फिर भी दोनों का आधार।
शिवतत्त्ववर्णनम् (Śiva-tattva-varṇana) — “Description/Exposition of the Principle of Śiva”
अध्याय 9 में शिव की कृपामय आत्म-प्रकटता और प्रमाणिक ज्ञान-प्रदान का वर्णन है। ब्रह्मा कहते हैं कि महादेव परम प्रसन्न होकर करुणानिधि रूप में प्रकट होते हैं—पंचवक्त्र, त्रिनेत्र, जटाधारी, भस्म-विभूषित देह, आभूषणों से सुशोभित तथा बहुभुज; यह रूप केवल अलंकार नहीं, अपितु दिव्य रहस्य का प्रकाश है। विष्णु ब्रह्मा सहित स्तुति करके श्रद्धापूर्वक शिव के समीप जाते हैं। तब शिव अपने ‘श्वास-रूप’ से निगम प्रदान करते हैं और विष्णु को ज्ञान उपदेश देते हैं; ब्रह्मा भी आगे उसी परमात्मा से ज्ञान प्राप्त करते हैं—इस प्रकार प्रकाशन को अनुग्रह-आधारित बताया गया है। आगे विष्णु पूछते हैं कि शिव को कैसे प्रसन्न करें, उनकी विधिवत पूजा व ध्यान कैसे हो, उन्हें अनुकूल/वश्य कैसे किया जाए, और शिव की आज्ञा से कौन-से कर्म करने योग्य हैं—जिससे शिवतत्त्व पर आधारित शैव साधना का विधान स्थापित होता है।
रुद्र-विष्णोः ऐकत्व-उपदेशः तथा धर्म-आज्ञा (Instruction on Rudra–Viṣṇu Unity and Divine Injunctions)
इस अध्याय में परमेश्वर रुद्र शिव विष्णु को जगत्-प्रशासन और भक्ति-धर्म के नियम बताते हैं। वे आदेश देते हैं कि विष्णु तीनों लोकों में पूज्य रहें और ब्रह्मा की सृष्टि में जब दुःख बढ़े तब दृढ़ता से कार्य कर समष्टि-पीड़ा का निवारण करें। शिव कठिन कार्यों और प्रबल शत्रुओं के दमन में सहायता का वचन देते हैं तथा धर्म-कीर्ति के विस्तार और प्राणियों के तारण हेतु विष्णु को विविध अवतार धारण करने को कहते हैं। मुख्य सिद्धान्त यह है कि रुद्र और हरि एक-दूसरे के ध्येय हैं और उनके बीच वास्तविक भेद नहीं—तत्त्वतः, वरदान से और क्रीड़ा में भी—ऐक्य ही है। साथ ही नियम है कि जो रुद्र-भक्त विष्णु की निन्दा करते हैं वे पुण्य खोकर शिवाज्ञा से नरकगामी होते हैं; विष्णु भोग-मोक्ष देने वाले हैं, भक्तों द्वारा पूज्य हैं और धर्म-रक्षा में निग्रह व अनुग्रह दोनों करते हैं।
लिङ्गपूजनसंक्षेपः (Concise Teaching on Liṅga Worship / Śiva-arcana-vidhi)
अध्याय 11 में ऋषि सूत से शैव-कथा की पावन शक्ति की प्रशंसा करते हैं और विशेषतः लिङ्गोत्पत्ति की अद्भुत, मंगल कथा का स्मरण करते हैं, जिसके श्रवण से दुःख दूर होता है। वे ब्रह्मा–नारद संवाद की कड़ी में शिवार्चन-विधि का स्पष्ट उपदेश चाहते हैं—शिव को कैसे पूजें कि वे प्रसन्न हों; प्रश्न में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी वर्ण सम्मिलित हैं। सूत इसे ‘रहस्य’ बताकर जैसा सुना-समझा है वैसा कहने का वचन देते हैं और परंपरा स्थापित करते हैं—व्यास ने सनत्कुमार से पूछा, उपमन्यु ने सुना, कृष्ण ने जाना, और ब्रह्मा ने पहले नारद को सिखाया। फिर ब्रह्मा की वाणी आती है कि लिङ्ग-पूजन इतना विशाल है कि सौ वर्षों में भी पूरा न कहा जा सके, इसलिए वे इसे संक्षेप में बताएँगे। इस प्रकार अध्याय श्रवण की उद्धारकता, परंपरा-प्रमाण और लिङ्ग-पूजा की संक्षिप्त किन्तु अधिकारपूर्ण रूपरेखा प्रस्तुत करता है।
सेवातत्त्वप्रश्नः — The Question of Whom to Serve (Sevā) for the Removal of Suffering
इस अध्याय में नारद शिवनिष्ठ प्रजापति ब्रह्मा की स्तुति करके उनसे विस्तृत उपदेश माँगते हैं। ब्रह्मा पूर्व प्रसंग बताते हैं—वे ऋषियों और देवताओं को साथ लेकर क्षीरसागर के तट पर, भगवान विष्णु के परम धाम में जाते हैं। वहाँ विष्णु शिव के चरणकमलों का स्मरण करते हुए ब्रह्मा और सुर-ऋषियों से आगमन का कारण पूछते हैं। देवगण हाथ जोड़कर प्रश्न करते हैं—‘दुःख-नाश के लिए किसकी नित्य-सेवा करनी चाहिए?’ भक्तवत्सल विष्णु करुणापूर्वक सच्ची सेवा-भक्ति के लक्षण, उसके फल और मुक्ति-दायक तत्त्व का निरूपण करते हुए शिव-परायणता का संकेत देते हैं।
पूजाविधिः (Pūjā-vidhiḥ) — The Supreme Procedure of Worship (Morning Observances)
अध्याय 13 में ब्रह्मा एक ‘अतुल्य’ पूजाविधि बताते हैं जो सभी अभीष्ट फल और सुख देने वाली है। क्रमशः प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में उठकर साम्बक शिव का स्मरण, जगत्-कल्याण हेतु जागरण-प्रार्थना, और अपनी नैतिक असमर्थता निवेदित कर महादेव के हृदयस्थ नियोग को ही आश्रय मानने का उपदेश है। फिर शौचाचार—गुरु-पाद स्मरण, उचित दिशा में मल-मूत्र त्याग, मिट्टी और जल से शुद्धि, हाथ-पैर धोना, दंतधावन तथा बार-बार आचमन—विधिपूर्वक कहा गया है। कुछ तिथियों/वारों में दंतधावन वर्जित है और श्राद्ध, संक्रांति, ग्रहण, तीर्थ, उपवास आदि अवसरों में देश-कालानुसार नियम बताए गए हैं। इस प्रकार पूजा का आरम्भ औपचारिक अर्पण से पहले ही स्मरण, शुद्धि और शुभ काल-नियमों के अनुशासन से माना गया है।
पुष्पार्पण-विनिर्णयः (Determination of Flower-Offerings to Śiva)
अध्याय 14 में ऋषि सूत से पूछते हैं कि शिव-पूजा में किन-किन पुष्पों का अर्पण किस फल से प्रमाणिक रूप से जुड़ा है। सूत बताते हैं कि यह पुष्पार्पण-विनिर्णय पहले नारद के प्रश्न पर ब्रह्मा ने कहा था, इसलिए यह परंपरा-प्रमाण से स्थापित है। आगे कमल, बिल्वपत्र, शतपत्र, शंखपुष्प आदि पुष्प-द्रव्यों का क्रमशः उल्लेख और उनके फल—लक्ष्मी/समृद्धि, पाप-नाश, तथा लक्ष-आदि बड़ी संख्या में अर्पण करने पर विशेष फल—बताए जाते हैं। प्रस्थ, पल, टंक आदि मानों द्वारा पुष्प-परिमाण की गणना और समताएँ देकर विधि को मानकीकृत किया गया है। साथ ही लिंग-पूजा, अक्षत/तंडुल, चंदन-लेप, जलधारा-अभिषेक आदि पूजांगों का संकेत देकर दिखाया गया है कि पुष्पार्पण व्यापक शिव-पूजा-विधान का अंग है। समग्रतः यह अध्याय द्रव्य, मान और भाव के अनुसार काम्य फल से लेकर शिवाभिमुख निष्कामता तक के लाभों का निर्देश करता है।
हंस-वराह-रूपग्रहण-कारणम् (The Reason for Assuming the Swan and Boar Forms)
अध्याय 15 लिङ्ग-प्रसंग के बाद की कथा को आगे बढ़ाता है। नारद ब्रह्मा से पहले सुनी हुई शैव-शुद्धि देने वाली कथा की प्रशंसा करके पूछते हैं कि आगे क्या हुआ और सृष्टि की विधि क्या रही। ब्रह्मा बताते हैं कि जब नित्य-शिव-स्वरूप भगवान शिव अंतर्धान हो गए, तब उन्हें और विष्णु को विशेष हर्ष व शांति मिली। फिर लोकों की सृष्टि और शासन के संकल्प से ब्रह्मा ने हंस-रूप और विष्णु ने वराह-रूप धारण किया। नारद का प्रश्न उठता है कि अन्य रूप छोड़कर यही रूप क्यों? सूत के माध्यम से ब्रह्मा उत्तर देते हैं—पहले शिव-पादों का स्मरण कर, हंस के ऊर्ध्वगामी स्थिर स्वभाव और तत्त्व-अतत्त्व विवेक (दूध-पानी अलग करने की उपमा) को कारण बताते हैं। अध्याय दिखाता है कि देव-रूप सृष्टि-कार्य और आध्यात्मिक संकेतों के वाहक हैं तथा शिव की प्रधानता को पुष्ट करते हैं।
सृष्टिक्रमवर्णनम् / Description of the Sequence of Creation
इस अध्याय में ब्रह्मा नारद से सृष्टि और व्यवस्था का क्रम बताते हैं। वे शब्दादि सूक्ष्म तत्त्वों से पञ्चीकरण द्वारा आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी की स्थूल उत्पत्ति, फिर पर्वत, समुद्र, वृक्ष आदि तथा कला और युगों के द्वारा काल-रचना का वर्णन करते हैं। इतना करके भी असंतोष होने पर वे साम्ब शिव का ध्यान करते हैं; तब नेत्र, हृदय, शिर और प्राण आदि से साधक तथा प्रमुख ऋषियों की सृष्टि करते हैं। संकल्प से धर्म प्रकट होता है जो समस्त साधना का साधन है; ब्रह्मा की आज्ञा से वह मानव रूप धारण कर साधकों द्वारा फैलता है। आगे ब्रह्मा विविध अंगों से अनेक प्रजाएँ उत्पन्न कर उन्हें देव-असुर आदि भिन्न देहों में नियोजित करते हैं। अंत में शंकर की अंतःप्रेरणा से वे अपने शरीर को विभाजित कर द्विरूप होते हैं, जिससे शिवाधीन विभेदयुक्त सृजन-प्रवृत्ति का संकेत मिलता है।
कैलासगमनं कुबेरसख्यं च — Śiva’s Journey to Kailāsa and His Friendship with Kubera
अध्याय 17 संवाद-रूप में है। सूत बताते हैं कि ब्रह्मा के पूर्व वचन सुनकर नारद फिर आदरपूर्वक पूछते हैं—शंकर का कैलास आगमन कैसे हुआ, कुबेर (धनद) से उनकी मित्रता किन कारणों से हुई, और वहाँ पूर्ण शुभ शिवाकृति में भगवान ने क्या किया। ब्रह्मा यह प्रसंग कहने को तैयार होकर पहले पृष्ठभूमि देते हैं—कांपिल्य नगर में यज्ञदत्त नामक विद्वान दीक्षित रहते थे, वेदकर्म और वेदाङ्गों में निपुण, दानी और प्रतिष्ठित। उनका पुत्र गुणनिधि उपनयन आदि से शिक्षित होकर भी गुप्त रूप से जुए में पड़ गया, बार-बार माता का धन लेता और जुआरियों की संगति करता रहा। इस प्रकार अध्याय धर्म-विद्या के विपरीत छिपे हुए पाप, धन-हानि और आगे चलकर कुबेर-शिव संबंध को कर्म और भक्ति की दृष्टि से समझाने की भूमिका बनाता है।
दीक्षितपुत्रस्य दैन्यचिन्ता तथा शिवरात्र्युपासनाप्रसङ्गः / The Initiate’s Son in Distress and the Occasion of Śivarātri Worship
अध्याय 18 में ब्रह्मा नारद को दीक्षितपुत्र (दीक्षिताङ्गज) की कथा सुनाते हैं। पूर्व जन्म/पूर्व वृत्तांत सुनकर वह अपने पुराने आचरण की निंदा करता है और अनजान दिशा में निकल पड़ता है। कुछ दूर जाकर जीविका और मान-प्रतिष्ठा की चिंता से वह निराश और जड़-सा हो जाता है; पढ़ाई का अभाव और धन की कमी याद कर, धन रखने में चोरों का भय और धन न होने की असुरक्षा—दोनों पर विचार करता है। याजक कुल में जन्म लेकर भी घोर दुर्भाग्य पाने पर वह विलाप करता है और मानता है कि विधि/भाग्य कर्म के अनुसार भविष्य को बाँधता है। वह ठीक से भीख भी नहीं माँग पाता, आसपास कोई परिचित नहीं, कोई आश्रय नहीं; इस स्थान पर मातृ-स्नेह भी दूर लगता है। वृक्ष के नीचे संध्या तक सोचते हुए कथा में एक विपरीत दृश्य आता है—नगर से निकलता एक माहेश्वर भक्त, लोगों के साथ, उपहार लेकर, शिवरात्रि का उपवास रखकर ईशान की पूजा हेतु जा रहा है। इस प्रकार मानव असहायता के सामने शिव-व्रत और पूजा को आश्रय, पुण्य और जीवन-परिवर्तन का साधन दिखाया गया है।
अलकापतेः तपः-लिङ्गप्रतिष्ठा च वरप्राप्तिः / The Lord of Alakā: Austerity, Liṅga-Establishment, and the Receiving of a Boon
अध्याय 19 में ब्रह्मा पूर्वकल्प का प्रसंग सुनाते हैं और अलकापति (वैश्रवण/कुबेर) की भक्ति का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। पद्मकल्प में पुलस्त्य से विश्रवा और उनसे वैश्रवण उत्पन्न हुए; विश्वकर्मा-निर्मित अलका नगरी उसका राज्य-भोग्य स्थान बताई गई है। इसके बाद अलकापति त्र्यम्बक शिव को प्रसन्न करने हेतु अत्यन्त घोर तप करता है और भक्ति की प्रभावशीलता दिखाते हुए काशी (चित्प्रकाशिका) की ओर अग्रसर होता है। साधना में भीतर शिव का बोधन, अनन्य भक्ति, स्थिर ध्यान, काम-क्रोध का त्याग और तपो-अग्नि से शुद्ध होकर शिवैक्य-भाव का विकास वर्णित है। वह शांभव लिंग की स्थापना कर सद्भाव-रूपी पुष्पों से पूजन करता है। दीर्घ तप के फलस्वरूप विश्वेश्वर प्रकट होकर वरदाता रूप में उसे वर मांगने को कहते हैं; इस प्रकार लिंग-प्रतिष्ठा, ध्यान और वैराग्य से दर्शन व वर-प्राप्ति की परंपरा स्थापित होती है।
शिवागमन-नाद-समागमः (Śiva’s Advent, the Drum-Sound, and the Cosmic Assembly)
इस अध्याय में ब्रह्मा नारद को कुबेर के प्रसंग से जुड़ा कैलास में शिव के आगमन का आदर्श वृत्तांत सुनाते हैं। विश्वेश्वर शिव कुबेर को निधियों के स्वामी होने का वर देकर अपने प्राकट्य का विचार करते हैं—रुद्र ब्रह्मा के हृदय से उत्पन्न पूर्ण अंश हैं, निर्मल और परम तत्त्व से अभिन्न; विष्णु और ब्रह्मा जिनकी सेवा करते हैं, पर वे दोनों से परे हैं। रुद्र उसी रूप में कैलास जाने, कुबेर-क्षेत्र के संबंध में महान तप करने और मित्रभाव से निवास करने का निश्चय करते हैं। फिर वे ढक्के का घन-गंभीर, अद्भुत नाद करते हैं जो आह्वान और प्रेरणा बन जाता है। उसे सुनकर विष्णु, ब्रह्मा, देव, मुनि, सिद्ध, आगम-निगम के मूर्त रूप, तथा सुर-असुर और विविध स्थानों के प्रमथ-गण उत्सव-सा भाव लेकर एकत्र होते हैं। आगे गणों की संख्या और उनकी महत्ता का वर्णन कर शिव-परिवार की विराटता प्रकट की जाती है।