Kumarakhanda
शिवविहारवर्णनम् (Śivavihāra-varṇana) — “Description of Śiva’s Divine Pastimes/Sojourn”
अध्याय 1 में कुमारखण्ड का आरम्भ मङ्गलाचरण और शिव-स्तुति से होता है। शिव को पूर्ण, सत्यस्वरूप तथा विष्णु और ब्रह्मा द्वारा वन्दित बताया गया है। फिर संवाद-प्रसंग में नारद ब्रह्मा से पूछते हैं—गिरिजा-विवाह के बाद शंकर पर्वत पर लौटकर क्या करते थे, परमात्मा के यहाँ पुत्र कैसे उत्पन्न हुआ, आत्माराम भगवान ने विवाह क्यों किया, और तारक का वध कैसे हुआ। ब्रह्मा ‘दिव्य रहस्य’ गुह्य-जन्म-कथा सुनाने का वचन देते हैं, जिसका फल तारकासुर के धर्मयुक्त विनाश में होता है। वे कहते हैं कि यह कथा पाप-नाशिनी, विघ्न-विनाशिनी, मङ्गल-प्रदा और कर्म-मूल काटने वाली मोक्ष-बीज है; श्रद्धापूर्वक श्रवण से श्रोता का कल्याण होता है।
शिवपुत्रजननवर्णनम् — Description of the Birth/Manifestation of Śiva’s Son
इस अध्याय में ब्रह्मा कहते हैं कि महादेव योगविद्या के स्वामी और काम-त्यागी होकर भी पार्वती को अप्रसन्न करने के भय और सम्मानवश दाम्पत्य-संयोग का त्याग नहीं करते। फिर भक्तवत्सल शिव, दैत्यपीड़ित देवों पर विशेष करुणा करके, उनके द्वार पर आते हैं। शिव को देखकर विष्णु और ब्रह्मा सहित देवगण प्रसन्न होकर स्तुति करते हैं और तारक आदि दैत्यों के विनाश तथा देव-रक्षा की प्रार्थना करते हैं। शिव सिद्धान्त रूप से कहते हैं कि जो भावी है वह अवश्य होगा, उसे रोका नहीं जा सकता। तत्पश्चात वे बताते हैं कि उनका विसर्जित/विस्थापित वीर्य-तेज प्रकट हो चुका है और अब प्रश्न यह है कि उसे कौन धारण करेगा। इस प्रकार देव-संकट, शिव की करुणा और दिव्य पुत्र के प्राकट्य की कारण-श्रृंखला स्थापित होती है।
कार्तिकेयलीलावर्णनम् (Narration of Kārttikeya’s Divine Play)
इस अध्याय में नारद के प्रश्न पर ब्रह्मा आगे की कथा कहते हैं। विधि-प्रेरित विश्वामित्र शिव के तेजस्वी पुत्र के अलौकिक धाम में समय पर पहुँचते हैं; दर्शन से वे पूर्णकाम, हर्षित होकर प्रणाम और स्तुति करते हैं। शिवसुत बताते हैं कि यह मिलन शिवेच्छा से हुआ है और वैदिक विधि से संस्कार कराने का अनुरोध करते हैं; उसी दिन से वे विश्वामित्र को अपना पुरोहित नियुक्त कर चिरसम्मान और सर्वत्र पूज्यता का वर देते हैं। विश्वामित्र विस्मित होकर कहते हैं कि वे जन्म से ब्राह्मण नहीं, गाधि-वंश के क्षत्रिय हैं, ‘विश्वामित्र’ नाम से प्रसिद्ध और ब्राह्मण-सेवा में तत्पर हैं। अध्याय में दिव्य-दर्शन, स्तुति, कर्म-वैधता और वर्ण/अधिकार का सूक्ष्म निरूपण जुड़ता है।
कार्त्तिकेयान्वेषण-नन्दिसंवाद-वर्णनम् (Search for Kārttikeya and the Nandī Dialogue)
इस अध्याय में संवाद-क्रम है। नारद ब्रह्मा से पूछते हैं कि कृत्तिकाओं द्वारा शिव-पुत्र को उठा ले जाने के बाद आगे क्या हुआ। ब्रह्मा बताते हैं कि समय बीतता है और हिमाद्रि-कन्या पार्वती (दुर्गा) इस घटना से अनजान रहती हैं; फिर वे चिंतित होकर शिव से शिव-वीर्य की गति के विषय में प्रश्न करती हैं—वह गर्भ में न जाकर पृथ्वी पर क्यों गिरा, कहाँ गया, और अव्यय शक्ति कैसे छिपी या व्यर्थ-सी प्रतीत हो सकती है। जगदीश्वर महेश्वर शांत भाव से देवताओं और ऋषियों की सभा बुलाकर पार्वती के प्रश्नों का समाधान कराने का निश्चय करते हैं। शीर्षक के अनुसार कथा ‘कार्त्तिकेय-अन्वेषण’ और ‘नन्दी-संवाद’ की ओर बढ़ती है, जहाँ कार्त्तिकेय की स्थिति तथा दिव्य ऊर्जा के गूढ़ होने और प्रकट होने का तात्त्विक कारण स्पष्ट होता है।
कुमाराभिषेकवर्णनम् — Description of Kumāra’s Abhiṣeka (Consecration/Installation)
इस अध्याय में ब्रह्मा पार्वती के आदेश से विश्वकर्मा द्वारा निर्मित विशाल, अनेक-चक्र, मनोवेग से चलने वाला दिव्य रथ देखते हैं, जो श्रेष्ठ परिचारकों से घिरा है। भक्तभाव से अनन्त हृदय-विह्वल होकर उस पर चढ़ता है। परमेश्वर की शक्ति से उत्पन्न परमबुद्धिमान कुमार/कार्त्तिकेय प्रकट होते हैं। शोकाकुल, अस्त-व्यस्त कृत्यिकाएँ आकर उनके प्रस्थान को मातृधर्म का भंग बताकर रोकती हैं; स्नेह से पाले पुत्र के वियोग में विलाप करती हुई वे उन्हें वक्ष से लगाकर मूर्छित हो जाती हैं। कुमार अध्यात्म-उपदेश देकर उन्हें जगाते और सांत्वना देते हैं, वियोग को अंतर्ज्ञान और दैवी व्यवस्था के रूप में समझाते हैं। फिर कृत्यिकाओं और शिवगणों सहित वे रथ पर आरूढ़ होकर मंगल दृश्य-ध्वनियों के बीच पिता के धाम को प्रस्थान करते हैं, जिससे उनके अभिषेक और औपचारिक मान्यता की भूमिका बनती है।
कुमाराद्भुतचरितवर्णनम् — Description of Kumāra’s Wondrous Deeds
अध्याय 6 में ब्रह्मा नारद को एक प्रसंग सुनाते हैं। एक ब्राह्मण (नारद नाम से) कुमार/कार्त्तिकेय/गुह के चरणों में शरण लेकर उनकी करुणा और जगदीश्वरता का स्तवन करता है। वह बताता है कि उसने अजमेध-अध्वर (छाग-यज्ञ) आरम्भ किया था, पर बँधा हुआ बकरा बंधन तोड़कर भाग गया; बहुत खोज के बाद भी नहीं मिला, जिससे यज्ञभंग और फल-नाश का भय है। वह कहता है कि आपके संरक्षण में यज्ञ विफल नहीं होना चाहिए; आपके सिवा कोई शरण नहीं, आप देवताओं द्वारा पूजित और हरि-ब्रह्मा आदि द्वारा स्तुत हैं। अंत में वह यज्ञ की पूर्णता हेतु कुमार से कृपा-पूर्वक हस्तक्षेप की प्रार्थना करता है, जिससे आगे उनके अद्भुत पराक्रम का प्रसंग बनता है।
युद्धप्रारम्भवर्णनम् — Description of the Commencement of Battle
इस अध्याय में देवगण शिव की प्रभावी दिव्य नीति और कुमार के तेजोवर्धन को देखकर पुनः आत्मविश्वास से भर उठते हैं। वे कुमार को अग्रभाग में रखकर उसे अभियान का रण-नीतिक तथा पावन केंद्र बनाते हुए सेना को सजाते हैं। देवों की तैयारी सुनते ही तारक विशाल बल के साथ तुरंत प्रतिमोर्चा लेकर युद्ध हेतु बढ़ता है। उसकी शक्ति देखकर देवगण गर्जना कर उत्साह प्रकट करते हैं। तभी शंकर-प्रेरित व्योमवाणी होती है कि ‘कुमार को आगे रखोगे तो विजय निश्चित है’; इस प्रकार युद्ध को शिव-नियंत्रित धर्मयुद्ध के रूप में स्थापित किया जाता है।
देवदैत्यसामान्ययुद्धवर्णनम् — Description of the General Battle Between Devas and Daityas
इस अध्याय में देवों और दैत्यों/असुरों के बीच घोर सामान्य युद्ध का वर्णन है। ब्रह्मा नारद से कहते हैं कि दैत्यों की प्रबल शक्ति और तेज के सामने देवगण उलटफेर झेलते हैं; वज्रधर इन्द्र आहत होकर संकट में पड़ते हैं, अन्य लोकपाल और देव भी शत्रु-तेज सह न सककर पराजित होकर भागने लगते हैं। असुर सिंहनाद जैसे जयघोष कर रण-कोलाहल मचाते हैं। इसी मोड़ पर शिवकोपोद्भव वीरभद्र अपने वीर गणों सहित प्रकट होकर तारक का सीधे सामना करता है और युद्ध के लिए सज्ज हो जाता है, जिससे देव-पराजय की धारा शिव-पक्षीय प्रत्याक्रमण में बदलती है। यह अध्याय संक्रमणकारी है—असुर-प्राबल्य, मुख्य विरोधी तारक, और शैव सुधारक वीरभद्र का प्रवेश स्थापित करता है।
तारकवाक्य-शक्रविष्णुवीरभद्रयुद्धवर्णनम् — Account of Tāraka’s declarations and the battle involving Śakra (Indra), Viṣṇu, and Vīrabhadra
इस अध्याय में तारकासुर के कारण देवताओं पर आए संकट को ब्रह्मा के वर-नियम के अधीन बताया गया है। ब्रह्मा गुह (पार्वतीसुत, शिवसुत) से कहते हैं कि ब्रह्मा के दिए वर के कारण विष्णु तारक का वध नहीं कर सकते, इसलिए विष्णु-तारक का युद्ध निष्फल है। तारक का संहार करने में केवल गुह ही समर्थ हैं; उनका प्राकट्य भी शंकर से विशेषतः तारक-विनाश हेतु हुआ है। ब्रह्मा गुह को न बालक न केवल युवक, बल्कि कार्यतः स्वामी-ईश्वर और पीड़ित देवों के रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं और शीघ्र तैयारी का आदेश देते हैं। तारक के तपोबल से इन्द्र और लोकपालों की पराजय तथा विष्णु की असमर्थता का वर्णन है। गुह के आगमन से देव पुनः युद्ध में प्रवृत्त होते हैं; ब्रह्मा की आज्ञा है—‘पापपुरुष’ तारक का वध कर त्रैलोक्य को फिर सुखी करो। यह रुद्रसंहिता के कुमारखण्ड का नवम अध्याय है।
तारक-कुमार-युद्धवर्णनम् / Description of the Battle between Tāraka and Kumāra
इस अध्याय में तारक-वध प्रसंग का युद्ध और अधिक तीव्र होता है। ब्रह्मा बताते हैं कि कुमार वीरभद्र को रोककर शिव के कमल-चरणों का स्मरण करते हुए तारक के वध का संकल्प करते हैं। कार्तिकेय की रण-तत्परता, गर्जना, क्रोध और सेना का विस्तार दिखाया गया है; देवता और ऋषि जयघोष व स्तुतियों से उनका अभिनन्दन करते हैं। यह संग्राम निजी द्वन्द्व नहीं, अपितु समस्त जगत को भयभीत करने वाला महायुद्ध बनकर उभरता है। दोनों वीर शक्तिशस्त्रों से परस्पर प्रहार करते हैं; वैतालिक और खेचर आदि विधियों, मंत्रों तथा युक्तियों का भी उल्लेख आता है। सिर, ग्रीवा, जंघा, घुटने, कटि, वक्ष और पीठ आदि अनेक अंगों पर आघात-प्रतिआघात से समबल, दीर्घ और घोर द्वन्द्व चलता है, जो आगे की कथा-समाधि की भूमिका बनता है।
क्रौञ्चशरणागमनम् तथा बाणासुरवधः (Krauñca Seeks Refuge; Slaying of Bāṇāsura)
इस अध्याय में ब्रह्मा बताते हैं कि बाण से विद्ध और पीड़ित क्रौञ्च पर्वत कुमार (स्कन्द) की शरण में आता है। वह विनयपूर्वक निकट जाकर स्कन्द के कमल-चरणों में प्रणाम करता है और उन्हें देवेश तथा तारकासुर-नाशक कहकर स्तुति करता हुआ बाणासुर से रक्षा की याचना करता है। भक्त-पालक स्कन्द प्रसन्न होकर अपनी अनुपम शक्ति धारण करते हैं और मन से शिव का स्मरण कर, शिव की आज्ञा-परंपरा में रहकर, बाण पर शक्ति का प्रहार करते हैं। प्रचण्ड दिव्य नाद होता है, दिशाएँ और आकाश दहक उठते हैं; क्षणमात्र में बाण अपने सैन्य सहित भस्म हो जाता है और शक्ति लौट आती है। अध्याय शरणागति, स्तुति और तत्क्षण दिव्य प्रत्युत्तर की प्रभावशीलता दिखाता है।
तारकवधोत्तरं देवस्तुतिः पर्वतवरप्रदानं च / Devas’ Hymn after Tāraka’s Slaying and the Bestowal of Boons upon the Mountains
इस अध्याय में ब्रह्मा तारक-वध के बाद देवताओं की प्रसन्नता का वर्णन करते हैं। विष्णु सहित समस्त देव शंकर-पुत्र कुमार/स्कन्द की दीर्घ स्तुति करते हैं और उन्हें दत्त-दैवी अधिकार से सृष्टि-स्थिति-लय के कार्यों का संचालक मानकर देव-रक्षा तथा धर्म-व्यवस्था की स्थिरता की प्रार्थना करते हैं। स्तुति से प्रसन्न होकर कुमार क्रमशः वर प्रदान करते हैं। इस अंश में वे पर्वतों से कहकर उन्हें तपस्वियों, यज्ञकर्म करने वालों और तत्त्वज्ञों द्वारा पूज्य घोषित करते हैं तथा भविष्य में उन्हें शम्भु के विशिष्ट रूप और शिव-लिङ्ग-रूप बनने की भविष्यवाणी करते हैं। अध्याय में विजय-उपरान्त स्तोत्र, संरक्षण का आश्वासन और पर्वत-भूमि का पावनीकरण एक साथ आता है।
गणेशोत्पत्ति-प्रसङ्गः / Episode on the Origin of Gaṇeśa (Śvetakalpa Account)
अध्याय 13 में सूत बताते हैं कि तारकारि (स्कन्द) से जुड़ा अद्भुत प्रसंग सुनकर नारद प्रसन्न होकर ब्रह्मा से गणेश की परम कथा का विधिपूर्वक वर्णन पूछते हैं। वे गणेश के ‘सर्वमंगल’ जन्म-वृत्त और जीवन-प्रसंग की याचना करते हैं। ब्रह्मा कल्प-भेद समझाते हुए पहले कही कथा का स्मरण कराते हैं—शनि की दृष्टि से शिशु का सिर कटना और फिर हाथी का सिर स्थापित होना। इसके बाद वे श्वेतकल्प का वर्णन आरम्भ करते हैं, जहाँ कारण-परम्परा में शिव करुणावश सिर काटते हैं। फिर सिद्धान्त स्पष्ट किया जाता है कि परम कर्ता शंकर ही हैं; शम्भु जगदीश्वर हैं, निर्गुण भी और सगुण भी; उनकी लीला से सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं। आगे शिव-विवाह के बाद कैलास लौटने पर समय आने से गणपति के प्राकट्य की भूमिका बनती है; पार्वती अपनी सखियों जया-विजया के साथ परामर्श करती हैं, जिससे आगे द्वारपालन, प्रवेश-नियमन और गृह-दैवी उद्देश्य से जुड़े प्रसंगों की पृष्ठभूमि तैयार होती है।
द्वारपाल-गणेशसंवादः / The Dialogue at the Gate: Gaṇeśa and Śiva’s Gaṇas
अध्याय 14 में पवित्र द्वार पर टकराव का वर्णन है। ब्रह्मा बताते हैं कि शिव की आज्ञा से क्रुद्ध शिवगण वहाँ पहुँचकर द्वारपाल—गिरिजा-पुत्र गणेश—से उसकी पहचान, उत्पत्ति और उद्देश्य पूछते हैं तथा उसे हट जाने का आदेश देते हैं। दण्ड हाथ में लिए निर्भय गणेश उलटे उनसे प्रश्न करते हुए द्वार पर उनके विरोध को चुनौती देते हैं। गण आपस में उसका उपहास करते हैं, फिर स्वयं को शंकर के सेवक बताकर कहते हैं कि वे शंकर के आदेश से उसे रोकने आए हैं; उसे गण-सदृश मानकर ही वे वध नहीं करते, ऐसा चेतावनी देते हैं। धमकियों के बाद भी गणेश द्वार नहीं छोड़ते। तब गण शिव को घटना सुनाते हैं; इस प्रसंग में अधिकार, निकटता और अनुमति जैसे शैव विषय, शिव-आज्ञा के दावे की परीक्षा के रूप में उभरते हैं।
गणेश-वाक्यं तथा गणानां समर-सन्नाहः | Gaṇeśa’s Challenge and the Mustering of the Gaṇas
इस अध्याय में युद्ध की भूमिका और वाक्-प्रेरणा का वर्णन है। ब्रह्मा कहते हैं कि एक महाप्रभावशाली सत्ता के संबोधन के बाद सब पक्ष दृढ़ निश्चय करके पूर्ण तैयारी सहित शिवधाम/मंदिर-प्रदेश की ओर बढ़ते हैं। गणेश श्रेष्ठ गणों के आगमन को देखकर रण-भाव धारण करते हैं और उन्हें सीधे संबोधित करते हैं। वे इस मुठभेड़ को शिवाज्ञा-परिपालन की निष्ठा-परीक्षा बताते हैं और स्वयं को ‘बालक’ कहकर चुनौती की लज्जा-शिक्षा को तीव्र करते हैं—यदि अनुभवी योद्धा एक बालक से लड़ें तो उनकी लज्जा पार्वती और शिव के साक्षी होने से प्रकट होगी। वे नियम समझाकर यथाविधि युद्ध करने को कहते हैं और घोषणा करते हैं कि तीनों लोकों में कोई होने वाले को रोक नहीं सकता। तब गण अपमानित होकर भी उद्दीप्त होते हैं, विविध आयुध धारण कर युद्ध के लिए एकत्र होते हैं; इस प्रकार शिव की सर्वोच्च सत्ता के अंतर्गत दिव्य लीला-रूप संघर्ष में अनुशासन और अधिकार का भाव उभरता है।
युद्धप्रसङ्गः—देवगणयुद्धे शिवविष्णुसंयोगः / Battle Episode—Śiva–Viṣṇu Convergence in the Devas’ Conflict
इस अध्याय में ब्रह्मा नारद से युद्ध-प्रसंग का वर्णन करते हैं। शक्ति से समर्थ एक दुर्जेय बाल-वीर के साथ देवगणों का घोर संग्राम होता है, पर देव शिवपादाम्बुज-स्मरण से भीतर स्थिर रहते हैं। विष्णु को बुलाया जाता है और वे महान बल से रण में उतरते हैं; विरोधी की असाधारण दृढ़ता देखकर शिव कहते हैं कि उसे सीधे बल से नहीं, छल/युक्ति से ही जीता जा सकता है। शिव का निरगुण होते हुए भी गुणरूप होना स्पष्ट किया गया है और उनकी उपस्थिति ही अन्य देवों को युद्धभूमि में एकत्र करती है। अंत में मेल-मिलाप, शिवगणों का हर्ष और सर्वत्र उत्सव होता है, जिससे संकट के बाद शिव की सर्वोच्च सत्ता में धर्म-व्यवस्था की पुनर्स्थापना दिखती है।
देव्याः क्रोधः शक्तिनिर्माणं च (Devī’s Wrath and the Manifestation of the Śaktis)
इस अध्याय में नारद ब्रह्मा से महादेवी से जुड़े प्रसंग के बाद की स्थिति पूछते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि गण वाद्य बजाकर उत्सव करते हैं, पर शिव एक शिरच्छेद के बाद शोक में डूब जाते हैं। गिरिजा/देवी तीव्र क्रोध और दुःख से अपनी हानि का विलाप करती हैं और अपराधी गणों का नाश करने या प्रलय आरम्भ करने का विचार करती हैं। उसी क्षण जगदम्बा असंख्य शक्तियों को प्रकट करती हैं; वे शक्तियाँ देवी को प्रणाम कर आदेश मांगती हैं। महामाया, शम्भुशक्ति/प्रकृति-स्वरूपा देवी उन्हें बिना हिचक संहार-कार्य करने की आज्ञा देती हैं, जिससे शोक से क्रोध, शक्ति-प्राकट्य और सृष्टि-व्यवस्था बनाम विनाश-वेग का तनाव स्पष्ट होता है।
गणेशाभिषेक-वरदान-विधानम् | Gaṇeśa’s Consecration, Boons, and Prescribed Worship
अध्याय 18 नारद–ब्रह्मा संवाद में है। नारद पूछते हैं कि देवी गिरिजा ने पुत्र को जीवित देखकर आगे क्या हुआ। ब्रह्मा महोत्सव का वर्णन करते हैं—देव और गणाध्यक्ष शिवपुत्र को दुःखमुक्त कर विधिवत अभिषेक करते हैं, उसे गजानन तथा शिवगणों का नायक मानकर प्रतिष्ठित करते हैं। देवी शिवा मातृआनन्द से बालक को आलिंगन कर वस्त्र-आभूषण देती हैं और सिद्धियों आदि के साथ पूजन करती हैं। फिर वरदान-विधान आता है—गणेश का पूर्वपूज्यत्व और अमरों में सदा शोक-रहितता। मुख पर सिन्दूर का संकेत मनुष्यों के लिए सिन्दूर से पूजा का निर्देश बनता है; पुष्प, चन्दन, सुगन्ध, नैवेद्य, नीराजन आदि उपचार बताकर गणेश-पूजा को शुभारम्भ का प्रमाणित विधान बनाया गया है।
गणेश-षण्मुखयोः विवाहविचारः / Deliberation on the Marriages of Gaṇeśa and Ṣaṇmukha
इस अध्याय में नारद गणेश के दिव्य जन्म और पराक्रम को सुनकर पूछते हैं—“ततः क्या हुआ?” जिससे शिव‑शिवा की कीर्ति बढ़े और महान आनंद हो। ब्रह्मा उनकी करुणामय जिज्ञासा की प्रशंसा कर क्रमबद्ध कथा कहते हैं। शिव और पार्वती स्नेही माता‑पिता की भाँति गणेश और षण्मुख से बढ़ते हुए प्रेम करते हैं, जो बढ़ते चंद्रमा जैसा है। माता‑पिता के संरक्षण से पुत्रों का सुख बढ़ता है और वे भी भक्ति‑सेवा (परिचर्या) से दोनों की सेवा करते हैं। फिर एकांत में शिव‑शिवा प्रेमपूर्वक विचार करते हैं कि दोनों पुत्र विवाह योग्य हो गए हैं; अतः दोनों के शुभ विवाह किस प्रकार और उचित समय पर किए जाएँ। लीला और धर्मसम्मत विधि‑चिंतन का यह संगम आगे की विवाह‑व्यवस्था की भूमिका बनाता है।
गणेशविवाहोत्सवः तथा सिद्धि-बुद्धि-सन्तानवर्णनम् | Gaṇeśa’s Wedding Festival and the Progeny of Siddhi & Buddhi
इस अध्याय में गणेश के विवाह-विधि का शुभ समापन और उसका दिव्य उत्सव वर्णित है। ब्रह्मा दिव्य लोक में घटनाक्रम देखकर विश्वरूप प्रजापति की तृप्ति तथा उसकी दो तेजस्विनी कन्याओं—सिद्धि और बुद्धि—का उल्लेख करते हैं। शंकर और गिरिजा गणेश का महोत्सव-विवाह कराते हैं; देवता और ऋषि आनंदपूर्वक सम्मिलित होते हैं, और विश्वकर्मा विधिपूर्वक व्यवस्था करते हैं। इस मंगल अवसर से शिव-पार्वती का मनोरथ पूर्ण होता है। आगे समय बीतने पर सिद्धि से क्षेम और बुद्धि से लाभ नामक दो दिव्य पुत्र उत्पन्न होते हैं, जो कल्याण-रक्षा और समृद्धि-प्राप्ति के प्रतीक हैं। गणेश का सुख अवर्णनीय कहा गया है और कथा पृथ्वी-परिभ्रमण कर किसी के आगमन की ओर बढ़ती है।