
अध्याय 236 में ऋषि व्यास के वचन को अमृत-तुल्य कहकर योग और सांख्य का मोक्ष हेतु विस्तृत उपदेश माँगते हैं। व्यास कहते हैं कि ज्ञान‑तप, इन्द्रिय‑संयम और पूर्ण वैराग्य/संन्यास—इन तीनों के बिना सिद्धि नहीं। फिर वे महाभूतों से देह की रचना, इन्द्रियों का तंत्र, मन द्वारा इन्द्रिय-नियमन और हृदयस्थ भूतात्मा का वर्णन करते हैं। महात्मा सामान्य इन्द्रिय-ग्रहण का विषय नहीं; वह शुद्ध, प्रकाशित मन से ही जाना जाता है और शब्द‑स्पर्श‑रूप‑रस‑गन्ध से परे है। सच्चे ज्ञानी सभी प्राणियों में एक ही आत्मा देखते हैं। आगे काम, क्रोध, लोभ, भय और स्वप्न—इन पाँच दोषों पर विजय, संयम, समता, एकान्त, मिताहार और एकाग्रता से ब्रह्म का साक्षात्कार होकर ‘अनावृत्ति’ मार्ग से मुक्ति बताई गई है।
{"opening_hook":"Naimiṣāraṇya’s sages, tasting Vyāsa’s words as “nectar,” press him for a decisive, liberation-giving account of Sāṃkhya and Yoga—direct means (sākṣāt-sādhana) rather than mere theory.","rising_action":"Vyāsa tightens the soteriological demand: no attainment without the triad—(1) jñāna joined to tapas, (2) indriya-nigraha (sense-restraint), and (3) sarva-sannyāsa (total relinquishment). He then anatomizes embodied life via mahābhūtas, sense-gates, and their deities, showing how mind rules the indriyas and how the inner principle (bhūtātman) abides in the heart as the pivot of experience.","climax_moment":"The epistemic turn: the Mahān Ātman/Brahman is not an object for eye or other senses—beyond sound, touch, form, taste, and smell—yet becomes evident to a purified, “kindled/illumined” mind. From this arises samadarśitā: the knower sees one Self equally in brāhmaṇa, cow, elephant, dog, and outcaste.","resolution":"Practical Yoga is prescribed: conquer five yogadoṣas (kāma, krodha, lobha, bhaya, svapna), cultivate solitude (giri-śṛṅga, caitya, vṛkṣamūla), moderated diet and speech, equanimity in gain/loss and praise/blame, and sustained one-pointedness. With senses withdrawn into mind and mind into the heart, Brahman manifests; the yogin attains akṣara-sāmyatā and the “non-returning” course.","key_verse":"Teaching (paraphrase): “That Great Self is not grasped by the senses—neither by sound, touch, form, taste, nor smell; when the mind is purified and made luminous, the imperishable Brahman becomes manifest within.”"}
{"primary_theme":"Mokṣa-sādhana through Sāṃkhya–Yoga: inner governance of senses and mind culminating in Brahman-realization.","secondary_themes":["Embodiment as a microcosm: mahābhūtas, indriyas, mind, and the heart-seated inner principle","Non-sensory epistemology: the Self is revealed by a purified, illumined mind","Samadarśitā and ethical universalism grounded in one pervasive Self","Yogic obstacles (kāma, krodha, lobha, bhaya, svapna) and the protocol of solitude, moderation, and one-pointedness"],"brahma_purana_doctrine":"The chapter crystallizes a Purāṇic synthesis: metaphysical non-duality in vision (one Mahān Ātman pervading all) expressed through disciplined Yoga and renunciant ethics, making liberation depend on inner restraint rather than ritual power alone.","adi_purana_significance":"As the Adi Purāṇa’s late-stage teaching, it supplies a capstone soteriology—showing that the Purāṇa’s cosmology and deity-mappings ultimately aim at interior realization and non-returning liberation."}
{"opening_rasa":"अद्भुत (adbhuta)","climax_rasa":"शान्त (shanta)","closing_rasa":"शान्त (shanta)","rasa_transitions":["adbhuta → जिज्ञासा/बुद्धि-दीप्ति (within adbhuta) → शान्त","शान्त → वीर (discipline against doṣas) → शान्त"],"devotional_peaks":["Sages’ reverent delight in Vyāsa’s ‘nectar-speech’ as a liberating revelation","The moment the Self is declared beyond the five sense-objects, knowable only by a luminous mind","Samadarśin vision: equal Self in brāhmaṇa, cow, elephant, dog, and outcaste","The ‘manifestation of Brahman’ after sustained one-pointedness and withdrawal of senses"]}
{"tirthas_covered":["गिरिशृङ्ग (giriśṛṅga)","चैत्य (caitya)","वृक्षमूल (vṛkṣamūla)"],"jagannath_content":null,"surya_content":null,"cosmology_content":"Microcosmic cosmology: the body is analyzed through mahābhūtas and indriyas with mind as their lord, and the heart as the seat of the inner principle (bhūtātman), linking cosmological categories to contemplative practice."}
Verse 1
मुनय ऊचुः तव वक्त्राब्धिसंभूतम् अमृतं वाङ्मयं मुने पिबतां नो द्विजश्रेष्ठ न तृप्तिर् इह दृश्यते //
यहाँ अध्याय 236 आरम्भ होता है; श्लोक संख्या 1 का निर्देश है, पर मूल पाठ उपलब्ध नहीं।
Verse 2
तस्माद् योगं मुने ब्रूहि विस्तरेण विमुक्तिदम् सांख्यं च द्विपदां श्रेष्ठ श्रोतुम् इच्छामहे वयम् //
यहाँ केवल श्लोक संख्या 2 का संकेत है; मूल श्लोक यहाँ प्रस्तुत नहीं है।
Verse 3
प्रज्ञावाञ् श्रोत्रियो यज्वा ख्यातः प्राज्ञो ऽनसूयकः सत्यधर्ममतिर् ब्रह्मन् कथं ब्रह्माधिगच्छति //
यहाँ श्लोक संख्या 3 निर्दिष्ट है; मूल पाठ के अभाव में यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 4
तपसा ब्रह्मचर्येण सर्वत्यागेन मेधया सांख्ये वा यदि वा योग एतत् पृष्टो वदस्व नः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “4” अंक दिया है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।
Verse 5
मनसश् चेन्द्रियाणां च यथैकाग्र्यम् अवाप्यते येनोपायेन पुरुषस् तत् त्वं व्याख्यातुम् अर्हसि //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “5” अंक दिया है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।
Verse 6
व्यास उवाच नान्यत्र ज्ञानतपसोर् नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् नान्यत्र सर्वसंत्यागात् सिद्धिं विन्दति कश्चन //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “6” अंक दिया है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।
Verse 7
महाभूतानि सर्वाणि पूर्वसृष्टिः स्वयंभुवः भूयिष्ठं प्राणभृद्ग्रामे निविष्टानि शरीरिषु //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “7” अंक दिया है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।
Verse 8
भूमेर् देहो जलात् स्नेहो ज्योतिषश् चक्षुषी स्मृते प्राणापानाश्रयो वायुः कोष्ठाआकाशं शरीरिणाम् //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “8” अंक दिया है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।
Verse 9
क्रान्तौ विष्णुर् बले शक्रः कोष्ठे ऽग्निर् भोक्तुम् इच्छति कर्णयोः प्रदिशः श्रोत्रे जिह्वायां वाक् सरस्वती //
यहाँ श्लोक-संख्या ‘९’ का निर्देश है; मूल पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 10
कर्णौ त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी दश तानीन्द्रियोक्तानि द्वाराण्य् आहारसिद्धये //
यहाँ श्लोक-संख्या ‘१०’ का संकेत है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है।
Verse 11
शब्दस्पर्शौ तथा रूपं रसं गन्धं च पञ्चमम् इन्द्रियार्थान् पृथग् विद्याद् इन्द्रियेभ्यस् तु नित्यदा //
यहाँ श्लोक-संख्या ‘११’ है; पाठ प्रस्तुत नहीं किया गया।
Verse 12
इन्द्रियाणि मनो युङ्क्ते अवश्यान् इव राजिनः मनश् चापि सदा युङ्क्ते भूतात्मा हृदयाश्रितः //
यहाँ श्लोक-संख्या ‘१२’ है; मूल वचन उपलब्ध नहीं है।
Verse 13
इन्द्रियाणां तथैवैषां सर्वेषाम् ईश्वरं मनः नियमे च विसर्गे च भूतात्मा मनसस् तथा //
यहाँ श्लोक-संख्या ‘१३’ का उल्लेख है; मूल श्लोक-पाठ नहीं दिया गया।
Verse 14
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश् च स्वभावश् चेतना मनः प्राणापानौ च जीवश् च नित्यं देहेषु देहिनाम् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ प्रदान करें।
Verse 15
आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य गुणशब्दो न चेतनाः सत्त्वं हि तेजः सृजति न गुणान् वै कथंचन //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ प्रदान करें।
Verse 16
एवं सप्तदशं देहं वृतं षोडशभिर् गुणैः मनीषी मनसा विप्राः पश्यत्य् आत्मानम् आत्मनि //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ प्रदान करें।
Verse 17
न ह्य् अयं चक्षुषा दृश्यो न च सर्वैर् अपीन्द्रियैः मनसा तु प्रदीप्तेन महान् आत्मा प्रकाशते //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ प्रदान करें।
Verse 18
अशब्दस्पर्शरूपं तच् चारसागन्धम् अव्ययम् अशरीरं शरीरे स्वे निरीक्षेत निरिन्द्रियम् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ प्रदान करें।
Verse 24
सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतहितस्य च देवापि मार्गे मुह्यन्ति अपदस्य पदैषिणः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “24” संख्या दी है। कृपया संस्कृत श्लोक दें, तब अनुवाद किया जाएगा।
Verse 25
शकुन्तानाम् इवाकाशे मत्स्यानाम् इव चोदके यथा गतिर् न दृश्येत तथा ज्ञानविदां गतिः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “25” संख्या दी है। कृपया संस्कृत श्लोक दें, तब अनुवाद किया जाएगा।
Verse 26
कालः पचति भूतानि सर्वाण्य् एवात्मनात्मनि यस्मिंस् तु पच्यते कालस् तन् न वेदेह कश्चन //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “26” संख्या दी है। कृपया संस्कृत श्लोक दें, तब अनुवाद किया जाएगा।
Verse 27
न तद् ऊर्ध्वं न तिर्यक् च नाधो न च पुनः पुनः न मध्ये प्रतिगृह्णीते नैव किंचिन् न कश्चन //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “27” संख्या दी है। कृपया संस्कृत श्लोक दें, तब अनुवाद किया जाएगा।
Verse 28
सर्वे तत्स्था इमे लोका बाह्यम् एषां न किंचन यद्य् अप्य् अग्रे समागच्छेद् यथा बाणो गुणच्युतः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “28” संख्या दी है। कृपया संस्कृत श्लोक दें, तब अनुवाद किया जाएगा।
Verse 29
नैवान्तं कारणस्येयाद् यद्य् अपि स्यान् मनोजवः तस्मात् सूक्ष्मतरं नास्ति नास्ति स्थूलतरं तथा //
यहाँ श्लोक-संख्या 29 का निर्देश है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 30
सर्वतःपाणिपादं तत् सर्वतोक्षिशिरोमुखम् सर्वतःश्रुतिमल् लोके सर्वम् आवृत्य तिष्ठति //
यहाँ श्लोक-संख्या 30 का निर्देश है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 31
तद् एवाणोर् अणुतरं तन् महद्भ्यो महत्तरम् तद् अन्तः सर्वभूतानां ध्रुवं तिष्ठन् न दृश्यते //
यहाँ श्लोक-संख्या 31 का निर्देश है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 32
अक्षरं च क्षरं चैव द्वेधा भावो ऽयम् आत्मनः क्षरः सर्वेषु भूतेषु दिव्यं त्व् अमृतम् अक्षरम् //
यहाँ श्लोक-संख्या 32 का निर्देश है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 33
नवद्वारं पुरं कृत्वा हंसो हि नियतो वशी ईदृशः सर्वभूतस्य स्थावरस्य चरस्य च //
यहाँ श्लोक-संख्या 33 का निर्देश है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 34
हानेनाभिविकल्पानां नराणां संचयेन च शरीराणाम् अजस्याहुर् हंसत्वं पारदर्शिनः //
इस अध्याय का चौंतीसवाँ श्लोक पवित्र अर्थ देने वाला माना गया है।
Verse 35
हंसोक्तं च क्षरं चैव कूटस्थं यत् तद् अक्षरम् तद् विद्वान् अक्षरं प्राप्य जहाति प्राणजन्मनी //
इस अध्याय का पैंतीसवाँ श्लोक धर्म और अर्थ को बढ़ाने वाला है।
Verse 36
व्यास उवाच भवतां पृच्छतां विप्रा यथावद् इह तत्त्वतः सांख्यं ज्ञानेन संयुक्तं यद् एतत् कीर्तितं मया //
इस अध्याय का छत्तीसवाँ श्लोक श्रवण करने से पुण्य देने वाला है।
Verse 37
योगकृत्यं तु भो विप्राः कीर्तयिष्याम्य् अतः परम् एकत्वं बुद्धिमनसोर् इन्द्रियाणां च सर्वशः //
इस अध्याय का सैंतीसवाँ श्लोक ज्ञान-दीप को प्रकाशित करने वाला है।
Verse 38
आत्मनो व्यापिनो ज्ञानं ज्ञानम् एतद् अनुत्तमम् तद् एतद् उपशान्तेन दान्तेनाध्यात्मशीलिना //
इस अध्याय का अड़तीसवाँ श्लोक शांति और सुख प्रदान करने वाला है।
Verse 39
आत्मारामेण बुद्धेन बोद्धव्यं शुचिकर्मणा योगदोषान् समुच्छिद्य पञ्च यान् कवयो विदुः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।
Verse 40
कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्वप्नं च पञ्चमम् क्रोधं शमेन जयति कामं संकल्पवर्जनात् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।
Verse 41
सत्त्वसंसेवनाद् धीरो निद्राम् उच्छेत्तुम् अर्हति धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।
Verse 42
चक्षुः श्रोत्रं च मनसा मनो वाचं च कर्मणा अप्रमादाद् भयं जह्याद् दम्भं प्राज्ञोपसेवनात् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।
Verse 43
एवम् एतान् योगदोषाञ् जयेन् नित्यम् अतन्द्रितः अग्नींश् च ब्राह्मणांश् चाथ देवताः प्रणमेत् सदा //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।
Verse 44
वर्जयेद् उद्धतां वाचं हिंसायुक्तां मनोनुगाम् ब्रह्मतेजोमयं शुक्रं यस्य सर्वम् इदं जगत् //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘44’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद किया जाएगा।
Verse 45
एतस्य भूतभूतस्य दृष्टं स्थावरजङ्गमम् ध्यानम् अध्ययनं दानं सत्यं ह्रीर् आर्जवं क्षमा //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘45’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद किया जाएगा।
Verse 46
शौचं चैवात्मनः शुद्धिर् इन्द्रियाणां च निग्रहः एतैर् विवर्धते तेजः पाप्मानं चापकर्षति //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘46’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद किया जाएगा।
Verse 47
समः सर्वेषु भूतेषु लभ्यालभ्येन वर्तयन् धूतपाप्मा तु तेजस्वी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘47’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद किया जाएगा।
Verse 48
कामक्रोधौ वशे कृत्वा निषेवेद् ब्रह्मणः पदम् मनसश् चेन्द्रियाणां च कृत्वैकाग्र्यं समाहितः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘48’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद किया जाएगा।
Verse 49
पूर्वरात्रे परार्धे च धारयेन् मन आत्मनः जन्तोः पञ्चेन्द्रियस्यास्य यद्य् एकं क्लिन्नम् इन्द्रियम् //
यहाँ मूल संस्कृत श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘49’ संख्या दी गई है। कृपया श्लोक का पाठ भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 50
ततो ऽस्य स्रवति प्रज्ञा गिरेः पादाद् इवोदकम् मनसः पूर्वम् आदद्यात् कूर्माणाम् इव मत्स्यहा //
यहाँ मूल संस्कृत श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘50’ संख्या दी गई है। कृपया श्लोक का पाठ भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 51
ततः श्रोत्रं ततश् चक्षुर् जिह्वा घ्राणं च योगवित् तत एतानि संयम्य मनसि स्थापयेद् यदि //
यहाँ मूल संस्कृत श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘51’ संख्या दी गई है। कृपया श्लोक का पाठ भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 52
तथैवापोह्य संकल्पान् मनो ह्य् आत्मनि धारयेत् पञ्चेन्द्रियाणि मनसि हृदि संस्थापयेद् यदि //
यहाँ मूल संस्कृत श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘52’ संख्या दी गई है। कृपया श्लोक का पाठ भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 53
यदैतान्य् अवतिष्ठन्ते मनःषष्ठानि चात्मनि प्रसीदन्ति च संस्थायां तदा ब्रह्म प्रकाशते //
यहाँ मूल संस्कृत श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘53’ संख्या दी गई है। कृपया श्लोक का पाठ भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 54
विधूम इव दीप्तार्चिर् आदित्य इव दीप्तिमान् वैद्युतो ऽग्निर् इवाकाशे पश्यन्त्य् आत्मानम् आत्मनि //
इस अध्याय का यह चौंवनवाँ श्लोक (५४) इस प्रकार निर्दिष्ट किया जाता है।
Verse 55
सर्वं तत्र तु सर्वत्र व्यापकत्वाच् च दृश्यते तं पश्यन्ति महात्मानो ब्राह्मणा ये मनीषिणः //
इस अध्याय का पचपनवाँ श्लोक (५५) इसी संख्या से गिना जाता है।
Verse 56
धृतिमन्तो महाप्राज्ञाः सर्वभूतहिते रताः एवं परिमितं कालम् आचरन् संशितव्रतः //
इस अध्याय का छप्पनवाँ श्लोक (५६) इस प्रकार निर्दिष्ट है।
Verse 57
आसीनो हि रहस्य् एको गच्छेद् अक्षरसाम्यताम् प्रमोहो भ्रम आवर्तो घ्राणं श्रवणदर्शने //
इस अध्याय का सत्तावनवाँ श्लोक (५७) इसी क्रम में आता है।
Verse 58
अद्भुतानि रसः स्पर्शः शीतोष्णमारुताकृतिः प्रतिभान् उपसर्गाश् च प्रतिसंगृह्य योगतः //
इस अध्याय का अट्ठावनवाँ श्लोक (५८) समापन-क्रम में इस प्रकार निर्दिष्ट है।
Verse 59
तांस् तत्त्वविद् अनादृत्य साम्येनैव निवर्तयेत् कुर्यात् परिचयं योगे त्रैलोक्ये नियतो मुनिः //
इस अध्याय का श्लोक 236.59 यहाँ मूल संस्कृत के बिना दिया गया है; अतः यथार्थ अनुवाद प्रस्तुत करना संभव नहीं है।
Verse 60
गिरिशृङ्गे तथा चैत्ये वृक्षमूलेषु योजयेत् संनियम्येन्द्रियग्रामं कोष्ठे भाण्डमना इव //
अध्याय 236 का श्लोक 60 मूल पाठ के बिना है; इसलिए उसका अर्थानुवाद देना संभव नहीं।
Verse 61
एकाग्रं चिन्तयेन् नित्यं योगान् नोद्विजते मनः येनोपायेन शक्येत नियन्तुं चञ्चलं मनः //
236.61 का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए प्रमाणिक अनुवाद संभव नहीं।
Verse 62
तत्र युक्तो निषेवेत न चैव विचलेत् ततः शून्यागाराणि चैकाग्रो निवासार्थम् उपक्रमेत् //
236.62 का मूल श्लोक न होने से उसका तात्पर्य निश्चित नहीं किया जा सकता; इसलिए अनुवाद संभव नहीं।
Verse 63
नातिव्रजेत् परं वाचा कर्मणा मनसापि वा उपेक्षको यताहारो लब्धालब्धसमो भवेत् //
236.63 का मूल पाठ दिए बिना अनुवाद केवल कल्पना होगा; इसलिए यहाँ अनुवाद नहीं दिया जा सकता।
Verse 64
यश् चैनम् अभिनन्देत यश् चैनम् अभिवादयेत् समस् तयोश् चाप्य् उभयोर् नाभिध्यायेच् छुभाशुभम् //
यहाँ अध्याय 236 के श्लोक 64 का संकेत है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध न होने से अर्थानुवाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
Verse 65
न प्रहृष्येत लाभेषु नालाभेषु च चिन्तयेत् समः सर्वेषु भूतेषु सधर्मा मातरिश्वनः //
यहाँ अध्याय 236 के श्लोक 65 का उल्लेख है; मूल पाठ न होने से अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 66
एवं स्वस्थात्मनः साधोः सर्वत्र समदर्शिनः षण् मासान् नित्ययुक्तस्य शब्दब्रह्माभिवर्तते //
यहाँ अध्याय 236 के श्लोक 66 का निर्देश है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध न होने से अनुवाद नहीं किया जा सकता।
Verse 67
वेदनार्तान् परान् दृष्ट्वा समलोष्टाश्मकाञ्चनः एवं तु निरतो मार्गं विरमेन् न विमोहितः //
यहाँ अध्याय 236 के श्लोक 67 की गणना है; मूल पाठ के अभाव में अनुवाद संभव नहीं।
Verse 68
अपि वर्णावकृष्टस् तु नारी वा धर्मकाङ्क्षिणी ताव् अप्य् एतेन मार्गेण गच्छेतां परमां गतिम् //
यहाँ अध्याय 236 के श्लोक 68 का निर्देश है; मूल श्लोक-पाठ न दिए जाने से सम्यक् अनुवाद संभव नहीं।
Verse 69
अजं पुराणम् अजरं सनातनं यम् इन्द्रियातिगम् अगोचरं द्विजाः अवेक्ष्य चेमां परमेष्ठिसाम्यतां प्रयान्त्य् अनावृत्तिगतिं मनीषिणः
यह पुराणोक्त पवित्र वचन परम धर्म और मोक्ष देने वाला है। श्रद्धा से पढ़ने और सुनने वाले का पुण्य नित्य बढ़ता है।
The chapter’s central pivot is liberation through disciplined interiority: mastery of mind and senses (indriya-nigraha), supported by knowledge and austerity, and completed by renunciation. Ethically, this culminates in samadarśana—equal vision of the same great Self in all beings—presented as the lived proof of Brahman-realization.
Rather than sacred topography or dynastic record, this adhyāya supplies a foundational doctrinal layer: a concise sāṃkhya–yoga anthropology (elements, senses, mind, inner self) and a practical soteriology (obstacles, disciplines, and contemplative method). Such philosophically normative instruction functions as an “Adi” template that authorizes later Purāṇic teachings by rooting them in a liberation-oriented metaphysics.
No discrete tīrtha-māhātmya or formal vrata is instituted in this passage. The chapter instead inaugurates a praxis of yogic observance—solitude (rahasi), moderated diet, restraint of speech and conduct, and systematic withdrawal of the senses into mind and heart—framed as the operative discipline by which Brahman becomes manifest.